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Monday, 27 July 2020

महाकाल भैरव स्तोत्रम् ।।

महाकाल भैरव स्तोत्रम् यं यं यं यक्ष रूपं दश दिशि विदितं भूमि कम्पायमानं सं सं सं संहार मूर्ति शुभ मुकुट जटा शेखरं चन्द्र विम्बं दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुख चौर्ध्व रोमं करालं पं पं पं पाप नाशं प्रणमतं सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ १ ॥ रं रं रं रक्तवर्णं कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्रा विशालं घं घं घं घोर घोसं घ घ घ घ घर्घरा घोर नादं कं कं कं कालरूपं धग धग धगितं ज्वलितं कामदेहं दं दं दं दिव्य देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ २ ॥ लं लं लं लम्ब दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वाकरालं धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुट विकृत मुखंमासुरं भीम रूपं रूं रूं रूं रुण्डमालं रुधिरमय मुखं ताम्र नेत्रं विशालं नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ३ ॥ वं वं वं वायुवेगं प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपं खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवन निलयं भास्करं भीमरूपं चं चं चं चालयन्तं चल चल चलितं चालितं भूत चक्रं मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ४ ॥ खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालान्धकारं क्षि क्षि क्षि क्षिप्र वेग दह दह दहन नेत्रं सांदिप्यमानं हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन गर्जितं भूमिकंपं Gyanchand Bundiwal. Kundan Jewellers We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices. हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष होल सेल भाव में मिलते हैं और टेस्टिंग कीये जाते है ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 website www.kundanjewellersnagpur.com

Monday, 29 June 2020

भगवान शिव की सोमवार को पूजा करना अधिक लाभदायक है

भगवान शिव की सोमवार को पूजा करना अधिक लाभदायक है सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी ईश्वर की पूजा, भक्ति और व्रत के लिए होता हैं पर सोमवार का दिन हिन्दू धर्म परमपराओं के अनुसार भगवान शिव को समर्पित होता है. माना जाता है कि शिवजी की भक्ति हर पल ही शुभ होती है. सच्चे मन से पूजा की जाए तो शिव अपने भक्तों पर जल्द ही प्रसन्न हो जाते है. क्यों सोमवार को ही शिवजी की पूजा करना अधिक लाभदायक होता है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी खास बातें- सोमवार के दिन रखा जाने वाला व्रत सोमेश्वर व्रत के नाम से जाना जाता है. इसके अपने धार्मिक महत्व होते हैं. इसी दिन चन्द्रमा की पूजा भी की जाती है. हमारे धर्मग्रंथों में सोमेश्वर शब्द के दो अर्थ होते हैं. पहला अर्थ है – सोम यानी चन्द्रमा. चन्द्रमा को ईश्वर मानकर उनकी पूजा और व्रत करना. सोमेश्वर शब्द का दूसरा अर्थ है- वह देव, जिसे सोमदेव ने भी अपना भगवान माना है. उस भगवान की सेवा-उपासना करना, और वह देवता हैं "भगवान शिव" पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत और पूजा से ही सोमदेव ने भगवान शिव की आराधना की. जिससे सोमदेव निरोगी होकर फिर से अपने सौंदर्य को पाया. भगवान शंकर ने भी प्रसन्न होकर दूज यानी द्वितीया तिथि के चन्द्रमा को अपनी जटाओं में मुकुट की तरह धारण किया। यही कारण है कि बहुत से साधू-संत और धर्मावलंबी इस व्रत परंपरा में शिवजी की पूजा-अर्चना भी करते आ रहे हैं क्योंकि इससे भगवान शिव की उपासना करने से चन्द्रदेव की पूजा भी हो जाती है. धार्मिक आस्था व परंपरा के चलते प्राचीन काल से ही सोमवार व्रत पर आज भी कई लोग भगवान शिव और पार्वती की पूजा करते आ रहे हैं परन्तु यह चंद्र उपासना से ज्यादा भगवान शिव की उपासना के लिए प्रसिद्ध हो गया. भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा कर सुख और कामनापूर्ति होती है। भगवान शिव से जुड़ी रोचक बातें *‘शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।’- भगवान राम* हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं। शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। आज से १५ से २० हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। इस दौरान भगवान शंकर ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया। भगवान विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था। पुराण कहते हैं कि जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था। इन तीनों से सब कुछ हो गया। वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया। सर्वप्रथम भगवान शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदि देव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ। शिव को *‘आदिनाथ’* भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस *‘आदिश’* शब्द से ही *‘आदेश’* शब्द बना है। नाथ साधु जब एक–दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश। भगवान शिव के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया। महाभारत काल ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे। महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गए। कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गए अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है। पहले भगवान शिव थे रुद्र वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है। देवों के देव महादेव देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। भगवान शिव ने क्यों मार दिए थे विशालकाय मानव… ब्रह्मा ने बनाए विशालकाय मानव विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी। भारत में मिले इस कंकाल के साथ एक शिलालेख भी मिला है। यह उस काल की ब्राह्मी लिपि का शिलालेख है। इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई। भगवान शिव का धनुष पिनाक शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था। उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया। देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया। भगवान शिव का चक्र चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला। त्रिशूल इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दिए। उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। त्रिशूल ३ प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें ३ तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी भगवान् शिव का अस्त्र है। भगवान शिव का सेवक वासुकी शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के प्रारंभ में ५ कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे। नाग वंशावलियों में ‘शेषनाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं। उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था। अमरनाथ के अमृत वचन किस नाम से सुरक्षित… अमरनाथ के अमृत वचन शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए ११२ ध्यान सूत्रों का संकलन है। योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के *‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’* और *‘शिव संहिता’₹ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। -मेरुतंत्र भगवान शिव ने अपना ज्ञान सबसे पहले किसे दिया…... भगवान शिव के शिष्य शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया। सप्त ऋषि ही शिव के मूल शिष्य भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए ७ ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के ७ बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन ७ रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने ३०० ईसा पूर्व मात्र २०० सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। योग का 8वां अंग मोक्ष है। ७ अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिए है। भगवान शिव के गणों के नाम… भगवान शिव गण भगवान शिव की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिए उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं। उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से *‘वीरभद्र’* नामक गण उत्पन्न किया। इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं। भगवान शिव के द्वारपाल… भगवान शिव के द्वारपाल कैलाश पर्वत के क्षेत्र में उस काल में कोई भी देवी या देवता, दैत्य या दानव शिव के द्वारपाल की आज्ञा के बगैर अंदर नहीं जा सकता था। ये द्वारपाल संपूर्ण दिशाओं में तैनात थे। इन द्वारपालों के नाम हैं- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल। उल्लेखनीय है कि शिव के गण और द्वारपाल नंदी ने ही कामशास्त्र की रचना की थी। कामशास्त्र के आधार पर ही कामसूत्र लिखा गया था। भगवान शिव पंचायत को जानिए… भगवान शिव पंचायत पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है। देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में ५ देवता शामिल थे। ये ५ देवता थे १. सूर्य, २. गणपति, ३. देवी, ४. रुद्र और ५. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं। भगवान शिव के पार्षद… भगवान शिव पार्षद जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी। भगवान शिव के प्रतीक चिह्न... भगवान शिव चिह्न वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्ध चंद्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं। भगवान शिव की जटाएं हैं। उन जटाओं में एक चंद्र चिह्न होता है। उनके मस्तष्क पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है। वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं। माना जाता है कि केदारनाथ और अमरनाथ में वे विश्राम करते हैं। भस्मासुर से बचकर यहां छिप गए थे शिव भगवान शिव की गुफा शिव ने एक असुर को वरदान दिया था कि तू जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। इस वरदान के कारण ही उस असुर का नाम भस्मासुर हो गया। उसने सबसे पहले शिव को ही भस्म करने की सोची। भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शंकर वहां से भाग गए। उनके पीछे भस्मासुर भी भागने लगा। भागते-भागते शिवजी एक पहाड़ी के पास रुके और फिर उन्होंने इस पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। बाद में विष्णुजी ने आकर उनकी जान बचाई। माना जाता है कि वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। इन खूबसूरत पहाड़ियों को देखने से ही मन शांत हो जाता है। इस गुफा में हर दिन सैकड़ों की तादाद में शिवभक्त शिव की अराधना करते हैं। भगवान राम ने किया था भगवान शिव से युद्ध : सभी जानते हैं कि राम के आराध्यदेव शिव हैं, तब फिर राम कैसे शिव से युद्ध कर सकते हैं? पुराणों में विदित दृष्टांत के अनुसार यह युद्ध श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के दौरान लड़ा गया। यज्ञ का अश्व कई राज्यों को श्रीराम की सत्ता के अधीन किए जा रहा था। इसी बीच यज्ञ का अश्व देवपुर पहुंचा, जहां राजा वीरमणि का राज्य था। वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उनसे उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान मांगा था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था। जब यज्ञ का घोड़ा उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया। ऐसे में अयोध्या और देवपुर में युद्ध होना तय था। महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जानकर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अपने सारे गणों को भेज दिया। एक और राम की सेना तो दूसरी ओर शिव की सेना थी। वीरभद्र ने एक त्रिशूल से राम की सेना के पुष्कल का मस्तक काट दिया। उधर भृंगी आदि गणों ने भी राम के भाई शत्रुघ्न को बंदी बना लिया। बाद में हनुमान भी जब नंदी के शिवास्त्र से पराभूत होने लगे तब सभी ने राम को याद किया। अपने भक्तों की पुकार सुनकर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए। श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। फिर श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिव गणों पर धावा बोल दिया। जब नंदी और अन्य शिव के गण परास्त होने लगे तब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए, तब श्रीराम और शिव में युद्ध छिड़ गया। भयंकर युद्ध के बाद अंत में श्रीराम ने पाशुपतास्त्र निकालकर कर शिव से कहा, ‘हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता इसलिए हे महादेव, आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर ही करता हूं’, ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया। वो अस्त्र सीधा महादेव के ह्वदयस्थल में समा गया और भगवान रुद्र इससे संतुष्ट हो गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें। इस पर श्रीराम ने कहा कि ‘हे भगवन्, यहां मेरे भाई भरत के पुत्र पुष्कल सहित असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, कृपया कर उन्हें जीवनदान दीजिए।’ महादेव ने कहा कि ‘तथास्तु।’ इसके बाद शिव की आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का अश्व श्रीराम को लौटा दिया और श्रीराम भी वीरमणि को उनका राज्य सौंपकर शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर चल दिए। ब्रह्मा, विष्णु और शिव का जन्म एक रहस्य है। तीनों के जन्म की कथाएं वेद और पुराणों में अलग-अलग हैं, लेकिन उनके जन्म की पुराण कथाओं में कितनी सच्चाई है और उनके जन्म की वेदों में लिखी कथाएं कितनी सच हैं, इस पर शोधपूर्ण दृष्टि की जरूरत है। यहां यह बात ध्यान रखने की है कि ईश्वर अजन्मा है। अलग-अलग पुराणों में भगवान शिव और विष्णु के जन्म के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को स्वयंभू माना गया है जबकि विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु स्वयंभू हैं। शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं। भगवान शिव के जन्म की कहानी हर कोई जानना चाहता है। श्रीमद् भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे, तब एक जलते हुए खंभे से जिसका कोई भी ओर-छोर ब्रह्मा या विष्णु नहीं समझ पाए, भगवान शिव प्रकट हुए। यदि किसी का बचपन है तो निश्चत ही जन्म भी होगा और अंत भी। *विष्णु पुराण* में शिव के बाल रूप का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। उन्होंने इसके लिए तपस्या की। तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका नाम *‘ब्रह्मा’* नहीं है इसलिए वह रो रहा है। तब ब्रह्मा ने शिव का नाम *‘रुद्र’* रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’। शिव तब भी चुप नहीं हुए इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया, पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे फिर भी चुप नहीं हुए। इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने ८ नाम दिए और शिव ८ नामों (रुद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए। शिव पुराण के अनुसार ये नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे। Gyanchand Bundiwal. 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Tuesday, 7 August 2018

भगवान भोलेनाथ को जगत पिता कहा गया हैं,


भगवान भोलेनाथ को जगत पिता कहा गया हैं, क्योकि भगवान शिव सर्वव्यापी एवं पूर्ण ब्रह्म हैं। । शिव शब्द के उच्चारण से ही मनुष्य को परम आनंद की अनुभूति होती है। भगवान शिव भारतीय संस्कृति को दर्शन ज्ञान के द्वारा संजीवनी प्रदान करने वाले देव हैं। इसी कारण अनादिकाल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में होते हुवे भी शिवलिंग के रूप में साकार मूर्ति की पूजा होती हैं। लेकिन अभी तक भगवान भोलेनाथ के बारे में आप यही जान रहे होंगे कि भगवान शिव की दो पत्नियां थी देवी सती और दूसरी माता पार्वती। लेकिन यदि पौराणिक कथाओं की माने तो भगवान नीलकंठेश्वर ने एक दो नहीं बल्कि चार विवाह किये थे। लेकिन उन्होंने यह सभी विवाह आदिशक्ति के साथ ही किए थे।
भगवान शिव ने पहला विवाह माता सती के साथ किया जो कि प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थी- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएं जन्मी और वीरणी से साठ कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां और हजारों पुत्र थे। राजा दक्ष की पुत्री ‘सती’ की माता का नाम था प्रसूति। यह प्रसूति स्वायंभु मनु की तीसरी पुत्री थी। सती ने अपने पिती की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से विवाह किया था। लेकिन, जब अपने पिता के यज्ञ में बिन बुलाए पहुंची सती के सामने भगवान शिव का अपमान हुआ, तब उन्होंने यज्ञ कुंड में ही अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। ऐसे में भगवान शिव माता सती का शव लेकर कई दिनों तक भटकते रहे। माता सती के शव जहां-जहां गिरे वहां पर 51 शक्तिपीठ बन गए।
माता सती के वियोग में भगवान शिव काफी दुःखी थे। इस दुःखद घटना के कई वर्षों बाद भगवान शिव का फिर से विवाह हुआ इस बार उनकी अर्धांगिनी बनी देवी पार्वती। देवी पार्वती हिमालय की पुत्री थीं। उन्हें अल्पआयु में ही भगवान शिव को अपना पति मानकर उनका वरण किया और उनका विवाह बाद में भगवान शिव से हुआ। देवी पार्वती को भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप करना पड़ा था। भगवान गणेश मां पार्वती के ही पुत्र हैं। देवी पार्वती ही मां दुर्गा हैं।
भगवान शिव का तीसरी पत्नी देवी उमा को बताया गया है। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। मां उमा देवी दयालु और सरल ह्दय की देवी हैं। आराधना करने पर वह जल्द ही प्रसन्न हो जाती हैं।
उमा के साथ महेश्वर शब्द का उपयोग किया जाता है। अर्थात महेश और उमा। कश्मीर में एक स्थान है उमा नगरी। यह नगरी अनंतनाग क्षेत्र के उत्तर में हिमालय में बसी है। यहां विराजमान है उमा देवी। भक्तों का ऐसा विश्वास है कि देवी स्वयं यहां एक नदी के रूप में रहती हैं जो ओंकार का आकार बनाती है जिसके साथ पांच झरने भी हैं।
भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली को बताया गया है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। वर्षों पहले एक ऐसा भी दानव हुआ जिसके रक्‍त की एक बूंद अगर धरती पर गिर जाए तो हजारों रक्तबीज पैदा हो जाते थे। इस दानव को मौत की नींद सुलाना किसी भी देवता के वश में नहीं था। तब मां महाकाली ने इस भयानक दानव का संहार कर तीनों लोकों को बचाया। रक्तबीज को मारने के बाद भी मां का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था, तब भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए गलती से मां महाकाली का पैर भगवान शिव के सीने पर रख गया। इसके बाद उनका गुस्सा शांत हुआ।
जानिए भगवान भोलेनाथ के कितने पुत्र थे
भगवान शिव के साथ साथ उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश भी देवो में पूजनीय है। लेकिन क्या आप जानते है इन दोनों के आलावा भी शिव के चार अन्य पुत्र है .. इस प्रकार शिव के दो नही वरन 6 पुत्र थे। आइये जानते है कैसे हुआ शिवजी के इन 6 पुत्रो का जन्म
गणेश : गणेश का जन्म माता पार्वती के चंदन से हुआ, एक बार गणेश को द्वार पर बिठा कर माता स्नान कर रही थी। इतने में शिव भवन में प्रवेश करने लगे। जब गणेश ने उन्हें रोका तो क्रोध में शिव ने गणेश का सिर काट दिया। जब पार्वती ने देखा की उनके पुत्र का सिर काट दिया है। तो वे क्रोधित हो गई। उन्हें शांत करने के लिए शिवजी ने गणेश के सिर के स्थान पर एक हाथी का सिर लगा दिया। और वे फिर से जीवित हो उठे।
कार्तिकेय : जब शिव सती के भस्म होने कारण दुःख से तपस्या में लीन हो गए थे तब धरती पर तारकासुर नामक दैत्य धरती पर अत्याचार मचाने लगा। उस दैत्य के अत्याचार से परेशान होकर देवता ब्रह्मा के पास गए तब ब्रह्मा ने कहा, इसका समाधान शिवजी का पुत्र ही कर सकता है। फिर देवता शिव के पास गए और तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति के लिए प्राथना करी। उनकी प्राथना सुन शिव,पार्वती से शुभ घड़ी व शुभ मुहूर्त में विवाह करते है। इस प्रकार भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ।
सुकेश : शिव के तीसरे पुत्र थे सुकेश। दानवो में दो भाई थे हेति और प्रहेति। दानवों ने इन्हे अपना प्रतिनिधि बनाया। ये दोनों भाई बलशाली और प्रतापी थे। प्रहेति धर्मिक था और हेति को राजपाट और राजनीति की लालसा थी। दानव हेति ने अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए काल की पुत्री ‘भय’ से विवाह कर लिया। कुछ समय पश्चात उनका पुत्र हुआ जिसका नाम था विद्युत्केश। विद्युत्केश का विवाह सालकटंकटा से हुआ। क्योकि सालकटंकटा व्यभिचारणी थी इस कारण उन्होंने अपने पुत्र को लवारिस छोड़ दिया। पुराणों के अनुसार जब भगवान शिव और पार्वती की उस लावारिस बालक पर नजर गई तो उन्होंने उसे गोद लिया।
जलंधर : जलंधर शिव जी का ही अंश था। एक बार जब शिव ने अपना तेज जल में फेका तो उस से जलंधर की उत्पति हुई। जलंधर बहुत ही शक्तिशाली था। उसने अपने आक्रमण से स्वर्ग में कब्जा कर लिया। शिवजी के पास गए और उन्हें पूरी घटना बताई। शिव ने इंद्र से जलंधर की पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म तोड़ने को कहा। क्योकि उंसकी पतिव्रता धर्म की शक्ति के कारण शिव जलंधर को पराजित करने में असमर्थ थे। अतः इंद्र ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का पतिव्रत तोडा तथा शिव ने जलंधर का वध कर दिया।
अयप्पा : अयप्पा भगवन शिव और मोहिनी का पुत्र था। कहते हैं कि जब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था तो उनकी मादकता से भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उस वीर्य से इस बालक का जन्म हुआ। दक्षिण भारत में अयप्पा देव की पूजा अधिक की जाती हैं। अयप्पा देव को ‘हरीहर पुत्र’ के नाम से भी जाना जाता हैं।
भौम भौम भगवान शिव के पसीने से उत्पन हुआ था। जब भगवान शिव तप में लीन थे। उस समय उनके सर से पसीने की एक बूंद टपकी जो धरती पर गिरी। इन पसीने की बूंदों से एक सुंदर और प्यारे बालक का जन्म हुआ। जिसके चार भुजाएं थीं। इस पुत्र का पृथ्वी ने पालन पोषण करना शुरु किया। तभी भूमि का पुत्र होने के कारण यह भौम कहलाया। कुछ बड़ा होने पर मंगल काशी पहुंचा और भगवान शिव की कड़ी तपस्या की। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मंगल लोक प्रदान किया

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शिव भक्त को कभी नहीं छोड़ते



शिव भक्त को कभी नहीं छोड़ते,,,,माटी नामका एक बड़ा शिवभक्त था. उसने संतान प्राप्ति के लिए वर्षों तक शिवजी का कठोर तप किया था. शिवजी ने उसे संतान का वरदान दिया. समय आने पर उसकी पत्नी गर्भवती हुई.
लेकिन पत्नी का प्रसव चार साल तक नहीं हुआ तो माटी को बड़ी चिंता हुई. पता चला कि गर्भ का बालक कालमार्ग यानी मृत्युलोक के कष्टों के डर से बाहर ही नहीं निकल रहा.
माटी ने सोचा कि क्यों न गर्भ में स्थित शिशु को शिवज्ञान दे दिया जाए. उसने शिशु को शिवज्ञान देना शुरू किया जिससे शिशु को बोध हुआ और वह बाहर निकला. माटी ने कालमार्ग से डरने के कारण अपने पुत्र का नाम रखा कालभीति. कालभीति जन्म से ही परम शिव भक्त थे. बड़ा होते ही कालभीति घोर तपस्या में लगे.
बेल के पेड़ के नीचे पैर के अंगूठे पर खड़े हो वह वर्षों तक एक बूँद भी पानी पिये बिना मंत्रों का जप करते रहे. सौ वर्ष पूरे होने पर एक दिन एक आदमी जल से भरा हुआ घड़ा लेकर आया.
कालभीति को नमस्कार कर उसने कहा कि जल ग्रहण कीजिए. कालभीति बोले– आप किस वर्ण के हैं, आप का आचार-व्यवहार कैसा है ? यह सब जाने बिना मैं जल नहीं पी सकताच.
पानी लाने वाला आगंतुक बोला- मैं जब अपने माता पिता को ही नहीं जानता तो अपने वर्ण का क्या कहूं ? आचार-विचार और धर्मों से मेरा कोई वास्ता ही नहीं रहा है.
कालभीति ने कहा- मेरे गुरु के अनुसार जिसके कुल का ज्ञान न हो उसका अन्न जल ग्रहण करने वाला तत्काल कष्ट में पड़ता है. मैं पानी नहीं पिउंगा श्रीमन् !
आगंतुक बोला– तुम्हारी बात पर हँसी आती है. जब सब में भगवान शंकर ही निवास करते हैं, तो किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए क्योंकि इससे भगवान शंकर की ही निंदा होती है.
यह जल अपवित्र कैसे हुआ ? घड़ा मिट्टी का बना है और आग में पका है, फिर जल से भर दिया गया. मेरे छूने से अशुद्धि आ गयी ? तो अगर मैं अशुद्ध होकर इसी धरती पर हूं तो आप यहां क्यों रहते हैं ? आकाश में क्यों नहीं रहते ?
कालभीति ने कहा– सभी में शिव ही हैं, सब को शिव मानने वाले नास्तिक लोग खाना छोड़ कर मिट्टी क्यों नहीं खाते ? राख और धूल क्यों नही फांकते ? मैं यह नहीं कह रहा कि सब में शिव नहीं है. भगवान शिव सब में हैं ही.
मेरी बात ध्यान से सुनिए. सोने के गहने बहुत तरह के बनते हैं. कुछ शुद्ध सोने के तो कुछ मिलावटी. खरे, खोटे सभी आभूषणों में सोना तो है ही. इसी प्रकार ऊंच, नीच, शुद्ध, अशुद्ध सब में भगवान् सदाशिव विराजमान हैं.
जैसे खोटा सोना खरे के साथ मिलकर एक हो जाता है इसी तरह इस शरीर को भी व्रत, तपस्या और सदाचार आदि के द्वारा शोधित करके शुद्ध बना लेने पर मनुष्य निश्चय ही खरा सोना होकर स्वर्गलोक में जाता है.
तो शरीर को खोटी अपवित्र चीजों से बिगाड़ना ठीक नहीं. जो व्रत, उपवास करके शुद्ध हो गया है, वह भी यदि इस तरह अशुद्ध होने लगे तो थोड़े ही दिनों में पतित हो जायेगा इसलिए आपका दिया पानी तो मैं कभी नहीं पिउंगा.
कालभीति के ऐसा कहने पर आगंतुक हंसने लगा. उसने दाहिने अंगूठे से जमीन कुरेदकर एक बहुत बड़ा गड्ढा तैयार किया. फिर उसी में वह सारा जल ढुलका दिया. गड्ढा भर गया, पानी बचा रह गया.
फिर उसने अपने पैर से ही कुरेदकर एक तालाब बना दिया और बचे हुए जल से उस तालाब को भर दिया. यह अद्भुत दृश्य देखकर भी कालभीति नहीं चौंके.
आगंतुक बोला- ब्राह्मणदेव ! आप हैं तो मूर्ख, परन्तु बातें पंडितों सी करते हैं. लगता है आपने विद्वानों की बात नहीं सुनी, कुआँ दूसरे का, घडा दूसरे का और रस्सी दूसरे की है. एक पानी पिलाता है और एक पीता है.
सब समान फल के भागी होते हैं. ऐसा ही मेरा भी जल है. तुम धर्म के ज्ञाता हो; फिर क्यों इसे नहीं पिओगे. कालभीति ने विचार किया,यदि एक कार्य में अनेक सहायक हों तो काम करने वाले को मिलने वाला फल बंटकर समान हो जाता है. बात तो ठीक है.
कालभीति ने उस मनुष्य से कहा- आपका यह कहना ठीक है. कुएं और तालाब का पानी पीने में दोष नहीं है. फिर भी आपने तो अपने घड़े के जल से ही इस गड्ढे को भरा है. यह बात सामने देखकर मैं हर्गिज इसे नहीं पीयूंगा.
कालभीति के हठ पर वह पुरुष हंसता हुआ अंतर्ध्यान हो गया. अब कालभीति को अचरज हुआ. सोचने लगे कि ये क्या किस्सा है. इतने में ही उस बेल के पेड़ के नीचे धरती फाड़ कर सुन्दर चमचमाता शिवलिंग प्रकट हो गया.
तब कालभीति ने कहा – जो पाप के काल हैं जिनके कंठ में काला चिन्ह सुशोभित होता है तथा जो संसार के कालस्वरूप हैं, उन भगवान् महाकाल की मैं शरण लेता हूं. आप हमें शरण दीजिए. आपको बारम्बार नमस्कार है.
कालभीति की स्तुति पर महादेव उस लिंग से प्रकट हुए और कहा– ब्राह्मण ! तुमने इस महातीर्थ में रहकर मेरी जो आराधना की है, उससे मैं संतुष्ट हूं. अब संसार के कष्टों से तुम निर्भय रहो.
मैं ही मनुष्य रूप में प्रकट हुआ था. मैंने यह गड्ढा और तालाब सब तीर्थों के जल से भरा है. यह परम पवित्र जल तुम्हारे लिए ही लाया था. तुम मुझ से कोई मनोवांछित वर मांगो.
कालभीति ने कहा – प्रभु ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो सदा यहां निवास करें. इस शिव लिंग पर जो भी दान, पूजन किया जाए, वह अक्षय हो. आपने काल से मुझे मुक्ति दिलाई है,इसलिए यह शिवलिंग महाकाल के नाम से प्रसिद्ध हो.
भगवान बोले– जो चतुर्दशी, अष्टमी, सोमवार तथा पर्व के दिन इस सरोवर में स्नान करके इस शिवलिंग की पूजा करेगा, वह शिव को ही प्राप्त होगा. यहां किया हुआ जप, तप और रूद्र जप सब अक्षय होगा. तुम नंदी के साथ मेरे दूसरे द्वारपाल बनोगे.
काल पर विजय पाने से तुम महाकाल के नाम से प्रसिद्द होगे. शीघ्र ही राजर्षि करन्धम यहां आएंगे उन्हें धर्म का उपदेश करके तुम मेरे लोक में चले आओ. यह कहकर भगवान रूद्र उस लिंग में ही लीन हो गए.


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Sunday, 29 July 2018

पार्वती पति हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

पार्वती पति हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
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जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
पार्वती पति हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
जय भवकार, तारक, हारक पातक दारक शिव शम्भो,
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो,
पार लगा दो भव सागर से, बनकर कर्णाधार हरे।
पार्वती पति हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन,
विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी, सरल हृदय,
अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी, निमिष में देते हैं,
नवनिधि मन मानी शिव योगी, भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी
शिव योगी, स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना,
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
पार्वती पति हर हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
।!!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557

Sunday, 4 March 2018

मैं शिव हूँ केवल ,शिव हूँ , शिव . मैं विकारों से रहित ,

मैं शिव हूँ केवल ,शिव हूँ , शिव . मैं विकारों से रहित ,
विकल्पों से रहित , निराकार , परम एश्वर्य युक्त , सर्वदा यत्किंच सभी में सर्वत्र ,समान रूप में ब्याप्त हूँ , मैं ईक्षा रहित , सर्व संपन्न ,जन्म -मुक्ति से परे ,सच्चिदानंद स्वरुप कल्याणकारी शिव हूँ केवल , शिव .न मृत्यु , न संदेह , न तो जाति-भेद (खंडित ) हूँ , न पिता न माता , न जन्म न बन्धु , न मित्र न गुरु न शिष्य ही हूँ ; मैं तो केवल स्वरुप कल्याणकारी शिव हूँ , शिव 
विभत्स हूँ विभोर हूँ
मैं समाधी में ही चूर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
घनघोर अँधेरा ओढ़ के
मैं जन जीवन से दूर हूँ
श्मशान में हूँ नाचता
मैं मृत्यु का ग़ुरूर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
साम – दाम तुम्हीं रखो
मैं दंड में सम्पूर्ण हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
चीर आया चरम में
मार आया मैं को मैं
मैं मैं नहीं
मैं भय नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
जो सिर्फ तू है सोचता
केवल वो मैं नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं काल का कपाल हूँ
मैं मूल की चिंघाड़ हूँ
मैं मग्न...मैं चिर मग्न हू
मैं एकांत में उजाड़ हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं आग हूँ
मैं राख हूँ
मैं पवित्र राष हूँ
मैं पंख हूँ
मैं श्वाश हूँ
मैं ही हाड़ माँस हूँ
मैं ही आदि अनन्त हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मुझमें कोई छल नहीं
तेरा कोई कल नहीं
मौत के ही गर्भ में
ज़िंदगी के पास हूँ
अंधकार का आकार हूँ
प्रकाश का मैं प्रकार हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं कल नहीं मैं काल हूँ
वैकुण्ठ या पाताल नहीं
मैं मोक्ष का भी सार हूँ
मैं पवित्र रोष हूँ
मैं ही तो अघोर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
Cheer Aaya Charam Me
Maar Aaya ‘Mein’ Ko Mein
Mein, Mein Nahi
Mein Bhay Nahi
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu 
चीर आया चरम में
मार आया मैं को मैं
मैं , मैं नहीं
मैं भय नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ मैं शिव हूँ।

Mere Shiv Baba kehte hai ki mat soch tera sapna pura hoga ya nahi..
Kyoki jiske karam aache hote hai, unki to mein bhi madad karta hu
!! Happy Shivratri !!
मेरे महाकाल कहते हैं कि मत सोच तेरा सपना पूरा होगा या नहीं
क्योंकि जिसके कर्म अच्छे होते हैं उनकी तो मैं भी मदद करता हूँ

Jo Sirf Tu Hai Sochta….
Keval Vo Mein Nahi Hota
Meinshiv Hu Mein Shiv Hu Meinshiv Hu
Mein Mahakaal Hu Mein Mahakaal Hu Mein Mahakaal Hu
जो सिर्फ तू है सोचता
केवल वो मैं नहीं
मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ।

Naa pucho mujhse meri pehchan
Mein to Bhasamdhari hu
Bhasam se hota jinka Shringar mein uss Bhole ka Pujari hu..
Bam Bam Bhole hindi status
ना पूछो मुझसे मेरी पहचान 
मैं तो भस्मधारी हूँ 
भस्म से होता जिनका श्रृंगार मैं उस महाकाल का पुजारी हूँ 
हर हर महादेव

Main Aag Hoon
Main Raakh Hoon
Main Pavitr Raash Hoon
Main Pankh Hoon
Main Shvaash Hoon
Main Hee Haad Maans Hoon
Main Hee Aadi Anant Hoon
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu
मैं आग हूँ
मैं राख हूँ
मैं पवित्र राष हूँ
मैं पंख हूँ
मैं श्वाश हूँ
मैं ही हाड़ माँस हूँ
मैं ही आदि अनन्त हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।

Shiv Shamkar ko jisne Pooja uska hi uddaar hua,
Anant kaal ke bhavsagar me uska beda paar hua,
Bhole Shankar ki Pooja karo,
Dhyaan charno me inke dharo..
Har Har Mahadev
Bhole status in Hindi

शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ 
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ 
भोले शंकर की पूजा करो , ध्यान चरणों में इनके धरो। 
Main Kaal Ka Kapaal Hoon
Main Mool Kee Chinghaad Hoon
Main Magn Main Chir Magn Hoon
Main Ekaant Mein Ujaad Hoon
Mein Mahakaal u Mein Maakaal Hu Mein Mahkaal Hu
मैं काल का कपाल हूँ
मैं मूल की चिंघाड़ हूँ
मैं मग्न…मैं चिर मग्न हूँ
मैं एकांत में उजाड़ हूँ
मैं महाकल हूँ। मैं महकाल हूँ। मैं हाकाल हूँ।

Shiv Satay hai, Shiv Anant hai,
Shiv Anaadi hai, Shiv hi Bhagwant hai,
Shiv Omkaar hai, Shiv hi Bhram hai,
Shiv Shakti hai, Shiv hi Bhagti hai,
Aao Bhagwaan Shiv ka Naman kare,
Auka Aashirwaad hum sab par bana rahe
शिव सत्य है, शिव अनंत है,
शिव अनादि है, शिव भगवंत है,
शिव ओंकार है, शिव ब्रह्म है,
शिव शक्ति है, शिव भक्ति है,
आओ भगवान शिव का नमन करें,
उनका आशीर्वाद हम सब पर बना रहे।

Mujhamen Koee Chhal Nahin
Tera Koee Kal Nahin
Maut Ke Hee Garbh Mein
Zindagee Ke Paas Hoon
Andhakaar Ka Aakaar Hoon
Prakaash Ka Main Prakaar Hoon
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu

मुझमें कोई छल नहीं
तेरा कोई कल नहीं
मौत के ही गर्भ में
ज़िंदगी के पास हूँ 
अंधकार का आकार हूँ
प्रकाश का मैं प्रकार हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
Mere Mahakaal tumhaare bina mein shunay hu..
TUm saath ho Bhole to mein Anant hu
Jai Shri trikaalnath mahakal 
मेरे महाकाल तुम्हारे बिना मैं शून्य हूँ 
तुम साथ हो महाकाल तो में अनंत हूँ 
जय श्री त्रिकालनाथ महाकाल

Main Kal Nahin Main Kaal Hoon
Vaikunth Ya Paataal Nahin
Main Moksh Ka Bhee Saar Hoon
Main Pavitr Rosh Hoon
Main Hee To Aghor Hoon
मैं कल नहीं मैं काल हूँ
वैकुण्ठ या पाताल नहीं
मैं मोक्ष का भी सार हूँ 
मैं पवित्र रोष हूँ
मैं ही तो अघोर हूँ
मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ।
Om Tryambakam Yajaamahe Sugandhimpushtivardhanam.
Urvaarukamiv Bandhanaat Mrtyormuksheey Maamrtaat.. Om Svah Bhuvah Bhooh Om Sah Joon Haun Om
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
!!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557

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