Tuesday, 21 May 2013

महाकाल

सुप्रभात जागो हे महाकाल, जागो जीवन आधार,भसम करो पापी के पाप को,
धरती पुकारे प्रभु आपको ।तुम को जगा रहा नीला गगन ।
तुम को जगाये प्रभु पूरा पवन ॥कंदों पे नुसत धरो , डमरू पे ताल दो ।
तीसरे नयन की आज ज्वाला निकाल दो ॥फूंक दो यह कष्टों की कालिमा ।
भरदो कानो में नयी लालिमा ॥,,सुप्रभात,,

सोमनाथ की जय

सोमनाथ की जय जय सोमनाथ की जय 
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जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा कर्पूरगौरं करुणावतारम संसार सारं भुजगेंद्रहारं। सदा वसन्तं हृदयार्विंदे भावं भवानी सहितं नमामि॥ जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा ब्रह्मा, विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ जय एकानन, चतुरानन, पंचानन राजै हंसासन, गरुडासन, वृषवाहन साजै॥ जय ॥ दो भुज चार चतुर्भुज, दशभुज ते सोहे तीनो रूप निरखता, त्रिभुवन-जन मोहे॥ जय ॥अक्षमाला, वनमाला, रुण्डमालाधारी त्रिपुरारी, कंसारी, करमाला धारी॥ जय ॥श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे सनकादिक, गरुडादिक, भूतादिक संगे॥ जय ॥कर मध्ये सुकमण्डलु, चक्र शूलधारी सुखकारी, दुखहारी, जग पालनकारी॥ जयब्रह्माविष्णु सदाशिव जानत अविवेका प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनो एका॥ जय कशी में विश्नाथ विराजत नंदी ब्रह्मचारी नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी॥ जय ॥ त्रिगुण स्वामीजी की आरती जो कोई नर गावै कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावै॥ जय

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की जय

 मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की जय
 मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की जय जय शिव शंकर !! जय भोले नाथ !! हर हर महादेवमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्रीशैलम आंध्र प्रदेश)MALLIKARJUNA jyotirlinga,,जय देव जगन्नाथ, जय शंकर शाश्वत। जय सर्व-सुराध्यक्ष, जय सर्व-सुरार्चित ! जय सर्व-गुणातीत, जय सर्व-वर-प्रद ! जय नित्य-निराधार, जय विश्वम्भराव्यय ! ।। जय विश्वैक-वेद्येश, जय नागेन्द्र-भूषण ! जय गौरी-पते शम्भो, जय चन्द्रार्ध-शेखर ! ।। जय कोट्यर्क-संकाश, जयानन्त-गुणाश्रय ! जय रुद्र-विरुपाक्ष, जय चिन्त्य-निरञ्जन ! ।। जय नाथ कृपा-सिन्धो, जय भक्तार्त्ति-भञ्जन ! जय दुस्तर-संसार-सागरोत्तारण-प्रभो ! ।।प्रसीद मे महा-भाग, संसारार्त्तस्य खिद्यतः। सर्व-पाप-भयं हृत्वा, रक्ष मां परमेश्वर ! ।।महा-दारिद्रय-मग्नस्य, महा-पाप-हृतस्य च। महा-शोक-विनष्टस्य, महा-रोगातुरस्य च।।ऋणभार-परीत्तस्य, दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य, प्रसीद मम शंकर !

राम भगवान विष्णु के दसवें अवतार माने जाते हैं

श्रीराम भगवान विष्णु के दसवें अवतार माने जाते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विख्यात श्रीराम का नाम हिन्दुओं के जन्म से लेकर मरण तक उनके साथ रहता है। अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम ने असुर राज रावण और अन्य आसुरी शक्तियों के प्रकोप से धरती को मुक्त कराने के लिए ही इस धरा पर जन्म लिया था। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से नैतिकता, वीरता, कर्तव्यपरायणता के जो उदाहरण प्रस्तुत किये वह बाद में मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक का काम करने लगे।
महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य श्रामायणश् और संत तुलसीदास जी ने भक्ति काव्य श्श्रीरामचरितमानसश् में भगवान श्रीराम के जीवन का विस्तृत वर्णन बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। हिन्दू धर्म के कई त्योहार श्रीराम के जीवन से जुड़े हुए हैं जिनमें रामनवमी के रूप में उनका जन्मदिवस मनाया जाता है तो दशहरा पर्व भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध करने की खुशी में मनाया जाता है। श्रीराम के वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटने की खुशी में हिन्दुओं का सबसे बड़ा पर्व दीपावली मनाया जाता है। राम प्रजा को हर तरह से सुखी रखना राजा का परम कर्तव्य मानते थे। उनकी धारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दुरूखी रहती है, वह अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य की विस्तृत चर्चा की है। राम अद्वितीय महापुरुष थे। वे अतुल्य बलशाली तथा उच्च शील के व्यक्ति थे। युवा श्रीराम के जीवनकाल में तब बड़ा परिवर्तन आया जब वह अपने छोटे भाई लक्ष्मण तथा मुनि विश्वामित्र के साथ जनकपुर पहुंचे और वहां श्रीराम ने जनकजी द्वारा प्रतिज्ञा के रूप में रखे शिव−धनुष को तोड़ दिया। जिसके बाद राजा ने साक्षात् लक्ष्मी के अंश से उत्पन्न सीता का विवाह राम के साथ कर दिया तथा दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण के साथ कर दिया। इसके बाद महाराज दशरथ ने अपने बड़े पुत्र राम को राज्य करने योग्य देखकर उन्हें राज्य भार सौंपने का मन में निश्चय किया। राजतिलक संबंधी सामग्रियों का प्रबंध हुआ देखकर महाराज दशरथ की तीसरी पत्नी रानी कैकेयी ने अपनी वशीभूत महाराज दशरथ से पूर्व कल्पित दो वरदान मांगे। उन्होंने पहले वरदान के रूप में अपने पुत्र भरत के लिये राज तथा दूसरे वरदान के रूप में श्रीराम को चौदह वर्षों का वनवास मांगा। कैकेयी का वचन मानकर श्रीरामचन्द्र जी सीता तथा लक्ष्मण के साथ द.डक वन चले गये, जहां राक्षस रहते थे। इसके बाद पुत्र के वियोग जनित शोक से संतप्त पु.यात्मा दशरथ ने पूर्व काल में एक व्यक्ति द्वारा प्रदत्त शाप का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये। वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण राक्षस तथा लंका का राजा था। सौ योजन का समुद्र लांघकर हनुमान जी ने सीता का पता लगाया। समुद्र पर सेतु बना। रणभूमि के महायज्ञ में श्रीराम के बाणों ने राक्षसों के साथ कुम्भकर्ण और रावण के प्राणों की आहुति ले ली। भगवान श्रीराम ने रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे और वहां सबसे मिलने के बाद श्रीराम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ।.

 Photo: श्रीराम भगवान विष्णु के दसवें अवतार माने जाते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विख्यात श्रीराम का नाम हिन्दुओं के जन्म से लेकर मरण तक उनके साथ रहता है। अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम ने असुर राज रावण और अन्य आसुरी शक्तियों के प्रकोप से धरती को मुक्त कराने के लिए ही इस धरा पर जन्म लिया था। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से नैतिकता, वीरता, कर्तव्यपरायणता के जो उदाहरण प्रस्तुत किये वह बाद में मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक का काम करने लगे।
महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य श्रामायणश् और संत तुलसीदास जी ने भक्ति काव्य श्श्रीरामचरितमानसश् में भगवान श्रीराम के जीवन का विस्तृत वर्णन बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। हिन्दू धर्म के कई त्योहार श्रीराम के जीवन से जुड़े हुए हैं जिनमें रामनवमी के रूप में उनका जन्मदिवस मनाया जाता है तो दशहरा पर्व भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध करने की खुशी में मनाया जाता है। श्रीराम के वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटने की खुशी में हिन्दुओं का सबसे बड़ा पर्व दीपावली मनाया जाता है। राम प्रजा को हर तरह से सुखी रखना राजा का परम कर्तव्य मानते थे। उनकी धारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दुरूखी रहती है, वह अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य की विस्तृत चर्चा की है। राम अद्वितीय महापुरुष थे। वे अतुल्य बलशाली तथा उच्च शील के व्यक्ति थे। युवा श्रीराम के जीवनकाल में तब बड़ा परिवर्तन आया जब वह अपने छोटे भाई लक्ष्मण तथा मुनि विश्वामित्र के साथ जनकपुर पहुंचे और वहां श्रीराम ने जनकजी द्वारा प्रतिज्ञा के रूप में रखे शिव−धनुष को तोड़ दिया। जिसके बाद राजा ने साक्षात् लक्ष्मी के अंश से उत्पन्न सीता का विवाह राम के साथ कर दिया तथा दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण के साथ कर दिया। इसके बाद महाराज दशरथ ने अपने बड़े पुत्र राम को राज्य करने योग्य देखकर उन्हें राज्य भार सौंपने का मन में निश्चय किया। राजतिलक संबंधी सामग्रियों का प्रबंध हुआ देखकर महाराज दशरथ की तीसरी पत्नी रानी कैकेयी ने अपनी वशीभूत महाराज दशरथ से पूर्व कल्पित दो वरदान मांगे। उन्होंने पहले वरदान के रूप में अपने पुत्र भरत के लिये राज तथा दूसरे वरदान के रूप में श्रीराम को चौदह वर्षों का वनवास मांगा। कैकेयी का वचन मानकर श्रीरामचन्द्र जी सीता तथा लक्ष्मण के साथ द.डक वन चले गये, जहां राक्षस रहते थे। इसके बाद पुत्र के वियोग जनित शोक से संतप्त पु.यात्मा दशरथ ने पूर्व काल में एक व्यक्ति द्वारा प्रदत्त शाप का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये। वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण राक्षस तथा लंका का राजा था। सौ योजन का समुद्र लांघकर हनुमान जी ने सीता का पता लगाया। समुद्र पर सेतु बना। रणभूमि के महायज्ञ में श्रीराम के बाणों ने राक्षसों के साथ कुम्भकर्ण और रावण के प्राणों की आहुति ले ली। भगवान श्रीराम ने रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे और वहां सबसे मिलने के बाद श्रीराम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ।.

ब्रह्मा-विष्णु शिव ,,,,शिव-ब्रह्मा-विष्णु


शिव-ब्रह्मा-विष्णु कहीं भी श्री शिव या श्री विष्णु या श्री ब्रह्मा एक दूसरे की न तो निंदा आदि की है और निंदा आदि करने के किसी से कहा ही है; बल्कि निंदा आदि का निषेध और तीनों को एक मानने की प्रशंसा की है!
शिव पुराण में कहा है——एसे परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम!परस्परेण वर्धन्ते परस्परमनुव्रता:!!क्वचित द्ब्रह्मा क्वचितद्विष्णु: क्वाविद्रुद्र प्रशस्यते!नानेव तेषा माधिक्य मैश्चर्यन्चातिरिच्यते!!अयं परस्त्वयं नेति संम्भा भिनिवेशिन:!यातु भवन्त्येव पिशाचा वा ण संशय:!!
ये तीनों [ ब्रह्मा, विष्णु और शिव] एक दूसरे से उत्पन्न हुए हैं, एक दूसरे को धारण करते हैं, एक दूसरे के द्वारा वृद्विन्गत होते हैं और एक दूसरे के अनुकूल आचरण करते हैं! कहीं ब्रह्मा कि प्रशंसा की जाती है, कहीं विष्णु कि और कहीं महादेव कि! उनका उत्कर्ष एवं ऐश्वर्य एक दूसरे की अपेक्षा इस प्रकार अधिक कहा है मानो वे अनेक हों! जो संशयात्मा मनुष्य यह विचार करते हैं कि अमुक बड़ा है और अमुक छोटा है, वे अगले जन्म में राक्षस अथवा पिशाच होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है!
स्वयं भगवान शिव जी विष्णु जी से कहते है मद्दर्शने फलं यद्वै तदेव तव दर्शने! ममैव हृदये विष्णुर्विष्नोश्च हृदये ह्यहम!! उभयोरन्तरं यो वै ण जानाति मतों मम!
मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है! आप मेरे ह्रदय में निवास करते हैं और मैं आपके ह्रदय में रहता हूँ! जो हम दोनों में भेद नहीं समझता, वही मुझे मान्य है!
भगवान श्रीराम भगवान श्रेशिव जी से कहते हैं ममास्ति हृदये शर्वो भवतो हृदये त्वहम ! आवयोरन्तरं नास्ति मूढ़ा: पश्यन्ति दुर्धिय:!! ये भेदन विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपकम ! कुम्भीपाकेषु पच्यते नरा: कल्पसह्त्रकम!! ये त्वद्भक्ता: सदासंस्ते मद्भक्ता धर्मसंयुक्ता:! मद्भक्ता अपि भूयस्या भवत्या नातिन्करा:!!
आप [शंकर] मेरे ह्रदय में रहते हैं और मैं आपके ह्रदय में रहता हूँ! हम दोनों में कोई भेद नहीं है! मूर्ख एवं दुर्बुद्धि मनुष्य ही हमारे अन्दर भेद समझते हैं! हम दोनों एकरूप हैं, जो मनुष्य हमारे अन्दर भेद-भावना करते हैं, वे हजार कल्पपर्यंत कुम्भीपाक नरक में यातना सहते हैं! जो आपके भक्त हैं वे धार्मिक पुरुष सदा ही मेरे भक्त रहे हैं और जो मेरे भक्त हैं वे प्रगाढ़ भक्ति से आपको भी प्रणाम करते हैं!
इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भी भगवान् श्रीशिव जी से कहते हैं!
त्वत्परो नास्ति मे प्रेयांस्त्वं मदीयात्मन: पर:! ये त्वां निदन्ति पापिष्ठा ज्ञानहीना विचेतस:!! पच्यन्ते कालसूत्रेण यावच्चंद्रदिवाकरौ! कृत्वा लिंगं सकृत्पूज्य वसेत कल्पायुतं दिवे! प्रजावान भूमिवान विद्वान पुत्रबान्धववांस्तथा!! ज्ञानवान मुक्तिमान साधु: शिवलिंगार्चनाद्भवेत! कोटिजन्मार्जितात पापान्मुक्तो मुक्तिं प्रयाति स:!
मुझे आपसे बढ़ कर कोई प्यारा नहीं है, आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय हैं! जो पापी, अज्ञानी एवं बुद्धिहीन पुरुष आपकी निंदा करते हैं, वे जब तक चन्द्र और सूर्य का अस्तित्व रहेगा, तब तक काल सूत्र में [नरक में][ पचाते रहेंगे! जो शिवलिंग का निर्माण कर एक बार भी उसकी पूजा कर लेता है, वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है! शिन्लिंग के अर्चन से मनुष्य को प्रजा, भूमि, विद्या, पुत्र, बान्धव श्रेष्ठता, ज्ञान एवं मुक्ति सब कुछ प्राप्त हो जाता है! जो मनुष्य "शिव" शब्द का उच्चारण कर शरीर छोड़ता है, वह करोड़ों जन्मों के संचित पापों से छूट कर मुक्ति को प्राप्त होता है!
भगवान विष्णु श्री मद्भागवत [४/७/५४] में दक्षप्रजापति के प्रति कहते हैं!
त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम! सर्वभूतात्मनां ब्रह्मन स शान्तिमधिगच्छति !!
हे विप्र! हम तीनों एकरूप हैं और समस्त भूतों की आत्मा हैं, हमारे अन्दर जो भेद-भावना नहीं करता, नि:संदेह वह शान्ति [मोक्ष] को प्राप्त होता है!
श्रीरामचरितमानस में भगवान श्री राम ने कहा है!—
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास! ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुं बॉस!! औरउ एक गुपुत मत सबहि कहऊँ कर जोरि! संकर भजन बिना नर भगति ण पावई मोरि!!
शांताकरम भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णँ शुभांगम।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगभिर्ध्यानिगम्यम।वंदे विष्णु भवभयहरणम् सर्वलोकैकनाथम ।।,,


शुभ रात्रि जय जय नारायण नारायण हरि हरि





शुभ रात्रि जय जय नारायण नारायण हरि हरि,जय जय नारायण नारायण हरि हरि, नारायण नारायण हरि हरि। हरि ॐ नारायण नारायण हरि हरि। भगवन नारायण नारायण हरि हरि...शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्

मोहिनी एकादशी वैसाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी कहलाती है

मोहिनी एकादशी,,वैसाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी कहलाती है|  | आपको बता दें कि इस दिन भगवान पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा की जाती है| व्रत के दिन भगवान की प्रतिमा को श्वेतवस्त्र पहनाये जाते हैं|
मोहिनी एकादशी व्रत विधि===इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान श्रीराम की पूजा की जाती है| व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरु किया जाता है| संकल्प लेने के लिये इन दोनों देवों के समक्ष संकल्प लिया जाता है| देवों का पूजन करने के लिये कुम्भ स्थापना कर, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कुम्भ का पूजन किया जाता है, इसके बाद इसके ऊपर भगवान की तस्वीर या प्रतिमा रखी जाती है| प्रतिमा रखने के बाद भगवान का धूप, दीप और फूलों से पूजन किया जाता है| तत्पश्चात व्रत की कथा सुनी जाती है|
मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व===मोहिनी एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप और दु:ख नष्ट होते है| इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य़ मोह जाल से छूट जाता है, अत: इस व्रत को सभी दु:खी मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए| मोहिनी एकादशी के व्रत के दिन इस व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए|
मोहिनी एकादशी व्रत कथा===युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन! वैशाख मास के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसका क्या फल होता है? उसके लिए कौन सी विधि है?
भगवान श्रीकृष्ण बोले : धर्मराज! पूर्वकाल में परम बुद्धिमान श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठजी से यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो।
श्रीराम ने कहा : भगवन्! जो समस्त पापों का क्षय तथा सब प्रकार के दु:खों का निवारण करनेवाला, व्रतों में उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।
वशिष्ठजी बोले : श्रीराम! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। मनुष्य तुम्हारा नाम लेने से ही सब पापों से शुद्ध हो जाता है। तथापि लोगों के हित की इच्छा से मैं पवित्रों में पवित्र उत्तम व्रत का वर्णन करुँगा। वैशाख मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम ‘मोहिनी’ है। वह सब पापों को हरनेवाली और उत्तम है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल तथा पातक समूह से छुटकारा पा जाते हैं।
सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम की सुन्दर नगरी है। वहाँ धृतिमान नामक राजा, जो चन्द्रवंश में उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते थे। उसी नगर में एक वैश्य रहता था, जो धन धान्य से परिपूर्ण और समृद्धशाली था। उसका नाम था धनपाल। वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था। भगवान विष्णु की भक्ति में उसका हार्दिक अनुराग था। वह सदा शान्त रहता था। उसके पाँच पुत्र थे : सुमना, धुतिमान, मेघावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि। धृष्टबुद्धि पाँचवाँ था। वह सदा बड़े बड़े पापों में ही संलग्न रहता था। जुए आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी। वह वेश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था। उसकी बुद्धि न तो देवताओं के पूजन में लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में। वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता था। एक दिन वह वेश्या के गले में बाँह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। तब पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बन्धु बान्धवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। अब वह दिन रात दु:ख और शोक में डूबा तथा कष्ट पर कष्ट उठाता हुआ इधर उधर भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्य के उदय होने से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पर जा पहुँचा। वैशाख का महीना था। तपोधन कौण्डिन्य गंगाजी में स्नान करके आये थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़ सामने खड़ा होकर बोला : ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’

रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करे ज्ञानचंद बूंदीवाल M.8275555557 ..For more information visit 
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कौण्डिन्य बोले : वैशाख के शुक्लपक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। ‘मोहिनी’ को उपवास करने पर प्राणियों के अनेक जन्मों के किये हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं ।’
वशिष्ठजी कहते है : श्रीरामचन्द्रजी! मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कौण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया। नृपश्रेष्ठ! इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरुढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया। इस प्रकार यह ‘मोहिनी’ का व्रत बहुत उत्तम है। इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है।’







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