Tuesday, 6 May 2014

महाकैलास अष्टोत्तर शत नामावली

महाकैलास अष्टोत्तर शत नामावली
ॐ श्रीमहाकैलासशिखरनिलयाय नमोनमः ।
ॐ हिमाचलेन्द्रतनयावल्लभाय नमोनमः ।
ॐ वामभागकलत्रार्धशरीराय नमोनमः ।
ॐ विलसद्दिव्यकर्पूरदिव्याभाय नमोनमः ।
ॐ कोटिकन्दर्पसदृशलावण्याय नमोनमः । ५।
ॐ रत्नमौक्तिकवैडूर्यकिरीटाय नमोनमः ।
ॐ मंदाकिनीजलोपेतमूर्धजाय नमोनमः ।
ॐ चारुशीतांशुशकलशेखराय नमोनमः ।
ॐ त्रिपुण्ड्रभस्मविलसत्फालकाय नमोनमः ।
ॐ सोमपावकमार्ताण्डलोचनाय नमोनमः । १०
ॐ वासुकीतशकलसत्कुण्डलाय नमोनमः ।
ॐ चारुप्रसन्नसुस्मेरवदनाय नमोनमः ।
ॐ समुद्रोद्भूतगरलकंधराय नमोनमः ।
ॐ कुरंगविलसत्पाणिकमलाय नमोनमः ।
ॐ परश्वधद्वयलसद्दिव्यकराब्जाय नमोनमः । १५।
ॐ वराभयप्रदकरयुगलाय नमोनमः ।
ॐ अनेकरत्नमाणिक्यसुहाराय नमोनमः ।
ॐ मौक्तिकस्वर्णरुद्राशमालिकाय नमोनमः ।
ॐ हिरण्यकिंकिणीयुक्तकंकणाय नमोनमः ।
ॐ मंदारमल्लिकादामभूषिताय नमोनमः । २०
ॐ महामातंगसत्कृत्तिवसनाय नमोनमः ।
ॐ नागेंद्रयज्ञोपवीतशोभिताय नमोनमः ।
ॐ सौदामिनीसमच्छायसुवस्त्राय नमोनमः ।
ॐ सिंजानमणिमंजीरचरणाय नमोनमः ।
ॐ चक्राब्जध्वजयुक्तांघ्रिसरोजाय नमोनमः । २५।
ॐ अपर्णाकुचकस्तूरीशोभिताय नमोनमः ।
ॐ गुहमत्तेभवदनजनकाय नमोनमः ।
ॐ बिडौजोविधिवैकुण्ठसन्नुताय नमोनमः ।
ॐ कमलाभारतींद्राणीसेविताय नमोनमः ।
ॐ महापंचाशरीमन्त्रस्वरूपाय नमोनमः । ३०
ॐ सहस्रकोटितपनसंकाशाय नमोनमः ।
ॐ अनेककोटिशीतंशुप्रकाशाय नमोनमः ।
ॐ कैलासतुल्यवृषभवाहनाय नमोनमः ।
ॐ नंदीभृंगीमुखानेकसंस्तुताय नमोनमः ।
ॐ निजपादा.म्बुजासक्तसुलभाय नमोनमः । ३५।
ॐ प्रारब्धजन्ममरणमोचनाय नमोनमः ।
ॐ संसारमयदुःखौघभेषजाय नमोनमः ।
ॐ चराचरस्थूलसूश्मकल्पकाय नमोनमः ।
ॐ ब्रह्मादिकीटपर्यन्तव्यापकाय नमोनमः ।
ॐ सर्वसहामहाचक्रस्यन्दनाय नमोनमः । ४०
ॐ सुधाकरजगच्छशूरथांगाय नमोनमः ।
ॐ अथर्वऋग्यजुस्सामतुरगाय नमोनमः ।
ॐ सरसीरुहसंजातप्राप्तसारथये नमोनमः ।
ॐ वैकुण्ठसायविलसत्सायकाय नमोनमः ।
ॐ चामीकरमहाशैलकार्मुकाय नमोनमः । ४५।
ॐ भुजंगराजविलसत्सिञ्जिनीकृतये नमोनमः ।
ॐ निजाशिजाग्निसन्दग्ध त्रिपुराय नमोनमः ।
ॐ जलंधरासुरशिरच्छेदनाय नमोनमः ।
ॐ मुरारिनेत्रपूजांघ्रिपंकजाय नमोनमः ।
ॐ सहस्रभानुसंकाशचक्रदाअय नमोनमः । ५०
ॐ कृतान्तकमहादर्पनाशनाय नमोनमः ।
ॐ मार्कण्डेयमनोभीष्टदायकाय नमोनमः ।
ॐ समस्तलोकगीर्वाणशरण्याय नमोनमः ।
ॐ अतिज्वलज्वालामालविषघ्नाय नमोनमः ।
ॐ शिशितांधकदैतेयविक्रमाय नमोनमः । ५
ॐ स्वद्रोहिदशसवनविघाताय नमोनमः ।
ॐ शंबरांतकलावण्यदेहसंहारिणे नमोनमः ।
ॐ रतिप्रार्तितमांगल्यफलदाय नमोनमः ।
ॐ सनकादिसमायुक्तदशिणामूर्तये नमोनमः ।
ॐ घोरापस्मारदनुजमर्दनाय नमोनमः । ६०
ॐ अनन्तवेदवेदान्तवेद्याय नमोनमः ।
ॐ नासाग्रन्यस्तनिटिलनयनाय नमोनमः ।
ॐ उपमन्युमहामोहभंजनाय नमोनमः ।
ॐ केशवब्रह्मसंग्रामनिवाराय नमोनमः ।
ॐ द्रुहिणांभोजनयनदुर्लभाय नमोनमः । ६५।
ॐ धर्मार्थकामकैवल्यसूचकाय नमोनमः ।
ॐ उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणाय नमोनमः ।
ॐ अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय नमोनमः ।
ॐ कोलाहलमहोदारशमनाय नमोनमः ।
ॐ नारसिंहमहाकोपशरभाय नमोनमः । ७०
ॐ प्रपंचनाशकल्पान्तभैरवाय नमोनमः ।
ॐ हिरण्यगर्भोत्तमांगच्छेदनाय नमोनमः ।
ॐ पतंजलिव्याघ्रपादसन्नुताय नमोनमः ।
ॐ महाताण्डवचातुर्यपंडिताय नमोनमः ।
ॐ विमलप्रणवाकारमध्यगाय नमोनमः । ७५।
ॐ महापातकतूलौघपावनाय नमोनमः ।
ॐ चंडीशदोषविच्छेदप्रवीणाय नमोनमः ।
ॐ रजस्तमस्सत्त्वगुणगणेशाय नमोनमः ।
ॐ दारुकावनमानस्त्रीमोहनाय नमोनमः ।
ॐ शाश्वतैश्वर्यसहितविभवाय नमोनमः । ८०
ॐ अप्राकृतमहादिव्यवपुस्थाय नमोनमः ।
ॐ अखंडसच्छिदानन्दविग्रहाय नमोनमः ।
ॐ अशेषदेवताराध्यपादुकाय नमोनमः ।
ॐ ब्रह्मादिसकलदेववन्दिताय नमोनमः ।
ॐ पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशतुरीयाय नमोनमः । ८५।
ॐ वसुन्धरमहाभारसूदनाय नमोनमः ।
ॐ देवकीसुतकौन्तेयवरदाय नमोनमः ।
ॐ अज्ञानतिमिरध्वान्तभास्कराय नमोनमः ।
ॐ अद्वैतानन्दविज्ञानसुखदाय नमोनमः ।
ॐ अविद्योपाधिरहितनिर्गुणाय नमोनमः । ९०
ॐ सप्तकोटिमहामन्त्रपूरिताय नमोनमः ।
ॐ गंधशब्दस्पर्शरूपसाधकाय नमोनमः ।
ॐ अशराशरकूटस्थपरमाय नमोनमः ।
ॐ षोडशाब्दवयोपेतदिव्यांगाय नमोनमः ।
ॐ सहस्रारमहापद्ममण्डिताय नमोनमः । ९५।
ॐ अनन्तानन्दबोधांबुनिधिस्थाय नमोनमः ।
ॐ अकारादिशकारान्तवर्णस्थाय नमोनमः ।
ॐ निस्तुलौदार्यसौभाग्यप्रमत्ताय नमोनमः ।
ॐ कैवल्यपरमानन्दनियोगाय नमोनमः ।
ॐ हिरण्यज्योतिविभ्राजत्सुप्रभाय नमोनमः । १००
ॐ ज्योतिषांमूर्तिमज्योतिरूपदाय नमोनमः ।
ॐ अनौपम्यमहासौख्यपदस्थाय नमोनमः ।
ॐ अचिंत्यमहिमाशक्तिरंजिताय नमोनमः ।
ॐ अनित्यदेहविभ्रांतिवर्जिताय नमोनमः ।
ॐ सकृत्प्रपन्नदौर्भाग्यच्छेदनाय नमोनमः ।
ॐ षट्त्रिंशत्तत्त्वप्रशादभुवनाअय नमोनमः ।
ॐ आदिमध्यान्तरहितदेहस्थाय नमोनमः ।
ॐ परानन्दस्वरूपार्थप्रबोधाय नमोनमः ।
ॐ ज्ञानशक्तिकृयाशक्तिसहिताय नमोनमः ।
ॐ पराशक्तिसमायुक्तपरेशाय नमोनमः । ११०
ॐ ओंकारानन्दनोद्यानकल्पकाय नमोनमः ।
ॐ ब्रह्मादिसकलदेववन्दिताय नमोनमः । ११२
॥ श्री महाकैलासाष्टोत्तरशतनामावलिः संपूर्णा ॥



SHIVA MAHADEVA by VISHNU108

अमरनाथ की जय,,बाबा बर्फानी की जय हो

अमरनाथ की जय,,बाबा बर्फानी की जय हो ,,,हर हर महादेव,,जय बाबा बर्फानी..जय बाबा अमरनाथ बर्फानी ,,जय हो अमरनाथ बाबा बर्फानी,,बाबा अमरनाथ की जय,अमरनाथ की जय,,अमरनाथ की जय,,बाबा बर्फानी की जय हो ,,,हर हर महादेव,,जय बाबा बर्फानी..जय बाबा अमरनाथ बर्फानी ,,जय हो अमरनाथ बाबा बर्फानी,,बाबा अमरनाथ की जय,अमरनाथ की जय,,अमरनाथ की जय,,बाबा बर्फानी की जय हो ,,,हर हर महादेव,,जय बाबा बर्फानी..जय बाबा अमरनाथ बर्फानी ,,जय हो अमरनाथ बाबा बर्फानी,,बाबा अमरनाथ की जय,अमरनाथ की जय

सीता नवमी जानकी नवमी का पूजन,, SITA NAVAMI JANKI NAVAMI

सीता नवमी का पूजन

वैशाख शुक्ल नवमी को माता सीता का प्राकट्य हुआ था। इस दिन उनके निमित्त व्रत व पूजन करना चाहिए। पूजन की विधि इस प्रकार है-
सीता नवमी के दिन व्रती (व्रत करने वाला) को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर माता जानकी के निमित्त व्रत व पूजन का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद उसे एक चौकी पर सीतारामजी सहित जनकजी, माता सुनयना, कुल पुरोहित शतानंदजी, हल और पृथ्वी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करके उनका पूजन करना चाहिए। सर्वप्रथम भगवान श्रीगणेश एवं माता अंबिका का पूजन करके माता जानकी का पूजन करना चाहिए। पूजन में सर्वप्रथम इन ध्यान मंत्रों को उच्चारण करना चाहिए
माता जानकी का ध्यान-
ताटम मण्डलविभूषितगण्डभागां,
चूडामणिप्रभृतिमण्डनमण्डिताम्।
कौशेयवस्त्रमणिमौक्तिकहारयुक्तां,
ध्यायेद् विदेहतनयां शशिगौरवर्णाम्।।
पिता जनक का ध्यान-
देवी पद्मालया साक्षादवतीर्णा यदालये।
मिथिलापतये तस्मै जनकाय नमो नम:।।
माता सुनयना का ध्यान-
सीताया: जननी मातर्महिषी जनकस्य च।
पूजां गृहाण मद्दतां महाबुद्धे नमोस्तु ते।।
कुल पुरोहित शतानंदजी का ध्यान-
निधानं सर्वविद्यानां विद्वत्कुलविभूषणम्।
जनकस्य पुरोधास्त्वं शतानन्दाय ते नम:।।
हल का ध्यान
जीवनस्यखिलं विश्वं चालयन् वसुधातलम्।
प्रादुर्भावयसे सीतां सीत तुभ्यं नमोस्तु ते।।
पृथ्वी का ध्यान
त्वयैवोत्पदितं सर्वं जगतेतच्चराचरम्।
त्वमेवासि महामाया मुनीनामपि मोहिनी।।
त्वदायत्ता इमे लोका: श्रीसीतावल्लभा परा।
वंदनीयासि देजवानां सुभगे त्वां नमाम्यहम्।।
तदुपरांत पंचोपचार से सभी का पूजन करना चाहिए। अंत में इस मंत्र से आरती करना चाहिए-
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं च प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदा भव।।
परिकरसहित श्रीजानकीरामाभ्यां नम:।
कर्पूरारार्तिक्यं समर्पयामि।।
 जानकी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

Monday, 5 May 2014

गंगा सप्तमी

गंगा सप्तमी,... गंगा सप्तमी पौराणिक शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मां गंगा स्वर्ग लोक से शिवशंकर की जटाओं में पहुंची थी। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई वह दिन गंगा जयंती (वैशाख शुक्ल सप्तमी) और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुई वह दिन 'गंगा दशहरा' (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के नाम से जाना जाता है। इस दिन मां गंगा का पूजन किया जाता है।
गंगा सप्तमी के अवसर पर्व पर मां गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैसे तो गंगा स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्ति पा जाता है। इस पर्व के लिए गंगा मंदिरों सहित अन्य मंदिरों पर भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
कहा जाता है कि गंगा नदी में स्नान करने से दस पापों का हरण होकर अंत में मुक्ति मिलती है। इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जीवनदायिनी गंगा में स्नान, पुण्यसलिला नर्मदा के दर्शन और मोक्षदायिनी शिप्रा के स्मरण मात्र से मोक्ष मिल जाता है।
गंगा सप्तमी के दिन गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है। सभी पापों का क्षय होता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। विधि-विधान से किया गया गंगा का पूजन अमोघ फल प्रदान करता है। ,,,(jyotish aur ratna paramarsh karta)08275555557 ,,
पुराणों के अनुसार गंगा विष्णु के अंगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण भगीरथ के प्रयास से कपिल मुनि के शाप द्वारा भस्मीकृत हुए राजा सगर के 60,000 पुत्रों की अस्थियों का उद्धार करने के लिए हुआ था, तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर माता गंगा को प्रसन्न किया और धरती पर लेकर आए।
वैसे तो गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो गंगाजी के संपूर्ण अर्थ को परिभाषित करती है। गंगा नदी हिंदुओं की आस्था का केंद्र है और अनेक धर्मग्रंथों में गंगा महत्व का वर्णन देखने को मिलता है।
एक अन्य पौराणिक एक कथा के अनुसार गंगा का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ।
एक अन्य मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु के चरण धोए और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया।
एक अन्य कथा अनुसार जब भगवान शिव ने नारद मुनि, ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा, जिसे ब्रह्माजी ने उसे अपने कमंडल में भर लिया और इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ था।

OM SHIVAYA by VISHNU108

उमामहेश्वर स्तोत्रम,,

उमामहेश्वर स्तोत्रम,,
नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्ट वपुर्धराभ्याम ।
नगेन्द्रकन्यावृषकेतनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां सरसोत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम ।
नारायणेनार्चितपादुकाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम ॥
नमह शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम ।
विभूतिपाटिरविलेपनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम ।
जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्याम पञ्चाशरी पञ्जररञ्चिताभ्याम ।
प्रपञ्च सृष्टिस्थिति संहृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्याम अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम ।
अशेषलोकैकहितङ्कराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम ।
कैलाशशैलस्थितदेवताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्याम अशेषलोकैकविशेषिताभ्याम ।
अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसंभृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्यां रवीन्दुवैश्वानरलोचनाभ्याम ।
राका शशाङ्काभ मुखाम्बुजाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां जटिलन्धराभ्यां जरामृतिभ्याम च विवर्जिताभ्याम ।
जनार्दनाब्जोद्भवपूजिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां विषमेशणाभ्यां बिल्वच्च्हदामल्लिकदामभृद्भ्याम ।
शोभावती शान्तवतीश्वराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्याम जगत्त्रयीरशण बद्दहृद्भ्याम ।
समस्त देवासुरपूजिताभ्याम नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीभ्यां भक्त्या पठेद्द्वादशकं नरो यः ।
स सर्व्सौभाग्य फलानि भुङ्क्ते शतायुरन्ते शिवलोकमेति ॥
॥ इति श्री शङ्कराचार्य कृत उमामहेश्वर स्तोत्रम ॥


Saturday, 3 May 2014

सूरदास जयंती संत सूरदास जयंती Sant Surdas Jayanti

संत सूरदास जयंती,,सूरदास का नाम कृष्ण भक्त कवियों में सबसे पहले लिया जाता है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं।
कवि सूरदास का जन्म दिल्ली के पास सीही नाम के गांव में बहुत निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके तीन बड़े भाई थे। सूरदास जन्म से ही अंधे थे, किंतु भगवान ने उन्हें सगुन बताने की एक अद्भुत शक्ति से परिपूर्ण करके धरती पर भेजा था।
मात्र छ: वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपने माता-पिता को अपनी सगुन बताने की विद्या से चकित कर दिया था। लेकिन उसके कुछ ही समय बाद वे घर छोड़कर अपने घर से चार कोस दूर एक गांव में जाकर तालाब के किनारे रहने लगे थे। सगुन बताने की विद्या के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।
इस उपलब्धि के साथ ही वे गायन विद्या में भी शुरू से ही प्रवीण थे। अत: उन्हें शीघ्र ही अच्छी प्रसिद्धि मिली। लेकिन फिर अठराह साल की उम्र में उन्हें संसार से विरक्ति हो गई और सूरदास वह स्थान छोड़कर यमुना के किनारे (आगरा और मथुरा के बीच) गऊघाट पर आकर रहने लगे।
गऊघाट पर उनकी भेंट वल्लभाचार्य से हुई। सूरदास गऊघाट पर अपने कई सेवकों के साथ रहते थे और वे सभी उन्हें 'स्वामी' कहकर संबोधित करते थे। वल्लभाचार्य ने भी प्रभावित होकर उनसे भेंट की और उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया। वल्लभाचार्य ने उन्हें गोकुल में श्रीनाथ जी के मंदिर पर कीर्तनकार के रूप में नियुक्त किया और वे आजन्म वहीं रहे। वहां वे कृष्‍ण भक्ति में मग्न रहें।
उस दौरान उन्होंने वल्लभाचार्य द्वारा 'श्रीमद् भागवत' में वर्णित कृष्ण की लीला का ज्ञान प्राप्त किया तथा अपने कई पदों में उसका वर्णन भी किया। उन्होंने 'भागवत' के द्वादश स्कन्धों पर पद-रचना की, 'सहस्त्रावधि' पद रचे, जो 'सागर' कहलाएं। सूरदास की पद-रचना और गान-विद्या की ख्याति सुनकर अकबर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकें। अत: उन्होंने मथुरा आकर सूरदास से भेंट की।

श्रीनाथजी के मंदिर में बहुत दिनों तक कीर्तन करने के बाद जब सूरदास को अहसास हुआ कि भगवान अब उन्हें अपने साथ ले जाने की इच्छा रख रहे हैं, तो वे श्रीनाथजी में स्थित पारसौली के चन्द्र सरोवर पर आकर लेट गए और श्रीनाथ जी की ध्वजा का ध्यान करने लगे। इसके बाद सूरदास ने अपना शरीर त्याग दिया।
सूरदास जी द्वारा लिखित पांच प्रमुख ग्रंथ बताए जाते हैं - * सूरसागर, * सूरसारावली, * साहित्य-लहरी, * नल-दमयंती और ब्याहलो।
सूरदास की रचना महान कवियों के बीच अतुलनीय है। वे सच्चे कृष्ण भक्त, कवि थे जो सत्य का अन्वेषण कर उसे मूर्त रूप देने में समर्थ होते हैं।  ,ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,Gems For Everyone,
मोर मुकुट, कुंडल स्रवननि बर दसन-दमक दामिनि-छवि छोरी
गए स्याम रवि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी
औचक ही देखी तहं राधा, नैन बिसाल भाल दिए रोरी
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी
सूर स्याम देखती हीं रीझै, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी

Adi Shankaracharya Jayanti आदि शंकराचार्य जयंती,,


आदि शंकराचार्य जयंती,, आदि शंकराचार्य एक महान हिन्दू दार्शनिक एवं धर्मगुरु थे. आदि शंकराचार्य जी का जन्म 788 ईसा पूर्व केरल के कालड़ी में एक नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. इसी उपलक्ष में वैशाख मास की शुक्ल पंचमी के दिन आदि गुरु शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है. इस वर्ष आद्यगुरू शंकराचार्य जयंती 11 मई 2016, . हिन्दू धार्मिक मान्यता अनुसार इन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है यह अद्वैत वेदान्त के संस्थापक और हिन्दू धर्म प्रचारक थे. आदि शंकराचार्य जी जीवनपर्यंत सनातन धर्म के जीर्णोद्धार में लगे रहे उनके प्रयासों ने हिंदु धर्म को नव चेतना प्रदान की.
आदि शंकराचार्य जयन्ती के पावन अवस्रप पर शंकराचार्य मठों में पूजन हवन का आयोजन किया जाता है. देश भर में आदि शंकराचार्य जी को पूजा जाता है. अनेक प्रवचनों एवं सतसंगों का आयोजन भी होता है. सनातन धर्म के महत्व पर की उपदेश दिए जाते हैं और चर्चा एवं गोष्ठी भी कि जाती है.
मान्यता है कि इस पवित्र समय अद्वैत सिद्धांत का पाठ करने से व्यक्ति को परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होती है. इस दिन धर्म यात्राएं एवं शोभा यात्रा भी निकाली जाती है.आदि शंकराचार्य जी ने अद्वैत वाद के सिंद्धांत को प्रतिपादित किया जिस कारण आदि शंकराचार्य जी को हिंदु धर्म के महान प्रतिनिधि के तौर पर जाना जाता है, आदि शंकराचार्य, जी को जगद्गुरु एवं शंकर भगवद्पादाचार्य के नाम से भी जाना जाता है.
आदि शंकराचार्य’ जन्म कथा | असाधारण प्रतिभा के धनी आद्य जगदगुरू शंकराचार्य का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी के पावन दिन हुआ था. दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में जन्में शंकर जी आगे चलकर ‘जगद्गुरु आदि शंकराचार्य’ के नाम से विख्यात हुए. इनके पिता शिवगुरु नामपुद्रि के यहाँ जब विवाह के कई वर्षों बाद भी कोई संतान नहीं हुई, तो इन्होंने अपनी पत्नी विशिष्टादेवी सहित संतान प्राप्ति की इच्छा को पूर्ण करने के लिए से दीर्घकाल तक भगवान शंकर की आराधना की इनकी श्रद्धा पूर्ण कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा.
शिवगुरु ने प्रभु शंकर से एक दीर्घायु सर्वज्ञ पुत्र की इच्छा व्यक्त की. तब भगवान शिव ने कहा कि ‘वत्स, दीर्घायु पुत्र सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ पुत्र दीर्घायु नहीं होगा अत: यह दोनों बातें संभव नहीं हैं तब शिवगुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति की प्रार्थना की और भगवान शंकर ने उन्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति का वरदान दिया तथा कहा कि मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म लूंगा.
इस प्रकार उस ब्राह्मण दंपती को संतान रूप में पुत्र रत्न की प्राप्त हुई और जब बालक का जन्म हुआ तो उसका नाम शंकर रखा गया शंकराचार्य ने शैशव में ही संकेत दे दिया कि वे सामान्य बालक नहीं है. सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने वेदों का पूर्ण अध्ययन कर लिया था, बारहवें वर्ष में सर्वशास्त्र पारंगत हो गए और सोलहवें वर्ष में ब्रह्मसूत्र- भाष्य कि रचना की उन्होंने शताधिक ग्रंथों की रचना शिष्यों को पढ़ाते हुए कर दी अपने इन्हीं महान कार्यों के कारण वह आदि गुरू शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए.
आदि शंकराचार्य जयंती महत्व |
आदि शंकराचार्य जयन्ती के दिन शंकराचार्य मठों में पूजन हवन किया जाता है और पूरे देश में सनातन धर्म के महत्व पर विशेष कार्यक्रम किए जाते हैं. मान्यता है कि आदि शंकराचार्य जंयती के अवसर पर अद्वैत सिद्धांत का किया जाता है.

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