Thursday, 18 February 2016

ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंह करुणारस स्तोत्रम्

ॐ श्री लक्ष्मी नृसिंह करुणारस स्तोत्रम् ॥

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते ।
(पाठभेद- भोगीन्द्रभोगमणिरञ्जित पुण्यमूर्ते)
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १॥

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २॥

संसारदावदहनाकरभीकरोरु-
(पाठभेद-संसारदावदहनातुरभीकरोरु-)
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य
(पाठभेद- त्वत्पादपद्मसरसीं शरणागतस्य)
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ३॥

संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य ।
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ४॥

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ५॥

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश ।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ६॥

संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ७॥

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ८॥

संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ९॥

संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् ।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १०॥

संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य ।
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ११॥

बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १२॥

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १३॥

एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥

(पाठभेद-देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम्)॥।१४॥

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १५॥

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।
भक्तानुरुक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १६॥

लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥ १७॥

(पाठभेद- यन्माययोर्जितवपुःप्रचुरप्रवाह-
मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् । ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥ १७॥)
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
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लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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ॐ श्री लक्ष्मी नरसिंह

ॐ श्री लक्ष्मी नरसिंह सुप्रभातस्तोत्रम् (यादगिरि) ॥
। श्री यादगिरि लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम्
श्री वङ्गीपुरम् नरसिंहाचार्यरचित ।
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल! कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥ १॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गळं कुरु ॥ २॥
यादाद्रिनाथशुभमन्दिरकल्पवल्लि
पद्मालये जननि पद्मभवादिवन्द्ये ।
भक्तार्तिभञ्जनि दयामयदिव्यरूपे
लक्ष्मीनृसिंहदयिते तव सुप्रभातम् ॥ ३॥
ज्वालानृसिंह करुणामय दिव्यमूर्ते
योगाभिनन्दन नृसिंह दयासमुद्र! ।
लक्ष्मीनृसिंह शरणागतपारिजात
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ४॥
श्रीरङ्गवेङ्कटमहीधरहस्तिशैल
श्री यादवाद्रिमुखसत्त्वनिकेतनानि ।
स्थानानि तेकिल वदन्ति परावरज्ञाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ५॥
ब्रह्मादयस्सुरवर मुनिपुङ्गवाश्च
त्वां सेवितुं विविधमङ्गळवस्तुहस्ताः ।
द्वारे वसन्ति नरसिंह भवाब्धिपोत
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ६॥

प्रह्लाद नारद पराशर पुण्डरीक
व्यासादिभक्तरसिका भवदीयसेवाम् ।
वाञ्छन्त्यनन्यहृदया करुणासमुद्र
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ७॥

त्वद्दास्यभोगरसिकाश्शठजिन्मुखार्याः
रामानुजादिमहनीयगुरुप्रधानाः ।
सेवार्थ मत्र भवदीयगृहाङ्गणस्थाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ८॥

भक्ता स्त्वदीयपदपङ्कजसक्तचित्ताः
काल्यं विधाय तवकन्दर मन्दिराग्रे ।
त्वद्दर्शनोत्सुकतया निबिडं श्रयन्ते
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ९॥

दिव्यावतारदशके नरसिंह ते तु
दिव्यावतारमहिमा नहि देवगम्यः ।
प्रह्लाददानवशिशोःकिल भक्तिगम्यः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १०॥

श्रीयादवाद्रिशिखरे त्वमहोबिलेऽपि
सिंहाचले च शुभमङ्गळशैलराजे ।
वेदाचलादि गिरि मूर्धसु सुस्थितोसि
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ११॥

काम्यार्थिनो वरदकल्पक कल्पकं त्वां
सेवार्थिनः स्सुजनसेव्यपदद्वयं त्वाम् ।
भक्त्या विनम्र शिरसा प्रणमन्ति सर्वे
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १२॥

त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्ति पापाः
त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्ति दैत्याः ।
त्वन्नाममन्त्रपठनेन लुठन्तिरोगाः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १३॥

लक्ष्मीनृसिंह! जगदीश! सुरेश! विष्णो
जिष्णो! जनार्दन! परात्पर विश्वरूप ।
विश्वप्रभातकरणाय कृतावतार
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १४॥

त्वन्नाममन्त्र पठनंकिलसुप्रभातं
अस्माकमस्तु तवचास्तु च सुप्रभातम् ।
अस्मत्समुद्धरणमेव विचित्रगाध
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १५॥

त्वत् पूजका परिव्रुढा परिचारकाश्च
नित्यार्चनाय विधिवद्विहित स्वक्रुत्याः ।
यत्तस्त्वदीय शुभगह्वर मन्दिराग्रे
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १६॥

प्राभातकीमुपचितिम् परिकल्पयन्तः
कुण्डाश्च पूर्णजलकुम्भमुपाहरन्तः ।
श्रीवैष्णवाः समुपयान्तिहरे! नृसिंह
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १७॥

सूर्योऽभ्युदेति विकसन्ति सरोरुहाणि
नीलोत्पलानि हि भवन्ति निमीलितानि ।
प्राग्दिङ्मुखेरुणगभस्तिगणोऽभ्युदेति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १८॥

मन्दानिलस्सुर नदीकमलोदरेशु
मन्दंविगाह्य शुभसौरभ मादधानः ।
हर्षप्रकर्षमुपयाति च सेवितुं त्वां
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ १९॥

तारागणोवियति मज्जति सुप्रभाते
सूर्येणसाकमवलोकयितुं त्वदीयम् ।
श्रीसुप्रभातमवभासित सर्वलोकं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २०॥

पक्षिस्वनाश्चपरितःपरिसम्पतन्ति
कूजन्तिकोकिलगणाःकलकण्ठरावैः ।
वाचा विशुद्धकलयानुवदन्तिकीराः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २१॥

पल्लीषु वल्लवजनाःस्वगृहाङ्गणेषु
धेनूर्दुहन्ति विनिभान्ति विशेषदृष्ट्या ।
गोपालबाल इव भक्तहृदम्बुजेषु
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २२॥

गाढान्धकारपटलम् गगनञ्जहाति
मोहान्धकार इव सन्मनुजम् समस्तम् ।
रागोविराग इव संविशति प्रकामं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २३॥

निद्राजहाति हि जनान् सुमुनिं यधावत्
प्रज्ञाप्युदेति हि जनेषु मुनौयधावत् ।
सक्तिर्जनेषु हि यथा च मुनौविरक्तिः
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २४॥

फुल्लानिपङ्कजवनानि विशुद्धसत्त्व
फुल्लानि सज्जनमनःकमलानि यद्वत् ।
भाश्शुद्धसत्वमिव भाति विदिक्षु दिक्षु
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २५॥

ब्रह्मास्वयंसुरगणैस्सहलोकपालैः
धामप्रविश्य तव मण्डपगोपुराढ्यम् ।
पञ्चाङ्गशुद्धिमभिवर्णयति त्वदीयां
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २६॥

विख्यातवैद्यजन वञ्चकरोगजाल
विख्यातवैद्य इति रोगनिपीडितास्त्वाम् ।
निश्चित्यधाम तव दूरत आपतन्ति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २७॥

भूतग्रहादि बलवत्तर तापयुक्ताः
बाणावतीमुख महोग्रपिशाच विद्धाः ।
स्नाताःप्रदक्षिणविधा वुपयान्तिनाथ
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २८॥

सन्तानहीन वनितास्सरसि त्वदीये
स्नात्वाजलार्द्रवसनास्तव दर्शनाय ।
आयान्तिसन्ततिवरप्रद देवदेव
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ २९॥

यद्दुष्ट संहरणमुत्तमलोकरक्षा
दीक्षां व्यनक्ति तवरूप महोनृसिंह ।
तच्चात्र यादगिरिमूर्थनिसंविभाति
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३०॥

प्रह्लाद पुण्यजनि पुण्यबलात्प्रतीतं
रूपं जनस्तवहरे निगमान्तवेद्यम् ।
प्रातःस्मरंस्तरति संस्मारणाम्बुराशिं
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३१॥

श्रीसुप्रभातमिदमच्युतकैतवोक्त
मप्यच्युतं भवतुभक्तजनैकवेद्यम् ।
लक्ष्मीनृसिंह तव नामशुभप्रभावात्
यादाद्रिनाथ नृहरे! तव सुप्रभातम् ॥ ३२॥

इत्थं यादाद्रिनाथस्य सुप्रभात मतन्द्रिताः ।
ये पठन्ति सदा भक्त्या ते नरास्सुखभागिनः ॥ ३३॥
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इति श्री लक्ष्मी नरसिंह सुप्रभातम् ।

Sunday, 17 January 2016

गुरु गोबिंद सिंह जी को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है.

 गुरु गोबिंद सिंह जी को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है. को त्याग और वीरता की मूर्ति भी माना जाता है.
सवा लाख से एक लड़ाऊँ चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ”
गुरु गोविंद साहब को सिखों का अहम गुरु माना जाता है. उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहादुरी थी. उनके लिए यह शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं “सवा लाख से एक लड़ाऊँ.” उनके अनुसार शक्ति और वीरत के संदर्भ में उनका एक सिख सवा लाख लोगों के बराबर है
गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: २२ दिसम्बर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) सिखों के दसवें गुरु थे। उनका जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।
उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम,उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।
गुरु गोबिंद साहिब,,,श्री गुरु गो‍बिंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरू हैं. इनका जन्म पौष सुदी 7वीं सन 1666 को पटना में माता गुजरी जी तथा पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी के घर हुआ. उस समय गुरु तेगबहादुर जी बंगाल में थे. उन्हीं के वचनानुसार बालक का नाम गोविंद राय रखा गया और सन 1699 को बैसाखी वाले दिन गुरुजी पंज प्यारों से अमृत छक कर गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह जी बन गए. इनका बचपन बिहार के पटना में ही बीता. जब 1675 में श्री गुरु तेगबहादुर जी दिल्ली में हिंन्दु धर्म की रक्षा के लिए शहीद हुए तब गुरु गोबिंद साहब जी गुरु गद्दी पर विराजमान हुए
खालसा पंथ की स्थापना
गुरु गोबिंद सिंह जी ने ही 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की. ख़ालसा यानि ख़ालिस (शुद्ध) जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो. पांच प्यारे बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन जाते हैं और कहते हैं-जहां पाँच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं निवास करूंगा. उन्होंने सभी जातियों के भेद-भाव को समाप्त करके समानता स्थापित की और उनमें आत्म-सम्मान की भावना भी पैदा की. गोबिंद सिंह जी ने एक नया नारा दिया था वाहे गुरु जी का ख़ालसा, वाहे गुरु जी की फतेह. दमदमा साहिब में आपने अपनी याद शक्ति और ब्रह्मबल से श्री गुरुग्रंथ साहिब का उच्चारण किया और लिखारी (लेखक) भाई मनी सिंह जी ने गुरुबाणी को लिखा.
पांच ककार,,,,युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पांच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है:-
(1) केश: जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे.
(2) कंघा: केशों को साफ करने के लिए लकड़ी का कंघा.
(3) कच्छा: स्फूर्ति के लिए.
(4) कड़ा: नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए.
(5) कृपाण: आत्मरक्षा के लिए.
वीरता और धैर्यशीलता की मिसाल
गुरु गोबिंद सिंह ने अपनी जिंदगी में वह सब देखा था जिसे देखने के बाद शायद एक आम मनुष्य अपने मार्ग से भटक या डगमगा जाए लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. परदादा गुरु अर्जुनदेव की शहादत, दादा गुरु हरगोविंद द्वारा किए गए युद्ध, पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, चार में से बड़े दो पुत्रों (साहिबजादा आजीत सिंह एवं साहिबजादा जुझार सिंह) का चमकौर के युद्ध में शहीद होना और छोटे दो पुत्रों (साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह) को जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाना, वीरता व बलिदान की विलक्षण मिसालें हैं. इस सारे घटनाक्रम में भी अड़िग रहकर गुरुगोबिंद सिंह संघर्षरत रहे, यह कोई सामान्य बात नहीं है
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द
गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु मेरा देऊ, अलख अभेऊ, सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु का दर्शन .... देख - देख जीवां, गुरु के चरण धोये -धोये पीवां
गुरु बिन अवर नहीं मैं ठाऊँ, अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु मेरा ज्ञान, गुरु हिरदय ध्यान, गुरु गोपाल पुरख भगवान
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
ऐसे गुरु को बल-बल जाइये ..-2 आप मुक्त मोहे तारें ..
गुरु की शरण रहो कर जोड़े, गुरु बिना मैं नहीं होर
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु बहुत तारे भव पार, गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
अंधकार में गुरु मंत्र उजारा, गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
गुरु पूरा पाईया बडभागी, गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोबिन्द, गुरु मेरा पार ब्रह्म, गुरु भगवंत
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