Sunday, 2 November 2014

श्रीनाथजी,,,,,,मथुरा मां श्रीनाथजी, गोकुल मां श्रीनाथजी

मथुरा मां श्रीनाथजी, गोकुल मां श्रीनाथजी ।
यमुनाजी ना कांठे रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १ ।।
रंगीला श्रीनाथजी, अलबेला श्रीनाथजी ।
वल्लम कुल ना बालक बोले, रंगीला श्रीनाथजी ।। २ ।।
मधुबन मां श्रीनाथजी, कुंजन मां श्रीनाथजी ।
बृन्दावन मां रास रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ३ ।।
नन्द गाँव श्रीनाथजी, बरसाने श्रीनाथजी।
कामबन मां क्रीडा करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ४ ।।
दान गढ श्रीनाथजी, मान गढ़ श्रीनाथजी ।
साँकरी खौरे गोरस खाता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ५ ।।
संकेत मां श्रीनाथजी, वन वन मां श्रीनाथजी ।
गहवर वन मां रास रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ६ ।।
गोवर्द्धन मां श्रीनाथजी, मारग मां श्रीनाथजी ।
मानसी गंगा मां मन हर, रंगीला श्रीनाथजी ।। ७ ।।
राधा कुंड श्रीनाथजी, कृष्ण कुंड श्रीनाथजी ।
चन्द्र सरोबर चौके रमता, रंगीला श्रीनाथजी। ।। ८ ।।
वृक्ष वृक्ष श्रीनाथजी, डाल डाल श्रीनाथजी ।
पत्र पत्र पर पुष्पे रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ९ ।।
आन्योर मां श्रीनाथजी, गोविन्द कुंडे श्रीनाथजी ।
अप्सरा कुंडे आनन्द करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १० ।।
गली गली श्रीनाथजी, कुंज कुंज श्रीनाथजी।
सुरभी कुंडे स्नान करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ११ ।।
मन्दिर मां श्रीनाथजी, पर्वत पर श्रीनाथजी ।
जतीपुरा में प्रकट विराजे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १२ ।।
विलछूवन श्रीनाथजी, कुसुमोखर श्रीनाथजी ।
श्याम ढाक मां छाक अरोगे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १३ ।।
रुद्र कुंड श्रीनाथजी, हरजी कुंड श्रीनाथजी ।
कदम्ब खण्डी क्रीडा करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १४ ।।
गाम गाम श्रीनाथजी, ठाम ठाम श्रीनाथजी ।
गुलाल कुंडे होली खेलता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १५ ।।
नवल कुंडे श्रीनाथजी, रमण कुंडे श्रीनाथजी ।
वृन्दावन मां धेनु चरातां, रंगीला श्रीनाथजी ।। १६ ।।
गायों मां श्रीनाथजी, गोपों मां श्रीनाथजी ।
गोपी मध्ये वेणु बजाता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १७ ।।
वल्लभ मां श्रीनाथजी, विट्ठल मां श्रीनाथजी ।
वृजवासी ना वाला म्हारा, रंगीला श्रीनाथजी ।। १८ ।।
मेवाडे श्रीनाथजी, श्रीजी द्वार श्रीनाथजी ।
मांग मांग कर भोग अरोगे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १९ ।।
रंगीला श्रीनाथजी, अलबेला श्रीनाथजी।
वल्लभ कुलना प्यारा बोले, रंगीला श्रीनाथजी ।। २० ।।

श्री नाथजी शरणं मम्.

श्री गोवर्धन नाथ पाद युगलम यंगवीन प्रियं ।
नित्यं श्री मधुराधिपं सुखकरं श्री विट्ठलेशं मुदा ॥
श्रीमद्वारवतीश गोकुलपति श्री गोकुलेन्दं विभुं ।
श्री मन मन्मथ मोहनं नटवरं श्री बालकृष्णं भजे ॥
श्रीमद वल्लभ विट्ठ्लो गिरिधरं गोविन्दराया मिधम ।
श्रीमद बालक कृष्ण गोकुलपति नाथं रघुणाम तथा ॥
एवं श्री यदुनायकं किल घनश्यामं च तद्व शजान ।
कालिन्दिन स्व गुरुं गिरिं गुरु विभुं स्वीयत प्रभुश्च स्मरेत ॥
चिन्ता सन्तान हन्तारो यत्पादांबुज रेणवः।
स्वीयानां तान्निजार्यान प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥१॥
यदनुग्रहतो जन्तुः सर्व दुःखतिगो भवेत ।
तमहं सर्वदा वंदे श्री मद वल्लभ नन्दनम॥२॥
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानान्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवै नमः ॥३॥
नमामि हृदये शेषे लीलाक्षीराब्धिशायिनम ।
लक्ष्मी सहस्त्रलीलाभिः सेव्यमानं कलानिधिम॥४॥
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च त्रिभिस्तथा ।
षडभिर्विराजते योSसौ पंचधा हृदये ममः ॥५॥

श्री कृष्ण: शरणं मम:, श्रीकृष्ण: शरणं मम :

श्री कृष्ण: शरणं मम:, श्री कृष्ण: शरणं मम : ।
श्री कृष्ण: शरणं मम:, श्री कृष्ण: शरणं मम: ।
https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5
कदंब के री डाली बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
यमुना के री पाल बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
ब्रज चौरासी कोस बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कुन्ड कुन्ड की सीढी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कमल कमल पर मधुकर बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
डाल डाल पर पक्षी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
वृन्दावन ना वृक्षों बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
गोकुलिया नी गायां बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कुन्ज कुन्ज वन उपवन बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
बृज भूमि ना रज कण बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
रास रमत या गोपी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
श्री धेनु चराता ग्वाला बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
बाजां मा तबला मा बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
शहनाई तम्बूर में बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
नृत्य करती नारी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
केसर के री क्यारी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
आकाशे-पाताले बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
चौदह लोक ब्रह्माण्डे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
चन्द्र सरोवर चौको बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
पत्र पत्र शाखाएँ बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
आम नीम अरु जामुन बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
वनस्पति हरियाली बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
जतीपुरा ना लोग बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
मथुराजी ना चौबे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
गोवर्धन ना शिखरे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
गली गली गहवर वन बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
वेणु स्वर संगीत बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कला करंता मोर बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
पुलिन कन्दरा मधुबन बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
श्री जमुना जी रे लहेरे बोले श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
आमा डालो कोयल बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
तुलसीजी नी क्यारी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
सर्व जगत मा व्यापक बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
विरही जन ना लिया बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कृष्ण वियोगी आतुर बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
वल्लभी वैष्णव सर्वे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
मधुर वीणा वाजिन्तो बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
कुमुदिनी सरोवर मां बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
चन्द्र सूर्य आकाशे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
तारा गणना मंडल बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
अष्ट प्रहर आनन्दे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
रोम रोम व्याकुल थई बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
महामंत्र मन माहे बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
युगल चरण अनुरागी बोले – श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।
श्रीकृष्ण: शरणं मम:, श्रीकृष्ण: शरणं मम : ।
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कृष्ण: शरणं मम:, श्रीकृष्ण: शरणं मम: ।

श्रीनाथ जी प्यारे

मेरे श्रीनाथ जी प्यारे, दृगन से होजु मत नयारे
दया कर दरस मोहे दीजे, कृपा कर आपनो कीजे
गले जामा दमामी का, कमर पटका बदामी का
सुरंगी पाग सिर सोहै, लसत बनमाल मन मोहे
लगी कोई कान में दूती, तजी मोहे सहज में सूती
मेरा दिल लै गया अली, लगी तन में जो बेहाली
न भूलो देख तन गोरा, जगत में जीवणा थोड़ा
कठिन है मोह की ज्वाला, बहा जाता है संसारा
सदा बृजधीशजी गाओ, छवि पर वारने जावो ।।
मेरे श्री नाथजी

Saturday, 25 October 2014

भैया दूज या यम द्वीतिया

भैया दूज या यम द्वीतिया
भैया दूज के साथ ही होती है चित्रगुप्त पूजा
दीपावली के दूसरे दिन भाई दूज मनाया जाता है। इस दिन यमराज की बहन यमुनाजी ने अपने उन्हें तिलक करके भोजन कराया था इसलिए इस दिन को यम द्वीतिया भी कहा जाता है। इस दिन बहनें भाई के मस्तक पर टीका लगाकर उसकी लंबी उम्र की मनोकामना करती है। माना जाता है इस दिन भाई के मस्तक पर टीका लगाने झसे भाई यमराज के कष्ट से बच जाता है। कहा जाता है इस दिन भाई अपनी बहन को यमुना स्नान कराएं। इसके बाद भाई को बहन तिलक करें और भोजन कराये। जो भाई और बहन यम द्वीतिया के दिन इस प्रकार दूज पूजन के बाद तिलक की रस्म पूरी करने के बाद भोजन करते हैं वे यम भय से मुक्त जो जाते हैं, उन्हें मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।
भैया दूज की एक पौराणिक कथा है।

भगवान सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा की दो संतानें थीं। उनमें पुत्र का नाम यमराज और पुत्री का नाम यमुना था। संज्ञा अपने पति सूर्य की उद्दीप्त किरणों को सहन नहीं कर सकने के कारण अपनी ही प्रतिकृति छाया बनाकर तपस्या करने चली गयीं|तथा छाया सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा बनकर रहने लगी। इसी से ताप्ती नदी तथा शनिश्चर का जन्म हुआ। इसी छाया से सदा युवा रहने वाले अश्विनी कुमारों का भी जन्म हुआ है, जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं ।छाया का यम तथा यमुना के साथ व्यवहार में अंतर आ गया। इससे व्यथित होकर यम ने अपनी नगरी यमपुरी बसाई। यमुना अपने भाई यम को यमपुरी में पापियों को दंड देते देख दु:खी होती, इसलिए वह गोलोक चली गई।
समय व्यतीत होता रहा। तब काफी सालों के बाद अचानक एक दिन यम को अपनी बहन यमुना की याद आई। यम ने अपने दूतों को यमुना का पता लगाने के लिए भेजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। फिर यम स्वयं गोलोक गए जहां यमुनाजी की उनसे भेंट हुई। इतने दिनों बाद यमुना अपने भाई से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई।

यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती हैं। वह उनसे बराबर निवेदन करतीं कि वह उनके घर आकर भोजन करें, लेकिन यमराज अपने काम में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वीतिया को यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करने के लिए बुलाया। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया।भाई को देखते ही यमुना ने हर्षविभोर होकर भाई का स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन करवाया। इससे भाई यम ने प्रसन्न होकर बहन से वरदान मांगने के लिए कहा। तब यमुना ने वर मांगा कि- 'हे भैया, मैं चाहती हूं कि जो भी मेरे जल में स्नान करे, वह यमपुरी नहीं जाए।'

यह सुनकर यम चिंतित हो उठे और मन-ही-मन विचार करने लगे कि ऐसे वरदान से तो यमपुरी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। भाई को चिंतित देख, बहन बोली- भैया आप चिंता न करें, मुझे यह वरदान दें कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका भय न रहे। जो लोग आज के दिन बहन के यहां भोजन करें तथा मथुरा नगरी स्थित विश्रामघाट पर स्नान करें, वे यमपुरी नहीं जाएं। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को वरदान दे दिया तथा यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमपुरी चले गये। ।

बहन-भाई मिलन के इस पर्व को अब भाई-दूज के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इस दिन बहन दूज बनाकर भाई को हल्दी, अक्षत रोली का तिलक करे। तिलक करने के बाद भाई को फल, मिठाई खाने के लिए दे। भाई भी अक्षत रोली का तिलक करे। भाई भी बहन को स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा द्रव्य देकर प्रसन्न करे। बहन के चरण स्पर्श कर आशीष ले। बहन चाहे छोटी या आयु में बड़ी हो उसके चरण स्पर्श अवश्य करें। भैया दूज के ही दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। भगवान चित्रगुप्त स्वर्ग और नरक लोक का लेखा-जोखा रखते हैं। इस पूजा को कलम दवात पूजा भी कहा जाता है। चित्रवंशियों के लिये यह पूजा अति महत्वपूर्ण होती है। इस दिन लगभग सभी चित्रवंशी अपनी कलम की पूजा करते हैं
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Photo: भैया दूज या यम द्वीतिया
भैया दूज के साथ ही होती है चित्रगुप्त पूजा
दीपावली के दूसरे दिन भाई दूज मनाया जाता है। इस दिन यमराज की बहन यमुनाजी ने अपने उन्हें तिलक करके भोजन कराया था इसलिए इस दिन को यम द्वीतिया भी कहा जाता है। इस दिन बहनें भाई के मस्तक पर टीका लगाकर उसकी लंबी उम्र की मनोकामना करती है। माना जाता है इस दिन भाई के मस्तक पर टीका लगाने झसे भाई यमराज के कष्ट से बच जाता है। कहा जाता है इस दिन भाई अपनी बहन को यमुना स्नान कराएं। इसके बाद भाई को बहन तिलक करें और भोजन कराये। जो भाई और बहन यम द्वीतिया के दिन इस प्रकार दूज पूजन के बाद तिलक की रस्म पूरी करने के बाद भोजन करते हैं वे यम भय से मुक्त जो जाते हैं, उन्हें मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। 
भैया दूज की एक पौराणिक कथा है।

भगवान सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा की दो संतानें थीं। उनमें पुत्र का नाम यमराज और पुत्री का नाम यमुना था। संज्ञा अपने पति सूर्य की उद्दीप्त किरणों को सहन नहीं कर सकने के कारण अपनी ही प्रतिकृति छाया बनाकर तपस्या करने चली गयीं|तथा छाया सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा बनकर रहने लगी। इसी से ताप्ती नदी तथा शनिश्चर का जन्म हुआ। इसी छाया से सदा युवा रहने वाले अश्विनी कुमारों का भी जन्म हुआ है, जो देवताओं के वैद्य माने जाते हैं ।छाया का यम तथा यमुना के साथ व्यवहार में अंतर आ गया। इससे व्यथित होकर यम ने अपनी नगरी यमपुरी बसाई। यमुना अपने भाई यम को यमपुरी में पापियों को दंड देते देख दु:खी होती, इसलिए वह गोलोक चली गई। 
समय व्यतीत होता रहा। तब काफी सालों के बाद अचानक एक दिन यम को अपनी बहन यमुना की याद आई। यम ने अपने दूतों को यमुना का पता लगाने के लिए भेजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। फिर यम स्वयं गोलोक गए जहां यमुनाजी की उनसे भेंट हुई। इतने दिनों बाद यमुना अपने भाई से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई।

यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती हैं। वह उनसे बराबर निवेदन करतीं कि वह उनके घर आकर भोजन करें, लेकिन यमराज अपने काम में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वीतिया को यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करने के लिए बुलाया। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया।भाई को देखते ही यमुना ने हर्षविभोर होकर भाई का स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन करवाया। इससे भाई यम ने प्रसन्न होकर बहन से वरदान मांगने के लिए कहा। तब यमुना ने वर मांगा कि- 'हे भैया, मैं चाहती हूं कि जो भी मेरे जल में स्नान करे, वह यमपुरी नहीं जाए।' 

यह सुनकर यम चिंतित हो उठे और मन-ही-मन विचार करने लगे कि ऐसे वरदान से तो यमपुरी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। भाई को चिंतित देख, बहन बोली- भैया आप चिंता न करें, मुझे यह वरदान दें कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका भय न रहे। जो लोग आज के दिन बहन के यहां भोजन करें तथा मथुरा नगरी स्थित विश्रामघाट पर स्नान करें, वे यमपुरी नहीं जाएं। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को वरदान दे दिया तथा यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमपुरी चले गये। । 

बहन-भाई मिलन के इस पर्व को अब भाई-दूज के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इस दिन बहन दूज बनाकर भाई को हल्दी, अक्षत रोली का तिलक करे। तिलक करने के बाद भाई को फल, मिठाई खाने के लिए दे। भाई भी अक्षत रोली का तिलक करे। भाई भी बहन को स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा द्रव्य देकर प्रसन्न करे। बहन के चरण स्पर्श कर आशीष ले। बहन चाहे छोटी या आयु में बड़ी हो उसके चरण स्पर्श अवश्य करें। भैया दूज के ही दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। भगवान चित्रगुप्त स्वर्ग और नरक लोक का लेखा-जोखा रखते हैं। इस पूजा को कलम दवात पूजा भी कहा जाता है। चित्रवंशियों के लिये यह पूजा अति महत्वपूर्ण होती है। इस दिन लगभग सभी चित्रवंशी अपनी कलम की पूजा करते हैं

Wednesday, 22 October 2014

रूप चौदस,,दीपावली को एक दिन का पर्व


रूप चौदस,,दीपावली को एक दिन का पर्व  दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। इस पर्व का जो महत्व है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है।

दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।
इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारात सजाई जाती है।

इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए।
यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है।

यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा।

तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Photo: रूप चौदस,,दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्योचित नहीं होगा। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। 

इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। इस पर्व का जो महत्व है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है। 

दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।
इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारात सजाई जाती है। 

इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए। 
यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है।

यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक बार एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था,यह उसी पापकर्म का फल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय पूछा। 

तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय

पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय
. दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या का दिन दीपावली के रूप में पूरे देश में बडी धूम-धाम से मनाया जाता हैं
मखाना का भोग

लक्ष्मी मैया को मखाना प्रिय है। इसका कारण यह है कि लक्ष्मी माता जल से प्रकट हुई हैं। मखाना भी जल में पलता बढ़ता है, यानि जल से जन्म लेता है। सागर को मथने के बाद जैसे लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं उसी प्रकार मखाना भी जल में एक कठोर आवरण में ढ़का रहता है।

पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
मखाने की तरह जल सिंघारा भी पानी के अंदर फलता है। अक्टूबर नवंबर में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान यह बाजार में खूब मिलता है। जल से उत्पन्न होने के कारण यह भी लक्ष्मी मैया को बहुत पसंद है। शास्त्रों में कहा गया है कि देवी-देवताओं को मौसमी फल प्रिय होता है। इसलिए जिस मौसम में जिस देवी देवता की पूजा हो।

उस मौसम का फल देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए। दीपावली के मौसम में जल सिंघरा मौसमी फल होता है इसलिए भी यह देवी लक्ष्मी का प्रिय है।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है

श्रीफल दे उत्तम फल
शास्त्रों में नारियल को श्रीफल कहा गया है। देवी लक्ष्मी का एक नाम 'श्री' भी है। लक्ष्मी माता का प्रिय फल होने के कारण ही नारियल को श्रीफल कहा गया है। मखाने की तरह यह भी कठोर आवरण से ढंका रहता है। जिससे यह शुद्ध और पवित्र रहता है। लक्ष्मी मैया को नारियल का लड्डू, कच्चा नारियल एवं जल से भरा नारियल अर्पित करने वाले पर माता प्रसन्न होती हैं।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
बताशे से करें लक्ष्मी मां का मुंह मीठा
जिस प्रकार गणेश जी को मोदक प्रिय है उसी प्रकार लक्ष्मी माता को बताशे पसंद है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मखाना, जल सिंघार और बताशे ये तीनों ही चन्द्रमा से संबंधित वस्तुएं हैं। चन्द्रमा जल का कारक है।

चन्द्रमा को देवी लक्ष्मी का भाई भी माना जाता है। चन्द्र से संबंध होने के कारण बताशे माता को प्रिय हैं। यही कारण है कि दीपावली में बताशे लक्ष्मी माता को अर्पित किए जाते हैं।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
पान की लाली मां को भाये

दुर्गा सप्तशती में के तीसरे अध्याय में महिषासुर वध की कथा है। महिषासुर से युद्ध करते हुए देवी थक जाती हैं। थकान दूर करने के लिए माता मधु से भरा पान खाती हैं। इसके बाद माता कहती हैं कि महिषासुर क्षण भर गरज ले, अभी युद्ध में मैं तुम्हारा वध करुंगी। इतना कहते ही माता महिषासुर पर आक्रमण कर देती है और महिषासुर शीघ्र ही माता के हाथों मारा जाता है।

महिषासुर का वध करने वाली देवी महालक्ष्मी को माना जाता है। माता को पान बहुत पसंद है। मधु यानी शहद से भरा पान खाने के बाद जब होंठों पर पान की लाली आ जाती है तो इसे देखकर देवी आनंदित होती है। इसलिए पूजा के बाद सबसे अंत में देवी को पान अवश्य भेंट करना चाहिए।
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Photo: पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय 
. दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या का दिन दीपावली के रूप में पूरे देश में बडी धूम-धाम से मनाया जाता हैं
मखाना का भोग

लक्ष्मी मैया को मखाना प्रिय है। इसका कारण यह है कि लक्ष्मी माता जल से प्रकट हुई हैं। मखाना भी जल में पलता बढ़ता है, यानि जल से जन्म लेता है। सागर को मथने के बाद जैसे लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं उसी प्रकार मखाना भी जल में एक कठोर आवरण में ढ़का रहता है।

पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
मखाने की तरह जल सिंघारा भी पानी के अंदर फलता है। अक्टूबर नवंबर में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान यह बाजार में खूब मिलता है। जल से उत्पन्न होने के कारण यह भी लक्ष्मी मैया को बहुत पसंद है। शास्त्रों में कहा गया है कि देवी-देवताओं को मौसमी फल प्रिय होता है। इसलिए जिस मौसम में जिस देवी देवता की पूजा हो।

उस मौसम का फल देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए। दीपावली के मौसम में जल सिंघरा मौसमी फल होता है इसलिए भी यह देवी लक्ष्मी का प्रिय है।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है

श्रीफल दे उत्तम फल
शास्त्रों में नारियल को श्रीफल कहा गया है। देवी लक्ष्मी का एक नाम 'श्री' भी है। लक्ष्मी माता का प्रिय फल होने के कारण ही नारियल को श्रीफल कहा गया है। मखाने की तरह यह भी कठोर आवरण से ढंका रहता है। जिससे यह शुद्ध और पवित्र रहता है। लक्ष्मी मैया को नारियल का लड्डू, कच्चा नारियल एवं जल से भरा नारियल अर्पित करने वाले पर माता प्रसन्न होती हैं।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
बताशे से करें लक्ष्मी मां का मुंह मीठा
जिस प्रकार गणेश जी को मोदक प्रिय है उसी प्रकार लक्ष्मी माता को बताशे पसंद है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मखाना, जल सिंघार और बताशे ये तीनों ही चन्द्रमा से संबंधित वस्तुएं हैं। चन्द्रमा जल का कारक है।

चन्द्रमा को देवी लक्ष्मी का भाई भी माना जाता है। चन्द्र से संबंध होने के कारण बताशे माता को प्रिय हैं। यही कारण है कि दीपावली में बताशे लक्ष्मी माता को अर्पित किए जाते हैं।
पांच प्रसाद जो लक्ष्मी माता को सबसे अधिक प्रिय है
पान की लाली मां को भाये

दुर्गा सप्तशती में के तीसरे अध्याय में महिषासुर वध की कथा है। महिषासुर से युद्ध करते हुए देवी थक जाती हैं। थकान दूर करने के लिए माता मधु से भरा पान खाती हैं। इसके बाद माता कहती हैं कि महिषासुर क्षण भर गरज ले, अभी युद्ध में मैं तुम्हारा वध करुंगी। इतना कहते ही माता महिषासुर पर आक्रमण कर देती है और महिषासुर शीघ्र ही माता के हाथों मारा जाता है।

महिषासुर का वध करने वाली देवी महालक्ष्मी को माना जाता है। माता को पान बहुत पसंद है। मधु यानी शहद से भरा पान खाने के बाद जब होंठों पर पान की लाली आ जाती है तो इसे देखकर देवी आनंदित होती है। इसलिए पूजा के बाद सबसे अंत में देवी को पान अवश्य भेंट करना चाहिए।

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