Wednesday, 3 January 2018

श्री अष्टविनायक मंत्र,,Ashta Vinayak Mantra

श्री अष्टविनायक मंत्र,,Ashta Vinayak Mantra
अष्टविनायक नमो नमः हे अष्टविनायक तेरी जय जयकार !हे गणनायक !https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 तेरी जय जयकार !हे गौरी सुत ! हे शिव नंदन !तेरी महिमा अपरम्पारहे अष्टविनायक तेरी जय जयकार !प्रथम विनायक वक्रतुंड है सिंह सवारी करता ;मत्सर असुर का वध कर दानव भगवन पीड़ा सबकी हरता ,हे गणेश तेरी जय जयकार !हे शुभेश तेरी जय जयकार !द्वितीय विनायक एकदंत मूषक की करें सवारी ;मदासुर का वध कर हारते विपदा सबकी भारी ,हे गजमुख तेरी जय जयकार हे सुमुख तेरी जय जयकार .नाम महोदर तृतीय विनायक मूषक इनका वाहन ; मोहसुर का नाश ये करते इनकी महिमा पावन ,हे विकट तेरी जय जयकार !हे कपिल तेरी जय जयकार !चौथे रूप में प्रभु विनायक धरते नाम गजानन ;लोभासुर संहारक हैं ये मूषक इनका वाहन ,हे गजकर्णक तेरी जय जयकार !हे धूम्रकेतु तेरी जय जयकार !प्रभु विनायक पंचम रूप लम्बोदर का धरते ;करें सवारी मूषक की क्रोधासुर दंभ हैं हरते ,हे गणपति तेरी जय जयकार !
हे गजानन तेरी जय जयकार ! विकट नाम के षष्टविनायक सौर ब्रह्म के धारक ;है मयूर वाहन इनका ये कामासुर संहारक ,हे गणाध्यक्ष तेरी जय जयकार !हे अग्रपूज्य तेरी जय जयकार !विघ्नराज अवतार प्रभु का सप्तम आप विनायक ;वाहन शेषनाग है इनका ममतासुर संहारक ,हे विघ्नहर्ता तेरी जय जयकार !हे विघ्ननाशक तेरी जय जयकार !धूम्रवर्ण हैं अष्टविनायक शिव ब्रह्म रूप प्रभु का ;अभिमानासुर संहारक मूषक वाहन है इनका ,हे महोदर तेरी जय जयकार ! हे लम्बोदर तेरी जय जयकार !!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

श्री गणपती चालीसा

श्री गणपती चालीसा 1

दोहा,जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 चौपाई..जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥३ राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥४ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥५ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥६ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥७ ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥८ कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥९ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।१० भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥११ अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥१२ अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥१३ मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥१४ गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥१५ अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥१६ बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥१७ सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥१८ शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥१९ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥२० निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥२१ गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥२२ कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥२३ नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥२४ पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥२५ गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥२६ हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥२७ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥२८ बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥२९ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥३० बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥३१ चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥३२ धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥३३ चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥३४ तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥३५ मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥३६ भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा॥३७ अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥३८ श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।३९ नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥४० दोहा सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥ श्री गणपती चालीसा 2 दोहा,,मंगलमय मंगल करन, करिवर वदन विशाल। विघ्न हरण रिपु रूज दलन, सुमिरौ गिरजा लाल॥ चौपाई जय गणेश बल बुद्दि उजागर। व्रक्तुन्द विद्या के सागर॥१ शम्भ्पूत सब जग से वन्दित। पुलकित बदन हमेश अनंदित॥२ शांत रूप तुम सिंदूर बदना। कुमति निवारक संकट हरना॥३ क्रीट मुकुट चंद्रमा बिराजै। कर त्रिशूल अरु पुस्तक राजै॥४ ॠद्दि सिद्दि के हे प्रिय स्वामी। माता पिता माता पिता वचन अनुगामी॥५ भावे मूषक की असवारी। जिनको उनकी है बलिहारी॥६ तुम्हरो नाम सकल नर गावै। कोटि जन्म के पाप नसावै॥७ सब मे पूजना प्रथम तुम्हारा। अचल अमर प्रिय नाम तुम्हारा॥८ भजन दुखी नर जो हैं करते। उनके संकट पल मे हरते॥ अहो षडानन के प्रिय भाई। थकी गिरा तव महिमा गाई॥१० गिरिजा ने तुमको उपजायो। वदन मैल तै अंग बनायो॥११ द्वार पाल की पदवी सुंदर। दिन्ही बैठायो ड्योडी पर॥१२ पिता शम्भू तब तप कर आए। तुम्हे देख कर अति सकुचाये॥१३ पूछैउं कौन कह्ना ते आयो। तुम्हे कौन एहि थल बैठायो॥१४ बोले तुम पार्वती लाल ह्नूं। इस ड्योडी का द्वारपाल ह्नूं॥१५ उनने कहा उमा का बालक। हुआ नही कोई कुल पालक॥१६ तू तेहि को फिर बालक कैसो। भ्रम मेरे मन में है ऐसो॥१७ सुन कर वचन पिता के बालक। बोले तुम मैं ह्नू कुलपालक॥१८ या मैं तनिक न भ्रम ही कीजे। कान वचन पर मेरे दीजे॥१९ माता स्नान कर रही भीतर। द्वारपाल सुत को थापित कर॥२० सो छिन में यही अवसर अइहै। प्रकट सफल सन्देह मिटाइहै॥२१ सुन कर शिव ऐसे तब वचना। ह्रदय बीच कर नई कल्पना॥२२ जाने के हित चरण बढाये। भीतर आगे तब तुम आये॥२३ बोले तात न पाँव उठाओ। बालक से जी न रार बढाओं॥२४ क्रोधित शिव ने शूल उठाया। गला काट कर पाँव बढाया॥२५ गए तुम गिरिजा के पास। बोले कहां नारी विश्वास॥२६ सुत कसे यह तुमने जायो। सती सत्य को नाम डुबायो॥२७ तब तव जन्म उमा सब भाखा। कुछ न छिपाया शंभु सन राखा॥२८ सुन गिरिजा की सकल कहानी। हँसे शम्भु माया विज्ञानी॥२९ दूत भद्र मुख तुरंत पठाये। हस्ती शीश काट सो लाये॥३० स्थापित कर शिव सो धड़ ऊपर। किनी प्राण संचार नाम धर॥३१ गणपति गणपति गिरिजा सुवना। प्रथम पूज्य भव भयरूज दहना॥३२ साई दिवस से तुम जग वन्दित। महाकाय से तुष्ट अनन्दित॥३३ पृथ्वी प्रद्क्षिणा दोउ दीन्ही। तहां षडानन जुगती कीन्ही॥३४ चढि मयूर ये आगे आगे। व्रक्तुन्द सो तुम संग भागे॥३५ नारद तब तोहिं दिय उपदेशा। रहनो न संका को लवलेसा॥३६ मातापिता की फेरी कीन्ही। भू फेरी कर महिमा लीन्ही॥३७ धन्य धन्य मूषक असवारी। नाथ आप पर जग बलिहारी॥३८ डासना पी नित कृपा तुम्हारी। रहे यही प्रभू इच्छा भारी॥३९ जो श्रधा से पढे ये चालीस। उनके तुम साथी गौरीसा॥४० दोहा शंबू तनय संकट हरन, पावन अमल अनूप। शंकर गिरिजा सहित नित, बसहु ह्रदय सुख भूप। श्री गणपती चालीसा 3 दोहा,जय जय जय वंदन भुवन, नंदन गौरिगणेश । दुख द्वंद्वन फंदन हरन,सुंदर सुवन महेश ॥ चौपाई,,जयति शंभु सुत गौरी नंदन । विघ्न हरन नासन भव फंदन ॥ जय गणनायक जनसुख दायक । विश्व विनायक बुद्धि विधायक ॥ एक रदन गज बदन विराजत । वक्रतुंड शुचि शुंड सुसाजत ॥ तिलक त्रिपुण्ड भाल शशि सोहत । छबि लखि सुर नर मुनि मन मोहत ॥ उर मणिमाल सरोरुह लोचन । रत्न मुकुट सिर सोच विमोचन ॥ कर कुठार शुचि सुभग त्रिशूलम् । मोदक भोग सुगंधित फूलम् ॥ सुंदर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ धनि शिव सुवन भुवन सुख दाता । गौरी ललन षडानन भ्राता ॥ ॠद्धि सिद्धि तव चंवर सुढारहिं । मूषक वाहन सोहित द्वारहिं ॥ तव महिमा को बरनै पारा । जन्म चरित्र विचित्र तुम्हारा ॥ एक असुर शिवरुप बनावै । गौरिहिं छलन हेतु तह आवै ॥ एहि कारण ते श्री शिव प्यारी । निज तन मैल मूर्ति रचि डारि ॥ सो निज सुत करि गृह रखवारे । द्धारपाल सम तेहिं बैठारे ॥ जबहिं स्वयं श्री शिव तहं आए । बिनु पहिचान जान नहिं पाए ॥ पूछ्यो शिव हो किनके लाला । बोलत भे तुम वचन रसाला ॥ मैं हूं गौरी सुत सुनि लीजै । आगे पग न भवन हित दीजै ॥ आवहिं मातु बूझि तब जाओ । बालक से जनि बात बढ़ाओ ॥ चलन चह्यो शिव बचन न मान्यो । तब ह्वै क्रुद्ध युद्ध तुम ठान्यो ॥ तत्क्षण नहिं कछु शंभु बिचारयो । गहि त्रिशूल भूल वश मारयो ॥ शिरिष फूल सम सिर कटि गयउ । छट उड़ि लोप गगन महं भयउ ॥ गयो शंभु जब भवन मंझारी । जहं बैठी गिरिराज कुमारी ॥ पूछे शिव निज मन मुसकाये । कहहु सती सुत कहं ते जाये ॥ खुलिगे भेद कथा सुनि सारी । गिरी विकल गिरिराज दुलारी ॥ कियो न भल स्वामी अब जाओ । लाओ शीष जहां से पाओ ॥ चल्यो विष्णु संग शिव विज्ञानी । मिल्यो न सो हस्तिहिं सिर आनी ॥ धड़ ऊपर स्थित कर दीन्ह्यो । प्राण वायु संचालन कीन्ह्यो ॥ श्री गणेश तब नाम धरायो । विद्या बुद्धि अमर वर पायो ॥ भे प्रभु प्रथम पूज्य सुखदायक । विघ्न विनाशक बुद्धि विधायक ॥ प्रथमहिं नाम लेत तव जोई । जग कहं सकल काज सिध होई ॥ सुमिरहिं तुमहिं मिलहिं सुख नाना । बिनु तव कृपा न कहुं कल्याना ॥ तुम्हरहिं शाप भयो जग अंकित । भादौं चौथ चंद्र अकलंकित ॥ जबहिं परीक्षा शिव तुहिं लीन्हा । प्रदक्षिणा पृथ्वी कहि दीन्हा ॥ षड्मुख चल्यो मयूर उड़ाई । बैठि रचे तुम सहज उपाई ॥ राम नाम महि पर लिखि अंका । कीन्ह प्रदक्षिण तजि मन शंका ॥ श्री पितु मातु चरण धरि लीन्ह्यो । ता कहं सात प्रदक्षिण कीन्ह्यो ॥ पृथ्वी परिक्रमा फल पायो । अस लखि सुरन सुमन बरसायो ॥ सुंदरदास राम के चेरा । दुर्वासा आश्रम धरि डेरा ॥ विरच्यो श्रीगणेश चालीसा । शिव पुराण वर्णित योगीशा ॥ नित्य गजानन जो गुण गावत । गृह बसि सुमति परम सुख पावत ॥ जन धन धान्य सुवन सुखदायक । देहिं सकल शुभ श्री गणनायक ॥ दोहा श्री गणेश यह चालिसा,पाठ करै धरि ध्यान । नित नव मंगल मोद लहि,मिलै जगत सम्मान ॥ द्धै सहस्त्र दस विक्रमी, भाद्र कृष्ण तिथि गंग । पूरन चालीसा भयो, सुंदर भक्ति अभंग ॥ ॥।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

श्री गणपती आरती 1.नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें

श्री गणपती आरती 1.नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें
नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें । लाडू मोदक अन्नें परिपूरित पातें । ऐसें पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रें ।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 अष्टहि सिद्धी नवनिधि देसी क्षणमात्रें ॥१॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती । तुझे गुण वर्णाया मज कैंची स्फूर्ती ॥ ध्रु० ॥ तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती । त्यांची सकलहि पापें विघ्नेंही हरती ॥ वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती । सर्वहि पावुनि अंती भवसागर तरती ॥ जय देव० ॥ २ ॥ शरणागत सर्वस्वे भजती तव चरणीं । कीर्ति तयांची राहे जोंवर शाशितरणी ॥ त्रैयोक्यों ते विजयी अद्भुत हे करणी । गोसावीनंदन रत नामस्मरणीम ॥ जय देव जय देव० ॥३॥
2.शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुखको शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुखको । दोंंदिल लाल बिराजे सुत गौरीहरको ॥ हाथ लिये गुडलड्डू साई सुरवरको । महिमा कहे न जाय लागत हूँ पदको ॥१॥ जय जयजी गणराज विद्या सुखदाता । धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता ॥ ध्रु० ॥ अष्टी सिद्धी दासी संकटको बैरी । विघ्नविनाशन मंगलमूरत अधिकाई ॥ कोटीसुरजप्रकाश ऐसी छबि तेरी । गंडस्थलमदमस्तक झुले शशिबहारी ॥जय० ॥२॥ भावभगतिसे कोई शारणागत आवे । संतति संपति सबही भरपूर पावे । ऐसे तुम महाराज मोको अति भवे । गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे ॥ जय० ॥३॥ 3.तूं सुखकर्ता तूं दुःखकर्ता विघ्नविनाशक मोरया तूं सुखकर्ता तूं दुःखकर्ता विघ्नविनाशक मोरया । संकटीं रक्षीं शरण तुला मी, गणपतीबाप्पा मोरया ॥ ध्रु० ॥ मंगलमूर्ति तूं गणनायक । वक्रतुंड तूं सिद्धिविनायक ॥ तुझिया द्वारीं आज पातलों । नेईं स्थितिप्रति राया ॥ संकटीं० ॥१॥ तूं सकलांचा भाग्यविधाता । तूं विद्येचा स्वामी दाता ॥ ज्ञानदीप उजळून आमुचा । निमवीं नैराश्याला ॥ संकटीं० ॥२॥ तूं माता, तुं पिता जगं या । ज्ञाता तूं सर्वस्व जगीं या ॥ पामर मी स्वर उणें भासती । तुझी आरती गाया ॥ संकटीं ३॥ मंगलमूर्ति मोरया । गणपतीबाप्पा मोरया 4.जय देव जय देव जय वक्रतुंडा जय देव जय देव जय वक्रतुंडा । सिंदुरमंडित विशाल सरळ भुजदंडा ॥ ध्रु० ॥ प्रसन्नभाळा विमला करिं घेउनि कमळा । उंदिरवाहन दोंदिल नाचसि बहुलीळा ॥ रुणझुण रुणझुण करिती घागरिया घोळा । सताल सुस्वर गायन शोभित अवलीळा ॥ जय देव० ॥ १ ॥ सारीगमपधनी सप्तस्वरभेदा । धिमिकिट धिमिकिट मृदंग वाजति गतिछंदा ॥ तातक तातक थैय्या करिसी आनंदा । ब्रह्मादिक अवलोकिती तव पदारविंदा ॥ जय देव० ॥ २ ॥ अभयवरदा सुखदा राजिवदलनयना । परशांकुशलड्डूधर शोभितशुभरदना ॥ ऊर्ध्वदोंदिल उंदिर कार्तिकेश्वर रचना । मुक्तेश्वर चरणांबुजिं अलिपरि करिं भ्रमणा ॥ जय देव जय देव जय वक्र० ॥ ३ ॥ 5. सुखकर्ता दु:खहर्ता || सुखकर्ता दु:खहर्ता वार्ता विघ्नाची | नुरवी पुरव प्रेम कृपा जयाची | सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची | कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ||१|| जयदेव जयदेव जय मंगलमुर्ती | दर्शनमात्रे मनःकामना पुरती ||ध्रु.|| रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा | चंदनाची उटी कुंकमकेशरा || हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा | रुणझुणती नुपुरे चरणी घागरिया ||२|| लंबोदर पीतांबर फणिवरवंदना | सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना | दास रामाचा वाट पाहे सदना | संकष्टी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना ||३|| ।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

Sunday, 31 December 2017

श्री सरस्वती सुप्रभातम्

श्री सरस्वती सुप्रभातम्
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ! हे वाणि! उत्तिष्ठ! हंसिनीध्वजे ।
उत्तिष्ठ! ब्रह्मणो राज्ञि! त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥ १॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
जागृहि त्वं महादेवि! जागृहि त्वं सरस्वति! ।
जागृहि त्वं चतुर्वेदि! लोकरक्षाविधिं कुरु! ॥ २॥
लोकाः सर्वे शुचाम्भोधौ निमग्नास्तान् समुद्धर!
त्वमेवैका स्वयंव्यक्ता समर्था सिकताभवा! ॥ ३
श्रीवाणि! सर्वजगतां जननि! प्रमोदे!
जिह्वाग्रवासिनि मनोहरि वेधसस्त्वम् ।
वाञ्छाप्रदायिनि! समाश्रितभक्तकोटेः
श्रीपद्मजातदयिते! तव सुप्रभातम्! ॥ ४॥
तव सुप्रभातमखिलार्थदायिनि!
कमनीयगात्रि! करुणातरङ्गिणि!
कमलायताक्षि! वदनेन्दुमण्डले !
परमेष्ठिदेवि! सुरसुन्दरीसुते! ॥ ॥ ५॥
श्रीव्यासपूजितपदाम्बुजकोमलाङ्गि!
कार्तस्वराञ्चितविशेषविभूषिताङ्गि! ।
प्रालेयमौक्तिकशशाङ्कसुशोभिताङ्गि!
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम् ॥ ६॥
श्रीगौतमीतटसमीकृतसैकतेन
व्यासेन सेचनसमाहित श्रीकरैश्च ।
श्रीषोडशी मनुजसेन निरूपिता त्वं
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ ७॥
वल्लीत्रयान्तरसुचक्रसमर्चनेन var सुचित्र
श्रीमन्त्रवाग्भवसमुच्चय कूटदेशे! ।
व्यक्तासि रक्षितुमितः स्वयमेव देवि ।
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ ८॥
श्रीमन्त्रराजतनुबीजविराजमानां
ओङ्कारतत्त्वविशदाय गृहीतमूर्तिम्! ।
त्वां पण्डिता भुवि भजन्ति सरस्वतीति
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ ९॥
ओङ्कारपञ्जरशुकीं निगमान्त वेद्यां!
ह्रीं मातृकावरण श्रींयुत ब्लूञ्च सौरैम् ।
क्लीं सौश्च सैङ्गतदशाक्षरदेवि वन्दे
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १०॥
संसारतारकमहामनुबीजवर्णां
मायामयीं गुणमयीं सगुणोद्भवां त्वाम् ।
शक्तित्रयात्मकचितीति जपन्ति बुद्धाः
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ ११॥
सौन्दर्यवारधितरङ्ग परम्परायां
वेलानिरूपकमनोहरदेहदीपे ।
सर्वोपमाननिचयस्य समोपमेये
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १२॥
सङ्गीतवाङ्मयकलाप्तसुहासनेत्रि!
रागैश्च षोडशसहस्रविधैश्च गीते ।
आनन्ददायकरसैर्खनिभिश्च पूर्णे
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १३॥
सौभाग्यदे! त्वमिह विद्रुमवर्णलक्ष्मीः
विद्याप्रदे! त्वमिह धौतसुधांशुवाणि ।
शत्रुञ्जये! त्वमिह नीलतमालकाळी
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १४॥
श्रीचक्रमन्दिरविहारिणि! राज्यलक्ष्मि!
राकासुधाकरशिरोमणि! नीलवेणि! ।
राजीवलोचनशिरीषसुमाग्रनासे ।
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १५॥
कौमारशैलशिखरे सुखवासयोग्ये
सूर्येन्द्रविष्णुशिवपुत्रगणेशमुख्यैः ।
वासिष्ठवारुणिवरैश्च सुपूततीर्थे
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १६॥
अष्टाब्जपुञ्जितविशेषवयोविलासे!
बिम्बाधराञ्चितसुहासविलासरेखे/नेत्रे! ।
कारुण्यपूरितदृगञ्चलरम्यमूर्ते
श्रीवाणि! वासरपुरे! तवसुप्रभातम्! ॥ १७॥
औदुम्बराख्यतरुमूलपवित्रदेशे
दत्तावधूतयतिरत्र गृहीतदीक्षः ।
जप्त्वा त्वदीयशुभनाम बभूव सिद्धः
श्रीवाणि ! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १८॥
प्रत्यूषरञ्जितनवार्कमरीचिपुञ्जाः
प्रान्तप्रशान्तप्रकृतिं रमणीयदृश्याम् ।
सम्भावयन्ति च विरच्य सरस्वतीह
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ १९॥
नित्यं तवार्चकसुधीश्च मुखारविन्दं
श्रीखण्डचूर्णहरितालसुगन्धतीर्थैः ।
ब्राह्मे मुहूर्तसमये रचनां करोति
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ ! २०॥
सप्तस्वराञ्चितमनोहरनादयुक्तैः
प्राभातकालिकसुनादविनोदरागैः ।
गायन्ति कोकिलमयूरमरालचक्राः
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २१॥
दीक्षाविधाननियमानुसरेण भक्ताः
गत्वा पुरे भवति! देहि घृणाक्षभिक्षम् ।
याचन्ति तानिति गृहस्थतदात्मरूपान्
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २२॥
योगीशमानससरोवरराजहंसि!
भक्तालिमानससरोजविहारभृङ्गि! ।
श्रीचक्रषोडशमहामनुबीजवासे
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २३॥
ज्ञानात्मिके! विविधवस्तुविवेकरूपे!
इच्छात्मिके! भगवदात्मसमानरूपे! ।
यत्नात्मिके! परमधाम समात्तरूपे
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २४॥
शिञ्जानकङ्कणनिनादविनोदपाणे!
वीणाविवादनविजृम्भितपूर्णरागे! ।
विन्यस्तहस्तभ्रुकुटीचुबुकाक्षिवत्से
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २५॥
कूजन्ति देवि! चरणायुधपक्षिसङ्घाः!
गायन्ति देवि! तव मागधवन्दिवृन्दाः ।
अर्चन्ति देवि! भुवि वैदिककाव्यशिष्याः
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २६॥
दिव्यापगाविकसिताच्छसुवर्णपुष्पाः
हस्ताश्च मन्त्रपठनानुरणेन देवाः ।
तिष्ठन्ति देवि! तव मन्दिरमुख्यमार्गे ।
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम् ॥ २७॥
दिक्पालकाश्च तव पीठककोणदेशे
श्रीचक्रमन्दिरनवावरणेषु देवाः ।
स्थित्वा च मङ्गलपुरश्चरणं पठन्ति
श्रीवाणि! वासरपुरे! तव सुप्रभातम्! ॥ २८॥
इत्थं सरस्वति! कृतं चिनवेङ्कनेन
वेदान्तमन्त्रजपपाठविधानपूर्वम् ।
पारायणेन च पवित्रचरित्रगानं
पुण्यावहं सकलमङ्गलसुप्रभातम्! ॥ २९॥
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!
इति श्री सरस्वती सुप्रभातं समाप्त्म् ॥

श्री गायत्री सुप्रभातम् shri gayatrI suprabhatam

श्री गायत्री सुप्रभातम् shri gayatrI suprabhatam
श्री पातूरि सीतारामांजनेयुलु कृत
श्रीरस्तु ॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
श्री जानिरद्रितनयापतिरब्जगर्भः
सर्वे च दैवतगणाः समहर्षयोऽमी ।
एते भूतनिचयाः समुदीरयन्ति
गायत्रि - लोकविनुते तव सुप्रभातम् ॥ १॥
पुष्पोच्चयप्रविलसत्करकंजयुग्माम्
गंगादिदिव्यतटिनीवरतीरदेशे- ।
ष्वर्घ्यम् समर्पयितुमत्रजनास्तवैते
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २॥
कर्णेऽमृतम् विकिरता स्वरसंचयेन
सर्वे द्विजाः श्रुतिगणम् समुदीरयन्ति ।
पश्याश्रमासथ वृक्षतलेषु देवि
गायति -लोकविनुते -तव सुप्रभातम् ॥ ४॥
गावो महर्षिनिचयाश्रम भूमिभागात्
गन्तुम् वनाय शनकैः शनकैः प्रयान्ति ।
वत्सान् पयोऽमृतरसम् ननु पाययित्या
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ४॥
शिष्य प्रबोधनपरा वर मौनि मुख्याः
व्याख्यान्ति वेदगदितम् स्फुट धर्म ततत्त्वम् ।
स्वीयाश्रमाङ्गणतलेषु मनोहरेषु
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ५॥
श्रोत्रामृतम् श्रुतिरवम् कलयन्त एते
विस्मृत्य गन्तुमटवीम् फललाभलोभात् ।
वृक्षाग्र भूमिषु वनेषु लसन्ति कीराः
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ६॥
मूर्तित्रयात्मकलिते निगम त्रयेण
वेद्ये स्वरत्रय परिस्फुट मन्तरूपे
तत्त्वप्रबोधनपरोपनिषत्प्रपञ्चे
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ७॥
विश्वात्मिके निगमशीर्षवतंसरूपे
सर्वागमान्तरुदिते वरतैजसात्मन् ।
प्राज्ञात्मिके सृजनपोषणसंहृतिस्थे
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ८॥
तुर्यात्मिके सकलतत्त्वगणानतीते
आनन्दभोगकलिते परमार्धदत्रि
ब्रह्मानुभूतिवरदे सततम् जनानाम् ।
गायत्रि - लोकविनुते -सुप्रभातम् ॥ ९॥
तारस्वरेण मधुरम् परिगीयमाने
मन्द्रस्वरेण मधुरेण च मध्यमेन ।
गानात्मिके निखिललोक मनोज्ञ भावे
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुपभातम् ॥ १०॥
पापाटवी दहन जागृत मानसा त्वम्
भक्तौघ पालन निरंतर दीक्षिताऽसि ।
त्वय्येव विश्वमखिलम् स्थिरतामुपैति
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ ११॥
या वैदिकी निखिल पावन पावनी वाक्
या लौकिकी व्यवहृति प्रवणा जनानाम् ।
या काव्यरूप कलिता तव रूप मेताः
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १२॥
दिव्यम् विमानमधिरुह्य नभोङ्गणेऽत्र
गायन्ति दिव्य महिमानमिमे भवत्याः ।
पश्य प्रसीद निचया दिविजाङ्गनानाम्
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १३॥
हैमीम् रुचम् सकल भूमिरुहाग्रदेशे-
ष्वाधाय तत्कृत परोपकृतौ प्रसन्नः ।
भानुः करोत्यवसरे कनकाभिषेकम्
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १४॥
दिव्यापगासु सरसीषु वनी निकुङ्जे-
षूच्चावचानि कुसुमानि मनोहराणि ।
पुल्लानि सन्ति परितस्तव पूजनाय
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १५॥
कुर्वन्ति पक्षिनिचयाः कलगानमेते
वृक्षाग्रमुन्नततरासनमाश्रयन्तः
देवि - त्वदीय महिमानमुदीरयन्तो
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १६॥
विश्वेशि - विष्णुभगिनि - श्रुतिवाक्स्वरूपे -
तन्मात्रिके - निखिलमन्तमयस्वरूपे -
गानात्मिके - निखिलतत्त्वनिजस्वरूपे -
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १७॥
तेजोमयि - त्रिभुवनावनसक्तचित्ते -
सन्धात्मिके - सकल काल कला स्वरूपे -
मृत्युंजये - जयिनि - नित्यनिरंतरात्मन् -
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १८॥
त्वामेव देवि - परितो निखिलानि तन्त्रा-
ण्याभाति तत्त्वमखिलम् भवतीम् विवृण्वत् ।
त्वम् सर्वदाऽसि तरुणारुणदिव्यदेहे -
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ १९॥
नित्याऽसि देवि - भवती निखिले प्रपञ्चे
वन्द्याऽसि सर्व भुवनैः सततोद्यतासि ।
धी प्रेरिकाऽसि भुवनस्य चराचरस्य
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २०॥
वन्दामहे भगवतीम् भवतीम् भवाब्धि-
सन्तारिणीम् त्रिकरणैः करुणामृताब्दे-
सम्पश्य चिन्मयतनो - करुणार्द्रदृष्ट्या
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २१॥
त्वम् मातृकामयतनुः परम प्रभावा
त्वय्येव देवि - परमः पुरुषः पुराणः ।
त्वत्तः समस्त भुवनानि समुल्लसन्ति
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २२॥
त्वम् वै प्रसूर्निखिलदेवगणस्य देवि
त्वम् स्तूयसे त्रिषवणम् निखिलैश्च लोकैः ।
त्वम् देश काल परमार्थ परिस्फुटासि
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २३॥
त्वम् गाधिसूनु परमर्षि वरेण दृष्टा
तेजोमयी सवितुरात्ममयाखिलार्था ।
सर्वार्थदा प्रणत भक्त जनस्य शश्वत्
गायत्रि - लोकविनुतो - तव सुप्रभातम् ॥ २४॥
संकल्प्य लोकमखिलम् मनसैव सूषे
कारुण्यभाव कलिताऽवसि लोकमाता ।
कोपान्विता तमखिलम् कुरुषे प्रलीनम्
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २५॥
मुक्ताभ विद्रुम सुवर्ण महेन्द्र नील
श्वेतप्रभैर् भुवन रक्षण बुद्धि दीक्षैः ।
वक्त्रैर्युते - निगम मातरुदारसत्त्वे
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २६॥
कारुण्य वीचि निचयामल कान्ति कान्ताम्
ब्रह्मादि सर्व दिविजेड्य महाप्रभावाम् ।
प्रीत्या प्रसारय दृशम् मयि लोकमातः
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २७॥
श्री लक्ष्मणादि गुरु सत्करुणैकलब्ध-
विद्या विनीत मतियानय माङनेयः ।
संसेवतेऽत्रभवतीम् भुवतीम् वचोभिः
गायत्रि - लोकविनुते - तव सुप्रभातम् ॥ २८॥
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इति सीतारामाङ्जनेय कवि कृत गायत्री सुप्रभातम् ॥

उडुपि श्रीकृष्ण सुप्रभातम् ..udupi shri krishna suprabhatam

उडुपि श्रीकृष्ण सुप्रभातम् ..udupi shri krishna suprabhatam

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥॥
नारायणाखिल शरण्य रथाङ्ग पाणे ।
प्राणायमान विजयागणित प्रभाव ।
गीर्वाणवैरि कदलीवन वारणेन्द्र ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातं ॥ १॥
उत्तिष्ठ दीन पतितार्तजनानुकम्पिन् ।
उत्तिष्ठ विश्व रचना चतुरैक शिल्पिन् ।
उत्तिष्ठ वैष्णव मतोद्भव धामवासिन् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २॥
उत्तिष्ठ पातय कृपामसृणान् कटाक्षान् ।
उत्तिष्ठ दर्शय सुमङ्गल विग्रहन्ते ।
उत्तिष्ठ पालय जनान् शरणं प्रपन्नान् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३॥
उत्तिष्ठ यादव मुकुन्द हरे मुरारे ।
उत्तिष्ठ कौरवकुलान्तक विश्वबन्धो ।
उत्तिष्ठ योगिजन मानस राजहंस ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ४॥
उत्तिष्ठ पद्मनिलयाप्रिय पद्मनाभ ।
पद्मोद्भवस्य जनकाच्युत पद्मनेत्र ।
उत्तिष्ठ पद्मसख मण्डल मध्यवर्तिन् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ५॥
मध्वाख्यया रजतपीठपुरेवतीर्णः ।
त्वत्कार्य साधनपटुः पवमान देवः ।
मूर्तेश्चकार तव लोकगुरोः प्रतिष्ठां ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ६॥
सन्यास योगनिरताश्रवणादिभिस्त्वां ।
भक्तेर्गुणैर्नवभिरात्म निवेदनान्तैः ।
अष्टौयजन्ति यतिनो जगतामधीशं ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ७॥
या द्वारकापुरि पुरातव दिव्यमूर्तिः ।
सम्पूजिताष्ट महिषीभिरनन्य भक्त्या ।
अद्यार्चयन्ति यतयोष्टमठाधिपास्तां ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ८॥
वामेकरे मथनदण्डमसव्य हस्ते ।
गृह्णंश्च पाशमुपदेष्टु मना इवासि ।
गोपालनं सुखकरं कुरुतेति लोकान् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ९॥
सम्मोहिताखिल चराचररूप विश्व ।
श्रोत्राभिराममुरली मधुरारवेण ।
आधायवादयकरेण पुनश्चवेणुं ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १०॥
गीतोष्णरश्मिरुदयन्वहनोदयाद्रौ ।
यस्याहरत्सकललोकहृदान्धकारं ।
सत्वं स्थितो रजतपीठपुरे विभासी ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ११॥
कृष्णेति मङ्गलपदं कृकवाकुवृन्दं ।
वक्तुं प्रयत्य विफलं बहुशः कुकूकुः ।
त्वां सम्प्रबोधयितुमुच्चरतीतिमन्ये ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १२॥
भृङ्गापिपासव इमे मधु पद्मषन्दे ।
कृष्णार्पणं सुमरसो स्वितिहर्षभाजः ।
झङ्कार राव मिषतः कथयन्ति मन्ये ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १३॥
निर्यान्ति शावक वियोगयुता विहङ्गाः ।
प्रीत्यार्भकेशु च पुनः प्रविशन्ति नीडं ।
धावन्ति सस्य कणिकानुपचेतु मारात् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १४॥
भूत्वातिथिः सुमनसामनिलः सुगन्धं ।
सङ्गृह्यवाति जनयन् प्रमदं जनानां ।
विश्वात्मनोर्चनधियातव मुञ्च निद्रां ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १५॥
तारालि मौक्तिक विभूषण मण्डिताङ्गी ।
प्राचीदुकूल मरुणं रुचिरं दधान ।
खेसौखसुप्तिक वधूरिव दृश्यतेद्य ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १६॥
आलोक्य देह सुषमां तव तारकालिः ।
ह्रीणाक्रमेण समुपेत्य विवर्णभावं ।
अन्तर्हितेवनचिरात्यज शेषशय्यां ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १७॥
साध्वीकराब्जवलयध्वनिनासमेतो ।
गानध्वनिः सुदधि मन्थन घोष पुष्टः ।
संश्रूयते प्रतिग्रहं रजनी विनष्टा ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १८॥
भास्वानुदेश्यति हिमांशुर भूद्गतश्रीः ।
पूर्वान्दिशामरुणयन् समुपैत्यनूरुः ।
आशाः प्रसाद सुभगाश्च गतत्रियामा ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १९॥
आदित्य चन्द्र धरणी सुत रौहिणेय ।
जीवोशनः शनिविधुं तुदकेतवस्ते ।
दासानुदास परिचारक भृत्य भृत्य ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २०॥
इन्द्राग्नि दण्डधर निर्रिति पाशिवायु ।
वित्तेश भूत पतयो हरितामधीशाः ।
आराधयन्ति पदवी च्युति शङ्कया त्वाम् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २१॥
वीणां सती कमलजस्य करे दधाना ।
तन्त्र्यागलस्य चरवे कलयन्त्य भेदं ।
विश्वं निमज्जयति गानसुधारसाब्धौ ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २२॥
देवर्षिरंबर तलादवनीं प्रपन्नः ।
त्वत्सन्निधौ मधुरवादित चारु वीणा ।
नामानिगायति नत स्फुरितोत्तमाङ्गो ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २३॥
वातात्मजः प्रणत कल्प तरुर्हनूमान् ।
द्वारे कृताञ्जलि पुटस्तवदर्शनार्थी ।
तिष्ठत्यमुं कुरुकृतार्थमपेत निद्रं ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २४॥
सर्वोत्तमो हरिरिति श्रुतिवाक्य वृन्दैः ।
चन्द्रेश्वर द्विरदवक्त्र षडाननाद्याः ।
उद्घोशयन्त्य निमिषा रजनी प्रभात ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २५॥
मध्वाभिदे सरसि पुण्यजले प्रभाते ।
गङ्गेंभ सर्वमघमाशु हरेति जप्त्वा ।
मज्जन्ति वैदिक शिखामणयो यथावन् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २६॥
द्वारे मिलन्ति निगमान्त विदस्त्रयीज्ञाः ।
मीमांसकाः पदविदोनयदर्शनज्ञाः ।
गान्धर्ववेद कुशलाश्च तवेक्षणार्थं ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २७॥
श्री मध्वयोगि वरवन्दित पादपद्म ।
भैष्मी मुखांभोरुह भास्कर विश्ववन्द्य ।
दासाग्रगण्य कनकादिनुत प्रभाव ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २८॥
पर्याय पीठ मधिरुह्य मठाधिपास्त्वां ।
अष्टौ भजन्ति विधिवत् सततं यतीन्द्राः ।
श्री वादिराजनियमान् परिपालयन्तो ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २९॥
श्रीमन्ननन्त शयनोडुपिवास शौरे ।
पूर्णप्रबोध हृदयांबर शीत रश्मे ।
लक्ष्मीनिवास पुरुषोत्तम पूर्णकाम ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३०॥
श्री प्राणनाथ करुणा वरुणालयार्त ।
सन्त्राण शौन्द रमणीय गुणप्रपूर्ण ।
सङ्कर्षणानुज फणीन्द्र फणा वितान ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३१॥
आनन्दतुन्दिल पुरन्दर पूर्वदास ।
वृन्दाभिवन्दित पदांबुजनन्द सूनो ।
गोविन्द मन्दरगिरीन्द्र धरांबुदाभ ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३२॥
मीनाकृते कमठरूप वराहमूर्ते ।
स्वामिन् नृसिंह बलिसूदन जामदग्न्यः ।
श्री राघवेन्द्र यदुपुङ्गव बुद्ध कल्किन् ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३३॥
गोपाल गोप ललनाकुलरासलीला ।
लोलाभ्रनील कमलेश कृपालवाल ।
कालीयमौलि विलसन्मणिरञ्जिताङ्घ्रे ।
मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३४॥
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!
कृष्णस्य मङ्गल निधेर्भुवि सुप्रभातं ।
येहर्मुखे प्रतिदिनं मनुजाः पठन्ति ।
विन्दन्ति ते सकल वाञ्छित सिद्धिमाशु ।
ज्ञानञ्च मुक्ति सुलभं परमं लभन्ते ॥ ३५॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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