Thursday, 7 September 2017

राधाष्टमी

राधाष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है। श्री राधाजी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। वेद तथा पुराणादि में जिनका ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वे श्री वृन्दावनेश्वरी राधा सदा श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली साध्वी कृष्णप्रिया थीं। कुछ महानुभाव श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी (बरसाना) या उनके ननिहाल रावल ग्राम में प्रातःकाल का मानते हैं। कल्पभेद से यह मान्य है, पर पुराणों में मध्याह्न का वर्णन ही प्राप्त होता है।

शास्त्रों में श्री राधा कृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा एवम प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित हैं अतः राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी मानी गयी है। श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारद जी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।

राधा अष्टमी कथा

श्रीकृष्ण भक्ति के अवतार देवर्षि नारद ने एक बार भगवान सदाशिव के श्री चरणों में प्रणाम करके पूछा ‘‘हे महाभाग ! मैं आपका दास हूं। बतलाइए, श्री राधादेवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी। महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं? क्या वे अंतरंग विद्या हैं या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं?’’श् सदाशिव बोले - ‘‘हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि महालक्ष्मी उनके चरण कमल की शोभा के सामने तुच्छ कही जाती हैं। हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्री राधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं। उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं। तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके। उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी मोहित करने वाली है। यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।’’

नारदजी बोले - ‘‘हे प्रभो श्री राधिकाजी के जन्म का माहात्म्य सब प्रकार से श्रेष्ठ है। हे भक्तवत्सल ! उसको मैं सुनना चाहता हूं।’’ हे महाभाग ! सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत श्री राधाष्टमी के विषय में मुझको सुनाइए। श्री राधाजी का ध्यान कैसे किया जाता है? उनकी पूजा अथवा स्तुति किस प्रकार होती है? यह सब सुझसे कहिए। हे सदाशिव! उनकी चर्या, पूजा विधान तथा अर्चन विशेष सब कुछ मैं सुनना चाहता हूं। आप बतलाने की कृपा करें।’’

शिवजी बोले - ‘‘वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु महान उदार थे। वे महान कुल में उत्पन्न हुए तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे। अणिमा-महिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियों से युक्त, श्रीमान्, धनी और उदारचेत्ता थे। वे संयमी, कुलीन, सद्विचार से युक्त तथा श्री कृष्ण के आराधक थे। उनकी भार्या श्रीमती श्रीकीर्तिदा थीं। वे रूप-यौवन से संपन्न थीं और महान राजकुल में उत्पन्न हुई थीं। महालक्ष्मी के समान भव्य रूप वाली और परम सुंदरी थीं। वे सर्वविद्याओं और गुणों से युक्त, कृष्णस्वरूपा तथा महापतिव्रता थीं। उनके ही गर्भ में शुभदा भाद्रपद की शुक्लाष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीवृन्दावनेश्वरी श्री राधिकाजी प्रकट हुईं। हे महाभाग ! अब मुझसे श्री राधाजन्म- महोत्सव में जो भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर्तव्य हैं, उन्हें सुनिए।

सदा श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए। श्री राधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाल्य, वस्त्र, पताका, तोरणादि नाना प्रकार के मंगल द्रव्यों से यथाविधि पूजा करनी चाहिए। स्तुतिपूर्वक सुवासित गंध, पुष्प, धूपादि से सुगंधित करके उस मंदिर के बीच में पांच रंग के चूर्ण से मंडप बनाकर उसके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमल के मध्य में दिव्यासन पर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख स्थापित करके ध्यान, पाद्य-अघ्र्यादि से क्रमपूर्वक भलीभांति उपासना करके भक्तों के साथ अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक सदा संयतचित्त होकर उनकी पूजा करें।

श्रीराधा-माधव-युगल का ध्यान
हेमेन्दीवरकान्तिमंजुलतरं श्रीमज्जगन्मोहनं नित्याभिर्ललितादिभिः परिवृतं सन्नीलपीताम्बरम्।नानाभूषणभूषणांगमधुरं कैशोररूपं युगंगान्धर्वाजनमव्ययं सुललितं नित्यं शरण्यं भजे।। जिनकी स्वर्ण और नील कमल के समान अति सुंदर कांति है, जो जगत को मोहित करने वाली श्री से संपन्न हैं, नित्य ललिता आदि सखियों से परिवृत्त हैं, सुंदर नील और पीत वस्त्र धारण किए हुए हैं तथा जिनके नाना प्रकार के आभूषणों से आभूषित अंगों की कांति अति मधुर है, उन अव्यय, सुललित, युगलकिशोररूप श्री राधाकृष्ण के हम नित्य शरणापन्न हैं।’ इस प्रकार युगलमूर्ति का ध्यान करके शालग्राम में अथवा मूर्ति में पुनः सम्यक् रूप से अर्चना करें।

भगवान को निवेदन किए गए गंध, पुष्प-माल्य तथा चंदन आदि से समागत कृष्ण भक्तों की आराधना करें। श्री राधाजी की भक्ति में दत्तचित्त होकर उनके लिए प्रस्तुत नैवेद्य, गंध, पुष्प-माल्य तथा चंदन आदि के द्वारा दिन में महोत्सव करें। पूजा करके दिन के अंत में भक्तों के साथ आनंदपूर्वक चरणोदक लेकर महाप्रसाद ग्रहण करें। फिर श्री राधाकृष्ण का स्मरण करते हुए रात में जागरण करें। चांदी और सोने की सुसंस्कृत मूर्ति रखकर उसकी पूजा करें। दूसरी कोई वार्ता न करते हुए नारी तथा बंधु-बांधवों के साथ पुराणादि से प्रयत्नपूर्वक इष्टदेवता श्री राधाकृष्ण के कथा-कीर्तन का श्रवण करें।

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्री राधाजन्माष्टमी का यह शुभानुष्ठान करता है, उसके विषय में सब देवतागण कहते हैं कि ‘यही मनुष्य भूतल में राधाभक्त है।’ इस अष्टमी को दिन रात एक-एक पहर पर विधिूपर्वक श्री राधामाधव की पूजा करें। श्री राधाकृष्ण में अनुरक्त रसिकजनों के साथ आलाप करते हुए बारंबार श्री राधाकृष्ण को याद करें। इस प्रकार महोत्सव करके परम आनंदित होकर अंत में विधिपूर्वक साष्टांग प्रणाम करें। जो पुरुष अथवा नारी राधाभक्तिपरायण होकर श्री राधाजन्म महोत्सव करता है, वह श्री राधाकृष्ण के सान्निध्य में श्रीवृंदावन में वास करता है। वह राधाभक्तिपरायण होकर व्रजवासी बनता है। श्री राधाजन्म- महोत्सव का गुण-कीर्तन करने से मनुष्य भव-बंधन से मुक्त हो जाता है। ‘राधा’ नाम की तथा राधा जन्माष्टमी-व्रत की महिमा जो मनुष्य राधा-राधा कहता है तथा स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कार से युक्त होकर सब प्रकार की विद्याओं में कुषल बनता है। जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है, राधा-राधा में जिसकी निष्ठा है, वह महाभाग श्रीवृन्दावन में श्री राधा का सहचर होता है। इस विश्वब्रह्मांड में यह पृथ्वी धन्य है, पृथ्वी पर वृन्दावनपुरी धन्य है। वृन्दावन में सती श्री राधा जी धन्य हैं, जिनका ध्यान बड़े-बड़े मुनिवर करते हैं। जो ब्रह्मा आदि देवताओं की परमाराध्या हैं, जिनकी सेवा देवता करते रहते हैं, उन श्री राधिकाजी को जो भजता है, मैं उसको भजता हूं। हे महाभाग ! उनके उत्तम मंत्र का जप करो और रात-दिन राधा-राधा बोलते हुए नाम कीर्तन करो। जो मनुष्य कृष्ण के साथ राधा का (राधेकृष्ण) नाम-कीर्तन करता है, उसके माहात्म्य का वर्णन मैं नहीं कर सकता और न उसका पार पा सकता हूं। राधा-नाम-स्मरण कदापि निष्फल नहीं जाता, यह सब तीर्थों का फल प्रदान करता है। श्री राधाजी सर्वतीर्थमयी हैं तथा ऐश्वर्यमयी हैं। श्री राधा भक्त के घर से कभी लक्ष्मी विमुख नहीं होतीं। हे नारद ! उसके घर श्री राधाजी के साथ श्री कृष्ण वास करते हैं। श्री राधाकृष्ण जिनके इष्ट देवता हैं, उनके लिए यह श्रेष्ठ व्रत है। उनके घर में श्रीहरि देह से, मन से कदापि पृथक् नहीं होते। यह सब सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने प्रणत होकर यथोक्त रीति से श्री राधाष्टमी में यजन-पूजन किया! जो मनुष्य इस लोक में राधाजन्माष्टमी -व्रत की यह कथा श्रवण करता है, वह सुखी, मानी, धनी और सर्वगुणसंपन्न हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्री राधा का मंत्र जप अथवा नाम स्मरण करता है, वह धर्मार्थी हो तो धर्म प्राप्त करता है, अर्थार्थी हो तो धन पाता है, कामार्थी पूर्णकामी हो जाता है और मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त करता है। कृष्णभक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यशरण होकर जब श्री राधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी और निष्काम हो जाता है।

राधा अष्टमी पूजन विधि

अन्य व्रतों की भांति इस दिन भी प्रात: उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का विधिवत पूजन करना चाहिए। इस पूजन हेतु मध्याह्न का समय उपयुक्त माना गया है। इस दिन पूजन स्थल में ध्वजा, पुष्पमाला,वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधा जी की स्तुति करनी चाहिए। पूजन स्थल में पांच रंगों से मंडप सजाएं, उनके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं, उस कमल के मध्य में दिव्य आसन पर श्री राधा कृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करें। बंधु बांधवों सहित अपनी सामर्थ्यानुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिभाव से भगवान की स्तुति गाएं। दिन में हरिचर्चा में समय बिताएं तथा रात्रि को नाम संकीर्तन करें। एक समय फलाहार करें। मंदिर में दीपदान करें।
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सरस्वती मंत्र

सरस्वती मंत्र भावार्थ
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
 भावार्थ :
जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमलासन पर बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें ।
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥
 भावार्थ :
शरत्काल में उत्पन्न कमल के समान मुखवाली और सब मनोरथों को देनेवाली शारदा सब सम्पत्तियों के साथ मेरे मुख में सदा निवास करें ।
सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम् । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ॥
 भावार्थ :
वाणी की अधिष्ठात्री उन देवी सरस्वती को प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है ।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं । वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे ताम् परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥
 भावार्थ :
जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचार की परम तत्व हैं, जो सब संसार में फैले रही हैं, जो हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अन्धकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिकमणि की माला लिए रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान होती हैं और बुद्धि देनेवाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वन्दना करता हूँ ।
पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥
 भावार्थ :
बुद्धिरूपी सोने के लिए कसौटी के समान सरस्वती जी, जो केवल वचन से ही विद्धान् और मूर्खों की परीक्षा कर देती है, हमलोगों का पालन करें ।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥
 भावार्थ :
हे महाभाग्यवती ज्ञानरूपा कमल के समान विशाल नेत्र वाली, ज्ञानदात्री सरस्वती ! मुझको विद्या दो, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।
सरस्वति नमौ नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: । वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च ॥
 भावार्थ :
सरस्वती को नित्य नमस्कार है, भद्रकाली को नमस्कार है और वेद, वेदान्त, वेदांग तथा विद्याओं के स्थानों को प्रणाम है ।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥
 भावार्थ :
हे महाभाग्यवती ज्ञानरूपा कमल के समान विशाल नेत्र वाली, ज्ञानदात्री सरस्वती ! मुझको विद्या दो, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: । एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ॥
 भावार्थ :
हे सरस्वती ! लक्ष्मी, मेघा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा, धृति - इन आठ मूर्तियों से मेरी रक्षा करो ।
आशासु राशीभवदङ्गवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम् । मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देऽरविन्दासनसुन्दरी त्वाम् ॥
 भावार्थ :
हे कमल पर बैठनेवाली सुन्दरी सरस्वती ! तुम सब दिशाओं में पुंजीभूत हुई अपनी देहलता की आभा से ही क्षीर-समुद्र को दास बनानेवाली और मन्द मुसकान से शरद् ऋतु के चन्द्रमा को तिरस्कृत करनेवाली हो, आपको मैं प्रणाम करता हूँ ।
वीणाधरे विपुलमङ्गलदानशीले भक्तार्तिनाशिनि विरिञ्चिहरीशवन्द्ये । कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महार्हे विद्याप्रदायिनि सरस्वतिनौमि नित्यम् ॥
 भावार्थ :
हे वीणा धारण करनेवाली, अपार मंगल देनेवाली, भक्तों के दुःख छुड़ाने वाली, ब्रह्मा, विष्णु और शिव से वन्दित होनेवाली कीर्ति तथा मनोरथ देनेवाली, पूज्यवरा और विद्या देनेवाली सरस्वती ! आपको नित्य प्रणाम करता हूँ ।
श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे श्वेताम्बरावृतमनोहरमञ्जुगात्रे । उद्यन्मनोज्ञसितपङ्कजमञ्जुलास्ये विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥
 भावार्थ :
हे श्वेत कमलों से भरे हुए निर्मल आसन पर विराजनेवाली, श्वेत वस्त्रों से ढके सुन्दर शरीरवाली, खिले हुए सुन्दर श्वेत कमल के समान मंजुल मुखवाली और विद्या देनेवाली सरस्वती ! आपको नित्य प्रणाम करता हूँ ।
मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे । स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि: शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥
 भावार्थ :
हे उदार बुद्धिवाली माँ ! मोहरूपी अन्धकार से भरे मेरे हृदय में सदा निवास करो और अपने सब अंगो की निर्मल कान्ति से मेरे मन के अन्धकार का शीघ्र नाश करो ।
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परिवर्तिनी एकादशी व्रत

परिवर्तिनी एकादशी व्रत  इस एकादशी को वामन एकादशी भी कहा जाता है। शास्‍त्रों के अनुसार इस दिन देवी-देवता भी व्रत करते हैं। आजकल चतुर्मास चल रहा है। भगवान व‌िष्‍णु को शयन करते 2 माह का समय पूर्ण हो गया है, आज के दिन वो करवट बदलते हैं। चतुर्मास में पड़ने वाली इस एकादशी का महत्व अत्यधिक है। भाद्र मास में शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली इस एकादशी को भगवान विष्णु के साथ उनकी अर्धांगिनी देवी लक्ष्मी का पूजन करने से धन और सुख से घर-संसार भर जाता है। मरणोपरांत भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान की प्राप्ति होती है।
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि बलि को बाँधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएँ कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।
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श्री लक्ष्मी नारायण कवचम्

श्री लक्ष्मी नारायण कवचम्
अधुना देवि वक्ष्यामि लक्ष्मीनारायणस्य ते ।
कवचं मन्त्रगर्भं च वज्रपञ्जरकाख्यया ॥ १॥
श्रीवज्रपञ्जरं नाम कवचं परमाद्भुतम् ।
रहस्यं सर्वदेवानां साधकानां विशेषतः ॥ २॥
यं धृत्वा भगवान् देवः प्रसीदति परः पुमान् ।
यस्य धारणमात्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३॥
ईश्वरोऽहं शिवो भीमो वासवोऽपि दिवस्पतिः ।
सूर्यस्तेजोनिधिर्देवि चन्द्रर्मास्तारकेश्वरः ॥ ४॥
वायुश्च बलवांल्लोके वरुणो यादसाम्पतिः ।
कुबेरोऽपि धनाध्यक्षो धर्मराजो यमः स्मृतः ॥ ५॥
यं धृत्वा सहसा विष्णुः संहरिष्यति दानवान् ।
जघान रावणादींश्च किं वक्ष्येऽहमतः परम् ॥ ६॥
कवचस्यास्य सुभगे कथितोऽयं मुनिः शिवः ।
त्रिष्टुप् छन्दो देवता च लक्ष्मीनारायणो मतः ॥ ७॥
रमा बीजं परा शक्तिस्तारं कीलकमीश्वरि ।
भोगापवर्गसिद्ध्यर्थं विनियोग इति स्मृतः ॥ ८॥

ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनारायणकवचस्य शिवः ऋषिः ,
त्रिष्टुप् छन्दः , श्रीलक्ष्मीनारायण देवता ,
श्रीं बीजं , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकं ,
भोगापवर्गसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।
अथ ध्यानम् ।
पूर्णेन्दुवदनं पीतवसनं कमलासनम् ।
लक्ष्म्या श्रितं चतुर्बाहुं लक्ष्मीनारायणं भजे ॥ ९॥

अथ कवचम् ।
ॐ वासुदेवोऽवतु मे मस्तकं सशिरोरुहम् ।
ह्रीं ललाटं सदा पातु लक्ष्मीविष्णुः समन्ततः ॥ १०॥

ह्सौः नेत्रेऽवताल्लक्ष्मीगोविन्दो जगतां पतिः ।
ह्रीं नासां सर्वदा पातु लक्ष्मीदामोदरः प्रभुः ॥ ११॥

श्रीं मुखं सततं पातु देवो लक्ष्मीत्रिविक्रमः ।
लक्ष्मी कण्ठं सदा पातु देवो लक्ष्मीजनार्दनः ॥ १२॥

नारायणाय बाहू मे पातु लक्ष्मीगदाग्रजः ।
नमः पार्श्वौ सदा पातु लक्ष्मीनन्दैकनन्दनः ॥ १३॥

अं आं इं ईं पातु वक्षो ॐ लक्ष्मीत्रिपुरेश्वरः ।
उं ऊं ऋं ॠं पातु कुक्षिं ह्रीं लक्ष्मीगरुडध्वजः ॥ १४॥

लृं लॄं एं ऐं पातु पृष्ठं ह्सौः लक्ष्मीनृसिंहकः ।
ओं औं अं अः पातु नाभिं ह्रीं लक्ष्मीविष्टरश्रवः ॥ १५॥

कं खं गं घं गुदं पातु श्रीं लक्ष्मीकैटभान्तकः ।
चं छं जं झं पातु शिश्र्नं लक्ष्मी लक्ष्मीश्वरः प्रभुः ॥ १६॥

टं ठं डं ढं कटिं पातु नारायणाय नायकः ।
तं थं दं धं पातु चोरू नमो लक्ष्मीजगत्पतिः ॥ १७॥

पं फं बं भं पातु जानू ॐ ह्रीं लक्ष्मीचतुर्भुजः ।
यं रं लं वं पातु जङ्घे ह्सौः लक्ष्मीगदाधरः ॥ १८॥

शं षं सं हं पातु गुल्फौ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीरथाङ्गभृत् ।
ळं क्षः पादौ सदा पातु मूलं लक्ष्मीसहस्रपात् ॥ १९॥

ङं ञं णं नं मं मे पातु लक्ष्मीशः सकलं वपुः ।
इन्द्रो मां पूर्वतः पातु वह्निर्वह्नौ सदावतु ॥ २०॥

यमो मां दक्षिणे पातु नैरृत्यां निरृतिश्च माम् ।
वरुणः पश्चिमेऽव्यान्मां वायव्येऽवतु मां मरुत् ॥ २१॥

उत्तरे धनदः पायादैशान्यामीश्वरोऽवतु ।
वज्रशक्तिदण्डखड्ग पाशयष्टिध्वजाङ्किताः ॥ २२॥

सशूलाः सर्वदा पान्तु दिगीशाः परमार्थदाः ।
अनन्तः पात्वधो नित्यमूर्ध्वे ब्रह्मावताच्च माम् ॥ २३॥

दशदिक्षु सदा पातु लक्ष्मीनारायणः प्रभुः ।
प्रभाते पातु मां विष्णुर्मध्याह्ने वासुदेवकः ॥ २४॥

दामोदरोऽवतात् सायं निशादौ नरसिंहकः ।
सङ्कर्षणोऽर्धरात्रेऽव्यात् प्रभातेऽव्यात् त्रिविक्रमः ॥ २५॥

अनिरुद्धः सर्वकालं विश्वक्सेनश्च सर्वतः ।
रणे राजकुले द्युते विवादे शत्रुसङ्कटे
ॐ ह्रीं ह्सौः ह्रीं श्रीं मूलं लक्ष्मीनारायणोऽवतु ॥ २६॥

ॐॐॐरणराजचौररिपुतः पायाच्च मां केशवः
ह्रींह्रींह्रींहह्हाह्सौः ह्सह्सौः वह्नेर्वतान्माधवः ।
ह्रींह्रींह्रींजलपर्वताग्निभयतः पायादनन्तो विभुः
श्रींश्रींश्रींशशशाललं प्रतिदिनं लक्ष्मीधवः पातु माम् ॥ २७॥

इतीदं कवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम् ।
लक्ष्मीनारायणस्येष्टं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ २८॥

सर्वसौभाग्यनिलयं सर्वसारस्वतप्रदम् ।
लक्ष्मीसंवननं तत्वं परमार्थरसायनम् ॥ २९॥

मन्त्रगर्भं जगत्सारं रहस्यं त्रिदिवौकसाम् ।
दशवारं पठेद्रात्रौ रतान्ते वैष्णवोत्तमः ॥ ३०॥

स्वप्ने वरप्रदं पश्येल्लक्ष्मीनारायणं सुधीः ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं कवचं मन्मुखोदितम् ॥ ३१॥

स याति परमं धाम वैष्णवं वैष्णवेश्वरः ।
महाचीनपदस्थोऽपि यः पठेदात्मचिन्तकः ॥ ३२॥

आनन्दपूरितस्तूर्णं लभेद् मोक्षं स साधकः ।
गन्धाष्टकेन विलिखेद्रवौ भूर्जे जपन्मनुम् ॥ ३३॥

पीतसूत्रेण संवेष्ट्य सौवर्णेनाथ वेष्टयेत् ।
धारयेद्गुटिकां मूर्ध्नि लक्ष्मीनारायणं स्मरन् ॥ ३४॥

रणे रिपुन् विजित्याशु कल्याणी गृहमाविशेत् ।
वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ ३५॥

सा बध्नीयान् कण्ठदेशे लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ।
गुरुपदेशतो धृत्वा गुरुं ध्यात्वा मनुं जपन् ॥ ३६॥

वर्णलक्षपुरश्चर्या फलमाप्नोति साधकः ।
बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य पार्वति ॥ ३७॥

विनानेन न सिद्धिः स्यान्मन्त्रस्यास्य महेश्वरि ।
सर्वागमरहस्याढ्यं तत्वात् तत्वं परात् परम् ॥ ३८॥

अभक्ताय न दातव्यं कुचैलाय दुरात्मने ।
दीक्षिताय कुलीनाय स्वशिष्याय महात्मने ॥ ३९॥

महाचीनपदस्थाय दातव्यं कवचोत्तमम् ।
गुह्यं गोप्यं महादेवि लक्ष्मीनारायणप्रियम् ।
वज्रपञ्जरकं वर्म गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४०॥
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॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीदेवीरहस्ये
लक्ष्मीनारायणकवचं सम्पूर्णम् ॥


विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र

विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
ॐ नमो: नारायण ।।ॐ नमोः नारायणाय ।।

ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।।
विनियोग : 'ॐ नमोः नारायणाय' मन्त्र के लिए—
 अस्य मंत्रस्य साध्य नारायण ऋषि:देवी गायत्री छन्द:, विष्णु देवता, सर्वेष्ट ​सिद्धये जपे विनियेग:।
द्वादशाक्षर मन्त्र : ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।
 विनियोग : अस्य मंत्रस्य प्रजापति ऋषि:देवी गायत्री छन्द:, वासुदेव परमात्मा देवता, सर्वेष्ट ​सिद्धये जपे विनियेग:।
मन्त्र : ''ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय'' इस मन्त्र का बारह लाख जप करने से सिद्धि होती है। दाम्पत्य जीवन एवं परिवारिक माहौल सुखमय रहता है। इस मन्त्र का नियमित जप करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। निम्न मन्त्रों में से अपनी श्रद्धा के अनुसार चयन करके अथवा गुरू—मुख से दीक्षा लेकर भगवान विष्णु के स्वरूप का ध्यान करके पूजन व जप करना शुभ होता है। पुराणों कहा जाता है। कि जिस भगवान के मंत्र का आप जप कर रहे है जप करते समय उनके स्वरूप का ध्यान करना चहिए अन्यथा उस जप का फल नहीं मिलता है।
मन्त्र : 1. ॐ विष्णवे नम:। 2. ॐ अच्युताय नम:। 3. ॐ लक्ष्मीपतये नम:। 4. ॐ जनार्दनाय नम:। 5. श्री हरे नम:। 6. ॐ अनन्ताय नम:। 7. ॐ परमात्मने नम:। 8. ॐ गोविन्दाय नम:। 9. ॐ श्रीधराय त्रैलोक्य मोहनाय नम:। 10. ॐ अच्युतानन्त गोविन्दाय नम:। 11. ॐ क्लीं ह्रषीकेशाय नम:। 12. ॐ ह्रीं ह्री श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नम:। 13. ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।
विष्णु जी के इस मंन्त्र का जप घर में सुख-संपत्ति लाने के लिए भी किया जाता है।

ध्यान मन्त्र :
शांता कारम भुजङ्ग शयनम पद्म नाभं सुरेशम। विश्वधारंगनसदृशम्मेघवर्णं शुभांगम।
लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्याननगमयम ।वन्दे विष्णुम्भवभयहरं सर्व्वलोकैकनाथम।।

विष्णु जी के इन मंत्रों का जाप करने से घर की परेशानी को दूर करने के लिए और घर में खुशी लाने के लिए किया जाता है।
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ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव,
त्वमेव विद्या, द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वं ममः देवदेवा।।

माँ शकुंभारी देवी चालीसा

माँ शकुंभारी देवी चालीसा
दोहा। दाहिने भीमा ब्रामरी अपनी छवि दिखाए |
बाई ओर सतची नेत्रो को चैन दीवलए |
भूर देव महारानी के सेवक पहरेदार |
मा शकुंभारी देवी की जाग मई जे जे कार ||
चौपाई ।जे जे श्री शकुंभारी माता | हर कोई तुमको सिष नवता ||
गणपति सदा पास मई रहते | विघन ओर बढ़ा हर लेते ||
हनुमान पास बलसाली | अगया टुंरी कभी ना ताली ||
मुनि वियास ने कही कहानी | देवी भागवत कथा बखनी ||
छवि आपकी बड़ी निराली | बढ़ा अपने पर ले डाली ||
अखियो मई आ जाता पानी | एसी किरपा करी भवानी ||
रुरू डेतिए ने धीयाँ लगाया | वार मई सुंदर पुत्रा था पाया ||
दुर्गम नाम पड़ा था उसका | अच्छा कर्म नही था जिसका ||
बचपन से था वो अभिमानी | करता रहता था मनमानी ||
योवां की जब पाई अवस्था | सारी तोड़ी धृम वेवस्था ||
सोचा एक दिन वेद छुपा लू | हर ब्रममद को दास बना लू ||
देवी देवता घबरागे | मेरी सरण मई ही आएगे ||
विष्णु शिव को छोड़ा उसने | ब्रहांमजी को धीयया उसने ||
भोजन छोड़ा फल ना खाया |वायु पीकेर आनंद पाया ||
जब ब्रहाम्मा का दर्शन पाया | संत भाव हो वचन सुनाया ||
चारो वेद भक्ति मई चाहू | महिमा मई जिनकी फेलौ ||
ब्ड ब्रहाम्मा वार दे डाला | चारो वेद को उसने संभाला ||
पाई उसने अमर निसनी | हुआ प्रसन्न पाकर अभिमानी ||
जैसे ही वार पाकर आया | अपना असली रूप दिखाया ||
धृम धूवजा को लगा मिटाने | अपनी शक्ति लगा बड़ाने ||
बिना वेद ऋषि मुनि थे डोले | पृथ्वी खाने लगी हिचकोले ||
अंबार ने बरसाए शोले | सब त्राहि त्राहि थे बोले ||
सागर नदी का सूखा पानी | कला दल दल कहे कहानी ||
पत्ते बी झड़कर गिरते थे | पासु ओर पाक्सी मरते थे ||
सूरज पतन जलती जाए | पीने का जल कोई ना पाए ||
चंदा ने सीतलता छोड़ी | समाए ने भी मर्यादा तोड़ी ||
सभी डिसाए थे मतियाली | बिखर गई पूज की तली ||
बिना वेद सब ब्रहाम्मद रोए | दुर्बल निर्धन दुख मई खोए ||
बिना ग्रंथ के कैसे पूजन | तड़प रहा था सबका ही मान ||
दुखी देवता धीयाँ लगाया | विनती सुन प्रगती महामाया ||
मा ने अधभूत दर्श दिखाया | सब नेत्रो से जल बरसया ||
हर अंग से झरना बहाया | सतची सूभ नाम धराया ||
एक हाथ मई अन्न भरा था | फल भी दूजे हाथ धारा था ||
तीसरे हाथ मई तीर धार लिया | चोथे हाथ मई धनुष कर लिया ||
दुर्गम रक्चाश को फिर मारा | इस भूमि का भर उतरा ||
नदियो को कर दिया समंदर | लगे फूल फल बाग के अंदर ||
हारे भरे खेत लहराई | वेद ससत्रा सारे लोटाय ||
मंदिरो मई गूँजी सांख वाडी | हर्षित हुए मुनि जान प्रडी ||
अन्न धन साक को देने वाली | सकंभारी देवी बलसाली ||
नो दिन खड़ी रही महारानी | सहारनपुर जंगल मई निसनी ||
दोहा
सकंभारी देवी की महिमा अपरंपार |
ॐ इन्ही को भाज रहा है सारा संसार ||
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भुवनेश्वरी कवचम्

भुवनेश्वरी कवचम्
देव्युवाच । देवेश भुवनेश्वर्या या या विद्याः प्रकाशिताः ।
श्रुताश्चाधिगताः सर्वाः श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ १॥
त्रैलोक्यमङ्गलं नाम कवचं यत्पुरोदितम् ।
कथयस्व महादेव मम प्रीतिकरं परम् ॥ २॥
ईश्वर उवाच । श्रृणु पार्वति वक्ष्यामि सावधानावधारय ।
त्रैलोक्यमङ्गलं नाम कवचं मन्त्रविग्रहम् ॥ ३॥
सिद्धविद्यामयं देवि सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।
पठनाद्धारणान्मर्त्यस्त्रैलोक्यैश्वर्यभाग्भवेत् ॥ ४॥
ॐ अस्य श्रीभुवनेश्वरीत्रैलोक्यमङ्गलकवचस्य शिव ऋषिः ,
विराट् छन्दः , जगद्धात्री भुवनेश्वरी देवता ,
धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।
ह्रीं बीजं मे शिरः पातु भुवनेशी ललाटकम् ।
ऐं पातु दक्षनेत्रं मे ह्रीं पातु वामलोचनम् ॥ १॥
श्रीं पातु दक्षकर्णं मे त्रिवर्णात्मा महेश्वरी ।
वामकर्णं सदा पातु ऐं घ्राणं पातु मे सदा ॥ २॥

ह्रीं पातु वदनं देवि ऐं पातु रसनां मम ।
वाक्पुटा च त्रिवर्णात्मा कण्ठं पातु परात्मिका ॥ ३॥

श्रीं स्कन्धौ पातु नियतं ह्रीं भुजौ पातु सर्वदा ।
क्लीं करौ त्रिपुटा पातु त्रिपुरैश्वर्यदायिनी ॥ ४॥

ॐ पातु हृदयं ह्रीं मे मध्यदेशं सदावतु ।
क्रौं पातु नाभिदेशं मे त्र्यक्षरी भुवनेश्वरी ॥ ५॥

सर्वबीजप्रदा पृष्ठं पातु सर्ववशङ्करी ।
ह्रीं पातु गुह्यदेशं मे नमोभगवती कटिम् ॥ ६॥

माहेश्वरी सदा पातु शङ्खिनी जानुयुग्मकम् ।
अन्नपूर्णा सदा पातु स्वाहा पातु पदद्वयम् ॥ ७॥

सप्तदशाक्षरा पायादन्नपूर्णाखिलं वपुः ।
तारं माया रमाकामः षोडशार्णा ततः परम् ॥ ८॥

शिरःस्था सर्वदा पातु विंशत्यर्णात्मिका परा ।
तारं दुर्गे युगं रक्षिणी स्वाहेति दशाक्षरा ॥ ९॥

जयदुर्गा घनश्यामा पातु मां सर्वतो मुदा ।
मायाबीजादिका चैषा दशार्णा च ततः परा ॥ १०॥

उत्तप्तकाञ्चनाभासा जयदुर्गाऽऽननेऽवतु ।
तारं ह्रीं दुं च दुर्गायै नमोऽष्टार्णात्मिका परा ॥ ११॥

शङ्खचक्रधनुर्बाणधरा मां दक्षिणेऽवतु ।
महिषामर्द्दिनी स्वाहा वसुवर्णात्मिका परा ॥ १२॥

नैऋत्यां सर्वदा पातु महिषासुरनाशिनी ।
माया पद्मावती स्वाहा सप्तार्णा परिकीर्तिता ॥ १३॥

पद्मावती पद्मसंस्था पश्चिमे मां सदाऽवतु ।
पाशाङ्कुशपुटा मायो स्वाहा हि परमेश्वरि ॥ १४॥

त्रयोदशार्णा ताराद्या अश्वारुढाऽनलेऽवतु ।
सरस्वति पञ्चस्वरे नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ॥ १५॥

स्वाहा वस्वक्षरा विद्या उत्तरे मां सदाऽवतु ।
तारं माया च कवचं खे रक्षेत्सततं वधूः ॥ १६॥

हूँ क्षें ह्रीं फट् महाविद्या द्वादशार्णाखिलप्रदा ।
त्वरिताष्टाहिभिः पायाच्छिवकोणे सदा च माम् ॥ १७॥

ऐं क्लीं सौः सततं बाला मूर्द्धदेशे ततोऽवतु ।
बिन्द्वन्ता भैरवी बाला हस्तौ मां च सदाऽवतु ॥ १८॥

इति ते कथितं पुण्यं त्रैलोक्यमङ्गलं परम् ।
सारात्सारतरं पुण्यं महाविद्यौघविग्रहम् ॥ १९॥

अस्यापि पठनात्सद्यः कुबेरोऽपि धनेश्वरः ।
इन्द्राद्याः सकला देवा धारणात्पठनाद्यतः ॥ २०॥

सर्वसिद्धिश्वराः सन्तः सर्वैश्वर्यमवाप्नुयुः ।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दद्यान्मूलेनैव पृथक् पृथक् ॥ २१॥

संवत्सरकृतायास्तु पूजायाः फलमाप्नुयात् ।
प्रीतिमन्योऽन्यतः कृत्वा कमला निश्चला गृहे ॥ २२॥

वाणी च निवसेद्वक्त्रे सत्यं सत्यं न संशयः ।
यो धारयति पुण्यात्मा त्रैलोक्यमङ्गलाभिधम् ॥ २३॥

कवचं परमं पुण्यं सोऽपि पुण्यवतां वरः ।
सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा त्रैलोक्यविजयी भवेत् ॥ २४॥

पुरुषो दक्षिणे बाहौ नारी वामभुजे तथा ।
बहुपुत्रवती भूयाद्वन्ध्यापि लभते सुतम् ॥ २५॥

ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि नैव कृन्तन्ति तं जनम् ।
एतत्कवचमज्ञात्वा यो भजेद्भुवनेश्वरीम् ।
दारिद्र्यं परमं प्राप्य सोऽचिरान्मृत्युमाप्नुयात् ॥ २६॥
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॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे देवीश्वर संवादे
त्रैलोक्यमङ्गलं नाम भुवनेश्वरीकवचं सम्पूर्णम् ॥

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