Showing posts with label गणेश. Show all posts
Showing posts with label गणेश. Show all posts

Wednesday, 26 August 2020

गणेशजी की पूजा सर्वप्रथम क्यों होती है

किसी भी सुबह कार्य को करने से पहले गणेश जी की पूजा करना आवश्यक मन गया है क्योंकि उन्हें विघ्नहर्ता व् ऋद्धि -सीधी का स्वामी कहा जाता है। इनके स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओ की पूर्ति होती है व् विघ्नों का विनाश होता है।
गणेश जी अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले बुद्दि के अधिष्ठाता और साक्षात् प्रणवरूप है। गणेश का अर्थ है - गणों का ईश अर्थात गणों का स्वामी। किसी पूजा आराधना, अनुष्ठान व् कार्य में गणेश जी के गण कोई विघ्न - बाधा न पहुंचाए, इसलिए सर्वप्रथम गणेश पूजन कर उनकी कृपा प्राप्त होती है।

प्रत्येक शुभकार्य के पूर्व "श्री गणेशाय नमः " का उच्चारण कर यह मंत्र बोल जाता है :
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ
 निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||

अर्थात= विशाल आकार और टेढ़ी सूंढ़ वाले करोडो सूर्यो के सामान ते वाले हे देव (गणेश जी) , समस्त कार्यो को सदा विघ्नरहित पूर्ण (सम्पन्न) करे।

वेदो में भी गणेश जी की महत्ता व् उनके विघ्नहर्ता सवरूप की ब्रह्मरूप में स्तुति व् आवाहन करते हुए कहा गया है की -

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कबिनामु पश्रवस्तमम |
 ज्येष्ठराजं ब्र्ह्मण्णा ब्रह्मणसप्त आ न: शृण्वन्नतिभि: सीद सादनम||

अर्थात तुम देवगणो के प्रभु होने से गणपति हो, ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो, उत्कृष्ठ ऋतिवलो में श्रेष्ठ हो, तुम शिव के ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हम आदर से तुम्हारा आव्हान करते है। हे ब्रह्मणसप्त गणेश, तुम अपने समस्त शक्तियों के साथ इस आसान पर आओ।

दूसरे मंत्र में कहा गया है की -
नि शु सीद गणपते गणेशु त्वामाहु विर्प्रत्म: कबिनाम |
 न रीते त्वत्त क्रियते की चनारे महामक मघवाक मघवचित्रमर्च ||

अर्थात = हे गणपते' आप देव आदि समूह में विराजिये क्योंकि समस्त बुद्धिमानो में आप ही श्रेष्ठ है, आपके बिना समीप या दूर का कोई कार्य नहीं किया जा सकता. हे पूज्य आदरणीय गणपति, हमारे सत्कार्यों को निर्विघ्न पूरा करने की कृपा कीजिये।

गणेशजी विधा के देवता है, साध्ना में उच्स्तरीय दूरदर्शिता आ जाये, उचित - अनुचित, कर्तव्य -अकर्तव्य की पहचान हो जाये, इसलिए सभी शुभकार्यो में गणेश पूजन का विधान बताया गया है।

गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है इसके पीछे एक पद्मपुराण की कथा भी है जो इस प्रकार है ...
सृष्टि के आरम्भ में जब यह प्रसन्न उठा कि प्रथमपूज्य किसे माना जाए तो समस्त देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे. ब्रह्मा जी ने कहा कि जो कोई पृथ्वी कि परिकर्मा सबसे पहले कर लगा, उसे ही प्रथम पूजा जायेगा. इस पर सभी देवतागण अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर परिक्रमा हेतु चल पडे।

चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा है और उनका शरीर स्थूल, तो ऐसे में वे परिक्रमा कैसे कर पाते! इस समस्या को सुलझाया देवर्षि नारद ने। नारद ने उन्हें जो उपाय सुझाया, उनके अनुसार गणेशजी ने भूमि पर "राम" नाम लिखकर उसकी सात परिक्रमा की और ब्रह्माजी के पास सबसे पहले पहुंच गए। तब ब्रह्माजी ने उन्हें प्रथमपूज्य बताया, क्योंकि "राम" नाम साक्षात् श्रीराम का स्वरूप है और श्रीराम में ही संपूर्ण ब्रह्मांड निहित है.

शिवपुराण में भी एक ऐसी ही कथा बताई गई है इसके अनुसार एक बार समस्त देवता भगवान शंकर के पास यह समस्या लेकर पहुंचे कि किस देव को उनका मुखिया चुना जाए। भगवान शिव ने यह प्रस्ताव रखा कि जो भी पहले पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके कैलाश लौटेगा, वहीं सर्वप्रथम पूजा के योग्य होगा और उसे ही देवताओं का स्वामी बनाया जाएगा। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा था जिसकी गति अत्यंत धीमी गति थी, इसलिए अपनी बुद्धि-चातुर्य के कारण उन्होंने अपने पिता शिव और माता पार्वती की ही तीन परिक्रमा पूर्ण की और हाथ जोडकर खडे हो गए।

शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमसे बढकर संसार में अन्य कोई इतना चतुर नहीं है। माता-पिता की तीन परिक्रमा से तीनों लोकों की परिक्रमा का पुण्य तुम्हें मिल गया, जो पृथ्वी की परिक्रमा से भी बडा है. इसलिए जो मनुष्य किसी कार्य के शुभारंभ से पहले तुम्हारा पूजन करेगा, उसे कोई बाधा नहीं आएगी। बस, तभी से गणेशजी अग्रपूज्य हो गए।

वाराहपुराण के अनुसार जब देवगणों की प्रार्थना सुनकर महादेव ने उमा की ओर निर्निमेष नेत्रों से देखा, उसकी समय के मुखरूपी से एक परम सुंदर, तेजस्वी कुमार वहां प्रकट हो गया. उसमें ब्रह्मा के सब गुण विद्यमान थे और वह दूसरा रूद्र जैसा ही लगता था. उसके रूप को देखकर पार्वती को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप दिया कि हे कुमार! तू हाथी के सिर वाला, लंबे पेट वाला और सांपों के जनेऊ वाला हो जाएगा।

इस पर शंकरजी ने क्रोधित होकर अपने शरीर को धुना, तो उनके रोमों से हाथी के सिर वाले, नीले अंजन जैसे रंग वाले, अनेक शस्त्रों को धारण किए हुए इतने विनायक उत्पन्न हुए कि पृथ्वी क्षुब्ध हो उठी, देवगण भी घबरा गए। तब ब्रह्मा ने महादेव से प्रार्थना की, "हे त्रिशूलधारी! आपके मुख से पैदा हुए ये विनायकगण आपके इस पुत्र के वश मे रहें. आप प्रसन्न होकर इन सबकों ऐसा ही वर दें. तब महादेव ने अपने पुत्र से कहा कि तुम्हारे भव, गजास्व, गणेश और विनायक नाम के होंगे।

यह सब कू्रर दृष्टि वाले प्रचण्ड विनायक तुम्हारे भृत्य होंगे यज्ञादि कार्यो में तुम्हारी सबसे पहले पूजा होगी, अन्यथा तुम कार्य के सिद्ध होने मे विघ्न उपस्थित कर दोगे" इसके अनन्तर देवगणों ने गणेशजी की स्तुति की और शंकर ने उनका अभिषेक किया।

एक बार देवताओं ने गोमती के तट पर यज्ञ प्रारंभ किया तो उसमें अनेक विघ्न पडने लगे, यज्ञ संपन्न नहीं हो सका। उदास होकर देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु से इसका कारण पूछा। दयामय चतुरानन ने पता लगाकर बताया कि इस यज्ञ मे श्रीगणेशजी विघ्न उपस्थित कर रहे है और यदि आप लोग विनायक को प्रसन्न कर ले, तब यज्ञ पूर्ण हो जाएगा। विधाता की सलाह से देवताओं ने स्नान कर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक गणेशजी का पूजन किया. विघ्नराज गणेशजी की कृपा से यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ।

तो इस प्रकार हम गणेश जी की सर्वप्रथम पूजा करते है ताकि काम में कोई बाधा ना आये !

बुधवार को गणेश जी की पूजा के लाभ
देवता भी अपने कार्यों की बिना किसी विघ्न से पूरा करने के लिए गणेश जी की अर्चना सबसे पहले करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देवगणों ने स्वयं उनकी अग्रपूजा का विधान बनाया है।

शास्त्रों में एक बार जिक्र आता है कि भगवान शंकर त्रिपुरासुर का वध करने में जब असफल हुए, तब उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार किया कि आखिर उनके कार्य में विघ्न क्यों पड़ा

तब महादेव को ज्ञात हुआ कि वे गणेशजी की अर्चना किए बगैर त्रिपुरासुर से युद्ध करने चले गए थे। इसके बाद शिवजी ने गणेशजी का पूजन करके उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया और दोबारा त्रिपुरासुर पर प्रहार किया, तब उनका मनोरथ पूर्ण हुआ।

सनातन एवं हिन्दू शास्त्रों में भगवान गणेश जी को, विघ्नहर्ता अर्थात सभी तरह की परेशानियों को खत्म करने वाला बताया गया है। पुराणों में गणेशजी की भक्ति शनि सहित सारे ग्रहदोष दूर करने वाली भी बताई गई हैं। हर बुधवार के शुभ दिन गणेशजी की उपासना से व्यक्ति का सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की रुकावटे दूर होती हैं।

गणेश भगवान की सामान्य पूजा विधि
प्रातः काल स्नान ध्यान आदि से सुद्ध होकर सर्व प्रथम ताम्र पत्र के श्री गणेश यन्त्र को साफ़ मिट्टी, नमक, निम्बू  से अच्छे से साफ़ किया जाए।  पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख कर के आसान पर विराजमान हो कर सामने श्री गणेश यन्त्र की स्थापना करें।

शुद्ध आसन में बैठकर सभी पूजन सामग्री को एकत्रित कर पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, मौली लाल, चंदन, मोदक आदि गणेश भगवान को समर्पित कर, इनकी आरती की जाती है।

अंत में भगवान गणेश जी का स्मरण कर ॐ गं गणपतये नमः का 108 नाम मंत्र का जाप करना चाहिए।

बुधवार को यहां बताए जा रहे ये छोटे-छोटे उपाय करने से व्यक्ति को लाभ प्राप्त होता है।

बिगड़े काम बनाने के लिए बुधवार को गणेश मंत्र का स्मरण करें-

त्रयीमयायाखिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय। नित्याय सत्याय च नित्यबुद्धि नित्यं निरीहाय नमोस्तु नित्यम्।

अर्थात भगवान गणेश आप सभी बुद्धियों को देने वाले, बुद्धि को जगाने वाले और देवताओं के भी ईश्वर हैं। आप ही सत्य और नित्य बोधस्वरूप हैं। आपको मैं सदा नमन करता हूं। कम से कम 21 बार इस मंत्र का जप जरुर होना चाहिए।

ग्रह दोष और शत्रुओं से बचाव के लिए-

गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:।
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक:।।
धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:।
गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्।।

इसमें भगवान गणेश जी के बारह नामों का स्मरण किया गया है। इन नामों का जप अगर मंदिर में बैठकर किया जाए तो यह उत्तम बताया जाता है। जब पूरी पूजा विधि हो जाए तो कम से कम 11 बार इन नामों का जप करना शुभ होता है।

परिवार और व्यक्ति के दुःख दूर करने के सरल उपाय
बुधवार के दिन घर में सफेद रंग के गणपति की स्थापना करने से समस्त प्रकार की तंत्र शक्ति का नाश होता है।

धन प्राप्ति के लिए बुधवार के दिन श्री गणेश को घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो जाता है।
परिवार में कलह कलेश हो तो बुधवार के दिन दूर्वा के गणेश जी की प्रतिकात्मक मूर्ति बनवाएं। इसे अपने घर के देवालय में स्थापित करें और प्रतिदिन इसकी विधि-विधान से पूजा करें।
घर के मुख्य दरवाजे पर गणेशजी की प्रतिमा लगाने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। कोई भी नकारात्मक शक्ति घर में प्रवेश नहीं कर पाती हैं।

- ज्ञानचंद बुंदिवाल
हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न (माणिक, पुखराज, नीलम, मोती, गोमेध, लहसुनिया, हिरा, मूंगा और पन्ना) और 1 से 14 मुखी रुद्राक्ष मिलते हैं
सभी रत्न और रुद्राक्ष सर्टफ़ाइड मिलते हैं
हमारे यहां सभी रत्न सर्टफ़ाइ भी किये जाते है
ज्योतिष और रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल
अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर जाए यहाँ क्लिक करें
हमारा पता - कुंदन ज्वैलर्स, न्यू इतवारी रोड, सर्राफा बाजार, नागपुर. 440002


Monday, 24 August 2020

गणेश जी को हाथी का सिर क्यों क्यों काटा गया गणेश जी का सिर

गणेश जी को हाथी का सिर क्यों क्यों काटा गया गणेश जी का सिर
एकदन्ताय् विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, लंबोदर, व्रकतुंड आदि कई विचित्र नामों से पुकारा जाता है। जितने विचित्र इनके नाम हैं उतनी विचित्र इनसे जुड़ी कथाएं भी हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में भगवान श्रीगणेश की कथाओं का वर्णन मिलता है। भगवान श्रीगणेश से जुड़ी कुछ जग प्रसिद्ध कथा यहाँ प्रस्तुत है।
1- शिवमहापुराण के अनुसार माता पार्वती को श्रीगणेश का निर्माण करने का विचार उनकी सखियां जया और विजया ने दिया था। जया-विजया ने पार्वती से कहा था कि नंदी आदि सभी गण सिर्फ महादेव की आज्ञा का ही पालन करते हैं। अत: आपको भी एक गण की रचना करनी चाहिए जो सिर्फ आपकी आज्ञा का पालन करे। इस प्रकार विचार आने पर माता पार्वती ने श्रीगणेश की रचना अपने शरीर के मैल से की।
2- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश के शरीर का रंग लाल और हरा है। श्रीगणेश को जो दूर्वा चढ़ाई जाती है वह जडऱहित, बारह अंगुल लंबी और तीन गांठों वाली होना चाहिए। ऐसी 101 या 121 दूर्वा से श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।
3- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुण्यक नाम व्रत किया था, इसी व्रत के फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण पुत्र रूप में माता पार्वती को प्राप्त हुए।
4- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब सभी देवता श्रीगणेश को आशीर्वाद दे रहे थे तब शनिदेव सिर नीचे किए हुए खड़े थे। पार्वती द्वारा पुछने पर शनिदेव ने कहा कि मेरे द्वारा देखने पर आपके पुत्र का अहित हो सकता है लेकिन जब माता पार्वती के कहने पर शनिदेव ने बालक को देखा तो उसका सिर धड़ से अलग हो गया।
5- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब शनि द्वारा देखने पर माता पार्वती के पुत्र का मस्तक कट गया तो भगवान श्रीहरि गरूड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए और पुष्पभद्रा नदी के तट पर हथिनी के साथ सो रहे एक गजबालक का सिर काटकर ले आए। उस गजबालक का सिर श्रीहरि ने माता पार्वती के मस्तक विहिन पुत्र के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया।
6- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार किसी कारणवश भगवान शिव ने क्रोध में आकर सूर्य पर त्रिशूल से प्रहार किया। इस प्रहार से सूर्यदेव चेतनाहीन हो गए। सूर्यदेव के पिता कश्यप ने जब यह देखा तो उन्होंने क्रोध में आकर शिवजी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूल से मेरे पुत्र का शरीर नष्ट हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे पुत्र का मस्तक भी कट जाएगा। इसी श्राप के फलस्वरूप भगवान श्रीगणेश के मस्तक कटने की घटना हुई।
7- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थी, उस समय वहां श्रीगणेश भी तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए लेकिन श्रीगणेश ने विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।
8- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश का विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से हुआ है। श्रीगणेश के दो पुत्र हैं इनके नाम शुभ तथा लाभ हैं।
9- शिवमहापुराण के अनुसार जब भगवान शिव त्रिपुर का नाश करने जा रहे थे तब आकाशवाणी हुई कि जब तक आप श्रीगणेश का पूजन नहीं करेंगे तब तक तीनों पुरों का संहार नहीं कर सकेंगे। तब भगवान शिव ने भद्रकाली को बुलाकर गजानन का पूजन किया और युद्ध में विजय प्राप्त की।
10- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया। वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।
11- स्कंद पुराण के अनुसार, एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नान स्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर 'बाल गणेश' को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया। इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं। गणेशजी उन्हें रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है।
युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला। माता का रौद्र रूप देख शिव एक हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़कर गणेश जी को पुन:जीवित कर देते हैं। तभी से भगवान गणेश को गजानन गणेश कहा जाने लगा।
12- महाभारत का लेखन श्रीगणेश ने किया है, ये बात तो सभी जानते हैं लेकिन महाभारत लिखने से पहले उन्होंने महर्षि वेदव्यास के सामने एक शर्त रखी थी इसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। शर्त इस प्रकार थी कि श्रीगणेश ने महर्षि वेदव्यास से कहा था कि यदि लिखते समय मेरी लेखनी क्षणभर के लिए भी न रूके तो मैं इस ग्रंथ का लेखक बन सकता हूं।
तब महर्षि वेदव्यास जी ये शर्त मान ली और श्रीगणेश से कहा कि मैं जो भी बोलूं आप उसे बिना समझे मत लिखना। तब वेदव्यास जी बीच-बीच में कुछ ऐसे श्लोक बोलते कि उन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगता। इस बीच महर्षि वेदव्यास अन्य काम कर लेते थे।
13- पद्मपुराण के अनुसार, पूर्वकाल में पार्वती देवी को देवताओं ने अमृत से तैयार किया हुआ एक दिव्य मोदक दिया। मोदक देखकर दोनों बालक (कार्तिकेय तथा गणेश) माता से माँगने लगे। तब माता ने मोदक के महत्व का वर्णन कर कहा कि तुममें से जो धर्माचरण के द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करके सर्वप्रथम सभी तीर्थों का भ्रमण कर आएगा, उसी को मैं यह मोदक दूँगी।
माता की ऐसी बात सुनकर कार्तिकेय ने मयूर पर आरूढ़ होकर मुहूर्तभर में ही सब तीर्थों का स्नान कर लिया। इधर गणेश जी का वाहन मूषक होने के कारण वे तीर्थ भ्रमण में असमर्थ थे। तब गणेशजी श्रद्धापूर्वक माता-पिता की परिक्रमा करके पिताजी के सम्मुख खड़े हो गए।
यह देख माता पार्वतीजी ने कहा कि समस्त तीर्थों में किया हुआ स्नान, सम्पूर्ण देवताओं को किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञों का अनुष्ठान तथा सब प्रकार के व्रत, मन्त्र, योग और संयम का पालन- ये सभी साधन माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते। इसलिए यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से भी बढ़कर है। अतः यह मोदक मैं गणेश को ही अर्पण करती हूँ। माता-पिता की भक्ति के कारण ही इसकी प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहले पूजा होगी।
14- गणेश पुराण के अनुसार छन्दशास्त्र में 8 गण होते हैं- मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण, तगण। इनके अधिष्ठाता देवता होने के कारण भी इन्हें गणेश की संज्ञा दी गई है। अक्षरों को गण भी कहा जाता है। इनके ईश होने के कारण इन्हें गणेश कहा जाता है, इसलिए वे विद्या-बुद्धि के 

Monday, 9 September 2019

गणेश जी की 4 सुंदर कथाएं

गणेश जी की 4 सुंदर कथाएं
भगवान गणपति के अवतरण व उनकी लीलाओं तथा उनके मनोरम स्वरूपों का वर्णन पुराणों और शास्त्रों में प्राप्त होता है। कल्पभेद से उनके अनेक अवतार हुए हैं।
1..पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से एक आकर्षक कृति बनाई। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।
2.लिंग पुराण के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान शिव की उपासना करके उनसे सुरद्रोही दानवों के दुष्टकर्म में विघ्न उपस्थित करने के लिए वर मांगा। आशुतोष शिव ने 'तथास्तु' कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया।
समय आने पर गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उनका मुख हाथी के समान था और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में पाश था। देवताओं ने पुष्प-वृष्टि करते हुए गजानन के चरणों में बार-बार प्रणाम किया। भगवान शिव ने गणेश जी को दैत्यों के कार्यों में विघ्न उपस्थित करके देवताओं और ब्राह्मणों का उपकार करने का आदेश दिया।
3 .इसी तरह से ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण तथा शिव पुराण में भी भगवान गणेश जी के अवतार की भिन्न-भिन्न कथाएं मिलती हैं प्रजापति विश्वकर्मा की रिद्धी-सिद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से शुभ और रिद्धी से लाभ नाम के दो कल्याणकारी पुत्र हुए।
4 .गणेश चालीसा में वर्णित है : एक बार माता पार्वती ने विलक्षण पुत्र प्राप्ति हेतु बड़ा तप किया। जब यज्ञ पूरा हुआ अब श्री गणेश ब्राह्मण का रूप धर कर पहुंचें। अतिथि मानकर माता पार्वती ने उनका सत्कार किया। श्री गणेश ने प्रसन्न होकर वर दिया कि माते, पुत्र के लिए जो तप आपने किया है उससे आपको विशिष्ट बुद्धि वाला पुत्र बिना गर्भ के ही प्राप्त होगा। वह गणनायक होगा, गुणों की खान होगा। ऐसा कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए और पालने में बालक का स्वरूप धारण कर लिया। माता पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। भव्य उत्सव मनाया जाने लगा। चारों दिशाओं से देवी-देवता विलक्षण पार्वती नंदन को देखने पहुंचने लगे। शनिदेव भी पहुंचे। लेकिन वे अपने दृष्टि अवगुण की वजह से बालक के सामने जाने से बचने लगे। माता पार्वती ने आग्रह किया कि क्या शनि देव को उनका उत्सव और पुत्र प्राप्ति अच्छी नहीं लगी? संकोच के साथ शनि देव सुंदर बालक को देखने पहुंचे। लेकिन यह क्या
शनिदेव की नजर पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया। माता पार्वती विलाप करने लगी। कैलाश में हाहाकार मच गया। हर तरफ यही चर्चा होने लगी कि शनि ने पार्वती पुत्र का नाश किया है। तुरंत भगवान विष्णु ने गरूड़ देव को आदेश दिया कि जो भी पहला प्राणी नजर आए उसका सिर काटकर ले आओ.... उन्हें रास्ते में सबसे पहले हाथी मिला। गरूड़ देव हाथी का सिर लेकर आए। बालक के धड़ के ऊपर उसे रखा। भगवान शंकर ने उन पर प्राण मंत्र छिड़का। सभी देवताओं ने मिलकर उनका गणेश नामकरण किया और उन्हें प्रथम पुज्य होने का वरदान भी दिया। इस प्रकार श्री गणेश का जन्म हुआ।
    
  Gyanchand Bundiwal.
Kundan Jewellers 
We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices.
हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष  होल सेल भाव में मिलते हैं और  ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 
website www.kundanjewellersnagpur.com

Tuesday, 3 September 2019

गणेश जी की 4 सुंदर कथा

गणेश जी की 4 सुंदर कथा    
भगवान गणपति के अवतरण व उनकी लीलाओं तथा उनके मनोरम स्वरूपों का वर्णन पुराणों और शास्त्रों में प्राप्त होता है। कल्पभेद से उनके अनेक अवतार हुए हैं।
1..पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से एक आकर्षक कृति बनाई। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।
2.लिंग पुराण के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान शिव की उपासना करके उनसे सुरद्रोही दानवों के दुष्टकर्म में विघ्न उपस्थित करने के लिए वर मांगा। आशुतोष शिव ने 'तथास्तु' कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया।
समय आने पर गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उनका मुख हाथी के समान था और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में पाश था। देवताओं ने पुष्प-वृष्टि करते हुए गजानन के चरणों में बार-बार प्रणाम किया। भगवान शिव ने गणेश जी को दैत्यों के कार्यों में विघ्न उपस्थित करके देवताओं और ब्राह्मणों का उपकार करने का आदेश दिया।

3 .इसी तरह से ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण तथा शिव पुराण में भी भगवान गणेश जी के अवतार की भिन्न-भिन्न कथाएं मिलती हैं प्रजापति विश्वकर्मा की रिद्धी-सिद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से शुभ और रिद्धी से लाभ नाम के दो कल्याणकारी पुत्र हुए।
4 .गणेश चालीसा में वर्णित है : एक बार माता पार्वती ने विलक्षण पुत्र प्राप्ति हेतु बड़ा तप किया। जब  यज्ञ पूरा हुआ अब श्री गणेश ब्राह्मण का रूप धर कर पहुंचें। अतिथि मानकर माता पार्वती ने उनका सत्कार किया। श्री गणेश ने प्रसन्न होकर वर दिया कि माते, पुत्र के लिए जो तप आपने किया है उससे आपको विशिष्ट बुद्धि वाला पुत्र बिना गर्भ के ही प्राप्त होगा। वह गणनायक होगा, गुणों की खान होगा। ऐसा कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए और पालने में बालक का स्वरूप धारण कर लिया। माता पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा।  आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। भव्य उत्सव मनाया जाने लगा। चारों दिशाओं से देवी-देवता विलक्षण पार्वती नंदन को देखने पहुंचने लगे। शनिदेव भी पहुंचे। लेकिन वे अपने दृष्टि अवगुण की वजह से बालक के सामने जाने से बचने लगे। माता पार्वती ने आग्रह किया कि क्या शनि देव को उनका उत्सव और पुत्र प्राप्ति अच्छी नहीं लगी? संकोच के साथ शनि देव सुंदर बालक को देखने पहुंचे। लेकिन यह क्या
शनिदेव की नजर पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया। माता पार्वती विलाप करने लगी। कैलाश में हाहाकार मच गया। हर तरफ यही चर्चा होने लगी कि शनि ने पार्वती पुत्र का नाश किया है। तुरंत भगवान विष्णु ने गरूड़ देव को आदेश दिया कि जो भी पहला प्राणी नजर आए उसका सिर काटकर ले आओ.... उन्हें रास्ते में सबसे पहले हाथी मिला। गरूड़ देव हाथी का सिर लेकर आए। बालक के धड़ के ऊपर उसे रखा। भगवान शंकर ने उन पर प्राण मंत्र छिड़का। सभी देवताओं ने मिलकर उनका गणेश नामकरण किया और उन्हें प्रथम पुज्य होने का वरदान भी दिया। इस प्रकार श्री गणेश का जन्म हुआ।  Gyanchand Bundiwal.
Kundan Jewellers
We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices.
हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष  होल सेल भाव में मिलते हैं और  ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557
website www.kundanjewellersnagpur.com

Sunday, 23 September 2018

श्री गणेश प्रश्नावली चक्र

श्री गणेश प्रश्नावली चक्र  इन यंत्रों की सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। इन्ही में से एक श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के बारे में हम आज आपको बता रहे है।
भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाती है। श्रीगणेश की पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। यह बहुत ही चमत्कारी यंत्र है।
उपयोग विधि,,,,जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।
1 आप जब भी समय मिले राम नाम का जप करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
2 आप जो कार्य करना चाह रहे हैं, उसमें हानि होने की संभावना है। कोई दूसरा कार्य करने के बारे में विचार करें। गाय को चारा खिलाएं।
3 आपकी चिंता दूर होने का समय आ गया है। कष्ट मिटेंगे और सफलता मिलेगी। आप रोज पीपल की पूजा करें।
4 आपको लाभ प्राप्त होगा। परिवार में वृद्धि होगी। सुख संपत्ति प्राप्त होने के योग भी बन रहे हैं। आप कुल देवता की पूजा करें।
5 आप शनिदेव की आराधना करें। व्यापारिक यात्रा पर जाना पड़े तो घबराएं नहीं। लाभ ही होगा।
6 रोज सुबह भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। महीने के अंत तक आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।
7 पैसों की तंगी शीघ्र ही दूर होगी। परिवार में वृद्धि होगी। स्त्री से धन प्राप्त होगा।
8 आपको धन और संतान दोनों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से आपको लाभ होगा।
9 आपकी ग्रह दिशा अनुकूल चल रही है। जो वस्तु आपसे दूर चली गई है वह पुन: प्राप्त होगी।
10 शीघ्र ही आपको कोई प्रसन्नता का समाचार मिलने वाला है। आपकी मनोकामना भी पूरी होगी। प्रतिदिन पूजन करें।
11 यदि आपको व्यापार में हानि हो रही है तो कोई दूसरा व्यापार करें। पीपल पर रोज जल चढ़ाएं। सफलता मिलेगी।
12 राज्य की ओर से लाभ मिलेगा। पूर्व दिशा आपके लिए शुभ है। इस दिशा में यात्रा का योग बन सकता है। मान-सम्मान प्राप्त होगा।
13 कुछ ही दिनों बाद आपका श्रेष्ठ समय आने वाला है। कपड़े का व्यवसाय करेंगे तो बेहतर रहेगा। सब कुछ अनुकूल रहेगा।
14 जो इच्छा आपके मन में है वह पूरी होगी। राज्य की ओर से लाभ प्राप्ति का योग बन रहा है। मित्र या भाई से मिलाप होगा।
15 आपके सपने में स्वयं को गांव जाता देंखे तो शुभ समाचार मिलेगा। पुत्र से लाभ मिलेगा। धन प्राप्ति के योग भी बन रहे हैं।
16 आप देवी मां पूजा करें। मां ही सपने में आकर आपका मार्गदर्शन करेंगी। सफलता मिलेगी।
17 आपको अच्छा समय आ गया है। चिंता दूर होगी। धन एवं सुख प्राप्त होगा।
18 यात्रा पर जा सकते हैं। यात्रा मंगल, सुखद व लाभकारी रहेगी। कुलदेवी का पूजन करें।
19 आपके समस्या दूर होने में अभी करीब डेढ़ साल का समय शेष है। जो कार्य करें माता-पिता से पूछकर करें। कुल देवता व ब्राह्मण की सेवा करें।
20 शनिवार को शनिदेव का पूजन करें। गुम हुई वस्तु मिल जाएगी। धन संबंधी समस्या भी दूर हो जाएगी।
21 आप जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। आप श्रीगणेश का पूजन करें।
22 यदि आपके घर में क्लेश रहता है तो रोज भगवान की पूजा करें तथा माता-पिता की सेवा करें। आपको शांति का अनुभव होगा।
23 आपकी समस्याएं शीघ्र ही दूर होंगी। आप सिर्फ आपके काम में मन लगाएं और भगवान शंकर की पूजा करें।
24 आपके ग्रह अनुकूल नहीं है इसलिए आप रोज नवग्रहों की पूजा करें। इससे आपकी समस्याएं कम होंगी और लाभ मिलेगा।
25 पैसों की तंगी के कारण आपके घर में क्लेश हो रहा है। कुछ दिनों बाद आपकी यह समस्या दूर जाएगी। आप मां लक्ष्मी का पूजन रोज करें।
26 यदि आपके मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो उनका त्याग करें और घर में भगवान सत्यनारायण का कथा करवाएं। लाभ मिलेगा।
27 आप जो कार्य इस समय कर रहे हैं वह आपके लिए बेहतर नहीं है इसलिए किसी दूसरे कार्य के बारे में विचार करें। कुलदेवता का पूजन करें।
28 आप पीपल के वृक्ष की पूजा करें व दीपक लगाएं। आपके घर में तनाव नहीं होगा और धन लाभ भी होगा।
29 आप प्रतिदिन भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा की पूजा करें। इससे आपको मनचाही सफलता मिलेगी और घर में सुख-शांति रहेगी।
30 रविवार का व्रत एवं सूर्य पूजा करने से लाभ मिलेगा। व्यापार या नौकरी में थोड़ी सावधानी बरतें। आपको सफलता मिलेगी।
31 आपको व्यापार में लाभ होगा। घर में खुशहाली का माहौल रहेगा और सबकुछ भी ठीक रहेगा। आप छोटे बच्चों को मिठाई बांटें।
32 आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। सब कुछ ठीक हो रहा है। आपकी चिंता दूर होगी। गाय को चारा खिलाएं।
33 माता-पिता की सेवा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं व भगवान श्रीराम की पूजा करें। आपकी हर अभिलाषा पूरी होगी।
34 मनोकामनाएं पूरी होंगी। धन-धान्य एवं परिवार में वृद्धि होगी। कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाएं।
35 परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है। जो भी करें सोच-समझ कर और अपने बुजुर्गो की राय लेकर ही करें। आप भगवान दत्तात्रेय का पूजन करें।
36 आप रोज भगवान श्रीगणेश को दुर्वा चढ़ाएं और पूजन करें। आपकी हर मुश्किल दूर हो जाएंगी। धैर्य बनाएं रखें।
37 आप जो कार्य कर रहे हैं वह जारी रखें। आगे जाकर आपको इसी में लाभ प्राप्त होगा। भगवान विष्णु का पूजन करें।
38 लगातार धन हानि से चिंता हो रही है तो घबराइए मत। कुछ ही दिनों में आपके लिए अनुकूल समय आने वाला है। मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें।
39 आप भगवान सत्यनारायण की कथा करवाएं तभी आपके कष्टों का निवारण संभव है। आपको सफलता भी मिलेगी।
40- आपके लिए हनुमानजी का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। खेती और व्यापार में लाभ होगा तथा हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।
41 आपको धन की प्राप्ति होगी। कुटुंब में वृद्धि होगी एवं चिंताएं दूर होंगी। कुलदेवी का पूजन करें।
42 आपको शीघ्र सफलता मिलने वाली है। माता-पिता व मित्रों का सहयोग मिलेगा। खर्च कम करें और गरीबों का दान करें।
43 रुका हुआ कार्य पूरा होगा। धन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग मिलेगा। सोच-समझकर फैसला लें। श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
44 धार्मिक कार्यों में मन लगाएं तथा प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपको लाभ होगा और बिगड़ते काम बन जाएंगे।
45 धैर्य बनाएं रखें। बेकार की चिंता में समय न गवाएं। आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। ईश्वर का चिंतन करें।
46 धार्मिक यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इसमें लाभ मिलने की संभावना है। रोज गायत्री मंत्र का जप करें।
47 प्रतिदिन सूर्य को अध्र्य दें और पूजन करें। आपको शत्रुओं का भय नहीं सताएगा। आपकी मनोकामना पूरी होगी।
48 आप जो कार्य कर रहे हैं वही करते रहें। पुराने मित्रों से मुलाकात होगी जो आपके लिए फायदेमंद रहेगी। पीपल को रोज जल चढ़ाएं।
49 अगर आपकी समस्या आर्थिक है तो आप रोज श्रीसूक्त का पाठ करें और लक्ष्मीजी का पूजा करें। आपकी समस्या दूर होगी।
50 आपका हक आपको जरुर मिलेगा। आप घबराएं नहीं बस मन लगाकर अपना काम करें। रोज पूजा अवश्य करें।
51 आप जो व्यापार करना चाहते हैं उसी में सफलता मिलेगी। पैसों के लिए कोई गलत कार्य न करें। आप रोज जरुरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।
52 एक महीने के अंदर ही आपकी मुसीबतें कम हो जाएंगी और सफलता मिलने लगेगी। आप कन्याओं को भोजन कराएं।
53 यदि आप विदेश जाने के बारे में सोच रहे हैं तो अवश्य जाएं। इसी में आपको सफलता मिलेगी। आप श्रीगणेश का आराधना करें।
54 आप जो भी कार्य करें किसी से पुछ कर करें अन्यथा हानि हो सकती है। विपरीत परिस्थिति से घबराएं नहीं। सफलता अवश्य मिलेगी।
55 आप मंदिर में रोज दीपक जलाएं, इससे आपको लाभ मिलेगा और मनोकामना पूरी होगी।
56 परिजनों की बीमारी के कारण चिंतित हैं तो रोज महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।
57 आपके लिए समय अनुकूल नहीं है। अपने कार्य पर ध्यान दें। प्रमोशन के लिए रोज गाय को रोटी खिलाएं।
58 आपके भाग्य में धन-संपत्ति आदि सभी सुविधाएं हैं। थोड़ा धैर्य रखें व भगवान में आस्था रखकर लक्ष्मीजी को नारियल चढ़ाएं।
59 जो आप सोच रहे हैं वह काम जरुर पूरा होगा लेकिन इसमें किसी का सहयोग लेना पड़ सकता है। आप शनिदेव की उपासना करें।
60- आप अपने परिजनों से मनमुटाव न रखें तो ही आपको सफलता मिलेगी। रोज हनुमानजी के मंदिर में चौमुखी दीपक लगाएं।
61 यदि आप अपने करियर को लेकर चिंतित हैं तो श्रीगणेश की पूजा करने से आपको लाभ मिलेगा।
62 आप रोज शिवजी के मंदिर में जाकर एक लोटा जल चढ़ाएं और दीपक लगाएं। आपके रुके हुए काम हो जाएंगे।
63 आप जिस कार्य के बारे में जानना चाहते हैं वह शुभ नहीं है उसके बारे में सोचना बंद कर दें। नवग्रह की पूजा करने से आपको सफलता मिलेगी।
64 आप रोज आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं। आपकी हर समस्या का निदान स्वत: ही हो जाएगा।Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Tuesday, 11 September 2018

गणेश चतुर्थी 22- अगस्त -2020

गणेश चतुर्थी 22- अगस्त -2020 मुहूर्त गणेश पूजा - सुबह 11- 02 से दिन 13- 32 चंद्र दर्शन से बचने का समय सुबह - 08- 59 से रात 21- 20 - 22 अगस्त चतुर्थी तिथि आरंभ - 23- 02 - रात 21 अगस्त - चतुर्थी तिथि समाप्त- रात 19:56 - 22 अगस्त भगवान गणपति को घर में विराजमान करने का विधान है।


 आइये, हम आपको बताते हैं कि किस प्रकार गणपति को अपने घर में विराजमान करें। कैसे उनका आह्वान करें। गणपति का आह्वान ठीक उसी प्रकार होता है, जैसे आप गृह प्रवे संकल्प: पहले दाएं हाथ में अक्षत और गंगाजल लेकर संकल्प करें कि हम गणपति को अपने घर तीन, पांच, सात और दस दिन के लिए विराजमान करेंगे। ऊं गणेशाय नम: मंत्र के साथ संकल्प लें। यह संकल्प हुआ कि आप भगवान गणपति को अपने घर में विराजमान करेंगे। प्रतिदिन उनकी पूजा करेंगे। आह्वान: संकल्प के बाद आप गणपति जी को लेकर आइये। लेकिन इससे पहले घर का सजाए-संवारे। घर स्वच्छ हो। जिस स्थान पर विराजमान करना हो, वह पवित्र होना चाहिए। आह्वान करें कि हे गणपति, हम आपको अपने घर में ......( दिन का उल्लेख करें) के लिए अपने समस्त परिवार.....( परिवार के सदस्यों के नाम लें).....अमुक गोत्र...( गोत्र का नाम लें) घर में सुख शांति समृद्धि के लिए प्रतिष्ठापित कर रहे हैं। हे गणपति, आप हमारी मनोकामनाएं पूरी करें और ऋद्धि-सिद्धि के साथ विराजमान हों। ज्ञात-अज्ञात यदि हमसे कोई भूल हो जाए तो आप क्षमा करना। आह्वान मंत्र कोई भी हो सकता है। यदि संस्कृत श्लोक न कर सकें तो ऊं गणेशाय नम: का ही जाप करते रहें। पूजा स्थल नियत दिन पर आप गणपति को अपने घर में विराजमान करें। कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। चार हल्दी की बिंदी लगाएं। एक मुट्ठी अक्षत रखें। इस पर छोटा बाजोट, चौकी या पटरा रखें। लाल, केसरिया या पीले वस्त्र को उस पर बिछाएं। रंगोली, फूल, आम के पत्ते और अन्य सामग्री से स्थान को सजाएं। एक तांबे का कलश पानी भर कर, आम के पत्ते और नारियल के साथ सजाएं। यह समस्त तैयारी गणेश उत्सव के आरंभ होने के पहले कर लें। गणपति की प्रतिष्ठापना जब गजानन को लेने जाएं तो स्वच्छ और नवीन वस्त्र धारण करें। यथासंभव, चांदी की थाली में स्वास्तिक बनाकर और फूल-मालाओं से सजाकर उसमें गणपति को विराजमान करके लाएं। यदि चांदी की थाली संभव न हो पीतल या तांबे की भी चलेगी। मूर्ति बड़ी है तो आप हाथों में लाकर भी विराजमान कर सकते हैं। जब घर में विराजमान करें तो मंगलगान करें, कीर्तन करें। गणपति को लड्डू का भोग लगाएं। लाल पुष्प चढ़ाएं। प्रतिदिन प्रसाद के साथ पंच मेवा जरूर रखें। पांच इलायची और पांच कमलगट्टे भगवान गणपति के आगे एक छोटी कटोरी में पांच छोटी इलायची और पांच कमलगट्टे रख दें। गणेश चतुर्थी तक इनको गणपति के आगे ही रहने दें। चतुर्थी के बाद कमलगट्टे एक लाल कपड़े में करके पूजा स्थल पर रहने दें और छोटी इलायची को गणपति का प्रसाद मानते हुए ग्रहण कर लें। यह समस्त कार्यों की सिद्धि का उपाय है। सारे कष्ट इससे समाप्त होते हैं। चंद्रमा, राहू, केतू की छाया भी नहीं पड़ेगी। पूजन विधि : आचमन- ॐ केशवाय नम:। ॐ नारायणाय नम:। ॐ माधवाय नम:। कहकर हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें एवं ॐ ऋषिकेशाय नम: कहकर हाथ धो लें। इसके बाद शरीर शुद्धि करें.. ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। इसका ध्यान रखें जल से भरा हुआ कलश गणेश जी के बाएं रखें। चावल या गेहूं के ऊपर स्थापित करें। कलश पर मौली बांधें एवं आमपत्र के साथ एक नारियल उसके मुख पर रखें। गणेश जी के स्थान के सीधे हाथ की तरफ घी का दीपक एवं दक्षिणावर्ती शंख रखें। गणेश जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था, इसलिए मध्याह्न में ही प्रतिष्ठापित करें। 10 दिन तक नियमित समय पर आरती करें। पूजा का समय नियत रखें। जाप माला की संख्या भी नियत ही रखें। गणेश जी के सम्मुख बैठकर उनसे संवाद करें। मंत्रों का जाप करें। अपने कष्ट कहें। शिव परिवार की आराधना अवश्य करें यानी भगवान शंकर और पार्वती जी का ध्यान अवश्य करें। सुपारी गणेश और मिट्टी के गणेश भी रख सकते हैं यदि आपकी सामर्थ्य न हो तो आप घर में सुपारी गणेश और पीली मिट्टी से गणेशाकृति बनाकर उनको स्थापित कर सकते हैं। इसमे कोई दोष नहीं है। सुपारी गणेश और पीली मिट्टी के गणेश जी बनाकर स्थापित करने से वास्तु दोष भी समाप्त होते हैं। लेकिन इतना ध्यान रखें कि पूजा नियमित हो। पीली मिट्टी के गणेश जी का स्नान नहीं हो सकता, इसलिए गंगाजल के छींटे लगा सकते हैं। गणेश पूजन (सरलतम विधि ) लम्बी सूंड, बड़ी आँखें ,बड़े कान ,सुनहरा सिन्दूरी वर्ण यह ध्यान करते ही प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का पवित्र स्वरुप हमारे सामने आ जाता है | सुखी व सफल जीवन के इरादों से आगे बढऩे के लिए बुद्धिदाता भगवान श्री गणेश के नाम स्मरण से ही शुरुआत शुभ मानी जाती है। जीवन में प्रसन्नता और हर छेत्र में सफलता प्राप्त करने हतु श्री गजानन महाराज के पूजन की सरलतम विधि विद्वान पंडित जी द्वारा बताई गयी है ,जो की आपके लिए प्रस्तुत है -प्रातः काल शुद्ध होकर गणेश जी के सम्मुख बैठ कर ध्यान करें और पुष्प, रोली ,अछत आदि चीजों से पूजन करें और विशेष रूप से सिन्दूर चढ़ाएं तथा दूर्बा दल(११या २१ दूब का अंकुर )समर्पित करें|यदि संभव हो तो फल और मीठा चढ़ाएं (मीठे में गणेश जी को मूंग के लड्डू प्रिय हैं ) अगरबत्ती और दीप जलाएं और नीचे लिखे सरल मंत्रों का मन ही मन 11, 21 या अधिक बार जप करें :- ॐ चतुराय नम: | ॐ गजाननाय नम: |ॐ विघ्रराजाय नम: | ॐ प्रसन्नात्मने नम: | पूजा और मंत्र जप के बाद श्री गणेश आरती कर सफलता व समृद्धि की कामना करें। सामान्य पूजन पूजन सामग्री (सामान्य पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,गंगाजल,सिन्दूर,रोली,रक्षा,कपूर,घी,दही,दूब,चीनी,पुष्प,पान,सुपारी,रूई,प्रसाद (लड्डू गणेश जी को बहुत प्रिय है) | विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें और आवाहन मंत्र पढकर अक्षत डालें | ध्यान श्लोक - शुक्लाम्बर धरं विष्णुं शशि वर्णम् चतुर्भुजम् . प्रसन्न वदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये .. षोडशोपचार पूजन - ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ध्यायामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आवाहयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आसनं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अर्घ्यं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पाद्यं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आचमनीयं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . उप हारं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पंचामृत स्नानं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . वस्त्र युग्मं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . यज्ञोपवीतं धारयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आभरणानि समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . गंधं धारयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अक्षतान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पैः पूजयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . प्रतिष्ठापयामि . और गणेश जी के इन नामों का जप करें - ॐ गणपतये नमः॥ ॐ गणेश्वराय नमः॥ ॐ गणक्रीडाय नमः॥ ॐ गणनाथाय नमः॥ ॐ गणाधिपाय नमः॥ ॐ एकदंष्ट्राय नमः॥ ॐ वक्रतुण्डाय नमः॥ ॐ गजवक्त्राय नमः॥ ॐ मदोदराय नमः॥ ॐ लम्बोदराय नमः॥ ॐ धूम्रवर्णाय नमः॥ ॐ विकटाय नमः॥ ॐ विघ्ननायकाय नमः॥ ॐ सुमुखाय नमः॥ ॐ दुर्मुखाय नमः॥ ॐ बुद्धाय नमः॥ ॐविघ्नराजाय नमः॥ ॐ गजाननाय नमः॥ ॐ भीमाय नमः॥ ॐ प्रमोदाय नमः ॥ ॐ आनन्दाय नमः॥ ॐ सुरानन्दाय नमः॥ ॐमदोत्कटाय नमः॥ ॐ हेरम्बाय नमः॥ ॐ शम्बराय नमः॥ ॐशम्भवे नमः ॥ॐ लम्बकर्णाय नमः ॥ॐ महाबलाय नमः॥ॐ नन्दनाय नमः ॥ॐ अलम्पटाय नमः ॥ॐ भीमाय नमः ॥ॐमेघनादाय नमः ॥ॐ गणञ्जयाय नमः ॥ॐ विनायकाय नमः ॥ॐविरूपाक्षाय नमः ॥ॐ धीराय नमः ॥ॐ शूराय नमः ॥ॐवरप्रदाय नमः ॥ॐ महागणपतये नमः ॥ॐ बुद्धिप्रियायनमः ॥ॐ क्षिप्रप्रसादनाय नमः ॥ॐ रुद्रप्रियाय नमः॥ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॥ॐ उमापुत्राय नमः ॥ ॐ अघनाशनायनमः ॥ॐ कुमारगुरवे नमः ॥ॐ ईशानपुत्राय नमः ॥ॐमूषकवाहनाय नः ॥ ॐ सिद्धिप्रदाय नमः॥ॐ सिद्धिपतयेनमः ॥ॐ सिद्ध्यै नमः ॥ॐ सिद्धिविनायकाय नमः॥ ॐ विघ्नाय नमः ॥ॐ तुङ्गभुजाय नमः ॥ॐ सिंहवाहनायनमः ॥ॐ मोहिनीप्रियाय नमः ॥ ॐ कटिंकटाय नमः ॥ॐराजपुत्राय नमः ॥ॐ शकलाय नमः ॥ॐ सम्मिताय नमः॥ ॐ अमिताय नमः ॥ॐ कूश्माण्डगणसम्भूताय नमः ॥ॐदुर्जयाय नमः ॥ॐ धूर्जयाय नमः ॥ ॐ अजयाय नमः ॥ॐभूपतये नमः ॥ॐ भुवनेशाय नमः ॥ॐ भूतानां पतये नमः॥ ॐ अव्ययाय नमः ॥ॐ विश्वकर्त्रे नमः ॥ॐविश्वमुखाय नमः ॥ॐ विश्वरूपाय नमः ॥ ॐ निधये नमः॥ॐ घृणये नमः ॥ॐ कवये नमः ॥ॐ कवीनामृषभाय नमः॥ ॐ ब्रह्मण्याय नमः ॥ ॐ ब्रह्मणस्पतये नमः ॥ॐज्येष्ठराजाय नमः ॥ॐ निधिपतये नमः ॥ ॐनिधिप्रियपतिप्रियाय नमः ॥ॐ हिरण्मयपुरान्तस्थायनमः ॥ॐ सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः ॥ ॐकराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलाय नमः ॥ॐ पूषदन्तभृतेनमः ॥ॐ उमाङ्गकेळिकुतुकिने नमः ॥ ॐ मुक्तिदाय नमः ॥ॐकुलपालकाय नमः ॥ॐ किरीटिने नमः ॥ॐ कुण्डलिने नमः॥ ॐ हारिणे नमः ॥ॐ वनमालिने नमः ॥ॐ मनोमयाय नमः ॥ॐवैमुख्यहतदृश्यश्रियै नमः ॥ ॐ पादाहत्याजितक्षितयेनमः ॥ॐ सद्योजाताय नमः ॥ॐ स्वर्णभुजाय नमः ॥ ॐमेखलिन नमः ॥ॐ दुर्निमित्तहृते नमः ॥ॐदुस्स्वप्नहृते नमः ॥ॐ प्रहसनाय नमः ॥ ॐ गुणिनेनमः ॥ॐ नादप्रतिष्ठिताय नमः ॥ॐ सुरूपाय नमः ॥ॐसर्वनेत्राधिवासाय नमः ॥ ॐ वीरासनाश्रयाय नमः ॥ॐपीताम्बराय नमः ॥ॐ खड्गधराय नमः ॥ ॐखण्डेन्दुकृतशेखराय नमः ॥ॐ चित्राङ्कश्यामदशनायनमः ॥ॐ फालचन्द्राय नमः ॥ ॐ चतुर्भुजाय नमः ॥ॐयोगाधिपाय नमः ॥ॐ तारकस्थाय नमः ॥ॐ पुरुषाय नमः॥ ॐ गजकर्णकाय नमः ॥ॐ गणाधिराजाय नमः ॥ॐविजयस्थिराय नमः ॥ ॐ गणपतये नमः ॥ॐ ध्वजिने नमः ॥ॐदेवदेवाय नमः ॥ॐ स्मरप्राणदीपकाय नमः ॥ ॐ वायुकीलकायनमः ॥ॐ विपश्चिद्वरदाय नमः ॥ॐ नादाय नमः ॥ ॐनादभिन्नवलाहकाय नमः ॥ॐ वराहवदनाय नमः ॥ॐमृत्युञ्जयाय नमः ॥ ॐ व्याघ्राजिनाम्बराय नमः ॥ॐइच्छाशक्तिधराय नमः ॥ॐ देवत्रात्रे नमः ॥ ॐदैत्यविमर्दनाय नमः ॥ॐ शम्भुवक्त्रोद्भवाय नमः ॥ॐ शम्भुकोपघ्ने नमः ॥ॐ शम्भुहास्यभुवे नमः ॥ॐशम्भुतेजसे नमः ॥ॐ शिवाशोकहारिणे नमः ॥ ॐगौरीसुखावहाय नमः ॥ॐ उमाङ्गमलजाय नमः ॥ॐगौरीतेजोभुवे नमः ॥ ॐ स्वर्धुनीभवाय नमः ॥ॐयज्ञकायाय नमः ॥ॐ महानादाय नमः ॥ॐ गिरिवर्ष्मणे नमः ॥ ॐ शुभाननाय नमः ॥ॐ सर्वात्मने नमः ॥ॐसर्वदेवात्मने नमः ॥ॐ ब्रह्ममूर्ध्ने नमः ॥ ॐककुप्छ्रुतये नमः ॥ॐ ब्रह्माण्डकुम्भाय नमः ॥ॐ चिद्व्योमफालाय नमः ॥ॐ सत्यशिरोरुहाय नमः ॥ॐजगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषाय नमः ॥ ॐ अग्न्यर्कसोमदृशेनमः ॥ॐ गिरीन्द्रैकरदाय नमः ॥ॐ धर्माय नमः ॥ॐधर्मिष्ठाय नमः ॥ ॐ सामबृंहिताय नमः ॥ॐग्रहर्क्षदशनाय नमः ॥ॐ वाणीजिह्वाय नमः ॥ॐवासवनासिकाय नमः ॥ ॐ कुलाचलांसाय नमः ॥ॐसोमार्कघण्टाय नमः ॥ॐ रुद्रशिरोधराय नमः ॥ ॐनदीनदभुजाय नमः ॥ॐ सर्पाङ्गुळिकाय नमः ॥ॐतारकानखाय नमः ॥ ॐ भ्रूमध्यसंस्थतकराय नमः ॥ॐब्रह्मविद्यामदोत्कटाय नमः ॥ ॐ व्योमनाभाय नमः॥ ॐ श्रीहृदयाय नमः ॥ॐ मेरुपृष्ठाय नमः ॥ॐअर्णवोदराय नमः ॥ ॐ कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषाय नमः|| उत्तर पूजा - ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . धूपं आघ्रापयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . दीपं दर्शयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . नैवेद्यं निवेदयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . फलाष्टकं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ताम्बूलं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . कर्पूर नीराजनं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंगल आरतीं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पांजलिः समर्पयामि यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च | तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे प्रदक्षिणा नमस्कारान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . समस्त राजोपचारान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंत्र पुष्पं समर्पयामि | वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा | प्रार्थनां समर्पयामि | आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं | पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व पुरुषोत्तम | क्षमापनं समर्पयामि | ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुनरागमनाय च || वृहद पूजन विधि पूजन सामग्री (वृहद् पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,दूध,दही,शहद,घी,चीनी,पंचामृत,वस्त्र,जनेऊ,मधुपर्क,सुगंध,लाल चन्दन,रोली,सिन्दूर,अक्षत(चावल),फूल,माला,बेलपत्र,दूब,शमीपत्र,गुलाल,आभूषण,सुगन्धित तेल,धूपबत्ती,दीपक,प्रसाद,फल,गंगाजल,पान,सुपारी,रूई,कपूर | विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें - और आवाहन करें - गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं | उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम || आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव | यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव || और अब प्रतिष्ठा (प्राण प्रतिष्ठा) करें -अस्यैप्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च | अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहती च कश्चन || आसन- रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यंकर शुभम | आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः || पाद्य (पैर धुलना)- उष्णोदकं निर्मलं च सर्व सौगंध्य संयुत्तम | पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगह्यताम || आर्घ्य(हाथ धुलना )- अर्घ्य गृहाण देवेश गंध पुष्पाक्षतै :| करुणाम कुरु में देव गृहणार्ध्य नमोस्तुते || आचमन - सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलं |आचम्यताम मया दत्तं गृहीत्वा परमेश्वरः || स्नान - गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदाजलै:| स्नापितोSसी मया देव तथा शांति कुरुश्वमे || दूध् से स्नान - कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम | पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थं समर्पितं | दही से स्नान- पयस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शक्तिप्रभं | दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यतां || घी से स्नान - नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकं | घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शहद से स्नान- तरु पुष्प समुदभूतं सुस्वादु मधुरं मधुः | तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शर्करा (चीनी) से स्नान - इक्षुसार समुदभूता शंकरा पुष्टिकार्कम मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || पंचामृत से स्नान - पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतं | पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शुध्दोदक (शुद्ध जल ) से स्नान -मंदाकिन्यास्त यध्दारि सर्वपापहरं शुभम | तदिधं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || वस्त्र -सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे | मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यतां || उपवस्त्र (कपडे का टुकड़ा )- सुजातो ज्योतिषा सह्शर्म वरुथमासदत्सव : | वासोअस्तेविश्वरूपवं संव्ययस्वविभावसो || यज्ञोपवीत - नवभिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुण देवतामयम |उपवीतं मया दत्तं गृहाणं परमेश्वर : || मधुपर्क -कस्य कन्स्येनपिहितो दधिमध्वा ज्यसन्युतः |मधुपर्को मयानीतः पूजार्थ् प्रतिगृह्यतां || गन्ध - श्रीखण्डचन्दनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम | विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतां || रक्त(लाल )चन्दन- रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसमुदभवम | मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुम || रोली - कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम | कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वर्: || सिन्दूर- सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् || शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यतां || अक्षत -अक्षताश्च सुरश्रेष्ठं कुम्कुमाक्तः सुशोभितः |माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः || पुष्प- पुष्पैर्नांनाविधेर्दिव्यै: कुमुदैरथ चम्पकै: | पूजार्थ नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां || पुष्प माला - माल्यादीनि सुगन्धिनी मालत्यादीनि वै प्रभो | मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर: || बेल का पत्र - त्रिशाखैर्विल्वपत्रैश्च अच्छिद्रै: कोमलै :शुभै : |तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर : || दूर्वा - त्वं दूर्वेSमृतजन्मानि वन्दितासि सुरैरपि | सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरो भव || दूर्वाकर - दूर्वाकुरान सुहरिता नमृतान मंगलप्रदाम |आनीतांस्तव पूजार्थ गृहाण गणनायक:|| शमीपत्र - शमी शमय ये पापं शमी लाहित कष्टका |धारिण्यर्जुनवाणानां रामस्य प्रियवादिनी || अबीर गुलाल - अबीरं च गुलालं च चोवा चन्दन्मेव च । अबीरेणर्चितो देव क्षत: शान्ति प्रयच्छमे || आभूषण - अलंकारान्महा दव्यान्नानारत्न विनिर्मितान | गृहाण देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर: | सुगंध तेल ,, चम्पकाशोक वकु ल मालती मीगरादिभि: |वासितं स्निग्धता हेतु तेलं चारु प्रगृह्यतां || धूप- वनस्पतिरसोदभूतो गन्धढयो गंध उत्तम : |आघ्रेय सर्वदेवानां धूपोSयं प्रतिगृह्यतां || दीप - आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिन्ना योजितं मया | दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम || नैवेद्य- शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमम |उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यतां | मध्येपानीय - अतितृप्तिकरं तोयं सुगन्धि च पिबेच्छ्या | त्वयि तृप्ते जगतृप्तं नित्यतृप्ते महात्मनि || ऋतुफल- नारिकेलफलं जम्बूफलं नारंगमुत्तमम | कुष्माण्डं पुरतो भक्त्या कल्पितं प्रतिगृह्यतां || आचमन - गंगाजलं समानीतां सुवर्णकलशे स्थितन |आचमम्यतां सुरश्रेष्ठ शुद्धमाचनीयकम || अखंड ऋतुफल - इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव |तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि || ताम्बूल पूंगीफलं - पूंगीफलम महद्दिश्यं नागवल्लीदलैर्युतम | एलादि चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यतां || दक्षिणा(दान)- हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो: | अनन्तपुण्यफलदमत : शान्ति प्रयच्छ मे || आरती - चंद्रादित्यो च धरणी विद्युद्ग्निंस्तर्थव च | त्वमेव सर्वज्योतीष आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम || पुष्पांजलि ,,नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोदभवानि च | पुष्पांजलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर: || प्रार्थना- रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक: भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात || अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम || श्री गणेश जी की आरती जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा | माता जाकी पारवती,पिता महादेवा | एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी | मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया | बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा | लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी कामना को पूरा करो जग बलिहारी | Gyanchand Bundiwal. Kundan Jewellers We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices. हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष होल सेल भाव में मिलते हैं और ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 website www.kundanjewellersnagpur.com

Wednesday, 3 January 2018

श्री गणपती चालीसा

श्री गणपती चालीसा 1

दोहा,जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 चौपाई..जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥३ राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥४ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥५ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥६ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥७ ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥८ कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥९ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।१० भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥११ अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥१२ अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥१३ मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥१४ गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥१५ अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥१६ बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥१७ सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥१८ शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥१९ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥२० निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥२१ गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥२२ कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥२३ नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥२४ पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥२५ गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥२६ हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥२७ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥२८ बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥२९ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥३० बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥३१ चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥३२ धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥३३ चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥३४ तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥३५ मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥३६ भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा॥३७ अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥३८ श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।३९ नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥४० दोहा सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥ श्री गणपती चालीसा 2 दोहा,,मंगलमय मंगल करन, करिवर वदन विशाल। विघ्न हरण रिपु रूज दलन, सुमिरौ गिरजा लाल॥ चौपाई जय गणेश बल बुद्दि उजागर। व्रक्तुन्द विद्या के सागर॥१ शम्भ्पूत सब जग से वन्दित। पुलकित बदन हमेश अनंदित॥२ शांत रूप तुम सिंदूर बदना। कुमति निवारक संकट हरना॥३ क्रीट मुकुट चंद्रमा बिराजै। कर त्रिशूल अरु पुस्तक राजै॥४ ॠद्दि सिद्दि के हे प्रिय स्वामी। माता पिता माता पिता वचन अनुगामी॥५ भावे मूषक की असवारी। जिनको उनकी है बलिहारी॥६ तुम्हरो नाम सकल नर गावै। कोटि जन्म के पाप नसावै॥७ सब मे पूजना प्रथम तुम्हारा। अचल अमर प्रिय नाम तुम्हारा॥८ भजन दुखी नर जो हैं करते। उनके संकट पल मे हरते॥ अहो षडानन के प्रिय भाई। थकी गिरा तव महिमा गाई॥१० गिरिजा ने तुमको उपजायो। वदन मैल तै अंग बनायो॥११ द्वार पाल की पदवी सुंदर। दिन्ही बैठायो ड्योडी पर॥१२ पिता शम्भू तब तप कर आए। तुम्हे देख कर अति सकुचाये॥१३ पूछैउं कौन कह्ना ते आयो। तुम्हे कौन एहि थल बैठायो॥१४ बोले तुम पार्वती लाल ह्नूं। इस ड्योडी का द्वारपाल ह्नूं॥१५ उनने कहा उमा का बालक। हुआ नही कोई कुल पालक॥१६ तू तेहि को फिर बालक कैसो। भ्रम मेरे मन में है ऐसो॥१७ सुन कर वचन पिता के बालक। बोले तुम मैं ह्नू कुलपालक॥१८ या मैं तनिक न भ्रम ही कीजे। कान वचन पर मेरे दीजे॥१९ माता स्नान कर रही भीतर। द्वारपाल सुत को थापित कर॥२० सो छिन में यही अवसर अइहै। प्रकट सफल सन्देह मिटाइहै॥२१ सुन कर शिव ऐसे तब वचना। ह्रदय बीच कर नई कल्पना॥२२ जाने के हित चरण बढाये। भीतर आगे तब तुम आये॥२३ बोले तात न पाँव उठाओ। बालक से जी न रार बढाओं॥२४ क्रोधित शिव ने शूल उठाया। गला काट कर पाँव बढाया॥२५ गए तुम गिरिजा के पास। बोले कहां नारी विश्वास॥२६ सुत कसे यह तुमने जायो। सती सत्य को नाम डुबायो॥२७ तब तव जन्म उमा सब भाखा। कुछ न छिपाया शंभु सन राखा॥२८ सुन गिरिजा की सकल कहानी। हँसे शम्भु माया विज्ञानी॥२९ दूत भद्र मुख तुरंत पठाये। हस्ती शीश काट सो लाये॥३० स्थापित कर शिव सो धड़ ऊपर। किनी प्राण संचार नाम धर॥३१ गणपति गणपति गिरिजा सुवना। प्रथम पूज्य भव भयरूज दहना॥३२ साई दिवस से तुम जग वन्दित। महाकाय से तुष्ट अनन्दित॥३३ पृथ्वी प्रद्क्षिणा दोउ दीन्ही। तहां षडानन जुगती कीन्ही॥३४ चढि मयूर ये आगे आगे। व्रक्तुन्द सो तुम संग भागे॥३५ नारद तब तोहिं दिय उपदेशा। रहनो न संका को लवलेसा॥३६ मातापिता की फेरी कीन्ही। भू फेरी कर महिमा लीन्ही॥३७ धन्य धन्य मूषक असवारी। नाथ आप पर जग बलिहारी॥३८ डासना पी नित कृपा तुम्हारी। रहे यही प्रभू इच्छा भारी॥३९ जो श्रधा से पढे ये चालीस। उनके तुम साथी गौरीसा॥४० दोहा शंबू तनय संकट हरन, पावन अमल अनूप। शंकर गिरिजा सहित नित, बसहु ह्रदय सुख भूप। श्री गणपती चालीसा 3 दोहा,जय जय जय वंदन भुवन, नंदन गौरिगणेश । दुख द्वंद्वन फंदन हरन,सुंदर सुवन महेश ॥ चौपाई,,जयति शंभु सुत गौरी नंदन । विघ्न हरन नासन भव फंदन ॥ जय गणनायक जनसुख दायक । विश्व विनायक बुद्धि विधायक ॥ एक रदन गज बदन विराजत । वक्रतुंड शुचि शुंड सुसाजत ॥ तिलक त्रिपुण्ड भाल शशि सोहत । छबि लखि सुर नर मुनि मन मोहत ॥ उर मणिमाल सरोरुह लोचन । रत्न मुकुट सिर सोच विमोचन ॥ कर कुठार शुचि सुभग त्रिशूलम् । मोदक भोग सुगंधित फूलम् ॥ सुंदर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ धनि शिव सुवन भुवन सुख दाता । गौरी ललन षडानन भ्राता ॥ ॠद्धि सिद्धि तव चंवर सुढारहिं । मूषक वाहन सोहित द्वारहिं ॥ तव महिमा को बरनै पारा । जन्म चरित्र विचित्र तुम्हारा ॥ एक असुर शिवरुप बनावै । गौरिहिं छलन हेतु तह आवै ॥ एहि कारण ते श्री शिव प्यारी । निज तन मैल मूर्ति रचि डारि ॥ सो निज सुत करि गृह रखवारे । द्धारपाल सम तेहिं बैठारे ॥ जबहिं स्वयं श्री शिव तहं आए । बिनु पहिचान जान नहिं पाए ॥ पूछ्यो शिव हो किनके लाला । बोलत भे तुम वचन रसाला ॥ मैं हूं गौरी सुत सुनि लीजै । आगे पग न भवन हित दीजै ॥ आवहिं मातु बूझि तब जाओ । बालक से जनि बात बढ़ाओ ॥ चलन चह्यो शिव बचन न मान्यो । तब ह्वै क्रुद्ध युद्ध तुम ठान्यो ॥ तत्क्षण नहिं कछु शंभु बिचारयो । गहि त्रिशूल भूल वश मारयो ॥ शिरिष फूल सम सिर कटि गयउ । छट उड़ि लोप गगन महं भयउ ॥ गयो शंभु जब भवन मंझारी । जहं बैठी गिरिराज कुमारी ॥ पूछे शिव निज मन मुसकाये । कहहु सती सुत कहं ते जाये ॥ खुलिगे भेद कथा सुनि सारी । गिरी विकल गिरिराज दुलारी ॥ कियो न भल स्वामी अब जाओ । लाओ शीष जहां से पाओ ॥ चल्यो विष्णु संग शिव विज्ञानी । मिल्यो न सो हस्तिहिं सिर आनी ॥ धड़ ऊपर स्थित कर दीन्ह्यो । प्राण वायु संचालन कीन्ह्यो ॥ श्री गणेश तब नाम धरायो । विद्या बुद्धि अमर वर पायो ॥ भे प्रभु प्रथम पूज्य सुखदायक । विघ्न विनाशक बुद्धि विधायक ॥ प्रथमहिं नाम लेत तव जोई । जग कहं सकल काज सिध होई ॥ सुमिरहिं तुमहिं मिलहिं सुख नाना । बिनु तव कृपा न कहुं कल्याना ॥ तुम्हरहिं शाप भयो जग अंकित । भादौं चौथ चंद्र अकलंकित ॥ जबहिं परीक्षा शिव तुहिं लीन्हा । प्रदक्षिणा पृथ्वी कहि दीन्हा ॥ षड्मुख चल्यो मयूर उड़ाई । बैठि रचे तुम सहज उपाई ॥ राम नाम महि पर लिखि अंका । कीन्ह प्रदक्षिण तजि मन शंका ॥ श्री पितु मातु चरण धरि लीन्ह्यो । ता कहं सात प्रदक्षिण कीन्ह्यो ॥ पृथ्वी परिक्रमा फल पायो । अस लखि सुरन सुमन बरसायो ॥ सुंदरदास राम के चेरा । दुर्वासा आश्रम धरि डेरा ॥ विरच्यो श्रीगणेश चालीसा । शिव पुराण वर्णित योगीशा ॥ नित्य गजानन जो गुण गावत । गृह बसि सुमति परम सुख पावत ॥ जन धन धान्य सुवन सुखदायक । देहिं सकल शुभ श्री गणनायक ॥ दोहा श्री गणेश यह चालिसा,पाठ करै धरि ध्यान । नित नव मंगल मोद लहि,मिलै जगत सम्मान ॥ द्धै सहस्त्र दस विक्रमी, भाद्र कृष्ण तिथि गंग । पूरन चालीसा भयो, सुंदर भक्ति अभंग ॥ ॥।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

Wednesday, 27 December 2017

एकदंत गणेश स्तोत्रम् ,,ekadanta ganesha stotram

एकदंत गणेश स्तोत्रम् ,,ekadanta ganesha stotram मदासुरं सुशान्तं वै दृष्ट्वा विष्णुमुखाः सुराः ।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 भृग्वादयश्च मुनय एकदन्तं समाययुः ॥ १॥ प्रणम्य तं प्रपूज्यादौ पुनस्तं नेमुरादरात् । तुष्टुवुर्हर्षसंयुक्ता एकदन्तं गणेश्वरम् ॥ २॥ देवर्षय ऊचुः..सदात्मरूपं सकलादि-भूतममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम् । अनादि-मध्यान्त-विहीनमेकं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ३॥ अनन्त-चिद्रूप-मयं गणेशं ह्यभेद-भेदादि-विहीनमाद्यम् । हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ४॥ विश्वादिभूतं हृदि योगिनां वै प्रत्यक्षरूपेण विभान्तमेकम् । सदा निरालम्ब-समाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ५॥ स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तं बिन्दुस्वरूपा रचिता स्वमाया । तस्यां स्ववीर्यं प्रददाति यो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ६॥ त्वदीय-वीर्येण समर्थभूता माया तया संरचितं च विश्वम् । नादात्मकं ह्यात्मतया प्रतीतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ७॥ त्वदीय-सत्ताधरमेकदन्तं गणेशमेकं त्रयबोधितारम् । सेवन्त आपुस्तमजं त्रिसंस्थास्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ८॥ ततस्त्वया प्रेरित एव नादस्तेनेदमेवं रचितं जगद्वै । आनन्दरूपं समभावसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ९॥ तदेव विश्वं कृपया तवैव सम्भूतमाद्यं तमसा विभातम् । अनेकरूपं ह्यजमेकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १०॥ ततस्त्वया प्रेरितमेव तेन सृष्टं सुसूक्ष्मं जगदेकसंस्थम् । सत्त्वात्मकं श्वेतमनन्तमाद्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ११॥ तदेव स्वप्नं तपसा गणेशं संसिद्धिरूपं विविधं वभूव । सदेकरूपं कृपया तवाऽपि तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १२॥ सम्प्रेरितं तच्च त्वया हृदिस्थं तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम् । तेनैव जाग्रन्मयमप्रमेयं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १३॥ जाग्रत्स्वरूपं रजसा विभातं विलोकितं तत्कृपया यदैव । तदा विभिन्नं भवदेकरूपं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १४॥ एवं च सृष्ट्वा प्रकृतिस्वभावात्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम् । बुद्धिप्रदाता गणनाथ एकस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १५॥ त्वदाज्ञया भान्ति ग्रहाश्च सर्वे नक्षत्ररूपाणि विभान्ति खे वै । आधारहीनानि त्वया धृतानि तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १६॥ त्वदाज्ञया सृष्टिकरो विधाता त्वदाज्ञया पालक एव विष्णुः । त्वदाज्ञया संहरको हरोऽपि तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १७॥ यदाज्ञया भूर्जलमध्यसंस्था यदाज्ञयाऽपः प्रवहन्ति नद्यः । सीमां सदा रक्षति वै समुद्रस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १८॥ यदाज्ञया देवगणो दिविस्थो ददाति वै कर्मफलानि नित्यम् । यदाज्ञया शैलगणोऽचलो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १९॥ यदाज्ञया शेष इलाधरो वै यदाज्ञया मोहप्रदश्च कामः । यदाज्ञया कालधरोऽर्यमा च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २०॥ यदाज्ञया वाति विभाति वायुर्यदाज्ञयाऽग्निर्जठरादिसंस्थः । यदाज्ञया वै सचराऽचरं च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २१॥ सर्वान्तरे संस्थितमेकगूढं यदाज्ञया सर्वमिदं विभाति । अनन्तरूपं हृदि बोधकं वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २२॥ यं योगिनो योगबलेन साध्यं कुर्वन्ति तं कः स्तवनेन स्तौति । अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २३॥ गृत्समद उवाच एवं स्तुत्वा च प्रह्लाद देवाः समुनयश्च वै । तूष्णीं भावं प्रपद्यैव ननृतुर्हर्षसंयुताः ॥ २४॥ स तानुवाच प्रीतात्मा ह्येकदन्तः स्तवेन वै । जगाद तान् महाभागान् देवर्षीन् भक्तवत्सलः ॥ २५॥ एकदन्त उवाच प्रसन्नोऽस्मि च स्तोत्रेण सुराः सर्षिगणाः किल । वृणुध्वं वरदोऽहं वो दास्यामि मनसीप्सितम् ॥ २६॥ भवत्कृतं मदीयं वै स्तोत्रं प्रीतिप्रदं मम । भविष्यति न सन्देहः सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २७॥ यं यमिच्छति तं तं वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः । पुत्र-पौत्रादिकं सर्वं लभते धन-धान्यकम् ॥ २८॥ गजाश्वादिकमत्यन्तं राज्यभोगं लभेद् ध्रुवम् । भुक्तिं मुक्तिं च योगं वै लभते शान्तिदायकम् ॥ २९॥ मारणोच्चाटनादीनि राज्यबन्धादिकं च यत् । पठतां शृण्वतां नृणां भवेच्च बन्धहीनता ॥ ३०॥ एकविंशतिवारं च श्लोकांश्चैवैकविंशतिम् । पठते नित्यमेवं च दिनानि त्वेकविंशतिम् ॥ ३१॥ न तस्य दुर्लभं किंचित् त्रिषु लोकेषु वै भवेत् । असाध्यं साधयेन् मर्त्यः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३२॥ नित्यं यः पठते स्तोत्रं ब्रह्मभूतः स वै नरः । तस्य दर्शनतः सर्वे देवाः पूता भवन्ति वै ॥ ३३॥ एवं तस्य वचः श्रुत्वा प्रहृष्टा देवतर्षयः । ऊचुः करपुटाः सर्वे भक्तियुक्ता गजाननम् ॥ ३४॥ इति श्री एकदन्तस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
उच्छिष्ट गणेश कवचम् ,uchchishta ganesha kavacham


अथ श्रीउच्छिष्टगणेशकवचम् प्रारम्भः
देव्युवाच ,,देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थितिलयात्मक ।
विना ध्यानं विना मन्त्रं विना होमं विना जपम् ॥ १॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
येन स्मरणमात्रेण लभ्यते चाशु चिन्तितम् ।
तदेव श्रोतुमिच्छामि कथयस्व जगत्प्रभो ॥ २॥
ईश्वर उवाच ,,श्रुणु देवी प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुहृतरं महत् ।
उच्छिष्टगणनाथस्य कवचं सर्वसिद्धिदम् ॥ ३॥

अल्पायासैर्विना कष्टैर्जपमात्रेण सिद्धिदम् ।
एकान्ते निर्जनेऽरण्ये गह्वरे च रणाङ्गणे ॥ ४॥

सिन्धुतीरे च गङ्गायाः कूले वृक्षतले जले ।
सर्वदेवालये तीर्थे लब्ध्वा सम्यग् जपं चरेत् ॥ ५॥

स्नानशौचादिकं नास्ति नास्ति निर्वंधनं प्रिये ।
दारिद्र्यान्तकरं शीघ्रं सर्वतत्त्वं जनप्रिये ॥ ६॥
सहस्रशपथं कृत्वा यदि स्नेहोऽस्ति मां प्रति ।
निन्दकाय कुशिष्याय खलाय कुटिलाय च ॥ ७॥
दुष्टाय परशिष्याय घातकाय शठाय च ।
वञ्चकाय वरघ्नाय ब्राह्मणीगमनाय च ॥ ८॥

अशक्ताय च क्रूराय गुरूद्रोहरताय च ।
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन ॥ ९॥

गुरूभक्ताय दातव्यं सच्छिष्याय विशेषतः ।
तेषां सिध्यन्ति शीघ्रेण ह्यन्यथा न च सिध्यति ॥ १०॥
गुरूसन्तुष्टिमात्रेण कलौ प्रत्यक्षसिद्धिदम् ।
देहोच्छिष्टैः प्रजप्तव्यं तथोच्छिष्ठैर्महामनुः ॥ ११॥

आकाशे च फलं प्राप्तं नान्यथा वचनं मम ।
एषा राजवती विद्या विना पुण्यं न लभ्यते ॥ १२॥

अथ वक्ष्यामि देवेशि कवचं मन्त्रपूर्वकम् ।
येन विज्ञातमात्रेण राजभोगफलप्रदम् ॥ १३॥

ऋषिर्मे गणकः पातु शिरसि च निरन्तरम् ।
त्राहि मां देवि गायत्रीछन्दो ऋषिः सदा मुखे ॥ १४॥

हृदये पातु मां नित्यमुच्छिष्टगणदेवता ।
गुह्ये रक्षतु तद्बीजं स्वाहा शक्तिश्च पादयोः ॥ १५॥

कामकीलकसर्वाङ्गे विनियोगश्च सर्वदा ।
पाश्वर्द्वये सदा पातु स्वशक्तिं गणनायकः ॥ १६॥

शिखायां पातु तद्बीजं भ्रूमध्ये तारबीजकम् ।
हस्तिवक्त्रश्च शिरसी लम्बोदरो ललाटके ॥ १७॥

उच्छिष्टो नेत्रयोः पातु कर्णौ पातु महात्मने ।
पाशाङ्कुशमहाबीजं नासिकायां च रक्षतु ॥ १८॥

भूतीश्वरः परः पातु आस्यं जिह्वां स्वयंवपुः ।
तद्बीजं पातु मां नित्यं ग्रीवायां कण्ठदेशके ॥ १९॥

गम्बीजं च तथा रक्षेत्तथा त्वग्रे च पृष्टके ।
सर्वकामश्च हृत् पातु पातु मां च करद्वये ॥ २०॥

उच्छिष्टाय च हृदये वह्निबीजं तथोदरे ।
मायाबीजं तथा कट्यां द्वैआ ऊरू सिद्धिदायकः ॥ २१॥

जङ्घायां गणनाथश्च पादौ पातु विनायकः ।
शिरसः पादपर्यन्तमुच्छिष्ठगणनायकः ॥ २२॥

आपादमस्तकान्तं च उमापुत्रश्च पातु माम् ।
दिशोऽष्टौ च तथाकाशे पाताले विदिशाष्टके ॥ २३॥

अहर्निशं च मां पातु मदचञ्चललोचनः ।
जलेऽनले च सङ्ग्रामे दुष्टकारागृहे वने ॥ २४॥

राजद्वारे घोरपथे मातु मां गणनायकः ।
इदं तु कवचं गुह्यं मम वक्त्राद्विनिर्गतम् ॥ २५॥

त्रैलौक्ये सततं पातु द्विभुजश्च चतुर्भुजः ।
वाह्यमाभ्यन्तरं पातु सिद्धिबुद्धिर्विनायकः ॥ २६॥

सर्वसिद्धि प्रदं देवि कवचमृद्धिसिद्धिदम् ।
एकान्ते प्रजपेन्मन्त्रं कवचं युक्तिसंयुतम् ॥ २७॥

इदं रहस्यं कवचमुच्छिष्टगणनायकम् ।
सर्ववर्मसु देवेशि इदं कवचनायकम् ॥ २८॥

एतत् कवचंमहात्म्यं वर्णितुं नैव शक्यते ।
धर्मार्थकाममोक्षं च नानाफलप्रदं नृणाम् ॥ २९॥

शिवपुत्रः सदा पातु पातु मां सुरार्चितः ।
गजाननः सदा पातु गणराजश्च पातु माम् ॥ ३०॥
सदा शक्तिरतः पातु पातु मां कामविह्वलः ।
सर्वाभरणभूषाढयः पातु मां सिन्दूरार्चितः ॥ ३१॥

पञ्चमोदकरः पातु पातु मां पार्वतीसुतः ।
पाशाङ्कुशधरः पातु पातु मां च धनेश्वरः ॥ ३२॥

गदाधरः सदा पातु पातु मां काममोहितः ।
नग्ननारीरतः पातु पातु मां च गणेश्वरः ॥ ३३॥

अक्षयं वरदः पातु शक्तियुक्तिः सदाऽवतु ।
भालचन्द्रः सदा पातु नानारत्नविभूषितः ॥ ३४॥

उच्छिष्टगणनाथश्च मदाघूर्णितलोचनः ।
नारीयोनिरसास्वादः पातु मां गजकर्णकः ॥ ३५॥

प्रसन्नवदनः पातु पातु मां भगवल्लभः ।
जटाधरः सदा पातु पातु मां च किरीटिकः ॥ ३६॥

पद्मासनास्थितः पातु रक्तवर्णश्च पातु माम् ।
नग्नसाममदोन्मत्तः पातु मां गणदैवतः ॥ ३७॥

वामाङ्गे सुन्दरीयुक्तः पातु मां मन्मथप्रभुः ।
क्षेत्रपः पिशितं पातु पातु मां श्रुतिपाठकः ॥ ३८॥

भूषणाढ्यस्तु मां पातु नानाभोगसमन्वितः ।
स्मिताननः सदा पातु श्रीगणेशकुलान्वितः ॥ ३९॥

श्रीरक्तचन्दनमयः सुलक्षणगणेश्वरः ।
श्वेतार्कगणनाथश्च हरिद्रागणनायकः ॥ ४०॥

पारभद्रगणेशश्च पातु सप्तगणेश्वरः ।
प्रवालकगणाध्यक्षो गजदन्तो गणेश्वरः ॥ ४१॥

हरबीजगणेशश्च भद्राक्षगणनायकः ।
दिव्यौषधिसमुद्भूतो गणेशाश्चिन्तितप्रदः ॥ ४२॥

लवणस्य गणाध्यक्षो मृत्तिकागणनायकः ।
तण्डुलाक्षगणाध्यक्षो गोमयश्च गणेश्चरः ॥ ४३॥

स्फटिकाक्षगणाध्यक्षो रूद्राक्षगणदैवतः ।
नवरत्नगणेशश्च आदिदेवो गणेश्वरः ॥ ४४॥

पञ्चाननश्चतुर्वक्त्रः षडाननगणेश्वरः ।
मयूरवाहनः पातु पातु मां मूषकासनः ॥ ४५॥

पातु मां देवदेवेशः पातु मामृषिपूजितः ।
पातु मां सर्वदा देवो देवदानवपूजितः ॥ ४६॥

त्रैलोक्यपूजितो देवः पातु मां च विभुः प्रभुः ।
रङ्गस्थं च सदा पातु सागरस्थं सदाऽवतु ॥ ४७॥

भूमिस्थं च सदा पातु पातलस्थं च पातु माम् ।
अन्तरिक्षे सदा पातु आकाशस्थं सदाऽवतु ॥ ४८॥

चतुष्पथे सदा पातु त्रिपथस्थं च पातु माम् ।
बिल्वस्थं च वनस्थं च पातु मां सर्वतस्तनम् ॥ ४९॥
राजद्वारस्थितं पातु पातु मां शीघ्रसिद्धिदः ।
भवानीपूजितः पातु ब्रह्माविष्णुशिवार्चितः ॥ ५०॥

इदं तु कवचं देवि पठनात्सर्वसिद्धिदम् ।
उच्छिष्ठगणनाथस्य समन्त्रं कवचं परम् ॥ ५१॥

स्मरणाद्भूभुजत्वं च लभते साङ्गतां ध्रूवम् ।
वाचः सिद्धिकरं शीघ्रं परसैन्यविदारणम् ॥ ५२॥

प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने दिवा रात्रौ पठेन्नरः ।
चतुर्थ्यां दिवसे रात्रौ पूजने मानदायकम् ॥ ५३॥

सर्वसौभाग्यदं शीघ्रं दारिद्र्यार्णवघातकम् ।
सुदारसुप्रजासौख्यं सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ॥ ५४॥

जलेऽथवाऽनलेऽरण्ये सिन्धुतीरे सरित्तटे ।
स्मशाने दूरदेशे च रणे पर्वतगह्वरे ॥ ५५॥

राजद्वारे भये घोरे निर्भयो जायते ध्रुवम् ।
सागरे च महाशीते दुर्भिक्षे दुष्टसङ्कटे ॥ ५६॥

भूतप्रेतपिशाचादियक्षराक्षसजे भये ।
राक्षसीयक्षिणीक्रूराशाकिनीडाकीनीगणाः ॥ ५७॥

राजमृत्युहरं देवि कवचं कामधेनुवत् ।
अनन्तफलदं देवि सति मोक्षं च पार्वति ॥ ५८॥

कवचेन विना मन्त्रं यो जपेद्गणनायकम् ।
इह जन्मानि पापिष्ठो जन्मान्ते मूषको भवेत् ॥ ५९॥

इति परमरहस्यं देवदेवार्चनं च
कवचपरमदिव्यं पार्वती पुत्ररूपम् ।
पठति परमभोगैश्वर्यमोक्षप्रदं च
लभति सकलसौख्यं शक्तिपुत्रप्रसादात् ॥ ६०॥
।Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
॥ इति श्रीरूद्रयामलतन्त्रे उमामहेश्वरसंवादे
उच्छिष्ठगणेशकवचं समाप्तम् ॥॥

Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...