Friday, 21 November 2014

Mahalakshmyai Namo Namah

Mahalakshmyai Namo Namah
Om Hrim Shrim Lakshmibhyo Namah
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah॥
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om॥
Photo: Mahalakshmyai  Namo Namah
Om Hrim Shrim Lakshmibhyo Namah
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah॥ 
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om॥

Wednesday, 19 November 2014

Ganapati Stotram Pranamya Shirasa Devam Gouri Putram Vinayakam


Ganapati Stotram
Pranamya Shirasa Devam Gouri Putram Vinayakam |
Bhakthaavaasam Smarennity-Maaayuh Kaamarth Siddhaye || 1 ||
Prathamam Vakratundam Cha Ekadantam Dviteeyakam |
Triteeyam Krishna-Pingaaksham Gajavaktram Chaturthakam || 2 ||
Lambodaram Panchamam Cha Shashtam Vikatamev Cha |
Saptamam Vighna-Raajendram Dhoomravarnam Taathashtakam || 3 ||
Navamam Bhalachandram Cha Dasham Tu Vinayakam |
Ekaadhasham Ganapati Dwaadasham Tu Gajaananam || 4 ||
Dwaad-Shaitani Naamani Trisandhyam Yaha Pathainnaraha |
Na Cha Vighnabhayam Tasya Sarva-Siddhi-Karam Param || 5 ||
Vidyarthi Labhathe Vidyam Dhanaarthi Labhate Dhanam |
Putraarthi Labhathe Putraan Moksharthi Labhate Gatim || 6 ||
Japed Ganapati-Stotram Shadbhirmaasaih Phalam Labhet |
Samvatsaren Siddhim Cha Labhate Naatra Samshayaha || 7 ||
Ashtabhyo Brahmanebhyashcha Likithvaa Yeh Samarpayet |
Tasya Vidhya Bhavet Sarva Ganeshasya Prasaadataha|| 8 ||
| Eti Shree Narad Purane Sankata Nashanam Ganesha Strotram Sampoornam

!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!


Photo: Ganapati Stotram
Pranamya Shirasa Devam Gouri Putram Vinayakam |
Bhakthaavaasam Smarennity-Maaayuh Kaamarth Siddhaye || 1 ||
Prathamam Vakratundam Cha Ekadantam Dviteeyakam |
Triteeyam Krishna-Pingaaksham Gajavaktram Chaturthakam || 2 ||
Lambodaram Panchamam Cha Shashtam Vikatamev Cha |
Saptamam Vighna-Raajendram Dhoomravarnam Taathashtakam || 3 ||
Navamam Bhalachandram Cha Dasham Tu Vinayakam |
Ekaadhasham Ganapati Dwaadasham Tu Gajaananam || 4 ||
Dwaad-Shaitani Naamani Trisandhyam Yaha Pathainnaraha |
Na Cha Vighnabhayam Tasya Sarva-Siddhi-Karam Param || 5 ||
Vidyarthi  Labhathe Vidyam Dhanaarthi Labhate Dhanam |
Putraarthi Labhathe Putraan Moksharthi  Labhate Gatim || 6 ||
Japed Ganapati-Stotram Shadbhirmaasaih Phalam Labhet |
Samvatsaren Siddhim Cha Labhate Naatra Samshayaha || 7 ||
Ashtabhyo Brahmanebhyashcha Likithvaa Yeh Samarpayet |
Tasya Vidhya Bhavet Sarva Ganeshasya Prasaadataha|| 8 ||
| Eti Shree Narad Purane Sankata Nashanam Ganesha Strotram Sampoornam

Ganesh Aarti in Egnlish

Ganesh Aarti in Egnlish

Jay Ganesh, Jay Ganesh, Jay Ganesh Devaa | 
Maataa Jaakii Paarvatii, Pitaa Mahaadevaa || 

Meaning: Victory to You, O Lord Ganesha, Victory to You, O Lord Ganesha, Victory to You, O Lord Ganesha Deva. You are born of Mother Parvati and Lord Shiva is your father 

Ek Dant Dayaavant, Caar Bhujaadhaarii | 
Maathe Par Tilak Sohe, Muuse Kii Savaarii || 

Meaning: You have a single tusk, You are filled with compassion and You have four hands. You have a beautiful vermillion mark on Your forehead, And You ride on Your vahana (carrier) which is in the form of a mouse. 

Paan Caddhe, Phuul Caddhe Aur Caddhe Mewa | 
Ladduan Ko Bhog Lage, Sant Kare Sevaa || 

Meaning: Devotees offer you paan (betel leaves), flowers, mewa (dry fruits), And sweets in the form of laddus; Saints offer devotional services to You. 

Andhe Ko Aankh Det, Koddhin Ko Kaayaa | 
Baanjhan Ko Putra Det, Nirdhan Ko Maayaa ||

Meaning: You bestow vision to the blind, and heal the leper. You bestow children to the barren woman, and wealth to the destitute. 

Suurashyaam Shaarann Aae Saphal Kiije Sevaa | 
Maataa Jaakii Paarvatii, Pitaa Mahaadevaa || 

Meaning: We pray to you day and night. Please bestow success on us. You are born of Mother Parvati and Lord Shiva is your father. 

Jay Ganesh, Jay Ganesh, Jay Ganesh Devaa || 

Victory to You, O Lord Ganesha, Victory to You, O Lord Ganesha, Victory to You, O Lord Ganesha Deva.!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
 Photo: JAI SHRI GANESHAYA NAMAH
JAI GANESH JAI GANESH JAI GANESH DEVA
 MATA JAKII PARVATII, PITAA MAHAADEVA
 EKA DANTA DAYAVANTA, CAAR BHUJA DHAARII
 MATHE SINDUURA SOHAI, MUUSE KII SAVARI
 JAI GANESH...
ANDHANA KO AANKHA DETA  KORHINA KO KAAYAA
 BANJHANA KO PUTRA DETA
 NIRDHANA KO MAAYA JAI GANESH...
HAAR CARHE, PHUULA CARHE  AURA CARHE MEVA
 LADDUAN KO BHOGA LAGE
 SANT KAREN SEVA JAI GANESHA..

Tuesday, 18 November 2014

ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, वायु-सुताय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, अखण्ड-ब्रह्मचर्य


ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, वायु-सुताय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, अखण्ड-ब्रह्मचर्य-व्रत-पालन-तत्पराय, धवली-कृत-जगत्-त्रितयाय, ज्वलदग्नि-सूर्य-कोटि-समप्रभाय, प्रकट-पराक्रमाय, आक्रान्त-दिग्-मण्डलाय, यशोवितानाय, यशोऽलंकृताय, शोभिताननाय, महा-सामर्थ्याय, महा-तेज-पुञ्जः-विराजमानाय, श्रीराम-भक्ति-तत्पराय, श्रीराम-लक्ष्मणानन्द-कारणाय, कवि-सैन्य-प्राकाराय, सुग्रीव-सख्य-कारणाय, सुग्रीव-साहाय्य-कारणाय, ब्रह्मास्त्र-ब्रह्म-शक्ति-ग्रसनाय, लक्ष्मण-शक्ति-भेद-निवारणाय, शल्य-विशल्यौषधि-समानयनाय, बालोदित-भानु-मण्डल-ग्रसनाय, अक्षकुमार-छेदनाय, वन-रक्षाकर-समूह-विभञ्जनाय, द्रोण-पर्वतोत्पाटनाय, स्वामि-वचन-सम्पादितार्जुन, संयुग-संग्रामाय, गम्भीर-शब्दोदयाय, दक्षिणाशा-मार्तण्डाय, मेरु-पर्वत-पीठिकार्चनाय, दावानल-कालाग्नि-रुद्राय, समुद्र-लंघनाय, सीताऽऽश्वासनाय, सीता-रक्षकाय, राक्षसी-संघ-विदारणाय, अशोक-वन-विदारणाय, लंका-पुरी-दहनाय, दश-ग्रीव-शिरः-कृन्त्तकाय, कुम्भकर्णादि-वध-कारणाय, बालि-निर्वहण-कारणाय, मेघनाद-होम-विध्वंसनाय, इन्द्रजित-वध-कारणाय, सर्व-शास्त्र-पारंगताय, सर्व-ग्रह-विनाशकाय, सर्व-ज्वर-हराय, सर्व-भय-निवारणाय, सर्व-कष्ट-निवारणाय, सर्वापत्ति-निवारणाय, सर्व-दुष्टादि-निबर्हणाय, सर्व-शत्रुच्छेदनाय, भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी-ध्वंसकाय, सर्व-कार्य-साधकाय, प्राणि-मात्र-रक्षकाय, राम-दूताय-स्वाहा।।
२॰ ॐ नमो हनुमते, रुद्रावताराय, विश्व-रुपाय, अमित-विक्रमाय, प्रकट-पराक्रमाय, महा-बलाय, सूर्य-कोटि-समप्रभाय, राम-दूताय-स्वाहा।।
३॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय राम-सेवकाय, राम-भक्ति-तत्पराय, राम-हृदयाय, लक्ष्मण-शक्ति-भेद-निवारणाय, लक्ष्मण-रक्षकाय, दुष्ट-निबर्हणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
४॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्व-शत्रु-संहारणाय, सर्व-रोग-हराय, सर्व-वशीकरणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
५॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, आध्यात्मिकाधि-दैविकाधि-भौतिक-ताप-त्रय-निवारणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
६॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, देव-दानवर्षि-मुनि-वरदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
७॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, भक्त-जन-मनः-कल्पना-कल्पद्रुमाय, दुष्ट-मनोरथ-स्तम्भनाय, प्रभञ्जन-प्राण-प्रियाय, महा-बल-पराक्रमाय, महा-विपत्ति-निवारणाय, पुत्र-पौत्र-धन-धान्यादि-विविध-सम्पत्-प्रदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
८॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, वज्र-देहाय, वज्र-नखाय, वज्र-मुखाय, वज्र-रोम्णे, वज्र-नेत्राय, वज्र-दन्ताय, वज्र-कराय, वज्र-भक्ताय, राम-दूताय स्वाहा।।
९॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पर-यन्त्र-मन्त्र-तन्त्र-त्राटक-नाशकाय, सर्व-ज्वरच्छेदकाय, सर्व-व्याधि-निकृन्त्तकाय, सर्व-भय-प्रशमनाय, सर्व-दुष्ट-मुख-स्तम्भनाय, सर्व-कार्य-सिद्धि-प्रदाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१०॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, देव-दानव-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी-दुष्ट-ग्रह-बन्धनाय, राम-दूताय स्वाहा।।
११॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पँच-वदनाय पूर्व-मुखे सकल-शत्रु-संहारकाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१२॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च-वदनाय दक्षिण-मुखे कराल-वदनाय, नारसिंहाय, सकल-भूत-प्रेत-दमनाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१३॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च वदनाय पश्चिम-मुखे गरुडाय, सकल-विष-निवारणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१४॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पञ्च वदनाय उत्तर मुखे आदि-वराहाय, सकल-सम्पत्-कराय, राम-दूताय स्वाहा।।
१५॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, उर्ध्व-मुखे, हय-ग्रीवाय, सकल-जन-वशीकरणाय, राम-दूताय स्वाहा।।
१६॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, सर्व-ग्रहान, भूत-भविष्य-वर्त्तमानान्- समीप-स्थान् सर्व-काल-दुष्ट-बुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय पर-बलानि क्षोभय-क्षोभय, मम सर्व-कार्याणि साधय-साधय स्वाहा।।
१७॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, पर-कृत-यन्त्र-मन्त्र-पराहंकार-भूत-प्रेत-पिशाच-पर-दृष्टि-सर्व-विध्न-तर्जन-चेटक-विद्या-सर्व-ग्रह-भयं निवारय निवारय स्वाहा।।
१८॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, डाकिनी-शाकिनी-ब्रह्म-राक्षस-कुल-पिशाचोरु-भयं निवारय निवारय स्वाहा।।
१९॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, भूत-ज्वर-प्रेत-ज्वर-चातुर्थिक-ज्वर-विष्णु-ज्वर-महेश-ज्वर निवारय निवारय स्वाहा।।
२०॰ ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, अक्षि-शूल-पक्ष-शूल-शिरोऽभ्यन्तर-शूल-पित्त-शूल-ब्रह्म-राक्षस-शूल-पिशाच-कुलच्छेदनं निवारय निवारय स्वाहा।।
,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
 

Tuesday, 4 November 2014

श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली

श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली
ॐ प्रकृत्यै नमः । ॐ विकृत्यै नमः । ॐ विद्यायै नमः । ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः । 
ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ विभूत्यै नमः । ॐ सुरभ्यै नमः । ॐ परमात्मिकायै नमः । 
ॐ वाचे नमः । ॐ पद्मालयायै नमः । ॐ पद्मायै नमः । ॐ शुचये नम । 
ॐ स्वाहायै नमः । ॐ स्वधायै नमः । ॐ सुधायै नमः । ॐ धन्यायै नमः । 
ॐ हिरण्मय्यै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । ॐ नित्यपुष्टायै नमः । ॐ विभावर्यै नमः । 
ॐ अदित्यै नमः । ॐ दित्ये नमः । ॐ दीपायै नमः । ॐ वसुधायै नमः । 
ॐ वसुधारिण्यै नमः । ॐ कमलायै नमः । ॐ कान्तायै नमः । ॐ कामाक्ष्यै नमः । 
ॐ क्रोधसंभवायै नमः । ॐ अनुग्रहप्रदायै नमः । ॐ बुद्धये नमः । ॐ अनघायै नमः । 
ॐ हरिवल्लभायै नमः । ॐ अशोकायै नमः । ॐ अमृतायै नमः । ॐ दीप्तायै नमः । 
ॐ लोकशोकविनाशिन्यै नमः । ॐ धर्मनिलयायै नमः । ॐ करुणायै नमः । ॐ लोकमात्रे नमः । 
ॐ पद्मप्रियायै नमः । ॐ पद्महस्तायै नमः । ॐ पद्माक्ष्यै नमः । ॐ पद्मसुन्दर्यै नमः । 
ॐ पद्मोद्भवायै नमः । ॐ पद्ममुख्यै नमः । ॐ पद्मनाभप्रियायै नमः । ॐ रमायै नमः । 
ॐ पद्ममालाधरायै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ पद्मिन्यै नमः । ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः । 
ॐ पुण्यगन्धायै नमः । ॐ सुप्रसन्नायै नमः । ॐ प्रसादाभिमुख्यै नमः ।ॐ प्रभायै नमः । 
ॐ चन्द्रवदनायै नमः । ॐ चन्द्रायै नमः । ॐ चन्द्रसहोदर्यै नमः । ॐ चतुर्भुजायै नमः । 
ॐ चन्द्ररूपायै नमः । ॐ इन्दिरायै नमः । ॐ इन्दुशीतलायै नमः । ॐ आह्लादजनन्यै नमः । 
ॐ पुष्टयै नमः । ॐ शिवायै नमः । ॐ शिवकर्यै नमः । ॐ सत्यै नमः । 
ॐ विमलायै नमः । ॐ विश्वजनन्यै नमः । ॐ तुष्टयै नमः । ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः । 
ॐ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः । ॐ शान्तायै नमः । ॐ शुक्लमाल्यांबरायै नमः । ॐ श्रियै नमः । 
ॐ भास्कर्यै नमः । ॐ बिल्वनिलयायै नमः । ॐ वरारोहायै नमः । ॐ यशस्विनयै नमः । 
ॐ वसुन्धरायै नमः । ॐ उदारांगायै नमः । ॐ हरिण्यै नमः । ॐ हेममालिन्यै नमः । 
ॐ धनधान्यकर्ये नमः । ॐ सिद्धये नमः । ॐ स्त्रैणसौम्यायै नमः । ॐ शुभप्रदाये नमः । 
ॐ नृपवेश्मगतानन्दायै नमः । ॐ वरलक्ष्म्यै नमः । ॐ वसुप्रदायै नमः । ॐ शुभायै नमः । 
ॐ हिरण्यप्राकारायै नमः । ॐ समुद्रतनयायै नमः । ॐ जयायै नमः । ॐ मंगळा देव्यै नमः । 
ॐ विष्णुवक्षस्स्थलस्थितायै नमः । ॐ विष्णुपत्न्यै नमः । ॐ प्रसन्नाक्ष्यै नमः । ॐ नारायणसमाश्रितायै नमः । 
ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ सर्वोपद्रव वारिण्यै नमः । ॐ नवदुर्गायै नमः । 
ॐ महाकाल्यै नमः । ॐ ब्रह्माविष्णुशिवात्मिकायै नमः । ॐ त्रिकालज्ञानसंपन्नायै नमः । ॐ भुवनेश्वर्यै नमः ।
इति श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली ॥
,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

Monday, 3 November 2014

पशुपतिनाथ नमो नमः पशुपत्यष्टकम्,,

पशुपतिनाथ नमो नमः पशुपत्यष्टकम्,,,इस जगत के सम्पूर्ण चर, अचर प्राणी (पशु) के स्वामी भगवान शिव ही हैं| उन सहस्त्र नामों से जाने जाते हैं महेश्वर के आठ प्रमुख नामों में एक है – पशुपति जो शिव के प्राणीमात्र के स्वामी होने को इंगित करता है | प्रस्तुत अष्टक शिव के इन्ही पशुपति स्वरूप की स्तुति है |
पशुपतिं द्युपतिं धरणिपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम्।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।1।।
े मनुष्यों! स्वर्ग, मर्त्य तथा नागलोक के जो स्वामी हैं, और जो शरणागत भक्तजनों की पीड़ा को दूर करते हैं, ऐसे पार्वतीवल्लभ व पशुपतिनाथ आदि नामों से प्रसिद्ध परमपुरुष गिरिजापति शंकर भगवान् का भजन करो।
न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम्।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।2।।
हे मनुष्यों! काल के गाल में पड़े हुए इस जीव को माता, पिता, सहोदरभाई, पुत्र, अत्यन्त बल व कुल; इनमें से कोई भी नहीं बचा सकता है। अत: परमपिता परमात्मा पार्वतीपति भगवान् शिव का भजन करो।
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम्।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं, भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।3।।
हे मनुष्यों! जो मृदङ्ग व डमरू बजाने में निपुण हैं, मधुर पञ्चम स्वर में गाने में कुशल हैं, और प्रमथ आदि भूतगणों से सेवित हैं, उन पार्वती वल्लभ भगवान् शिव का भजन करो।
शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम्।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।4।।
हे मनुष्यों! ‘शिव, शिव, शिव’ कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, जो शरणागत को शरण, सुख व अभयदान देते हैं, ऐसे करुणासागरस्वरूप भगवान् गिरिजापति का भजन करो।
नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम्।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।5।।
हे मनुष्यों! जो नरमुण्ड रूपी मणियों का कुण्डल पहने हुए हैं, और सर्पराज के हार से ही प्रसन्न हैं, शरीर में चिता की भस्म रमाये हुए हैं, ऐसे वृषभध्वज भवानीपति भगवान् शंकर का भजन करो।
मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम्।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।6।।
हे मनुष्यों! जिन्होंने दक्ष यज्ञ का विनाश किया, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है, जो निरन्तर यज्ञ करने वालों को यज्ञ का फल देते हैं, और प्रलयावस्था में जिन्होने देव दानव व मानव को दग्ध कर दिया है, ऐसे पार्वती वल्लभ भगवान् शिव का भजन करो।
मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम्।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ।।7।।
हे मनुष्यों! मृत्यु, जन्म व जरा के भय से पीड़ित, विनाशशील एवं भयों से व्याकुल इस संसार को अच्छी तरह देखकर, चिरकाल से हृदय में स्थित अज्ञानरूप अहंकार को छोड़कर भवानीपति भगवान् शिव का भजन करो।
हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम्।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।8।।
हे मनुष्यों! जिनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु व इन्द्र आदि करते हैं, यम, जनेश व कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं और जो त्रिभुवन के स्वामी हैं, उन गिरिजापति भगवान शिव का भजन करो।
पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा।
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम्।।9।।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
जो मनुष्य पृथिवीपति सूरी के द्वारा रचित इस पशुपतिअष्टकम् का पाठ या इसका श्रवण करता है,वहशिवपुरीमेंनिवासकरकेआनन्दितहोताहै।







पशुपतिनाथ नमो नमः पशुपत्यष्टकम्,,

पशुपतिनाथ नमो नमः पशुपत्यष्टकम्,,,इस जगत के सम्पूर्ण चर, अचर प्राणी (पशु) के स्वामी भगवान शिव ही हैं| उन सहस्त्र नामों से जाने जाते हैं महेश्वर के आठ प्रमुख नामों में एक है – पशुपति जो शिव के प्राणीमात्र के स्वामी होने को इंगित करता है | प्रस्तुत अष्टक शिव के इन्ही पशुपति स्वरूप की स्तुति है |
पशुपतिं द्युपतिं धरणिपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम्।
प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।1।।
े मनुष्यों! स्वर्ग, मर्त्य तथा नागलोक के जो स्वामी हैं, और जो शरणागत भक्तजनों की पीड़ा को दूर करते हैं, ऐसे पार्वतीवल्लभ व पशुपतिनाथ आदि नामों से प्रसिद्ध परमपुरुष गिरिजापति शंकर भगवान् का भजन करो।
न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम्।
अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।2।।
हे मनुष्यों! काल के गाल में पड़े हुए इस जीव को माता, पिता, सहोदरभाई, पुत्र, अत्यन्त बल व कुल; इनमें से कोई भी नहीं बचा सकता है। अत: परमपिता परमात्मा पार्वतीपति भगवान् शिव का भजन करो।
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम्।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं, भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।3।।
हे मनुष्यों! जो मृदङ्ग व डमरू बजाने में निपुण हैं, मधुर पञ्चम स्वर में गाने में कुशल हैं, और प्रमथ आदि भूतगणों से सेवित हैं, उन पार्वती वल्लभ भगवान् शिव का भजन करो।
शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम्।
अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।4।।
हे मनुष्यों! ‘शिव, शिव, शिव’ कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, जो शरणागत को शरण, सुख व अभयदान देते हैं, ऐसे करुणासागरस्वरूप भगवान् गिरिजापति का भजन करो।
नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम्।
चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।5।।
हे मनुष्यों! जो नरमुण्ड रूपी मणियों का कुण्डल पहने हुए हैं, और सर्पराज के हार से ही प्रसन्न हैं, शरीर में चिता की भस्म रमाये हुए हैं, ऐसे वृषभध्वज भवानीपति भगवान् शंकर का भजन करो।
मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम्।
प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।6।।
हे मनुष्यों! जिन्होंने दक्ष यज्ञ का विनाश किया, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है, जो निरन्तर यज्ञ करने वालों को यज्ञ का फल देते हैं, और प्रलयावस्था में जिन्होने देव दानव व मानव को दग्ध कर दिया है, ऐसे पार्वती वल्लभ भगवान् शिव का भजन करो।
मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम्।
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ।।7।।
हे मनुष्यों! मृत्यु, जन्म व जरा के भय से पीड़ित, विनाशशील एवं भयों से व्याकुल इस संसार को अच्छी तरह देखकर, चिरकाल से हृदय में स्थित अज्ञानरूप अहंकार को छोड़कर भवानीपति भगवान् शिव का भजन करो।
हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम्।
त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।।8।।
हे मनुष्यों! जिनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु व इन्द्र आदि करते हैं, यम, जनेश व कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं और जो त्रिभुवन के स्वामी हैं, उन गिरिजापति भगवान शिव का भजन करो।
पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा।
पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम्।।9।।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
जो मनुष्य पृथिवीपति सूरी के द्वारा रचित इस पशुपतिअष्टकम् का पाठ या इसका श्रवण करता है,वहशिवपुरीमेंनिवासकरकेआनन्दितहोताहै।







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