Tuesday, 17 October 2017

दीपावली के दिन करने पर बहुत जल्दी लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है। यहां लक्ष्मी कृपा पाने के लिए 51 उपाय

दीपावली के दिन करने पर बहुत जल्दी लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है। यहां लक्ष्मी कृपा पाने के लिए 51 उपाय
  बताए जा रहे हैं और ये उपाय सभी राशि के लोगों द्वारा किए जा सकते हैं। यदि आप चाहे तो इन उपायों में से कई उपाय भी कर सकते हैं
1। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन में हल्दी की गांठ भी रखें। पूजन पूर्ण होने पर हल्दी की गांठ को घर में उस स्थान पर रखें, जहां धन रखा जाता है।
2. दीपावली के दिन यदि संभव हो सके तो किसी किन्नर से उसकी खुशी से एक रुपया लें और इस सिक्के को अपने पर्स में रखें। बरकत बनी रहेगी।

3. दीपावली के दिन घर से निकलते ही यदि कोई सुहागन स्त्री लाल रंग की पारंपरिक ड्रेस में दिख जाए तो समझ लें आप पर महालक्ष्मी की कृपा होने वाली है। यह एक शुभ शकुन है। ऐसा होने पर किसी जरूरतमंद सुहागन स्त्री को सुहाग की सामग्री दान करें।

4. दीपावली की रात में लक्ष्मी और कुबेर देव का पूजन करें और यहां दिए एक मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन-धान्यधिपतये धन-धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा।

5. दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के बाद घर के सभी कमरों में शंख और घंटी बजाना चाहिए। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता बाहर चली जाती है। मां लक्ष्मी घर में आती हैं।

6. महालक्ष्मी के पूजन में गोमती चक्र भी रखना चाहिए। गोमती चक्र भी घर में धन संबंधी लाभ दिलाता है।

7. दीपावली पर तेल का दीपक जलाएं और दीपक में एक लौंग डालकर हनुमानजी की आरती करें। किसी मंदिर हनुमान मंदिर जाकर ऐसा दीपक भी लगा सकते हैं।

8. रात को सोने से पहले किसी चौराहे पर तेल का दीपक जलाएं और घर लौटकर आ जाएं। ध्यान रखें पीछे पलटकर न देखें।

9. दीपावली के दिन अशोक के पेड़ के पत्तों से वंदनद्वार बनाएं और इसे मुख्य दरवाजे पर लगाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाएगी।

10. किसी शिव मंदिर जाएं और वहां शिवलिंग पर अक्षत यानी चावल चढ़ाएं। ध्यान रहें सभी चावल पूर्ण होने चाहिए। खंडित चावल शिवलिंग पर चढ़ाना नहीं चाहिए।

11. अपने घर के आसपास किसी पीपल के पेड़ के नीचे तेल का दीपक जलाएं। यह उपाय दीपावली की रात में किया जाना चाहिए। ध्यान रखें दीपक लगाकर चुपचाप अपने घर लौट आए, पीछे पलटकर न देखें।

12. यदि संभव हो सके तो दीपावली की देर रात तक घर का मुख्य दरवाजा खुला रखें। ऐसा माना जाता है कि दिवाली की रात में महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों के घर जाती हैं।

13. महालक्ष्मी के पूजन में पीली कौड़ियां भी रखनी चाहिए। ये कौडिय़ा पूजन में रखने से महालक्ष्मी बहुत ही जल्द प्रसन्न होती हैं। आपकी धन संबंधी सभी परेशानियां खत्म हो जाएंगी।

14. दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा करते समय एक थोड़ा बड़ा घी का दीपक जलाएं, जिसमें नौ बत्तियां लगाई जा सके। सभी 9 बत्तियां जलाएं और लक्ष्मी पूजा करें।

15. दीपावली की रात में लक्ष्मी पूजन के साथ ही अपनी दुकान, कम्प्यूटर आदि ऐसी चीजों की भी पूजा करें, जो आपकी कमाई का साधन हैं।

16. लक्ष्मी पूजन के समय एक नारियल लें और उस पर अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि अर्पित करें और उसे भी पूजा में रखें।

17. दीपावली के दिन झाड़ू अवश्य खरीदना चाहिए। पूरे घर की सफाई नई झाड़ू से करें। जब झाड़ू का काम न हो तो उसे छिपाकर रखना चाहिए।

18. इस दिन अमावस्या रहती है और इस तिथि पर पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने पर शनि के दोष और कालसर्प दोष समाप्त हो जाते हैं।

19. प्रथम पूज्य श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित करें। दूर्वा की 21 गांठ गणेशजी को चढ़ाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। दीपावली के शुभ दिन यह उपाय करने से गणेशजी के साथ महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है।

20. दीपावली से प्रतिदिन सुबह घर से निकलने से पहले केसर का तिलक लगाएं। ऐसा हर रोज करें, महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।

21. यदि संभव हो सके तो दीपावली पर किसी गरीब व्यक्ति को काले कंबल का दान करें। ऐसा करने पर शनि और राहु-केतु के दोष शांत होंगे और कार्यों में आ रही रुकावटें दूर हो जाएंगी।

22. महालक्ष्मी के पूजन में दक्षिणावर्ती शंख भी रखना चाहिए। यह शंख महालक्ष्मी को अतिप्रिय है। इसकी पूजा करने पर घर में सुख-शांति का वास होता है।

23. महालक्ष्मी के चित्र का पूजन करें, जिसमें लक्ष्मी अपने स्वामी भगवान विष्णु के पैरों के पास बैठी हैं। ऐसे चित्र का पूजन करने पर देवी बहुत जल्द प्रसन्न होती हैं।

24. दीपावली के पांचों दिनों में घर में शांति बनाए रखें। किसी भी प्रकार का क्लेश, वाद-विवाद न करें। जिस घर में शांति रहती है वहां देवी लक्ष्मी हमेशा निवास करती हैं।

25. दीपावली पर ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करते समय नहाने के पानी में कच्चा दूध और गंगाजल मिलाएं। स्नान के बाद अच्छे वस्त्र धारण करें और सूर्य को जल अर्पित करें। जल अर्पित करने के साथ ही लाल पुष्प भी सूर्य को चढ़ाएं। किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज का दान करें। अनाज के साथ ही वस्त्र का दान करना भी श्रेष्ठ रहता है।

26. दीपावाली पर श्रीसूक्त एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। रामरक्षा स्तोत्र या हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ भी किया जा सकता है।

27.  महालक्ष्मी को तुलसी के पत्ते भी चढ़ाने चाहिए। लक्ष्मी पूजा में दीपक दाएं, अगरबत्ती बाएं, पुष्य सामने व नैवेद्य थाली में दक्षिण में रखना श्रेष्ठ रहता है।

28. महालक्ष्मी के मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम:,  इस मंत्र का जप करें। मंत्र जप के लिए कमल के गट्टे की माला का उपयोग करें। दीपावली पर कम से कम 108 बार इस मंत्र का जप करें।

29. दीपावली से यह एक नियम रोज के लिए बना लें कि सुबह जब भी उठे तो उठते ही सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों का दर्शन करना चाहिए।

30. दीपावली पर श्रीयंत्र के सामने अगरबत्ती व दीपक लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें। फिर श्रीयंत्र का पूजन करें और कमलगट्टे की माला से महालक्ष्मी के मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम: का जप करें।

31. किसी में मंदिर झाड़ू का दान करें। यदि आपके घर के आसपास कहीं महालक्ष्मी का मंदिर हो तो वहां गुलाब की सुगंध वाली अगरबत्ती का दान करें।

32. घर के मुख्य द्वार पर कुमकुम से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। द्वार के दोनों ओर कुमकुम से ही शुभ-लाभ लिखें।

33. लक्ष्मी पूजन में सुपारी रखें। सुपारी पर लाल धागा लपेटकर अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि पूजन सामग्री से पूजा करें और पूजन के बाद इस सुपारी को तिजोरी में रखें।

34. दीपावली के दिन श्वेतार्क गणेश की प्रतिमा घर में लाएंगे तो हमेशा बरकत बनी रहेगी। परिवार के सदस्यों को पैसों की कमी नहीं आएगी।

35. यदि संभव हो सके तो इस दिन किसी तालाब या नदी में मछलियों को आटे की गोलियां बनाकर खिलाएं। शास्त्रों के अनुसार इस पुण्य कर्म से बड़े-बड़े संकट भी दूर हो जाते हैं।

36. घर में स्थित तुलसी के पौधे के पास दीपावली की रात में दीपक जलाएं। तुलसी को वस्त्र अर्पित करें।

37. स्फटिक से बना श्रीयंत्र दीपावली के दिन बाजार से खरीदकर लाएं। श्रीयंत्र को लाल वस्त्र में लपेटकर तिजोरी में रखें। कभी भी पैसों की कमी नहीं होगी।

38. दीपावली पर सुबह-सुबह शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल अर्पित करें। जल में यदि केसर भी डालेंगे तो श्रेष्ठ रहेगा।

39. जो लोग धन का संचय बढ़ाना चाहते हैं, उन्हें तिजोरी में लाल कपड़ा बिछाना चाहिए। इसके प्रभाव से धन का संचय बढ़ता है। महालक्ष्मी का ऐसा फोटो रखें, जिसमें लक्ष्मी बैठी हुईं दिखाई दे रही हैं।

40. उपाय के अनुसार दीपावली के दिन 3 अभिमंत्रित गोमती चक्र, 3 पीली कौडिय़ां और 3 हल्दी गांठों को एक पीले कपड़ें में बांधें। इसके बाद इस पोटली को तिजोरी में रखें। धन लाभ के योग बनने लगेंगे।

41. यदि धन संबंधियों परेशानियों का सामना कर रहे हैं तो किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में हनुमानजी का यह उपाय करें।

42. उपाय के अनुसार किसी पीपल के वृक्ष एक पत्ता तोड़ें। उस पत्ते पर कुमकुम या चंदन से श्रीराम का लिखें। इसके बाद पत्ते पर मिठाई रखें और यह हनुमानजी को अर्पित करें। इस उपाय से भी धन लाभ होता है।

43. एक बात का विशेष ध्यान रखें कि माह की हर अमावस्या पर पूरे घर की अच्छी तरह से साफ-सफाई की जानी चाहिए। साफ-सफाई के बाद घर में धूप-दीप-ध्यान करें। इससे घर का वातावरण पवित्र और बरकत देने वाला बना रहेगा।

44. सप्ताह में एक बार किसी जरूरतमंद सुहागिन स्त्री को सुहाग का सामना दान करें। इस उपाय से देवी लक्ष्मी तुरंत ही प्रसन्न होती हैं और धन संबंधी परेशानियों को दूर करती हैं। ध्यान रखें यह उपाय नियमित रूप से हर सप्ताह करना चाहिए।

45. यदि कोई व्यक्ति दीपावली के दिन किसी पीपल के वृक्ष के नीचे छोटा सा शिवलिंग स्थापित करता है तो उसकी जीवन में कभी भी कोई परेशानियां नहीं आएंगी। यदि कोई भयंकर परेशानियां चल रही होंगी वे भी दूर हो जाएंगी। पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नियमित पूजा भी करनी चाहिए। इस उपाय से गरीब व्यक्ति भी धीरे-धीरे मालामाल हो जाता है।

46. पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर श्रीराम का नाम लिखें। राम नाम लिखने के लिए चंदन का उपयोग किया जा सकता है। यह काम पीपल के नीचे बैठकर करेंगे तो जल्दी शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। राम नाम लिखने के बाद इन पत्तों की माला बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें।

47. कलयुग में हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं। इनकी कृपा प्राप्त करने के लिए कई प्रकार उपाय बताए गए हैं। यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।

48. शनि दोषों से मुक्ति के लिए तो पीपल के वृक्ष के उपाय रामबाण हैं। शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को नष्ट करने के लिए पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सात परिक्रमा करनी चाहिए। इसके साथ ही शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक भी लगाना चाहिए।

49. दीपावली से एक नियम हर रोज के लिए बना लें। आपके घर में जब भी खाना बने तो उसमें से सबसे पहली रोटी गाय को खिलाएं।

50. शास्त्रों के अनुसार एक पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार को कोई दुख नहीं सताता है। उस इंसान को कभी भी पैसों की कमी नहीं रहती है। पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे नियमित रूप से जल अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बड़ा होगा आपके घर-परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती जाएगी, धन बढ़ता जाएगा। पीपल के बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए तभी आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होंगे।
51. दीपावली पर लक्ष्मी का पूजन करने के लिए स्थिर लग्न श्रेष्ठ माना जाता है। इस लग्न में पूजा करने पर महालक्ष्मी स्थाई रूप से घर में निवास करती हैं।-पूजा में लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र और श्रीयंत्र रखना चाहिए। यदि स्फटिक का श्रीयंत्र हो तो सर्वश्रेष्ठ रहता है। एकाक्षी नारियल, दक्षिणावर्त शंख, हत्थाजोड़ी की भी पूजा करनी चाहिए।
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Saturday, 14 October 2017

श्री महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम् अथवा कमला सहस्रनाम स्तोत्रम्



महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम् अथवा कमला सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
ॐ तामाह्वयामि सुभगां लक्ष्मीं त्रैलोक्यपूजिताम् ।
एह्येहि देवि पद्माक्षि पद्माकरकृतालये ॥ १॥
आगच्छागच्छ वरदे पश्य मां स्वेन चक्षुषा ।
आयाह्यायाहि धर्मार्थकाममोक्षमये शुभे ॥ २॥
एवंविधैः स्तुतिपदैः सत्यैः सत्यार्थसंस्तुता ।
कनीयसी महाभागा चन्द्रेण परमात्मना ॥ ३॥
निशाकरश्च सा देवी भ्रातरौ द्वौ पयोनिधेः ।
उत्पन्नमात्रौ तावास्तां शिवकेशवसंश्रितौ ॥ ४॥
सनत्कुमारस्तमृषिं समाभाष्य पुरातनम् ।
प्रोक्तवानितिहासं तु लक्ष्म्याः स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ ५॥
अथेदृशान्महाघोराद् दारिद्र्यान्नरकात्कथम् ।
मुक्तिर्भवति लोकेऽस्मिन् दारिद्र्यं याति भस्मताम् ॥ ६॥
सनत्कुमार उवाच -
पूर्वं कृतयुगे ब्रह्मा भगवान् सर्वलोककृत् ।
सृष्टिं नानाविधां कृत्वा पश्चाच्चि न्तामुपेयिवान् ॥ ७॥
किमाहाराः प्रजास्त्वेताः सम्भविष्यन्ति भूतले ।
तथैव चासां दारिद्र्यात्कथमुत्तरणं भवेत् ॥ ८॥
दारिद्र्यान्मरणं श्रेयस्ति्वति सञ्चिन्त्य चेतसि ।
क्षीरोदस्योत्तरे कूले जगाम कमलोद्भवः ॥ ९॥
तत्र तीव्रं तपस्तप्त्वा कदाचित्परमेश्वरम् ।
ददर्श पुण्डरीकाक्षं वासुदेवं जगद्गुरुम् ॥ १०॥
सर्वज्ञं सर्वशक्तीनां सर्वावासं सनातनम् ।
सर्वेश्वरं वासुदेवं विष्णुं लक्ष्मीपतिं प्रभुम् ॥ ११॥
सोमकोटिप्रतीकाशं क्षीरोद विमले जले ।
अनन्तभोगशयनं विश्रान्तं श्रीनिकेतनम् ॥ १२॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं महायोगेश्वरेश्वरम् ।
योगनिद्रारतं श्रीशं सर्वावासं सुरेश्वरम् ॥ १३॥
जगदुत्पत्तिसंहारस्थितिकारणकारणम् ।
लक्ष्म्यादि शक्तिकरणजातमण्डलमण्डितम् ॥ १४॥
आयुधैर्देहवद्भिश्च चक्राद्यैः परिवारितम् ।
दुर्निरीक्ष्यं सुरैः सिद्धः महायोनिशतैरपि ॥ १५॥
आधारं सर्वशक्तीनां परं तेजः सुदुस्सहम् ।
प्रबुद्ध ं देवमीशानं दृष्ट्वा कमलसम्भवः ॥ १६॥
शिरस्यञ्जलिमाधाय स्तोत्रं पूर्वमुवाच ह ।
मनोवाञ्छितसिद्धि ं त्वं पूरयस्व महेश्वर ॥ १७॥
जितं ते पुण्डरीक्ष नमस्ते विश्वभावन ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥ १८॥
सर्वेश्वर जयानन्द सर्वावास परात्पर ।
प्रसीद मम भक्तस्य छिन्धि सन्देहजं तमः ॥ १९॥
एवं स्तुतः स भगवान् ब्रह्म णाऽव्यक्तजन्मना ।
प्रसादाभिमुखः प्राह हरिर्विश्रान्तलोचनः ॥ २०॥
श्रीभगवानुवाच -
हिरण्यगर्भ तुष्टोऽस्मि ब्रूहि यत्तेऽभिवाञ्छितम् ।
तद्वक्ष्यामि न सन्देहो भक्तोऽसि मम सुव्रत ॥ २१॥
केशवाद्वचनं श्रुत्वा करुणाविष्टचेतनः ।
प्रत्युवाच महाबुद्धिर्भगवन्तं जनार्दनम् ॥ २२॥
चतुर्विधं भवस्यास्य भूतसर्गस्य केशव ।
परित्राणाय मे ब्रूहि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥ २३॥
दारिद्र्यशमनं धन्यं मनोज्ञं पावनं परम् ।
सर्वेश्वर महाबुद्ध स्वरूपं भैरवं महत् ॥ २४॥
श्रियः सर्वातिशायिन्यास्तथा ज्ञानं च शाश्वतम् ।
नामानि चैव मुख्यानि यानि गौणानि चाच्युत ॥ २५॥
त्वद्वक्त्रकमलोत्थानि श्रेतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रतिवाक्यमुवाच सः ॥ २६॥
श्रीभगवानुवाच -
महाविभूतिसंयुक्ता षाड्गुण्यवपुषः प्रभो ।
भगवद्वासुदेवस्य नित्यं चैषाऽनपायिनी ॥ २७॥
एकैव वर्ततेऽभिन्ना ज्योत्स्नेव हिमदीधितेः ।
सर्वशक्त्यात्मिका चैव विश्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥ २८॥
सर्वैश्वर्यगुणोपेता नित्यशुद्ध स्वरूपिणी ।
प्राणशक्तिः परा ह्येषा सर्वेषां प्राणिनां भुवि ॥ २९॥
शक्तीनां चैव सर्वासां योनिभूता परा कला ।
अहं तस्याः परं नाम्नां सहस्रमिदमुत्तमम् ॥ ३०॥
शृणुष्वावहितो भूत्वा परमैश्वर्यभूतिदम् ।
देव्याख्यास्मृतिमात्रेण दारिद्र्यं याति भस्मताम् ॥ ३१॥
अथ महालक्ष्मीसह्सरनामस्तोत्रम् अथवा कमलासहस्रनामस्तोत्रम् ।
श्रीः पद्मा प्रकृतिः सत्त्वा शान्ता चिच्छक्तिरव्यया ।
केवला निष्कला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा ॥ १॥
व्योमपद्मकृताधारा परा व्योमामृतोद्भवा ।
निर्व्योमा व्योममध्यस्था पञ्चव्योमपदाश्रिता ॥ २॥
अच्युता व्योमनिलया परमानन्दरूपिणी ।
नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निर्विकारा निरीक्षणा ॥ ३॥
ज्ञानशक्तिः कर्तृशक्तिर्भोक्तृशक्तिः शिखावहा ।
स्नेहाभासा निरानन्दा विभूतिर्विमलाचला ॥ ४॥
अनन्ता वैष्णवी व्यक्ता विश्वानन्दा विकासिनी ।
शक्तिर्विभिन्नसर्वार्तिः समुद्रपरितोषिणी ॥ ५॥
मूर्तिः सनातनी हार्दी निस्तरङ्गा निरामया ।
ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी ॥ ६॥
स्वच्छन्दशक्तिर्गहना निष्कम्पार्चिः सुनिर्मला ।
स्वरूपा सर्वगा पारा बृंहिणी सुगुणोर्जिता ॥ ७॥
अकलङ्का निराधारा निःसंकल्पा निराश्रया ।
असंकीर्णा सुशान्ता च शाश्वती भासुरी स्थिरा ॥ ८॥
अनौपम्या निर्विकल्पा नियन्त्री यन्त्रवाहिनी ।
अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगा ॥ ९॥
अग्राह्या ग्राहिका गूढा गम्भीरा विश्वगोपिनी ।
अनिर्देश्या प्रतिहता निर्बीजा पावनी परा ॥ १०॥
अप्रतर्क्या परिमिता भवभ्रान्तिविनाशिनी ।
एका द्विरूपा त्रिविधा असंख्याता सुरेश्वरी ॥ ११॥
सुप्रतिष्ठा महाधात्री स्थितिर्वृद्धिर्ध्रुवा गतिः ।
ईश्वरी महिमा ऋद्धिः प्रमोदा उज्ज्वलोद्यमा ॥ १२॥
अक्षया वर्द्धमाना च सुप्रकाशा विहङ्गमा ।
नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा ॥ १३॥
तपोनुदा च ज्वाला च सुदीप्तिश्चांशुमालिनी ।
अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी ॥ १४॥
अवदाता सुशुद्धा च अमोघाख्या परम्परा ।
संधानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी ॥ १५॥
लक्ष्मीस्तुष्टिर्महाधीरा शान्तिरापूरणानवा ।
अनुग्रहा शक्तिराद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधिः ॥ १६॥
सत्या प्रह्वा क्रिया योग्या अपर्णा ह्लादिनी शिवा ।
सम्पूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमृतावहा ॥ १७॥
रजोवत्यर्कप्रतिभाऽऽकर्षिणी कर्षिणी रसा ।
परा वसुमती देवी कान्तिः शान्तिर्मतिः कला ॥ १८॥
कला कलङ्करहिता विशालोद्दीपनी रतिः ।
सम्बोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा ॥ १९॥
अमृतस्यन्दिनी जीवा जननी खण्डिका स्थिरा ।
धूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुमतीरसा ॥ २०॥
शुद्धा ध्वनिः सृतिः सृष्टिर्विकृतिः कृष्टिरेव च ।
प्रापणी प्राणदा प्रह्वा विश्वा पाण्डुरवासिनी ॥ २१॥
अवनिर्वज्रनलिका चित्रा ब्रह्माण्डवासिनी ।
अनन्तरूपानन्तात्मानन्तस्थानन्तसम्भवा ॥ २२॥
महाशक्तिः प्राणशक्तिः प्राणदात्री ऋतम्भरा ।
महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा ॥ २३॥
प्रत्यक्षलक्ष्मीर्निष्कम्पा प्ररोहाबुद्धिगोचरा ।
नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी ॥ २४॥
सहस्राणी प्रधाना च न्यायवस्तुप्रकाशिका ।
सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी ॥ २५॥
नानास्वरूपचिद्धात्री शब्दपूर्वा पुरातनी ।
व्यक्ताव्यक्ता जीवकेशा सर्वेच्छापरिपूरिता ॥ २६॥
संकल्पसिद्धा सांख्येया तत्त्वगर्भा धरावहा ।
भूतरूपा चित्स्वरूपा त्रिगुणा गुणगर्विता ॥ २७॥
प्रजापतीश्वरी रौद्री सर्वाधारा सुखावहा ।
कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषनाशिनी ॥ २८॥
नीरूपोद्भिन्नसंताना सुयन्त्रा त्रिगुणालया ।
महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया ॥ २९॥
महास्त्री विमला कीर्तिर्जया लक्ष्मीर्निरञ्जना ।
प्रकृतिर्भगवन्माया शक्तिर्निद्रा यशस्करी ॥ ३०॥
चिन्ता बुद्धिर्यशः प्रज्ञा शान्तिः सुप्रीतिवर्द्धिनी ।
प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा ॥ ३१॥
काष्ठा निष्ठा प्रतिष्ठा च ज्येष्ठा श्रेष्ठा जयावहा ।
सर्वातिशायिनी प्रीतिर्विश्वशक्तिर्महाबला ॥ ३२॥
वरिष्ठा विजया वीरा जयन्ती विजयप्रदा ।
हृद्गृहा गोपिनी गुह्या गणगन्धर्वसेविता ॥ ३३॥
योगीश्वरी योगमाया योगिनी योगसिद्धिदा ।
महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया ॥ ३४॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रनमिता सुरासुरवरप्रदा ।
त्रिवर्त्मगा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा ॥ ३५॥
सुतारा तारिणी तारा दुर्गा संतारिणी परा ।
सुतारिणी तारयन्ती भूरितारेश्वरप्रभा ॥ ३६॥
गुह्यविद्या यज्ञविद्या महाविद्या सुशोभिता ।
अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी ॥ ३७॥
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिर्नयात्मिका ।
गौरी वागीश्वरी गोप्त्री गायत्री कमलोद्भवा ॥ ३८॥
विश्वम्भरा विश्वरूपा विश्वमाता वसुप्रदा ।
सिद्धिः स्वाहा स्वधा स्वस्तिः सुधा सर्वार्थसाधिनी ॥ ३९॥
इच्छा सृष्टिर्द्युतिर्भूतिः कीर्तिः श्रद्धा दयामतिः ।
श्रुतिर्मेधा धृतिर्ह्रीः श्रीर्विद्या विबुधवन्दिता ॥ ४०॥
अनसूया घृणा नीतिर्निर्वृतिः कामधुक्करा ।
प्रतिज्ञा संततिर्भूतिर्द्यौः प्रज्ञा विश्वमानिनी ॥ ४१॥
स्मृतिर्वाग्विश्वजननी पश्यन्ती मध्यमा समा ।
संध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती ॥ ४२॥
काङ्क्षा माया महामाया मोहिनी माधवप्रिया ।
सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी ॥ ४३॥
सुधौतकनकप्रख्या सुवर्णकमलासना ।
हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा ॥ ४४॥
चन्द्रा हिरण्मयी ज्योत्स्ना रम्या शोभा शुभावहा ।
त्रैलोक्यमण्डना नारी नरेश्वरवरार्चिता ॥ ४५॥
त्रैलोक्यसुन्दरी रामा महाविभववाहिनी ।
पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषिता ॥ ४६॥
पद्मयुग्मधरा कान्ता दिव्याभरणभूषिता ।
विचित्ररत्नमुकुटा विचित्राम्बरभूषणा ॥ ४७॥
विचित्रमाल्यगन्धाढ्या विचित्रायुधवाहना ।
महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवन्दिता ॥ ४८॥
कालसंकर्षिणी घोरा तत्त्वसंकर्षिणीकला ।
जगत्सम्पूरणी विश्वा महाविभवभूषणा ॥ ४९॥
वारुणी वरदा व्याख्या घण्टाकर्णविराजिता ।
नृसिंही भैरवी ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी ॥ ५०॥
ऐन्द्री कामधेनुः सृष्टिः कामयोनिर्महाप्रभा ।
दृष्टा काम्या विश्वशक्तिर्बीजगत्यात्मदर्शना ॥ ५१॥
गरुडारूढहृदया चान्द्री श्रीर्मधुरानना ।
महोग्ररूपा वाराही नारसिंही हतासुरा ॥ ५२॥
युगान्तहुतभुग्ज्वाला कराला पिङ्गलाकला ।
त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी ॥ ५३॥
महोत्कटा महारक्ता महाचण्डा महासना ।
शङ्खिनी लेखिनी स्वस्था लिखिता खेचरेश्वरी ॥ ५४॥
भद्रकाली चैकवीरा कौमारी भवमालिनी ।
कल्याणी कामधुग्ज्वालामुखी चोत्पलमालिका ॥ ५५॥
बालिका धनदा सूर्या हृदयोत्पलमालिका ।
अजिता वर्षिणी रीतिर्भरुण्डा गरुडासना ॥ ५६॥
वैश्वानरी महामाया महाकाली विभीषणा ।
महामन्दारविभवा शिवानन्दा रतिप्रिया ॥ ५७॥
उद्रीतिः पद्ममाला च धर्मवेगा विभावनी ।
सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया ॥ ५८॥
सहसावर्तमाना च हस्तिनादप्रबोधिनी ।
हिरण्यपद्मवर्णा च हरिभद्रा सुदुर्द्धरा ॥ ५९॥
सूर्या हिरण्यप्रकटसदृशी हेममालिनी ।
पद्मानना नित्यपुष्टा देवमाता मृतोद्भवा ॥ ६०॥
महाधना च या शृङ्गी कर्द्दमी कम्बुकन्धरा ।
आदित्यवर्णा चन्द्राभा गन्धद्वारा दुरासदा ॥ ६१॥
वराचिता वरारोहा वरेण्या विष्णुवल्लभा ।
कल्याणी वरदा वामा वामेशी विन्ध्यवासिनी ॥ ६२॥
योगनिद्रा योगरता देवकी कामरूपिणी ।
कंसविद्राविणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा ॥ ६३॥
कात्यायनी कालरात्रिर्निशितृप्ता सुदुर्जया ।
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानांपरिरक्षिणी ॥ ६४॥
बहुरूपा स्वरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ।
घण्टानिनादबहुला जीमूतध्वनिनिःस्वना ॥ ६५॥
महादेवेन्द्रमथिनी भ्रुकुटीकुटिलानना ।
सत्योपयाचिता चैका कौबेरी ब्रह्मचारिणी ॥ ६६
आर्या यशोदा सुतदा धर्मकामार्थमोक्षदा ।
दारिद्र्यदुःखशमनी घोरदुर्गार्तिनाशिनी ॥ ६७॥
भक्तार्तिशमनी भव्या भवभर्गापहारिणी ।
क्षीराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा ॥ ६८॥
रुक्मिणी रोहिणी सीता सत्यभामा यशस्विनी ।
प्रज्ञाधारामितप्रज्ञा वेदमाता यशोवती ॥ ६९॥
समाधिर्भावना मैत्री करुणा भक्तवत्सला ।
अन्तर्वेदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरागतिः ॥ ७०॥
दीक्षा वीक्षा परीक्षा च समीक्षा वीरवत्सला ।
अम्बिका सुरभिः सिद्धा सिद्धविद्याधरार्चिता ॥ ७१॥
सुदीक्षा लेलिहाना च कराला विश्वपूरका ।
विश्वसंधारिणी दीप्तिस्तापनी ताण्डवप्रिया ॥ ७२॥
उद्भवा विरजा राज्ञी तापनी बिन्दुमालिनी ।
क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा ॥ ७३॥
हव्यगर्भा चाज्यगर्भा जुह्वतोयज्ञसम्भवा ।
आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया ॥ ७४॥
मातृका माधवी मुख्या मोक्षलक्ष्मीर्महर्द्धिदा ।
सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमङ्गला ॥ ७५॥
श्वेता सुशुक्लवसना शुक्लमाल्यानुलेपना ।
हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हृत्कमलालया ॥ ७६॥
सितातपत्रा सुश्रोणी पद्मपत्रायतेक्षणा ।
सावित्री सत्यसंकल्पा कामदा कामकामिनी ॥ ७७॥
दर्शनीया दृशा दृश्या स्पृश्या सेव्या वराङ्गना ।
भोगप्रिया भोगवती भोगीन्द्रशयनासना ॥ ७८॥
आर्द्रा पुष्करिणी पुण्या पावनी पापसूदनी ।
श्रीमती च शुभाकारा परमैश्वर्यभूतिदा ॥ ७९॥
अचिन्त्यानन्तविभवा भवभावविभावनी ।
निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता ॥ ८०॥
बला बलाधिका देवी गौतमी गोकुलालया ।
तोषिणी पूर्णचन्द्राभा एकानन्दा शतानना ॥ ८१॥
उद्याननगरद्वारहर्म्योपवनवासिनी ।
कूष्माण्डा दारुणा चण्डा किराती नन्दनालया ॥ ८२॥
कालायना कालगम्या भयदा भयनाशिनी ।
सौदामनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी ॥ ८३॥
जगन्माता भयकरी भूतधात्री सुदुर्लभा ।
काश्यपी शुभदाता च वनमाला शुभावरा ॥ ८४॥
धन्या धन्येश्वरी धन्या रत्नदा वसुवर्द्धिनी ।
गान्धर्वी रेवती गङ्गा शकुनी विमलानना ॥ ८५॥
इडा शान्तिकरी चैव तामसी कमलालया ।
आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुसुमाश्रया ॥ ८६॥
जगत्प्रिया च सरथा दुर्जया खगवाहना ।
मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता ॥ ८७॥
व्योमलक्ष्मीर्महालक्ष्मीस्तेजोलक्ष्मीः सुजाज्वला ।
रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्गन्धलक्ष्मीर्वनाश्रया ॥ ८८॥
श्रवणा श्रावणी नेत्री रसनाप्राणचारिणी ।
विरिञ्चिमाता विभवा वरवारिजवाहना ॥ ८९॥
वीर्या वीरेश्वरी वन्द्या विशोका वसुवर्द्धिनी ।
अनाहता कुण्डलिनी नलिनी वनवासिनी ॥ ९०॥
गान्धारिणीन्द्रनमिता सुरेन्द्रनमिता सती ।
सर्वमङ्गल्यमाङ्गल्या सर्वकामसमृद्धिदा ॥ ९१॥
सर्वानन्दा महानन्दा सत्कीर्तिः सिद्धसेविता ।
सिनीवाली कुहू राका अमा चानुमतिर्द्युतिः ॥ ९२॥
अरुन्धती वसुमती भार्गवी वास्तुदेवता ।
मायूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना ॥ ९३॥
अनघा धरणिर्धीरा धमनी मणिभूषणा ।
राजश्री रूपसहिता ब्रह्मश्रीर्ब्रह्मवन्दिता ॥ ९४॥
जयश्रीर्जयदा ज्ञेया सर्गश्रीः स्वर्गतिः सताम् ।
सुपुष्पा पुष्पनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया ॥ ९५॥
धनुर्लक्ष्मीस्त्वमिलिता परक्रोधनिवारिणी ।
कद्रूर्द्धनायुः कपिला सुरसा सुरमोहिनी ॥ ९६॥
महाश्वेता महानीला महामूर्तिर्विषापहा ।
सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्तृप्तिर्व्याप्तिः प्रभाकरी ॥ ९७॥
तेजोवती पद्मबोधा मदलेखारुणावती ।
रत्ना रत्नावली भूता शतधामा शतापहा ॥ ९८॥
त्रिगुणा घोषिणी रक्ष्या नर्द्दिनी घोषवर्जिता ।
साध्या दितिर्दितिदेवी मृगवाहा मृगाङ्कगा ॥ ९९॥
चित्रनीलोत्पलगता वृषरत्नकराश्रया ।
हिरण्यरजतद्वन्द्वा शङ्खभद्रासनास्थिता ॥ १००॥
गोमूत्रगोमयक्षीरदधिसर्पिर्जलाश्रया ।
मरीचिश्चीरवसना पूर्णा चन्द्रार्कविष्टरा ॥ १०१॥
सुसूक्ष्मा निर्वृतिः स्थूला निवृत्तारातिरेव च ।
मरीचिज्वालिनी धूम्रा हव्यवाहा हिरण्यदा ॥ १०२॥
दायिनी कालिनी सिद्धिः शोषिणी सम्प्रबोधिनी ।
भास्वरा संहतिस्तीक्ष्णा प्रचण्डज्वलनोज्ज्वला ॥ १०३॥
साङ्गा प्रचण्डा दीप्ता च वैद्युतिः सुमहाद्युतिः ।
कपिला नीलरक्ता च सुषुम्णा विस्फुलिङ्गिनी ॥ १०४॥
अर्चिष्मती रिपुहरा दीर्घा धूमावली जरा ।
सम्पूर्णमण्डला पूषा स्रंसिनी सुमनोहरा ॥ १०५॥
जया पुष्टिकरीच्छाया मानसा हृदयोज्ज्वला ।
सुवर्णकरणी श्रेष्ठा मृतसंजीविनीरणे ॥ १०६॥
विशल्यकरणी शुभ्रा संधिनी परमौषधिः ।
ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐन्दवी रत्नसम्भवा ॥ १०७॥
विद्युत्प्रभा बिन्दुमती त्रिस्वभावगुणाम्बिका ।
नित्योदिता नित्यहृष्टा नित्यकामकरीषिणी ॥ १०८॥
पद्माङ्का वज्रचिह्ना च वक्रदण्डविभासिनी ।
विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी ॥ १०९॥
मानिनी मङ्गला मान्या मालिनी मानदायिनी ।
विश्वेश्वरी गणवती मण्डला मण्डलेश्वरी ॥ ११०॥
हरिप्रिया भौमसुता मनोज्ञा मतिदायिनी ।
प्रत्यङ्गिरा सोमगुप्ता मनोऽभिज्ञा वदन्मतिः ॥ १११॥
यशोधरा रत्नमाला कृष्णा त्रैलोक्यबन्धनी ।
अमृता धारिणी हर्षा विनता वल्लकी शची ॥ ११२॥
संकल्पा भामिनी मिश्रा कादम्बर्यमृतप्रभा ।
अगता निर्गता वज्रा सुहिता संहिताक्षता ॥ ११३॥
सर्वार्थसाधनकरी धातुर्धारणिकामला ।
करुणाधारसम्भूता कमलाक्षी शशिप्रिया ॥ ११४॥
सौम्यरूपा महादीप्ता महाज्वाला विकाशिनी ।
माला काञ्चनमाला च सद्वज्रा कनकप्रभा ॥ ११५॥
प्रक्रिया परमा योक्त्री क्षोभिका च सुखोदया ।
विजृम्भणा च वज्राख्या शृङ्खला कमलेक्षणा ॥ ११६॥
जयंकरी मधुमती हरिता शशिनी शिवा ।
मूलप्रकृतिरीशानी योगमाता मनोजवा ॥ ११७॥
धर्मोदया भानुमती सर्वाभासा सुखावहा ।
धुरन्धरा च बाला च धर्मसेव्या तथागता ॥ ११८॥
सुकुमारा सौम्यमुखी सौम्यसम्बोधनोत्तमा ।
सुमुखी सर्वतोभद्रा गुह्यशक्तिर्गुहालया ॥ ११९॥
हलायुधा चैकवीरा सर्वशस्त्रसुधारिणी ।
व्योमशक्तिर्महादेहा व्योमगा मधुमन्मयी ॥ १२०॥
गङ्गा वितस्ता यमुना चन्द्रभागा सरस्वती ।
तिलोत्तमोर्वशी रम्भा स्वामिनी सुरसुन्दरी ॥ १२१॥
बाणप्रहरणावाला बिम्बोष्ठी चारुहासिनी ।
ककुद्मिनी चारुपृष्ठा दृष्टादृष्टफलप्रदा ॥ १२२॥
काम्याचरी च काम्या च कामाचारविहारिणी ।
हिमशैलेन्द्रसंकाशा गजेन्द्रवरवाहना ॥ १२३॥
अशेषसुखसौभाग्यसम्पदा योनिरुत्तमा ।
सर्वोत्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया ॥ १२४॥
सर्वाङ्गयोनिः साव्यक्ता सम्प्रधानेश्वरेश्वरी ।
विष्णुवक्षःस्थलगता किमतः परमुच्यते ॥ १२५॥
परा निर्महिमा देवी हरिवक्षःस्थलाश्रया ।
सा देवी पापहन्त्री च सान्निध्यं कुरुतान्मम ॥ १२६॥
इति नाम्नां सहस्रं तु लक्ष्म्याः प्रोक्तं शुभावहम् ।
परावरेण भेदेन मुख्यगौणेन भागतः ॥ १२७॥
यश्चैतत् कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद् वापि पद्मज ।
शुचिः समाहितो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ १२८॥
श्रीनिवासं समभ्यर्च्य पुष्पधूपानुलेपनैः ।
भोगैश्च मधुपर्काद्यैर्यथाशक्ति जगद्गुरुम् ॥ १२९॥
तत्पार्श्वस्थां श्रियं देवीं सम्पूज्य श्रीधरप्रियाम् ।
ततो नामसहस्रोण तोषयेत् परमेश्वरीम् ॥ १३०॥
नामरत्नावलीस्तोत्रमिदं यः सततं पठेत् ।
प्रसादाभिमुखीलक्ष्मीः सर्वं तस्मै प्रयच्छति ॥ १३१॥
यस्या लक्ष्म्याश्च सम्भूताः शक्तयो विश्वगाः सदा ।
कारणत्वे न तिष्ठन्ति जगत्यस्मिंश्चराचरे ॥ १३२॥
तस्मात् प्रीता जगन्माता श्रीर्यस्याच्युतवल्लभा ।
सुप्रीताः शक्तयस्तस्य सिद्धिमिष्टां दिशन्ति हि ॥ १३३॥
एक एव जगत्स्वामी शक्तिमानच्युतः प्रभुः ।
तदंशशक्तिमन्तोऽन्ये ब्रह्मेशानादयो यथा ॥ १३४॥
तथैवैका परा शक्तिः श्रीस्तस्य करुणाश्रया ।
ज्ञानादिषाङ्गुण्यमयी या प्रोक्ता प्रकृतिः परा ॥ १३५॥
एकैव शक्तिः श्रीस्तस्या द्वितीयात्मनि वर्तते ।
परा परेशी सर्वेशी सर्वाकारा सनातनी ॥ १३६॥
अनन्तनामधेया च शक्तिचक्रस्य नायिका ।
जगच्चराचरमिदं सर्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥ १३७॥
तस्मादेकैव परमा श्रीर्ज्ञेया विश्वरूपिणी ।
सौम्या सौम्येन रूपेण संस्थिता नटजीववत् ॥ १३८॥
यो यो जगति पुम्भावः स विष्णुरिति निश्चयः ।
या या तु नारीभावस्था तत्र लक्ष्मीर्व्यवस्थिता ॥ १३९॥
प्रकृतेः पुरुषाच्चान्यस्तृतीयो नैव विद्यते ।
अथ किं बहुनोक्तेन नरनारीमयो हरिः ॥ १४०॥
अनेकभेदभिन्नस्तु क्रियते परमेश्वरः ।
महाविभूतिं दयितां ये स्तुवन्त्यच्युतप्रियाम् ॥ १४१
ते प्राप्नुवन्ति परमां लक्ष्मीं संशुद्धचेतसः ।
पद्मयोनिरिदं प्राप्य पठन् स्तोत्रमिदं क्रमात् ॥ १४२॥
दिव्यमष्टगुणैश्वर्यं तत्प्रसादाच्च लब्धवान् ।
सकामानां च फलदामकामानां च मोक्षदाम् ॥ १४३॥
पुस्तकाख्यां भयत्रात्रीं सितवस्त्रां त्रिलोचनाम् ।
महापद्मनिषण्णां तां लक्ष्मीमजरतां नमः ॥ १४४॥
करयुगलगृहीतं पूर्णकुम्भं दधाना
क्वचिदमलगतस्था शङ्खपद्माक्षपाणिः ।
क्वचिदपि दयिताङ्गे चामरव्यग्रहस्ता
क्वचिदपि सृणिपाशं बिभ्रती हेमकान्तिः ॥ १४५॥
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
॥ इत्यादिपद्मपुराणे काश्मीरवर्णने हिरण्यगर्भहृदये
सर्वकामप्रदायकं पुरुषोत्तमप्रोक्तं


श्रीलक्ष्मीसहस्रनामस्तोत्रं समाप्तम्

Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...