Wednesday, 13 August 2014

नृसिंहकवचस्तोत्रम् ||नरसिंह कवच Narasinha-kavacha

नृसिंहकवचस्तोत्रम् ||नरसिंह कवच Narasinha-kavacha
नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा | सर्वरक्षकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम् |१||
सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम् |ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम् ||२||
विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम् | लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गम् विभूतिभिरुपाश्रितम् ||३||
चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम् |सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम् ||४||
तप्त काञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम् |इन्द्रादिसुरमौलिष्ठः स्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः ||५||
विरजितपदद्वन्द्वम् च शङ्खचक्रादिहेतिभिः |गरुत्मत्मा च विनयात् स्तूयमानम् मुदान्वितम् ||६||
स्व हृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत् |नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः ||७||
सर्वगेऽपि स्तम्भवासः फलं मे रक्षतु ध्वनिम् |नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ||८||
स्मृतं मे पातु नृहरिः मुनिवार्यस्तुतिप्रियः |नासं मे सिंहनाशस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः ||९||
सर्व विद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनं मम |वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः ||१०||
नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभृदनन्तकृत् |दिव्यास्त्रशोभितभुजः नृसिंहः पातु मे भुजौ ||११||
करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः |हृदयं योगि साध्यश्च निवासं पातु मे हरिः ||१२||
मध्यं पातु हिरण्याक्ष वक्षःकुक्षिविदारणः |नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभिब्रह्मसंस्तुतः ||१३||
ब्रह्माण्ड कोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम् |गुह्यं मे पातु गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक् ||१४||
ऊरू मनोभवः पातु जानुनी नररूपदृक् |जङ्घे पातु धराभर हर्ता योऽसौ नृकेशरी ||१५||
सुर राज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः |सहस्रशीर्षापुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम् ||१६||
महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः |महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वलस्तु नैरृतः ||१७||
पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः |नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भूषणविग्रहः ||१८||
ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः |संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेशई ||१९||
इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम् |भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ||२०||
पुत्रवान् धनवान् लोके दीर्घायुरुपजायते |कामयते यं यं कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम् ||२१||
सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् |भूम्यन्तरीक्षदिव्यानां ग्रहाणां विनिवारणम् ||२२||
वृश्चिकोरगसम्भूत विषापहरणं परम् |ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणम् ||२३||
भुजेवा तलपात्रे वा कवचं लिखितं शुभम् |करमूले धृतं येन सिध्येयुः कर्मसिद्धयः ||२४||
देवासुर मनुष्येषु स्वं स्वमेव जयं लभेत् |एकसन्ध्यं त्रिसन्ध्यं वा यः पठेन्नियतो नरः ||२५||
सर्व मङ्गलमाङ्गल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति |
द्वात्रिंशतिसहस्राणि पठेत् शुद्धात्मनां नृणाम् ||२६||
कवचस्यास्य मन्त्रस्य मन्त्रसिद्धिः प्रजायते |अनेन मन्त्रराजेन कृत्वा भस्माभिर्मन्त्रानाम् ||२७||
तिलकं विन्यसेद्यस्तु तस्य ग्रहभयं हरेत् |त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्याभिमन्त्र्य च ||२८||
प्रसयेद् यो नरो मन्त्रं नृसिंहध्यानमाचरेत् |तस्य रोगः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षिसम्भवाः ||२९||
गर्जन्तं गार्जयन्तं निजभुजपतलं स्फोटयन्तं हतन्तं रूप्यन्तं तापयन्तं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयन्तं क्षिपन्तम् |
क्रन्दन्तं रोषयन्तं दिशि दिशि सततं संहरन्तं भरन्तं वीक्षन्तं पूर्णयन्तं करनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि ||३०||
||इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे प्रह्लादोक्तं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम्

सातुड़ी तीज कजली तीज बड़ी तीज,, नीमड़ी माता की कहानी,, सातुड़ी तीज के उद्यापन की विधि ,, सातुड़ी तीज के उद्यापन की विधि

सातुड़ी तीज कजली तीज बड़ी तीज ,, 06 अगस्त , 2020,, नीमड़ी माता की कहानी,, सातुड़ी तीज के उद्यापन की विधि ,, रक्षा बंधन के दो दिन बाद भाद्रपद कृष्ण तृतीया को कजली तीज , बड़ी तीज या सातुड़ी तीज का त्यौहार व्यापक रूप से मनाया जाता है। व्रत के पूर्व की तैयारी - बड़ी तीज के एक दिन पूर्व सिर धोकर , चारों हाथ पैरों के मेहंदी लगाई जाती है। सवा किलो या सवा पाव चने की दाल को सेक कर और पीस कर उसमें पिसी हुई शक्कर और घी मिला कर सातू तैयार किया जाता है। सातू जौ , गेहूं ,चावल या चने आदि का भी मनाया जा सकता है। पूजन सामग्री - एक छोटा सातू का लड्डू , नीम के पेड़ की एक छोटी टहनी , दीपक , केला ,अमरुद , ककड़ी , दूध मिश्रित जल , कच्चा दूध , मोती की लड़ , पूजा की थाली व जल का कलश। पूजन की तैयारी - मिट्टी व गोबर से दीवार के सहारे एक छोटा सा ढेर बनाकर उसके बीच में नीम के पेड़ की टहनी रोप देते हैं। इस नीम की टहनी के चारों तरफ कच्चा दूध मिश्रित जल डाल देते हैं। इसके पास एक दीपक जलाकर रख देते हैं। पूजा विधान - इस दिन पूरे दिन उपवास किया जाता है और शाम को नीमडी माता का पूजन किया जाता हैं सर्वप्रथम नीमडी माता के जल के छींटे , फिर रोली के छींटे दें और चाँवल चढ़ाएँ। इसके बाद पीछे दीवार पर रोली , मेहंदी और काजल की तेरह बिंदियाँ अपनी अंगुली से लगायें। फिर नीमडी माता के मोली चढ़ाएं , मेहंदी , काजल और वस्त्र भी चढ़ाएं। दीवार पर लगायी गयी बिंदियों पर भी मेहंदी की सहायता से लच्छा चिपका दें। फिर नीमडी माता के ऋतु फल दक्षिणा चढ़ाएं। पूजन करके कथा या कहानी सुननी चाहिये। रात को चाँद उगने पर उसकी तरफ जल के छींटे देवें फिर चाँदी की अंगूठी व गेहूं हाथ में लेकर जल से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। ( इस दिन चँद्रमा के उगने का समय ऊपर दिया हुआ है।) इसके बाद व्रत खोला जाता है। एक साहूकार था ,उसके सात बेटे थे। उसका सबसे छोटा बेटा पांगला (पाव से अपाहिज़ ) था। वह रोजाना एक वेश्या के पास जाता था। उसकी पत्नी बहुत पतिव्रता थी। खुद उसे कंधे पर बिठा कर वेश्या के यहाँ ले जाती थी। बहुत गरीब थी। जेठानियों के पास काम करके अपना गुजारा करती थी। भाद्रपद के महीने में कजली तीज के दिन सभी ने तीज माता के व्रत और पूजा के लिए सातु बनाये। छोटी बहु गरीब थी उसकी सास ने उसके लिए भी एक सातु का छोटा पिंडा बनाया। शाम को पूजा करके जैसे ही वो सत्तू पासने लगी उसका पति बोला मुझे वेश्या के यहाँ छोड़ कर आ हर दिन की तरह उस दिन भी वह पति को कंधे पैर बैठा कर छोड़ने गयी , लेकिन वो बोलना भूल गया की तू जा। वह बाहर ही उसका इंतजार करने लगी इतने में जोर से वर्षा आने लगी और बरसाती नदी में पानी बहने लगा । कुछ देर बाद नदी आवाज़ से आवाज़ आई “आवतारी जावतारी दोना खोल के पी। पिव प्यारी होय “ आवाज़ सुनकर उसने नदी की तरफ देखा तो दूध का दोना नदी में तैरता हुआ आता दिखाई दिया। उसने दोना उठाया और सात बार उसे पी कर दोने के चार टुकड़े किये और चारों दिशाओं में फेंक दिए। उधर तीज माता की कृपा से उस वेश्या ने अपना सारा धन उसके पति को वापस देकर सदा के लिए वहाँ से चली गई। पति ने सारा धन लेकर घर आकर पत्नी को आवाज़ दी ” दरवाज़ा खोल ” तो उसकी पत्नी ने कहा में दरवाज़ा नहीं खोलूँगी। तब उसने कहा कि अब में वापस नहीं जाऊंगा। अपन दोनों मिलकर सातु पासेगें। लेकिन उसकी पत्नी को विश्वास नहीं हुआ, उसने कहा मुझे वचन दो वापस वेश्या के पास नहीं जाओगे। पति ने पत्नी को वचन दिया तो उसने दरवाज़ा खोला और देखा उसका पति गहनों और धन माल सहित खड़ा था। उसने सारे गहने कपड़े अपनी पत्नी को दे दिए। फिर दोनों ने बैठकर सातु पासा। सुबह जब जेठानी के यहाँ काम करने नहीं गयी तो बच्चे बुलाने आये काकी चलो सारा काम पड़ा है। उसने कहा अब तो मुझ पर तीज माता की पूरी कृपा है अब मै काम करने नहीं आऊंगी। बच्चो ने जाकर माँ को बताया की आज से काकी काम करने नहीं आएगी उन पर तीज माता की कृपा हुई है वह नए – नए कपडे गहने पहन कर बैठी है और काका जी भी घर पर बैठे है। सभी लोग बहुत खुश हुए। हे तीज माता !!! जैसे आप उस पर प्रसन्न हुई वैसे ही वैसी ही सब पर प्रसन्न होना ,सब के दुःख दूर करना। बोलो तीज माता की जय ! सातुड़ी तीज के उद्यापन की विधि चार बड़े पिंडे सातु के बनाएँ एक सासू का , एक मंदिर का , एक पति का , एक खुद का सातु के सत्रह पिंडे सवा पाव -सवा पाव के बनाये ( सोलह सुहागन के लिए , एक सांख्या के लिए सत्रह स्टील के प्याले ,, मंगवा ले। पिंडों को प्लेटो में रख कर , कुमकुम टीका करे और सब पर लच्छा , सुपारी , सिक्का , गिट लगाये।चाहें तो साथ में बिंदी का एक पत्ता भी रख सकते है। अब ये सातु पिंड वाली प्लेट एक एक करके सोलह सुहागनों को दे दें । एक बड़े पिंडे पर बेस ( साड़ी ब्लाउज ) , सुहाग का सामान (काजल , बिंदी ,चूड़ी आदि ) और रूपये रख कर (51 ,101 इच्छानुसार ) कलपना निकाले व सासु जी को दें और पाँव छू कर आशीर्वाद लें। ये कलपना या बयाना होता है। इसे सासू न हो तो ननद को या किसी बुजुर्ग स्त्री को जिसने आपके साथ पूजा की हो उसे दे सकते है। इसे सबसे पहले करके बाद में सोलह सुहागन को सातु दिया जा सकता है। एक बड़ा पिंडा मंदिर में दे दें। एक बड़ा पिंडा पति को झिला दें। एक पिंडा खुद के लिए रख लें। अब संखिया (देवर या घर का कोई भी लड़का जैसे भांजा , भतीजा जा आपसे उम्र में छोटा हो – सगे भाई के अलावा ) को टावेल या पेंट शर्ट व सातु वाली प्लेट , कुछ पैसे इच्छानुसार दे और कान में धीरे से बोले मेरी बड़ी तीज का उद्यापन की हामी भरना , मैने उद्यापन किया है मान लेना “ इसी तरह सातुड़ी तीज का उद्यापन सम्पन्न होता है। है तीज माता सबके जीवन में खुशहाली रखना। बोलो तीज माता की जय नीमड़ी माता की कहानी एक शहर में एक सेठ- सेठानी रहते थे । वह बहुत धनवान थे लेकिन उनके पुत्र नहीं था। सेठानी ने भादुड़ी बड़ी तीज ( सातुड़ी तीज ) का व्रत करके कहा कि ” हे नीमड़ी माता मेरे बेटा हो जायेगा , तो मै आपको सवा मण का सातु चढ़ाऊगी “। माता की कृपा से सेठानी को नवें महीने लड़का हो गया। सेठानी ने सातु नहीं चढ़ाया। समय के साथ सेठानी को सात बेटे हो गए लेकिन सेठानी सातु चढ़ाना भूल गयी। पहले बेटे का विवाह हो गया। सुहागरात के दिन सोया तो आधी रात को साँप ने आकर डस लिया और उसकी मृत्यु हो गयी। इसी तरह उसके छः बेटो की विवाह उपरान्त मृत्यु हो गयी। सातवें बेटे की सगाई आने लगी सेठ-सेठानी मना करने लगे तो गाँव वालो के बहुत कहने व समझाने पर सेठ-सेठानी बेटे की शादी के लिए तैयार हो गए। तब सेठानी ने कहा गाँव वाले नहीं मानते हैं तो इसकी सगाई दूर देश में करना। सेठ जी सगाई करने के लिए घर से चले ओर बहुत दूर एक गाँव आये। वहाँ चार-पांच लड़कियाँ खेल रही थी जो मिटटी का घर बनाकर तोड़ रही थी। उनमे से एक लड़की ने कहा में अपना घर नहीं तोडूंगी। सेठ जी को वह लड़की समझदार लगी। खेलकर जब लड़की वापस अपने घर जाने लगी तो सेठ जी भी पीछे -पीछे उसके घर चले गए। सेठजी ने लड़की के माता पिता से बात करके अपने लड़के की सगाई व विवाह की बात पक्की कर दी। घर आकर विवाह की तैयारी करके बेटे की बारात लेकर गया और बेटे की शादी सम्पन्न करवा दी। इस तरह सातवे बेटे की शादी हो गयी। बारात विदा हुई लंबा सफर होने के कारण लड़की की माँ ने लड़की से कहा कि मै यह सातु व सीख डाल रही हूं। रास्ते में कहीं पर शाम को नीमड़ी माता की पूजा करना, नीमड़ी माता की कहानी सुनना , सातु पास लेना व कलपना निकल कर सासु जी को दे देना। बारात धूमधाम से निकली। रास्ते में बड़ी तीज का दिन आया ससुर जी ने बहु को खाने का कहा। बहु बोली आज मेरे तीज का उपवास है ,शाम को नीमड़ी माता का पूजन करके नीमड़ी माता की कहानी सुनकर ही भोजन करुँगी। एक कुएं के पास नीमड़ी नजर आई तो सेठ जी ने गाड़ी रोक दी। बहु नीमड़ी माता की पूजा करने लगी तो नीमड़ी माता पीछे हट गयी। बहु ने पूछा ” हे माता आप पीछे क्यों हट रही हो “। इस पर माता ने कहा तेरी सास ने कहा था पहला पुत्र होने पर सातु चढ़ाऊंगी और सात बेटे होने के बाद , उनकी शादी हो जाने के बाद भी अभी तक सातु नहीं चढ़ाया। वो भूल चुकी है। बहु बोली हमारे परिवार की भूल को क्षमा कीजिये , सातु मैं चढ़ाऊंगी। कृपया मेरे सारे जेठ को वापस कर दो और मुझे पूजन करने दो। माता नववधू की भक्ति व श्रद्धा देखकर प्रसन्न हो गई। बहु ने नीमड़ी माता का पूजन किया ,और चाँद को अर्ध्य दिया ,सातु पास लिया और कलपना ससुर जी को दे दिया। प्रातः होने पर बारात अपने नगर लौट आई। जैसे ही बहु से ससुराल में प्रवेश किया उसके छहों जेठ प्रकट हो गए। सभी बड़े खुश हुए उन सभी को गाजे बाजे से घर में लिया। सासु बहु के पैर पकड़ का धन्यवाद करने लगी तो बहु बोली सासु जी आप ये क्या करते हो , जो बोलवा करी है उसे याद कीजिये । सासु बोली ” मुझे तो याद नहीं तू ही बता दे ” बहु बोली आपने नीमड़ी माता के सातु चढाने का बोला था सो पूरा नहीं किया। तब सासू को याद आई। बारह महीने बाद जब कजली तीज आई , सभी ने मिल कर कर सवा सात मण का सातु तीज माता को चढ़ाया। श्रद्धा और भक्ति भाव से गाजे बाजे के साथ नीमड़ी माँ की पूजा की। बोलवा पूरी करी। हे भगवान उनके आनंद हुआ वैसा सबके होवे। खोटी की खरी ,अधूरी की पूरी।बोलो नीमड़ी माता की जय सातुड़ी तीज का उद्यापन सातुड़ी तीज का व्रत महिलाएँ उत्साह के साथ हर वर्ष करती है। तीज के व्रत का उद्यापन करना रीती रिवाज का एक अभिन्न अंग है। शादी ह जाने के पश्चात् महिलाओं द्वारा इस व्रत का उद्यापन विधि पूर्वक किया जाता है। उद्यापन करने के बाद ही व्रत किया जाना सम्पूर्ण माना जाता है। भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि जिसे सातुड़ी तीज ,कजली तीज या बड़ी तीज कहते है उसकी उद्यापन विधि के बारे में संपूर्ण विवरण प्रस्तुत है। कुछ लोग उद्यापन को उजमन या उजवना भी कहते है। उद्यापन के बाद भी कुछ लोग तीज का व्रत पहले की तरह करते रहते है। कुछ लोग उद्यापन करने के सिर्फ अगले साल तीज का व्रत नहीं करते उसके बाद आने वाले सालो में अपनी सुविधा के अनुसार व्रत करते हैं सातुड़ी तीज के उद्यापन की विधि चार बड़े पिंडे सातु के बनाएँ (एक सासू का , एक मंदिर का , एक पति का , एक खुद का सातु के सत्रह पिंडे सवा पाव -सवा पाव के बनाये ( सोलह सुहागन के लिए , एक सांख्या के लिए सत्रह स्टील के प्याले ( प्लेट ) मंगवा ले। पिंडों को प्लेटो में रख कर , कुमकुम टीका करे और सब पर लच्छा , सुपारी , सिक्का , गिट लगाये।चाहें तो साथ में बिंदी का एक पत्ता भी रख सकते है। अब ये सातु पिंड वाली प्लेट एक एक करके सोलह सुहागनों को दे दें । एक बड़े पिंडे पर बेस ( साड़ी ब्लाउज ) , सुहाग का सामान (काजल , बिंदी ,चूड़ी आदि ) और रूपये रख कर (51 ,101 इच्छानुसार ) कलपना निकाले व सासु जी को दें और पाँव छू कर आशीर्वाद लें। ये कलपना या बयाना होता है। इसे सासू न हो तो ननद को या किसी बुजुर्ग स्त्री को जिसने आपके साथ पूजा की हो उसे दे सकते है। इसे सबसे पहले करके बाद में सोलह सुहागन को सातु दिया जा सकता है। एक बड़ा पिंडा मंदिर में दे दें। एक बड़ा पिंडा पति को झिला दें। एक पिंडा खुद के लिए रख लें। अब संखिया (देवर या घर का कोई भी लड़का जैसे भांजा , भतीजा जा आपसे उम्र में छोटा हो –सगे भाई के अलावा ) को टावेल या पेंट शर्ट व सातु वाली प्लेट , कुछ पैसे इच्छानुसार दे और कान में धीरे से बोल मेरी बड़ी तीज का उद्यापन की हामी भरना , मैने उद्यापन किया है मान लेना “ इसी तरह सातुड़ी तीज का उद्यापन सम्पन्न होता है। है तीज माता सबके जीवन में खुशहाली रखना। बोलो तीज माता की जय ॥https://wa.me/c/918275555557 Kundan Jewellers (Gems For Everyone & Testing Lab Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

Sunday, 10 August 2014

नारियल पूर्णिमा

नारियल पूर्णिमा,,,श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधनके दिन ही मनाया
जानेवाला श्रावणमासका महत्त्वपूर्ण त्यौहार है... नारियल पूर्णिमा....
नारियल पूर्णिमा प्राकृतिक परिवर्तनपर आधारित त्यौहार है । वर्षाकालके आरंभमें प्रथम दो महीने समुद्री व्यापार अथवा समुद्री-यात्रा करना संभव नहीं होता है । परंतु श्रावण पूर्णिमाके कालमें वर्र्षाका परिमाण घटता है । आंधी अथवा तूफानके कारण उफननेवाला समुद्र भी इस कालमें शांत होता है । इसलिए इस दिन समुद्रतट पर जाकर समुद्रकी अर्थात वरुणदेवताकी पूजा की जाती है । वरुण देवता जलपर नियंत्रण रखनेवाले देवता हैं । पूजाके कारण वरुणदेवता प्रसन्न होते हैं, इस कारण समुद्री संकटोंका सामना नहीं करना पडता । यह त्यौहार संपूर्ण भारतखंडके समुद्री तटोंपर बडी धूमधामसे मनाया जाता है ।इस दिन समुद्रको अर्पण किए जानेवाले नारियल सजाकर जुलूसके साथ समुद्रतट पर ले जाते हैं । वहां पहुंचनेपर समुद्रकी पूजा करते हैं, तथा श्रद्धाभावसहित उस नारियलको अर्पण करते हैं समुद्रदेवताका भावपूर्ण वंदन करनेसे व्यक्तिमें भावके वलय जागृत होते हैं ।
नारियलका पूजन करनेसे उसमें परमेश्वरीय तत्त्वके वलय कार्यरत होते हैं ।
नारियलमें चैतन्यके वलय कार्यरत होते हैं ।
. समुद्रदेवताको शरणागत भावसे नारियल अर्पण करनेसे समुद्रकी ओर चैतन्यके प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं ।
समुद्रदेवताका भावपूर्ण पूजन करनेसे परमेश्वरीय तत्त्वके प्रवाह समुद्रकी ओर आकृष्ट होते हैं ।
. अप्रकट रूपमें विद्यमान परमेश्वरीय तत्त्व वलयके रूपमें प्रकट होकर कार्यरत होते हैं ।
वरुणदेवताके तत्त्व वलयके रूपमें कार्यरत होते हैं ।
निर्गुण तत्त्व समुद्रमें अधिक मात्रामें वलयके रूपमें कार्यरत होते हैं ।
समुद्रमें आनंद, चैतन्य एवं शक्ति के वलय आकृष्ट होते हैं एवं समुद्रमें आनंद, चैतन्य एवं शक्ति के वलय जागृत होते हैं । इन वलयोंसे व्यक्ति की ओर आनन्द, चैतन्य एवं शक्ति के प्रवाह प्रक्षेपित होनेसे व्यक्तिमें आनन्द , चैतन्य तथा शक्तिके वलय जागृत होते हैं ।
 ॥Astrologer Gyanchand Bundiwal। nagpur M. 0 8275555557

Photo: नारियल पूर्णिमा,,,श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधनके दिन ही मनाया
जानेवाला श्रावणमासका महत्त्वपूर्ण त्यौहार है... नारियल पूर्णिमा....
नारियल पूर्णिमा प्राकृतिक परिवर्तनपर आधारित त्यौहार है । वर्षाकालके आरंभमें प्रथम दो महीने समुद्री व्यापार अथवा समुद्री-यात्रा करना संभव नहीं होता है । परंतु श्रावण पूर्णिमाके कालमें वर्र्षाका परिमाण घटता है । आंधी अथवा तूफानके कारण उफननेवाला समुद्र भी इस कालमें शांत होता है । इसलिए इस दिन समुद्रतट पर जाकर समुद्रकी अर्थात वरुणदेवताकी पूजा की जाती है । वरुण देवता जलपर नियंत्रण रखनेवाले देवता हैं । पूजाके कारण वरुणदेवता प्रसन्न होते हैं, इस कारण समुद्री संकटोंका सामना नहीं करना पडता । यह त्यौहार संपूर्ण भारतखंडके समुद्री तटोंपर बडी धूमधामसे मनाया जाता है ।इस दिन समुद्रको अर्पण किए जानेवाले नारियल सजाकर जुलूसके साथ समुद्रतट पर ले जाते हैं । वहां पहुंचनेपर समुद्रकी पूजा करते हैं, तथा श्रद्धाभावसहित उस नारियलको अर्पण करते हैं समुद्रदेवताका भावपूर्ण वंदन करनेसे व्यक्तिमें भावके वलय जागृत होते हैं ।
नारियलका पूजन करनेसे उसमें परमेश्वरीय तत्त्वके वलय कार्यरत होते हैं ।
नारियलमें चैतन्यके वलय कार्यरत होते हैं ।
. समुद्रदेवताको शरणागत भावसे नारियल अर्पण करनेसे समुद्रकी ओर चैतन्यके प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं ।
समुद्रदेवताका भावपूर्ण पूजन करनेसे परमेश्वरीय तत्त्वके प्रवाह समुद्रकी ओर आकृष्ट होते हैं ।
. अप्रकट रूपमें विद्यमान परमेश्वरीय तत्त्व वलयके रूपमें प्रकट होकर कार्यरत होते हैं ।
वरुणदेवताके तत्त्व वलयके रूपमें कार्यरत होते हैं ।
निर्गुण तत्त्व समुद्रमें अधिक मात्रामें वलयके रूपमें कार्यरत होते हैं ।
समुद्रमें आनंद, चैतन्य एवं शक्ति के वलय आकृष्ट होते हैं एवं समुद्रमें आनंद, चैतन्य एवं शक्ति के वलय जागृत होते हैं । इन वलयोंसे व्यक्ति की ओर आनन्द, चैतन्य एवं शक्ति के प्रवाह प्रक्षेपित होनेसे व्यक्तिमें आनन्द , चैतन्य तथा शक्तिके वलय जागृत होते हैं ।

रक्षा बंधन


रक्षा बन्धन  राखी बाँधने का  मुहूर्त ,शनिवार,,29,,अगस्त को रक्षा बन्धन अनुष्ठान का समय = 13:50 से 20:58,, अवधि = 7 घण्टे 8 मिनट्स
श्रावण पूर्णिमा रक्षा बन्धन के लिये अपराह्न का मुहूर्त = 13:50 से 16:10 अवधि = 2 घण्टे 20 मिनट्स,,रक्षा बन्धन के लिये प्रदोष काल का मुहूर्त = 18:42 से 20:58,,,अवधि = 2 घण्टे 15 मिनट्स
भद्रा  28 अगस्त को रात 3.35 बजे से लग जायेगा और यह रक्षाबंधन पर्व यानी 29 अगस्त के दोपहर 1.40 बजे तक रहेगा। 9 घंटे 11 मिनट तक का है
भाई और बहन का लगाव एक अद्भुत प्रेम है। इस रिश्तें में एक-दूसरे के प्रति मन का, भावनाओं का, सेवा का, ममता का व सुरक्षा का समपर्ण है। लेकिन वासना की बू लेशमात्र भी नहीं है। इस अनमोल रिश्तें में अब मानसिक दरार दिखलाई पड़ने लगी है। ’’भैया को दीन्ही महल अटारी, हमका दीया परदेश’’ शिक्षा दीप्ति स्त्रियों के ’’कान्ता-सम्मित उपदेशों’’ का असर इतना तो हुआ कि पैतृक सम्मपत्ति में लड़कियों को हिस्सा मिला। मगर इसका नतीजा यह है कि भाईयों के मन में बहनों की खातिर संशय बैठ गया। उन्हे लगने लगा कि यह माॅ-बाप की सेवा के नाम पर बहनें बार-2 मायके आने लगी और अपने नयें घर पर माॅ-बाप को महीनों रखने लगी। कहीं उन्हें पोट कर सम्पत्ति का अधिकांश हिस्सा अपने नाम न लिखवा लें। इस मानसिक भ्रम के कारण भाईयों को बहनों में अपना प्रतिद्वंद्वी दिखने लगा।
राक्षा सूत्र बाॅधते समय क्या करें-
1 रक्षाबन्धन के दिन सर्वप्रथम गणेश जी को राखी बाॅधे तत्पश्चात अन्य लोगों को बाॅधें।
2 राखी बॅधवाने वाले व्यक्ति का मुॅख पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
3 रक्षा सूत्र बॅधवाते वक्त सिर पर रूमाल या कोई कपड़ा अवश्य रखें।
4 महिलावर्ग रखी बाॅधते समय लाल, गुलाबी, पीले या केसरिया रंग कपड़े पहने तो विशेष लाभ होगा।
5 सर्वप्रथम कलाई में कलावा बाॅधे उसके बाद अन्य कोई फैशनेबल राखी बाॅधे।
6 बहने जों रक्षा सूत्र बाॅधें उसे एक वर्ष तक कलाई में बाॅधे रखे और दूसरे वर्ष पुराना वाला रक्षा सूत्र उतार कर किसी नदीं में प्रवाहित करके पुनः नया रक्षा सूत्र बहनों से बॅधवायें। ऐसा करने पर आपकी सुख, समृद्धि व स्वास्थ्य की रक्षा पूरे वर्ष होती रहेगी।
7 येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
बहने राखी बाॅधते समय उपरोक्त मन्त्र का उच्चारण करें।
8 राखी बाॅधवाते समय दाहिने हाथ की मुठ्ठी में फॅूल अवश्य रखें।
9 रक्षा सूत्र शत-प्रतिशत सूती धागे का ही होना चाहिए।
10 राखी को 7 या 5 बार घुमाकर ही हाथ में बाॅधना चाहिए।
रक्षा सूत्र क्यों बाॅधा जाता है ?
1 कलावा या मोली बाॅधने की प्रथा तब से चली आ रही है, जब से दानवीर राजा बलि की वीरता की रक्षा के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बाॅधा था। शास्त्रों में इस श्लोक का उल्लेख मिलता भी मिलता है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
2 रक्षासूत्र बाॅधने से त्रिदेव ब्रहमा, विष्णु, महेश व तीनों देवियाॅ लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा की कृपा बनी रहती है।
3 शरीर की संरचना का प्रमुख नियन्त्रण हाथ की कलाई में होता है। इसलिए कलाई में रक्षा सूत्र बाॅधने से आत्म-विश्वास आता है एंव तीनों दोष वात, पित्त व कफ में सन्तुलन बना रहता है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
4 कलावा या मोली बाॅधने से ब्लडप्रेशर व तनाव का रोग कम होता है।
यदि बहन भाई से रूष्ठ है तो क्या करें-
जन्मकुण्डली में बहन का कारक ग्रह बुध होता है। यदि आपका बुध अशुभ है, पापी है या नीच का है तो बहन से आपके रिश्तें मधुर नहीं रहेंगे। किसी भी प्रकार की नोंक-झोक चलती रहेगी।
1 बहन से रिश्तें मधुर हो जायें इसके लिए आपको रक्षा बन्धन के दिन अपनी बहन को हरें रंग साड़ी, हरे रंग की चूडियाॅ उपहार में दें।
2 नाक व कान में पहनें वाली कोई वस्तु भेंट करने से भी रिश्तें अच्छें हो जाते है।
3 रक्षा बन्धन के दिन बहन को सौंफ युक्त मीठा पान खिलायें।
4 विष्णु सह्रसनाम का पाठ करें।
5 अपनी बहन को हरे रंग की ब्रेसलेट या कोई अन्य उपहार जो हरें रंग का हो उसे दें।
यदि भाई नाराज है तो बहनें क्या करें-
भाई का कारक ग्रह मंगल होता है। स्त्रियों की कुण्डली में मंगल अशुभ, नीच का या भावसन्धि में फॅसा है तो भाई से रिश्तें अच्छे नहीं रहेंगे।
1 बहनें रक्षा बन्धन के दिन सबसे पहले हनुमान जी को रखी बाॅधे और उसके बाद भाई को राखी बाॅधते वक्त हनुमान जी की दाहिने भुजा से लिया हुआ वन्दन भाई को लगायें। ऐसा करने से आपस में प्रेम सम्बन्ध मजबूत होंगे।
2 आज के दिन बहनें सुन्दर काण्ड का पाठ करके भाई को राखी बाॅधें तथा बेसन लडडू खिलायें।
3 बहनें अपनें भाईयों को गहरे लाल रंग का कोई उपहार दें।
4 रक्षाबन्धन के दिन बहनें अपनें भाईयों को अपने हाथों से भोजन करायें तथा केसर युक्त कोई मीठी वस्तु अवश्य खिलायें।
5 भाई को राखी बाॅधते समय बहन मन में कार्तिकेय भगवान का स्मरण करें। हे कार्तिकेय जी मेरे और भाई के बीच रिश्तें हमेशा मधुर बनें।

Photo: रक्षा बंधन का मुहूर्त = 13=28 से 16=10.....10 अगस्त को सुबह से लेकर 1.38 मिनट तक भद्रा काल है। इसके बाद राखी त्योहार मनाना शुभ फलदायी होगा। रविवार का दिन होने के कारण 4.30 से 6 बजे तक राहु काल रहेगा। इसलिए इस समय के बाद भी राखी का त्योहार मनाने से बचना अच्छा होगा। शाम 6.30 से 7.30 तक शुभ और 7.30 से रात 9 बजे तक अमृत का चौघडिया रहेगा। चर के चौघडिया में भी रात 9 से 10.30 बजे तक रक्षासूत्र बांधा जा सकेगा।
भाई और बहन का लगाव एक अद्भुत प्रेम है। इस रिश्तें में एक-दूसरे के प्रति मन का, भावनाओं का, सेवा का, ममता का व सुरक्षा का समपर्ण है। लेकिन वासना की बू लेशमात्र भी नहीं है। इस अनमोल रिश्तें में अब मानसिक दरार दिखलाई पड़ने लगी है। ’’भैया को दीन्ही महल अटारी, हमका दीया परदेश’’ शिक्षा दीप्ति स्त्रियों के ’’कान्ता-सम्मित उपदेशों’’ का असर इतना तो हुआ कि पैतृक सम्मपत्ति में लड़कियों को हिस्सा मिला। मगर इसका नतीजा यह है कि भाईयों के मन में बहनों की खातिर संशय बैठ गया। उन्हे लगने लगा कि यह माॅ-बाप की सेवा के नाम पर बहनें बार-2 मायके आने लगी और अपने नयें घर पर माॅ-बाप को महीनों रखने लगी। कहीं उन्हें पोट कर सम्पत्ति का अधिकांश हिस्सा अपने नाम न लिखवा लें। इस मानसिक भ्रम के कारण भाईयों को बहनों में अपना प्रतिद्वंद्वी दिखने लगा। 
रक्षा बन्धन का शुभ मुहूर्त- रक्षाबन्धन अपरान्हव्यापिनी श्रावण पूर्णिमा में मनाया जाता है। भद्रा में यह निषिद्ध है। 10 अगस्त को अपरान्ह 1:38मि0 तक भद्रा रहेगी। अतः अपरान्ह 1:40 मि0 से 3:30 मि0 तक शुभ मुहूर्त है। वैसे भद्रा के बाद पूरे दिन  मूहूर्त रहेगा।
राक्षा सूत्र बाॅधते समय क्या करें-
1  रक्षाबन्धन के दिन सर्वप्रथम गणेश जी को राखी बाॅधे तत्पश्चात अन्य लोगों को बाॅधें।
2  राखी बॅधवाने वाले व्यक्ति का मुॅख पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
3   रक्षा सूत्र बॅधवाते वक्त सिर पर रूमाल या कोई कपड़ा अवश्य रखें।
4  महिलावर्ग रखी बाॅधते समय लाल, गुलाबी, पीले या केसरिया रंग कपड़े पहने तो विशेष लाभ होगा।
5  सर्वप्रथम कलाई में कलावा बाॅधे उसके बाद अन्य कोई फैशनेबल राखी बाॅधे। 

6  बहने जों रक्षा सूत्र बाॅधें उसे एक वर्ष तक कलाई में बाॅधे रखे और दूसरे वर्ष पुराना वाला रक्षा सूत्र उतार कर किसी नदीं में प्रवाहित करके पुनः नया रक्षा सूत्र बहनों से बॅधवायें। ऐसा करने पर आपकी सुख, समृद्धि व स्वास्थ्य की रक्षा पूरे वर्ष होती रहेगी।

7  येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
   तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
 बहने राखी बाॅधते समय उपरोक्त मन्त्र का उच्चारण करें।
8   राखी बाॅधवाते समय दाहिने हाथ की मुठ्ठी में फॅूल अवश्य रखें।
9  रक्षा सूत्र शत-प्रतिशत सूती धागे का ही होना चाहिए।
10  राखी को 7 या 5 बार घुमाकर ही हाथ में बाॅधना चाहिए।
रक्षा सूत्र क्यों बाॅधा जाता है ?
1  कलावा या मोली बाॅधने की प्रथा तब से चली आ रही है, जब से दानवीर राजा बलि की वीरता की रक्षा के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बाॅधा था। शास्त्रों में इस श्लोक का उल्लेख मिलता भी मिलता है। 
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामानुवध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
2   रक्षासूत्र बाॅधने से त्रिदेव ब्रहमा, विष्णु, महेश व तीनों देवियाॅ लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा की कृपा बनी रहती है।
3  शरीर की संरचना का प्रमुख नियन्त्रण हाथ की कलाई में होता है। इसलिए कलाई में रक्षा सूत्र बाॅधने से आत्म-विश्वास आता है एंव तीनों दोष वात, पित्त व कफ में सन्तुलन बना रहता है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
4   कलावा या मोली बाॅधने से ब्लडप्रेशर व तनाव का रोग कम होता है।
यदि बहन भाई से रूष्ठ है तो क्या करें-
जन्मकुण्डली में बहन का कारक ग्रह बुध होता है। यदि आपका बुध अशुभ है, पापी है या नीच का है तो बहन से आपके रिश्तें मधुर नहीं रहेंगे। किसी भी प्रकार की नोंक-झोक चलती रहेगी।
1 बहन से रिश्तें मधुर हो जायें इसके लिए आपको रक्षा बन्धन के दिन अपनी बहन को हरें रंग साड़ी, हरे रंग की चूडियाॅ उपहार में दें। 
2  नाक व कान में पहनें वाली कोई वस्तु भेंट करने से भी रिश्तें अच्छें हो जाते है।
3  रक्षा बन्धन के दिन बहन को सौंफ युक्त मीठा पान खिलायें।
4  विष्णु सह्रसनाम का पाठ करें।
5  अपनी बहन को हरे रंग की ब्रेसलेट या कोई अन्य उपहार जो हरें रंग का हो उसे दें।
यदि भाई नाराज है तो बहनें क्या करें-
भाई का कारक ग्रह मंगल होता है। स्त्रियों की कुण्डली में मंगल अशुभ, नीच का या भावसन्धि में फॅसा है तो भाई से रिश्तें अच्छे नहीं रहेंगे।
1 बहनें रक्षा बन्धन के दिन सबसे पहले हनुमान जी को रखी बाॅधे और उसके बाद भाई को राखी बाॅधते वक्त हनुमान जी की दाहिने भुजा से लिया हुआ वन्दन भाई को लगायें। ऐसा करने से आपस में प्रेम सम्बन्ध मजबूत होंगे।
2 आज के दिन बहनें सुन्दर काण्ड का पाठ करके भाई को राखी बाॅधें तथा बेसन लडडू खिलायें।
3 बहनें अपनें भाईयों को गहरे लाल रंग का कोई उपहार दें।
4 रक्षाबन्धन के दिन बहनें अपनें भाईयों को अपने हाथों से भोजन करायें तथा केसर युक्त कोई मीठी वस्तु अवश्य खिलायें।
5 भाई को राखी बाॅधते समय बहन मन में कार्तिकेय भगवान का स्मरण करें। हे कार्तिकेय जी मेरे और भाई के बीच रिश्तें हमेशा मधुर बनें।

Thursday, 7 August 2014

ॐ गुरु दत्ता नमो नमः

ॐ गुरु दत्ता नमो नमः ll
ॐ दत्‍तात्रेय हरे कृष्‍ण उन्‍मत्‍तानन्‍ददायक दिगंबर मुने बाल पिशाच ज्ञानसागर ll
ॐ आं ह्रीं क्रों एहि दत्‍तात्रेयाय स्‍वाहा ll
ॐ ऐं क्रों क्‍लीं क्‍लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सौ: दत्‍तात्रेयाय स्‍वाहा ll
ॐ द्रां ह्रीं क्रो ॐ दत्तात्रेया विद्महे योगीश्‍राय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात् ll
ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्‍राय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात् ll
ॐ दत्तात्रेया विद्महे ,दिगंबराय धीमहीतन्नो दत: प्रचोदयात् ll
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अवधूताय धीमहि तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌ ll
ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे l अत्री पुत्राय धीमहि तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌ ll
श्री दत्तात्रेययांची आरती
आरती ओवाळू गुरुसी l ब्रह्माविष्णुमहेशाशी ll ध्रु.ll
दिधले आत्मदान जगति l म्हणवुनि श्रीदत्त तुज म्हणती ll
ब्रह्मारूपे जग सृजसी l विष्णू तूचि प्रतिपाळिसी l
हर हरिसी भार उतरविसी l पार देऊनी आत्मज्ञान प्रणती l
किती तव स्मरणे जगी तरती ll १ ll
निर्गुण चित्धन वस्तुसी l अत्नीअनसूयात्मज म्हणती l
लीला दावूनी उध्दरसी l मानवदेहा जरी धरिसी l
परि नससि देह, हाचि संदेह l हृदयी असूनि ही मूर्ती l
जाणीव लोपली अंधमती l आरती ओवाळू श्रीगुरूसी ll २ ll

Wednesday, 6 August 2014

गणेश पञ्चरत्नं संपूर्णम्

मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकं कलाधरावतंसकं विलासि लोक रक्षकम्
अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकं नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥
नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरं नमत् सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥
समस्त लोक शंकरं निरास्त दैत्य कुन्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रं अक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥
अकिंचनार्ति मर्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।
प्रपञ्चनाश भीषणं धनंजयादि भूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥४॥
नितान्त कान्त दन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तराय कृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेकमेव चिन्तयामि सन्ततम् ॥
महागणेश पञ्चरत्नं आदरेण योन्ऽवहं प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम्
अरोगतां अदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्ट भूतिमभ्युपैति सोऽचिरत् ॥
॥ इति श्री शंकराचार्य विरचितं श्री महागणेश पञ्चरत्नं संपूर्णम् ॥

पुत्रदा एकादशी श्रावण मास शुक्लपक्ष की

पुत्रदा एकादशी श्रावण मास शुक्लपक्ष की
युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’

राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा

प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।

उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय
ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,
लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।

यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।

इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।
मम समस्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं श्रावणशुक्लैकादशीव्रतमहं करिष्ये

Photo: पुत्रदा एकादशी श्रावण मास शुक्लपक्ष की
०६ अगस्त,२०१४,,तिथि: एकादशी - १३:४७:१९,,से
युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है   कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’
 
राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।
 
लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।
 
उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा 
 
प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।
 
उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’
 
प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय 
 ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,
लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।
 
यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।
 
इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।
मम समस्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं श्रावणशुक्लैकादशीव्रतमहं करिष्ये

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