Wednesday, 18 April 2018

परशुराम जयंती,, वैशाख शुक्ल द्वितीया को परशुराम जयंती है

परशुराम जयंती,, वैशाख शुक्ल द्वितीया को परशुराम जयंती है । इस उपलक्ष्यमें भगवान परशुरामसे संबंधित,,परशुरामकी कथाएं रामायण, महाभारत एवं कुछ पुराणोंमें पाई जाती हैं । पूर्वके अवतारोंके समान इनके नामका स्वतंत्र पुराण नहीं है ।
अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।
अर्थ : चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष्य-बाण है अर्थात् शौर्य है । अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।
मूर्ति : भीमकाय देह, मस्तकपर जटाभार, कंधेपर धनुष्य एवं हाथमें परशु, ऐसी होती है परशुरामकी मूर्ति ।
पूजाविधि: परशुराम श्रीविष्णुके अवतार हैं, इसलिए उन्हें उपास्य देवता मानकर पूजा जाता है । वैशाख शुक्ल तृतीयाकी परशुराम जयंती एक व्रत और उत्सवके तौरपर मनाई जाती है
परशुराम के अवतार हुए इसीलिए इस दिन इनकी जयंती मनाई जाती है।
अक्षय तृतीया का भगवान परशुराम के अवतार से संबंध होने से यह पर्व राष्ट्रीय शासन व्यवस्था के लिए भी एक विशेष स्मरणीय एवं चिंतनीय पर्व है। दस महाविद्याओं में भगवती पीतांबरा (बगलामुखी) के अनन्य साधक परशुरामजी ने अपनी शक्ति का प्रयोग सदैव कुशासन के विरुद्ध किया। निर्बल और असहाय समाज की रक्षा के लिए उनका कुठार अत्याचारी कुशासकों के लिए काल बन चुका था।
अधर्मी कार्तवीर्य (सहस्रबाहु) जिसने परशुरामजी के पिता महर्षि जमदग्नि को मारा था, उसका वध कर उसकी राजसत्ता को परशुरामजी ने छिन्न-भिन्न कर दिया। आज लोग किसी भी जीत को प्रकट करने के लिए जिन दो उंगलियों को उठाकर विजय मुद्रा का प्रदर्शन करते हैं वह परशुरामजी की विजय मुद्रा की नकल मात्र है। भगवान परशुराम की इस विजय मुद्रा के कई भाव हैं। इसका इसका एक भाव है, जो शासक जीव और परमात्मा में अंतर समझते हैं उनका मैंने मर्दन किया है।
दूसरा यह कि मनसुख और धर्मविमुख राजाओं को यह समझ लेना चाहिए कि या तो जनक की तरह निर्गुण निराकार ब्रह्म को जानने वाले तत्वज्ञानी राजा बनो या महाराजा दशरथ आदि की तरह सगुण साकार ब्रह्म को स्वीकार करो। अवैदिक अमर्यादित राजा मेरे कुठार से बच नहीं सकते इसीलिए उन्होंने तर्जनी और मध्यमा दो उंगलियों को प्रदर्शित कर ‍तात्विक विजय मुद्रा का प्रदर्शन किया।
इसीलिए पुराणों में कहीं भी कौशल नरेश महाराजा दशरथ और मिथिला नरेश महाराज जनक के साथ परशुरामजी के मनमुटाव के उदाहरण नहीं दिखते।,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal 08275555557,,,
श्रीराम द्वारा धनुष तोड़ने के बाद समस्त राजाओं की दुरभिसंधि हुई कि श्रीराम ने धनुष तो तोड़ लिया है लेकिन इन्हें सीता स्वयंवर से रोकना होगा। अत: अपनी-अपनी सेनाओं की टु‍कड़ियों के साथ धनुष यज्ञ में आए समस्त राजा एकजुट होकर श्रीराम से युद्ध के लिए कमर कसकर तैयार हो गए। धनुष यज्ञ गृहयुद्ध में बदलने वाला था, ऐसी विकट स्थि‍ति में वहां अपना फरसा लहराते हुए परशुरामजी प्रकट हो जाते हैं।
वे राजा जनक से पूछते हैं कि तुरंत बताओ कि यह शिव धनुष किसने तोड़ा है अन्यथा जितने भी राजा यहां बैठे हैं मैं क्रमश: उन्हें अपने परशु की भेंट चढ़ाता हूं। तब श्रीराम विनम्र भाव से कहते हैं- हे नाथ, शंकर के धनुष को तोड़ने वाला कोई आपका ही दास होगा। परशुराम-राम संवाद के बीच में ही लक्ष्मण उत्तेजित हो उठे। विकट लीला प्रारंभ हो गई। संवाद चलते रहे। लीला आगे बढ़ती रही।
परशुरामजी ने श्रीराम से कहा- अच्‍छा, मेरे विष्णु धनुष में तीर चढ़ाओ। तीर चढ़ गया, परशुरामजी ने प्रणाम किया और कहा- मेरा कार्य अब पूरा हुआ, आगे का कार्य करने के लिए श्रीराम आप आ गए हैं। गृहयुद्ध टल गया। सारे राजाओं ने श्रीराम को अपना सम्राट मान लिया, भेंट पूजा की एवं अपनी-अपनी राजधानी लौट गए।
श्रीराम के केंद्रीय शासन नियमों से धर्मयुक्त राज्य करने लगे। देश में शांति छाने लगी। अब श्रीराम निश्चिंत थे, क्योंकि उन्हें तो देश की सीमाओं के पार संचालित आतंक के खिलाफ लड़ना था इसीलिए अयोध्या आते ही वन को चले गए। पंचवटी में लीला रची गई, लंका कूच हुआ। रावण का कुशासन समाप्त हुआ। राम राज्य की स्थापना हुई। अत: रामराज्य की भूमिका तैयार करने वाले भगवान परशुराम ही थे।
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
परशुराम चालीसा
दोहा श्री गुरु चरण सरोज छवि, निज मन मन्दिर धारि ।
सुमरि गजानन शारदा, गहि आशिष त्रिपुरारि । ।
बुद्धिहीन जन जानिये, अवगुणों का भण्डार ।
बरणौं परशुराम सुयश, निज मति के अनुसार । ।
चौपाई जय प्रभु परशुराम सुख सागर, जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर ।
भृगुकुल मुकुट बिकट रणधीरा, क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा ।
जमदग्नी सुत रेणुका जाया, तेज प्रताप सकल जग छाया ।
मास बैसाख सित पच्छ उदारा, तृतीया पुनर्वसु मनुहारा ।
प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा, तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा ।
तब ऋषि कुटीर रुदन शिशु कीन्हा, रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा ।
निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े, मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े ।
तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा, जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा ।
धरा राम शिशु पावन नामा, नाम जपत लग लह विश्रामा ।
भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर, कांधे मूंज जनेऊ मनहर ।
मंजु मेखला कठि मृगछाला, रुद्र माला बर वक्ष विशाला ।
पीत बसन सुन्दर तुन सोहें, कंध तुरीण धनुष मन मोहें ।
वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता, क्रोध रूप तुम जग विख्याता ।
दायें हाथ श्रीपरसु उठावा, वेद-संहिता बायें सुहावा ।
विद्यावान गुण ज्ञान अपारा, शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा ।
भुवन चारिदस अरु नवखंडा, चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा ।
एक बार गणपति के संगा, जूझे भृगुकुल कमल पतंगा ।
दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा, एक दन्द गणपति भयो नामा ।
कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला, सहस्रबाहु दुर्जन विकराला ।
सुरगऊ लखि जमदग्नी पाही, रहिहहुं निज घर ठानि मन माहीं ।
मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई, भयो पराजित जगत हंसाई ।
तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी, रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी ।
ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना, निन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा ।
लगत शक्ति जमदग्नी निपाता, मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता ।
पितु-बध मातु-रुदन सुनि भारा, भा अति क्रोध मन शोक अपारा ।
कर गहि तीक्षण पराु कराला, दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला ।
क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा, पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा ।
इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी, छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी ।
जुग त्रेता कर चरित सुहाई, शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई ।
गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना, तब समूल नाश ताहि ठाना ।
कर जोरि तब राम रघुराई, विनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई ।
भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता, भये शिष्य द्वापर महँ अनन्ता ।
शस्त्र विद्या देह सुयश कमावा, गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा ।
चारों युग तव महिमा गाई, सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई ।
दे कश्यप सों संपदा भाई, तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई ।
अब लौं लीन समाधि नाथा, सकल लोक नावइ नित माथा ।
चारों वर्ण एक सम जाना, समदर्शी प्रभु तुम भगवाना ।
लहहिं चारि फल शरण तुम्हारी, देव दनुज नर भूप भिखारी ।
जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा, तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा ।
पूर्णेन्दु निसि बासर स्वामी, बसहुं हृदय प्रभु अन्तरयामी ।
दोहा
परशुराम को चारु चरित, मेटत सकल अज्ञान ।
शरण पड़े को देत प्रभु, सदा सुयश सम्मान । ।
श्लोक
भृगुदेव कुलं भानुं, सहस्रबाहुर्मर्दनम् ।
रेणुका नयनानंदं, परशुं वन्दे विप्रधनम् । ।
इति सम्पूर्ण

परशुराम स्तुती

परशुराम स्तुती
कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः ।
बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु ॥ १॥
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नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका
नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा ।
विप्राणां प्रतिमन्दिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नाम्ब्धीनो
स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः ॥ २॥
पायाद्वो यमदग्निवंशतिलको वीरव्रतालङ्कृतो
रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः ।
येनाशेषहताहिताङ्गरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा
भक्‍त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता ॥ ३॥
द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनङ्गदे पीयूषं
सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चतस्रो दश ।
एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः
पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः ॥ ४॥
इति परशुराममस्तुतिः
परशुराम सहस्रनामस्तोत्र ॥
पुरा दाशरथी रामः कृतोद्वाहः सबान्धवः ।
गच्छन् अयोध्यां राजेन्द्रः पितृमातृसुहृद्धतः ॥ १॥
ददर्श यान्तं मार्गेण क्षत्रियान्तकरं विभुम् ।
रामं तं भार्गवं दृष्टवाभितस्तुष्टाव राघवः ।
रामः श्रीमान्महाविष्णुरिति नामसहस्रतः ॥ २॥
अहं त्वत्तः परं राम विचरामि स्वलीलया ।
इत्युक्तवन्तमभ्यर्च प्रणिपत्य कृतान्जलिः ॥ ३॥
श्री राघव उवाच -
यन्नामग्रहणाज्जन्तुः प्राप्नुयात्र भवापदम् ।
यस्य पादार्चनात्सिद्धिः स्वेप्सिता नौमि भार्गवम् ॥ ४॥
निह्स्पृहो यः सदा देवो भूम्यां वसति माधवः ।
आत्मबोधोदधिं स्वच्छं योगिनं नौमि भार्गवम् ॥ ५॥
यस्मादेतज्जगत् सर्वं जायते यत्र लीलया ।
स्थितिं प्राप्नोति देवेशं जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ ६॥
यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण ब्रह्माद्याः सकलाः सुराः ।
शतवारं भवन्यत्र भवन्ति न भवन्ति च ॥ ७॥
तप उग्रं चचारादौ यमुद्दिश्य च रेणुका ।
आद्या शक्तिर्महादेवी रामं तं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥
॥ अथ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीजामदग्न्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री राम ऋषिः ।
जामदग्न्यः परमात्मा देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमदविनाशिरामप्रीत्यर्थम्
चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥
॥ अथ करन्यासः ॥
ॐ ह्रां गोविन्दात्मने अन्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं महीधरात्मने तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ह्रूं हृषीकेशात्मने मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मन्ने अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रः माधवात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ अथ हृदयन्यासः ॥
ॐ ह्रां गोविन्दात्मने हृदयाय नमः ।
ॐ महीधरात्मने शिरसे स्वाहा ।
ॐ ह्रौं हृषीकेशात्मने शिखायै वशट् ।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मने कवचाय हुम् ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने नेत्रत्रयाय वौशट् ।
ॐ ह्रः माधवात्मने अस्त्राय फट् ।
॥ अथ ध्यानम् ॥
शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तं कृष्णाजीनाधरं विभुम् ॥ ९॥
बाणचापौ च परशुमभयं च चतुर्भुजैः ।
प्रकोष्ठशोभिरुदाक्षैर्दधानं भृगुनन्दनम् ॥ १०॥
हेमयज्ञोपवीतं च स्निग्धस्मितमुखाम्बुजम् ।
दर्भाञ्जितकरं देवं क्षत्रियक्षयदीक्षितम् ॥ ११॥
श्रीवत्सवक्षसं रामं ध्यायेद्वै ब्रह्मचारिणम् ।
हृत्पुन्डरीकमध्यस्थं सनकाद्यैरभिष्टुतम् ॥ १२॥
सहस्रमिव सूर्याणामेकीभूय पुरःस्थितम् ।
तपसामिव सन्मूर्तिं भृगुवंशतपस्विनम् ॥ १३॥
चूडाचुम्बितकङ्कपत्रमभिस्तूणीद्वयपृष्ठतो ।
भस्मस्निग्धपवित्रलाञ्छनवपुर्धत्ते त्वचं रौरवीम् ॥ १४॥
मौञ्ज्या मेखलया नियन्त्रितमधो वासस्च माञ्जिष्ठकम् ।
पाणौ कार्मुकमक्षसूत्रवलयं दण्डं पा पैप्पलः ॥ १५॥
रेणुकाहृदयानन्दं भृगुवंशतपस्विनम् ।
क्षत्रियाणामन्तकं पूर्णं जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ १६॥
अव्यक्तव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ १७॥
श्री परशुराम द्वादश नामानि ॥
हरिः परशुधारी च रामः च भृगुनन्दनः ।
एकवीरात्मजो विष्णुः जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ १८॥
सहयाद्रिवासी वीरः च क्षत्रजित्पृथिवीपतिः ।
इति द्वादशनामानि भार्गवस्य महात्मनः ।
यस्त्रिकाले पठेन्नित्यं सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ १९

Sunday, 8 April 2018

मां काली दक्षिणकाली मंत्र ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥

मां काली मां दुर्गा का ही एक स्वरुप है।

https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5.   मां दुर्गा के इस महाकाली स्वरुप को देवी के सभी रुपों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। दसमहाविद्याओं में काली का पहला स्थान माना जाता है। दुष्ट, अभिमानी राक्षसों के संहार के लिए मां काली को जाना जाता है। अक्सर काली की साधना सन्यासी या तांत्रिक करते ही करते हैं लेकिन मां काली के कुछ मंत्र ऐसे भी हैं जिनका जाप कर कोई भी साधक अपने जीवन के संकटों को दूर कर सकता है।
22 अक्षरी श्री दक्षिण काली मंत्र
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
इस मंत्र के जरिये दक्षिण काली का आह्वान किया जाता है। शत्रुओं के विनाश के लिए साधक इस मंत्र के जरिये मां काली की साधना करते हैं व सिद्धि प्राप्त करते हैं। तंत्र विद्या में मां काली की साधना के लिए यह मंत्र काफी लोकप्रिय है। इस मंत्र का तात्पर्य है अर्थ है कि परमेश्वरी स्वरुप जगत जननी महाकाली महामाया मां मेरे दुखों को दूर करें। शत्रुओं का नाश कर मां अज्ञानता का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश हो। वैसे भी मां काली ज्ञान, मोक्ष तथा शत्रु नाश करने की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी कृपा से समस्त दुर्भाग्य दूर हो जाते हैं
एकाक्षरी काली मंत्र
ॐ क्रीं
यह मां काली का एकाक्षरी मंत्र है। इसका जप मां के सभी रूपों की आराधना, उपासना और साधना में किया जा सकता है। मां काली के इस एकाक्षरी मंत्र को मां चिंतामणि काली का विशेष मंत्र भी कहा जाता है।
तीन अक्षरी काली मंत्र
ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं॥
मां काली की साधना व उनके प्रचंड रुपों की आराधना के लिए यह तीन अक्षरी मंत्र एक विशिष्ट मंत्र है। एकाक्षरी व त्रयाक्षरी मंत्रों को तांत्रिक साधना के मंत्र के पहले और बाद में संपुट की तरह भी लगाया जा सकता है।
पांच अक्षरी काली मंत्र
ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं हूँ फट्॥
माना जाता है कि इस पंचाक्षरी मंत्र का जाप प्रतिदिन प्रात:काल में 108 बार किया जाये तो मां काली साधक के सभी दुखों का निवारण करके उसके यहां धन-धान्य की वृद्धि करती हैं। पारिवारिक शांति के लिए भी इस मंत्र का जप किया जाता है।
षडाक्षरी काली मंत्र
ॐ क्रीं कालिके स्वाहा॥
इस षडाक्षरी मंत्र का जप सम्मोहन आदि तांत्रिक सिद्धियों के लिए किया जाता है। यह मंत्र तीनों लोकों को मोहित करने वाला है।
सप्ताक्षरी काली मंत्र
ॐ हूँ ह्रीं हूँ फट् स्वाहा॥
यह मंत्र भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए यह मंत्र कारगर माना जाता है।
श्री दक्षिणकाली मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥
तांत्रिक इस मंत्र के जरिये दक्षिण काली की साधना कर सिद्धि प्राप्ति की कामना करते हैं। यदि आपको शत्रुओं का भय सता रहा है तो आप भी अपने गुरु के मार्गदर्शन में इस मंत्र का जाप कर सकते हैं।
श्री दक्षिणकाली मंत्र
क्रीं ह्रुं ह्रीं दक्षिणेकालिके क्रीं ह्रुं ह्रीं स्वाहा॥
यह भी दक्षिण काली का एक प्रचलित मंत्र है। रोग दोष आदि को दूर करने के लिए इस मंत्र से साधना करें। मां काली शीघ्र कृपा करती हैं।
श्री दक्षिणकाली मंत्र
ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
इस मंत्र में भी विभिन्न बीज मंत्रों को सम्मिलित किया गया है जिससे मंत्र और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। मां काली को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक या सन्यासी इस मंत्र के द्वारा मां काली की साधना करते हैं।
श्री दक्षिणकाली मंत्र
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके स्वाहा॥
यह काली माता का एक विशिष्ट मंत्र है इसका प्रयोग भी तांत्रिक साधना में किया जाता है।
भद्रकाली मंत्र
ॐ ह्रौं काली महाकाली किलिकिले फट् स्वाहा॥
मां भद्रकाली के इस मंत्र का प्रयोग शत्रुओं को वश में करने के लिये किया जाता है। शत्रुओं के तीव्र विनाश के लिये मां भद्रकाली की साधना की जाती है। मां भद्रकाली को धर्म, कर्म और अर्थ की सिद्धी देने वाली माना जाता है। साधक जिस भी कामना से भद्रकाली की साधना करता है, उनकी उपासना करता है, वह पूर्ण होती है।
श्री शमशान काली मंत्र
ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं॥
यह माना जाता है कि शमशान काली शमशान में वास करती हैं व शव की सवारी करती हैं। तंत्र विद्या के अनुसार शमशान काली की साधना शवारुढ़ यानि शव पर बैठकर की जाती है। इसलिए यह बहुत ही जटिल एवं अमानवीय साधना भी मानी जाती है जो कि सामाजिक व कानूनी रुप से लगभग प्रतिबंधित है। फिर भी लकड़ी आदि के टुकड़ों में प्राण प्रतिष्ठा कर उसे शव का रुप देकर भी तांत्रिक शमशान काली की साधना करते हैं। भूत-प्रेत, पिशाचादि को वश में करने के लिए शमशान काली की साधना की जाती है।
दस महाविद्या के शाबर मन्त्र साधना
साधना विधि
साधक स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएँ। माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें।
शापोद्धार मंत्र का एक माला जाप करे-
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा ।।
अब उत्कीलन मंत्र का एक माला जाप करे-
ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं मंत्र चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ।।
ध्यान मंत्र:
खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥
दसमहाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र-
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दसगुणात्मिकायै चामुंडायै प्रसीद प्रसीद दुर्गादेव्यै नमः॥
जब ध्यान हो जाये तब दस महाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र का नित्य 11 माला जाप 9 दिन रात्रिकालीन समय मे उत्तर मुखी बैठकर करे,आसन वस्त्र लाल रंग के हो।फोटो मे दुर्गा सप्तशती मंत्र दे रहा हु उसका कॉपी बनवाकर यंत्र को स्थापित करे और मंत्र जाप रुद्राक्ष माला से कर सकते हैं।इससे साधना के बाद नवार्ण मंत्र और दस महाविद्या मंत्रो मे पुर्ण सफलता प्राप्त होता है।
साथ मे काली तंत्र का एक विधान दे रहा हु जिसे आप इस साधना को करने के बाद करे तो महाकाली जी का आशिर्वाद विषेश रुप से प्राप्त होता है।
बाईस अक्षर का श्री दक्षिण काली मंत्र -
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं स्वाहा ।।
विनियोग-
अस्य श्री दक्षिण मंत्रस्य भैरव ऋषी: |उस्णिक छंद : |
दक्षिण कलिका देवता |क्रीं बीजं |ह्रुं शक्ति : |क्रीं कीलकम |ममाभिस्ट सिध्यथर्ये जपे विनियोग : |
ऋषयादी न्यास -
ॐ भैरव ऋषये नमः शिरसी ||१ ||
उष्णिक छंद्से नमः मुखे ||२||
दक्षिण कलिका देवताये नमः ह्रदि ||३||
क्रीं बीजाय नमः गृहे ||४||
ह्रूं शक्तये नमः पादयो ||५||
क्रीं किलकाय नमः नाभौ ||६||
विनियोगाय नमः सर्वांगे ||७||
करन्यास -
ॐ क्राम आन्गुष्ठाभ्याम नमः ||१||
ॐ क्रीं तर्जनिभ्याम नमः ||२||
ॐ क्रूं मध्यमाभ्याम नमः ||३||
ॐ क्रें अनामिकभ्याम नमः ||४||
ॐ क्रों कनिष्ठकाभ्याम नमः ||५||
ॐ क्र: करतल कर्पुश्थाभ्याम नमः ||६||
ह्रद्यादी षडंग न्यास -
ॐ क्राम ह्रदयाय नमः ||१||
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ||२||
ॐ क्रुम शिखाये वष्ट ||३||
ॐ क्रेह कवचाय ह्रुं ||४||
ॐ क्रों नेत्रत्रयाय वौष्ट ||५||
ॐ क्र: अस्त्राय फट ||६||
वर्णमाला न्यास -
ॐ अं अँ ईं ऊं ऊं त्र लृम लृम नामोह्रदी ||१||
ॐ अं अई ओ औ अं अ: कं खं गे धं दक्षभुजे ||२||
ॐ दं चं छं जं झं गं थं ठं ड ढ नमो वामभूजे ||३||
ॐ ण तं थं दं धं नं पं फं लं भं नमो दक्ष पादे ||४||
ॐ मं यं रं लं वं शं षम सं हं क्षम नमो वामपादे ||५||
इस न्यास के बाद निचे दिए गए न्यास करे-
ॐ क्रीं नमः भ्रमरन्ध्रे ||१||
ॐ क्रीं नमः भ्रूमध्ये ||२||
ॐ क्रीं नमः ललाटे ||३||
ॐ ह्रीं नमः नाभो ||४||
ॐ ह्रीं नमः गृह्ये ||५||
ॐ ह्रुं नमः वक्ते ||६||
ॐ ह्रुं नमः गुवर्गे ||७||
ध्यान मंत्र -
।। ॐ स्धशीचछन्नसिर: कृपणंभयं हस्तेवरम बिभ्रती धोरास्याम सिर्शाम स्त्रजा सुरुचिरामुन्मुक्त केशावलिम || स्रुकास्रुक प्रव्हाम स्मशान निल्याम श्रुतयो: रावालंकृति श्रुतयो: सवालंकृतिम श्यामांगी कृतमेख्लाम शवकरेदेवीभजे कालिकाम ।।
इस तरह से ध्यान करके नीचे कर्म से दिये 10 महाविद्याओं के किसी एक मंत्र सिद्धि के लिए 9 दिन रात्रि काल मे नियमित 11 माला जाप करे।
सोरठा
ॐ सोऽहं सिद्ध की काया, तीसरा नेत्र त्रिकुटी ठहराया । गगण मण्डल में अनहद बाजा।
वहाँ देखा शिवजी बैठा, गुरु हुकम से भितरी बैठा, शुन्य में ध्यान गोरख दिठा।
यही ध्यान तपे महेशा, यही ध्यान ब्रह्माजी लाग्या, यही ध्यान विष्णु की माया।
ॐ कैलाश गिरि से आई पार्वती देवी, जाकै सन्मुख बैठे गोरक्ष योगी
देवी ने जब किया आदेश । नहीं लिया आदेश, नहीं दिया उपदेश ।
सती मन में क्रोध समाई, देखु गोरख अपने माही,
नौ दरवाजे खुले कपाट, दशवे द्वारे अग्नि प्रजाले, जलने लगी तो पार पछताई।
राखी राखी गोरख राखी, मैं हूँ तेरी चेली, संसार सृष्टि की हूँ मैं माई ।
कहो शिव-शंकर स्वामीजी, गोरख योगी कौन है दिठा ।
यह तो योगी सबमें विरला, तिसका कौन विचार ।
हम नहीं जानत, अपनी करणी आप ही जानी । गोरख देखे सत्य की दृष्टि ।
दृष्टि देख कर मन भया उनमन, तब गोरख कली बिच कहाया ।
हम तो योगी गुरुमुख बोली, सिद्धों का मर्म न जाने कोई ।
कहो पार्वती देवीजी अपनी शक्ति कौन-कौन समाई।
तब सती ने शक्ति की खेल दिखाई, दश महाविध्या की प्रगटली ज्योति।
प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली
ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत-सार, तत-सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम-ज्योत, परम-ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ॐ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहिनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त पीवे । भस्मन्ती माई जहां पाई तहां लगाई। सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगन, नागों की नागन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।
मंत्र क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा
ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खड्ग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।
मंत्र ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्,
ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्।
तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटली
ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।
मंत्र श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं श्रीं कएईल ह्रीं हसकहल ह्रीं सकल ह्रीं सोः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ।
चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटली
ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।
मंत्र ह्रीं
पञ्चम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटली
सत का धर्म सत की काया,ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।
मंत्र श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्रवैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।
षष्टम ज्योति भैरवी प्रगटली
ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर- भैरवी, समपत-प्रदा-भैरवी, कौलेश- भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंशिनी-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कमेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी, जपा-अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।
मंत्र ॐ ह्सैं ह्स्क्ल्रीं ह्स्त्रौः
सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटली
ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।
मंत्र ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा ।
अष्टम ज्योति बगलामुखी प्रगटली
ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची-बच्ची-काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।
मंत्र ॐ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भन-बाणाय धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात् ।
नवम ज्योति मातंगी प्रगटली
ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार, ओंकार मे शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशि अमीरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया। बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी। बूँद मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते। ॐ मातंगी, सुंदरी, रूपवन्ती, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी, अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।
मंत्र ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।
दसवीं ज्योति कमला प्रगटली
ॐ अयोनि शंकर ॐकार रूप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐकार। कमला देवी पूजो केशर, पान, सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि-सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश ।
मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाहा ।
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को
कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुंडलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये । इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया । अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अचलगढ़ पर्वत पर बैठ श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने पढ़ कर सुनाया।
ये दसों महाविध्याओं के शाबर मंत्र दे रहे है जो सर्व पाप-ताप को हरने की क्षमता रखते है । घी या तिल के तेल का दीपक जला कर आप इसका कम से कम 5 पाठ नवरात्र में रोज 9 दिन तक करने से अवश्य आपकी समस्याओं का समाधान होगा ।!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

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