Tuesday, 10 July 2018

चंद्रग्रहण 27=28 जुलाई की रात 11=54 बजे से शुरू होकर रात के 3=49 बजे समाप्त होगा। 3=55



चंद्रग्रहण 27=28 जुलाई की रात 11=54 बजे से शुरू होकर रात के 3=49 बजे समाप्त होगा। 3=55 घंटे लंबे इस ग्रहण का सूतक 27 जुलाई की दोपहर 2=54 बजे से ही लग जाएगा
साल का दूसरा एवं आखिरी चंद्रग्रहण 27=28 जुलाई की दरमियानी रात पड़ेगा। चंद्रग्रहण 27 जुलाई की रात 11=54 बजे से शुरू होकर रात के 3=49 बजे समाप्त होगा। 3=55 घंटे लंबे इस ग्रहण का सूतक 27 जुलाई की दोपहर 2=54 बजे से ही लग जाएगा। शहर के अधिकतर ज्योतिषियों और पंडितों का कहना है कि ग्रहण के सूतक से पहले गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाना श्रेष्ठ है। इसके लिए शहर में गुरु पूर्णिमा पर होने वाले बड़े आयोजन एक दिन पहले यानि 26 जुलाई को आयोजित किए जाएंगे। इसी दिन धूमधाम से कई जगहों पर गुरुपूर्णिमा मनाई जाएगी
आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा शुक्रवार 27 जुलाई को है। इसी दिन गुरु पूर्णिमा भी है। इसी तारीख में रात को खग्रास चंद्रग्रहण होगा। इस तरह का संयोग पूरे 104 साल बाद बन रहा है। गुरुपूर्णिमा के दिन ही चंद्रग्रहण होने के चलते इसका सूतक दोपहर से लग जाएगा। गुरुपूर्णिमा एक दिन पहले 26 जुलाई को मनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि चंद्रग्रहण 27 और 28 जुलाई की मध्य रात्रि में लगने वाला ग्रहण करीब 3 घंटे 55 मिनट का होगा। चंद्रग्रहण का सूतक दिन में 2=54 मिनट से होगा। गुरु पूर्णिमा शहर में सूतक लगने के कारण कुछ स्थानों पर गुरु पूर्णिमा एक दिन पहले 26 जुलाई को मनाई जाएगी। रात 10 बजकर 21 मिनट पर पूर्णिमा तिथि का प्रवेश होगा। सूतक में मंदिर के पट बंद रहते हैं। जलपान, भोजन बंद रहता है। रात्रिकालीन कार्यक्रम जागरण, भंडारा, पूजा-पाठ वर्जित के कारण गुरु पूर्णिमा एक दिन पहले भी मनाना कोई दोष नहीं है, क्योंकि पूर्णिमा का प्रवेश रात्रि में होगा
ग्रहण ऐसे समय में पड़ रहे हैं जब 9 में से 6 ग्रह वक्री अर्थात उल्टी चाल चल में रहेंगे। साथ ही 18 जुलाई को नवग्रहों में कालसर्प योग की छाया रहेगी। इसके कारण सभी ग्रह राहु-केतु के अधीन आ जाएंगे। यह संयोग न केवल मानसून को प्रभावित करेगा बल्कि प्राकतिक आपदाओं की आशंकाएं भी पैदा करता है। 27 को भारत में पड़ रहा खग्रास चंद्र ग्रहण का प्रारंभ रात 11=54 बजे होगा, जबकि इसकी समाप्ति रात 3=49 पर होगी। इससे 18 जुलाई से एक महीने तक विश्व में कहीं भी जन्म लेने वाले शिशु की कुंडली में कालसर्प दोष रहेगा
पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के समय राहु देवताओं के बिच छल से बैठ गया था। समुद्र मंथन में निकले चौदह रत्न में अम्रत भी था। जब मोहनी रूप धारण कर भगवान विष्णु देवताओं को अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु भी देवताओं का रूप धारण कर छल से देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। उसने देवताओं के साथ-साथ अमृत पान कर लिया।
सूर्य और चंद्रमा ने राहु को ऐसा करते हुए देख लिया। उन्होंने भगवान विष्णु को तत्कल इसके बारे में बताया तो क्रोध में भगवान विष्णु ने चक्र से राहु का सिर काट दिया, लेकिन तब तक राहु अमृतपान कर चुका था। इसलिए उसकी मृत्यु नहीं हुई उसका मस्तक वाला भाग राहु और धड़ वाला भाग केतु बन गया।
देवताओं के साथ छल-छदम का दुष्परिणाम तो आखिरकार राहु को भुगतना ही पड़ा। मगर, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने दुष्कर्म पर पछताप भी नहीं होता। राहु के साथ भी ऐसा ही था। चंद्रमा और और सूर्य ने राहु को ऐसा करते हुए पकड़ा था, तब से राहु उनसे बैर रखता है। वह समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसने की कोशिश करता है, जिससे ग्रहण लगता है।
राहु और केतु ग्रह तो है नहीं, तो क्या हैं
राहु और केतु का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। इन्हें छाया ग्रह की क्षेणी में रखा गया है। दरअसल, हर वयक्ति या वस्तु की छाया होती है। उसी तरह ग्रहों की छाया को भी ग्रह की श्रेणी में रखा गया है। जब सूर्य, चंद्रमा और धरती एक सीध में आ जाते हैं, तो सूर्य की छाया को यदि पृथ्वी रोक लेती है, तो चंद्रमा दिखाई नहीं देता है
इस स्थिति में चंद्र ग्रहण होता है। वहीं, जब सूर्य और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है, तो वह सूर्य की छाया को धरती तक नहीं पहुंचने देता है, जिससे सूर्य ग्रहण होता है। यानी पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्य और चंद्र ग्रहण होते हैं। यह छाया ही राहु और केतु कहलाती है।
ज्योतिष में गणना बिंदु हैं राहु और केतु
सूर्य के चारों ओर धरती परिक्रमा करती है और धरती के चारों ओर चंद्रमा घूमता है। ये दोनों परिभ्रमण पथ एक-दूसरे को 2 बिंदुओं पर काटते हैं। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चन्द्र के परिभ्रमण-पथ पर कटने वाले दोनों बिंदु लंबवत होते हैं। इन्हीं बिंदुओं के एक सीध में होने पर अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण और पूर्णिमा की रात को चंद्र ग्रहण होता है। प्राचीन ज्योतिषियों ने इन बिंदुओं को महत्वपूर्ण समझते हुए इन बिंदुओं का नाम 'राहु' और 'केतु' रखा था।
कुंडली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि और 180 अंश की दूरी पर होते हैं, जो सामान्यत: कुंडली में आमने-सामने स्थित होते हैं। इनकी दैनिक गति 3 कला और 11 विकला हैं। ज्योतिष के अनुसार 18 वर्ष 7 माह 18 दिवस और 15 घटी- ये संपूर्ण राशियों में भ्रमण करते हैं
ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय
सनातन धर्मानुसार ऋषि मुनियों ने इनके दुष्प्रभाव से बचने के लिए कुछ उपाय बताए हैं जो कि निम्न है:
1.ग्रहण में सभी वस्तुओं में कुश डाल देनी चाहिए कुश से दूषित किरणों का प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि कुश जड़ी- बूटी का काम करती है.
2. ग्रहण के समय तुलसी और शमी के पेड़ को नहीं छूना चाहिए. कैंची, चाकू या फिर किसी भी धारदार वस्तु का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
3. ग्रहण में किसी भी भगवान की मूर्ति और तस्वीर को स्पर्श नहीं चाहिए. इतना ही नहीं सूतक के समय से ही मंदिर के दरवाजे बंद कर देने चाहिए.
4. ग्रहण के दिन सूतक लगने के बाद छोटे बच्चे, बुजुर्ग और रोगी के अलावा कोई व्यक्ति भोजन नहीं करे.
5. ग्रहण के समय खाना पकाने और खाना नहीं खाना चाहिए, इतना ही नहीं सोना से भी नहीं चाहिए. ऐसा कहा जाता है कि ग्रहण के वक्त सोने और खाने से सेहत पर बुरा असर पड़ता है.
6. क्योंकि ग्रहण के वक्त वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो कि बच्चे और मां दोनों के लिए हानिकारक मानी जाती है.
7. गर्भावस्था की स्थिति में ग्रहण काल के समय अपने कमरे में बैठ कर के भगवान का भजन ध्यान मंत्र या जप करें.
8. ग्रहण काल के समय प्रभु भजन, पाठ , मंत्र, जप सभी धर्मों के व्यक्तियों को करना चाहिए, साथ ही ग्रहण के दौरान पूरी तन्मयता और संयम से मंत्र जाप करना विशेष फल पहुंचाता है. इस दौरान अर्जित किया गया पुण्य अक्षय होता है। कहा जाता है इस दौरान किया गया जाप और दान, सालभर में किए गए दान और जाप के बराबर होता है.
9. ग्रहण के दिन सभी धर्मों के व्यतियों को शुद्ध आचरण करना चाहिए
10. किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहिए, सब के साथ करना चाहिए.
11. सभी के साथ अच्छा व्यवहार करें, और मीठा बोलें.
12. ग्रहण के समय जाप, मंत्रोच्चारण, पूजा-पाठ और दान तो फलदायी होता ही है.
13. ग्रहण मोक्ष के बाद घर में सभी वस्तुओं पर गंगा जल छिड़कना चाहिए, उसके बाद स्नान आदि कर के भगवान की पूजा अर्चना करनी चाहिए और हवन करना चाहिए और भोजन दान करना चाहिए. धर्म सिंधु के अनुसार ग्रहण मोक्ष के उपरांत हवन करना, स्नान, स्वर्ण दान, तुला दान, गौ दान भी श्रेयस्कर है.
14. ग्रहण के समय वस्त्र, गेहूं, जौं, चना आदि का श्रद्धानुसार दान करें , जो कि श्रेष्ठकर होता है
चन्द्रग्रहण का राशियों पर प्रभाव रहेगा
15 शुभफलदायक-मेष, सिंह, वृश्चिक, मीन
16 मध्यमफलदायक-वृषभ, कर्क, कन्या, धनु
16 अशुभ फलदायक-मिथुन, तुला, मकर, कुंभ
17 अत: वृषभ, कर्क, कन्या, धनु, मिथुन, तुला, मकर, कुंभ राशिवाले जातकों को ग्रहण के दर्शन करना शुभ नहीं रहेगा।
18 यह खग्रास चन्द्रग्रहण मकर राशि पर मान्य है इसलिए मकर राशिवाले जातकों को यह ग्रहण विशेष रूप से अनिष्ट फलदायक रहेगा। ग्रहण अवधि में घर रहकर अपने ईष्टदेव का पूजन, जप, तप, आराधन करना श्रेयस्कर रहेगा।
19 मिथुन, तुला, मकर, कुंभ राशिवालों को नीचे दी गई वस्तुओं का दान करना लाभप्रद रहेगा
मिथुन-हरे वस्त्र, मूंग, हरे फ़ल, कांसा, धार्मिक पुस्तकें इत्यादि।
20 तुला-श्वेत वस्त्र, सौंदर्य सामग्री, चांदी, चावल, दूध-दही, शकर, घी, सफ़ेद फूल इत्यादि।
21 मकर-काला वस्त्र, उड़द, काले-तिल, सुगन्धित तेल, छाता, कम्बल इत्यादि।
22 कुंभ नीला वस्त्र, कोयला, चमड़े के जूते, लोहा, सरसों का तेल, इमरती इत्यादि।
23   ॐ अमृतंग अन्गाये विद्ममहे कलारुपाय धीमहि,तन्नो सोम प्रचोदयात
ॐ अत्रि पुत्राय विद्महे सागरोद्भवाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात!
24  चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भव
श्चाग्नेयः चतुरस्स्र्रवारुणमुखश्चापोप्युमाधीश्वरः ।।
षट्सप्ताग्निदशशोभनफलो ज्ञोरिः गुरोर्कप्रियः
स्वामीयामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ।।
25  सेतो वर्ण भएका, कर्कटराशिका मालिक, गोचरमा छैठौं, सातौं र दसौं स्थानमा शुभफल प्रदान गर्ने, सूर्य र बृहस्पति मित्र भएका, बुध शत्रु हुने, यामुनदेशमा उत्पन्न, उमा र ईश्वर अधिदेवता हुने, ग्रहसभामा आग्नेयकोणमा धनुष आकारमा विराजमान, आग्नेय दिशाका मालिक आत्रेयगोत्र भएका चन्द्रले हामीलाई माङ्गल्य प्रदान गरून् 

ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:।
वाक् सिद्धि हेतु,,,ॐ ह्लीं दूं दूर्गाय: नम:
लक्ष्मी प्राप्ति हेतु तांत्रिक मंत्र,,,,ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं ऐं ॐ स्वाहा:।
नौकरी एवं व्यापार में वृद्धि हेतु प्रयोग.,,,ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:।

मुकदमे में विजय के लिए,,,ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीं ओम् स्वाहा।।
।।,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557



Monday, 9 July 2018

श्री रामचरित मानस के सिद्ध ‘मन्त्र’

श्री रामचरित मानस के सिद्ध मन्त्र मानस के दोहे चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र जप की आवश्यकता हो उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये। अष्टांग हवन सामग्री 1 चन्दन का बुरादा 2 तिल 3 शुद्ध घी4 चीनी 5 अगर 6 तगर, 7 कपूर 8 शुद्ध केसर 9 नागरमोथा 10 पञ्चमेवा,11 जौ और 12 चावल। जानने की बातें जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) 108 बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल देना चाहिये। प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से 108 आहुति के लिये एक सेर (80 तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम किशमिश (द्राक्षा) अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध 4 आने भर ही डालने से काम चल जायेगा हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता 108 की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये। मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं। सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार 108 आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा। एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम 108 बार प्रातःकाल या रात्रि को जब सुविधा हो जप करते रहना चाहिये। कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये। 1 विपत्ति नाश के लिये राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक। 2 संकट-नाश के लिये जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी। 3 कठिन क्लेश नाश के लिये हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू 4 विघ्न शांति के लिये सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही 5 खेद नाश के लिये जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए 6 चिन्ता की समाप्ति के लिये जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू 7 विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा 8 मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे 9 विष नाश के लिये नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को। 10 अकाल मृत्यु निवारण के लिये नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट 11 सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये भूत भगाने के लिये प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन। जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर 12 नजर झाड़ने के लिये स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी। 13 खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। 14 जीविका प्राप्ति केलिये बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई। 15 दरिद्रता मिटाने के लिये अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।। 16 लक्ष्मी प्राप्ति के लिये जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ। 17 पुत्र प्राप्ति के लिये प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान। 18 सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि। 19 ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ। 20 सर्वबसुख प्राप्ति के लिये सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। 21 मनोरथ सिद्धि के लिये भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि। 22 कुशल क्षेम के लिये भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू। 23 मुकदमा जीतने के लिये पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना। 24 शत्रु के सामने जाने के लिये कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥ 25 शत्रु को मित्र बनाने के लिये गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई। 26 शत्रुतानाश के लिये बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई 27 वार्तालाप में सफ़लता के लिये तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा 28 विवाह के लिये तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै 29 यात्रा सफ़ल होने के लिये प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा 30 परीक्षा शिक्षा की सफ़लता के लिये जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती 31 आकर्षण के लिये जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू 32 स्नान से पुण्य-लाभ के लिये सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग। 33 निन्दा की निवृत्ति के लिये राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी। 34 विद्या प्राप्ति के लिये गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई 35 उत्सव होने के लिये सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु। 36 यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग। 37 प्रेम बढाने के लिये सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती 38 कातर की रक्षा के लिये मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ। 39 भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग । सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग 40 विचार शुद्ध करने के लिय ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ। 41 संशय-निवृत्ति के लिये राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी। 42 ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।। 43 विरक्ति के लिये भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं। सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।। 44 ज्ञान-प्राप्ति के लिये छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। 45 भक्ति की प्राप्ति के लिये भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।। 46 श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।। 47 मोक्षप्राप्ति के लिये सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।। 48 श्री सीताराम के दर्शन के लिये नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम । लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥ 49 श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।। 50श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान। देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।। 51 सहज स्वरुप दर्शन के लिये । भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।। Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

Friday, 6 July 2018

राहु की युति

राहु की युति 
1. राहु + सूर्य की युति।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
सूर्य और राहु दो ऐसे ग्रह हैं जो एक दूसरे से विपरीत होते हुए भी अनेक प्रकार से समान हैं | दोनो ही ग्रह दार्शनिकता और राजनीति के कारक भी हैं | कुडंली मे दोनो की युति ग्रहण योग का निर्माण करती है | यह युति जिस भाव मे बनती है उसके फलो को न्यून करती है | परन्तु ऐसा जातक जिसकी कुंडली मे यह योग होता है वे राजनैतिक सफलता प्राप्त करता है | मेरे अनुभव मे यह आया है कि यदि यह योग 9,10,11 भाव मे बनता है तो ऐसे व्यक्ति राजनीति मे सफल होते देखे गए हैं | शायद यह इसलिए हुआ कि राहु और सूर्य दोनो ही राजनीति, प्रभुत्व एवं सत्ता के कारक ग्रह हैं
2. राहु + चंद्र की युति
राहु और चंद्र दो विपरीत ग्रह परन्तु अनेक प्रकार से समान भी हैं | दोनो ही धन तथा यात्रा के ग्रह हैं | इन दोनो की युति ग्रहण योग का निर्माण करती है जो कि मानसिक बेचैनी का कारण बनती है | इस युति पर यदि बुध की दूषित दृष्टि हो तो त्वचा रोग होता है | परन्तु इस प्रकार के परिणाम लगनस्थ राहु + चंद्र के होने से देखे गए हैं | इस योग के शुभ परिणाम भी आते हैं | अतः इस योग के होने से ज्यादा घबडाने की आवश्यकता नही है | यदि यह युति 3, 7 व 9 भावो मे हो तो यात्राएं करनी पडती हैं | इस योग मे यदि गुरु की शुभ दृष्टि हो तो ऐसे जातक का जीवन शीशे के समान पारदर्शी एवं निष्पक्ष होता है | 11वें भाव मे यदि यह युति शुभ प्रभाव लेकर बैठी हो तो अचानक धन लाभ भी होता है | इसी प्रकार चंद्र यदि चतुर्थेश होकर राहु के साथ 12वें भाव मे युति बनाए तो विदेश यात्रा से इंकार नही किया जा सकता |
3.मंगल + राहु की युति
मंगल और राहु एक दूसरे के शत्रु ग्रह हैं परन्तु साहस,पराक्रम, शत्रु, षडयंत्र, झगडे, विवाद जैसे विषयो मे इनकी समानता है | कुंडली मे इनकी युति अंगारक योग का निर्माण करती है | जिसके फलस्वरुप कुंडली धारक का व्यक्तित्व अतिक्रोधी, कठोर, दुःसाहसी और षडयंत्रकारी होता है | प्रायः इस योग के गलत परिणाम 1, 2, 3, 4, 7, 8 व 12 भाव मे देखने को मिलते हैं | 5 भाव मे यह युति सत्ता पक्ष से लाभ दिलाती है | 6 भाव मे यह युति सर्जन बना सकती है | 9,10,11 भाव मे यह युति राजनीति मे सफलता व प्रभुता संपन्न बनाती है |
बुध + राहु युति
बुध और राहु की युति होने से जडत्व योग बनता है | यह योग जातक को सामन्यतः चालाक बनाता है | यदि इस युति पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक अनेक भाषाओं का ज्ञाता होता है तथा बडी चालाकी से अपने कार्यो को सफल कर लेता है | यदि यह योग 1 तथा 6 भाव मे बनता है तो लाइलाज वीमारी देता है | 4 तथा 5 भाव मे यह योग शिक्षा मे विघ्न देता है | 2 व 11 भाव मे अनावश्यक खर्च देता है | 3 भाव मे संबधियो से व 7 भाव मे जीवन साथी से मतभेद देता है | 9 भाव मे यह युति जातक को नास्तिक बनाती है | 10 भाव मे होने से जातक नीतिगत फैसले लेने मे अपने आपको असफल पाता है | 12 भाव मे यह युति शैय्या सुख मे कमी करता है | इस प्रकार विभिन्न भावो मे जडत्व योग अशुभ ही परिणाम देता है परन्तु गुरु की इस योग पर दृष्टि होने से राहत की अपेक्षा की जा सकती है | यदि बुध अस्त न हो तथा बुध केन्द्रेश या त्रिकोणेश हो कर केन्द्र या त्रिकोण पर जडत्व योग बनाए तो यह योग राजयोग कारक होता है तथा जातक बडी चालाकी से अपने समस्त कार्यो को संपादित करता हुआ सफलता के शिखर पर पहुँच जाता है | यदि गुरु का सपोर्ट मिला तो सोने मे सुहागा |
4.गुरु + राहु की युति
गुरु +राहु की युति चांडाल योग का निर्माण करती है। जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रहों की युति होती है, वह परंपरा विरोधी और आध्यात्मिकता में रूचि न रखने वाला होता है। ऐसी स्थिति में राहु गुरु के सात्विक और शुभ गुणों को कम कर देता है। जिस जातक की कुंडली में लग्न में गुरु राहु की युति होती है वह नास्तिक, पाखंडी तथा धार्मिकता में रूचि न रखने वाला होता है। धन भाव में यह योग दरिद्रता का सूचक माना जाता है। किंतु यही युति यदि पंचम, नवम अथवा केंद्र भावों में हो तो ऐसा जातक ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता होता है। तृतीय, सप्तम में धार्मिक यात्राएं तथा दशम, एकादश भाव में राजनीति में सफलता मिलती है। ऐसी स्थिति में यदि राहु गुरु के नक्षत्र में भी हो तो ऐसा जातक सफल राजनेता हो सकता है। एकादश तथा द्वादश भावों में यदि यह युति है तो ऐसा जातक तंत्र साधना अथवा तांत्रिक कार्यों के द्वारा भी धनार्जन करता है। चांडाल योग का निर्माण करती है। जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रहों की युति होती है, वह परंपरा विरोधी और आध्यात्मिकता में रूचि न रखने वाला होता है। ऐसी स्थिति में राहु गुरु के सात्विक और शुभ गुणों को कम कर देता है। जिस जातक की कुंडली में लग्न में गुरु राहु की युति होती है वह नास्तिक, पाखंडी तथा धार्मिकता में रूचि न रखने वाला होता है। धन भाव में यह योग दरिद्रता का सूचक माना जाता है। किंतु यही युति यदि पंचम, नवम अथवा केंद्र भावों में हो तो ऐसा जातक ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता होता है। तृतीय, सप्तम में धार्मिक यात्राएं तथा दशम, एकादश भाव में राजनीति में सफलता मिलती है। ऐसी स्थिति में यदि राहु गुरु के नक्षत्र में भी हो तो ऐसा जातक सफल राजनेता हो सकता है। एकादश तथा द्वादश भावों में यदि यह युति है तो ऐसा जातक तंत्र साधना अथवा तांत्रिक कार्यों के द्वारा भी धनार्जन करता है।
5.शुक्र + राहु की युति
राहु के साथ यदि शुक्र लग्न में है तो ‘क्रोध योग’ का निर्माण होता है। यह योग जातक को क्रोधी स्वभाव का स्वामी बनाकर आजीवन लड़ाई-झगड़े एवं विवाद का कारण बनता है, जिसके फलस्वरूप जातक को अपने कटु स्वभाव के कारण अपने जीवन में अनेकानेक नुकसान उठाने पड़ते हैं। शुक्र और राहु एक दूसरे के परम मित्र ग्रह हैं। शुक्र प्रेम, विवाह, सौंदर्य, घुंघराले बाल एवं श्याम वर्ण इत्यादि का कारक ग्रह है। राहु भी गुप्त संबंधों एवं प्रेम संबंधों का कारक है। व्यक्ति को श्याम वर्ण ही देता है। कुंडली में दोनों ग्रहों की युति जातक को विपरीत लिंग के प्रति स्वाभाविक आकर्षण प्रदान करती है। यदि शुक्र राहु की युति पति पत्नी दोनों की कुंडली में सप्तम भाव में है तो वैवाहिक जीवन में कष्ट एवं संबंध विच्छेद का कारण भी बनती है। ऐसे जातक के अन्यत्र संबंध अवश्य ही बनते हैं।
6.शनि + राहु की युति
शनि के साथ राहु की युति को ज्योतिष में ‘नन्दी योग’ के नाम से जाना जाता है। यह युति जिस भाव में बनती है उस भाव से संबंधित कष्ट एवं जिस भाव पर दृष्टि डालती है उससे संबंधित शुभ फल प्रदान करती है। इस योग के फलस्वरूप जातक को सुख, वैभव एवं समृद्धि भी प्राप्त होती है। शनि राहु की युति पर यदि मंगल का प्रभाव भी आ जाये तो ऐसा जातक साधारणतया क्रूर एवं आतंकवादी प्रवृत्ति का होता है। यह युति यदि लग्न में आ जाये तो ऐसा जातक हत्या या आत्महत्या का प्रयास भी कर सकता है। लग्न में शनि$राहु के फलस्वरूप क्षीण स्वास्थ्य, द्वितीय भाव में धनाभाव, तृतीय भाव में संबंधियों से विरोध, चतुर्थ में माता के लिये अशुभ, पंचम में सफलता मंग कमी, षष्ठ भाव में रोग, सप्तम में जीवन साथी से वैमनस्य, अष्टम में पैतृक संपत्ति प्राप्त करने में अड़चनंे, नवम में निर्बल भाग्य, दशम में व्यवसाय में परेशानी, एकादश में लाभ कम तथा द्वादश भाव में भी वैवाहिक सुख में कमी होती है।
राहु से विस्तार की बात केवल इसलिये की जाती है क्योंकि राहु जिस भाव और ग्रह में अपना प्रवेश लेता है उसी के विस्तार की बात जीव के दिमाग में शुरु हो जाती है,कुंडली में जब यह व्यक्ति की लगन में होता है तो वह व्यक्ति को अपने बारे में अधिक से अधिक सोचने के लिये भावानुसार और राशि के अनुसार सोचने के लिये बाध्य कर देता है जो लोग लगातार अपने को आगे बढाने के लिये देखे जाते है उनके अन्दर राहु का प्रभाव कहीं न कहीं से अवश्य देखने को मिलता है। लेकिन भाव का प्रभाव तो केवल शरीर और नाम तथा व्यक्ति की बनावट से जोड कर देखा जाता है लेकिन राशि का प्रभाव जातक को उस राशि के प्रति जीवन भर अपनी योग्यता और स्वभाव को प्रदर्शित करने के लिये मजबूर हो जाता है। राहु विस्तार का कारक है,और विस्तार की सीमा कोई भी नही होती है,पौराणिक कथा के अनुसार राहु की माता का नाम सुरसा था,और जब हनुमान जी सीताजी की खोज के लिये समुद्र पार कर रहे थे तो देवताओं ने हनुमानजी की शक्ति की परीक्षा के लिये सुरसा को भेजा था । सुरसा को छाया पकड कर आसमानी जीवों को भक्षण करने की शक्ति थी,हनुमान जी की छाया को पकड कर जैसे ही सुरसा ने उन्हे अपने भोजन के लिये मुंह में डालना चाहा उन्होने अपने पराक्रम के अनुसार अपनी शरीर की लम्बाई चौडाई को सुरसा के मुंह से दो गुना कर लिया,आखिर तक जितना बडा रूप सुरसा अपने मुंह का बनाने लगी और उससे दोगुना रूप हनुमानजी बनाने लगे,जब कई सौ योजन का मुंह सुरसा का हो गया तो हनुमानजी ने अपने को एक अंगूठे के आकार का बनाकर सुरसा के पेट में जाकर और बाहर आकर सुरसा को माता के रूप में प्रणाम किया और सुरसा की इच्छा को पूरा होना कहकर सुरसा से आशीर्वाद लेकर वे लंका को पधार गये थे। पौराणिक कथाओं के ही अनुसार सुरसा को अहिन यानी सर्पों की माता के रूप में भी कहा गया है। जब कभी राहु के बारे में किसी की कुंडली में विवेचना की है तो कहने से कहीं अधिक बातें कुंडली में देखने को मिली है। राहु चन्द्रमा के साथ मिलकर अपना रूप जब प्रस्तुत करता है तो वह अपनी शक्ति और राशि के अनुसार अपने को कैमिकल के रूप में प्रस्तुत करता है। तरल राशि के प्रभाव में वह बहता हुआ कैमिकल बन जाता है गुरु रूपी हवा के साथ मिलकर वह गैस के रूप में अपनी योग्यता को प्रकट करने लगता है,शनि रूपी पत्थर के साथ मिलकर वह सीमेंट का रूप ले लेता है,और वही शनि अगर पंचम भाव में होता है तो अनैतिकता की तरफ़ ले जाने के लिये अपनी शक्ति को प्रदान करने लगता है। शुक्र के साथ आजाने से राहु का स्वभाव असीम प्यार मोहब्बत वाली बातें करने लगता है और बुध के साथ मिलकर वह केलकुलेशन के मामले में अपनी योग्यता को कम्पयूटर के सोफ़्टवेयर की तरह से सामने हाजिर हो जाता है। सूर्य के साथ मिलकर राज्य की तरफ़ उसका आकर्षण बढ जाता है और जब राहु और सूर्य दोनो ही बलवान होकर पंचम नवम एकादस में अपनी युति राज्य की कारक राशि में स्थान बनाते है तो बडा राजनीतिक बनाने में राहु का पहला प्रभाव ही माना जाता है। मिथुन राशि में राहु का प्रभाव व्यक्ति के अन्दर भाव के अनुसार प्रदर्शित करने की कला को देता है और धनु राहु में राहु अपनी नीचता को प्रकट करने के बाद बडे बडे अनहोनी जैसे कारण पैदा कर देता है और व्यक्ति की जीवनी को आजन्म और उसके बाद भी लोगों के लिये सोचने वाली बात को बनाने से नही चूकता है।
राहु का असर तब और देखा जाता है जब व्यक्ति क नवें भाव में जाकर वह पुराने संस्कारों को तिलांजलि देने के कारकों में शामिल हो जाता है और जिस कुल या समाज में जातक का जन्म होता है जिन संस्कारों में उसकी प्राथमिक जीवन की शुरुआत होती है उन्हे भूलने और समझ मे नही आने के कारण जब वह धन भाग्य और न्याय वाली बातों तथा ऊंची शिक्षाओं अथवा अपने समाज के विपरीत समाज में प्रवेश करने के बाद उसे सोचने के लिये मजबूर होना पडता है। शनि के घर में राहु के प्रवेश होने के कारण तथा व्यक्ति की लगन में होने पर राहु शनि की युति अगर महिला की कुंडली में हो तो शरीर को ढककर चलने के लिये अपनी सोच को देता है और जब वह सप्तम स्थान में चन्द्रमा के साथ अपनी युति बना लेता है जो आजन्म जीवन साथी की सोच को समझने के प्रति असमर्थ बना देता है। राहु को अगर मंगल की युति मुख्य त्रिकोण में मिलती है तो जातक को आजीवन प्रेसर वाले रोग मिलते है। और खून के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन वाली बीमारी मिलती है,महिलाओं की कुंडली में राहु अगर दूसरे भाव में होता है तो अक्सर झाइयां मुंहासे और चेहरे को बदरंग बनाने से नही चूकता है तथा पुरुष के चेहरे वाली राशि में होता है तो जातक को दाडी बढाने और चेहरे पर तरह तरह के बालों के आकार बनाने में बडा अच्छा लगता है। लगन का मंगल राहु क्षत्रिय जाति से अपने को सूचित करता है,मंगल की सकारात्मक राशि वृश्चिक राशि में अपना प्रभाव देने के कारण वह मुस्लिम संप्रदाय से अपनी युति को जोडता है और चन्द्रमा की राशि कर्क को वह अपनी मोक्ष और धर्म के प्रति आस्थावान बनाता है। गुरु राहु मंगल की युति से जातक को सिक्ख सम्प्रदाय से जोडता है और केतु के साथ शनि के होने से वह ईशाई सम्प्रदाय से सम्बन्धित बात को भी बताता है,बुध के साथ केतु के होने से राहु व्यापार की कला में और खरीदने बेचने के कार्यों में कुशलता देता है।
राहु को सम्भालने के लिये जातक को मंगल का सहारा लेना पडता है। मंगल तकनीक है तो राहु विस्तार अगर विस्तार को तकनीकी रूप में प्रयोग में लाया जाये तो यह अन्दरूनी शक्ति बडे बडे काम करती है। वैसे तो झाडी वाले जंगल को भी अष्टम राहु के लिये जाना जाता है लेकिन उन्ही झाडियों को औषिधि के रूप में प्रयोग करने की कला का अनुभव हो जाये तो जंगल की झाडियां भी तकनीकी कारणों से काम करने के लिये मानी जा सकती है। शनि के अन्दर राहु और केतु का प्रवेश हमेशा से माना जाता है,शनि को अगर सांप माना जाये तो राहु उसका मुंह है और केतु उसकी पूंछ जब भी शनि को कोई कारण जीवन के लिये पैदा करना होता है तो वह हमेशा के लिये समाप्त या हमेशा के लिये विस्तार करवाने के लिये राहु का प्रयोग करता है और उसे केवल झटका देकर बढाने या घटाने की बात होती है तो वह केतु का प्रयोग करता है। सूर्य को समाप्त करने के बाद जो सबसे पहले कारण पैदा होता है वह आसमान की तरफ़ जाने वाला प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के लिये माना जाता है। जैसे सूर्य को लकडी के रूप में जाना जाता है और जब सूर्य (लकडी) मंगल (ताप) और गुरु (हवा) का सहारा लेकर जलाया जाता है तो राहु धुंआ के रूप में आसमान में ऊपर की ओर जाते हुये अपनी उपस्थिति को दर्शाता है।
राहु को रूह का भी रूप दिया जाता है अगर यह अष्टम स्थान में वृश्चिक राशि का है तो यह शमशानी आत्मा के रूप में जाना जाता है.इस स्थान का राहु या तो कोई ऐसी बीमारी देता है जिससे जूझने के लिये जातक को आजीवन जूझना पडता है और धर्म अर्थ काम और मोक्ष के कारणों से दूर करता है या घर के अन्दर अपनी करतूतों से शमशानी क्रियायें आदि करने या खुद के द्वारा सम्बन्धित कारणों को समाप्त करने के बाद खाक में मिलाने के जैसा व्यवहार करता है,पैदा होने के पहले भी माता बीमार रहती है पिता को तामसी भोजनों पर विस्वास होता है और जातक के पैदा होने के बाद आठवीं साल की उम्र से कोई शरीर का रोग अक्समात लग जाता है जो आजीवन साथ नही छोडता है
उपायों से भी होगा चांडाल दोष में लाभ

योग्य गुरु की शरण में जाएँ, अपने गुरु की निस्‍वार्थ भाव से सेवा करें और आशीर्वाद प्राप्त करें। स्वयं हल्दी और केसर का टीका लगाएँ।
निर्धन विद्यार्थियों को अध्ययन में सहायता करें।
राहु ग्रह का जप-दान करने से लाभ होगा।
गाय को भोजन कराएं एवं नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करें।
कोई भी महत्‍वपूर्ण निर्णय लेते समय बड़ों की राय अवश्‍य लें।
अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें एवं प्रसन्‍न रहें।
बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करें और अपने माता-पिता का आदर करे
नियमित रूप से स्वयं हल्दी और केसर का टीका लगाने से लाभ होगा।
भगवान गणेश और देवी सरस्वती की आराधना करें और मंत्र का जाप करें।
बरगद के वृक्ष में कच्चा दूध डालें और केले के वृक्ष का भी पूजन करें।
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Tuesday, 3 July 2018

दुर्गा माँ के लोक कल्याणकारी सिद्ध मन्त्र

दुर्गा माँ के लोक कल्याणकारी सिद्ध मन्त्र
१॰ बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये
“सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:॥” (अ॰१२,श्लो॰१३)
अर्थ :- मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
२॰ बन्दी को जेल से छुड़ाने हेतु
“राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे।।” (अ॰१२, श्लो॰२७)
३॰ सब प्रकार के कल्याण के लिये
“सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥” (अ॰११, श्लो॰१०)
अर्थ :- नारायणी! तुम सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।
४॰ दारिद्र्य-दु:खादिनाश के लिये
“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता॥” (अ॰४,श्लो॰१७)
अर्थ :- माँ दुर्गे! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दु:ख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दया‌र्द्र रहता हो।
४॰ वित्त, समृद्धि, वैभव एवं दर्शन हेतु
“यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि।।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः।
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने।।
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके।। (अ॰४, श्लो॰३५,३६,३७)
५॰ समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये
“विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति :॥” (अ॰११, श्लो॰६)
अर्थ :- देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे एवं परा वाणी हो।
६॰ शास्त्रार्थ विजय हेतु
“विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु च का त्वदन्या।
ममत्वगर्तेऽति महान्धकारे, विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्।।” (अ॰११, श्लो॰ ३१)
७॰ संतान प्राप्ति हेतु
“नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भ सम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी” (अ॰११, श्लो॰४२)
८॰ अचानक आये हुए संकट को दूर करने हेतु
“ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्ॐ।।” (अ॰११, श्लो॰५५)
९॰ रक्षा पाने के लिये
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥
अर्थ :- देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।
१०॰ शक्ति प्राप्ति के लिये
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ :- तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।
११॰ प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव॥
अर्थ :- विश्व की पीडा दूर करनेवाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पडे हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियों की पूजनीया परमेश्वरि! सब लोगों को वरदान दो।
१२॰ विविध उपद्रवों से बचने के लिये
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥
अर्थ :- जहाँ राक्षस, जहाँ भयंकर विषवाले सर्प, जहाँ शत्रु, जहाँ लुटेरों की सेना और जहाँ दावानल हो, वहाँ तथा समुद्र के बीच में भी साथ रहकर तुम विश्व की रक्षा करती हो।
१३॰ बाधा शान्ति के लिये
“सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥” (अ॰११, श्लो॰३८)
अर्थ :- सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
१४॰ सर्वविध अभ्युदय के लिये
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्ग:।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥
अर्थ :- सदा अभ्युदय प्रदान करनेवाली आप जिन पर प्रसन्न रहती हैं, वे ही देश में सम्मानित हैं, उन्हीं को धन और यश की प्राप्ति होती है, उन्हीं का धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा वे ही अपने हृष्ट-पुष्ट स्त्री, पुत्र और भृत्यों के साथ धन्य माने जाते हैं।
१५॰ सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति के लिये
पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
अर्थ :- मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्‍‌नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो।
१६॰ आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :- मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।
१७॰ महामारी नाश के लिये
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
अर्थ :- जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा- इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो।
१८॰ रोग नाश के लिये
“रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥” (अ॰११, श्लो॰ २९)
अर्थ :- देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवाञ्छित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।
१९॰ विपत्ति नाश के लिये
“शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥” (अ॰११, श्लो॰१२)
अर्थ :- शरण में आये हुए दीनों एवं पीडितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीडा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।
२०॰ पाप नाश के लिये
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥
अर्थ :- देवि! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मो से रक्षा करती है।
१७॰ भय नाश के लिये
“सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु न: सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥ ” (अ॰११, श्लो॰ २४,२५,२६)
अर्थ :- सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्ति यों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है। कात्यायनी! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है। भद्रकाली! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयंकर और समस्त असुरों का संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल भय से हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है।
२१॰ विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति के लिये
करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:।
अर्थ :- वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले।
२२॰ विश्व की रक्षा के लिये
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥
अर्थ :- जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रतारूप से, शुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिये।
२३॰ विश्व के अभ्युदय के लिये
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयि भक्ति नम्रा:॥
अर्थ :- विश्वेश्वरि! तुम विश्व का पालन करती हो। विश्वरूपा हो, इसलिये सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान् विश्वनाथ की भी वन्दनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देनेवाले होते हैं।
२४॰ विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश के लिये
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
अर्थ :- शरणागत की पीडा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत् की अधीश्वरी हो।
२५॰ विश्व के पाप-ताप निवारण के लिये
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्य:।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥
अर्थ :- देवि! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत् का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी आदि बडे-बडे उपद्रवों को शीघ्र दूर करो।
२६॰ विश्व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिये
यस्या: प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तु मलं बलं च।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥
अर्थ :- जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत् का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का विचार करें।
२७॰ सामूहिक कल्याण के लिये
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्शेषदेवगणशक्ति समूहमूत्र्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा न:॥
अर्थ :- सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगों का कल्याण करें।
२८॰ भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति के लिये
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
२९॰ पापनाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिये
नतेभ्यः सर्वदा भक्तया चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
३०॰ स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिये
सर्वभूता यदा देवि स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥
३१॰ स्वर्ग और मुक्ति के लिये
“सर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य ह्रदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोस्तुऽते॥” (अ॰११, श्लो८)
३२॰ मोक्ष की प्राप्ति के लिये
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
३३॰ स्वप्न में सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये
दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके।
मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय॥
३४॰ प्रबल आकर्षण हेतु
“ॐ महामायां हरेश्चैषा तया संमोह्यते जगत्,
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।” (अ॰१, श्लो॰५५)!Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557

Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...