Friday, 1 May 2015

नृसिंह जयंती महामहोत्सव वैशाख शुक्ल चतुर्दशी ,,,नरसिंघ जयन्ती

नृसिंह जयंती महामहोत्सव,, वैशाख शुक्ल चतुर्दशी  , नरसिंह जयंती
श्रीनृसिंह मंत्र ॐ उग्रवीरं महा विष्णुं ज्वलन्तं सर्वतो मुखम्। नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥"
हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक 
फैली हुई है। हे नृसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी 
यम हो और मैं तुम्हारे समक्ष   आत्मसमर्पण करता हूँ।"

श्रीनृसिंह देवाय नमो नम:ॐ  ॐश्रीभक्त प्रह्लादाय नमो नम: ॐ
श्रीनृसिंहजी एवं श्रीप्रह्लाजी चरित्र!!  ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
हमारे परम पवित्र सनातन धर्म में भक्त और भगवान् का "प्रेम और करुणा" का 
अटूट संबंधऔर उनकी पवित्र कथाओ  
का वर्णन सदा से ही हमे अतिदुर्लभ और मूल्यवान, जो हमे केवल उस परमात्मा 
की दया दृष्टि से ही प्राप्त होने वाली उनकी श्री चरणों की "भक्ति" और "अनुराग" के 
मार्ग को प्रशस्त कर नित्य प्रति हमें मार्गदर्शन करती है...और हमारे अंतर्मन में
निहित प्रभु के प्रति भक्ति-भाव मेंउत्साहवर्धन करती है !!!
श्रीविष्णुपुराण" में वर्णित एक कथा   के अनुसार- दैत्यों के आदि पुरुष 
श्रीकश्यपजी और उनकी पत्नी दिति  के दो राक्षस पुत्र हुए.......
हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष (श्रापित- 'जय-विजय') वे दोनों बहुत 
ही क्रूर स्वाभाव के थे और सदा से ही भगवान श्री हरि विष्णु से द्वेष भाव रखते थे !!
जब हिरण्याक्ष ने श्री भगवती पृथ्वी देवी को समुद्र के  रसातल में ले गया था... क्योकि वह 
देवताओ और श्री हरि विष्णु से द्वेष करता था, उसका मानना था की पृथ्वी 
पर रहने वाले लोगों के पूजा, अर्चना और यज्ञ आदि कर्मो से देवताओ को बल मिलता हैं !!!
ॐ श्री वराह अवतार
अपने भक्तों की करुण पुकार सुन  भक्त वत्सल भगवन श्री हरि विष्णु 
ने स्वयं वराह के रूप में अवतार लेकर भगवती पृथ्वी के उद्धार हेतु राक्षस 
हिरण्याक्ष से समद्र के रसातल में युद्ध किया और अंततः हिरण्याक्ष का 
संहार कर भगवती पृथ्वी देवी को अपने नथुने के दांतों से रसातल  से बाहर निकाला था !!
जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकश्यप को अपने भाई की मृत्यु का समाचार 
ज्ञात हुआ तो वो बहुत ही क्रोधित हुआ और मन ही मन भगवन श्री हरि विष्णु 
से और ज्यादा द्वेष करने लगा !!
हिरण्यकश्यप ने एक दिन अपने मंत्रियों की एक सभा का आयोजन 
किया ! उस सभा में सभी दैत्य मंत्री और राक्षस भी आये थे, उन्हें संबोधित 
कर हिरण्यकश्यप अत्यंत ही क्रोधित होकर इस प्रकार कहने लगा-
आज हम अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का शोक मनाने के लिए 
यहाँ एकत्रित हुए हैं ! इन्द्र जैसे हमारे क्षुद्र शत्रुओ ने दैत्य शिरोमणि हिरण्याक्ष 
को विष्णु के हाथो मरवा डाला हैं !जिसका बदला न केवल विष्णु से बल्कि समस्त देवताओ से लेना होगा !!
आज मैं सबके सामने ये प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने इस त्रिशूल से विष्णु का 
वध करूँगा, और अपने भाई की  मृतात्मा को तृप्त करूँगा !
ऐसी प्रतिज्ञा कर हिरण्यकश्यप ने सभा विसर्जित की, और उस प्रतिज्ञा को 
पूरा करने के लिए उपाय सोचने लगा !वो यह जानता था की भगवान् 
श्री हरि विष्णु से युद्ध में जीतना आसान  नहीं है ! ऐसा सोच वो वन में तपस्या
करने के लिए गया ! और वहां जाकर उसने भगवान् श्री ब्रम्हा जी की तपस्या 
की !! हिरण्यकश्यप, अमरता के  वरदान की लालसा में तपस्या करते हुए...
काफी वर्ष तपस्या में बीत जाने के बाद, जबउसका शरीर अत्यंत ही क्षीण हो 
गया, एकदिन स्वयं ब्रह्मा जी उसे वरदान  देने के लिए उपस्थित हुए...
हिरण्यकश्यप ने उनसे अमरता का 
वरदान माँगा, परन्तु सृष्टि की मर्यादा के अनुकूल न होने पर ब्रह्मा जी ने उसे 
कोई और वरदान मांगने को कहा...तो हिरण्यकश्यप ने उनसे वरदान 
मांगते हुए कहा- हे ! ब्रह्मा जी मुझे ऐसावरदान दीजिए जिससे मैं किसी व्यक्ति 
से मरू न किसी पशु से.... न मैं किसी अस्त्र से मरू न शस्त्र से.... न मैं दिन में
मरू न रात्रि में.... न मैं धरती में मरू न आकाश में..... न में घर के अंदर मरू न बाहर मरू..... न ही मैं इन बारह 
महीनो में किसी भी एक महीनो में मरू..! हिरण्यकश्यप की तपस्या से प्रसन्न 
हो श्रीब्रह्मा जी ने हिरण्यकश्यप को तथास्तु कह वो वरदान दे दिया, और वह से चले गए...!
इस वरदान को पाकर हिरण्यकश्यप यह सोचने लगा कि... अब उसे इन 
परिस्थितियों में कोई नहीं मार सकता, इस प्रकार उस वरदान ने हिरण्यकश्यप
को अहंकारी बना दिया और वह अपनेआप को अमर समझने लगा !
उसने स्वर्ग के राजा इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित 
करने लगा ! वह चाहता था कि-सब लोग उसे ही भगवान मानें और 
उसकी पूजा करें ! उसने अपने राज्य में 
श्री हरि विष्णु की पूजा को वर्जित कर   दिया उसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड में अपना 
आधिपत्य बना लिया !!
और जो कोई भी श्री हरि विष्णु की पूजा अर्चना या उनका नाम लेता वो उसे 
मृत्युदंड दे देता था !
देवताओ सहित तीनों लोको के प्राणी  उस दैत्य हिरण्यकश्यप के सामने नतमस्तक हो गए !!!

हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु एक धर्मपरायण स्त्री थी, जब वो गर्भवती 
थी तो उसकी धरम परायणता को देख  स्वयं नारद जी ने उसे श्री हरि विष्णु 
की कथा का उपदेश दिया था ! जिसके फलस्वरूप उसका गर्भ में स्थित
शिशु जो कि प्रह्लाद थे, उनको गर्भकाल से ही भगवन श्री हरि विष्णु 
के नाम के प्रति अनुराग हो गया !
उस समय सारी सृष्टि में केवल एक नन्हा सा बालक ही ऐसा था जो भगवान् 
श्री हरि विष्णु के नाम का निरंतर कीर्तन करता रहता था... और वो 
उसी हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था !श्री प्रह्लाद पांच वर्ष कि अवस्था में ही
श्री हरि नरायण का नाम जपते रहते थे !हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद 
को श्री हरि के प्रति भक्ति भाव देख उन्हें बहुत ही तरीके से समझया, 
डराया और प्रताड़ित किया ! परन्तु  प्रह्लाद, श्री हरि की परम भक्ति से 
विमुख न हुए ! हिरण्यकश्यप ने  अपने पुत्र प्रह्लाद को राक्षसी गुरुकुल 
भेजा ! ताकि वो श्री हरि विष्णु की भक्ति से विमुख हो सके ! प्रह्लाद  अपने गुरुकुल के मित्रो को 
श्री हरि नाम का उपदेश और उसका महत्व बताने लगा !
हिरण्यकश्यप मदिरा पान में तन्मय हो सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी 
क्रूरता से प्रताड़ित करने लगा, नर नारी,नाग, किन्नर, गंधर्व और स्वयं इन्द्र 
आदि देवतागण भी उससे भयभीत रहने लगे !इधर भक्त प्रह्लाद गुरुकुल 
में श्री हरि का नाम निरंतर जपते रहे !अपने राक्षस सखाओ को भी 
श्री हरि विष्णु के नाम संकीर्तन महत्व समझाया और जिससे प्रभावित हो 
उनके सभी सखा और गुरुजनों को भी श्री हरि विष्णु के श्री चरणों में अनुराग हो गया ! 
जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, उसे शरीर नहीं दिखता, केवल परमात्मा ही 
दिखते हैं ! यह सुन हिरण्यकश्यप की आँखे क्रोध से लाल लाल हो गयी !
उसकी भृकुटी तन गयी और उसनें प्रह्लाद से कहा-
अरे मुर्ख !! और कहाँ-कहाँ दिखता है तुझे तेरा परमात्मा ?
श्री प्रह्लााद ने कहा- प्रत्येक वस्तु में आकाश में, धरती में, 
वायु में, आप में, मुझे में, सारे संतो में, और इन दैत्य सैनिको में भी.... आप 
विश्वास कीजिये पिताश्री... वे सृष्टीके कण-कण में विद्यमान हैं !!
हिरण्यकश्यप ने कहा- यहाँ के हर वस्तु में भी ! प्रह्लाद ने हाथ जोड़ कर कहा-जी पिताश्री !
हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा :इस महल में भी ?प्रह्लाद ने कहा -
जी पिताश्री !! मैं तो उन्हें इस महल की हर वस्तु में देख रहा हूँ !
हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा- तो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे 
में भी दिखता है...तुझे तेरा परमात्मा...?
प्रह्लाद ने कहा-जी पिताश्री ...वे उस खम्बे में भी हैं !हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा-
अरे मूढ़ !! यदि वो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे में भी अगर तेरा वो विष्णु है तो जा आलिंगन कर उसका !!
यह सुन प्रह्लाद उस दहकते हुए खम्बे की ओर श्री हरि विष्णु नारायण का ध्यान करते हुए बढे !!
अपने प्रिय भक्त का अटूट विश्वास और हिरण्यकश्यप के पाप का घड़ा 
भरा हुआ देख स्वयं भगवान 
श्री हरि विष्णु नारायण-श्रीनृसिंह जी के रूप में सिंह की सी गर्जना करते
हुए उस खम्बे को फाड़कर प्रकट हुए !!!भगवान श्री हरि विष्णु नारायण का 
वो रौद्र रूप बहुत ही भयंकर था !उनका मुख सिंह का था... उनका 
शरीर मनुष्य का था... हाथों में सिंह के से बड़े बड़े नाख़ून थे... श्री भगवान 
का वह रूप देख वहां उपस्थित सभी लोग डरने लगे...यहा तक स्वयं 
प्रह्लाद भी एक क्षण के लिए डर गए ! हिरण्यकश्यप ने श्री भगवान का यह
रूप देखा तो वो भी डर से कांपने लगा !!
फिर हिरण्यकश्यप कुछ संभलकर 
भगवान श्रीनृसिंहजी पर प्रहार करने लगा... परन्तु श्री भगवान के प्रहार 
का वेग वो सहन न कर सका और कुछ ही समय में थक गया...और 
श्री हरि विष्णु नारायण जिन्होंने  नृसिंह देव जी के रूप में अवतार 
लिया था... वे उसी क्रोधित मुद्रा में सिंह की सी गर्जना करते हुए 
हिरण्यकश्यप के समीप गए... और उसे अपने नाखून वाले हाथो से
पकड़ के बीच सभा में घसीटते हुए उस सभा के द्वार की देहली पर 
ले गए... और हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में उठा कर लिटा लिया...
श्री भगवान का ये रूप देख  हिरण्यकश्यप के मुख से एक भी 
स्वर नहीं निकला... और फिर भगवान नृसिंह देव यह देख उससे इस प्रकार कहने लगे-
हे असुरवंशी हिरण्यकश्यप !! तुझे ब्रह्मा जी का वरदान था... की तू 
किसी ब्रह्मा की सृष्टि से नहीं मरेगा... तो देख मैं स्वयं ब्रह्मा की सृष्टि में
नहीं हूँ... न मैं नर हूँ न पशु... न देवता न दैत्य हूं !!! इस समय न दिन हैं न रात्रि हैं... इस समय 
सायंकाल हैं... तुझे न अस्त्र से मारा जा रहा है न शस्त्र से... तुझे स्वयं 
मैं अपने इन नाखूनों से मारूंगा... तू न धरती में है न आकाश में... 
देख तू मेरी गोद में हैं... तू उन बारह महीनो में भी नहीं मारा जा रहा... केवल तेरे लिए ही मैंने इस अधिक 
{पुरषोतम} मास की रचना की हैं... न तू अन्दर हैं न बाहर... तुझे मैं घर की द्वार की देहली पर मार रहा हूँ !

ऐसा कह श्री हरि नृसिंहजी सिंह की सी तेज गर्जना करते हुए... 
अपने नुकीले लंबे लंबे नाखूनों सेहिरण्यकश्यप का पेट फाड़ देते हैं... 
और हिरण्यकश्यप का वध कर पाप का अंत कर देते हैं !!! 
भगवान नृसिंह जी हिरण्यकश्यप के शव को दूर फेंक खड़े हो... 
जोर जोर से सिंह के समान गर्जना करने लगते हैं !
यह दृश्य देख प्रह्लाद के आँखों से अश्रु धाराएं बहने लगती हैं और 
वे अपने हाथो में श्रीनृसिंहजी के लिए फूलो की माला लिए श्री हरि विष्णु 
का ध्यान करने लगते हैं.!! वहां पर उपस्थित समस्त असुर, दैत्य सैनिक 
अदि नतमस्तक हो भगवान नृसिंहजी से हाथ जोड़ क्षमा प्रार्थना करने 
लगते हैं ! तत्पश्चात उस सभा में भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा , इन्द्र 
आदि देवतागण प्रकट हो, भगवान श्री नृसिंह देवजी की करबद्ध स्तुति करने लगे !!

भगवान श्री नृसिंहजी का रौद्र रूप किसी प्रकार से शांत होता न देख... 
तत्क्षण श्री प्रह्लाद अपने अश्रु पूर्ण नेत्रो के साथ अपने आराध्य देव 
श्री नृसिंहजी की स्तुति व प्रार्थना करते हैं !!!
श्री प्रह्लाद हाथ जोड़ इस प्रकार श्री हरि नृसिंहदेवजी की स्तुति करते है.....
नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...
जय नरसिंह नारायणा.....अद्भुत छवि नारायणा.....
नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...
नृसिंह रूप हरे, प्रभु नृसिंह रूप हरे ....शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर....
चरण पडू मैं तुम्हरे, ॐ जय नृसिंह हरे...नृसिंह रूप हरे, प्रभु नृसिंह रूप हरे ....
हे शरणागत वत्सल, भक्तन हितकारी....तुम्हरा यश गावेंगे, युग युग नर नारी....
हे प्रह्लाद के रक्षक, हे पालक यह बालक...चरणन शीश धरे, ॐ जय नृसिंह हरे.....
नृसिंह रूप हरे... प्रभु नृसिंह रूप हरे ....शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर....

नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...जय नृसिंह नारायणा.....
अद्भुत छवि नारायणा.....नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...

श्री प्रह्लाद को श्री हरि नृसिंह नारायण अपनी गोद में बैठा लेते हैं, और श्री हरि नृसिंह जी अपने हाथो से, 
श्री प्रह्लाद के बालो को संवारते हैं... और अपनी जीभ से उनको चाटने लगते हैं... 
श्री नृसिंह भगवान श्री प्रह्लाद से बोले- हे वत्स !! 
मैं तुमसे और तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ... तुम मुझसे कुछ वरदान 
मांग लो... श्री प्रह्लाद बोले- हे नाथ !! मैं जिन भी हजारों योनियों 
में विराजूं, उन उन सभी जन्मों में मैं सदा आप की निरन्तर भक्ति करूं....
हे ! अच्युत आप कृपा कर मेरी यह इच्छा पूर्ण करो...श्री नृसिंह भगवान 
बोले- हे प्रह्लाद !! मुझमें तो तुम्हारी अनन्य भक्ति है ही और आगे भी 
ऐसे ही रहेगी ! तुम्हें और जो भी वर  की इच्छा हो मुझ से ले लो ! 
श्री प्रहलाद बोले- हे श्री हरि नारायण !! आपकी स्तुति करने के कारण, मुझसे 
जो पिताश्री ने द्वेष किया था, उससे  उन्हें जो पाप लगा था, उनका वह 
पाप नष्ट हो जाये !मुझे पर्वत के ऊपर से गिराया...
अग्नि में जलाया...मुझे नागो के भरे हुए कुण्ड में डाला...और हाथी के 
नीचे दबवाने की कोशिश की... तेल की गरम गरम कढ़ाई में मुझे 
बिठाया गया तथा और जो भी असाधु कार्य मेरे पिता श्री ने मेरे 
विरुद्ध किये, आप में भक्तिमान मनुष्य से द्वेष करने के कारण जो 
उनहें पाप प्राप्त हुआ है...हे ! प्रभु !! आप की कृपा से जल्द ही मेरे पिता 
उस से मुक्त हो जायें...और मेरे पिताश्री को मोक्ष प्रदान करे प्रभु !!
श्री नृसिंह भगवान बोले- हे भक्त प्रह्लाद मैं तुम्हारी पितृ भक्ति से 
भी बहुत प्रसन्न हुआ ! मेरी कृपा से तुम्हारे पिता हिरण्यकश्यप मोक्ष
को प्राप्त करेंगे ! मैं तुम्हें और वर देना चाहता हूं, वर माँगो !श्री प्रह्लाद बोले- 
हे भगवान, आप ने जो मुझे वर दिया की मैं आप की कृपा से भविष्य 
में भी आप की अव्यभिचारिणी भक्ति करूँगा. मैं तो उस से ही 
कृत कृत हो गया हूँ ! धर्म, अर्थ, काम उसके लिये क्या हैं, वह तो मुक्ति को 
अपने हथेली पर स्थित किये हुये है !जो इस सारे संसार की मूल आपकी 
भक्ति में स्थित है ! श्री नृसिंह भगवान बोले- जैसी तुम्हारा चित्त निश्चल मेरी 
भक्ति में स्थित है, वैसे ही मेरी कृपा से तुम परम निर्वाण पद प्राप्त करोगे !!!
तत्पश्चात श्री प्रह्लाद ने पुनः श्री हरि नृसिंह जी की स्तुति
'हरि अष्टकम' नामक 'स्त्रोत' से की जो इस प्रकार करते हैं ......

श्री हरि: अष्टकम
हरिर्हरति पापानि दुष्टचितैरपि स्मृतः ।अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥१॥
भगवान श्री हरि समस्त पापों को हर लेते हैं चाहे दुष्ट चित् ने ही उन्हें क्यों 
न याद किया हो, या न चाहते हुये भी उन्हें किसी ने याद किया हो.....बिलकुल 
वैसे ही जैसे अग्नि का स्पर्श करने से वह हर वस्तु को जला कर भस्म कर 
देती हैं.... वह, यह नहीं देखती कौनसी वस्तु पवित्र है और कौन से अपवित्र...
स गँगा स गया सेतुः स काशी स च पुष्करम् । जिह्वाग्रे वर्तते यस्या हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥२॥
उस प्राणी ने श्री गंगा, सेतु, काशी और पुष्कर के दर्शन कर लिये जिसके 
मुँह मे भगवान श्री हरि का नाम के ये दो अक्षर निरंतर रहते हैं.....
वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिशारण्य एव च ।
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥३॥
उस प्राणी ने वाराणसी, कुरुक्षेत्र, नैमिशारण में जो भी पुण्य कार्य हुये हैं 
वो सब कर लिये जो हरि नाम के ये दो अक्षरों का उच्चारण करता हैं ....
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुन्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥४॥
पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और अन्य भी जितने पुण्य और पवित्र स्थान हैं 
वो सब हरि, ये दो अक्षरों में हैं .....
गवां कोटिसहस्राणि हेमकन्यासहस्रकम् ।
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं  हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥५॥
....ॠग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः ।अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥६॥
ॠग, साम, यजुर और अथर्व, ये चारों वेद उस ने पढ़ लिये हैं जो हरि, इन 
दो अक्षरों का ऊच्चारण करता है....
अश्वमेधैर्महायज्ञैः नरमेधैस्तथैव च ।
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥७॥
अश्वमेध नाम के महायज्ञ से और नरमेध यज्ञ से जो पुण्य फल प्राप्त 
होते हैं वो सब भगवान हरि का नाम लेने वाले को प्राप्त होते हैं....
प्राण प्रयाण पाथेयं संसार व्याधिनाशनम् ।
दुःखात्यन्त परित्राणं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥८॥
हरि नाम के ये दो अक्षर कानों द्वारा प्राणों के रस्ते जाकर संसार रूपी 
बीमारी का नाश कर देते हैं और अत्यन्त दुख का अन्त करते हैं....
बद्ध परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥
जो हरि का नाम लेते हैं वे पुण्यशील लोग हाथजोड़े मोक्ष कि तरफ बढते हैं....
!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
श्री प्रह्लाद के मुख से "श्रीहरि अष्टकम स्त्रोत्र" सुन 
भगवान श्रीनृसिंहदेवजी बहुत ही प्रसन्न होते हैं और भक्त प्रह्लाद
को अपना स्नेहाशीष प्रदान कर श्रीनृसिंहदेव भगवान वहां से 
अन्तर्ध्यान हो जाते हैं...!!!*ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,Gems For Everyone 
जो कोई भी प्राणी सच्चे हृदय से श्रीप्रह्लादजी द्वारा रचित यह 
हरिअष्टकम का स्त्रोत्रसुनता अथवा कहता हैं.... 
उसके पापों का जल्दी ही क्षय हो जाता है......
दिन और रात मे किये पाप से, श्री नरसिंह जी की स्तुति सुनने या 
पढने से, मनुष्य मुक्त हो जाता है, इस में कोई शक नहीं है .....
जैसे भगवान हरिजी ने प्रह्लादजी की सभी संकटों से रक्षा की थी, उसी 
प्रकार वे उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनके श्री स्तुति हृदय से सदा सुनता और कहता है। 
भगवान श्री नृसिंह देवाय नमो नम श्री भक्त प्रह्लादाय नमो नम:


Wednesday, 29 April 2015

गायत्री मंत्र Gayatri Mantra ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्

                    

गायत्री मंत्र Gayatri Mantra
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्
ॐ ॐ ॐ ॐ काराय विद्महे डमरुजातस्य धीमहि तन्नः प्रणवः प्रचोदयात् ॥
अग्नि ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निमथनाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात्
अग्नि ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
अग्नि ॐ रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ॥
अग्नि ॐ वैश्वानराय विद्महे लाललीलाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
अग्नि ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
अग्नि ॐ सप्तजिह्वाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥
अजपा ॐ हंस हंसाय विद्महे सोऽहं हंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात्
अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णा प्रचोदयात्
आकाश
आकाश ॐ आकाशाय च विद्महे नभोदेवाय धीमहि तन्नो गगनं प्रचोदयात् ॥
इन्द्र, शक्र
इन्द्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
इन्द्र ॐ सहस्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
इन्द्र ॐ देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नः शक्रः प्रचोदयात् ॥
काम
काम ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
काम ॐ मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥
काम ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
कामकलाकाली
कामकलाकाली ॐ अनङ्गाकुलायै विद्महे मदनातुरायै धीमहि तन्नः कामकलाकाली प्रचोदयात् ॥
काली
काली ॐ आद्यायै च विद्महे परमेश्वर्यै च धीमहि तन्नः कालीः प्रचोदयात् ॥
काली ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै च धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात्
काली ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥
कृष्ण
कृष्ण ॐ गोविन्दाय विद्महे गोपीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ।
कृष्ण ॐ दामोदराय विद्महे रुक्मिणीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
कृष्ण ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
कृष्ण ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
कृष्ण ॐ श्रीकृष्णाय विद्महे दामोदराय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
केतु
केतु ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
केतु ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
केतु ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥
गणेश
गणेश ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
गणेश ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
गणेश ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
गरुड
गरुड ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपर्णाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
गरुड ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
गरुड ॐ वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
गुरु
गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
गुरु ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
गुरु ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
गोपाल
गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥
गौरी
गौरी ॐ गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
गौरी ॐ सुभगायै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
चन्द्र, सोम
चन्द्र ॐ निशाकराय विद्महे कलानाथाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥
चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
छिन्नमस्ता
छिन्नमस्ता ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
जयदुर्गा
जयदुर्गा ॐ नारायण्यै विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
जल
जल ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नस्त्वम्बु प्रचोदयात् ॥
जल ॐ ह्रीं जलबिम्बाय विद्महे मीनपुरुषाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
जानकी
जानकी ॐ जनकजायै विद्महे रामप्रियायै धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥
तारा
तारा ॐ तारायै च विद्महे महोग्रायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
तुलसी
तुलसी ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे विष्णुप्रियायै च धीमहि तन्नो बृन्दः प्रचोदयात्
तुलसी ॐ श्रीत्रिपुराय विद्महे तुलसीपत्राय धीमहि तन्नस्तुलसी प्रचोदयात् ॥
त्वरिता
त्वरिता ॐ त्वरितादेव्यै विद्महे महानित्यायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
दक्षिणामूर्ति
दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात् ॥
दुर्गा
दुर्गा ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
दुर्गा ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
दुर्गा ॐ गिरिजायै च विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
दुर्गा ॐ महादेव्यै च विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
दुर्गा ॐ महाशूलिन्यै विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥
देवी
देवी ॐ देव्यैब्रह्माण्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
देवी ॐ महाशूलिन्यै च विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥
देवी ॐ वाग्देव्यै च विद्महे कामराज्ञै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
धूमावती
धूमावती ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात् ॥
नन्दिकेश्वर
नन्दिकेश्वर ॐ तत्पुरुषाय विद्महे नन्दिकेश्वराय धीमहि तन्नो वृषभः प्रचोदयात् ॥
नन्दी
नन्दी ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो नन्दीः प्रचोदयात् ॥
नन्दी ॐ हरिवक्त्राय विद्महे रुद्रवक्त्राय धीमहि तन्नो नन्दीः प्रचोदयात् ॥
नारायण विष्णु
नारायण ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायणः प्रचोदयात्
नारायण ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
निरृति
निरृति ॐ निशाचराय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो निरृतिः प्रचोदयात् ॥
नृसिंह
नृसिंह ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नः सिंहः प्रचोदयात् ॥
नृसिंह ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात् ॥
नृसिंह ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात् ॥
परमहंसः
परमहंस ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे वेदवक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात् ॥
परशुराम
परशुराम ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नः परशुरामः प्रचोदयात् ॥
पाञ्चजन्य
पाञ्चजन्य ॐ पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शङ्खः प्रचोदयात् ॥
पाण्डुरङ्ग
पाण्डुरङ्ग ॐ भक्तवरदाय विद्महे पाण्डुरङ्गाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात्
पृथ्वी, पृथिवी
पृथ्वी ॐ पृथ्वी देव्यै विद्महे सहस्रमर्त्यै च धीमहि तन्नः पृथ्वी प्रचोदयात् ॥
पृथिवी ॐ पृथिवीदेव्यै च विद्महे सहस्रमूर्त्यै च धीमहि तन्नो मही प्रचोदयात् ॥
पृथिवी ॐ समुद्धृताय विद्महे विष्णुनैकेन धीमहि तन्नो धरा प्रचोदयात् ॥
बगलामुखी
बगलामुखी ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
बटुकभैरव
बटुकभैरव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे आपदुद्धारणाय धीमहि तन्नो बटुकः प्रचोदयात् ॥
बुध
बुध ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥
बुध ॐ चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥
बुध ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥
ब्रह्मा
ब्रह्मा ॐ चतुर्मुखाय विद्महे कमण्डलुधराय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
ब्रह्मा ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारूढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
ब्रह्मा ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे देववक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात् ॥
ब्रह्मा ॐ परमेश्वराय विद्महे परतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
ब्रह्मा ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
भुवनेश्वरी
भुवनेश्वरी ॐ नारायण्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
भैरवी
भैरवी ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
भौम, अङ्गारक, मङ्गल, कुज
भौम ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
भौम ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
भौम ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
भौम ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नः कुजः प्रचोदयात् ॥
मन्मथ
मन्मथ ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पवनाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥
महादेव
महादेव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
महिषामर्दिनि
महिषामर्दिनी ॐ महिषमर्दिन्यै विद्महे दुर्गायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
मातङ्गी
मातङ्गी ॐ मातङ्ग्यै च विद्महे उच्छिष्टचाण्डाल्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
मारुती
मारुती ॐ मरुत्पुत्राय विद्महे आञ्जनेयाय धीमहि तन्नो मारुतिः प्रचोदयात् ॥यम
यम ॐ वैवस्वताय विद्महे दण्डहस्ताय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात् ॥
यम ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात् ॥
यक्ष
यक्ष ॐ यक्षेश्वराय विद्महे गदाहस्ताय धीमहि तन्नो यक्षः प्रचोदयात् ॥
राधा, राधिका
राधा ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् ॥
राम
राम ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
राम ॐ भरताग्रजाय विद्महे रघुनन्दनाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
राम ॐ भरताग्रजाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
राम ॐ रघुवंश्याय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
राहु
राहु ॐ नाकध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥
राहु ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥
रुद्र
रुद्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
रुद्र ॐ पुरुषस्य विद्महे सहस्राक्षस्य धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
रुद्र ॐ सर्वेश्वराय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
लक्ष्मण ।Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
लक्ष्मण ॐ दाशरथाय विद्महे अलबेलया धीमहि तन्नो लक्ष्मणः प्रचोदयात् ॥
लक्ष्मी
लक्ष्मी ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
लक्ष्मी ॐ महाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्
लक्ष्मी ॐ महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नीश्च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्
लक्ष्मी ॐ महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
लक्ष्मी ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे महाश्रियै च धीमहि तन्नः श्रीः प्रचोदयात् ॥
लक्ष्मी ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे सार्वशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
वडवानल
वडवानल ॐ शोचिष्लेशाय विद्महे वडवामुखाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्
वरुण
वरुण ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात् ॥
वरुण ॐ शुद्धहस्ताय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात् ॥
वाचा
वाचा ॐ शिवास्यजायै विद्महे देवरूपायै धीमहि तन्नो वाचा प्रचोदयात् ॥
वाणी
वाणी ॐ ब्रह्मजायायै विद्महे देवरूपायै धीमहि तन्नो वाचा प्रचोदयात् ॥
वायु
वायु ॐ पवनपुरुषाय विद्महे सहस्रमूर्तये च धीमहि तन्नो वायुः प्रचोदयात् ॥
वायु ॐ सर्वप्राणाय विद्महे यष्टिहस्ताय धीमहि तन्नो वायुः प्रचोदयात् ॥
विष्णु
विष्णु ॐ त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे आत्मारामाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
विष्णु ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
विष्णु ॐ श्रीविष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
वृष
वृष ॐ तीक्ष्णदंष्ट्राय विद्महे वेदपादाय धीमहि तन्नो वृषः प्रचोदयात् ॥
वेङ्कटेश्वर
वेङ्कटेश्वर ॐ निरञ्जनाय विद्महे निरपाशाय (?) धीमहि तन्नः श्रीनिवासः प्रचोदयात् ॥
वैश्वानर
वैश्वानर ॐ पावकाय विद्महे सप्तजिह्वाय धीमहि तन्नो वैश्वानरः प्रचोदयात् ॥
शिव
शङ्कर ॐ सदाशिवाय विद्महे सहस्राक्ष्याय धीमहि तन्नः साम्बः प्रचोदयात् ॥
ॐ तुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।

Thursday, 9 April 2015

शुभ रात्री कृष्ण रात्री जय श्री कृष्णा आ जा री निंदिया आ जा, कान्हा को सुला जा

शुभ रात्री  कृष्ण रात्री  जय श्री कृष्णा  आ जा री निंदिया आ जा, कान्हा को सुला जा
कान्हा है शैतान हमारा रूठ बितता है दिन सारा हाट बाट औ'बृज गली में
नींद करे चट फेरी  शाम को आवे लाल सुलावे उड़ जा बड़ी सवेरी!
आ जा निंदिया आ जा तेरी कान्हा जोहे बाट कान्हा को सुला जा
सोने के हैं पाए जिसके रूपे की है खाट मखमल का है कान्हा बिछौना तकिया झालरदार
सवा लाख हैं मोती जिसमें लटकें लाल हज़ार  आ जा री निंदिया आ जा  कान्हा को सुला जा
नींद कहे मैं आती हूँ  सँग में सपने लाती हूँ
निंदिया आवे निंदिया जाय, निंदिया बैठी घी गुड़ खाय भोर पंख ले के उड़ जाय!
वर्षा के मौसम में जुड़ जाता पानी बरसे झम झम कर, बिजली चमके चम-चम कर
भोर का जागा कान्हा , मेरी गोद में सोवे बन बन कर निरख निरख छवि तन-मन वारूँ लोरी सुनाऊं चुन चुन कर  आ जा री निंदिया कान्हा को सुला जा


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