Tuesday, 19 February 2019

श्री हनुमान चालीसा में महाबली हनुमानजी के 109

श्री हनुमान चालीसा में महाबली हनुमानजी के 109 नामों का उल्लेख श्री गोस्वामीजी ने बड़ी चतुराई के साथ किया है। 
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हनुमान चालीसा के 109 नाम हैं श्री हनुमान चालीसा में (गुप्त रूप) से 
वर्णित 109 नामावली 
1. हनुमान- विशाल टेढ़ी ठुड्डी वाले।
2. ज्ञानसागर - ज्ञान के अथाह सागर।
3.गुण सागर - गुणों के अथाह सागर।
4. कपीश - वानरों के राजा।
5. तीनों लोकों को उजागर करने वाले।
6. श्री बाबा रामचन्द्रजी के दूत बनने वाले।
7. अतुल बलशाली।
8. माता अंजनी के पुत्र कहलाने वाले।
9. पवन (वायुदेव) के पुत्र कहलाने वाले।
10. वीरों के वीर कहलाने वाले महावीर
11. विक्रम - विशेष पराक्रमी।
12. बजरंगी - वज्र के समान अंग वाले।
13. सभी प्रकार की कुमति का निवारण करने वाले।
14.सभी प्रकार की सुमति प्रदान करने वाले।
15. कंचन वर्ण- स्वर्ण के समान वेश धारण करने वाले।
16. सुवेशा - भली प्रकार से वेश धारण करने वाले।
17. कानों में कुण्डल धारण करने वाले।
18. कुंचीत केशा- घुंघराले बाल वाले।
19. हाथ में गदा धारण करने वाले।
20. हाथ में ध्वजा धारण करने वाले।
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21. कांधे मुन्ज : कंधे पर मुन्ज जनेऊ धारण करने वाले।
22. परमात्मा : शिवशंकर के अवतारी।
23. वानरराज केशरी सुपुत्र।
24. तेज प्रताप धारण करने वाले।
25. महाजग वंदन : सारे विश्व से पुजित।
26. विद्यावान : सारी विद्याओं में पारंगत।
27. गुणी : सर्वगुण संपन्न।
28. अति चातुर : अत्यंत कार्यकुशल।
29. श्रीराम के कार्य हेतु सदा आतुर रहने वाले।
30. श्रीराम चरित्र सुनने में आनंद रस लेने वाले।
31.श्री राजा रामजी के हृदय में बसने वाले।
32. लक्ष्मणजी के हृदय में बसने वाले।
33. श्री सीताजी के हृदय में बसने वाले।
34. अति लघुरूप धारण करने वाले।
35. अति भयंकर रूप धारण करने वाले।
36. लंका दहन करने वाले।
37. भीमकाय (विशाल) रूप धारण करने वाले।
38. असुरों का नाश करने वाले।
39. श्री रामचन्द्रजी के काज संवारने वाले।
40. संजीवनी बूटी लाने वाले।
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41. लक्ष्मणजी के प्राण बचाने वाले।
42. रघुपतिजी का आलिंगन पाने वाले।
43. रघुपतिजी से प्रशंसा पाने वाले।
44.श्री भरतजी के समान प्रेम पाने वाले
45.हजारों मुखों से यशोगान श्रवण करने वाले।
46. सनकादिक ऋषियों, महर्षियों द्वारा।
यशोगान श्रवण करने वाले।
47. मुनियों द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
48. ब्रह्माजी द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
49. देवताओं द्वारा यशोगान करने वाले।
50. नारदजी द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
51. सरस्वती द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
52. शेषनागजी द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
53. यमराजजी द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
54. कुबेरजी द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
55. सब दिशाओं के रक्षकों द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
56. कवियों द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
57. विद्वानों द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
58. पंडितों द्वारा यशोगान श्रवण करने वाले।
59. श्री सुग्रीवजी पर उपकार करने वाले।
60. श्री सुग्रीवजी को रामजी से मिलाने वाले।
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61. श्री सुग्रीवजी को राजपद दिलाने वाले।
62. श्री विभीषणजी को मंत्र प्रदान करने वाले।
63. श्री विभीषणजी को लंकापति बनाने वाले।
64. हजारों योजन तक उड़ने वाले।
65. श्री सूर्यनारायण को फल समझकर निगलने वाले।
66. श्रीराम नाम मुद्रिका मुख में रखने वाले।
67. जलधी (समुद्र) को लांघने वाले।
68. कठिन कार्य को सरल बनाने वाले।
69. श्री रामचन्द्रजी के द्वार के रखवाले।
70 श्री रामचन्द्रजी के दरबार में प्रवेश की आज्ञा प्रदान करने वाले
(श्री रामजी की आज्ञा के बगैर कहीं न जाने वाले)
71. शरणागत को सब सुख प्रदान करने वाले।
72. निज भक्तों को निर्भय (रक्षा) प्रदान करने वाले।
73. अपने वेग को स्वयं ही संभालने वाले।
74. अपनी ही हांक से तीनों लोक
कम्पायमान करने वाले।
75. भूतों के भय से भक्तों को मुक्त करने वाले।
76. पिशाचों के भय से भक्तों को मुक्त करने वाले।
77. महावीर श्रीराम नाम श्रवण करने वाले।
78. भक्तों के सभी रोगों का नाश करने वाले।
79. भक्तों की सभी पीड़ाओं का नाश करने वाले।
80. मन से ध्यान करने वालों के संकट से छुड़ाने वाले।
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81. कर्म से ध्यान करने वालों को संकट से छुड़ाने वाले।
82. वचन से ध्यान करने वालों के संकट से छुड़ाने वाले।
83. तपस्वी राजा रामजी के कार्य को सहज करने वाले।
84. भक्तों के मनोरथ (कामनाएं) पूर्ण करने वाले।
85. भक्तों को जीवन फल (रामभक्ति) प्रदान करने वाले।
86.चारों युगों में अपना यश (प्रताप) फैलाने वाले।
87. कीर्ति को सर्वत्र फैलाने वाले।
88. जगत में ज्ञान का उजियारा करने वाले।
89. सज्जनों की रक्षा करने वाले।
90. दुष्टों का नाश करने वाले।
91. श्रीरामजी का असीम प्रेम पाने वाले।
92. अष्ट सिद्धि प्रदान करने वाले।
93. नवनिधि प्रदान करने वाले।
94. माता सीताजी से वरदान पाने वाले।
95. रामनाम औषधि रखने वाले।
96. श्री रघुपतिजी के दास कहलाने वाले।
97. अपने भजन से रामजी की प्राप्ति कराने वाले।
98. जन्म-जन्मांतर के दुख दूर करने वाले।
99. अंतकाल में राम दरबार में पहुंचाने वाले।
100. निज भक्तों को श्रीराम भक्त बनाने वाले।
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101. अपने सेवकों को सब सुख प्रदान करने वाले।
102. अपने सेवकों के संकट मिटाने वाले।
103. अपने सेवकों की सब पीड़ा मिटाने वाले।
104. श्री हनुमानजी बलियों के वीर।
105. श्री सद्गुरुदेव स्वरूप श्री हनुमानजी।
106. अपने भक्तों को बंधनों से छुड़ाने वाले।
107. अपने भक्तों को महासुख प्रदान करने वाले।
108. नित्य पाठ करने वालों को सिद्धियों की साक्षी करवाने वाले।
109. श्री तुलसीदासजी के हृदय में निवास करने वाले।
जय जय जय श्री राम!
आपका सेवक।!!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557
सच्चे मन से जो कोई गावे, उसका बेरा पार है
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माघी पूर्णिमा माघ महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा

माघी पूर्णिमा माघ महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा । 
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ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस संबंध में बताया गया है कि माघी पूर्णिमा पर भगवान विष्णु गंगाजल में निवास करते हैं। इसलिए इस दिन गंगा नदी में स्नान करना चाहिए, अगर ऐसा न हो सके तो घर में ही पानी में गंगाजल डालकर नहा लेना चाहिए। इसके अलावा गंगाजल का आचमन यानी हथेली में थोड़ा सा गंगाजल पी लेने से भी पुण्य मिलता है। माघी पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करना चाहिए। इससे हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।
माघी पूर्णिमा की सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें। फिर पितरों का श्राद्ध कर गरीबों को भोजन, वस्त्र, तिल, कंबल, कपास, गुड़, घी, जूते, फल, अन्न आदि का दान करें।
इस दिन सोने एवं चांदी का दान भी किया जाता है। गौ दान का विशेष फल प्राप्त होता है। इसी दिन संयमपूर्वक आचरण कर व्रत करें। दिन भर कुछ खाए नहीं। संभव न हो तो एक समय फलाहार कर सकते हैं।
इस दिन ज्यादा जोर से बोलना या किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए। गृह क्लेश से बचना चाहिए। गरीबों एवं जरुरतमंदों की सहायता करनी चाहिए।
इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके द्वारा या आपके मन, वचन या कर्म के माध्यम से किसी का अपमान न हो। इस प्रकार संयमपूर्वक व्रत करने से व्रती को पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

इसलिए खास है ये तिथि,,,,मान्यता है कि माघी पूर्णिमा पर देवता भी रूप बदलकर गंगा स्नान के लिए प्रयाग आते हैं। इसलिए इस तिथि का विशेष महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है।
जो श्रद्धालु तीर्थराज प्रयाग में एक मास तक कल्पवास करते हैं। माघी पूर्णिमा पर उनके व्रत का समापन होता है।

सभी कल्पवासी माघी पूर्णिमा पर माता गंगा की आरती पूजन करके साधु संन्यासियों और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। बची हुई सामग्री का दान कर देवी गंगा से फिर बुलाने का निवेदन कर अपने घर जाते हैं।
कहते हैं कि माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से रोग दूर होते हैं। इस दिन तिल और कंबल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।

धार्मिक मान्यता,,,माघ माह के बारे में कहते हैं कि इन दिनों देवता पृथ्वी पर आते हैं। प्रयाग में स्नान-दान आदि करते हैं। सूर्य मकर राशि में आ जाता है। देवता मनुष्य रूप धारण करके भजन-सत्संग आदि करते हैं। माघ पूर्णिमा के दिन सभी देवी-देवता अंतिम बार स्नान करके अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं। नतीजतन इसी दिन से संगम तट पर गंगा, यमुना एवं सरस्वती की जलराशियों का स्तर कम होने लगता है। मान्यता है कि इस दिन अनेकों तीर्थ, नदी-समुद्र आदि में प्रातः स्नान, सूर्य अर्घ्य, जप-तप, दान आदि से सभी दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्र कहते हैं कि यदि माघ पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र हो तो इस दिन का पुण्य अक्षुण हो जाता है।

पौराणिक प्रसंग,,,शास्त्रों में एक प्रसंग है कि भरत ने कौशल्या से कहा कि 'यदि राम को वन भेजे जाने में उनकी किंचितमात्र भी सम्मति रही हो तो वैशाख, कार्तिक और माघ पूर्णिमा के स्नान सुख से वो वंचित रहें। उन्हें निम्न गति प्राप्त हो।' यह सुनते ही कौशल्या ने भरत को गले से लगा लिया।" इस तथ्य से ही इन अक्षुण पुण्यदायक पर्व का लाभ उठाने का महत्त्व पता चलता है।

संक्षिप्त कथा,,,माघ माह की पूर्णिमा को 'बत्तीस पूर्णिमा' भी कहते हैं। पुत्र और सौभाग्य को प्राप्त करने के लिए मध्याह्न में शिवोपासना की जाती है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार- "कांतिका नगरी में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह नि:संतान था। बहुत उपाय किया, लेकिन उसकी पत्नी रूपमती से कोई संतान नहीं हुई। ब्राह्मण दान आदि मांगने भी जाता था। एक व्यक्ति ने ब्राह्मण दंपत्ति को दान देने से इसलिए मना कर दिया कि वह नि:संतान दंपत्ति को दान नहीं करता है। लेकिन उसने उस नि:संतान दंपत्ति को एक सलाह दी कि चंद्रिका देवी की वे आराधना करें। इसके पश्चात् ब्राह्मण दंपत्ति ने माँ काली की घनघोर आराधना की। 16 दिन उपवास करने के पश्चात् माँ काली प्रकट हुईं। माँ बोलीं कि "तुमको संतान की प्राप्ति अवश्य होगी। अपनी शक्ति के अनुसार आटे से बना दीप जलाओं और उसमें एक-एक दीप की वृद्धि करते रहना। यह कर्क पूर्णिमा के दिन तक 22 दीपों को जलाने की हो जानी चाहिए।" देवी के कथनानुसार ब्राह्मण ने आम के वृक्ष से एक आम तोड़ कर पूजन हेतु अपनी पत्नी को दे दिया। पत्नी इसके बाद गर्भवती हो गयी। देवी के आशीर्वाद से देवदास नाम का पुत्र पैदा हुआ। देवदास पढ़ने के लिए काशी गया, उसका मामा भी साथ गया। रास्ते में घटना हुई। प्रपंचवश उसे विवाह करना पड़ा। देवदास ने जबकि साफ-साफ बता दिया था कि वह अल्पायु है, लेकिन विधि के चक्र के चलते उसे मजबूरन विवाह करना पड़ा। उधर, काशी में एक रात उसे दबोचने के लिए काल आया, लेकिन व्रत के प्रताप से देवदास जीवित हो गया।
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ललिता जयंती

माँ ललिता दस महाविद्याओं में से एक हैं.
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 ललिता जयंती का व्रत भक्तजनों के लिए बहुत ही फलदायक होता है. ऐसी मान्यता है कि यदि कोई इस दिन मां ललिता देवी की पूजा भक्ति-भाव सहित करता है तो उसे देवी मां की कृपा अवश्य प्राप्त होती है और जीवन में हमेशा सुख शांति एवं समृद्धि बनी रहती है।
श्री ललिता जयंती कथा
देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण में प्राप्त होता है. जिसके अनुसार पिता दक्ष द्वारा अपमान से आहत होकर जब दक्ष पुत्री सती ने अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये तो सती के वियोग में भगवान शिव उनका पार्थिव शव अपने कंधों में उठाए चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं. इस महाविपत्ति को यह देख भगवान विष्णु चक्र द्वारा सती के शव के 108 भागों में विभाजित कर देते हैं. इस प्रकार शव के टूकडे़ होने पर सती के शव के अंश जहां गिरे वहीं शक्तिपीठ की स्थापना हुई. उसी में एक माँ ललिता का स्थान भी है. भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा.
एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोडे गये चक्र से पाताल समाप्त होने लगा. इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है. तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं. उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं. सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है.
श्री ललिता जयंती महत्व
मां ललिता देवी मंदिर में हमेशा ही भक्तों का तांता लगा रहता है, परन्तु जयंती के अवसर पर मां की पूजा-आराधना का कुछ विशेष ही महत्व होता है.
यह पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है. पौराणिक मान्यतानुसार इस दिन देवी ललिता भांडा नामक राक्षस को मारने के लिए अवतार लेती हैं. राक्षस भांडा कामदेव के शरीर के राख से उत्पन्न होता है. इस दिन भक्तगण षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते है. इस दिन मां ललिता के साथ साथ स्कंदमाता और शिव शंकर की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है.
श्री ललिता पूजा
देवी ललिता जी का ध्यान रुप बहुत ही उज्जवल व प्रकाश मान है.
माँ की पूजा तीन स्वरूपों में होती है
1. बाल सुंदरी 8 वर्षीया कन्या रूप में
2. षोडशी त्रिपुर सुंदरी - 16 वर्षीया सुंदरी
3. ललिता त्रिपुर सुंदरी- युवा स्वरूप
माँ की दीक्षा और साधना भी इसी क्रम में करनी चाहिए। ऐसा देखा गया है की सीधे ललिता स्वरूप की साधना करने पर साधक को शुरू में कई बार आर्थिक संकट भी आते हैं और फिर धीरे धीरे साधना बढ़ने पर लाभ होता है।
बृहन्नीला तंत्र के अनुसार काली के दो भेद कहे गए हैं कृष्ण वर्ण और रक्त वर्ण।
कृष्ण वर्ण काली दक्षिणकालिका स्वरुप है और
रक्त वर्ण त्रिपुर सुंदरी स्वरुप।
अर्थात माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी रक्त काली स्वरूपा हैं।
महा विद्याओं में कोई स्वरुप भोग देने में प्रधान है तो कोई स्वरूप मोक्ष देने में परंतु त्रिपुरसुंदरी अपने साधक को दोनों ही देती हैं।
शुक्ल पक्ष के समय प्रात:काल माता की पूजा उपासना करनी चाहिए. कालिकापुराण के अनुसार देवी की दो भुजाएं हैं, यह गौर वर्ण की, रक्तिम कमल पर विराजित हैं.
ललिता देवी की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है. दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है. इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है।
ये श्री यंत्र की मूल अधिष्ठात्री देवी हैं। आज श्री यंत्र को पंचामृत से स्नान करवा कर यथोचित पूजन और ललिता सहस्त्रनाम, ललिता त्रिशति ललितोपाख्यान और श्री सूक्त का पाठ करें।
ध्यान,,,बालार्क युत तैजसं त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लसिनीं।
नानालंकृतिराजमानवपुषं बालोडुराट शेखराम्।।
हस्तैरिक्षु धनुः सृणि सुमशरं पाशं मुदा विभ्रतीं।
श्री चक्र स्थितःसुन्दरीं त्रिजगतधारभूतां भजे।।
मन्त्र... ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः।
इस ध्यान मन्त्र से माँ को रक्त पुष्प , वस्त्र आदि चढ़ाकर अधिकाधिक जप करें। आपकी आर्थिक भौतिक समस्याएं समाप्त होंगी।
माँ ललिताम्बा सबका कल्याण करें।
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गुरू रविदास (रैदास)

गुरू रविदास (रैदास) जी का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को को हुआ था।उनके जन्म के बारे में एक दोहा प्रचलित है । https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास । दुखियों के कल्याण हित प्रगटे स्री रविदास।
उनके पिता रघ्घू या राघवदास तथा माता का नाम घुरबिनिया था। उनकी पत्नी लोना एवं एक पुत्र विजयदास हुए।उनकी एक पुत्री रविदासिनी थी।
बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। वे जूते बनाने का काम कभी नहीं किया औऱ न ही कभी उनका ये व्यवसाय था और उन्होंने अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।
उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।प्रारम्भ से ही रविदा स जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रविदास जी पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।
स्वभाव,,,,उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु । गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।
वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद कतेब, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
चारो वेद के करे खंडौती । जन रैदास करे दंडौती।।
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे।
उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की। सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
रैदास जी के ४० पद गुरु ग्रन्थ साहब में मिलते हैं जिसका सम्पादन गुरु अर्जुन सिंह देव ने १६ वीं सदी में किया था ।
रैदास के पद,,,अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै ‘रैदासा’॥
दोहे,,,,जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
मन चंगा तो कठौती में गंगा ||
ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीनपूजिए चरण चंडाल के जो होवे गुण प्रवीन
बाभन कहत वेद के जाये, पढ़त लिखत कछु समुझ न आवत ।
मन ही पूजा मन ही धूप ,मन ही सेऊँ सहज सरूप।
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Wednesday, 9 January 2019

श्री दत्तात्रेय उपासना ,,भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है  
,और तीनो ईश्वरीय शक्तियो से समाहित महाराज दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफ़ल और जल्दी से फ़ल देने वाली है,महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी,अवधूत,और दिगम्बर रहे थे,वे सर्वव्यापी है,और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले है,अगर मानसिक,या कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जावे तो भक्त किसी भी कठिनाई से बहुत जल्दी दूर हो जाते है।
उपासना विधि
श्री दत्तात्रेय जी की प्रतिमा,चित्र या यंत्र को लाकर लाल कपडे पर स्थापित करने के बाद चन्दन लगाकर,फ़ूल चढाकर,धूप की धूनी देकर,नैवेद्य चढाकर दीपक से आरती उतारकर पूजा की जाती है,पूजा के समय में उनके लिये पहले स्तोत्र को ध्यान से पढा जाता है,फ़िर मन्त्र का जाप किया आता है,उनकी उपासना तुरत प्रभावी हो जाती है,और शीघ्र ही साधक को उनकी उपस्थिति का आभास होने लगता है,साधकों को उनकी उपस्थिति का आभास सुगन्ध के द्वारा,दिव्य प्रकाश के द्वारा,या साक्षात उनके दर्शन से होता है,साधना के समय अचानक स्फ़ूर्ति आना भी उनकी उपस्थिति का आभास देती है,भगवान दत्तात्रेय बडे दयालो और आशुतोष है,वे कहीं भी कभी भी किसी भी भक्त को उनको पुकारने पर सहायता के लिये अपनी शक्ति को भेजते है.

श्री दत्तात्रेय की उपासना में विनियोग विधि
पूजा करने के आरम्भ में भगवान श्री दत्तात्रेय के लिय आवाहन किया जाता है,एक साफ़ बर्तन में पानी लेकर पास में रखना चाहिये,बायें हाथ में एक फ़ूल और चावल के दाने लेकर इस प्रकार से विनियोग करना चाहिये- "ऊँ अस्य श्री दत्तात्रेय स्तोत्र मंत्रस्य भगवान नारद ऋषि: अनुष्टुप छन्द:,श्री दत्त परमात्मा देवता:, श्री दत्त प्रीत्यर्थे जपे विनोयोग:",इतना कहकर दाहिने हाथ से फ़ूल और चावल लेकर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा,चित्र या यंत्र पर सिर को झुकाकर चढाने चाहिये,फ़ूल और चावल को चढाने के बाद हाथों को पानी से साफ़ कर लेना चाहिये,और दोनों हाथों को जोडकर प्रणाम मुद्रा में उनके लिये जप स्तुति को करना चाहिये,जप स्तुति इस प्रकार से है। जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम। सर्व रोग हरं देव,दत्तात्रेयमहं भज॥"

श्री दत्तात्रेयजी का जाप करने वाला मंत्र
पूजा करने में फ़ूल और नैवेद्य चढाने के बाद आरती करनी चाहिये और आरती करने के समय यह स्तोत्र पढना चाहिये:-
जगदुत्पति कर्त्रै च स्थिति संहार हेतवे। भव पाश विमुक्ताय दत्तात्रेय नमो॓‍ऽस्तुते॥
जराजन्म विनाशाय देह शुद्धि कराय च। दिगम्बर दयामूर्ति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
कर्पूरकान्ति देहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च। वेदशास्त्रं परिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ह्रस्व दीर्घ कृशस्थूलं नामगोत्रा विवर्जित। पंचभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
यज्ञभोक्त्रे च यज्ञाय यशरूपाय तथा च वै। यज्ञ प्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णु: अन्ते देव: सदाशिव:। मूर्तिमय स्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भोगलयाय भोगाय भोग योग्याय धारिणे। जितेन्द्रिय जितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूप धराय च। सदोदित प्रब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
जम्बूद्वीपे महाक्षेत्रे मातापुर निवासिने। जयमान सता देवं दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भिक्षाटनं गृहे ग्रामं पात्रं हेममयं करे। नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वक्त्रो चाकाश भूतले। प्रज्ञानधन बोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
अवधूत सदानन्द परब्रह्म स्वरूपिणे। विदेह देह रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
सत्यरूप सदाचार सत्यधर्म परायण। सत्याश्रम परोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शूल हस्ताय गदापाणे वनमाला सुकंधर। यज्ञसूत्रधर ब्रह्मान दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
क्षराक्षरस्वरूपाय परात्पर पराय च। दत्तमुक्ति परस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे। गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शत्रु नाश करं स्तोत्रं ज्ञान विज्ञान दायकम।सर्वपाप शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥

इस स्तोत्र को पढने के बाद एक सौ आठबार "ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां " का जाप मानसिक रूप से करना चाहिये.इसके बाद दस माला का जाप नित्य इस मंत्र से करना चाहिये " ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा"।

दत्त स्वरूप चिंता
ब्रह्मा विष्णु और महेश की आभा में दत्तात्रेय जी का ध्यान सदा कल्याण कारी माना जाता है। गुरु दत्त के रूप में ब्रह्मा दत्त के रूप में विष्णु और शिवदत्त के रूप में भगवान शिव की आराधना करनी अति उत्तम रहती है। काशी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था,उसने स्वप्न में देखा कि भगवान शिव के तीन सिर है,और तीनों सिरों से वे बात कर रहे है,एक सिर कुछ कह रहा है दूसरा सिर उसे सुन रहा है और तीसरा सिर उस कही हुयी बात को चारों तरफ़ प्रसारित कर रहा है,जब उसने मनीषियों से इस बात का जिक्र किया तो उन्होने भगवान दत्तात्रेय जी के बारे में उसे बताया। दत्तात्रेयजी का कहीं भी प्रकट होना भी माना जाता है,उनके उपासक गुरु के रूप में उन्हे मानते है,स्वामी समर्थ आदि कितने ही गुरु के अनुगामी साधक इस धरती पर पैदा हुये और अपनी अपनी भक्ति से भगवान दत्तात्रेय जी के प्रति अपनी अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद अपने अपने धाम को चले गये है।

दत्तात्रेय की गाथा
एक बार वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्णव्यवस्था का लोप हो गया था। उस समय दत्तात्रेय ने इन सबका पुनरूद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किये थे:

1. बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, अदोषदर्शी तथा सहस्त्र भुजाओं वाला बनने का
2. जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का।
3. देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का तथा
4. इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।
,, कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा दत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया। कार्तवीर्य अर्जुन, पुण्यात्मा, प्रजा का रक्षक तथा पालक था। जब वह समुद्र में चलता था तब उसके कपड़े भीगते नहीं थे। उत्तरोत्तर वीरता के प्रमाद से उसका पतन हुआ तथा उसका संहार परशुराम-रूपी अवतार ने किया।
,,कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने का अवसर आया तो अर्जुन ने राज्यभार ग्रहण करने के प्रति उदासीनता व्यक्त की। उसने कहा कि प्रजा का हर व्यक्ति अपनी आय का बारहवां भाग इसलिए राजा को देता है कि राजा उसकी सुरक्षा करे। किंतु अनेक बार उसे अपनी सुरक्षा के लिए और उपायों का प्रयोग भी करना पड़ता हैं, अत: राजा का नरक में जाना अवश्यंभावी हो जाता है। ऐसे राज्य को ग्रहण करने से क्या लाभ? उनकी बात सुनकर गर्ग मुनि ने कहा-'तुम्हें दत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।
, एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गये। बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेजा। वे लक्ष्मी (अपनी पत्नी) सहित आश्रम में विराजमान थे। उन्होंने दानवों को वहां जाने के लिए कहा। देवताओं ने दानवों को युद्ध के लिए ललकारा, फिर दत्तात्रेय के आश्रम में शरण ली। जब दैत्य आश्रम में पहुंचे तो लक्ष्मी का सौंदर्य देखकर आसक्त हो गये। युद्ध की बात भुलाकर वे लोग लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर अपने मस्तक से उनका वहन करते हुए चल दिये। पर नारी का स्पर्श करने के कारण उनका तेज नष्ट हो गया। दत्तात्रेय की प्रेरणा से देवताओं ने युद्ध करके उन्हें हरा दिया। दत्तात्रेय की पत्नी, लक्ष्मी पुन: उनके पास पहुंच गयी।' अर्जुन ने उनके प्रभाव विषयक कथा सुनी तो दत्तात्रेय के आश्रम में गये। अपनी सेवा से प्रसन्न कर उन्होंने अनेक वर प्राप्त किये। मुख्य रूप से उन्होंने प्रजा का न्यायपूर्वक पालन तथा युद्धक्षेत्र में एक सहस्त्र हाथ मांगे। साथ ही यह वर भी प्राप्त किया कि कुमार्ग पर चलते ही उन्हें सदैव कोई उपदेशक मिलेगा। तदनंतर अर्जुन का राज्याभिषेक हुआ तथा उसने चिरकाल तक न्यायपूर्वक राज्य-कार्य संपन्न किया।!ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा"। 
Gyanchand Bundiwal.
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Monday, 31 December 2018

रत्न भगाएं रोग रत्न,,कई बीमारियों को नष्ट हैं

रत्न भगाएं रोग रत्न,,कई बीमारियों को नष्ट हैं ,   
https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
,,रोगोपचार में भी इनका महत्व है क्योंकि रत्न भी उन्हीं तत्वों और यौगिकों के सम्मिश्रण से बने हैं जिनसे मानव देह और ब्रह्मांड। अपने यौगिकों के अनुसार ही इन रत्नों का रंग होता है। अपनी आकर्षण एवं विकर्षण शक्तियों के द्वारा शरीर में विभिन्न तत्वों का संतुलन बनाए रखने में ये सक्षम होते हैं तथा जिस तत्व (दोष या मल) की वृद्धि से शरीर में विकृति (रोग) उत्पन्न हुई हो उसे नियंत्रित करते हैं। रत्न धारण से स्वास्थ्य लाभ और रोगोपचार तो होता ही है, आयुर्वेद में भी विभिन्न रत्नों की भस्म आदि के द्वारा रोगी का उपचार होता है। रत्न धारण में रत्नों के द्वारा विभिन्न रंगों की बह्मांडीय ग्रह रश्मियों, किरणों को शरीर में प्रविष्ट कराकर विसर्जित किया जाता है, क्योंकि रत्न इसके सशक्त माध्यम हैं। विद्वानों ने विभिन्न रत्नों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है और किस रत्न से किस रोग की शांति होती है इस पर व्यापक अनुसंधान किया है। माणिक्य, पद्मराग या याकूत: यह सूर्य का रत्न है। वैसे तो सूर्य में सातों रंग हैं, लेकिन लाल रंग मुख्य है। इसीलिए नंगे वदन सूर्य स्नान (प्रातः काल) स्वास्थ्यवर्द्धक माना गया है। माणिक्य शरीर में सभी धातुओं को पुष्ट कर उसे स्वस्थ रखता है, जीवनी शक्ति बढ़ा कर दीर्घायु प्रदान करता है। रक्त को बढ़ाने वाला और आत्मशक्ति तथा आत्मविश्वासदायक है। हृदय रोग, विशेषकर उच्च रक्तचाप, में माणिक्य धारण करना अत्यंत लाभकारी है। नेत्र दोष में भी, यदि गर्मी से बढ़ता हो, तो लाभकारी है। यह साहस बढ़ाता है। आयुर्वेद के अनुसार नपुंसकता, धातुक्षीणता, हृदयरोग, मन्दाग्नि, क्षय, जननेन्द्रिय की शिथिलता, रक्ताल्पता, तथा पांडुरोग (पीलिया) में विशेष लाभदायक है तथा बल-वीर्यवर्धक है। रक्ताल्पता की महौषधि है। नाड़ी की गति बढ़ाता है और शरीर को रोग से लड़ने की शक्ति देता है। मोती, मुक्ता या मोतिया: इसका मुख्य कार्य मन तथा मस्तिष्क को नियंत्रित करना है, अतः यह मन और मस्तिष्क के रोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। नेत्र दोष में भी (यदि शीत से रोग बढ़ता हो) यह विशेष लाभकारी है। मूच्र्छा, मिरगी, दंतरोग, पायरिया, हृदय रोग, कम्पवायु, श्वास रोग, कफज रोग, क्षय, खांसी इत्यादि में विशेष लाभदायक है। यह वीर्यवर्द्धक है तथा मूत्रदोष में भी लाभकारक है। यह कैल्शियम को बढ़ाता है।

चंद्रमा ,,,के समान ही शीतलता और शांतिदायक है। मूंगा, प्रवाल या मिरजान: इस का मुख्य कार्य रक्त दोष निवारण है। दूषित रक्त को शुद्ध करना, विष को दूर करना, घाव, चोट, फोड़ा-फुंसी आदि के क्षत चिह्नों को शीघ्र पूरा करना, रक्त स्राव को नियंत्रित करना, गर्भ स्राव को रोकना, मासिक धर्म को नियमित करना, आदि इसके मुख्य कार्य हैं। कैंसर तथा रक्त कैंसर में यह विशेष प्रभावकारी है। शरीर की कांति को बढ़ाता है और भूख जगाता है। आयुर्वेद के अनुसार विषम ज्वर (मलेरिया) में यह ताप को शांत करता है। कफ विकार, पित्त विकार, दाह, उन्माद, भूतबाधा, रक्तचाप, हृदय रोग, नेत्र विकार, क्षय, कुक्कुरखांसी, चेचक, खसरा आदि से बचाव में विशेष लाभकारी है। वर्ण चिकित्सा पद्धति के अनुसार सिंदूरी रंग अर्थात देशी मूंगा गुर्दे तथा कर्मेंद्रिय को उत्तेजित करता है जबकि नारंगी रंग रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। ऐंठन, जकड़न में लाभदायक है। कैल्शियम चयापचय में अभिवृद्धि तथा फेफड़े, अग्न्याशय (पैंक्रियाज) एवं प्लीहा को सशक्त बनाता है। नाड़ी की गति बढ़ाता है किंतु रक्त चाप को नियंत्रित रखता है। पन्ना, मरकत, ताक्ष्र्य, मारूत्मत या जमूरन: पन्ने के तत्व शरीर में बढ़ जाने से पिट्युइटरी ग्रंथि और मांसपेशियों पर कुप्रभाव पड़ता है। पन्ना हृदय में उत्तम और शुद्ध भावनाओं को जन्म देता है। मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाना और रक्त धमनियों का विस्तार इसका मुख्य कार्य है। त्वचा, मांस, बालों, नसों, हड्डियों पर इस का विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है और इन्हें पुष्ट कर के शरीर को शक्तिशाली बनाने में सहायक होता है। इसके साथ ही त्वचा रोग (चर्मरोग), नसों के दोष, हड्डी के रोग, मांस के विकार (कुष्ठ), बालों के गिरने, टूटने, सफेद होने आदि से बचाव में लाभकारी है। फिरोजी रंग का पन्ना अथवा फिरोजा त्वचा में होने वाले किसी भी रोग से बचाव में लाभकारी है। साइनुसाइटिस के उपचार में उपयोगी है।

पन्ना,,,, पित्त रोग से बचाव में भी लाभकारी है। आयुर्वेद के अनुसार यह सन्निपात ज्वर, विषविकार, वमन, प्यास, अम्लपित्त, पांडु, मलावरोध, शोथ, मंदाग्नि, हृदय रोग, स्मरणशक्ति की कमी आदि से मुक्ति में लाभकारी है। गरुड़ महापुराण के अनुसार जो विष किसी औषधि या मंत्र से दूर न हो, वह इससे दूर होता है।
पुखराज या पुष्पराग: यह भी मानसिक रोगों में विशेष रूप से लाभदायक है। बुद्धि तथा विद्या एवं विवेक शक्ति बढ़ाने में यह परम उपयोगी है। मन मस्तिष्क में अकारण एवं निरर्थक उपजने वाले भय, भ्रम, संशय, मोह और -भूत-प्रेत बाधा, जादू-टोना आदि के संशय एवं चिंता से मुक्ति में यह अत्यंत लाभकारी है। यह रत्न यदि हल्के रंग में हो तो मस्तिष्क के सेरिब्रल भाग को अनुप्राणित करने वाला तथा अम्ल, पित्त शामक होता है। गहरे रंग का पुखराज मोटर तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता बढ़ाने, मांसपेशियों को मजबूत बनाने और पाचन संस्थान को नियंत्रित करने में भी लाभकारी होता है। यह मांस बढ़ाने वाला और मांस दोष से मुक्ति में लाभकारक है।

पुखराज ,,की ग्रह रश्मियों (पीली) की वृद्धि होने पर पित्त दोष के बढ़ने, आंतों और पाचन क्रिया की प्रणाली में गड़बड़ी उत्पन्न होने, सन्निपात तथा हृदय रोग (उच्च रक्तचाप) बढ़ने की संभावना होती है। आयुर्वेद के अनुसार पुखराज विषविकार, वमन, कफ, वात, मंदाग्नि, दाह, कुष्ठ, बवासीर में लाभदायक है। कीटाणुनाशक, पित्तवर्धक, जठराग्नि उद्दीपक एवं बुद्धि-वीर्यवर्द्धक है। हीरा, वज्र या अलिमास: हीरे का सर्वाधिक प्रभाव वीर्य, प्रजनन अंगों एवं संबंधित रोगों, स्त्री रोगों (स्वप्नदोष, प्रमेह, प्रसूति, नपुंसकता, मूत्र दोष आदि) पर पड़ता है। रक्त, लार, मज्जा और शुक्र को पुष्ट करने तथा इनसे संबंधित रोगों के निवारण में यह विशेष सहायक है। नेत्र और मस्तिष्क रोगों से मुक्ति में भी लाभदायक है।

हीरे ,,के पुरुष, स्त्री, नपुंसक नाम से भी तीन भेद हैं। बड़े आकार का गोल हीरा पुरुष संज्ञक और उत्तम होता है। षट्कोण का हीरा स्त्री संज्ञक होता है। तिकोना तथा बड़े आकार का हीरा नपुंसक कहलाता है। आयुर्वेद के अनुसार हीरा शरीर को पुष्ट करता है। यह बलवर्धक, कामोत्तेजक और वात, पित्त, कुष्ठ, क्षय, भ्रम, कफ, शोथ, प्रमेह, भगंदर तथा पांडुरोग (पीलिया) से बचाव में लाभदायक है

कुछ विद्वानों के मत से स्त्रियों को पुत्र की कामना से त्रिकोण या सिंघाड़े के आकार का हीरा पहनना चाहिए। कुछ विद्वानों के अनुसार हीरा धारण करने से युद्ध में विजय, शत्रु वशीकरण, तेज में वृद्धि, सुख, विद्या लाभ और संपत्ति आदि लाभ होते है। बिजली का भय नहीं होता, अकाल मृत्यु नहीं होती, जादू टोने का प्रभाव नहीं होता, मिरगी में लाभ होता है। विषैले जीवों का भय कम होता है।

नीलम,,, नीलमणि, दाक्षायण, नीलाविल याकूत: नीलम का मुख्य प्रभाव शरीर के संचालन पर पड़ता है। नीलम के तत्व शरीर में ऐसे कारण है- जिस के कारण ही मानव शरीर के अवयवों को हिलाडुला सकता है एवं शरीर में ऐसी सामथ्र्य रहती है जिस के तत्व की कमी से शरीर अपंग एवं अशक्त हो जाएगा। मिरगी, पक्षाघात, पोलियो, वात, रक्तचाप ,अल्प. से बचाव में यह परम लाभकारी है। यह नेत्र ज्योति भी बढ़ाता है। यह शरीर में चयापचय को बढ़ाता है। मस्तिष्क की उच्चतम स्थिति अर्थात अंतप्र्रज्ञा को जगाता है। त्वचा के जलने में आराम देता है।
जामुनी और बैंगनी रंग का नीलम (व इसका उपरत्न लाजवर्त) रक्त कोशिकाओं के शोधन में और पोटैशियम की मात्रा को संतुलित रखने में सहायक होता है। तीव्र भूख लगने के रोग से बचाव में लाभदायक है। ट्यूमर को रोकने में भी यह सहायक है। आयुर्वेद के अनुसार खांसी (कफ ज्यादा) दमा, मलेरिया सन्निपात, शुक्राणु दोष बवासीर आदि से मुक्ति में भी लाभकारी है।

गोमेद,,, सीलोबी, मेदक या गोमेदकः यह निरर्थक भय, मानसिक तनाव, अशांति और घबराहट से मुक्ति में फायदेमंद है। अकारण भयभीत एवं उद्विग्न रहने वाले लोगों के लिए यह लाभकारी है। पोटैशियम का संतुलन बनाए रखने और ट्यूमर के विकास को रोकने में भी सहायक है। यह पेट के कीड़े, भगंदर, वायुगोला, सूखी खांसी, क्षय, रक्ताल्पता, पीलिया तथा मंदाग्नि में लाभ करता है।

गुर्दा रोग, पथरी, मिरगी और पेट के अल्सर में परम उपयोगी है। लहसुनिया,,, सूत्रमणि, वैदूर्य: यह शत्रुनाशक, अस्त्र-शस्त्र से रक्षा करने वाला और आत्मशक्तिदायक है। इसके धारण से भूत-प्रेत बाधा और जादू-टोने का प्रभाव नहीं होता है। मन और मस्तिष्क के रोगों में भी यह लाभदायक है।

1,, पन्ना - अच्छी स्मरण शक्ति के लिए धारण करें।
2 ,,नीलम - गठिया, मिर्गी, हिचकी एवं नपुंसकता को नष्ट करता है।
3,, फिरोजा-दैविक आपदाओं से बचाने के लिए फिरोजा धारण करें।
4 मरियम - बवासीर या बहते हुए रक्त को रोकने के लिए।
5 ,,माणिक - रक्त वृद्धि के लिए।
6,, मोती - तनाव व स्नायु रोगों के लिए।
7,, किडनी स्टोन -किडनी रोग निवारण के लिए।
8,, लाड़ली-हृदय रोग, बवासीर एवं नजर रोग के लिए धारण कर सकते हैं।
9 ,मूंगा, मोती - मुंहासों के लिए धारण करें।
10,, पन्ना, नीलम, लाजवर्त-पेप्टीक अल्सर में उपयोगी है।
11,, पुखराज,लाजावर्त्त, मूनस्टोन - दांतों के लिए
12,, माणिक, मोती, पन्ना - सिरदर्द के लिए।
13 ,,गौमेद या मून स्टोन -गले की खराबी के लिए।
14 ,,माणिक, मूंगा, पुखराज - सर्दी, खांसी, बुखार जिसे बार-बार होता है, वह धारण करें।
15 ,,मूंगा, मोती, पुखराज, फिरोजा- दुर्घटना से बचने के लिए...या बार-बार दुर्घटना होने पर धारण करें।
16,, तांबे की चेन - कूकर खांसी के लिए
17,, मूंगा, मोती, पन्ना -मूंगा, मोती, पन्ना एक ही अंगूठी में मोतियाबिंद को नष्ट करने के लिए धारण करें।
18,, मूंगा, पुखराज- कब्ज मुक्ति के लिए।
19,, पन्ना, पुखराज, मूंगा-पन्ना, पुखराज, मूंगा,एक ही अंगूठी में ब्रेन ट्यूमर के लिए धारण करें।
20 ,,मोती, पुखराज - चांदी की चेन में हर्निया के लिए धारण करें।
रत्नों को ऐसे अनेक प्रकार से कई बीमारियों को नष्ट करने के लिए स्वास्थ्य बल प्राप्ति के लिए धारण करते हैं। कोई भी रत्न शुभ-अशुभ दोनों प्रकार से फल प्रदान करता है। अतः अधिक सुखफल प्राप्ति के लिए अपनी कुंडली किसी प्रतिष्ठित ज्योतिषी को दिखाकर रत्न ही धारण करें,,ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks

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Sunday, 11 November 2018

श्री हनुमत्तन्त्रान्तर्गतमन्त्रसमुच्चयः ॐ हं हनुमते नमः

श्री हनुमत्तन्त्रान्तर्गतमन्त्रसमुच्चयः ॐ हं हनुमते नमः https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
ॐ नमो भगवते हनुमते आञ्जनेयाय
महाबलाय स्वाहा ॐ हं हनुमते मुख्यप्राणाय नमः ॐ हूं पवननन्दनाय हनुमते स्वाहा ॐ नमो भगवते हनुमते सर्वभूतात्मने स्वाहा ॐ नमो हरिमर्कटमर्कटमहावीराय स्वाहा ॐ भूभुर्वःसुवः श्रीहनुमते नमः ॐ श्रीहनुमद्देवतायै नमः ॐ श्रीहनुमन्महारुद्राय नमः ॐ ह्रीं श्रीं हौं ह्रां फट् स्वाहा । ॐ हं नमो हनुमते रामदूताय रुद्रात्मकाय स्वाहा ॐ अञ्जनीसुताय महावीर्यप्रमथनाय महाबलाय जानकीशोकनिवारणाय श्रीरामचन्द्रकृपापादुकाय ब्रह्माण्डनाथाय कामदाय पञ्चमुखवीरहनुमते स्वाहा ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय आत्मतत्त्वप्रकाशाय स्वाहा ॐ ऐं ह्रां हनुमते रामदूताय किलिकिलिबुबुकारेण विभीषणाय नमो हनुमद्देवाय ॥ आञ्जनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि । तन्नो हनूमान् प्रचोदयात् ॥ ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीताम्बरधराय कर्णकुण्डलाद्या- भरणकृतभूषणाय वनमालाविभूषिताय कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय श्रीरामचन्द्रमनोभिलाषिताय लङ्कादहनकारणाय घनकुलगिरिवज्रदण्डाय अक्षकुमारप्राणहरणाय ॐ यं ॐ भगवते रामदूताय स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा ॥ ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रें हूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीरामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय भानुमण्डलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रदाय महाभयनिवारकाय ये ह्रौं ॐ स्फ्रें हं स्फ्रें हैं स्फ्रें ॐ वीर । सर्वारिष्टशमनार्थम् ॐ नमो वीरहनुमते सर्वाण्यरिष्टानि सद्यः शमय शमय स्वाहा ॥ ॐ वीराञ्जनेय भगवन् मम सर्वकार्याणि साधय साधय सर्वतो मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ॐ महावीर हनुमन् सर्वयन्त्रतन्त्रमायाश्छेदय छेदय स्वाहा ॥ रक्षणार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय वायुसुताय अञ्जनीगर्भसम्भूताय अखण्डब्रह्मचर्यपालनतत्पराय धवलीकृतजगत्त्रितयाय ज्वलदग्निसूर्यकोटिसमप्रभाय प्रकटपराक्रमाय आक्रान्तदिङ्मण्डलाय यशोवितानाय यशोऽलङ्कृताय शोभिताननाय महासामर्थ्याय महातेजःपुञ्जविराजमानाय श्रीरामभक्तितत्पराय श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारणाय कपिसैन्यप्राकाराय सुग्रीवसख्यकारणाय सुग्रीवसाहाय्यनिमित्ताय ब्रह्मास्त्रब्रह्मशक्तिग्रसनाय लक्ष्मणशक्तिभेदनिवारणाय शल्यविशल्यौषधिसमानयनाय बालोदितभानुमण्डलग्रसनोद्युक्ताय अक्षकुमारछेदनाय वनरक्षाकरसमूहविभञ्जनाय द्रोणपर्वतोत्पाटनाय स्वामिवचनसम्पादितार्जुनसंयुगसङ्ग्रामाय गम्भीरशब्दोदयाय दक्षिणाशामार्तण्डाय मेरुपर्वतरक्षकाय (मेरुपर्वतपीठिकार्चनाय दावानलकालाग्निरुद्राय समुद्रलङ्घनाय सीताश्वासनाय सीतारक्षकाय) राक्षसीसङ्घविदारणाय अशोकवनिकाविध्वंसनाय (विदारणाय) लङ्गापुरदाहनाय दशग्रीवशिरःकृन्तनाय कुम्भकर्णादिवधकारणाय वालिनिबर्हणकारणाय मेघनादहोमविनाशकाय (विध्वंसनाय) इन्द्रजिद्वधकारणाय सर्वशास्त्रपारङ्गताय सर्वग्रहनिबर्हणाय (विनाशकाय) सर्वज्वरहराय सर्वभयनिवारणाय सर्वकष्टनिवारणाय सर्वापत्तिनिवारणाय सर्वकार्यसाधकाय प्राणिमात्ररक्षकाय रामदूताय स्वाहा ॥ सर्वत्र रक्षार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय विश्वरूपाय अमितविक्रमाय प्रकटपराक्रमाय महाबलाय सूर्यकोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय रामसेवकाय रामभक्तितत्पराय रामहृदयाय (लक्ष्मणशक्तिभेदनिवारणाय) लक्ष्मणरक्षकाय दुष्टनिबर्हणाय रामदूताय स्वाहा ॥ वशीकरणार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारकाय सर्वरोगहराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा ॥ तापत्रयनिवारणार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय आध्यत्मिकाधिदैविकाधि- भौतिकतापत्रयनिवारणाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय देवदानवर्षिमुनिवरदाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भक्तजनमनःकल्पनाकल्पद्रुमाय दुष्टमनोरथस्तम्भनाय प्रभञ्जनप्राणप्रियाय महाबलपराक्रमाय महाविपत्तिनिवारणाय पुत्रपौत्रधनधान्यादिविविधसम्पत्प्रदाय रामदूताय स्वाहा । ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परयन्त्रमन्त्रतन्त्रत्राटकनाशकाय सर्वज्वरच्छेदकाय सर्वव्याधिनिकृन्तनाय सर्वभयप्रशमनाय सर्वदुष्टमुखस्तम्म्भनाय सर्वकार्यसिद्धिप्रदाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय वज्रदेहाय वज्रनखाय वज्ररोम्णे वज्रनेत्राय वज्रदन्ताय वज्रकराय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय देवदानवयक्षराक्षसभूतप्रेत-पिशाचडाकिनीशाकिनीदुष्टग्रहबन्धनाय रामदूताय स्वाहा ॥ पञ्चमुखहनुमत्तन्त्रतः ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय पूर्वमुखे सकलशत्रुसंहारकाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय दक्षिणमुखे करालवदनाय नारसिंहाय सकलभूतप्रेतदमनाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय पश्चिममुखे गरुडाय सकलविघ्ननिवारणाय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय उत्तरमुखे आदिवराहाय सकलसम्पत्कराय रामदूताय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय ऊर्ध्वमुखे हयग्रीवाय सकलजनवशीकरणाय रामदूताय स्वाहा ॥ ग्रहोच्चाटनार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वग्रहान् भूतभविष्यद्वर्तमानान् समीपस्थान् सर्वकालदुष्टबुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय परबलानि क्षोभय क्षोभय मम सर्वकार्याणि साधय साधय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारायपरकृतयन्त्रमन्त्रपराहङ्कार- भूतप्रेतपिशाचपरसृष्टिविघ्नतर्जनचेटकविद्यासर्वग्रहभयं निवारय निवारय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय डाकिनीशाकिनीब्रह्मराक्षसकुल- पिशाचोरुभयं निवारय निवारय स्वाहा ॥ व्याधिनिवारणार्थम् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भूतज्वरप्रेतज्वरचातुर्थिकज्वर- विष्णुज्वरमहेशज्वरं निवारय निवारय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय अक्षिशूल-पक्षशूल-शिरोऽभ्यन्तरशूल- पित्तशूल-ब्रह्मराक्षसशूल-पिशाचकुलच्छेदनं निवारय निवारय स्वाहा ॥ भूतादिग्रहबन्धनार्थम् ॐ नमो भगवते वीरहनुमते प्रलयकालानलप्रभाज्वलनाय प्रतापवज्रदेहाय अञ्जनागर्भसम्भूताय प्रकटविक्रमवीरदैत्यदानव- यक्षरक्षोगणग्रहबन्धनाय भूतग्रहनिबन्धनाय ब्रह्मबन्धनाय शाकिनीकामिनीग्रहबन्धनाय ब्रह्मराक्षसग्रहबन्धनाय चोरग्रहबन्धनाय मारिकाग्रहबन्धनाय एह्येहि आगच्छागच्छ आवेशयावेशय मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय स्वाहा ॥ ॐ यं ह्रीं वायुपुत्राय एह्येहि आगच्छागच्छ आवेशयावेशय श्रीरामचन्द्र आवेशयावेशय श्रीरामचन्द्र आज्ञापयति स्वाहा ॥ सर्वतो विजयार्थम् ॐ हूं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट् स्वाहा ॥ ॐ हं पवननन्दनाय हनुमते स्वाहा ॥ ॐ ह्रीं यं ह्रीं रामदूताय रिपुपुरीदहनाय अक्षकुक्षिविदारणाय अपरिमितबलपराक्रमाय रावणगिरिवज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा ॥ ॐ भगवते अञ्जनापुत्राय उज्जयिनीनिवासिने गुरुतरपराक्रमाय श्रीरामदूताय लङ्कापुरीदाहनाय यक्षराक्षससंहारकारिणे हुं फट् स्वाहा ॥ ॐ श्रीं महाञ्जनेय पवनपुत्राऽवेशयाऽवेशय ॐ हनुमते फट् स्वाहा ॥ ज्ञानार्थम् ॐ नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्मतत्वंप्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा ॥ बन्धमोचनार्थम् ॐ हरिमर्कट वामकरे परिमुञ्च मुञ्च शृङ्खलिकां स्वाहा । ॐ यो यो हनूमन्त फलिफलिति धिगिधिगिति हर हर हूं फट् स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय शृङ्खलां त्रोटय त्रोटय बन्धमोक्षं कुरु कुरु स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते आवेशयाऽवेशय स्वाहा ॥ ॐ नमो हरिमर्कटाय स्वाहा । ॐ नमो रामदूताञ्जनेयाय वायुपत्राय महाबलाय कोलाहलसकलब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनीरलङ्घनाय पिङ्गलनयनायामितविक्रमाय दृष्टिनिरालङ्कृताय सञ्जीविनीसञ्जीविताङ्गदलक्ष्मणमहाकपिसैन्य- प्राणदाय रामेष्टाय स्वाहा ॥ सम्पत्प्राप्त्यर्थम् ह्रीं ह्रीं ह्रूं ह्रों ह्रः हनुमते श्रियं देहि दापय दापय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रों ह्रः श्रीं स्वाहा ॥ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सकलसम्पत्कराय स्वाहा ॥ ॐ पवननन्दनाय रमेराम रमेराम रमेरामाः ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ स्वाहा ॥ ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं वित्तेश्वराय हनुमद्देवताय श्रीं ह्रीं एं ॐ स्वाहा ॥ स्वपनदृष्टान्तार्थम् ॐ शिवहरिमर्कटमर्कटाय स्वाहा ॥ ॐहरिमर्कटमर्कटाय स्वपनं दर्शय दर्शय ॐ स्वाहा ॥ भयनाशनार्थम् ॐ नमो भगवते सप्तवदनाय आद्यकपिमुखाय वीरहनुमते सर्वशत्रुसंहारणाय ठं ठं ठं ठं ठं ठं ठं ॐ नमः स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते सप्तवदनाय द्वितीयनारसिंहास्याय अत्युग्रतेजोवपुषे भीषणाय भयनाशनाय हं हं हं हं हं हं हं ॐ नमः स्वाहा ॥ रं हरिमर्कट हरिमर्कट भूतप्रेतब्रह्मराक्षसवेतालादि नाशय नाशय मर्कटमर्कटाय हरि हूं फट् ॥ ॐ नमो हनुमते अञ्जनीगर्भसम्भूताय रामलक्ष्मणानन्दकराय कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीवामात्याय रणपरोद्धाटनाय कुमारब्रह्मचारिणे गम्भीरशब्दोदयाय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं सर्वदुष्टनिवारणाय सर्वभूतप्रेतडाकिनीशाकिनीनिवारणाय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं फट् ॥ वादविजयार्थम् ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा । वेतालसिद्ध्यर्थम् हौं ह्स्फ्र्ं ख्फों ह्रसों ह्स्ख्फ्रों ह्सौः हनुमते नमः ॥ रक्षार्थम् अञ्जनीगर्भसम्भूताय कपीन्द्रसचिवोत्तम रामप्रिय नमस्तुभ्यंहनुमन् रक्ष रक्ष सर्वदा ॥ बन्धमोक्षार्थम् ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बन्धमोक्षं कुरु स्वाहा ॥ दृष्टिदोषपरिहारार्थम् ॐ रं मङ्गल ॐ ॥ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट् ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परमन्त्रपरयन्त्रपरतन्त्र- मूढघातत्राटकचेटक-नाशाय सर्वज्वरच्छेदकाय सर्वव्याधिनिकृन्तनाय सर्वभयप्रशमनाय सर्वदुष्टमुखस्तम्भनाय सर्वकार्यसिद्धिप्रदाय रामदूताय हुं हुं हुं फट् फट् ॥ हनुमद्गायत्री रामदूताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि । तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥ सामर्थ्यावाप्त्यर्थं ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं वज्रकायाय लङ्गेश्वरवधाय महासेतुबन्धाय महाशैलप्रवाह गगनेचर एह्येहि महाबलपराक्रमाय भैरवायाज्ञापय एह्येहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय वैरिणो भञ्जय हूं फट् ॥ षट्कर्मसिद्ध्यर्थम् आकर्षणार्थम् ॐ नमो मर्कट मर्कटाय लुं लुं लुं लुं लुं लुं लुंआकर्षितसकलसम्पत्कराय हरिमर्कटमर्कटाय ॐ ॥ वशीकरणार्थम् ॐ नमो हनुमते ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुद्रमूर्तये प्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ॥ मारणार्थम् रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रःरुद्रावताराय शत्रुसंहारणाय रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रः फट्स्वाहा ॥ विद्वेषणार्थम् ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बं बं बं बं बंअमुकामुकं विद्वेषय विद्वेषय हूं फट् ॥ स्तम्भनार्थम् ॐ नमो हनुमते पञ्चवदनाय टं टं टं टं टंअमुकं स्तम्भय स्तम्भय टं टं टं टं टं हूं फट् ॥ मोहनार्थम् ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं ह्स्फ्रें ह्स्फ्रें ह्स्रौं ॐहनुमते अमुकं मोहय मोहय हुं फट् ॥ त्रिदोषसन्निपातनिवृत्त्यर्थम् ॐ हनुमते श्रीरामदूताय नमः । आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् । हार्दचक्रजागरणार्थम् गुरवे मम अञ्जनीसूनवे नमः ॥ सर्वमनोरथपूरणार्थम् ॐ नमो भगवते महावीराय श्रीमते सर्वकामप्रदाय हुं स्वाहा ॥ असाध्यसाधक स्वामिन् असाध्यं तव किं वद । !!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 रामदूत महोत्साह ममाभीष्टं प्रसाधय

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