Sunday, 17 January 2016

गुरु गोबिंद सिंह जी को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है.

 गुरु गोबिंद सिंह जी को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है. को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है.
सवा लाख से एक लड़ाऊँ चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ”
गुरु गोविंद साहब को सिखों का अहम गुरु माना जाता है. उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहादुरी थी. उनके लिए यह शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं “सवा लाख से एक लड़ाऊँ.” उनके अनुसार शक्ति और वीरत के संदर्भ में उनका एक सिख सवा लाख लोगों के बराबर है
गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: २२ दिसम्बर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) सिखों के दसवें गुरु थे। उनका जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।
उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम,उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।
गुरु गोबिंद साहिब,,,श्री गुरु गो‍बिंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरू हैं. इनका जन्म पौष सुदी 7वीं सन 1666 को पटना में माता गुजरी जी तथा पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी के घर हुआ. उस समय गुरु तेगबहादुर जी बंगाल में थे. उन्हीं के वचनानुसार बालक का नाम गोविंद राय रखा गया और सन 1699 को बैसाखी वाले दिन गुरुजी पंज प्यारों से अमृत छक कर गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह जी बन गए. इनका बचपन बिहार के पटना में ही बीता. जब 1675 में श्री गुरु तेगबहादुर जी दिल्ली में हिंन्दु धर्म की रक्षा के लिए शहीद हुए तब गुरु गोबिंद साहब जी गुरु गद्दी पर विराजमान हुए
खालसा पंथ की स्थापना
गुरु गोबिंद सिंह जी ने ही 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की. ख़ालसा यानि ख़ालिस (शुद्ध) जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो. पांच प्यारे बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं-जहां पाँच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं निवास करूंगा. उन्होंने सभी जातियों के भेद-भाव को समाप्त करके समानता स्थापित की और उनमें आत्म-सम्मान की भावना भी पैदा की. गोबिंद सिंह जी ने एक नया नारा दिया था वाहे गुरु जी का ख़ालसा, वाहे गुरु जी की फतेह. दमदमा साहिब में आपने अपनी याद शक्ति और ब्रह्मबल से श्री गुरुग्रंथ साहिब का उच्चारण किया और लिखारी (लेखक) भाई मनी सिंह जी ने गुरुबाणी को लिखा.
पांच ककार,,,,युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पांच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है:-
(1) केश: जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे.
(2) कंघा: केशों को साफ करने के लिए लकड़ी का कंघा.
(3) कच्छा: स्फूर्ति के लिए.
(4) कड़ा: नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए.
(5) कृपाण: आत्मरक्षा के लिए.
वीरता और धैर्यशीलता की मिसाल
गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी जिंदगी में वह सब देखा था जिसे देखने के बाद शायद एक आम मनुष्य अपने मार्ग से भटक या डगमगा जाए लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. परदादा गुरु अर्जुनदेव की शहादत, दादा गुरु हरगोविंद द्वारा किए गए युद्ध, पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, चार में से बड़े दो पुत्रों (साहिबजादा आजीत सिंह एवं साहिबजादा जुझार सिंह) का चमकौर के युद्ध में शहीद होना और छोटे दो पुत्रों (साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह) को जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाना, वीरता व बलिदान की विलक्षण मिसालें हैं. इस सारे घटनाक्रम में भी अड़िग रहकर गुरुगोबिंद सिंह संघर्षरत रहे, यह कोई सामान्य बात नहीं है
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ, अलख अभेऊ, सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां, गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नहीं मैं ठाऊँ, अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान, गुरु हिरदय ध्यान, गुरु गोपाल पुरख भगवान
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-2 आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े, गुरु बिना मैं नहीं होर
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार, गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा, गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी, गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

Thursday, 14 January 2016

जय माँ कालका भवानी ॐ क्रीं काल्यै नमः

जय माँ कालका भवानी ॐ क्रीं काल्यै नमः 
ॐ काली महाकाली कालिके परमेश्वरी । 
सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।। 
जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥
जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥
जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4
जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥
एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥
जय माँ कालका भगवती दया करो सब कृपा करो माँ जगत जननी

कनकधारा स्तोत्र ,, हिन्दी पाठ

कनकधारा स्तोत्र ,, हिन्दी पाठ .,,, अंग हरे पुलकभूषणमाश्रयंती , भृंगागनेव मुकुलाभरणं तमालम |
अंगीकृताखिलविभूतिर पांग लीला, मांगल्यदास्तु मम मंगदेवताया || 1 ||
मुग्धा मुहुर्विदधाति वदने मुरारेः , प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि |
माला दुशोर्मधुकरीय महोत्पले या, सा में श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः || 2 ||
विश्वासमरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष , मानन्दहेतुरधिकं मधुविद्विषो पि |
इषन्निषीदतु मयी क्षणमीक्षर्णा, मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः || 3 ||
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द, मानन्दकन्मनिमेषमनंगतन्त्रम |
आकेकरस्थितिकनीकिमपक्ष्म नेत्रं, भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनायाः || 4 ||
बाह्यंतरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या, हारावलीव हरीनिलमयी विभाति |
कामप्रदा भागवतोपी कटाक्ष माला, कल्याणमावहतु मे कमलालायायाः || 5 ||
कालाम्बुदालितलिसोरसी कैटमारे, धरिधरे स्फुरति या तु तडंग दन्यै |
मातुः समस्तजगताम महनीयमूर्ति , र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः || 6 ||
प्राप्तम पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान, मांगल्यभाजि मधुमाथिनी मन्मथेन |
मययापतेत्तदिह मन्थन मीक्षर्णा, मन्दालसम च मकरालयकन्यकायाः || 7 ||
दाद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा, मस्मिन्न वि किंधनविहंगशिशौ विपाणे |
दुष्कर्मधर्म मापनीय चिराय दूरं, नारायणप्रगणयिनीनयनाम्बुवाहः || 8 ||
इष्ट विशिष्टमतयोपी यया दयार्द्र, दुष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लर्भते |
दृष्टिः प्रहष्टकमलोदरदीप्तिरीष्टां, पुष्टि कृपीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः || 9 ||
गीर्तेवतेती गरुड़ध्वजभामिनीति, शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति |
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै, तस्यै नमास्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुन्यै || 10 ||
क्ष्फत्यै नमोस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै, रत्यै नमोस्तु रमणीयगुणार्णवायै |
शक्त्यै नमोस्तु शतपनिकेतनायै, पुष्ट्यै नमोस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै || 11 ||
नमोस्तु नालीकनिभान्नायै, नमोस्तु दुग्धोदधिजन्म भूत्यै |
नमोस्तु सोमामृतसोदरायै , नमोस्तु नारायणवल्लभायै || 12 ||
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि, साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि |
त्वद्वन्द्वनानि दुरिताहरणोद्यतानी , मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यम || 13 ||
यत्कटाक्ष समुपासनाविधिः, सेवकस्य सकलार्थ सम्पदः |
संतनोति वचनांगमान, सैस्त्वां मुरारीहृदयेश्वरीं भजे || 14 ||
सरसीजनिलये सरोजहस्ते, धवलतमांशु -कगंधमाल्य शोभे |
भगवती हरिवल्लभे मनोज्ञे, त्रिभुवन भूतिकरि प्रसीद मह्यं || 15 ||
दिग्धस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट, स्वर्वाहिनीतिमलाचरूजलप्तुतांगम |
प्रातर्नमामि जगताम जननीमशेष, लोकाधिनाथ गृहिणीम मृताब्धिपुत्रिम || 16 ||
कमले कमलाक्षवल्लभे, त्वम्, करुणापूरतरंगितैपरपाडयै |
अवलोकय ममाकिंचनानां, प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः || 17 ||
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमू भिरन्वहं, त्रयोमयीं त्रिभुवनमातरम रमाम |
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभामिनी, भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः || 18 ||
जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।
जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।
जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।
शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।
जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सीसुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।।5।।
* जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।।6।
* समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े।।7।।
* भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।।8।। 
* विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें।।9।।
* जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।
* मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।
* कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।। 
* कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे)।।13।।
* जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।। 
* भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।। ,,,,,,रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks
* दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं।।16।। 
* कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! 
मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।।17।।
* जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।



Friday, 20 November 2015

देवउठनी एकादशी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है

देवउठनी एकादशी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे देवोत्थान एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं कैसे करें भगवान विष्णु का व्रत-पूजन
देवउठनी एकादशी के दिन व्रत करने वाली महिलाएं प्रातःकाल में स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक बनाएं।
  पश्चात भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें।
  फिर दिन की तेज धूप में विष्णु के चरणों को ढंक दें।
  देवउठनी एकादशी को रात्रि के समय सुभाषित स्त्रोत पाठ, भगवत कथा और पुराणादि का श्रवण और भजन आदि का गायन करें।
  घंटा, शंख, मृदंग, नगाड़े और वीणा बजाएं।
 विविध प्रकार के खेल-कूद, लीला और नाच आदि के साथ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान को जगाएं : -
 उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥''उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥''शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।'
 इसके बाद विधिवत पूजा करें।
पूजन के लिए भगवान का मन्दिर अथवा सिंहासन को विभिन्न प्रकार के लता पत्र, फल, पुष्प और वंदनबार आदि से सजाएं।
 आंगन में देवोत्थान का चित्र बनाएं, तत्पश्चात फल, पकवान, सिंघाड़े, गन्ने आदि चढ़ाकर डलिया से ढंक दें तथा दीपक जलाएं।
  विष्णु पूजा या पंचदेव पूजा विधान अथवा रामार्चनचन्द्रिका आदि के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूजन तथा दीपक, कपूर आदि से आरती करें।
  इसके बाद इस मंत्र से पुष्पांजलि अर्पित करें : -
'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन।
तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्तिदेवाः॥'
 पश्चात इस मंत्र से प्रार्थना करें ,,,,,, इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता। त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थ शेषशायिना॥'
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो।  न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥'
साथ ही प्रह्लाद, नारद, पाराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष,शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत, पंचामृत व प्रसाद वितरित करें। तत्पश्चात एक रथ में भगवान को विराजमान कर स्वयं उसे खींचें तथा नगर, ग्राम या गलियों में भ्रमण कराएं।
'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557. Gems For Everyone,
शास्त्रानुसार जिस समय वामन भगवान तीन पद भूमि लेकर विदा हुए थे, उस समय दैत्यराज बलि ने वामनजी को रथ में विराजमान कर स्वयं उसे चलाया था। ऐसा करने से 'समुत्थिते ततो विष्णौ क्रियाः सर्वाः प्रवर्तयेत्‌' के अनुसार भगवान विष्णु योग निद्रा को त्याग कर सभी प्रकार की क्रिया करने में प्रवृत्त हो जाते हैं   अंत में कथा श्रवण कर प्रसाद का वितरण करें।

देवउठनी एकादशी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है

देवउठनी एकादशी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे देवोत्थान एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं कैसे करें भगवान विष्णु का व्रत-पूजन
देवउठनी एकादशी के दिन व्रत करने वाली महिलाएं प्रातःकाल में स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन में चौक बनाएं।
  पश्चात भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करें।
  फिर दिन की तेज धूप में विष्णु के चरणों को ढंक दें।
  देवउठनी एकादशी को रात्रि के समय सुभाषित स्त्रोत पाठ, भगवत कथा और पुराणादि का श्रवण और भजन आदि का गायन करें।
  घंटा, शंख, मृदंग, नगाड़े और वीणा बजाएं।
 विविध प्रकार के खेल-कूद, लीला और नाच आदि के साथ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान को जगाएं : -
 उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥''उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥''शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।'
 इसके बाद विधिवत पूजा करें।
पूजन के लिए भगवान का मन्दिर अथवा सिंहासन को विभिन्न प्रकार के लता पत्र, फल, पुष्प और वंदनबार आदि से सजाएं।
 आंगन में देवोत्थान का चित्र बनाएं, तत्पश्चात फल, पकवान, सिंघाड़े, गन्ने आदि चढ़ाकर डलिया से ढंक दें तथा दीपक जलाएं।
  विष्णु पूजा या पंचदेव पूजा विधान अथवा रामार्चनचन्द्रिका आदि के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूजन तथा दीपक, कपूर आदि से आरती करें।
  इसके बाद इस मंत्र से पुष्पांजलि अर्पित करें : -
'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन।
तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्तिदेवाः॥'
 पश्चात इस मंत्र से प्रार्थना करें ,,,,,, इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता। त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थ शेषशायिना॥'
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो।  न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥'
साथ ही प्रह्लाद, नारद, पाराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष,शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत, पंचामृत व प्रसाद वितरित करें। तत्पश्चात एक रथ में भगवान को विराजमान कर स्वयं उसे खींचें तथा नगर, ग्राम या गलियों में भ्रमण कराएं।
'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557. Gems For Everyone,
शास्त्रानुसार जिस समय वामन भगवान तीन पद भूमि लेकर विदा हुए थे, उस समय दैत्यराज बलि ने वामनजी को रथ में विराजमान कर स्वयं उसे चलाया था। ऐसा करने से 'समुत्थिते ततो विष्णौ क्रियाः सर्वाः प्रवर्तयेत्‌' के अनुसार भगवान विष्णु योग निद्रा को त्याग कर सभी प्रकार की क्रिया करने में प्रवृत्त हो जाते हैं   अंत में कथा श्रवण कर प्रसाद का वितरण करें।

श्री राम १०८ नामावली

श्री राम १०८ नामावली 1 ॐ राम रामाय नमह:
2 ॐ राम भद्राया नमह: 
3 ॐ राम चंद्राय नमह: 
4 ॐ राम शाश्वताया नमह: 
5 ॐ राजीवलोचनाय नमह: 
6 ॐ वेदात्मने नमह: 
7 ॐ भवरोगस्या भेश्हजाया नमह: 
8 ॐ दुउश्हना त्रिशिरो हंत्रे नमह: 
9 ॐ त्रिमुर्तये नमह: 
10 ॐ त्रिगुनात्मकाया नमह: 
11 ॐ श्रीमते नमह: 
12 ॐ राजेंद्राय नमह: 
13 ॐ रघुपुंगवाय नमह: 
14 ॐ जानकिइवल्लभाय नमह: 
15 ॐ जैत्राय नमह: 
16 ॐ जितामित्राय नमह: 
17 ॐ जनार्दनाय नमह: 
18 ॐ विश्वमित्रप्रियाय नमह: 
19 ॐ दांताय नमह: 
20 ॐ शरणात्राण तत्पराया नमह: 
21 ॐ वालिप्रमाथानाया नमह: 
22 ॐ वाग्मिने नमह: 
23 ॐ सत्यवाचे नमह: 
24 ॐ सत्यविक्रमाय नमह: 
25 ॐ सत्यव्रताय नमह: 
26 ॐ व्रतधाराय नमह: 
27 ॐ सदाहनुमदाश्रिताय नमह: 
28 ॐ कौसलेयाय नमह: 
29 ॐ खरध्वा.सिने नमह: 
30 ॐ विराधवाधपन दिताया नमह: 
31 ॐ विभीषना परित्रात्रे नमह: 
32 ॐ हरकोदांद खान्दनाय नमह: 
33 ॐ सप्तताला प्रभेत्त्रे नमह: 
34 ॐ दशग्रिइवा शिरोहराया नमह: 
35 ॐ जामद्ग्ंया महादर्पदालनाय नमह: 
36 ॐ तातकांतकाय नमह: 
37 ॐ वेदांतसाराय नमह: 
38 ॐ त्रिविक्रमाय नमह: 
39 ॐ त्रिलोकात्मने नमह: 
40 ॐ पुंयचारित्रकिइर्तनाया नमह: 
41 ॐ त्रिलोकरक्षकाया नमह: 
42 ॐ धंविने नमह: 
43 ॐ दंदकारंय पुण्यक्रिते नमह: 
44 ॐ अहल्या शाप शमनाय नमह: 
45 ॐ पित्रै भक्ताया नमह: 
46 ॐ वरप्रदाय नमह: 
47 ॐ राम जितेंद्रियाया नमह: 
48 ॐ राम जितक्रोधाय नमह: 
49 ॐ राम जितामित्राय नमह: 
50 ॐ राम जगद्गुरवे नमह: 
51 ॐ राम राक्षवानरा संगथिने नमह: 
52 ॐ चित्रकुउता समाश्रयाया नमह: 
53 ॐ राम जयंतत्रनवरदया नमह: 
54 ॐ सुमित्रापुत्र सेविताया नमह: 
55 ॐ सर्वदेवादि देवाय नमह: 
56 ॐ राम मृतवानर्जीवनया नमह: 
57 ॐ राम मायामारिइचहंत्रे नमह: 
58 ॐ महादेवाय नमह: 
59 ॐ महाभुजाय नमह: 
60 ॐ सर्वदेवस्तुताय नमह: 
61 ॐ सौम्याय नमह: 
62 ॐ ब्रह्मंयाया नमह: 
63 ॐ मुनिसंसुतसंस्तुतया नमह: 
64 ॐ महा योगिने नमह: 
65 ॐ महोदराया नमह: 
66 ॐ सच्चिदानंद विग्रिहाया नमह: 
67 ॐ परस्मै ज्योतिश्हे नमह: 
68 ॐ परस्मै धाम्ने नमह: 
69 ॐ पराकाशाया नमह: 
70 ॐ परात्पराया नमह: 
71 ॐ परेशाया नमह: 
72 ॐ पारगाया नमह: 
73 ॐ पाराया नमह: 
74 ॐ सर्वदेवात्मकाया परस्मै नमह: 
75 ॐ सुग्रिइवेप्सिता राज्यदाया नमह: 
76 ॐ सर्वपुंयाधिका फलाया नमह: 
77 ॐ स्म्रैता सर्वाघा नाशनाया नमह: 
78 ॐ आदिपुरुष्हाय नमह: 
79 ॐ परमपुरुष्हाय नमह: 
80 ॐ महापुरुष्हाय नमह: 
81 ॐ पुंयोदयाया नमह: 
82 ॐ अयासाराया नमह: 
83 ॐ पुरान पुरुशोत्तमाया नमह: 
84 ॐ स्मितवक्त्राया नमह: 
85 ॐ मितभाश्हिने नमह: 
86 ॐ पुउर्वभाश्हिने नमह: 
87 ॐ राघवाया नमह: 88 ॐ अनंतगुना गम्भिइराया नमह: 
89 ॐ धिइरोत्तगुनोत्तमाया नमह: 
90 ॐ मायामानुश्हा चरित्राया नमह: 
91 ॐ महादेवादिपुउजिताया नमह: 
92 ॐ राम सेतुक्रूते नमह: 
93 ॐ जितवाराशये नमह: 
94 ॐ सर्वतिइर्थमयाया नमह: 
95 ॐ हरये नमह: 
96 ॐ श्यामानगाया नमह: 
97 ॐ सुंदराया नमह: 
98 ॐ शुउराया नमह: 
99 ॐ पितवाससे नमह: 
ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,Gems For Everyone,
100 ॐ धनुर्धराया नमह: 
101 ॐ सर्वयज्ञाधिपाया नमह:  102 ॐ यज्वने नमह: 103 ॐ जरामरनवर्जिताया नमह: 
104 ॐ विभिषनप्रतिश्थात्रे नमह: 
105 ॐ सर्वावगुनवर्जिताया नमह: 
106 ॐ परमात्मने नमह: 
107 ॐ परस्मै ब्रह्मने नमह: 
108

Wednesday, 18 November 2015

गोपाष्टमी कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी को



गोपाष्टमी कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी को यह
मानुष हों तो वही 'रसखानि', बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन
जो 'पसु' हौं तो कहा बस मेरो, चरों नित नन्द की 'धेनु' मंझारन।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गौ चारण लीला शुरू की थी। इस दिन प्रातः काल में उठकर नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान आदि करते हैं। गोपाष्टमी हमारे निजी सुख और वैभव में हिस्सेदार होने वाले गौवंश का सत्कार है। द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था तभी से इस महोत्सव को मनाने की परम्परा शुरु हुई।
श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा करने और अपने भक्तों को दिए वचन को पूरा करने के लिए धरती पर अवतार लेकर गिरिराज गोवर्धन का मान बढ़ाने गोसंवर्धन के लिए ही यह लीला की।
प्राचीनकाल से ही ब्रज क्षेत्र में देवाधिदेव इन्द्र की पूजा की जाती थी। लोगों की मान्यता थी कि इन्द्र समस्त मानव जाति, प्राणियों, जीव जंतुओं को जीवन दान देते हैं और उन्हें तृप्त करने के लिए वर्षा भी करते हैं। इन्द्र को इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि लोग उनसे बहुत अधिक डरने लगे हैं।
श्री कृष्ण भगवान ने नंद बाबा को कहा कि वन और पर्वत हमारे घर हैं। गिरि राज गोवर्धन की छत्रछाया में उनका पशुधन चरता है उनसे सभी को वनस्पतियां और छाया मिलती है। गोवर्धन महाराज सभी के देव, हमारे कुलदेवता और रक्षक हैं, इसलिए सभी को गिरिराज गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए।
नंद बाबा की आज्ञा से सभी ने जो सामान इन्द्र देव की पूजा के लिए तैयार किया था उसी से गिरिराज गोवर्धन की पूजा की। भगवान की यह अद्भुत लीला तो देखते ही बनती थी क्योंकि एक ओर तो वह ग्वाल बालों के साथ थे तथा दूसरी ओर साक्षात गिरिराज के रूप में भोग ग्रहण कर रहे थे। सभी ने बड़े आनंद से गिरिराज भगवान का प्रसाद खाया और जो बचा उसे सभी मेें बांटा। इन्द्र को पता चला तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने गोकुल पर इतनी वर्षा की कि चारों तरफ जल थल हो गया। भगवान श्री कृष्ण ने तब गिरिराज पर्वत को अंगुली पर उठाकर सभी गोकुलवासियों की वर्षा से रक्षा की। जब इन्द्र को वास्तविकता का पता चला तो उन्होंने भगवान से क्षमा याचना की। तभी से कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का उत्सव मनाया जा रहा है।
कार्तिक मास में आने वाला यह महोत्सव अति उत्तम फलदायक है। जो लोग नियम से कार्तिक स्नान करते हुए जप, होम, अर्चन का फल पाना चाहते हैं उन्हेें गोपाष्टमी पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन गाय, बैल और बछड़ों को स्नान करवा कर उन्हें सुन्दर आभूषण पहनाएं। यदि आभूषण सम्भव न हो तो उनके सींगों को रंग से सजाएं अथवा उन्हें पीले फूलों की माला से सजाएं। उन्हें हरा चारा और गुड़ खिलाना चाहिए। उनकी आरती करते हुए उनके पैर छूने चाहिएं। गौशाला के लिए दान दें। गोधन की परिक्रमा करना अति उत्तम कर्म है। गोपाष्टमी को गऊ पूजा के साथ गऊओं के रक्षक 'ग्वाले या गोप' को भी तिलक लगा कर उन्हें मीठा खिलाएं। ज्योतिषियों के अनुसार गोपाष्टमी पर पूजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं, उपासक को धन और सुख-समृ्द्धि की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में लक्ष्मी का वास होता है। ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,Gems For Everyone अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन नन्द बाबा ने श्रीकृष्ण को स्वतन्त्र रूप से गायों को वन में ले जाकर चराने की स्वीकृति दी थी।  

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