Thursday, 14 April 2016

काली-सहस्रनाम ,,Kali Sahasranama

काली-सहस्रनाम,,,Kali Sahasranama
श्मशान-कालिका काली भद्रकाली कपालिनी ।
गुह्य-काली महाकाली कुरु-कुल्ला विरोधिनी ।।१।।
कालिका काल-रात्रिश्च महा-काल-नितम्बिनी ।
काल-भैरव-भार्या च कुल-वत्र्म-प्रकाशिनी ।।२।।
कामदा कामिनीया कन्या कमनीय-स्वरूपिणी ।
कस्तूरी-रस-लिप्ताङ्गी कुञ्जरेश्वर-गामिनी।।३।।
ककार-वर्ण-सर्वाङ्गी कामिनी काम-सुन्दरी ।
कामात्र्ता काम-रूपा च काम-धेनुु: कलावती ।।४।।
कान्ता काम-स्वरूपा च कामाख्या कुल-कामिनी ।
कुलीना कुल-वत्यम्बा दुर्गा दुर्गति-नाशिनी ।।५।।
कौमारी कुलजा कृष्णा कृष्ण-देहा कृशोदरी ।
कृशाङ्गी कुलाशाङ्गी च क्रीज्ररी कमला कला ।।६।।
करालास्य कराली च कुल-कांतापराजिता ।
उग्रा उग्र-प्रभा दीप्ता विप्र-चित्ता महा-बला ।।७।।
नीला घना मेघ-नाद्रा मात्रा मुद्रा मिताऽमिता ।
ब्राह्मी नारायणी भद्रा सुभद्रा भक्त-वत्सला ।।८।।
माहेश्वरी च चामुण्डा वाराही नारसिंहिका ।
वङ्कांगी वङ्का-कंकाली नृ-मुण्ड-स्रग्विणी शिवा ।।९।।
मालिनी नर-मुण्डाली-गलद्रक्त-विभूषणा ।
रक्त-चन्दन-सिक्ताङ्गी सिंदूरारुण-मस्तका ।।१०।।
घोर-रूपा घोर-दंष्ट्रा घोरा घोर-तरा शुभा ।
महा-दंष्ट्रा महा-माया सुदन्ती युग-दन्तुरा ।।११।।
सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना ।
शारदेन्दु-प्रसन्नस्या स्पुâरत्-स्मेराम्बुजेक्षणा ।।१२।।
अट्टहासा प्रफुल्लास्या स्मेर-वक्त्रा सुभाषिणी ।
प्रफुल्ल-पद्म-वदना स्मितास्या प्रिय-भाषिणी ।।१३।।
कोटराक्षी कुल-श्रेष्ठा महती बहु-भाषिणी ।
सुमति: मतिश्चण्डा चण्ड-मुण्डाति-वेगिनी ।।१४।।
प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिका चण्ड-वेगिनी ।
सुकेशी मुक्त-केशी च दीर्घ-केशी महा-कचा ।।१५।।
पे्रत-देही-कर्ण-पूरा प्रेत-पाणि-सुमेखला ।
प्रेतासना प्रिय-प्रेता प्रेत-भूमि-कृतालया ।।१६।।
श्मशान-वासिनी पुण्या पुण्यदा कुल-पण्डिता ।
पुण्यालया पुण्य-देहा पुण्य-श्लोका च पावनी ।।१७।।
पूता पवित्रा परमा परा पुण्य-विभूषणा ।
पुण्य-नाम्नी भीति-हरा वरदा खङ्ग-पाशिनी ।।१८।।
नृ-मुण्ड-हस्ता शस्त्रा च छिन्नमस्ता सुनासिका ।
दक्षिणा श्यामला श्यामा शांता पीनोन्नत-स्तनी ।।१९।।
दिगम्बरा घोर-रावा सृक्कान्ता-रक्त-वाहिनी ।
महा-रावा शिवा संज्ञा नि:संगा मदनातुरा ।।२०।।
मत्ता प्रमत्ता मदना सुधा-सिन्धु-निवासिनी ।
अति-मत्ता महा-मत्ता सर्वाकर्षण-कारिणी ।।२१।।
गीत-प्रिया वाद्य-रता प्रेत-नृत्य-परायणा ।
चतुर्भुजा दश-भुजा अष्टादश-भुजा तथा ।।२२।।
कात्यायनी जगन्माता जगती-परमेश्वरी ।
जगद्-बन्धुर्जगद्धात्री जगदानन्द-कारिणी ।।२३।।
जगज्जीव-मयी हेम-वती महामाया महा-लया ।
नाग-यज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नाग-शायनी ।।२४।।
नाग-कन्या देव-कन्या गान्धारी किन्नरेश्वरी ।
मोह-रात्री महा-रात्री दरुणाभा सुरासुरी ।।२५।।
विद्या-धरी वसु-मती यक्षिणी योगिनी जरा ।
राक्षसी डाकिनी वेद-मयी वेद-विभूषणा ।।२६।।
श्रुति-स्मृतिर्महा-विद्या गुह्य-विद्या पुरातनी ।
चिंताऽचिंता स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ।।२७।।
अर्पणा निश्चला लीला सर्व-विद्या-तपस्विनी ।
गङ्गा काशी शची सीता सती सत्य-परायणा ।।२८।।
नीति: सुनीति: सुरुचिस्तुष्टि: पुष्टिर्धृति: क्षमा ।
वाणी बुद्धिर्महा-लक्ष्मी लक्ष्मीर्नील-सरस्वती ।।२९।।
स्रोतस्वती स्रोत-वती मातङ्गी विजया जया ।
नदी सिन्धु: सर्व-मयी तारा शून्य निवासिनी ।।३०।।
शुद्धा तरंगिणी मेधा शाकिनी बहु-रूपिणी ।
सदानन्द-मयी सत्या सर्वानन्द-स्वरूपणि ।।३१।।
स्थूला सूक्ष्मा सूक्ष्म-तरा भगवत्यनुरूपिणी ।
परमार्थ-स्वरूपा च चिदानन्द-स्वरूपिणी ।।३२।।
सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी ।
रंकिणी टंकिणी चित्रा विचित्रा चित्र-रूपिणी ।।३३।।
पद्मा पद्मालया पद्म-मुखी पद्म-विभूषणा ।
शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिर-प्रिया ।।३४।।
भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रु-मर्दिनी ।
उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चन्द्र-स्वरूपिणी ।।३५।।
सूय्र्यात्मिका रुद्र-पत्नी रौद्री स्त्री प्रकृति: पुमान् ।
शक्ति: सूक्तिर्मति-मती भक्तिर्मुक्ति: पति-व्रता ।।३६।।
सर्वेश्वरी सर्व-माता सर्वाणी हर-वल्लभा ।
सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ।।३७।।
कर्त्री हर्त्री पालयित्री शर्वरी तामसी दया ।
तमिस्रा यामिनीस्था न स्थिरा धीरा तपस्विनी ।।३८।।
चार्वङ्गी चंचला लोल-जिह्वा चारु-चरित्रिणी ।
त्रपा त्रपा-वती लज्जा निर्लज्जा ह्नीं रजोवती ।।३९।।
सत्व-वती धर्म-निष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुर-वादिनी ।
गरिष्ठा दुष्ट-संहत्री विशिष्टा श्रेयसी घृणा ।।४०।।
भीमा भयानका भीमा-नादिनी भी: प्रभावती ।
वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञ-कत्र्री यजु:-प्रिया ।।४१।।
ऋक्-सामाथर्व-निलया रागिणी शोभन-स्वरा ।
कल-कण्ठी कम्बु-कण्ठी वेणु-वीणा-परायणा ।।४२।।
वशिनी वैष्णवी स्वच्छा धात्री त्रि-जगदीश्वरी ।
मधुमती कुण्डलिनी शक्ति: ऋद्धि: सिद्धि: शुचि-स्मिता ।।४३।।
रम्भोवैशी रती रामा रोहिणी रेवती मघा ।
शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मनी तथा ।।४४।।
शूलिनी परिघास्त्रा च पाशिनी शाङ्र्ग-पाणिनी ।
पिनाक-धारिणी धूम्रा सुरभि वन-मालिनी ।।४५।।
रथिनी समर-प्रीता च वेगिनी रण-पण्डिता ।
जटिनी वङ्किाणी नीला लावण्याम्बुधि-चन्द्रिका ।।४६।।
बलि-प्रिया महा-पूज्या पूर्णा दैत्येन्द्र-मन्थिनी ।
महिषासुर-संहन्त्री वासिनी रक्त-दन्तिका ।।४७।।
रक्तपा रुधिराक्ताङ्गी रक्त-खर्पर-हस्तिनी ।
रक्त-प्रिया माँस - रुधिरासवासक्त-मानसा ।।४८।।
गलच्छोेणित-मुण्डालि-कण्ठ-माला-विभूषणा ।
शवासना चितान्त:स्था माहेशी वृष-वाहिनी ।।४९।।
व्याघ्र-त्वगम्बरा चीर-चेलिनी सिंह-वाहिनी ।
वाम-देवी महा-देवी गौरी सर्वज्ञ-भाविनी ।।५०।।
बालिका तरुणी वृद्धा वृद्ध-माता जरातुरा ।
सुभ्रुर्विलासिनी ब्रह्म-वादिनि ब्रह्माणी मही ।।५१।।
स्वप्नावती चित्र-लेखा लोपा-मुद्रा सुरेश्वरी ।
अमोघाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी ।।५२।।
मन्दाकिनी मन्द-हासा ज्वालामुख्यसुरान्तका ।
मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता ।।५३।।
मदिरा मदिरोन्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी ।
सुमध्यानन्त-गुणिनी सर्व-लोकोत्तमोत्तमा ।।५४।।
जयदा जित्वरा जेत्री जयश्रीर्जय-शालिनी ।
सुखदा शुभदा सत्या सभा-संक्षोभ-कारिणी ।।५५।।
शिव-दूती भूति-मती विभूतिर्भीषणानना ।
कौमारी कुलजा कुन्ती कुल-स्त्री कुल-पालिका ।।५६।।
कीर्तिर्यशस्विनी भूषां भूष्या भूत-पति-प्रिया ।
सगुणा-निर्गुणा धृष्ठा कला-काष्ठा प्रतिष्ठिता ।।५७।।
धनिष्ठा धनदा धन्या वसुधा स्व-प्रकाशिनी ।
उर्वी गुर्वी गुरु-श्रेष्ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका ।।५८।।
महा-कुलीना निष्कामा सकामा काम-जीवना ।
काम-देव-कला रामाभिरामा शिव-नर्तकी ।।५९।।
चिन्तामणि: कल्पलता जाग्रती दीन-वत्सला ।
कार्तिकी कृत्तिका कृत्या अयोेध्या विषमा समा ।।६०।।
सुमंत्रा मंत्रिणी घूर्णा ह्लादिनी क्लेश-नाशिनी ।
त्रैलोक्य-जननी हृष्टा निर्मांसा मनोरूपिणी ।।६१।।
तडाग-निम्न-जठरा शुष्क-मांसास्थि-मालिनी ।
अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्य-पावनीश्वरी ।।६२।।
व्यक्ताव्यक्तानेक-मूर्ति: शर्वरी भीम-नादिनी ।
क्षेमज्र्री शंकरी च सर्व- सम्मोह-कारिणी ।।६३।।
ऊध्र्व-तेजस्विनी क्लिन्न महा-तेजस्विनी तथा ।
अद्वैत भोगिनी पूज्या युवती सर्व-मङ्गला ।।६४।।
सर्व-प्रियंकरी भोग्या धरणी पिशिताशना ।
भयंकरी पाप-हरा निष्कलंका वशंकरी ।।६५।।
आशा तृष्णा चन्द्र-कला निद्रिका वायु-वेगिनी ।
सहस्र-सूर्य संकाशा चन्द्र-कोटि-सम-प्रभा ।।६६।।
वह्नि-मण्डल-मध्यस्था सर्व-तत्त्व-प्रतिष्ठिता ।
सर्वाचार-वती सर्व-देव - कन्याधिदेवता ।।६७।।
दक्ष-कन्या दक्ष-यज्ञ नाशिनी दुर्ग तारिणी ।
इज्या पूज्या विभीर्भूति: सत्कीर्तिब्र्रह्म-रूपिणी ।।६८।।
रम्भीश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहु: ।
मनस्विनी देव-माता यशस्या ब्रह्म-चारिणी ।।६९।।
ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धि: सर्वाद्या सर्व-दायिनी ।
आधार-रूपिणी ध्येया मूलाधार-निवासिनी ।।७०।।
आज्ञा प्रज्ञा-पूर्ण-मनाश्चन्द्र-मुख्यानुवूâलिनी ।
वावदूका निम्न-नाभि: सत्या सन्ध्या दृढ़-व्रता ।।७१।।
आन्वीक्षिकी दंड-नीतिस्त्रयी त्रि-दिव-सुन्दरी ।
ज्वलिनी ज्वालिनी शैल-तनया विन्ध्य-वासिनी ।।७२।।
अमेया खेचरी धैर्या तुरीया विमलातुरा ।
प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्पुâलिङ्गिनी ।।७३।।
भुक्ति सिद्धि सदा प्राप्ति: प्राकम्या महिमाणिमा ।
इच्छा-सिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वीध्र्व-निवासिनी ।।७४।।
लघिमा चैव गायित्री सावित्री भुवनेश्वरी ।
मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा ।।७५।।
पिंगला कपिला जिह्वा-रसज्ञा रसिका रसा ।
सुषुम्नेडा भोगवती गान्धारी नरकान्तका ।।७६।।
पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधिका ।
अमृता तुलसी वृन्दा वैâटभी कपटेश्वरी ।।७७।।
उग्र-चण्डेश्वरी वीर-जननी वीर-सुन्दरी ।
उग्र-तारा यशोदाख्या देवकी देव-मानिता ।।७८।।
निरन्जना चित्र-देवी क्रोधिनी कुल-दीपिका ।
कुल-वागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा ।।७९।।
योगेश्वरी-महा-मारी भ्रामरी विन्दु-रूपिणी ।
दूती प्राणेश्वरी गुप्ता बहुला चामरी-प्रभा ।।८०।।
कुब्जिका ज्ञानिनी ज्येष्ठा भुशुंडी प्रकटा तिथि: ।
द्रविणी गोपिनी माया काम-बीजेश्वरी क्रिया ।।८१।।
शांभवी केकरा मेना मूषलास्त्रा तिलोत्तमा ।
अमेय-विक्रमा व्रूâरा सम्पत्-शाला त्रिलोचना ।।८२।।
सुस्थी हव्य-वहा प्रीतिरुष्मा धूम्रार्चिरङ्गदा ।
तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा ।।८३।।
त्रिखंडा बोधिनी वश्या सकला शब्द-रूपिणी ।
बीज-रूपा महा-मुद्रा योगिनी योनि-रूपिणी ।।८४।।
अनङ्ग - मदनानङ्ग - लेखनङ्ग - कुशेश्वरी ।
अनङ्ग-मालिनि-कामेशी देवि सर्वार्थ-साधिका ।।८५।।
सर्व-मन्त्र-मयी मोहिन्यरुणानङ्ग-मोहिनी ।
अनङ्ग-कुसुमानङ्ग-मेखलानङ्ग - रूपिणी ।।८६।।
वङ्कोश्वरी च जयिनी सर्व-द्वन्द्व-क्षयज्र्री ।
षडङ्ग-युवती योग-युक्ता ज्वालांशु-मालिनी ।।८७।।
दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्ग-रूपिणी ।
दुरन्ता दुष्कृति-हरा दुध्र्येया दुरतिक्रमा ।।८८।।
हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी ।
त्रिकोण-निलया नित्या परमामृत-रञ्जिता ।।८९।।
महा-विद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डा कुल-सुन्दरी ।
त्वरिता भक्त-संसक्ता भक्ति-वश्या सनातनी ।।९०।।
भक्तानन्द-मयी भक्ति-भाविका भक्ति-शज्र्री ।
सर्व-सौन्दर्य-निलया सर्व-सौभाग्य-शालिनी ।।९१।।
सर्व-सौभाग्य-भवना सर्व सौख्य-निरूपिणी ।
कुमारी-पूजन-रता कुमारी-व्रत-चारिणी ।।९२।।
कुमारी-भक्ति-सुखिनी कुमारी-रूप-धारिणी ।
कुमारी-पूजक-प्रीता कुमारी प्रीतिदा प्रिया ।।९३।।
कुमारी-सेवकासंगा कुमारी-सेवकालया ।
आनन्द-भैरवी बाला भैरवी वटुक-भैरवी ।।९४।।
श्मशान-भैरवी काल-भैरवी पुर-भैरवी ।
महा-भैरव-पत्नी च परमानन्द-भैरवी ।।९५।।
सुधानन्द-भैरवी च उन्मादानन्द-भैरवी ।
मुक्तानन्द-भैरवी च तथा तरुण-भैरवी ।।९६।।
ज्ञानानन्द-भैरवी च अमृतानन्द-भैरवी ।
महा-भयज्र्री तीव्रा तीव्र-वेगा तपस्विनी ।।९७।।
त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुर-सुन्दरी ।
त्रिपुरेशी पञ्च-दशी पञ्चमी पुर-वासिनी ।।९८।।
महा-सप्त-दशी चैव षोडशी त्रिपुरेश्वरी ।
महांकुश-स्वरूपा च महा-चव्रेâश्वरी तथा ।।९९।।
नव-चव्रेâश्वरी चक्र-ईश्वरी त्रिपुर-मालिनी ।
राज-राजेश्वरी धीरा महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।।१००।।
सिन्दूर-पूर-रुचिरा श्रीमत्त्रिपुर-सुन्दरी ।
सर्वांग-सुन्दरी रक्ता रक्त-वस्त्रोत्तरीयिणी ।।१०१।।
जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-धारिणी ।
त्रिकूटस्था पञ्च-कूटा सर्व-वूâट-शरीरिणी ।।१०२।।
चामरी बाल-कुटिल-निर्मल-श्याम-केशिनी ।
वङ्का-मौक्तिक-रत्नाढ्या-किरीट-मुकुटोज्ज्वला ।।१०३।।
रत्न-कुण्डल-संसक्त-स्फुरद्-गण्ड-मनोरमा ।
कुञ्जरेश्वर-कुम्भोत्थ-मुक्ता-रञ्जित-नासिका ।।१०४।।
मुक्ता-विद्रुम-माणिक्य-हाराढ्य-स्तन-मण्डला ।
सूर्य-कान्तेन्दु-कान्ताढ्य-कान्ता-कण्ठ-भूषणा ।।१०५।।
वीजपूर-स्फुरद्-वीज -दन्त - पंक्तिरनुत्तमा ।
काम-कोदण्डकाभुग्न-भ्रू-कटाक्ष-प्रवर्षिणी ।।१०६।।
मातंग-कुम्भ-वक्षोजा लसत्कोक-नदेक्षणा ।
मनोज्ञ-शुष्कुली-कर्णा हंसी-गति-विडम्बिनी ।।१०७।।
पद्म-रागांगदा-ज्योतिर्दोश्चतुष्क-प्रकाशिनी ।
नाना-मणि-परिस्फूर्जच्दृद्ध-कांचन-वंâकणा ।।१०८।।
नागेन्द्र-दन्त-निर्माण-वलयांचित-पाणिनी ।
अंगुरीयक-चित्रांगी विचित्र-क्षुद्र-घण्टिका ।।१०९।।
पट्टाम्बर-परीधाना कल-मञ्जीर-शिंजिनी ।
कर्पूरागरु-कस्तूरी-कुंकुम-द्रव-लेपिता ।।११०।।
विचित्र-रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता ।
रत्न-द्वीप-स्पुâरद्-रक्त-सिंहासन-विलासिनी ।।१११।।
षट्-चक्र-भेदन-करी परमानन्द-रूपिणी ।
सहस्र-दल - पद्यान्तश्चन्द्र - मण्डल-वर्तिनी ।।११२।।
ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी ।
हर-विष्णु-विरंचीन्द्र-ग्रह - नायक-सेविता ।।११३।।
शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी ।
मातंगिनी श्रीमती च तथैवानन्द-मेखला ।।११४।।
डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता ।
माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिव-रूपिणी ।।११५।।
अलम्बुषा वेग-वती क्रोध-रूपा सु-मेखला ।
गान्धारी हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभज्र्री ।।११६।।
पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव गन्धिनी ।
आत्म-योनिब्र्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा ।।११७।।
भग-रूपा भग-स्थात्री भगनी भग-रूपिणी ।
भगात्मिका भगाधार-रूपिणी भग-मालिनी ।।११८।।
लिंगाख्या चैव लिंगेशी त्रिपुरा-भैरवी तथा ।
लिंग-गीति: सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृव्â ।।११९।।
लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती ।
भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा ।।१२०।।
गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृव्â ।
लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी ।।१२१।।
लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी ।
लिंग-गीतिमहा-प्रीता भग-गीतिर्महा-सुखा ।।१२२।।
लिंग-नाम-सदानंदा भग-नाम सदा-रति: ।
लिंग-माला-वंâठ-भूषा भग-माला-विभूषणा ।।१२३।।
भग-लिंगामृत-प्रीता भग-लिंगामृतात्मिका ।
भग-लिंगार्चन-प्रीता भग-लिंग-स्वरूपिणी ।।१२४।।
भग-लिंग-स्वरूपा च भग-लिंग-सुखावहा ।
स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता स्वयम्भू-कुसुमार्चिता ।।१२५।।
स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता ।।१२६।।
स्वयम्भू-पुष्प-घटिता स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी ।
स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता ।।१२७।।
स्वयम्भू-पुष्प-निरता स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा ।
स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।।१२८।।
स्वयम्भू-पुष्प-निचिता स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया ।
स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त - मानसा ।।१२९।।
स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध देहिनी ।
स्वयम्भू-कुसुमाधारा स्वयम्भू-वुुâसुमा-कला ।।१३०।।
स्वयम्भू-पुष्प-निलया स्वयम्भू-पुष्प-वासिनी ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्निग्धा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका ।।१३१।।
स्वयम्भू-पुष्प-कारिणी स्वयम्भू-पुष्प-पाणिका ।
स्वयम्भू-कुसुम-ध्याना स्वयम्भू-कुसुम-प्रभा ।।१३२।।
स्वयम्भू-कुसुम-ज्ञाना स्वयम्भू-पुष्प-भोगिनी ।
स्वयम्भू-कुसुमोल्लास स्वयम्भू-पुष्प-वर्षिणी ।।१३३।।
स्वयम्भू-कुसुमोत्साहा स्वयम्भू-पुष्प-रूपिणी ।
स्वयम्भू-कुसुमोन्मादा स्वयम्भू पुष्प-सुन्दरी ।।१३४।।
स्वयम्भू-कुसुमाराध्या स्वयम्भू-कुसुमोद्भवा ।
स्वयम्भू-कुसुम-व्यग्रा स्वयम्भू-पुष्प-पूर्णिता ।।१३५।।
स्वयम्भू-पूजक-प्रज्ञा स्वयम्भू-होतृ-मातृका ।
स्वयम्भू-दातृ-रक्षित्री स्वयम्भू-रक्त-तारिका ।।१३६।।
स्वयम्भू-पूजक-ग्रस्ता स्वयम्भू-पूजक-प्रिया ।
स्वयम्भू-वन्दकाधारा स्वयम्भू-निन्दकान्तका ।।१३७।।
स्वयम्भू-प्रद-सर्वस्वा स्वयम्भू-प्रद-पुत्रिणी ।
स्वम्भू-प्रद-सस्मेरा स्वयम्भू-प्रद-शरीरिणी ।।१३८।।
सर्व-कालोद्भव-प्रीता सर्व-कालोद्भवात्मिका ।
सर्व-कालोद्भवोद्भावा सर्व-कालोद्भवोद्भवा ।।१३९।।
कुण्ड-पुष्प-सदा-प्रीतिर्गोल-पुष्प-सदा-रति: ।
कुण्ड-गोलोद्भव-प्राणा कुण्ड-गोलोद्भवात्मिका ।।१४०।।
स्वयम्भुवा शिवा धात्री पावनी लोक-पावनी ।
कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्र-सुन्दरी ।।१४१।।
अश्विनी कृत्तिका पुष्या तैजस्का चन्द्र-मण्डला ।
सूक्ष्माऽसूक्ष्मा वलाका च वरदा भय-नाशिनी ।।१४२।।
वरदाऽभयदा चैव मुक्ति-बन्ध-विनाशिनी ।
कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल-सुन्दरी ।।१४३।।
दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ-प्रकाशिनी ।
दुष्टादुष्ट-मतिश्चैव सर्व-कार्य-विनाशिनी ।।१४४।।
शुक्राधारा शुक्र-रूपा-शुक्र-सिन्धु-निवासिनी ।
शुक्रालया शुक्र-भोग्या शुक्र-पूजा-सदा-रति:।।१४५।।
शुक्र-पूज्या-शुक्र-होम-सन्तुष्टा शुक्र-वत्सला ।
शुक्र-मूत्र्ति: शुक्र-देहा शुक्र-पूजक-पुत्रिणी ।।१४६।।
शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्र-संस्पृहा शुक्र-सुन्दरी ।
शुक्र-स्नाता शुक्र-करी शुक्र-सेव्याति-शुक्रिणी ।।१४७।।
महा-शुक्रा शुक्र-भवा शुक्र-वृष्टि-विधायिनी ।
शुक्राभिधेया शुक्रार्हा शुक्र-वन्दक-वन्दिता ।।१४८।।
शुक्रानन्द-करी शुक्र-सदानन्दाभिधायिका ।
शुक्रोत्सवा सदा-शुक्र-पूर्णा शुक्र-मनोरमा ।।१४९।।
शुक्र-पूजक-सर्वस्वा शुक्र-निन्दक-नाशिनी ।
शुक्रात्मिका शुक्र-सम्पत् शुक्राकर्षण-कारिणी ।।१५०।।
शारदा साधक-प्राणा साधकासक्त-रक्तपा ।
साधकानन्द-सन्तोषा साधकानन्द-कारिणी ।।१५१।।
आत्म-विद्या ब्रह्म-विद्या पर ब्रह्म स्वरूपिणी ।
सर्व-वर्ण-मयी देवी जप-माला-विधायिनी ।।
रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks


Friday, 4 March 2016

दुर्गा कवचम् ॥,, वंश वृद्धिकरं दुर्गा कवचम् ॥

दुर्गा कवचम् ॥,, वंश वृद्धिकरं दुर्गा कवचम् ॥
भगवन् देव देवेशकृपया त्वं जगत् प्रभो ।
वंशाख्य कवचं ब्रूहि मह्यं शिष्याय तेऽनघ ।
यस्य प्रभावाद्देवेश वंश वृद्धिर्हिजायते ॥ १॥
सूर्य ऊवाच ॥शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि वंशाख्यं कवचं शुभम् ।
सन्तानवृद्धिर्यत्पठनाद्गर्भरक्षा सदा नृणाम् ॥ २॥
वन्ध्यापि लभते पुत्रं काक वन्ध्या सुतैर्युता ।
मृत वत्सा सुपुत्रस्यात्स्रवद्गर्भ स्थिरप्रजा ॥ ३॥
अपुष्पा पुष्पिणी यस्य धारणाश्च सुखप्रसूः ।
कन्या प्रजा पुत्रिणी स्यादेतत् स्तोत्र प्रभावतः ॥ ४॥
भूतप्रेतादिजा बाधा या बाधा कुलदोषजा ।
ग्रह बाधा देव बाधा बाधा शत्रु कृता च या ॥ ५॥
भस्मी भवन्ति सर्वास्ताः कवचस्य प्रभावतः ।
सर्वे रोगा विनश्यन्ति सर्वे बालग्रहाश्च ये ॥ ६॥
अथ दुर्गा कवचम् ॥ॐ पुर्वं रक्षतु वाराही चाग्नेय्यां अम्बिका स्वयम् ।
दक्षिणे चण्डिका रक्षेन्नैऋत्यां शववाहिनी ॥ १॥
वाराही पश्चिमे रक्षेद्वायव्याम् च महेश्वरी ।
उत्तरे वैष्णवीं रक्षेत् ईशाने सिंह वाहिनी ॥ २॥
ऊर्ध्वां तु शारदा रक्षेदधो रक्षतु पार्वती ।
शाकम्भरी शिरो रक्षेन्मुखं रक्षतु भैरवी ॥ ३॥
कन्ठं रक्षतु चामुण्डा हृदयं रक्षतात् शिवा ।
ईशानी च भुजौ रक्षेत् कुक्षिं नाभिं च कालिका ॥ ४ ॥
अपर्णा ह्युदरं रक्षेत्कटिं बस्तिं शिवप्रिया ।
ऊरू रक्षतु कौमारी जया जानुद्वयं तथा ॥ ५॥
गुल्फौ पादौ सदा रक्षेद्ब्रह्माणी परमेश्वरी ।
सर्वाङ्गानि सदा रक्षेद्दुर्गा दुर्गार्तिनाशनी ॥ ६॥
नमो देव्यै महादेव्यै दुर्गायै सततं नमः ।
पुत्रसौख्यं देहि देहि गर्भरक्षां कुरुष्व नः ॥ ७॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ऐं
महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती रुपायै
नवकोटिमूर्त्यै दुर्गायै नमः ॥ ८
ह्रीं ह्रीं ह्रीं दुर्गार्तिनाशिनी सन्तानसौख्यम् देहि देहि
बन्ध्यत्वं मृतवत्सत्वं च हर हर गर्भरक्षां कुरु कुरु
सकलां बाधां कुलजां बाह्यजां कृतामकृतां च नाशय
नाशय सर्वगात्राणि रक्ष रक्ष गर्भं पोषय पोषय
सर्वोपद्रवं शोषय शोषय स्वाहा ॥ ९॥
फल श्रुतिः अनेन कवचेनाङ्गं सप्तवाराभिमन्त्रितम् ।
ऋतुस्नात जलं पीत्वा भवेत् गर्भवती ध्रुवम् ॥ १॥
गर्भ पात भये पीत्वा दृढगर्भा प्रजायते ।
अनेन कवचेनाथ मार्जिताया निशागमे ॥ २॥
सर्वबाधाविनिर्मुक्ता गर्भिणी स्यान्न संशयः ।
अनेन कवचेनेह ग्रन्थितं रक्तदोरकम् ॥ ३॥
कटि देशे धारयन्ती सुपुत्रसुख भागिनी ।
असूत पुत्रमिन्द्राणां जयन्तं यत्प्रभावतः ॥ ४॥
गुरूपदिष्टं वंशाख्यम् कवचं तदिदं सुखे ।
गुह्याद्गुह्यतरं चेदं न प्रकाश्यं हि सर्वतः ॥ ५॥
धारणात् पठनादस्य वंशच्छेदो न जायते ।
बाला विनश्यन्ति पतन्ति गर्भास्तत्राबलाः कष्टयुताश्च वन्ध्याः ॥ ६ ॥
बाल ग्रहैर्भूतगणैश्च रोगैर्न यत्र धर्माचरणं गृहे स्यात् ॥
॥ इति श्री ज्ञान भास्करे वंश वृद्धिकरं वंश कवचं
सम्पूर्णम् ॥Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्री महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

श्री महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
श्रीः पद्मा प्रकृतिः सत्त्वा शान्ता चिच्छक्तिरव्यया ।
केवला निष्कला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा ॥ १॥
व्योमपद्मकृताधारा परा व्योमामृतोद्भवा ।
निर्व्योमा व्योममध्यस्था पञ्चव्योमपदाश्रिता ॥ २॥
अच्युता व्योमनिलया परमानन्दरूपिणी ।
नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निर्विकारा निरीक्षणा ॥ ३॥
ज्ञानशक्तिः कर्तृशक्तिर्भोक्तृशक्तिः शिखावहा ।
स्नेहाभासा निरानन्दा विभूतिर्विमलाचला ॥ ४॥
अनन्ता वैष्णवी व्यक्ता विश्वानन्दा विकासिनी ।
शक्तिर्विभिन्नसर्वार्तिः समुद्रपरितोषिणी ॥ ५॥
मूर्तिः सनातनी हार्दी निस्तरङ्गा निरामया ।
ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी ॥ ६
स्वच्छन्दशक्तिर्गहना निष्कम्पार्चिः सुनिर्मला ।
स्वरूपा सर्वगा पारा बृंहिणी सुगुणोर्जिता ॥ ७॥
अकलङ्का निराधारा निःसङ्कल्पा निराश्रया ।
असङ्कीर्णा सुशान्ता च शाश्वती भासुरी स्थिरा ॥ ८॥
अनौपम्या निर्विकल्पा नियन्त्री यन्त्रवाहिनी ।
अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगा ॥ ९॥
अग्राह्या ग्राहिका गूढा गम्भीरा विश्वगोपिनी ।
अनिर्देश्या प्रतिहता निर्बीजा पावनी परा ॥ १०॥
अप्रतर्क्या परिमिता भवभ्रान्तिविनाशिनी ।
एका द्विरूपा त्रिविधा असङ्ख्याता सुरेश्वरी ॥ ११॥
सुप्रतिष्ठा महाधात्री स्थितिर्वृद्धिर्ध्रुवा गतिः ।
ईश्वरी महिमा ऋद्धिः प्रमोदा उज्ज्वलोद्यमा ॥ १२॥
अक्षया वर्द्धमाना च सुप्रकाशा विहङ्गमा ।
नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा ॥ १३॥
तपोनुदा च ज्वाला च सुदीप्तिश्चांशुमालिनी ।
अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी ॥ १४॥
अवदाता सुशुद्धा च अमोघाख्या परम्परा ।
सन्धानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी ॥ १५॥
लक्ष्मीस्तुष्टिर्महाधीरा शान्तिरापूरणानवा ।
अनुग्रहा शक्तिराद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधिः ॥ १६॥
सत्या प्रह्वा क्रिया योग्या अपर्णा ह्लादिनी शिवा ।
सम्पूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमृतावहा ॥ १७॥
रजोवत्यर्कप्रतिभाऽऽकर्षिणी कर्षिणी रसा ।
परा वसुमती देवी कान्तिः शान्तिर्मतिः कला ॥ १८॥
कला कलङ्करहिता विशालोद्दीपनी रतिः ।
सम्बोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा ॥ १९॥
अमृतस्यन्दिनी जीवा जननी खण्डिका स्थिरा ।
धूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुमतीरसा ॥ २०॥
शुद्धा ध्वनिः सृतिः सृष्टिर्विकृतिः कृष्टिरेव च ।
प्रापणी प्राणदा प्रह्वा विश्वा पाण्डुरवासिनी ॥ २१॥
अवनिर्वज्रनलिका चित्रा ब्रह्माण्डवासिनी ।
अनन्तरूपानन्तात्मानन्तस्थानन्तसम्भवा ॥ २२॥
महाशक्तिः प्राणशक्तिः प्राणदात्री ऋतम्भरा ।
महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा ॥ २३॥
प्रत्यक्षलक्ष्मीर्निष्कम्पा प्ररोहाबुद्धिगोचरा ।
नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी ॥ २४॥
सहस्राणी प्रधाना च न्यायवस्तुप्रकाशिका ।
सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी ॥ २५॥
नानास्वरूपचिद्धात्री शब्दपूर्वा पुरातनी ।
व्यक्ताव्यक्ता जीवकेशा सर्वेच्छापरिपूरिता ॥ २६॥
सङ्कल्पसिद्धा साङ्ख्येया तत्त्वगर्भा धरावहा ।
भूतरूपा चित्स्वरूपा त्रिगुणा गुणगर्विता ॥ २७॥
प्रजापतीश्वरी रौद्री सर्वाधारा सुखावहा ।
कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषनाशिनी ॥ २८॥
नीरूपोद्भिन्नसन्ताना सुयन्त्रा त्रिगुणालया ।
महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया ॥ २९॥
महास्त्री विमला कीर्तिर्जया लक्ष्मीर्निरञ्जना ।
प्रकृतिर्भगवन्माया शक्तिर्निद्रा यशस्करी ॥ ३०॥
चिन्ता बुद्धिर्यशः प्रज्ञा शान्तिः सुप्रीतिवर्द्धिनी ।
प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा ॥ ३१॥
काष्ठा निष्ठा प्रतिष्ठा च ज्येष्ठा श्रेष्ठा जयावहा ।
सर्वातिशायिनी प्रीतिर्विश्वशक्तिर्महाबला ॥ ३२॥
वरिष्ठा विजया वीरा जयन्ती विजयप्रदा ।
हृद्गृहा गोपिनी गुह्या गणगन्धर्वसेविता ॥ ३३॥
योगीश्वरी योगमाया योगिनी योगसिद्धिदा ।
महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया ॥ ३४॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रनमिता सुरासुरवरप्रदा ।
त्रिवर्त्मगा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा ॥ ३५॥
सुतारा तारिणी तारा दुर्गा सन्तारिणी परा ।
सुतारिणी तारयन्ती भूरितारेश्वरप्रभा ॥ ३६॥
गुह्यविद्या यज्ञविद्या महाविद्या सुशोभिता ।
अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी ॥ ३७॥
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिर्नयात्मिका ।
गौरी वागीश्वरी गोप्त्री गायत्री कमलोद्भवा ॥ ३८॥
विश्वम्भरा विश्वरूपा विश्वमाता वसुप्रदा ।
सिद्धिः स्वाहा स्वधा स्वस्तिः सुधा सर्वार्थसाधिनी ॥ ३९॥
इच्छा सृष्टिर्द्युतिर्भूतिः कीर्तिः श्रद्धा दयामतिः ।
श्रुतिर्मेधा धृतिर्ह्रीः श्रीर्विद्या विबुधवन्दिता ॥ ४०॥
अनसूया घृणा नीतिर्निर्वृतिः कामधुक्करा ।
प्रतिज्ञा सन्ततिर्भूतिर्द्यौः प्रज्ञा विश्वमानिनी ॥ ४१॥
स्मृतिर्वाग्विश्वजननी पश्यन्ती मध्यमा समा ।
सन्ध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती ॥ ४२॥
काङ्क्षा माया महामाया मोहिनी माधवप्रिया ।
सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी ॥ ४३॥
सुधौतकनकप्रख्या सुवर्णकमलासना ।
हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा ॥ ४४॥
चन्द्रा हिरण्मयी ज्योत्स्ना रम्या शोभा शुभावहा ।
त्रैलोक्यमण्डना नारी नरेश्वरवरार्चिता ॥ ४५॥
त्रैलोक्यसुन्दरी रामा महाविभववाहिनी ।
पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषिता ॥ ४६॥
पद्मयुग्मधरा कान्ता दिव्याभरणभूषिता ।
विचित्ररत्नमुकुटा विचित्राम्बरभूषणा ॥ ४७॥
विचित्रमाल्यगन्धाढ्या विचित्रायुधवाहना ।
महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवन्दिता ॥ ४८॥
कालसङ्कर्षिणी घोरा तत्त्वसङ्कर्षिणीकला ।
जगत्सम्पूरणी विश्वा महाविभवभूषणा ॥ ४९॥
वारुणी वरदा व्याख्या घण्टाकर्णविराजिता ।
नृसिंही भैरवी ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी ॥ ५०॥
ऐन्द्री कामधेनुः सृष्टिः कामयोनिर्महाप्रभा ।
दृष्टा काम्या विश्वशक्तिर्बीजगत्यात्मदर्शना ॥ ५१॥
गरुडारूढहृदया चान्द्री श्रीर्मधुरानना ।
महोग्ररूपा वाराही नारसिंही हतासुरा ॥ ५२॥
युगान्तहुतभुग्ज्वाला कराला पिङ्गलाकला ।
त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी ॥ ५३॥
महोत्कटा महारक्ता महाचण्डा महासना ।
शङ्खिनी लेखिनी स्वस्था लिखिता खेचरेश्वरी ॥ ५४॥
भद्रकाली चैकवीरा कौमारी भवमालिनी ।
कल्याणी कामधुग्ज्वालामुखी चोत्पलमालिका ॥ ५५॥
बालिका धनदा सूर्या हृदयोत्पलमालिका ।
अजिता वर्षिणी रीतिर्भरुण्डा गरुडासना ॥ ५६॥
वैश्वानरी महामाया महाकाली विभीषणा ।
महामन्दारविभवा शिवानन्दा रतिप्रिया ॥ ५७॥
उद्रीतिः पद्ममाला च धर्मवेगा विभावनी ।
सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया ॥ ५८॥
सहसावर्तमाना च हस्तिनादप्रबोधिनी ।
हिरण्यपद्मवर्णा च हरिभद्रा सुदुर्द्धरा ॥ ५९॥
सूर्या हिरण्यप्रकटसदृशी हेममालिनी ।
पद्मानना नित्यपुष्टा देवमाता मृतोद्भवा ॥ ६०॥
महाधना च या शृङ्गी कर्द्दमी कम्बुकन्धरा ।
आदित्यवर्णा चन्द्राभा गन्धद्वारा दुरासदा ॥ ६१॥
वराचिता वरारोहा वरेण्या विष्णुवल्लभा ।
कल्याणी वरदा वामा वामेशी विन्ध्यवासिनी ॥ ६२॥
योगनिद्रा योगरता देवकी कामरूपिणी ।
कंसविद्राविणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा ॥ ६३॥
कात्यायनी कालरात्रिर्निशितृप्ता सुदुर्जया ।
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानाम्परिरक्षिणी ॥ ६४॥
बहुरूपा स्वरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ।
घण्टानिनादबहुला जीमूतध्वनिनिःस्वना ॥ ६५॥
महादेवेन्द्रमथिनी भ्रुकुटीकुटिलानना ।
सत्योपयाचिता चैका कौबेरी ब्रह्मचारिणी ॥ ६६॥
आर्या यशोदा सुतदा धर्मकामार्थमोक्षदा ।
दारिद्र्यदुःखशमनी घोरदुर्गार्तिनाशिनी ॥ ६७॥
भक्तार्तिशमनी भव्या भवभर्गापहारिणी ।
क्षीराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा ॥ ६८॥
रुक्मिणी रोहिणी सीता सत्यभामा यशस्विनी ।
प्रज्ञाधारामितप्रज्ञा वेदमाता यशोवती ॥ ६९॥
समाधिर्भावना मैत्री करुणा भक्तवत्सला ।
अन्तर्वेदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरागतिः ॥ ७०॥
दीक्षा वीक्षा परीक्षा च समीक्षा वीरवत्सला ।
अम्बिका सुरभिः सिद्धा सिद्धविद्याधरार्चिता ॥ ७१॥
सुदीक्षा लेलिहाना च कराला विश्वपूरका ।
विश्वसन्धारिणी दीप्तिस्तापनी ताण्डवप्रिया ॥ ७२॥
उद्भवा विरजा राज्ञी तापनी बिन्दुमालिनी ।
क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा ॥ ७३॥
हव्यगर्भा चाज्यगर्भा जुह्वतोयज्ञसम्भवा ।
आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया ॥ ७४॥
मातृका माधवी मुख्या मोक्षलक्ष्मीर्महर्द्धिदा ।
सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमङ्गला ॥ ७५॥
श्वेता सुशुक्लवसना शुक्लमाल्यानुलेपना ।
हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हृत्कमलालया ॥ ७६॥
सितातपत्रा सुश्रोणी पद्मपत्रायतेक्षणा ।
सावित्री सत्यसङ्कल्पा कामदा कामकामिनी ॥ ७७॥
दर्शनीया दृशा दृश्या स्पृश्या सेव्या वराङ्गना ।
भोगप्रिया भोगवती भोगीन्द्रशयनासना ॥ ७८॥
आर्द्रा पुष्करिणी पुण्या पावनी पापसूदनी ।
श्रीमती च शुभाकारा परमैश्वर्यभूतिदा ॥ ७९॥
अचिन्त्यानन्तविभवा भवभावविभावनी ।
निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता ॥ ८०॥
बला बलाधिका देवी गौतमी गोकुलालया ।
तोषिणी पूर्णचन्द्राभा एकानन्दा शतानना ॥ ८१॥
उद्याननगरद्वारहर्म्योपवनवासिनी ।
कूष्माण्डा दारुणा चण्डा किराती नन्दनालया ॥ ८२॥
कालायना कालगम्या भयदा भयनाशिनी ।
सौदामनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी ॥ ८३॥
जगन्माता भयकरी भूतधात्री सुदुर्लभा ।
काश्यपी शुभदाता च वनमाला शुभावरा ॥ ८४॥
धन्या धन्येश्वरी धन्या रत्नदा वसुवर्द्धिनी ।
गान्धर्वी रेवती गङ्गा शकुनी विमलानना ॥ ८५॥
इडा शान्तिकरी चैव तामसी कमलालया ।
आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुसुमाश्रया ॥ ८६॥
जगत्प्रिया च सरथा दुर्जया खगवाहना ।
मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता ॥ ८७॥
व्योमलक्ष्मीर्महालक्ष्मीस्तेजोलक्ष्मीः सुजाज्वला ।
रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्गन्धलक्ष्मीर्वनाश्रया ॥ ८८॥
श्रवणा श्रावणी नेत्री रसनाप्राणचारिणी ।
विरिञ्चिमाता विभवा वरवारिजवाहना ॥ ८९॥
वीर्या वीरेश्वरी वन्द्या विशोका वसुवर्द्धिनी ।
अनाहता कुण्डलिनी नलिनी वनवासिनी ॥ ९०॥
गान्धारिणीन्द्रनमिता सुरेन्द्रनमिता सती ।
सर्वमङ्गल्यमाङ्गल्या सर्वकामसमृद्धिदा ॥ ९१॥
सर्वानन्दा महानन्दा सत्कीर्तिः सिद्धसेविता ।
सिनीवाली कुहू राका अमा चानुमतिर्द्युतिः ॥ ९२॥
अरुन्धती वसुमती भार्गवी वास्तुदेवता ।
मायूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना ॥ ९३॥
अनघा धरणिर्धीरा धमनी मणिभूषणा ।
राजश्री रूपसहिता ब्रह्मश्रीर्ब्रह्मवन्दिता ॥ ९४॥
जयश्रीर्जयदा ज्ञेया सर्गश्रीः स्वर्गतिः सताम् ।
सुपुष्पा पुष्पनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया ॥ ९५॥
धनुर्लक्ष्मीस्त्वमिलिता परक्रोधनिवारिणी ।
कद्रूर्द्धनायुः कपिला सुरसा सुरमोहिनी ॥ ९६॥
महाश्वेता महानीला महामूर्तिर्विषापहा ।
सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्तृप्तिर्व्याप्तिः प्रभाकरी ॥ ९७॥
तेजोवती पद्मबोधा मदलेखारुणावती ।
रत्ना रत्नावली भूता शतधामा शतापहा ॥ ९८॥
त्रिगुणा घोषिणी रक्ष्या नर्द्दिनी घोषवर्जिता ।
साध्या दितिर्दितिदेवी मृगवाहा मृगाङ्कगा ॥ ९९॥
चित्रनीलोत्पलगता वृषरत्नकराश्रया ।
हिरण्यरजतद्वन्द्वा शङ्खभद्रासनास्थिता ॥ १००॥
गोमूत्रगोमयक्षीरदधिसर्पिर्जलाश्रया ।
मरीचिश्चीरवसना पूर्णा चन्द्रार्कविष्टरा ॥ १०१॥
सुसूक्ष्मा निर्वृतिः स्थूला निवृत्तारातिरेव च ।
मरीचिज्वालिनी धूम्रा हव्यवाहा हिरण्यदा ॥ १०२॥
दायिनी कालिनी सिद्धिः शोषिणी सम्प्रबोधिनी ।
भास्वरा संहतिस्तीक्ष्णा प्रचण्डज्वलनोज्ज्वला ॥ १०३॥
साङ्गा प्रचण्डा दीप्ता च वैद्युतिः सुमहाद्युतिः ।
कपिला नीलरक्ता च सुषुम्णा विस्फुलिङ्गिनी ॥ १०४॥
अर्चिष्मती रिपुहरा दीर्घा धूमावली जरा ।
सम्पूर्णमण्डला पूषा स्रंसिनी सुमनोहरा ॥ १०५॥
जया पुष्टिकरीच्छाया मानसा हृदयोज्ज्वला ।
सुवर्णकरणी श्रेष्ठा मृतसञ्जीविनीरणे ॥ १०६॥
विशल्यकरणी शुभ्रा सन्धिनी परमौषधिः ।
ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐन्दवी रत्नसम्भवा ॥ १०७॥
विद्युत्प्रभा बिन्दुमती त्रिस्वभावगुणाम्बिका ।
नित्योदिता नित्यहृष्टा नित्यकामकरीषिणी ॥ १०८॥
पद्माङ्का वज्रचिह्ना च वक्रदण्डविभासिनी ।
विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी ॥ १०९॥
मानिनी मङ्गला मान्या मालिनी मानदायिनी ।
विश्वेश्वरी गणवती मण्डला मण्डलेश्वरी ॥ ११०॥
हरिप्रिया भौमसुता मनोज्ञा मतिदायिनी ।
प्रत्यङ्गिरा सोमगुप्ता मनोऽभिज्ञा वदन्मतिः ॥ १११॥
यशोधरा रत्नमाला कृष्णा त्रैलोक्यबन्धनी ।
अमृता धारिणी हर्षा विनता वल्लकी शची ॥ ११२॥
सङ्कल्पा भामिनी मिश्रा कादम्बर्यमृतप्रभा ।
अगता निर्गता वज्रा सुहिता संहिताक्षता ॥ ११३॥
सर्वार्थसाधनकरी धातुर्धारणिकामला ।
करुणाधारसम्भूता कमलाक्षी शशिप्रिया ॥ ११४॥
सौम्यरूपा महादीप्ता महाज्वाला विकाशिनी ।
माला काञ्चनमाला च सद्वज्रा कनकप्रभा ॥ ११५॥
प्रक्रिया परमा योक्त्री क्षोभिका च सुखोदया ।
विजृम्भणा च वज्राख्या शृङ्खला कमलेक्षणा ॥ ११६॥
जयङ्करी मधुमती हरिता शशिनी शिवा ।
मूलप्रकृतिरीशानी योगमाता मनोजवा ॥ ११७॥
धर्मोदया भानुमती सर्वाभासा सुखावहा ।
धुरन्धरा च बाला च धर्मसेव्या तथागता ॥ ११८॥
सुकुमारा सौम्यमुखी सौम्यसम्बोधनोत्तमा ।
सुमुखी सर्वतोभद्रा गुह्यशक्तिर्गुहालया ॥ ११९॥
हलायुधा चैकवीरा सर्वशस्त्रसुधारिणी ।
व्योमशक्तिर्महादेहा व्योमगा मधुमन्मयी ॥ १२०॥
गङ्गा वितस्ता यमुना चन्द्रभागा सरस्वती ।
तिलोत्तमोर्वशी रम्भा स्वामिनी सुरसुन्दरी ॥ १२१॥
बाणप्रहरणावाला बिम्बोष्ठी चारुहासिनी ।
ककुद्मिनी चारुपृष्ठा दृष्टादृष्टफलप्रदा ॥ १२२॥
काम्याचरी च काम्या च कामाचारविहारिणी ।
हिमशैलेन्द्रसङ्काशा गजेन्द्रवरवाहना ॥ १२३॥
अशेषसुखसौभाग्यसम्पदा योनिरुत्तमा ।
सर्वोत्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया ॥ १२४॥
सर्वाङ्गयोनिः साव्यक्ता सम्प्रधानेश्वरेश्वरी ।
विष्णुवक्षःस्थलगता किमतः परमुच्यते ॥ १२५॥
परा निर्महिमा देवी हरिवक्षःस्थलाश्रया ।
सा देवी पापहन्त्री च सान्निध्यं कुरुतान्मम ॥ १२६॥
इति नाम्नां सहस्रं तु लक्ष्म्याः प्रोक्तं शुभावहम् ।
परावरेण भेदेन मुख्यगौणेन भागतः ॥ १२७॥
यश्चैतत् कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद् वापि पद्मज ।
शुचिः समाहितो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ १२८॥
श्रीनिवासं समभ्यर्च्य पुष्पधूपानुलेपनैः ।
भोगैश्च मधुपर्काद्यैर्यथाशक्ति जगद्गुरुम् ॥ १२९॥
तत्पार्श्वस्थां श्रियं देवीं सम्पूज्य श्रीधरप्रियाम् ।
ततो नामसहस्रोण तोषयेत् परमेश्वरीम् ॥ १३०॥
नामरत्नावलीस्तोत्रमिदं यः सततं पठेत् ।
प्रसादाभिमुखीलक्ष्मीः सर्वं तस्मै प्रयच्छति ॥ १३१॥
यस्या लक्ष्म्याश्च सम्भूताः शक्तयो विश्वगाः सदा ।
कारणत्वे न तिष्ठन्ति जगत्यस्मिंश्चराचरे ॥ १३२॥
तस्मात् प्रीता जगन्माता श्रीर्यस्याच्युतवल्लभा ।
सुप्रीताः शक्तयस्तस्य सिद्धिमिष्टां दिशन्ति हि ॥ १३३॥
एक एव जगत्स्वामी शक्तिमानच्युतः प्रभुः ।
तदंशशक्तिमन्तोऽन्ये ब्रह्मेशानादयो यथा ॥ १३४॥
तथैवैका परा शक्तिः श्रीस्तस्य करुणाश्रया ।
ज्ञानादिषाङ्गुण्यमयी या प्रोक्ता प्रकृतिः परा ॥ १३५॥
एकैव शक्तिः श्रीस्तस्या द्वितीयात्मनि वर्तते ।
परा परेशी सर्वेशी सर्वाकारा सनातनी ॥ १३६॥
अनन्तनामधेया च शक्तिचक्रस्य नायिका ।
जगच्चराचरमिदं सर्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥ १३७॥
तस्मादेकैव परमा श्रीर्ज्ञेया विश्वरूपिणी ।
सौम्या सौम्येन रूपेण संस्थिता नटजीववत् ॥ १३८॥
यो यो जगति पुम्भावः स विष्णुरिति निश्चयः ।
या या तु नारीभावस्था तत्र लक्ष्मीर्व्यवस्थिता ॥ १३९॥
प्रकृतेः पुरुषाच्चान्यस्तृतीयो नैव विद्यते ।
अथ किं बहुनोक्तेन नरनारीमयो हरिः ॥ १४०॥
अनेकभेदभिन्नस्तु क्रियते परमेश्वरः ।
महाविभूतिं दयितां ये स्तुवन्त्यच्युतप्रियाम् ॥ १४१॥
ते प्राप्नुवन्ति परमां लक्ष्मीं संशुद्धचेतसः ।
पद्मयोनिरिदं प्राप्य पठन् स्तोत्रमिदं क्रमात् ॥ १४२॥
दिव्यमष्टगुणैश्वर्यं तत्प्रसादाच्च लब्धवान् ।
सकामानां च फलदामकामानां च मोक्षदाम् ॥ १४३॥
पुस्तकाख्यां भयत्रात्रीं सितवस्त्रां त्रिलोचनाम् ।
महापद्मनिषण्णां तां लक्ष्मीमजरतां नमः ॥ १४४॥
करयुगलगृहीतं पूर्णकुम्भं दधाना
क्वचिदमलगतस्था शङ्खपद्माक्षपाणिः ।
क्वचिदपि दयिताङ्गे चामरव्यग्रहस्ता
क्वचिदपि सृणिपाशं बिभ्रती हेमकान्तिः ॥ १४५॥
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
॥ इत्यादिब्रह्मपुराणे काश्मीरवर्णने हिरण्यगर्भहृदये
सर्वकामप्रदायकं पुरुषोत्तमप्रोक्तं
श्रीलक्ष्मीसहस्रनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥

Thursday, 3 March 2016

विजया एकादशी,, 5 मार्च शनिवार.2016,,फाल्गुन कृष्ण एकादशी

विजया एकादशी,, 5 मार्च शनिवार.2016,,फाल्गुन कृष्ण एकादशी,,
एकादशी तिथि प्रारम्भ = 4 /मार्च/2016 को 18,,02 बजे
एकादशी तिथि समाप्त = 5 /मार्च/ 2016 को 17,,11 बजे
धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले ,, हे जनार्दन! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए।
श्री भगवान बोले हे राजन् ,, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य को विजय प्राप्त‍ होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है। इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान कहिए।
ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कही। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहाँ पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में चल दिए।
घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुँचे तो जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया। वहाँ से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।
श्री रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सम्पत्ति से लंका को प्रस्थान किया। जब श्री रामचंद्रजी समुद्र से किनारे पहुँचे तब उन्होंने मगरमच्छ आदि से युक्त उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे।
श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदालभ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए।
मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषे! मैं अपनी सेना ‍सहित यहाँ आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूँ। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूँ।
वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,
इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या मिट्‍टी का एक घड़ा बनाएँ। उस घड़े को जल से भरकर तथा पाँच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एका‍दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें।
तत्पश्चात घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें ‍और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें। हे राम! यदि तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी। श्री रामचंद्रजी ने ऋषि के कथनानुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई।
अत: हे राजन्! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र! जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

Thursday, 18 February 2016

ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंह करुणारस स्तोत्रम्

ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंह करुणारस स्तोत्रम् ॥

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते ।
(पाठभेद- भोगीन्द्रभोगमणिरञ्जित पुण्यमूर्ते)
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १॥

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २॥

संसारदावदहनाकरभीकरोरु-
(पाठभेद-संसारदावदहनातुरभीकरोरु-)
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य
(पाठभेद- त्वत्पादपद्मसरसीं शरणागतस्य)
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ३॥

संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य ।
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ४॥

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ५॥

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश ।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ६॥

संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ७॥

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ८॥

संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ९॥

संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् ।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १०॥

संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य ।
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ११॥

बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १२॥

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १३॥

एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥

(पाठभेद-देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम्)॥।१४॥

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १५॥

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।
भक्तानुरुक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १६॥

लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥ १७॥

(पाठभेद- यन्माययोर्जितवपुःप्रचुरप्रवाह-
मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् । ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥ १७॥)
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
Photo

ॐ श्री लक्ष्मी नरसिंह

ॐ श्री लक्ष्मी नरसिंह सुप्रभातस्तोत्रम् (यादगिरि) ॥
। श्री यादगिरि लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम्
श्री वङ्गीपुरम् नरसिंहाचार्यरचित ।
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल! कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥ १॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गळं कुरु ॥ २॥
यादाद्रिनाथशुभमन्दिरकल्पवल्लि
पद्मालये जननि पद्मभवादिवन्द्ये ।
भक्तार्तिभञ्जनि दयामयदिव्यरूपे
लक्ष्मीनृसिंहदयिते तव सुप्रभातम् ॥ ३॥
ज्वालानृसिंह करुणामय दिव्यमूर्ते
योगाभिनन्दन नृसिंह दयासमुद्र! ।
लक्ष्मीनृसिंह शरणागतपारिजात
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ४॥
श्रीरङ्गवेङ्कटमहीधरहस्तिशैल
श्री यादवाद्रिमुखसत्त्वनिकेतनानि ।
स्थानानि तेकिल वदन्ति परावरज्ञाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ५॥
ब्रह्मादयस्सुरवर मुनिपुङ्गवाश्च
त्वां सेवितुं विविधमङ्गळवस्तुहस्ताः ।
द्वारे वसन्ति नरसिंह भवाब्धिपोत
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ६॥

प्रह्लाद नारद पराशर पुण्डरीक
व्यासादिभक्तरसिका भवदीयसेवाम् ।
वाञ्छन्त्यनन्यहृदया करुणासमुद्र
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ७॥

त्वद्दास्यभोगरसिकाश्शठजिन्मुखार्याः
रामानुजादिमहनीयगुरुप्रधानाः ।
सेवार्थ मत्र भवदीयगृहाङ्गणस्थाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ८॥

भक्ता स्त्वदीयपदपङ्कजसक्तचित्ताः
काल्यं विधाय तवकन्दर मन्दिराग्रे ।
त्वद्दर्शनोत्सुकतया निबिडं श्रयन्ते
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ९॥

दिव्यावतारदशके नरसिंह ते तु
दिव्यावतारमहिमा नहि देवगम्यः ।
प्रह्लाददानवशिशोःकिल भक्तिगम्यः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १०॥

श्रीयादवाद्रिशिखरे त्वमहोबिलेऽपि
सिंहाचले च शुभमङ्गळशैलराजे ।
वेदाचलादि गिरि मूर्धसु सुस्थितोसि
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ११॥

काम्यार्थिनो वरदकल्पक कल्पकं त्वां
सेवार्थिनः स्सुजनसेव्यपदद्वयं त्वाम् ।
भक्त्या विनम्र शिरसा प्रणमन्ति सर्वे
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १२॥

त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्ति पापाः
त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्ति दैत्याः ।
त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्तिरोगाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १३॥

लक्ष्मीनृसिंह! जगदीश! सुरेश! विष्णो
जिष्णो! जनार्दन! परात्पर विश्वरूप ।
विश्वप्रभातकरणाय कृतावतार
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १४॥

त्वन्नाममन्त्र पठनंकिलसुप्रभातं
अस्माकमस्तु तवचास्तु च सुप्रभातम् ।
अस्मत्समुद्धरणमेव विचित्रगाध
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १५॥

त्वत् पूजका परिव्रुढा परिचारकाश्च
नित्यार्चनाय विधिवद्विहित स्वक्रुत्याः ।
यत्तस्त्वदीय शुभगह्वर मन्दिराग्रे
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १६॥

प्राभातकीमुपचितिम् परिकल्पयन्तः
कुण्डाश्च पूर्णजलकुम्भमुपाहरन्तः ।
श्रीवैष्णवाः समुपयान्तिहरे! नृसिंह
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १७॥

सूर्योऽभ्युदेति विकसन्ति सरोरुहाणि
नीलोत्पलानि हि भवन्ति निमीलितानि ।
प्राग्दिङ्मुखेरुणगभस्तिगणोऽभ्युदेति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १८॥

मन्दानिलस्सुर नदीकमलोदरेशु
मन्दंविगाह्य शुभसौरभ मादधानः ।
हर्षप्रकर्षमुपयाति च सेवितुं त्वां
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १९॥

तारागणोवियति मज्जति सुप्रभाते
सूर्येणसाकमवलोकयितुं त्वदीयम् ।
श्रीसुप्रभातमवभासित सर्वलोकं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २०॥

पक्षिस्वनाश्चपरितःपरिसम्पतन्ति
कूजन्तिकोकिलगणाःकलकण्ठरावैः ।
वाचा विशुद्धकलयानुवदन्तिकीराः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २१॥

पल्लीषु वल्लवजनाःस्वगृहाङ्गणेषु
धेनूर्दुहन्ति विनिभान्ति विशेषदृष्ट्या ।
गोपालबाल इव भक्तहृदम्बुजेषु
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २२॥

गाढान्धकारपटलम् गगनञ्जहाति
मोहान्धकार इव सन्मनुजम् समस्तम् ।
रागोविराग इव संविशति प्रकामं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २३॥

निद्राजहाति हि जनान् सुमुनिं यधावत्
प्रज्ञाप्युदेति हि जनेषु मुनौयधावत् ।
सक्तिर्जनेषु हि यथा च मुनौविरक्तिः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २४॥

फुल्लानिपङ्कजवनानि विशुद्धसत्त्व
फुल्लानि सज्जनमनःकमलानि यद्वत् ।
भाश्शुद्धसत्वमिव भाति विदिक्षु दिक्षु
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २५॥

ब्रह्मास्वयंसुरगणैस्सहलोकपालैः
धामप्रविश्य तव मण्डपगोपुराढ्यम् ।
पञ्चाङ्गशुद्धिमभिवर्णयति त्वदीयां
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २६॥

विख्यातवैद्यजन वञ्चकरोगजाल
विख्यातवैद्य इति रोगनिपीडितास्त्वाम् ।
निश्चित्यधाम तव दूरत आपतन्ति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २७॥

भूतग्रहादि बलवत्तर तापयुक्ताः
बाणावतीमुख महोग्रपिशाच विद्धाः ।
स्नाताःप्रदक्षिणविधा वुपयान्तिनाथ
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २८॥

सन्तानहीन वनितास्सरसि त्वदीये
स्नात्वाजलार्द्रवसनास्तव दर्शनाय ।
आयान्तिसन्ततिवरप्रद देवदेव
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २९॥

यद्दुष्ट संहरणमुत्तमलोकरक्षा
दीक्षां व्यनक्ति तवरूप महोनृसिंह ।
तच्चात्र यादगिरिमूर्थनिसंविभाति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३०॥

प्रह्लाद पुण्यजनि पुण्यबलात्प्रतीतं
रूपं जनस्तवहरे निगमान्तवेद्यम् ।
प्रातःस्मरंस्तरति संस्मारणाम्बुराशिं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३१॥

श्रीसुप्रभातमिदमच्युतकैतवोक्त
मप्यच्युतं भवतुभक्तजनैकवेद्यम् ।
लक्ष्मीनृसिंह तव नामशुभप्रभावात्
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३२॥

इत्थं यादाद्रिनाथस्य सुप्रभात मतन्द्रिताः ।
ये पठन्ति सदा भक्त्या ते नरास्सुखभागिनः ॥ ३३॥
'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
इति श्री लक्ष्मी नरसिंह सुप्रभातम् ।

Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...