Tuesday, 6 March 2018

दशा माता,, का व्रत,,कथा,,,चैत माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है..

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मनुष्य या किसी भी वस्तु की स्थिति का परिवर्तन अलौकिक शक्ति के द्वारा होता है। उस अलौकिक शक्ति का नाम है दशारानी । मनुष्य की दशा अनुकूल होने पर उसका चारों ओर से कल्याण होता है। जबकि यदि दशा प्रतिकूल हो तो अच्छ काम भी बुरा प्रभाव देने लगते हैं ।
इसीलिये दशारानी माता की पूजा की जाती है और उनके नाम के गँडे लिये जाते हैं । दशा माता की अनुकूलता के लिये दशारानी का व्रत और पूजन किया जाता है।
कब लें दशा माता,, के गंडे
जब तुलसी का वृक्ष स्वयं निकल आये यानी तुलसी का ऐसा वृक्ष जो एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह न लगाया हुआ हो, वरन् जहाँ उगे वही हो, बाल निकले; गाय पहला बछड़ा जने; पहलौठी घोड़ी के बछेड़ा हो; स्त्री की प्रथम संतान बालक हो; तो इस तरह के सुखद समाचार पाकर दशारानी के व्रत का संकल्प लिया जाता है। किंतु इसमें ध्यान देने योग्य बातें यह है कि पैदा हुए बच्चे अच्छी घड़ी में हुए हों। ऐसी स्थिति में दशा रानी का गंडा लिया जाता है।
नौ सूत कच्चे धागे के और एक सूत व्रत रखने वाली के आंचल के, इन दस सूतों का एक गंडा बनाकर उसमें गाँठ लगाई जाती है । दिन भर व्रत रहने के बाद शाम को गंडे की पूजा होती है । नौ व्रत तक तो शाम को पूजा होती है, परंतु दसवें व्रत मे जब पूजा होती है, तो मध्याह्न के पूर्व ही होती है । जिस दिन दशा रानी का व्रत हो, उस दिन जब तक पूजा न हो जाय, किसी को कोई वस्तु, यहाँ तक कि आग भी, नहीं दी जाती । पूजा के पहले उस दिन किसी का स्वागत भी नहीं किया जाता ।
एक नोक वाले पान पर चन्दन से दशा रानी की प्रतिमा बनाई जाती है।
जमीन में चौक पूरकर उस पर पटा रखकर उस पर पान रक्खा जाता है। पान के ऊपर गंडे को दूध में डुबाकर रख दिया जाता है। उसी की हल्दी और अक्षर से पूजा होती है और घी, गुड़, बताशा आदि का भोग लगता है। हवन के अन्त में कथा कही जाती है। कथा हो चुकने पर पूजा की सामग्री को गीली मिट्टी के पिंड में रखकर मौन होकर व्रतवाली भेंटती है, फिर आप ही उसे कुँआ या तालाब आदि जलाशय में सिराकर तब पारणकरती है। पारण करते समय किसी से बोलना वर्जित है। जितना पारण सामने परोस लें, उसमें से कुछ छोड़ना भी नहीं चाहिये । थाली धोकर पी लेना चाहिये।
पूजन सामग्री:
∗ नोक वाला पान ∗ चंदन ∗ हल्दी ∗ अक्षत ∗ लकड़ी का पटरा ∗ गुड़ ∗ घी ∗ वताशा ∗ हवन के लिये:- ∗ आम की लकड़ी ∗ हवन सामग्री
दशा माता ,, पूजन विधि
जब भी कोई अच्छी खबर मिले तब दशारानी के गंडे लिये जाते हैं। खबर सुनने के बाद घर आकर नौ सूत कच्चे धागे के और एक सूत जिसे व्रत रखना है उसके आंचल के लेकर, इन दस सूतों का एक गंडा बनाकर गाँठ लगायें। दिन भर व्रत रहने के बाद शाम को गंडे की पूजा करें।। नौ दिनों तक पूरे दिन व्रत करें और शाम को पूजा करके कथा सुने अथवा सुनायें। प्रत्येक दिन एक-एक कथा कहे या सुने। दसवें दिन सुबह उठक्र नित्य कर्म कर सर से स्नान करें। घर को स्वच्छ कर लें । पूजा के स्थान पर चौक (अल्पना) बनायें। चौक पर एक लकड़ी का पटरा रखें। एक नोक वाले पान पर चंदन से दशारानी का चित्र बनायें। इस पान को पटरे पर रखें । गंडे को दूध मेंडुबाकर पान के ऊपर रख दें। हल्दी, अक्षत से गंडे की पूजा करें। घी,गुड़, बताशा का भोग लगायें। उसके बाद हवन करें। हवन के बाद पहली कथा फिर से कहें। कथा कहने के बाद पूजन की सामग्री को गीली मिट्टी के पिंड में रखकर मौन होकर व्रत रखनेवाली मिलायें। उसके बाद किशी जलाशय या तालाब में जाकर सिराये (जल में प्रवाहित करें)। उसके बाद घर आकर पारण करे। पारण के लिये जितना अन्न लें सब खा लें, थाली में कुछ भी नहीं बचना चाहिये। पारण के वक्त मौन रहें ।थाली धोकर पी लें।
जिस दिन दशा रानी का व्रत हो, उस दिन जब तक पूजा न हो जाय, किसी को कोई वस्तु, यहाँ तक कि आग भी, नहीं दी जाती । पूजा के पहले उस दिन किसी का स्वागत भी नहीं किया जाता ।

दशा माता .. कथा प्रारम्भ
एक घर मे कोई सास-बहू थी । सास का लड़का – बहू का पति परदेश गया हुआ था । एक दिन सास ने बहू से कहा- “जा गाँव में से आग ला और भोजन बनाकर तैयार कर ले ।” बहू गाँव में आग लेने गई , तो किसी ने उसको आग न दी, और कहा- “जब तक दशारानी की पूजा न हो जायगी, आग न मिलेगी। ” बहू बेचारी खाली हाथ घर आई । सास ने पूछा- “क्यों ? आग नहीं लाई ? ” तब बहू ने कण्डा सास के सामने पटक दिया और कहा- “गाँव भर में पूजन-व्रत सब कुछ होता है; तुमको इसकी खबर नहीं होती । आज गाँव भर में दशारानी की पूजा है, कोई आग- बाग तो दे क्यों, किसी ने यह भी नहीं पूछा कि कौन है ? कहाँ से आई है ? ” सास बोली –“अच्छा, शाम को देखूँगी, कैसी पूजा है , क्या बात है ।”
शाम को सास आग लेने के लिये गाँव में गई, तब स्त्रियोंने उसे स्वागत-पूर्वक बिठाया और कहा- “सवेरे तेरी बहू आई थी; परंतु हमारे यहाँ पूजा नहीं हुई थी, इसी कारण आग नहीं दे सकी, क्षमा करना ।” सास ने आग के अतिरिक्त जिससे जो चीज चाही , सभी ने खुशी से दी।
सास आग लेकर अपने घर के दरवाजे तक पहुँची थी कि एक व्यक्ति बछवा लिये आया और उसके पीछे ब्याई कलोरी गाय आती दिखाई दी उस स्त्री ने उससे पूछा- “क्या यह गाय पहलौठी ब्याई है ? ” आदमी ने कहा- “हाँ ” उसने फिर पूछा – “ बछवा है या बछिया ? ” आदमी ने जवाब दिया –“बछवा है ।” सास ने घर में जाकर बहू से कहा- “आओ, हम-तुम भी दशा रानी के गंडे लेवे और व्रत रहें । ” दोनों ने गंडे लिये । सवेरे से व्रत आरम्भ किया । नौ व्रत पूरे हो चुकने के बाद दसवें दिन गंडे की पूजा होनी थी । सास-बहू दोनों ने मिलकर गोल-गोले बेले हुये दस – दस अर्थात् बीस फरे बनाये । इक्कीसवाँ एक बड़ा फरा गाय को दिया । पूजन के बाद सास- बहू दोनों पारण करने बैठी ।
दशा माता,, कथा
उसी समय बुढ़िया का लड़का परदेश से आ गया। उसने दरवाजे से आवाज लगाई । सुनकर माँ ने मन में कहा-“क्या हरज हैं , उसे जरा बाहर ठहरने दो, मैं पारण कर लूँगी, तब किवाड़ खोलूँगी ।’ परन्तु बहू को रुकने का सब्र नहीं हुआ । अपनी थाली का अन्न इधर-उधर करके झट से पानी पीकर उठ खड़ी हुई । उसने जाकर किवाड़ खोले । पति ने उससे पूछा- “माता कहाँ है ? ” स्त्री ने कहा- “वह तो अभी पारण कर रही है । ” तब पति बोला- “मैं तेरे हाथ का जल अभी नहीं पिऊँगा, मैं बारह बरस में आया हूँ, इतने दिनों तक न जाने तू कैसी रही होगी । माता आयेगी, वह जल लायेगी, तब जल पिऊँगा ।” यह सुनकर स्त्री चुपचाप बैठी रही ।

माता पारण करने के बाद जब अपनी थाली धोकर पी चुकी, तब वह लड़के के पास गई। लड़के ने माँ के पैर छुए । माता उसे आशीर्वाद देती हुई घर के भीतर लिवा ले गई । माता ने थाली परोसकर रक्खी । बेटा भोजन करने बैठ गया । उसने हाथ में प्रथम ग्रास लिया और फेरों के वे टुकड़े जो बहू ने अपनी थाली से फेंक दिये थे, आपसे आप उचककर उसके सामने आने लगे । उस ने माँ से पूछा- “ यह सब क्या तमाशा है ? ” माँ बोली- “मैं क्या जानूँ, बहू जाने ।” यह सुनते ही लड़का आग-बबूला हो गया । वह बोला-“ऐसी बहू किस काम की, जिसके चरित्र की तू साक्षी नहीं है । इसको अभी निकाल बाहर करो । यदि यह घर में रहेगी, तो मैं घर में न रहूँगा।”
माता ने पुत्र को व्रत-पारण का सब हाल बताकर हर तरह से समझाया; परन्तु उसने एक बात न मानी। वह यही कहता रहा कि इसे निकाल बाहर करो, तभी मै घर में रहूँगा । माँ ने सोचा , बहू को थोड़ी देर के लिये बाहर कर देती हूँ , इतने में लड़के का गुस्सा शांत पड़ जायेगा । इसकी बात रह जायेगी, तब फिर इसे घर में बुला लूँगी । उसने बहू से कहा- “देहरी के बाहर जाकर ओसारे के नीचे खड़ी होना ।” जब बहू ओसारे के नीचे खड़ी हुई, तो ओसारा बोला- “मुझे इतना भार छानी-छप्पर का नहीं है , जितना तेरा है ; दशारानी के विरोधी को मैं छाया नहीं दे सकता ।” तब वह वहाँ से चलकर घिरौंची (दरवाजे) के पास गई । घिरौंची बोली- “ मुझसे हटकर खड़ी हो, मुझे इतना भार घरों का नहीं है, जितना तेरा है ।” वह वहाँ से भी हटकर घूरे पर जाकर खड़ी हुई । तब घूरा बोल- “मुझे इतना भार सब कूड़े का नहीं है, जितना तेरा है ; चल हटकर खड़ी हो ।” इसी तरह वह जहाँ कहीं जाती, वहीं से हटाई जाती थी । इस कारण वह अपने जी में अत्यंतदुखी होकर जंगल को चली गई ।
दशा माता ,, कथा
जंगल में भूखी-प्यासी फिरती- फिरती एक अंधकूप में गिर पड़ी । गिरी परंतु उसे कोई चोट नहीं आई । वह नीचे जाकर बैठ गई । उसी समय किसी नगर का राजा नल उसी जंगल में शिकार खेलने के लिये गये थे । उनके साथ के सब लोग बिछुड़ गये थे । वह प्यास के मारे भटकते हुये उसी कुँए के पास पहुँचे, जिसमें वह स्त्री गिरी हुई थी। राजा के सारथि ने लोटा कुँए में डाला, तो स्त्री ने उस लोटे को पकड़ लिया । तब सारथि ने राजा से कहा- “इस कुँए में तो किसी ने लोटा पकड़ रक्खा है ।” तब राजा ने कुँए की जगत पर जाकर कहा- “भाई ! पुरुष है तो मेरा धर्म भाई है, और स्त्री है तो धर्म की बहन है । तुम जो भी हो, बोलो । मैं तुमको ऊपर निकाल लूँगा ।” स्त्री ने आवाज दी । इस पर राजा ने उसे कुएँ से बाहर निकलवा लिया और अपने साथ हाथी पर बैठाकर अपनी राजधानी में ले आये ।
महाराज शिकार से लौटकर महल की ओर आ रहे थे, तब तक धावनी ने महारानी के पास जाकर खबर दी कि महाराज आ रहे हैं और एक रानी भी साथ ला रहे हैं । रानी अपने मन में बड़ी दुखी हुई । वह सोच ही रही थी कि अब सौत से कैसे निभेगी। इसी सोच में महाराज सामने आ पहुँचे। तब रानी ने हाथ जोड़कर विनय की- “ महाराज ! मुझसे ऐसी क्या बात न बन पड़ी, जो आप मेरे रहते दूसरा विवाह कर लाये हैं ।” उसपर राजा ने हँस कर उत्तर दिया- “वह जो आई है, तुम्हारी सौत नहीं, ननद है । तुमको उसके साथ मेरी सगी बहन-जैसा बर्ताव करना चाहिये ।” यह सुनते हीं रानी का मुँह प्रसन्नता से कमल की तरह खिल उठा । उसने स्वत: कहा- “अब-तक मैं ननद का सुख नहीं जानती थी, अच्छा हुआ जो भाग्य से ननद आ गई । ” राजा ने उसका नाम मुँहबोली बहन रक्खा और उस के लिये एक अलग महल बनवा दिया । उसी में वह आनंद से रहने लगी । इसी प्रकार बहुत दिन बीत गये ।

1 यह व्रत चैत्र (चैत) माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है।
2 सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने घर की दशा सुधारने के लिए करती हैं।
3 इस दिन कच्चे सूत का 10 तार का डोरा, जिसमें 10 गठानें लगाते हैं, लेकर पीपल की पूजा करती हैं।
4 इस डोरे की पूजन करने के बाद पूजनस्थल पर नल-दमयंती की कथा सुनती हैं।
5 इसके बाद डोरे को गले में बांधती हैं।
6 पूजन के पश्चात महिलाएं अपने घरों पर हल्दी एवं कुमकुम के छापे लगाती हैं।
7 एक ही प्रकार का अन्न एक समय खाती हैं।
8 भोजन में नमक नहीं होना चाहिए।
9. विशेष रूप से अन्न में गेहूं का ही उपयोग करते हैं।
10 घर की साफ-सफाई करके घरेलू जरूरत के सामान के साथ-साथ झाडू इत्यादि भी खरीदेंगी।
11 यह व्रत जीवनभर किया जाता है और इसका उद्यापन नहीं होता है
श्री दशा माता की ..आरती
जय सत-चित्त आनंद दाता की |भय भंजनि अरु दशा सुधारिणी |
पाप -ताप-कलि कलुष विदारणी|शुभ्र लोक में सदा विहारणी |
जय पालिनी दिन जनन की |आरती श्री दशा माता की ||
अखिल विश्व- आनंद विधायिनी |मंगलमयी सुमंगल दायिनी |
जय पावन प्रेम प्रदायिनी |अमिय-राग-रस रंगरली की |
आरती श्री दशा माता की ||नित्यानंद भयो आह्लादिनी |
आनंद घन आनंद प्रसाधिनी|रसमयि रसमय मन- उन्मादिनी |
सरस कमलिनी विष्णुआली की |आरती श्री दशा माता की |
|!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Monday, 5 March 2018

अक्षय तृतीया 14 अप्रैल 2021 को

अक्षय तृतीया  14 अप्रैल  2021 को 
अक्षय तृतीया वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया कहते हैं।  
ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अगर किसी कार्य का शुभारंभ किया जाए तो वह कार्य कभी समाप्त नहीं होता। केवल कार्य ही नहीं, जो भौतिक संसाधन भी इस अवधि में जुटाए जाएं वे भी हमारे जीवन में चिर स्थाई हो जाते हैं। इस तिथि का कुछ लोगों यह भी सदुपयोग किया है कि वे इस दिन दान पुण्य करते हैं, ताकि उनके किए दान अक्षय हो जाएं।

ऐसे में अक्षय तृतीया के दिन नया काम शुरू करने, नए भौतिक संसाधन जैसे बरतन, सोना, चांदी और अन्य कीमती वस्तुएं, विवाह और दान पुण्य करने का रिवाज बन गया है।

चूंकि यह दिन अपने आप में महत्वपूर्ण है, अत: इस पूरे दिन को अपने आप में अबूझ मुहुर्त कहा गया है, इस दिन न तो राहुकाल देखा जाता है, न चौघडि़या और न ही होरा, पूरे दिन में कभी भी किसी भी समय शुभ कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। हमारे बीकानेर में अक्षय तृतीय के दिन जमकर पतंगबाजी होती है, और मेरे जैसे कुछ लोग छतों पर चढ़कर पतंगों की उड़ान से हवा की दिशा ज्ञात कर आने वाले साल में मानसून कैसा रहेगा, यह तय करने का प्रयास करते हैं।   

आप सभी को अक्षय तृतीय की ढेरों शुभकामनाएं। नए वस्त्र खरीदिए, मांगलिक कार्य कीजिए, कीमती आभूषण खरीदिए और दान पुण्य कीजिए, सभी कुछ अक्षय रहे इस कामना के साथ।

प्रचलित मान्यताएं 
पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप–तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने–अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन क्या करें  
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन–जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।

सतयुग और त्रेता का आरंभ बिंदू 
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर–नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया 41 घटी 21 पल होती है तथा धर्म सिंधु एवं निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार अक्षय तृतीया 6 घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

व्रत कथाएं
एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी–देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म–कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी–पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी–पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

जैन धर्म में महत्व
जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी–गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते–करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।

भगवान श्री आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस की तपस्या के पश्चात पारायण किया था। यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी अत: जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है। तपस्या आरंभ करने से पूर्व इस बात का पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि प्रति मास की चौदस को उपवास करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का वर्षीतप करीबन 13 मास और 10 दिन का हो जाता है। उपवास में केवल गर्म पानी का सेवन किया जाता है।

मांगलिक कार्य इस दिन से शादी–ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े–बुजुर्ग अपने पुत्र–पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति–रिवाज के साथ अपने गुड्डा–गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ–साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत–प्रतिशत सत्य होते हैं। 

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव–घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुंड बनाकर घर–घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर ख़रबूज़ा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरंभ किसानों को समृद्धि देता है।

पहले समझते हैं कि तिथि क्या है, सूर्य और चंद्रमा की निश्चित कोणीय दूरी को एक तिथि कहा जाता है। यही कारण है कि अंग्रेजी कलेण्डर में जब दिन जारी रहता है, तभी तिथि समाप्त हो जाती है अथवा अंग्रेजी कलेण्डर में तारीख वही रहती है और तिथि बदल जाती है।

इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि किसी तिथि का लोप हो जाता है तो किसी तिथि की वृद्धि हो जाती है। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि सनातन कलेण्डर के अनुसार एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच की अवधि को एक दिन कहा जाता है। अगर कोई तिथि एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच ही समाप्त हो जाती है, तो उसे तिथि का लोप होना कहते हैं और अगर एक दूसरे दिन के सूर्योदय के बाद भी तिथि जारी रहती है तो उसे तिथि वृद्धि होना कहा जाता है।

सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंधों में अक्षय तृतीया एक ऐसा बिंदू है, जहां यह संबंध बिल्कुल सटीक होता है, और सूर्योदय के साथ तिथि का उदय होता है और अगले दिन सूर्योदय से पहले तिथि समाप्त हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अक्षय तृतीया ऐसी तिथि है, जिसमें कभी वृद्धि अथवा लोप नहीं होता। इसी कारण इसे अक्षय कहा गया है, इसका कभी क्षरण नहीं होता।

 

Sunday, 4 March 2018

मैं शिव हूँ केवल ,शिव हूँ , शिव . मैं विकारों से रहित ,

मैं शिव हूँ केवल ,शिव हूँ , शिव . मैं विकारों से रहित ,
विकल्पों से रहित , निराकार , परम एश्वर्य युक्त , सर्वदा यत्किंच सभी में सर्वत्र ,समान रूप में ब्याप्त हूँ , मैं ईक्षा रहित , सर्व संपन्न ,जन्म -मुक्ति से परे ,सच्चिदानंद स्वरुप कल्याणकारी शिव हूँ केवल , शिव .न मृत्यु , न संदेह , न तो जाति-भेद (खंडित ) हूँ , न पिता न माता , न जन्म न बन्धु , न मित्र न गुरु न शिष्य ही हूँ ; मैं तो केवल स्वरुप कल्याणकारी शिव हूँ , शिव 
विभत्स हूँ विभोर हूँ
मैं समाधी में ही चूर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
घनघोर अँधेरा ओढ़ के
मैं जन जीवन से दूर हूँ
श्मशान में हूँ नाचता
मैं मृत्यु का ग़ुरूर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
साम – दाम तुम्हीं रखो
मैं दंड में सम्पूर्ण हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
चीर आया चरम में
मार आया मैं को मैं
मैं मैं नहीं
मैं भय नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
जो सिर्फ तू है सोचता
केवल वो मैं नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं काल का कपाल हूँ
मैं मूल की चिंघाड़ हूँ
मैं मग्न...मैं चिर मग्न हू
मैं एकांत में उजाड़ हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं आग हूँ
मैं राख हूँ
मैं पवित्र राष हूँ
मैं पंख हूँ
मैं श्वाश हूँ
मैं ही हाड़ माँस हूँ
मैं ही आदि अनन्त हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मुझमें कोई छल नहीं
तेरा कोई कल नहीं
मौत के ही गर्भ में
ज़िंदगी के पास हूँ
अंधकार का आकार हूँ
प्रकाश का मैं प्रकार हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। 
मैं कल नहीं मैं काल हूँ
वैकुण्ठ या पाताल नहीं
मैं मोक्ष का भी सार हूँ
मैं पवित्र रोष हूँ
मैं ही तो अघोर हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
Cheer Aaya Charam Me
Maar Aaya ‘Mein’ Ko Mein
Mein, Mein Nahi
Mein Bhay Nahi
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu 
चीर आया चरम में
मार आया मैं को मैं
मैं , मैं नहीं
मैं भय नहीं
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ मैं शिव हूँ।

Mere Shiv Baba kehte hai ki mat soch tera sapna pura hoga ya nahi..
Kyoki jiske karam aache hote hai, unki to mein bhi madad karta hu
!! Happy Shivratri !!
मेरे महाकाल कहते हैं कि मत सोच तेरा सपना पूरा होगा या नहीं
क्योंकि जिसके कर्म अच्छे होते हैं उनकी तो मैं भी मदद करता हूँ

Jo Sirf Tu Hai Sochta….
Keval Vo Mein Nahi Hota
Meinshiv Hu Mein Shiv Hu Meinshiv Hu
Mein Mahakaal Hu Mein Mahakaal Hu Mein Mahakaal Hu
जो सिर्फ तू है सोचता
केवल वो मैं नहीं
मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ।

Naa pucho mujhse meri pehchan
Mein to Bhasamdhari hu
Bhasam se hota jinka Shringar mein uss Bhole ka Pujari hu..
Bam Bam Bhole hindi status
ना पूछो मुझसे मेरी पहचान 
मैं तो भस्मधारी हूँ 
भस्म से होता जिनका श्रृंगार मैं उस महाकाल का पुजारी हूँ 
हर हर महादेव

Main Aag Hoon
Main Raakh Hoon
Main Pavitr Raash Hoon
Main Pankh Hoon
Main Shvaash Hoon
Main Hee Haad Maans Hoon
Main Hee Aadi Anant Hoon
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu
मैं आग हूँ
मैं राख हूँ
मैं पवित्र राष हूँ
मैं पंख हूँ
मैं श्वाश हूँ
मैं ही हाड़ माँस हूँ
मैं ही आदि अनन्त हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।

Shiv Shamkar ko jisne Pooja uska hi uddaar hua,
Anant kaal ke bhavsagar me uska beda paar hua,
Bhole Shankar ki Pooja karo,
Dhyaan charno me inke dharo..
Har Har Mahadev
Bhole status in Hindi

शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ 
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ 
भोले शंकर की पूजा करो , ध्यान चरणों में इनके धरो। 
Main Kaal Ka Kapaal Hoon
Main Mool Kee Chinghaad Hoon
Main Magn Main Chir Magn Hoon
Main Ekaant Mein Ujaad Hoon
Mein Mahakaal u Mein Maakaal Hu Mein Mahkaal Hu
मैं काल का कपाल हूँ
मैं मूल की चिंघाड़ हूँ
मैं मग्न…मैं चिर मग्न हूँ
मैं एकांत में उजाड़ हूँ
मैं महाकल हूँ। मैं महकाल हूँ। मैं हाकाल हूँ।

Shiv Satay hai, Shiv Anant hai,
Shiv Anaadi hai, Shiv hi Bhagwant hai,
Shiv Omkaar hai, Shiv hi Bhram hai,
Shiv Shakti hai, Shiv hi Bhagti hai,
Aao Bhagwaan Shiv ka Naman kare,
Auka Aashirwaad hum sab par bana rahe
शिव सत्य है, शिव अनंत है,
शिव अनादि है, शिव भगवंत है,
शिव ओंकार है, शिव ब्रह्म है,
शिव शक्ति है, शिव भक्ति है,
आओ भगवान शिव का नमन करें,
उनका आशीर्वाद हम सब पर बना रहे।

Mujhamen Koee Chhal Nahin
Tera Koee Kal Nahin
Maut Ke Hee Garbh Mein
Zindagee Ke Paas Hoon
Andhakaar Ka Aakaar Hoon
Prakaash Ka Main Prakaar Hoon
Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu Mein Shiv Hu

मुझमें कोई छल नहीं
तेरा कोई कल नहीं
मौत के ही गर्भ में
ज़िंदगी के पास हूँ 
अंधकार का आकार हूँ
प्रकाश का मैं प्रकार हूँ
मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
Mere Mahakaal tumhaare bina mein shunay hu..
TUm saath ho Bhole to mein Anant hu
Jai Shri trikaalnath mahakal 
मेरे महाकाल तुम्हारे बिना मैं शून्य हूँ 
तुम साथ हो महाकाल तो में अनंत हूँ 
जय श्री त्रिकालनाथ महाकाल

Main Kal Nahin Main Kaal Hoon
Vaikunth Ya Paataal Nahin
Main Moksh Ka Bhee Saar Hoon
Main Pavitr Rosh Hoon
Main Hee To Aghor Hoon
मैं कल नहीं मैं काल हूँ
वैकुण्ठ या पाताल नहीं
मैं मोक्ष का भी सार हूँ 
मैं पवित्र रोष हूँ
मैं ही तो अघोर हूँ
मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ। मैं महाकाल हूँ।
Om Tryambakam Yajaamahe Sugandhimpushtivardhanam.
Urvaarukamiv Bandhanaat Mrtyormuksheey Maamrtaat.. Om Svah Bhuvah Bhooh Om Sah Joon Haun Om
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
!!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557

संकष्टी चतुर्थी विनायक चतुर्थी

संकष्टी चतुर्थी विनायक चतुर्थी

संकष्टी चतुर्थी विनायक चतुर्थी https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5
चन्द्रोदय का समय,,प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं
और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। कहा जाता है कि जो श्रद्घालु चतुर्थी का व्रत कर श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। फिर माघी या तिल चौथ का तो विशेष महत्व है।माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ या वक्रतुण्ड चतुर्थी कहते हैं। संतान की लंबी आयु और आरोग्य के लिए इस दिन स्त्रियां व्रत रखती हैं। इस रोज गणपति के पूजन के साथ चंद्रमा को भी अघ्र्य दिया जाता है।
हालाँकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर महीने में होता है लेकिन सबसे मुख्य संकष्टी चतुर्थी पुर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ के महीने में पड़ती है और अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पौष के महीने में पड़ती है।
संकष्टी चतुर्थी अगर मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं और इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिल नाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है।
जो श्रद्घालु नियमित रूप से चतुर्थी का व्रत नहीं कर सकते यदि माघी चतुर्थी का व्रत कर लें, तो ही साल भर की चतुर्थी व्रत का फल प्राप्त हो जाता है। माघी तिल (तिल चौथ) चतुर्थी पर जहां गणेश मंदिरों में भक्तों का तांता लगेगा, वहीं मंदिरों मे विशेष आयोजन भी होंगे। श्रद्घालु लंबोदर के समक्ष शीश नवाएंगे और आशीष पाकर अपने संकटों को दूर करेंगे।
माघी चौथ के अवसर पर गणेश मंदिरों में मनमोहक श्रृंगार होंगे तथा प्रसाद वितरण किया जाएगा। चतुर्थी का व्रत रख श्रद्घालु चंद्रदर्शन के बाद भोजन करेंगे। माघी चतुर्थी पर गणेश मंदिरों में तिल उत्सव मनेगा।
भगवान गणेश के भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से चन्द्रोदय तक उपवास रखते हैं। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं। भगवान गणेश जो ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च हैं, सभी तरह के विघ्न हरने के लिए पूजे जाते हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल जाती है।
संकष्टी चतुर्थी का उपवास कठोर होता है जिसमे केवल फलों, जड़ों (जमीन के अन्दर पौधों का भाग) और वनस्पति उत्पादों का ही सेवन किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, आलू और मूँगफली श्रद्धालुओं का मुख्य आहार होते हैं। श्रद्धालु लोग चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को तोड़ते हैं।
व्रतधारी श्रद्घालुओं को चंद्रदर्शन और गणेश पूजा के बाद व्रत समाप्त करना चाहिए। इसके अलावा पूजा के समय भगवान गणेश के इन बारह नामों का जाप करने से फल अवश्य मिलता है।
विशेष 01 . माघी चतुर्थी का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने वाले श्रद्घालुओं की समस्त मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
सुबह गणेश पूजा करें।
पूजा के साथ यदि अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाए तो अति उत्तम।
गणेश द्वादश नामावली का पाठ करें
दिन में अथवा गोधूली वेला में गणेश दर्शन अवश्य करें।
शाम को सहस्र मोदक या स्वेच्छानुसार लड्डुओं का भोग अर्पित करें।
सहस्र दुर्वा अर्पण करें
हो सके तो सहस्र मोदक से हवन अवश्य करें।
विशेष 02 . विनायक पूजा और उपासना कार्य बाधा और जीवन में आने वाली शत्रु बाधा को दूर कर शुभ व मंगल करती है। यही कारण है हर माह के शुक्ल पक्ष को विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश की उपासना कार्य की सफलता के लिए बहुत ही शुभ मानी गई है। यहां जानते हैं विनायक चतुर्थी के दिन श्री गणेश उपासना का एक सरल उपाय, जो कोई भी अपनाकर हर कार्य को सफल बना सकता है
चतुर्थी के दिन, बुधवार को सुबह और शाम दोनों ही वक्त यह उपाय किया जा सकता है।
स्नान कर भगवान श्री गणेश को कुमकुम, लाल चंदन, सिंदूर, अक्षत, अबीर, गुलाल, फूल, फल, वस्त्र, जनेऊ आदि पूजा सामग्रियों के अलावा खास तौर पर 21 दूर्वा चढ़ाएं। दूर्वा श्री गणेश को विशेष रूप से प्रिय मानी गई है।
विनायक को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें। जानते हैं ये मंत्
ॐ गणाधिपाय नम:। ॐ विनायकाय नम:। ॐ विघ्रनाशाय नम:। ॐ एकदंताय नम:। ॐ उमापुत्राय नम:। ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम:।ॐ ईशपुत्राय नम:। ॐ मूषकवाहनाय नम:। ॐ इभवक्त्राय नम:। ॐ कुमारगुरवे नम:।- ॐ गं गौं गणपतये विघ्रविनाशिने स्वाहा।
मंत्रों के साथ पूजा के बाद यथाशक्ति मोदक का भोग लगाएं। 21 मोदक का चढ़ावा श्रेष्ठ माना जाता है
मंत्र जप के बाद भगवान गणेश की आरती गोघृत यानी गाय के घी के दीप और कर्पूर से करें
अंत में भगवान गणेश से हर पीड़ा, दु:ख, संकट, भय व बिघ्न का अंत करने की प्रार्थना कर सफलता की कामना करें। यह मंत्र जप किसी भी प्रतिकूल या संकट की स्थिति में पवित्र भावना से स्मरण करने पर शुभ फल देता है।
अंत में श्री गणेश आरती कर क्षमा प्रार्थना करें। कार्य में विघ्र बाधाओं से रक्षा की कामना करें।
जानिए चिंतामण गणेश के बारह नाम
1 वक्रतुंड 2 एकदंत 3,, कृष्णपिंगाक्ष 4,, गजवक्त्र 5,, लंबोदर
6,, विकट 7,,, विघ्नराज 8,, धूम्रवर्ण 9,, भालचंद्र 10,,विनायक 11,, गणपति 12,, गजानंद।
10 मार्च रविवार विनायक चतुर्थी 11:13 to 13:3
09 अप्रैल मंगलवार विनायक चतुर्थी 11:01 to 13:
08 मई बुधवार विनायक चतुर्थी 10:53 to 13:32
06 जून बृहस्पतिवार विनायक चतुर्थी 10: 59 to 13:10
06 जुलाई शनिवार विनायक चतुर्थी 11:02 to 13:37
04 अगस्त रविवार विनायक चतुर्थी 10: 59 to 13:28
02सितम्बर सोमवार गणेश चतुर्थी 10:52 to 11:40
02 अक्टूबर बुधवार विनायक चतुर्थी 10: 52 to 11 40
31 अक्टूबर बृहस्पतिवार विनायक चतुर्थी 10:50 to 13:05
30 नवम्बर शनिवार विनायक चतुर्थी 10:57 to 13:07
30 दिसम्बर सोमवार विनायक चतुर्थी 11:12 to 13:20
24 मार्च रविवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.53
22 अप्रैल सोमवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.33
22 मई बुधवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 22.04
20 जून बृहस्पतिवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.32
20 जुलाई शनिवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.29
19 अगस्त सोमवार संकष्टी चतुर्थी बहुला चतुर्थी चन्द्रोदय 21.13
17 सितम्बर मंगलवार अंगारकी चतुर्थी चन्द्रोदय 20.23
17 अक्टूबर बृहस्पतिवार संकष्टी चतुर्थी करवा चौथचन्द्रोदय 20.21
15 नवम्बर शुक्रवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 19.55
15 दिसम्बर रविवार संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 20.42
॥।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

शीतला माता के व्रत और पूजन किये जाते हैं। शीतला सप्तमी, शीतला माता,,,बसौड़ा पर्व

शीतला माता के व्रत और पूजन किये जाते हैं। शीतला माता,,,बसौड़ा पर्व
 शीतला सप्तमी ,,15 मार्च 2020,,,शीतला माता,,,बसौड़ा पर्व 16  मार्च 2020 https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

ये होली सम्पन्न होने के अगले सप्ताह में बाद करते हैं। प्रायः शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होती है, लेकिन कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है।
भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग यानि बसौड़ा तैयार कर लिया जाता है। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर दिया जाता है।. ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं।
प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी शीतला का वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। चेचक का रोगी व्यग्रतामें वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत:कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है।
स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
अर्थात
गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवालीभगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत:स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी ,झाड,] होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।
मान्यता अनुसार इस व्रत को करनेसे शीतला देवी प्रसन्‍न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतलाकी फुंसियोंके चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं।
शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलता है। आज भी लाखों लोग इस नियम का बड़ी आस्था के साथ पालन करते हैं। शीतला माता की उपासना अधिकांशत: वसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में होती है। शीतला (चेचक रोग) के संक्रमण का यही मुख्य समय होता है। इसलिए इनकी पूजा का विधान पूर्णत: सामयिक है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है। इसलिए यह दिन शीतलाष्टमी के नाम से विख्यात है।
आधुनिक युग में भी शीतला माता की उपासना स्वच्छता की प्रेरणा देने के कारण सर्वथा प्रासंगिक है। भगवती शीतला की उपासना से स्वच्छता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा मिलती है।
दोहा
जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान। होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥
घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥
चालीसा
जय जय श्री शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणधानी ॥
गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती। पूरन शरन चंद्रसा साजती ॥
विस्फोटक सी जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥
मात शीतला तव शुभनामा। सबके काहे आवही कामा ॥
शोक हरी शंकरी भवानी। बाल प्राण रक्षी सुखदानी ॥
सूचि बार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥
चौसट योगिन संग दे दावै। पीड़ा ताल मृदंग बजावै ॥
नंदिनाथ भय रो चिकरावै। सहस शेष शिर पार ना पावै ॥
धन्य धन्य भात्री महारानी। सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ॥
ज्वाला रूप महाबल कारी। दैत्य एक विश्फोटक भारी ॥
हर हर प्रविशत कोई दान क्षत। रोग रूप धरी बालक भक्षक ॥
हाहाकार मचो जग भारी। सत्यो ना जब कोई संकट कारी ॥
तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा। कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ॥
विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो। मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ॥
बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा। मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ॥
अब नही मातु काहू गृह जै हो। जह अपवित्र वही घर रहि हो ॥
पूजन पाठ मातु जब करी है। भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥
अब भगतन शीतल भय जै हे। विस्फोटक भय घोर न सै हे ॥
श्री शीतल ही बचे कल्याना। बचन सत्य भाषे भगवाना ॥
कलश शीतलाका करवावै। वृजसे विधीवत पाठ करावै ॥
विस्फोटक भय गृह गृह भाई। भजे तेरी सह यही उपाई ॥
तुमही शीतला जगकी माता। तुमही पिता जग के सुखदाता ॥
तुमही जगका अतिसुख सेवी। नमो नमामी शीतले देवी ॥
नमो सूर्य करवी दुख हरणी। नमो नमो जग तारिणी धरणी ॥
नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी। दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ॥
श्री शीतला शेखला बहला। गुणकी गुणकी मातृ मंगला ॥
मात शीतला तुम धनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी ॥
राघव खर बैसाख सुनंदन। कर भग दुरवा कंत निकंदन ॥
सुनी रत संग शीतला माई। चाही सकल सुख दूर धुराई ॥
कलका गन गंगा किछु होई। जाकर मंत्र ना औषधी कोई ॥
हेत मातजी का आराधन। और नही है कोई साधन ॥
निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय ईप्सित सो फल पावै ॥
कोढी निर्मल काया धारे। अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ॥
बंधा नारी पुत्रको पावे। जन्म दरिद्र धनी हो जावे ॥
सुंदरदास नाम गुण गावत। लक्ष्य मूलको छंद बनावत ॥
या दे कोई करे यदी शंका। जग दे मैंय्या काही डंका ॥
कहत राम सुंदर प्रभुदासा। तट प्रयागसे पूरब पासा ॥
ग्राम तिवारी पूर मम बासा। प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ॥
अब विलंब भय मोही पुकारत। मातृ कृपाकी बाट निहारत ॥
बड़ा द्वार सब आस लगाई। अब सुधि लेत शीतला माई ॥
यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय।
सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ॥
बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू।
जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू ॥
॥ इति ॥
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