हिन्दू धर्म के सभी देवी देवताओं की और त्योहारों की जानकारी। भगवान के मंत्र स्तोत्र तथा सहस्त्र नामावली की जानकारी ।
Wednesday, 22 August 2018
रक्षा बन्धन राखी बाँधने का मुहूर्त, रक्षा बंधन
रक्षा बन्धन रखी बांधने का मुहूर्त
3 अगस्त 2020
समय = 09=28 से 21=00
अवधि = 11 घण्टे 32 मिनट्स
रक्षा बन्धन के लिये अपराह्न का मुहूर्त = 13=37 से 16 =12
अवधि = 2 घण्टे 35 मिनट्स
रक्षा बन्धन के लिये प्रदोष काल का मुहूर्त =18=47 18 से 21=00
अवधि = 2 घण्टे 12 मिनट्स
भद्रा पूँछ = 05=16 से 06=28
भद्रा मुख = 06=28 से 08=28
भद्रा अन्त समय = 09=28
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ = 2अगस्त 2020 को 21=28 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त = 3 अगस्त 2020 को 21=27 बजे
भाई और बहन का लगाव एक अद्भुत प्रेम है। इस रिश्तें में एक-दूसरे के प्रति मन का, भावनाओं का, सेवा का, ममता का व सुरक्षा का समपर्ण है। लेकिन वासना की बू लेशमात्र भी नहीं है। इस अनमोल रिश्तें में अब मानसिक दरार दिखलाई पड़ने लगी है। ’’भैया को दीन्ही महल अटारी, हमका दीया परदेश’’ शिक्षा दीप्ति स्त्रियों के ’’कान्ता-सम्मित उपदेशों’’ का असर इतना तो हुआ कि पैतृक सम्मपत्ति में लड़कियों को हिस्सा मिला। मगर इसका नतीजा यह है कि भाईयों के मन में बहनों की खातिर संशय बैठ गया। उन्हे लगने लगा कि यह माॅ-बाप की सेवा के नाम पर बहनें बार-2 मायके आने लगी और अपने नयें घर पर माॅ-बाप को महीनों रखने लगी। कहीं उन्हें पोट कर सम्पत्ति का अधिकांश हिस्सा अपने नाम न लिखवा लें। इस मानसिक भ्रम के कारण भाईयों को बहनों में अपना प्रतिद्वंद्वी दिखने लगा।
राक्षा सूत्र बाॅधते समय क्या करें-
1 रक्षाबन्धन के दिन सर्वप्रथम गणेश जी को राखी बाॅधे तत्पश्चात अन्य लोगों को बाॅधें।
2 राखी बॅधवाने वाले व्यक्ति का मुॅख पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
3 रक्षा सूत्र बॅधवाते वक्त सिर पर रूमाल या कोई कपड़ा अवश्य रखें।
4 महिलावर्ग रखी बाॅधते समय लाल, गुलाबी, पीले या केसरिया रंग कपड़े पहने तो विशेष लाभ होगा।
5 सर्वप्रथम कलाई में कलावा बाॅधे उसके बाद अन्य कोई फैशनेबल राखी बाॅधे।
6 बहने जों रक्षा सूत्र बाॅधें उसे एक वर्ष तक कलाई में बाॅधे रखे और दूसरे वर्ष पुराना वाला रक्षा सूत्र उतार कर किसी नदीं में प्रवाहित करके पुनः नया रक्षा सूत्र बहनों से बॅधवायें। ऐसा करने पर आपकी सुख, समृद्धि व स्वास्थ्य की रक्षा पूरे वर्ष होती रहेगी।
7 येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
बहने राखी बाॅधते समय उपरोक्त मन्त्र का उच्चारण करें।
8 राखी बाॅधवाते समय दाहिने हाथ की मुठ्ठी में फॅूल अवश्य रखें।
9 रक्षा सूत्र शत-प्रतिशत सूती धागे का ही होना चाहिए।
10 राखी को 7 या 5 बार घुमाकर ही हाथ में बाॅधना चाहिए।
रक्षा सूत्र क्यों बाॅधा जाता है ?
11 कलावा या मोली बाॅधने की प्रथा तब से चली आ रही है, जब से दानवीर राजा बलि की वीरता की रक्षा के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बाॅधा था। शास्त्रों में इस श्लोक का उल्लेख मिलता भी मिलता है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
12 रक्षासूत्र बाॅधने से त्रिदेव ब्रहमा, विष्णु, महेश व तीनों देवियाॅ लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा की कृपा बनी रहती है।
13 शरीर की संरचना का प्रमुख नियन्त्रण हाथ की कलाई में होता है। इसलिए कलाई में रक्षा सूत्र बाॅधने से आत्म-विश्वास आता है एंव तीनों दोष वात, पित्त व कफ में सन्तुलन बना रहता है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
14 कलावा या मोली बाॅधने से ब्लडप्रेशर व तनाव का रोग कम होता है।
यदि बहन भाई से रूष्ठ है तो क्या करें-
जन्मकुण्डली में बहन का कारक ग्रह बुध होता है। यदि आपका बुध अशुभ है, पापी है या नीच का है तो बहन से आपके रिश्तें मधुर नहीं रहेंगे। किसी भी प्रकार की नोंक-झोक चलती रहेगी।
15 बहन से रिश्तें मधुर हो जायें इसके लिए आपको रक्षा बन्धन के दिन अपनी बहन को हरें रंग साड़ी, हरे रंग की चूडियाॅ उपहार में दें
16 नाक व कान में पहनें वाली कोई वस्तु भेंट करने से भी रिश्तें अच्छें हो जाते हैं
17 रक्षा बन्धन के दिन बहन को सौंफ युक्त मीठा पान खिलायें।
18 विष्णु सह्रसनाम का पाठ करें
19 अपनी बहन को हरे रंग की ब्रेसलेट या कोई अन्य उपहार जो हरें रंग का हो उसे दें।
यदि भाई नाराज है तो बहनें क्या करें
भाई का कारक ग्रह मंगल होता है। स्त्रियों की कुण्डली में मंगल अशुभ, नीच का या भावसन्धि में फॅसा है तो भाई से रिश्तें अच्छे नहीं रहेंगे।
20 बहनें रक्षा बन्धन के दिन सबसे पहले हनुमान जी को रखी बाॅधे और उसके बाद भाई को राखी बाॅधते वक्त हनुमान जी की दाहिने भुजा से लिया हुआ वन्दन भाई को लगायें। ऐसा करने से आपस में प्रेम सम्बन्ध मजबूत होंगे।
21 आज के दिन बहनें सुन्दर काण्ड का पाठ करके भाई को राखी बाॅधें तथा बेसन लडडू खिलायें।
22 बहनें अपनें भाईयों को गहरे लाल रंग का कोई उपहार दें।
23 रक्षाबन्धन के दिन बहनें अपनें भाईयों को अपने हाथों से भोजन करायें तथा केसर युक्त कोई मीठी वस्तु अवश्य खिलायें।
25 भाई को राखी बाॅधते समय बहन मन में कार्तिकेय भगवान का स्मरण करें। हे कार्तिकेय जी मेरे और भाई के बीच रिश्तें हमेशा मधुर बनें।
26 भद्रा का संबंध सूर्य और शनि से होता है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में, भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी क्रूर बताया गया है। इस उग्र स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उसे कालगणना या पंचाग के एक प्रमुख अंग करण में स्थान दिया। जहां उसका नाम विष्टी करण रखा गया। भद्रा की स्थिति में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि कार्यों को निषेध माना गया। इसलिये इस बार भद्रा का साया समाप्त होने पर ही रक्षाबंधन अनुष्ठान किया जाता है। लेकिन इस बार भद्रा मुक्त रक्षाबंधन होने से यह बहनों के लिये बहुत ही हर्ष का पर्व है।
27 रक्षाबंधन का यह पवित्र त्यौहार इस बार रविवार के दिन है। हालांकि सोमवार को भगवान भोलेनाथ का दिन माने जाने की वजह से श्रावण माह में सोमवार का महत्व कुछ बढ़ जाता है लेकिन आपको बता दें कि सावन माह का तो प्रत्येक दिन भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता है इसलिये रविवार के दिन होने से रक्षाबंधन का महत्व कम नहीं हो जाता। कोटि देवी देवता की और आपके परिवार को रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी को ढेर सारी बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
Tuesday, 7 August 2018
शिव के इन 108 रूपों और नामों का अर्थ
शिव के इन 108 रूपों और नामों का अर्थ
शिव - कल्याण स्वरूप
महेश्वर - माया के अधीश्वर
शम्भू - आनंद स्वरूप वाले
पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
विरूपाक्ष - भौंडी आंख वाले
कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
शंकर - सबका कल्याण करने वाले
शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
अंबिकानाथ - भगवति के पति
श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
कपाली - कपाल धारण करने वाले
कामारी - कामदेव के शत्रु अंधकार
सुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
ललाटाक्ष - ललाट में आंख वाले
कालकाल - काल के भी काल
कृपानिधि - करूणा की खान
भीम - भयंकर रूप वाले
परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
जटाधर - जटा रखने वाले
कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
कवची - कवच धारण करने वाले
कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
परमात्मा - सबका अपना आपा
सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्नि रूपी आंख वाले
हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
सोम - उमा के सहित रूप वाले
पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
गणनाथ - गणों के स्वामी
प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
गिरीश - पहाड़ों के मालिक
गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
अनघ - पापरहित
भुजंगभूषण - सांप के आभूषण वाले
भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
जगद्गुरू - जगत के गुरू
व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
सात्त्विक - सत्व गुण वाले
शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
शाश्वत - नित्य रहने वाले
खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
अज - जन्म रहित
पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
मृड - सुखस्वरूप वाले
पशुपति - पशुओं के मालिक
देव - स्वयं प्रकाश रूप
महादेव - देवों के भी देव
अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
हरि - विष्णुस्वरूप
पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाल
हर - पापों व तापों को हरने वाले
भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
सहस्राक्ष - अनंत आंख वाले
सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
अनंत - देशकालवस्तुरूपीपरिछेद से रहित
तारक - सबको तारने वाला परमेश्वर
!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
शिवलिंग पूजा का महत्व
शिवलिंग पूजा का महत्व
श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी
वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि
हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,श ंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"
प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से )
(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से )
(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुँचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )
(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।
(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते।
प्रभु शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है।
श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जाँचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है।
पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभु शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।
(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा।
तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभु शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभु शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हूँ।
तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।
श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभु शिव की पूजा नहीं की जाती।
महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)
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श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी
वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि
हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,श
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"
प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से )
(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से )
(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुँचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )
(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।
(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते।
प्रभु शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है।
श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जाँचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है।
पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभु शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।
(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा।
तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभु शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभु शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हूँ।
तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।
श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभु शिव की पूजा नहीं की जाती।
महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)
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भगवान भोलेनाथ को जगत पिता कहा गया हैं,
भगवान भोलेनाथ को जगत पिता कहा गया हैं, क्योकि भगवान शिव सर्वव्यापी एवं पूर्ण ब्रह्म हैं। । शिव शब्द के उच्चारण से ही मनुष्य को परम आनंद की अनुभूति होती है। भगवान शिव भारतीय संस्कृति को दर्शन ज्ञान के द्वारा संजीवनी प्रदान करने वाले देव हैं। इसी कारण अनादिकाल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में होते हुवे भी शिवलिंग के रूप में साकार मूर्ति की पूजा होती हैं। लेकिन अभी तक भगवान भोलेनाथ के बारे में आप यही जान रहे होंगे कि भगवान शिव की दो पत्नियां थी देवी सती और दूसरी माता पार्वती। लेकिन यदि पौराणिक कथाओं की माने तो भगवान नीलकंठेश्वर ने एक दो नहीं बल्कि चार विवाह किये थे। लेकिन उन्होंने यह सभी विवाह आदिशक्ति के साथ ही किए थे।
भगवान शिव ने पहला विवाह माता सती के साथ किया जो कि प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थी- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएं जन्मी और वीरणी से साठ कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां और हजारों पुत्र थे। राजा दक्ष की पुत्री ‘सती’ की माता का नाम था प्रसूति। यह प्रसूति स्वायंभु मनु की तीसरी पुत्री थी। सती ने अपने पिती की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से विवाह किया था। लेकिन, जब अपने पिता के यज्ञ में बिन बुलाए पहुंची सती के सामने भगवान शिव का अपमान हुआ, तब उन्होंने यज्ञ कुंड में ही अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। ऐसे में भगवान शिव माता सती का शव लेकर कई दिनों तक भटकते रहे। माता सती के शव जहां-जहां गिरे वहां पर 51 शक्तिपीठ बन गए।
माता सती के वियोग में भगवान शिव काफी दुःखी थे। इस दुःखद घटना के कई वर्षों बाद भगवान शिव का फिर से विवाह हुआ इस बार उनकी अर्धांगिनी बनी देवी पार्वती। देवी पार्वती हिमालय की पुत्री थीं। उन्हें अल्पआयु में ही भगवान शिव को अपना पति मानकर उनका वरण किया और उनका विवाह बाद में भगवान शिव से हुआ। देवी पार्वती को भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप करना पड़ा था। भगवान गणेश मां पार्वती के ही पुत्र हैं। देवी पार्वती ही मां दुर्गा हैं।
भगवान शिव का तीसरी पत्नी देवी उमा को बताया गया है। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। मां उमा देवी दयालु और सरल ह्दय की देवी हैं। आराधना करने पर वह जल्द ही प्रसन्न हो जाती हैं।
उमा के साथ महेश्वर शब्द का उपयोग किया जाता है। अर्थात महेश और उमा। कश्मीर में एक स्थान है उमा नगरी। यह नगरी अनंतनाग क्षेत्र के उत्तर में हिमालय में बसी है। यहां विराजमान है उमा देवी। भक्तों का ऐसा विश्वास है कि देवी स्वयं यहां एक नदी के रूप में रहती हैं जो ओंकार का आकार बनाती है जिसके साथ पांच झरने भी हैं।
भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली को बताया गया है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। वर्षों पहले एक ऐसा भी दानव हुआ जिसके रक्त की एक बूंद अगर धरती पर गिर जाए तो हजारों रक्तबीज पैदा हो जाते थे। इस दानव को मौत की नींद सुलाना किसी भी देवता के वश में नहीं था। तब मां महाकाली ने इस भयानक दानव का संहार कर तीनों लोकों को बचाया। रक्तबीज को मारने के बाद भी मां का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था, तब भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए गलती से मां महाकाली का पैर भगवान शिव के सीने पर रख गया। इसके बाद उनका गुस्सा शांत हुआ।
जानिए भगवान भोलेनाथ के कितने पुत्र थे
भगवान शिव के साथ साथ उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश भी देवो में पूजनीय है। लेकिन क्या आप जानते है इन दोनों के आलावा भी शिव के चार अन्य पुत्र है .. इस प्रकार शिव के दो नही वरन 6 पुत्र थे। आइये जानते है कैसे हुआ शिवजी के इन 6 पुत्रो का जन्म
गणेश : गणेश का जन्म माता पार्वती के चंदन से हुआ, एक बार गणेश को द्वार पर बिठा कर माता स्नान कर रही थी। इतने में शिव भवन में प्रवेश करने लगे। जब गणेश ने उन्हें रोका तो क्रोध में शिव ने गणेश का सिर काट दिया। जब पार्वती ने देखा की उनके पुत्र का सिर काट दिया है। तो वे क्रोधित हो गई। उन्हें शांत करने के लिए शिवजी ने गणेश के सिर के स्थान पर एक हाथी का सिर लगा दिया। और वे फिर से जीवित हो उठे।
कार्तिकेय : जब शिव सती के भस्म होने कारण दुःख से तपस्या में लीन हो गए थे तब धरती पर तारकासुर नामक दैत्य धरती पर अत्याचार मचाने लगा। उस दैत्य के अत्याचार से परेशान होकर देवता ब्रह्मा के पास गए तब ब्रह्मा ने कहा, इसका समाधान शिवजी का पुत्र ही कर सकता है। फिर देवता शिव के पास गए और तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति के लिए प्राथना करी। उनकी प्राथना सुन शिव,पार्वती से शुभ घड़ी व शुभ मुहूर्त में विवाह करते है। इस प्रकार भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ।
सुकेश : शिव के तीसरे पुत्र थे सुकेश। दानवो में दो भाई थे हेति और प्रहेति। दानवों ने इन्हे अपना प्रतिनिधि बनाया। ये दोनों भाई बलशाली और प्रतापी थे। प्रहेति धर्मिक था और हेति को राजपाट और राजनीति की लालसा थी। दानव हेति ने अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए काल की पुत्री ‘भय’ से विवाह कर लिया। कुछ समय पश्चात उनका पुत्र हुआ जिसका नाम था विद्युत्केश। विद्युत्केश का विवाह सालकटंकटा से हुआ। क्योकि सालकटंकटा व्यभिचारणी थी इस कारण उन्होंने अपने पुत्र को लवारिस छोड़ दिया। पुराणों के अनुसार जब भगवान शिव और पार्वती की उस लावारिस बालक पर नजर गई तो उन्होंने उसे गोद लिया।
जलंधर : जलंधर शिव जी का ही अंश था। एक बार जब शिव ने अपना तेज जल में फेका तो उस से जलंधर की उत्पति हुई। जलंधर बहुत ही शक्तिशाली था। उसने अपने आक्रमण से स्वर्ग में कब्जा कर लिया। शिवजी के पास गए और उन्हें पूरी घटना बताई। शिव ने इंद्र से जलंधर की पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म तोड़ने को कहा। क्योकि उंसकी पतिव्रता धर्म की शक्ति के कारण शिव जलंधर को पराजित करने में असमर्थ थे। अतः इंद्र ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का पतिव्रत तोडा तथा शिव ने जलंधर का वध कर दिया।
अयप्पा : अयप्पा भगवन शिव और मोहिनी का पुत्र था। कहते हैं कि जब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था तो उनकी मादकता से भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उस वीर्य से इस बालक का जन्म हुआ। दक्षिण भारत में अयप्पा देव की पूजा अधिक की जाती हैं। अयप्पा देव को ‘हरीहर पुत्र’ के नाम से भी जाना जाता हैं।
भौम भौम भगवान शिव के पसीने से उत्पन हुआ था। जब भगवान शिव तप में लीन थे। उस समय उनके सर से पसीने की एक बूंद टपकी जो धरती पर गिरी। इन पसीने की बूंदों से एक सुंदर और प्यारे बालक का जन्म हुआ। जिसके चार भुजाएं थीं। इस पुत्र का पृथ्वी ने पालन पोषण करना शुरु किया। तभी भूमि का पुत्र होने के कारण यह भौम कहलाया। कुछ बड़ा होने पर मंगल काशी पहुंचा और भगवान शिव की कड़ी तपस्या की। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मंगल लोक प्रदान किया
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शिव भक्त को कभी नहीं छोड़ते

शिव भक्त को कभी नहीं छोड़ते,,,,माटी नामका एक बड़ा शिवभक्त था. उसने संतान प्राप्ति के लिए वर्षों तक शिवजी का कठोर तप किया था. शिवजी ने उसे संतान का वरदान दिया. समय आने पर उसकी पत्नी गर्भवती हुई.
लेकिन पत्नी का प्रसव चार साल तक नहीं हुआ तो माटी को बड़ी चिंता हुई. पता चला कि गर्भ का बालक कालमार्ग यानी मृत्युलोक के कष्टों के डर से बाहर ही नहीं निकल रहा.
माटी ने सोचा कि क्यों न गर्भ में स्थित शिशु को शिवज्ञान दे दिया जाए. उसने शिशु को शिवज्ञान देना शुरू किया जिससे शिशु को बोध हुआ और वह बाहर निकला. माटी ने कालमार्ग से डरने के कारण अपने पुत्र का नाम रखा कालभीति. कालभीति जन्म से ही परम शिव भक्त थे. बड़ा होते ही कालभीति घोर तपस्या में लगे.
बेल के पेड़ के नीचे पैर के अंगूठे पर खड़े हो वह वर्षों तक एक बूँद भी पानी पिये बिना मंत्रों का जप करते रहे. सौ वर्ष पूरे होने पर एक दिन एक आदमी जल से भरा हुआ घड़ा लेकर आया.
कालभीति को नमस्कार कर उसने कहा कि जल ग्रहण कीजिए. कालभीति बोले– आप किस वर्ण के हैं, आप का आचार-व्यवहार कैसा है ? यह सब जाने बिना मैं जल नहीं पी सकताच.
पानी लाने वाला आगंतुक बोला- मैं जब अपने माता पिता को ही नहीं जानता तो अपने वर्ण का क्या कहूं ? आचार-विचार और धर्मों से मेरा कोई वास्ता ही नहीं रहा है.
कालभीति ने कहा- मेरे गुरु के अनुसार जिसके कुल का ज्ञान न हो उसका अन्न जल ग्रहण करने वाला तत्काल कष्ट में पड़ता है. मैं पानी नहीं पिउंगा श्रीमन् !
आगंतुक बोला– तुम्हारी बात पर हँसी आती है. जब सब में भगवान शंकर ही निवास करते हैं, तो किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए क्योंकि इससे भगवान शंकर की ही निंदा होती है.
यह जल अपवित्र कैसे हुआ ? घड़ा मिट्टी का बना है और आग में पका है, फिर जल से भर दिया गया. मेरे छूने से अशुद्धि आ गयी ? तो अगर मैं अशुद्ध होकर इसी धरती पर हूं तो आप यहां क्यों रहते हैं ? आकाश में क्यों नहीं रहते ?
कालभीति ने कहा– सभी में शिव ही हैं, सब को शिव मानने वाले नास्तिक लोग खाना छोड़ कर मिट्टी क्यों नहीं खाते ? राख और धूल क्यों नही फांकते ? मैं यह नहीं कह रहा कि सब में शिव नहीं है. भगवान शिव सब में हैं ही.
मेरी बात ध्यान से सुनिए. सोने के गहने बहुत तरह के बनते हैं. कुछ शुद्ध सोने के तो कुछ मिलावटी. खरे, खोटे सभी आभूषणों में सोना तो है ही. इसी प्रकार ऊंच, नीच, शुद्ध, अशुद्ध सब में भगवान् सदाशिव विराजमान हैं.
जैसे खोटा सोना खरे के साथ मिलकर एक हो जाता है इसी तरह इस शरीर को भी व्रत, तपस्या और सदाचार आदि के द्वारा शोधित करके शुद्ध बना लेने पर मनुष्य निश्चय ही खरा सोना होकर स्वर्गलोक में जाता है.
तो शरीर को खोटी अपवित्र चीजों से बिगाड़ना ठीक नहीं. जो व्रत, उपवास करके शुद्ध हो गया है, वह भी यदि इस तरह अशुद्ध होने लगे तो थोड़े ही दिनों में पतित हो जायेगा इसलिए आपका दिया पानी तो मैं कभी नहीं पिउंगा.
कालभीति के ऐसा कहने पर आगंतुक हंसने लगा. उसने दाहिने अंगूठे से जमीन कुरेदकर एक बहुत बड़ा गड्ढा तैयार किया. फिर उसी में वह सारा जल ढुलका दिया. गड्ढा भर गया, पानी बचा रह गया.
फिर उसने अपने पैर से ही कुरेदकर एक तालाब बना दिया और बचे हुए जल से उस तालाब को भर दिया. यह अद्भुत दृश्य देखकर भी कालभीति नहीं चौंके.
आगंतुक बोला- ब्राह्मणदेव ! आप हैं तो मूर्ख, परन्तु बातें पंडितों सी करते हैं. लगता है आपने विद्वानों की बात नहीं सुनी, कुआँ दूसरे का, घडा दूसरे का और रस्सी दूसरे की है. एक पानी पिलाता है और एक पीता है.
सब समान फल के भागी होते हैं. ऐसा ही मेरा भी जल है. तुम धर्म के ज्ञाता हो; फिर क्यों इसे नहीं पिओगे. कालभीति ने विचार किया,यदि एक कार्य में अनेक सहायक हों तो काम करने वाले को मिलने वाला फल बंटकर समान हो जाता है. बात तो ठीक है.
कालभीति ने उस मनुष्य से कहा- आपका यह कहना ठीक है. कुएं और तालाब का पानी पीने में दोष नहीं है. फिर भी आपने तो अपने घड़े के जल से ही इस गड्ढे को भरा है. यह बात सामने देखकर मैं हर्गिज इसे नहीं पीयूंगा.
कालभीति के हठ पर वह पुरुष हंसता हुआ अंतर्ध्यान हो गया. अब कालभीति को अचरज हुआ. सोचने लगे कि ये क्या किस्सा है. इतने में ही उस बेल के पेड़ के नीचे धरती फाड़ कर सुन्दर चमचमाता शिवलिंग प्रकट हो गया.
तब कालभीति ने कहा – जो पाप के काल हैं जिनके कंठ में काला चिन्ह सुशोभित होता है तथा जो संसार के कालस्वरूप हैं, उन भगवान् महाकाल की मैं शरण लेता हूं. आप हमें शरण दीजिए. आपको बारम्बार नमस्कार है.
कालभीति की स्तुति पर महादेव उस लिंग से प्रकट हुए और कहा– ब्राह्मण ! तुमने इस महातीर्थ में रहकर मेरी जो आराधना की है, उससे मैं संतुष्ट हूं. अब संसार के कष्टों से तुम निर्भय रहो.
मैं ही मनुष्य रूप में प्रकट हुआ था. मैंने यह गड्ढा और तालाब सब तीर्थों के जल से भरा है. यह परम पवित्र जल तुम्हारे लिए ही लाया था. तुम मुझ से कोई मनोवांछित वर मांगो.
कालभीति ने कहा – प्रभु ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो सदा यहां निवास करें. इस शिव लिंग पर जो भी दान, पूजन किया जाए, वह अक्षय हो. आपने काल से मुझे मुक्ति दिलाई है,इसलिए यह शिवलिंग महाकाल के नाम से प्रसिद्ध हो.
भगवान बोले– जो चतुर्दशी, अष्टमी, सोमवार तथा पर्व के दिन इस सरोवर में स्नान करके इस शिवलिंग की पूजा करेगा, वह शिव को ही प्राप्त होगा. यहां किया हुआ जप, तप और रूद्र जप सब अक्षय होगा. तुम नंदी के साथ मेरे दूसरे द्वारपाल बनोगे.
काल पर विजय पाने से तुम महाकाल के नाम से प्रसिद्द होगे. शीघ्र ही राजर्षि करन्धम यहां आएंगे उन्हें धर्म का उपदेश करके तुम मेरे लोक में चले आओ. यह कहकर भगवान रूद्र उस लिंग में ही लीन हो गए.
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महादेव भगवान ने दिया अमरत्व का ज्ञान
महादेव भगवान ने दिया अमरत्व का ज्ञान
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से ऐसे गूढ़ ज्ञान देने का अनुरोध किया जो संसार में किसी भी जीव को प्राप्त न हो. वह अमरत्व का रहस्य प्रभु से सुनना चाहती थीं.
.अमरत्व का रहस्य किसी कुपात्र के हाथ न लग जाए इस चिंता में पड़कर महादेव पार्वती जी को लेकर एक निर्जन प्रदेश में गए.
.उन्होंने एक गुफा चुनी और उस गुफा का मुख अच्छी तरह से बंद कर दिया. फिर महादेव ने देवी को कथा सुनानी शुरू की. पार्वती जी थोड़ी देर तक तो आनंद लेकर कथा सुनती रहीं.
जैसे किसी कथा-कहानी के बीच में हुंकारी भरी जाती है उसी तरह देवी काफी समय तक हुंकारी भरती रहीं लेकिन जल्द ही उन्हें नींद आने लगी.
उस गुफा में तोते यानी शुक का एक घोंसला भी था. घोसले में अंडे से एक तोते के बच्चे का जन्म हुआ. वह तोता भी शिव जी की कथा सुन रहा था.
अमरकथा सुनने से उसमें दिव्य शक्तियां आ गईं. जब तोते ने देखा कि माता सो रही हैं. कहीं महादेव कथा सुनाना न बंद कर दें इसलिए वह पार्वती की जगह हुंकारी भरने लगा.
महादेव कथा सुनाते रहे. लेकिन शीघ्र ही महादेव को पता चल गया कि पार्वती के स्थान पर कोई औऱ हुंकारी भर रहा है. वह क्रोधित होकर शुक को मारने के लिए उठे.
शुक वहां से निकलकर भागा. वह व्यास जी के आश्रम में पहुंचा. व्यास जी की पत्नी ने उसी समय जम्हाई ली और शुक सूक्ष्म रूप धारण कर उनके मुख में प्रवेश कर गया.
महादेव ने जब उसे व्यास की शरण में देखा तो मारने का विचार त्याग दिया. शुक व्यास की पत्नी के गर्भस्थ शिशु हो गए. गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो प्राप्त था.
शुक ने सांसारिकता देख ली थी इस लिए वह माया के पृथ्वी लोक की प्रभाव में आना नहीं चाहते थे इसलिए ऋषि पत्नी के गर्भ से बारह वर्ष तक नहीं निकले.
व्यास जी ने शिशु से बाहर आने को कहा लेकिन वह यह कहकर मना करता रहा कि संसार तो मोह-माया है मुझे उसमें नहीं पड़ना. ऋषि पत्नी गर्भ की पीड़ा से मरणासन्न हो गईं.
भगवान श्री कृष्ण को इस बात का ज्ञान हुआ. वह स्वयं वहां आए और उन्होंने शुक को आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा. श्री कृष्ण से मिले वरदान के बाद ही शुक ने गर्भ से निकल कर जन्म लिया...महादेव की कृपा से शुकदेव जन्म लेते ही ब्रह्मज्ञानी हुए थे... ऊँ नम: शिवाय् !!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
Sunday, 29 July 2018
श्रावण सोमवार की कथा
श्रावण सोमवार की कथा ,,, अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतरमन से बहुत दुखी था, क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
दिन रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।'
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वतीजी का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूं, लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम 'अमर' रखा।
जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इंकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा, क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं? विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया राजकुमारी चंद्रिका तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इंकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न-वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें, नहीं तो इसके माता पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।'
पार्वतीजी के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।
शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत सा धन वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
श्रावण में सोमवार की महिमा ,,,,शिव का एक नाम 'सोम' भी बताया गया है। सोम का अर्थ होता है चंद्रमा। चंद्रमा मन का कारक है। शिव द्वारा चंद्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। इसलिए जब हम शिव की आराधना करते हैं तो अपने मन को स्थिर करने का उपाय भी करते हैं। भगवान शंकर के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में कथा प्रचलित है कि जब भगवान शिव ने चंद्रमा को श्राप से मुक्त किया था तो उन्होंने सोमनाथ में शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी कारण यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ प्रसिद्ध हुआ।
जलाभिषेक,,,पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रावण मास में ही समुद्र मंथन किया गया था। मंथन से जो हलाहल विष निकला उसे भगवान शिव ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की थी। विष के प्रभाव से कंठ नीला पड़ जाने के कारण शिव 'नीलकंठ" कहलाए। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवताओं ने शिवजी को जल अर्पित किया।
यही वजह है कि श्रावण मास में शिवजी को जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। इस महीने में गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, शतरूद्रिपाठ और पुरुषसूक्त का पाठ एवं पंचाक्षर और षडाक्षर आदि शिव मंत्रों व नामों का जप विशेष फल देने वाला है। इस पूरे मास जो भी निष्काम भाव से भगवान शिव की भक्ति करता है उसे शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।'
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मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये'
ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
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