Friday, 12 October 2018

श्री सत्यानारयण जी की आरती

श्री सत्यानारयण जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा |
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा
रत्नजडित सिंहासन , अद्भुत छवि राजें |
नारद करत निरतंर घंटा ध्वनी बाजें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी....
प्रकट भयें कलिकारण ,द्विज को दरस दियो |
बूढों ब्राम्हण बनके ,कंचन महल कियों ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
दुर्बल भील कठार, जिन पर कृपा करी |
च्रंदचूड एक राजा तिनकी विपत्ति हरी ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
वैश्य मनोरथ पायों ,श्रद्धा तज दिन्ही
सो फल भोग्यों प्रभूजी , फेर स्तुति किन्ही ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
भाव भक्ति के कारन .छिन छिन रुप धरें |
श्रद्धा धारण किन्ही ,तिनके काज सरें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
ग्वाल बाल संग राजा ,वन में भक्ति करि |
मनवांचित फल दिन्हो ,दीन दयालु हरि ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
चढत प्रसाद सवायों ,दली फल मेवा
धूप दीप तुलसी से राजी सत्य देवा ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे |
ऋद्धि सिद्धी सुख संपत्ति सहज रुप पावे ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा ॥

लक्ष्मीजी की आरती

लक्ष्मीजी की आरती
महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं सुरेश्र्वरी |
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥
https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 ,, 
ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
उमा ,रमा,ब्रम्हाणी, तुम जग की माता |
सूर्य चद्रंमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
दुर्गारुप निरंजन, सुख संपत्ति दाता |
जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धी धन पाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता |
कर्मप्रभाव प्रकाशनी, भवनिधि की त्राता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद् गुण आता|
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता |
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
शुभ गुण मंदिर सुंदर क्षीरनिधि जाता|
रत्न चतुर्दश तुम बिन ,कोई नहीं पाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
महालक्ष्मी जी की आरती ,जो कोई नर गाता |
उँर आंनद समाा,पाप उतर जाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
स्थिर चर जगत बचावै ,कर्म प्रेर ल्याता |
रामप्रताप मैया जी की शुभ दृष्टि पाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता....
ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता

चामुण्डा देवी जी की आरती

चामुण्डा देवी जी की आरती
जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी। निशिदिन तुमको ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी॥ जय अम्बे
माँग सिन्दूर विराजत, टीको, मृगमद को। उज्जवल से दोउ नयना, चन्द्रबदन नीको॥ जय अम्बे
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्त पुष्प गलमाला, कंठ हार साजे॥ जय अम्बे
हरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी।सुर नर मुनिजन सेवत, तिनके दु:ख हारी॥ जय अम्बे
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम जोती॥ जय अम्बे
शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती। धूम्र-विलोचन नयना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे
चण्ड-मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोऊ मारे, सुर भय दूर करे॥ जय अम्बे
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे
चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, और बाजत डमरु॥ जय अम्बे
तुम हो जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ जय अम्बे
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे

राम जी की आरती

राम जी की आरती
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं
नवकंज लोचन, कंजमुख, करकुंज, पदकंजारुणं॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं
श्री राम श्री राम....
कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनीलनीरद सुन्दरं ।
पट पीत मानहु तडीत रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं
श्री राम श्री राम....
भजु दीनबंधु दिनेश दानवदै त्यवंशनिकंदनं ।
रघुनंद आंनदकंद कोशलचंद दशरथनंदनं ॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं ॥
श्री राम श्री राम...
सिर मुकुट कूंडल तिलक चारु उदारु अंग विभुषणं ।
आजानु भुजा शरा चाप धरा, संग्राम जित खर दुषणं ॥
भुजा शरा चाप धरा, संग्राम जित खर दुषणं ॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं
इति वदित तुलसीदास शंकरशेषमुनिमनरंजनं ।
मम ह्रदयकंजनिवास कुरु, कमदि खल दल गंजनं ॥ 

विष्णु जी की आरती

विष्णु जी की आरती
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥ जय जगदीश हरे
जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥ जय जगदीश हरे
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ जय जगदीश हरे
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ जय जगदीश हरे
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ जय जगदीश हरे
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती॥ जय जगदीश हरे
दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पडा तेरे॥ जय जगदीश हरे
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढाओ, संतन की सेवा॥ जय जगदीश हरे
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥ जय जगदीश हरे
आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।
अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥ जय जगदीश हरे
अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।
सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥ जय जगदीश हरे
विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।
विश्व चराचर तुम ही, तुम ही विश्वभूपा॥ जय जगदीश हरे
माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद्-भर्ता।
विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥ जय जगदीश हरे
साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।
केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥ जय जगदीश हरे
राम-कृष्ण करुणामय, प्रेमामृत-सागर।
मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥ जय जगदीश हरे
सब विधि-हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।
प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन मन॥ जय जगदीश हरे
आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।
पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥ जय जगदीश हरे

Saturday, 6 October 2018

दुर्गा मां, तू है नवरूपा

दुर्गा मां, तू है नवरूपा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार दुर्गा अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी। तब दुर्गा का नाम ‘सती’ था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं को भाग लेने हेतु आमंत्रण भेजा, किंतु भगवान शंकर को आमंत्रण नहीं भेजा। परिणाम क्या हुआ, पढिए इस लेख में ‘सती’ के पिता का यज्ञ देखने, वहां जा कर माता और बहनों से मिलने का प्रबल आग्रह देख कर भगवान शंकर ने, उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। ‘सती’ ने पिता के घर पहुंच कर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है। उन्होंने देखा कि वहां भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। पिता दक्ष ने भी भगवान के प्रति अपमानजनक वचन कहे। यह सब देख कर ‘सती’ का मन ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। वह अपने पति का अपमान न सह सकीं और उन्होंने अपने आपको यज्ञ में जला कर भस्म कर लिया। अगले जन्म में सती ने नव दुर्गा के रूप धारण कर के जन्म लिया, जिनके नाम हैं: 1. शैलपुत्री 2. ब्रह्मचारिणी 3. चंद्रघंटा 4. कूष्मांडा 5. स्कंदमाता 6. कात्यायनी 7 कालरात्रि 8. महागौरी 9.सिद्धिदात्री साधक नव रात्रों में दुर्गा के इन्हीं नौ स्वरूपों को पूजते हैं और मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। शैलपुत्री: प्रथम नव रात्रि को शैलपुत्री माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र वंदे वान्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्। शैल पुत्री दुर्गा का महत्व और उनकी शक्ति अनंत हैं। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के, तांबे का शैलपुत्री माता का चित्रयुक्त बीसा यंत्र भक्तों में बांटें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। ब्रह्मचारिणी: द्वितीय नव रात्रि को ब्रह्मचारिणी माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु!। देवी प्रसीदतु मणि ब्रह्मचारिणी यनुत्तमा।। मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप उनके भक्तों को अनंत फल देने वाला है। नव दुर्गा पूजन में दूसरे दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान’ चक्र मे स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी इनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के, तांबे का ब्रह्मचारिणी माता का चित्र, बीसा यंत्रसहित, देवी भक्तों में बांटंे, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। चंद्रघंटा: तृतीय नव रात्रि को चंद्रघंटा माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र: पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युुता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता।। नव दुर्गा पूजन के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा के शरणागत हो कर उपासना, आराधना में तत्पर हों, तो, समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त हो कर, सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के, चंद्रघंटा माता का तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। कूष्मांडा: चतुर्थ नव रात्रि को कूष्मांडा माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र: सूरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधानां हस्तपदमयां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे। नव दुर्गा पूजन के चैथे दिन मां दुर्गा के चैथे स्वरूप कूष्मांडा की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘अनाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। कूष्मांडा देवी का ध्यान करने से अपनी लौकिक-पारलौकिक उन्नति चाहने वालों पर इनकी विशेष कृपा होती है। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर क,े कूष्मांडा माता का तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। स्कंदमाता: पंचम नव रात्रि को स्कंद माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र सिंहासनागता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी। नव दुर्गा पूजन के पांचवे दिन मां दुर्गा के पांचवंे स्वरूप-स्कंदमाता की उपासना करनी चाहिए। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। स्कंदमाता का ध्यान करने से साधक, इस भव सागर के दुःखों से मुक्त हो कर, मोक्ष को प्राप्त करता है। उपर्युक्त मंत्र का शुद्ध उच्चारण क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के स्कंदमाता का तांबे का चित्र, बीसा यंत्रयुक्त, देवी भक्तों में वितरण करें, तो अधिक लाभ प्राप्त होता है। कात्यायनी: षष्ठ नव रात्रि को कात्यायनी माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र: चंद्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवर वाहना।। कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनि। नव दुर्गा पूजन के छठे दिन दुर्गा के छठे स्वरूप कात्यायनी माता की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। कात्यायनी माता के द्वारा बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के, कात्यायनी माता का तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। कालरात्रि: सप्तम नवरात्रि को कालरात्रि माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र: एकवेणी जपाकिर्णपूरा नग्ना खरास्थित। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी।। वाम पादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रि भर्यङ्करी।। नव दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवंे स्वरूप कालरात्रि की उपासना का विधान है। उस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। कालरात्रि माता का ध्यान करने वाले साधक को इनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर दुर्गा जी की आरती कर के, कालरात्रि माता का तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। महागौरी: अष्टम नव रात्रि को महागौरी माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्त्रमहादेवप्रमोददा।। नव दुर्गा पूजन के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की उपासना करनी चाहिए। महागौरी माता का ध्यान करने वाले साधक के लिए असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें। फिर अंबा जी की आरती कर के, महागौरी माता का तांबे का चित्रयुक्त बीसा यंत्र देवी भक्तों में वितरण करें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता है। सिद्धिदात्री: नवम नव रात्रि को सिद्धि दात्री माता की पूजा की जाती है। वंदना मंत्र: सिद्धगन्धर्वयज्ञद्यैर सुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धि दायिनी।। नवदुर्गा पूजन के नौवें दिन साधक मां दुर्गा के नौवंे स्वरूप सिद्धिदात्री की उपासना करते हैं। सिद्धिदात्री माता का ध्यान करने वाले साधक को इनकी उपासना से इस संसार की वास्तविकता का बोध होता है। वास्तविकता परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाली होती है। साधकों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। उपर्युक्त मंत्र का जप शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल की माला से 1 माला (108 बार) करें तथा अंबा जी की आरती करने के बाद, कालरात्रि माता का तांबें का चित्रयुक्त बीसा यंत्र सभी देवी भक्तों में बांटें, तो और भी अधिक लाभ प्राप्त कूष्मांडा स्कंदमाता कात्यायनी होता है।!!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557


Friday, 5 October 2018

बृहस्पतिवार) गुरुवार की पौराणिक व्रत कथा

बृहस्पतिवार) गुरुवार की पौराणिक व्रत कथा
बृहस्पति देवता प्रसन्न होते हैं।  https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5    यह व्रत अत्यंत फलदायी है। अग्निपुराण के अनुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से आरंभ करके 7 गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की हर पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
बृहस्पतिवार व्रत कथा: प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी।
एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती।
बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।
तब बृहस्पतिदेव बोले "यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।
व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले "हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?"
तब व्यापारी बोला "हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।" इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले "देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।
साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला "महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।" इस पर साधु जी बोले तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।"
उसने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया।
अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे।
बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली "मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।" इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो।
बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली "भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।"
वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को "राम नाम सत्य है" कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली "मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।" अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया।
पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी।
उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे "देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।"
जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला। चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले "हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।"
दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए। !!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557

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