Sunday, 1 March 2020

होलाष्टक 2020, 3 मार्च, मंगलवार को शुरू हो रहा है।

होलाष्टक 2020, 3 मार्च, मंगलवार को शुरू हो रहा है। होलाष्टक एक अशुभ अवधि है जो होलिका दहन और होली से ठीक पहले पड़ता है। वैज्ञानिक शोधों और पौराणिक मान्यताओं दोनों के अनुसार, इस समय के दौरान हमारे वातावरण में नकारात्मक ऊर्जाएं प्रवेश करती हैं। होली के दिन के विपरीत, ये आठ दिन वास्तव में अप्रभेद्य, अशुभ और अप्राप्य हैं। वार्षिक रूप से, यह कृष्ण पक्ष के 8 वें दिन पड़ता है। होलाष्टक 2020, 3 मार्च, मंगलवार को शुरू हो रहा है। आमतौर पर, यह अवधि आठ दिनों की अवधि के लिए रहती है, इस प्रकार, इसे होलाष्टक कहा जाता है। हालांकि, ज्योतिषीय पक्ष और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर, यह सात दिनों तक भी चल सकता है। यह अवधि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शुरू होती है। इसका समापन होलिका दहन पूजा के साथ होता है। 2020 में, होलाष्टक 9 मार्च, सोमवार को होलिका दहन के शुभ मुहूर्त के साथ समाप्त होता है। इसके अलावा, होली का उत्सव १० मार्च, मंगलवार को मनाया जाएगा। सूर्योदय– 03 मार्च, 2020 को सुबह 06 30 बजे सूर्यास्त– ०3 मार्च, 2020 6,27 बजे अष्टमी तिथि प्रारम्भ– 02 मार्च, 2020 12 ,53 बजे अष्टमी तिथि समापन– 03 मार्च, 2020 1,50 बजे क्यों अशुभ है होलाष्टक? प्राचीन समय में, अन्य देवताओं के अनुरोध के बाद, कामदेव ने अपने “प्रेम बाण” के साथ भगवान शिव की तपस्या को भंग कर दिया। इस घटना से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आँख खोली और कामदेव को जला दिया। इसके बाद, कामदेव के मरणोपरांत, पूरा ब्रह्मांड शोक और दुखों से ढंक गया। इस पर, कामदेव की पत्नी रति ने अपने पति को पुनर्जीवित करने के लिए 8 दिनों की कठिन तपस्या की। तत्पश्चात, रति की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवनदान दे दिया। इस घटना के बाद, रति की तपस्या के कारण यह आठ दिन अशुभ दृष्टि से याद किये जाते हैं। इसके साथ, एक और प्रमुख कहानी इस प्रकार है- भगवान विष्णु के प्रति अपने पुत्र प्रहलाद की भक्ति से क्रोधित, राजा हिरण्यकश्यप ने उसे आठ दिनों तक अत्यंत यातनाएं दीं। होलिका दहन की घटना से पहले ये आठ दिन होते हैं। इस प्रकार, भक्ति पर हमले के इन आठ दिनों के कारण हिंदू धर्म में अशुभ माना गया है। होलाष्टक का महत्व होलाष्टक दो शब्दों में विभाजित है, होली और अष्टक। यहाँ, होली रंगों का त्यौहार है, और अष्टक का अर्थ है आठ दिन। हिंदू धर्म में, इन आठ दिनों को अत्यंत अशुभ माना जाता है क्योंकि यह दिन भक्त प्रह्लाद के उत्पीड़न को दर्शाते हैं। होलाष्टक एक प्रतिकूल अवधि होने के कारण, पौराणिक कथाओं में इस अवधि में यज्ञ, हवन, विवाह, और हिंदू जनेऊ समारोह, आदि जैसे सभी भाग्यशाली कार्यों का निषेध करने का सुझाव दिया गया है। इन दिनों में शुभ समारोह निषिद्ध हैं क्योंकि इस अवधि में सूर्य और चंद्र सहित सभी ग्रह हानिकारक स्थिति में होते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इन आठ दिनों में ग्रहों की स्थिति एक तरह से स्थायी नकारात्मक प्रभाव आकर्षित कर सकती है। इस अवधि के दौरान, नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक हानिकारक होती हैं। इसलिए, यह एक ऐसा समय भी है जब कुछ लोग तांत्रिक क्रियाओं और टोटके करते हैं। इसके अतिरिक्त, तांत्रिक विद्या की साधना भी इस अवधि में अत्यधिक सफल होती है। होलाष्टक में दान भारत के सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषियों के अनुसार, नवग्रह इस अवधि में अपने भयंकर रूप में होते हैं। अष्टमी से पूर्णिमा तक, ग्रहों की स्थिति को अशुभ अवधि माना जाता है। इसके अतिरिक्त, यह कहा जाता है कि ग्रहों की ऐसी स्थिति के कारण, लोगो के मन में तनाव हो सकता है। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य समृद्ध परिणाम नहीं देता है। हालाँकि, दान इस अवधि में भी एक समृद्ध कार्य है। होलाष्टक में दान करना और जरूरतमंदों को भोजन अर्पित करने से सौभाग्यशाली परिणाम प्राप्त होते हैं। इन आठ दिनों में दान करने से जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है। होलाष्टक 2020 पर क्या करें होलाष्टक पर सभी अनुष्ठान नकारात्मकता ऊर्जा और ग्रहों की नकारात्मक प्रभाव को दूर करने के लिए किए जाते हैं। साथ ही, इस अवसर पर गंगाजल की सहायता से होलिका दहन के क्षेत्र को शुद्ध करना चाहिए। इसके अलावा, लकड़ी के दो स्तंभ और गाय के गोबर के उपले लगाने चाहिए। स्तंभों के इन दो पक्षों को होलिका और प्रहलाद माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस दिन के बाद से, लोग लकड़ी और अन्य वस्तुओं को इकट्ठा करना शुरू करते हैं जो वह होलिका में दहन करना चाहते हैं। इसके अलावा, आप लकड़ी के शाखाओं को रंगीन कपड़ों से सजा सकते हैं। यह नकारात्मक ऊर्जाओं को कम करता है। ज्योतिषियों के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को शाखाओं को सजाना चाहिए। इससे जीवन में प्रसन्नता आती है। होलिका दहन के दिन, कपड़े के इन टुकड़ों को होलिका के साथ जलाया जाता है। इसके अलावा, ये कपड़े नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। होलाष्टक 2020 पर क्या न करें शास्त्रों के अनुसार, हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से कोई भी होलाष्टक में निषिद्ध है। विवाह- होलाष्टक की अवधि विवाह करने या विवाह की दिनांक निश्चित करने के लिए प्रतिष्ठित नहीं है। यह एक जोड़े के जीवन में अशुभ प्रभाव डाल सकता है। नामकरण और मुंडन संस्कार- नामकरण संस्कार उन आजीवन गतिविधियों में से एक है जो बच्चे को उनके जीवन में आगे बढ़ने में मदद करते हैं। हालाँकि, हिंदू धर्म में एक बच्चे के नामकरण का मुहूर्त महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, होलाष्टक जैसे एक अभेद्य मुहूर्त पर, बच्चे का नामकरण प्रतिकूल प्रभाव दे सकता है। निर्माण कार्य- ज्योतिषियों के अनुसार, होलाष्टक किसी भी भवन के निर्माण के लिए एक अत्यंत ही शुभ अवसर होता है। व्यावसयिक या व्यक्तिगत उपयोग के लिए, किसी भी इमारत के निर्माण की शुरुआत फलदायक प्रभाव नहीं डालती है। इसी तरह, गृह प्रवेश या भवन निर्माण प्रारम्भ करने के लिए यह एक शुभ समय नहीं है। व्यवसाय की प्रतिबद्धता- होलाष्टक अवधि के दौरान शुरू किया गया कोई भी व्यवसाय ऋण और हानि को आकर्षित करता है। नई नौकरी शुरू करना- होलाष्टक अवधि में किसी भी नयी जगह कार्यग्रहण करना व्यावसायिक जीवन में तनाव लाता है। कीमती वस्तुओं की खरीद- इन 8 दिनों में, वाहन, सोना या चांदी जैसी कोई भी वस्तु खरीदना किसी भी तरह एक अच्छा विकल्प नहीं है। होलाष्टक होली से पहले के 8 दिनों को कहा जाता है। इस वर्ष होलाष्टक 02 मार्च से प्रारंभ हो रहा है, जो 09 मार्च यानी होलिका दहन तक रहेगा। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा ​तिथि तक होलाष्टक माना जाता है। 09 मार्च को होलिका दहन के बाद अगले दिन 10 मार्च को रंगों का त्योहार होली धूमधाम से मनाया जाएगा। होलाष्टक के 8 दिनों में मांगलिक कार्यों को करना निषेध होता है। इस समय मांगलिक कार्य करना अशुभ माना जाता है। होलाष्टक में तिथियों की गणना की जाती है। मतांतर से इस बार होलाष्टक 03 मार्च से प्रारंभ होकर 09 मार्च को समाप्त माना जा रहा है, ऐसे में यह कुल 7 दिनों का हुआ। लेकिन तिथियों को ध्यान में रखकर गणना की जाए तो यह अष्टमी से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक है, ऐसे में दिनों की संख्या 8 होती है। ज्यादातर विद्वान इसे भानु सप्तमी 2 मार्च से आरंभ मान रहे हैं। इन 13 कार्यों को कर आप समस्त दोषों से बच सकते हैं। 1. इस अवधि में मनुष्य को अधिक से अधिक भगवत भजन,जप,तप,स्वाध्याय व वैदिक अनुष्ठान करना चाहिए। ताकि समस्त कष्ट, विघ्न व संतापों का क्षय हो सके। 2. यदि शरीर में कोई असाध्य रोग हो जिसका उपचार के बाद भी लाभ नहीं हो रहा हो तो रोगी भगवान शिव का पूजन करें। योग्य वैदिक ब्राह्मण द्वारा महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान प्रारम्भ करवाएं,बाद में गूगल से हवन करें। 3. लड्डू गोपाल का पूजन कर संतान गोपाल मंत्र का जाप या गोपाल सहस्त्र नाम पाठ करवा कर अंत में शुद्ध घी व मिश्री से हवन करें त ो शीघ्र संतान प्राप्ति होती है। 4. लक्ष्मी प्राप्ति व ऋण मुक्ति हेतु श्रीसूक्त व मंगल ऋण मोचन स्त्रोत का पाठ करवाएं। 5. कमल गट्टे,साबूदाने की खीर से हवन करें। 6. विजय प्राप्ति हेतु-आदित्यहृदय स्त्रोत,सुंदरकांड का पाठ या बगलामुखी मंत्र का जाप करें 7. अपार धन-संपदा के लिए गुड़,कनेर के पुष्प, हल्दी की गांठ व पीली सरसों से हवन करें। 8. परिवार की समृद्धि हेतु-रामरक्षास्तोत्र ,हनुमान चालीसा व विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। 9 . करियर में चमकदार सफलता के लिए जौ, तिल व शकर से हवन करें। 10. कन्या के विवाह हेतु-कात्यायनी मंत्रों का इन दिनों जाप करें। 11. सौभाग्य की प्राप्ति के लिए चावल,घी, केसर से हवन करें। 12. बच्चों का पढाई में मन नहीं लग रहा है तो गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें। मोदक व दूर्वा से हवन करें। 13. नवग्रह की कृपा प्राप्ति हेतु भगवान शिव का पंचामृत अभिषेक करें। 14,उक्त अनुष्ठानों को योग्य वैदिक ब्राह्मण के द्वारा ही संपादित कर होलिका दहन के पश्चात उसी स्थान पर हवन कर अनुष्ठान की पूर्णाहुति करें यदि होलिका दहन के स्थान पर हवन करना संभव न हो तो होली में प्रज्वलित अग्नि का कंडा घर ला कर उसमें भी हवन कर सकते हैं। होलाष्टक का महत्व 15, होलाष्टक की अवधि भक्ति की शक्ति का प्रभाव बताती है. इस अवधि में तप करना ही अच्छा रहता है. होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काट कर उसे जमीन पर लगाते हैं. इसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांध देते हैं. इसे भक्त प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है. मान्यताओं के अनुसार, जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए एक पेड़ की शाखा काट कर उसे जमीन पर लगाते हैं, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है. होलाष्टक की पौराणिक मान्यता 16, मान्यता है कि होली के पहले के आठ दिनों यानी अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक विष्णु भक्त प्रहलाद को काफी यातनाएं दी गई थीं. प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी को ही हिरण्यकश्यप ने बंदी बना लिया था. प्रहलाद को जान से मारने के लिए तरह-तरह की यातनाएं दी गईं. लेकिन प्रह्लाद विष्णु भक्ति के कारण भयभीत नहीं हुए और विष्णु कृपा से हर बार बच गए. 17, अपने भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख उसकी बहन होलिका आईं. होलिका को ब्रह्मा ने अग्नि से ना जलने का वरदान दिया था. लेकिन जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो वो खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए. 8, भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर नृसिंह भगवान प्रकट हुए और प्रह्लाद की रक्षा कर हिरण्यकश्यप का वध किया. तभी से भक्त पर आए इस संकट के कारण इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है. प्रह्लाद पर यातनाओं से भरे उन आठ दिनों को ही अशुभ मानने की परंपरा बन गई. होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य वर्जित होते हैं. 19 , इसके साथ ही एक कथा यह भी है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के कारण शिव ने कामदेव को फाल्गुन की अष्टमी पर ही भस्म किया था. धार्मिक ग्रंथ और शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक के दिनों में किए गए व्रत और किए गए दान से जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है और ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है. इस दिन वस्त्र, अनाज और अपने इच्छानुसार धन का दान भी आप कर सकते हैं. 20, ऐसे करें होलाष्टक के दिन की शुरुआत होलाष्टक के दिनों में ही संवत और होलिका की प्रतीक लकड़ी या डंडे को गाड़ा जाता है. इस समय में अलग-अलग दिन अलग-अलग चीजों से होली खेली जाती है. पूरे समय में शिव जी या कृष्ण जी की उपासना की जाती है. होलाष्टक में प्रेम और आनंद के लिए किए गए सारे प्रयास सफल होते हैं. 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Thursday, 20 February 2020

महा शिवरात्रि पर केसे करे शिव पूजा

महा शिवरात्रि पर केसे करे शिव पूजा ।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 सामान्य मंत्रो से सम्पूर्ण शिवपूजन प्रकार और पद्धति शिवपूजन में ध्यान रखने जैसे कुछ खास बाते (१) स्नान कर के ही पूजा में बेठे (२) साफ सुथरा वस्त्र धारण कर ( हो शके तो शिलाई बिना का तो बहोत अच्छा ) (३) आसन एक दम स्वच्छ चाहिए ( दर्भासन हो तो उत्तम ) (४) पूर्व या उत्तर दिशा में मुह कर के ही पूजा करे (५) बिल्व पत्र पर जो चिकनाहट वाला भाग होता हे वाही शिवलिंग पर चढ़ाये ( कृपया खंडित बिल्व पत्र मत चढ़ाये ) (६) संपूर्ण परिक्रमा कभी भी मत करे ( जहा से जल पसार हो रहा हे वहा से वापस आ जाये ) (७) पूजन में चंपा के पुष्प का प्रयोग ना करे (८) बिल्व पत्र के उपरांत आक के फुल, धतुरा पुष्प या नील कमल का प्रयोग अवश्य कर शकते हे (९) शिव प्रसाद का कभी भी इंकार मत करे ( ये सब के लिए पवित्र हे ) 10 पूजन सामग्री ,,शिव की मूर्ति या शिवलिंगम, अबीर- गुलाल, चन्दन ( सफ़ेद ) अगरबत्ती धुप ( गुग्गुल ) बिलिपत्र बिल्व फल, तुलसी, दूर्वा, चावल, पुष्प, फल,मिठाई, पान-सुपारी,जनेऊ, पंचामृत, आसन, कलश, दीपक, शंख, घंट, आरती यह सब चीजो का होना आवश्यक है। 11 पूजन विधि ,,जो इंसान भगवन शंकर का पूजन करना चाहता हे उसे प्रातः कल जल्दी उठकर प्रातः कर्म पुरे करने के बाद पूर्व दिशा या इशान कोने की और अपना मुख रख कर .. प्रथम आचमन करना चाहिए बाद में खुद के ललाट पर तिलक करना चाहिए बाद में निन्म मंत्र बोल कर शिखा बांधनी चाहिए 12 शिखा मंत्र ह्रीं उर्ध्वकेशी विरुपाक्षी मस्शोणित भक्षणे। तिष्ठ देवी शिखा मध्ये चामुंडे ह्य पराजिते।। 13 आचमन मंत्र,ॐ केशवाय नमः / ॐ नारायणाय नमः / ॐ माधवाय नमः तीनो बार पानी हाथ में लेकर पीना चाहिए और बाद में ॐ गोविन्दाय नमः बोल हाथ धो लेने चाहिए बाद में बाये हाथ में पानी ले कर दाये हाथ से पानी .. अपने मुह, कर्ण, आँख, नाक, नाभि, ह्रदय और मस्तक पर लगाना चाहिए और बाद में ह्रीं नमो भगवते वासुदेवाय बोल कर खुद के चारो और पानी के छीटे डालने चाहिए ह्रीं नमो नारायणाय बोल कर प्राणायाम करना चाहिए 14 स्वयं एवं सामग्री पवित्रीकरण,,'ॐ अपवित्र: पवित्रो व सर्वावस्था गतोपी व। य: स्मरेत पूंडरीकाक्षम सह: बाह्याभ्यांतर सूचि।। ( बोल कर शरीर एवं पूजन सामग्री पर जल का छिड़काव करे - शुद्धिकरण के लिए ) 15 न्यास,, निचे दिए गए मंत्र बोल कर बाजु में लिखे गए अंग पर अपना दाया हाथ का स्पर्श करे। ह्रीं नं पादाभ्याम नमः / ( दोनों पाव पर ), ह्रीं मों जानुभ्याम नमः / ( दोनों जंघा पर ) ह्रीं भं कटीभ्याम नमः / ( दोनों कमर पर ) ह्रीं गं नाभ्ये नमः / ( नाभि पर ) ह्रीं वं ह्रदयाय नमः / ( ह्रदय पर ) ह्रीं ते बाहुभ्याम नमः / ( दोनों कंधे पर ) ह्रीं वां कंठाय नमः / ( गले पर ) ह्रीं सुं मुखाय नमः / ( मुख पर ) ह्रीं दें नेत्राभ्याम नमः / ( दोनों नेत्रों पर ) ह्रीं वां ललाटाय नमः / ( ललाट पर ) ह्रीं यां मुध्र्ने नमः / ( मस्तक पर ) ह्रीं नमो भगवते वासुदेवाय नमः / ( पुरे शरीर पर ) तत्पश्चात भगवन शंकर की पूजा करे 15 पूजन विधि निन्म प्रकार से हे तिलक मन्त्र,, स्वस्ति तेस्तु द्विपदेभ्यश्वतुष्पदेभ्य एवच / स्वस्त्यस्त्व पादकेभ्य श्री सर्वेभ्यः स्वस्ति सर्वदा // 16 नमस्कार मंत्र हाथ मे अक्षत पुष्प लेकर निम्न मंत्र बोलकर नमस्कार करें। श्री गणेशाय नमः इष्ट देवताभ्यो नमः कुल देवताभ्यो नमः ग्राम देवताभ्यो नमः स्थान देवताभ्यो नमः सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः गुरुवे नमः मातृ पितरेभ्यो नमः ॐ शांति शांति शांति 17 गणपति स्मरण ,, सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज कर्णक लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक।। धुम्र्केतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः द्वाद्शैतानी नामानी यः पठेच्छुनुयादापी।। विध्याराम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमेस्त्था। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।। शुक्लाम्बर्धरम देवं शशिवर्ण चतुर्भुजम। प्रसन्न वदनं ध्यायेत्सर्व विघ्नोपशाताये।। वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि सम प्रभु। निर्विघम कुरु में देव सर्वकार्येशु सर्वदा।। 18 संकल्प ,दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले 'ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे ---*--- नगरे ---**--- ग्रामे वा बौद्धावतारे विजय नाम संवत्सरे श्री सूर्ये दक्षिणायने वर्षा ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ भाद्रप्रद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्याम्‌ तिथौ भृगुवासरे हस्त नक्षत्रे शुभ योगे गर करणे तुला राशि स्थिते चन्द्रे सिंह राशि स्थिते सूर्य वृष राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ,, ज्ञानचंद बुंदिवाल ,, दासो ऽहं मम आत्मनः श्रीमन्‌ महागणपति प्रीत्यर्थम्‌ यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये।'' इसके पश्चात्‌ हाथ का जल किसी पात्र में छोड़ देवें। 19 नोट ,यहाँ पर अपने नगर का नाम बोलें -यहाँ पर अपने ग्राम का नाम बोलें , यहाँ पर अपना कुल गौत्र बोलें , यहाँ पर अपना नाम बोलकर ,ज्ञानचंद बुंदिवाल, आदि बोलें 20 द्विग्रक्षण - मंत्र यादातर संस्थितम भूतं स्थानमाश्रित्य सर्वात:/ स्थानं त्यक्त्वा तुं तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गछतु // यह मंत्र बोल कर चावालको अपनी चारो और डाले। 21 वरुण पूजन अपाम्पताये वरुणाय नमः। सक्लोप्चारार्थे गंधाक्षत पुष्पह: समपुज्यामी। यह बोल कर कलश के जल में चन्दन - पुष्प डाले और कलश में से थोडा जल हाथ में ले कर निन्म मंत्र बोल कर पूजन सामग्री और खुद पर वो जल के छीटे डाले 22 दीप पूजन दिपस्त्वं देवरूपश्च कर्मसाक्षी जयप्रद:। साज्यश्च वर्तिसंयुक्तं दीपज्योती जमोस्तुते।। ( बोल कर दीप पर चन्दन और पुष्प अर्पण करे ) 23 शंख पूजन, लक्ष्मीसहोदरस्त्वंतु विष्णुना विधृत: करे। निर्मितः सर्वदेवेश्च पांचजन्य नमोस्तुते।। ( बोल कर शंख पर चन्दन और पुष्प चढ़ाये ) 24 घंट पूजन , देवानं प्रीतये नित्यं संरक्षासां च विनाशने। घंट्नादम प्रकुवर्ती ततः घंटा प्रपुज्यत।। ( बोल कर घंट नाद करे और उस पर चन्दन और पुष्प चढ़ाये ) 25 ध्यान मंत्र ध्यायामि दैवतं श्रेष्ठं नित्यं धर्म्यार्थप्राप्तये। धर्मार्थ काम मोक्षानाम साधनं ते नमो नमः।। ( बोल कर भगवान शंकर का ध्यान करे ) 26 आहवान मंत्र आगच्छ देवेश तेजोराशे जगत्पतये। पूजां माया कृतां देव गृहाण सुरसतम।। ( बोल कर भगवन शिव को आह्वाहन करने की भावना करे ) 27 आसन मंत्र, सर्वकश्ठंयामदिव्यम नानारत्नसमन्वितम। कर्त्स्वरसमायुक्तामासनम प्रतिगृह्यताम।। ( बोल कर शिवजी कोई आसन अर्पण करे ) 28 खाध्य प्रक्षालन उष्णोदकम निर्मलं च सर्व सौगंध संयुत। पद्प्रक्षलानार्थय दत्तं ते प्रतिगुह्यतम।। ( बोल कर शिवजी के पैरो को पखालने हे ) 29 अर्ध्य मंत्र जलं पुष्पं फलं पत्रं दक्षिणा सहितं तथा। गंधाक्षत युतं दिव्ये अर्ध्य दास्ये प्रसिदामे।। ( बोल कर जल पुष्प फल पात्र का अर्ध्य देना चाहिए ) पंचामृत स्नान 30 पायो दाढ़ी धृतम चैव शर्करा मधुसंयुतम। पंचामृतं मयानीतं गृहाण परमेश्वर।। ( बोल कर पंचामृत से स्नान करावे ) 31 स्नान मंत्र गंगा रेवा तथा क्षिप्रा पयोष्नी सहितास्त्था। स्नानार्थ ते प्रसिद परमेश्वर।। (बोल कर भगवन शंकर को स्वच्छ जल से स्नान कराये और चन्दन पुष्प चढ़ाये ) 32 संकल्प मन्त्र अनेन स्पन्चामृत पुर्वरदोनोने आराध्य देवता: प्रियत्नाम। ( तत पश्यात शिवजी कोई चढ़ा हुवा पुष्प ले कर अपनी आख से स्पर्श कराकर उत्तर दिशा की और फेक दे ,बाद में हाथ को धो कर फिर से चन्दन पुष्प चढ़ाये ) 33 अभिषेक मंत्र सहस्त्राक्षी शतधारम रुषिभी: पावनं कृत। तेन त्वा मभिशिचामी पवामान्य : पुनन्तु में।। ( बोल कर जल शंख में भर कर शिवलिंगम पर अभिषेक करे ) बाद में शिवलिंग या प्रतिमा को स्वच्छ जल से स्नान कराकर उनको साफ कर के उनके स्थान पर विराजमान करवाए 34 वस्त्र मंत्र सोवर्ण तन्तुभिर्युकतम रजतं वस्त्र्मुत्तमम। परित्य ददामि ते देवे प्रसिद गुह्यतम।। ( बोल कर वस्त्र अर्पण करने की भावना करे ) 35 जनेऊ मन्त्र नवभिस्तन्तुभिर्युकतम त्रिगुणं देवतामयम। उपवीतं प्रदास्यामि गृह्यताम परमेश्वर।। ( बोल कर जनेऊ अर्पण करने की भावना करे ) 36 चन्दन मंत्र मलयाचम संभूतं देवदारु समन्वितम। विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रति गृह्यताम।। ( बोल कर शिवजी को चन्दन का लेप करे ) 37 अक्षत मंत्र अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कंकुमुकदी सुशोभित। माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर।। (बोल चावल चढ़ाये ) 38 पुष्प मंत्र नाना सुगंधी पुष्पानी रुतुकलोदभवानी च। मायानितानी प्रीत्यर्थ तदेव प्रसिद में।। ( बोल कर शिवजी को विविध पुष्पों की माला अर्पण करे ) 39 बिल्वपत्र मन्त्र त्रिदलं त्रिगुणा कारम त्रिनेत्र च त्र्ययुधाम। त्रिजन्म पाप संहारमेकं बिल्वं शिवार्पणं।। ( बोल कर बिल्वपत्र अर्पण करे ) 40 दूर्वा मन्त्र दुर्वकुरण सुहरीतन अमृतान मंगलप्रदान। आतितामस्तव पूजार्थं प्रसिद परमेश्वर शंकर :।। ( बोल करे दूर्वा दल अर्पण करे ) 41 सौभाग्य द्रव्य हरिद्राम सिंदूर चैव कुमकुमें समन्वितम। सौभागयारोग्य प्रीत्यर्थं गृहाण परमेश्वर शंकर :।। ( बोल कर अबिल गुलाल चढ़ाये और होश्के तो अलंकर और आभूषण शिवजी को अर्पण करे ) 42 धुप मन्त्र वनस्पति रसोत्पन्न सुगंधें समन्वित :। देव प्रितिकारो नित्यं धूपों यं प्रति गृह्यताम।। ( बोल कर सुगन्धित धुप करे ) 43 दीप मन्त्र त्वं ज्योति : सर्व देवानं तेजसं तेज उत्तम :.। आत्म ज्योति: परम धाम दीपो यं प्रति गृह्यताम।। ( बोल कर भगवन शंकर के सामने दीप प्रज्वलित करे ) 44 नैवेध्य मन्त्र नैवेध्यम गृह्यताम देव भक्तिर्मेह्यचलां कुरु। इप्सितम च वरं देहि पर च पराम गतिम्।। ( बोल कर नैवेध्य चढ़ाये ) 45 भोजन (नैवेद्य मिष्ठान मंत्र) ॐ प्राणाय स्वाहा. ॐ अपानाय स्वाहा. ॐ समानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा. ॐ समानाय स्वाहा ( बोल कर भोजन कराये ) नैवेध्यांते हस्तप्रक्षालानं मुख्प्रक्षालानं आरामनियम च समर्पयामि निम्न ५ मंत्र से भोजन करवाए और ३ बार जल अर्पण करें और बाद में देव को चन्दन चढ़ाये। 45 मुखवास मंत्र एलालवंग संयुक्त पुत्रिफल समन्वितम। नागवल्ली दलम दिव्यं देवेश प्रति गुह्याताम।। ( बोल कर पान सोपारी अर्पण करे ) 46 दक्षिणा मंत्र ह्रीं हेमं वा राजतं वापी पुष्पं वा पत्रमेव च। दक्षिणाम देवदेवेश गृहाण परमेश्वर शंकर।। ( बोल कर अपनी शक्ति अनुसार दक्षिणा अर्पण करे ) 47 आरती मंत्र सर्व मंगल मंगल्यम देवानं प्रितिदयकम। निराजन महम कुर्वे प्रसिद परमेश्वर।। ( बोल कर एक बार आरती करे ) बाद में आरती की चारो और जल की धरा करे और आरती पर पुष्प चढ़ाये सभी को आरती दे और खुद भी आरती ले कर हाथ धो ले। 48 पुष्पांजलि मंत्र पुष्पांजलि प्रदास्यामि मंत्राक्षर समन्विताम। तेन त्वं देवदेवेश प्रसिद परमेश्वर।। ( बोल कर पुष्पांजलि अर्पण करे ) 49 प्रदक्षिणा, यानी पापानि में देव जन्मान्तर कृतानि च। तानी सर्वाणी नश्यन्तु प्रदिक्षिने पदे पदे।। ( बोल कर प्रदिक्षिना करे ) बाद में शिवजी के कोई भी मंत्र स्तोत्र या शिव शहस्त्र नाम स्तोत्र का पाठ करे अवश्य शिव कृपा प्राप्त होगी। पूजा में हुई अशुद्धि के लिये निम्न स्त्रोत्र पाठ से क्षमा याचना करें। 50 देव्पराधक्षमापनस्तोत्रम्।। न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला: परं तेषां मध्ये विरलतरलोहं तव सुत:। मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्व चिदपि कुमाता न भवति परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरित चिरं कोटिकनकै:। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जन: को जानीते जननि जपनीयं चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् न मोक्षस्याकाड्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत: नाराधितासि विधिना विविधोपचारै: किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथा: क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् मत्सम: पातकी नास्ति पापन्घी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु।।। Gyanchand Bundiwal. 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Thursday, 13 February 2020

यशोदा जयंती पुराणिक कथा

यशोदा जयंती पुराणिक कथा : एक समय माता यशोदा ने भवगवान विष्णु की घोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर मांगने को कहा. माता ने बोले हे ईश्वर! मेरी तपस्या तभी पूर्ण होगी जब आप मुझे, मेरे पुत्र के रूप में प्राप्त होंगे. भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें कहा कि आने वाले काल में में वासुदेव एवं देवकी माँ के घर जन्म लूंगा लेकिन मुझे मातृत्व का सुख आपसे ही प्राप्त होगा. समय के साथ ऐसा ही हुआ एवं भगवान कृष्ण देवकी एवं वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में प्रकट हुए, क्योंकि कंस को मालूम था कि उनका वध देवकी एवं वासुदेव की संतान द्वारा ही होगा तो उन्होंने अपनी बहन एवं वासुदेव को कारावास में डाल दिया. जब कृष्ण का जन्म हुआ तो वासुदेव उन्हें नंद बाबा एवं यशोदा मैय्या के घर छोड़ आए ताकि उनका अच्छे से पालन पोषण हो सके. तत्पश्चात माता यशोदा ने ही कृष्ण को मातृत्व का सुख दिया. माता यशोदा एवं कृष्ण की लीलाएं तो जग जाहिर हैं. कभी माखन चोर बने, तो कभी पूतना का वध किया. मां की डांट पड़ने पर अपने मुंह को खोल कर पूरे ब्रह्मांड के दर्शन भी करवा दिए. उनकी ऐसी अद्भुद लीलाएं देख कर मां यशोदा को एहसास हो गया की कृष्ण ही भगवान विष्णु का रूप हैं. वह कृतघ्न हो गयी एवं और भी वात्सल्य से भर गयीं. जसोदा हरि पालने झुलावै. हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-जोइ कछु गावै॥ मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै न आनि सुवावै. तू काहैं नहि बेगहि आवै, तोकौ कान्ह बुलावै॥ कबहुं पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुं अधर फरकावै. सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि-करि सैन बतावै॥ इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै. जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद-भामिनि पावै॥ यशोदा जयंती पूजा विधि आज के दिन मां यशोदा को दिल से याद करें, उनका आवाहन करें एवं उनसे संतान सुख के लिए आशीर्वाद मांगें. मां तो सभी के लिए वात्सल्य से भारी हुई हैं. आपकी मनोकामनाओं को अवश्य पूर्ण करेंगी. अगर आप संतान से सम्बंधित कष्टों से गुजर रहे हैं या फिर संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं तो आपको आज के दिन प्रातः काल उठ कर स्नान आदि कर स्वच्छ होकर मां यशोदा का ध्यान करना चाहिए एवं कृष्ण के लड्डू गोपाल रूप का ध्यान करना चाहिए. मां को लाल चुनरी चड़ाएं, पंजीरी एवं मीठा रोठ एवं थोड़ा सा मख्खन लड्डू गोपाल के लिए भी भोग के लिए रखें. मन ही मन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें, शुभ होगा. Gyanchand Bundiwal. Kundan Jewellers We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices. हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष होल सेल भाव में मिलते हैं और ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 website www.kundanjewellersnagpur.com

Wednesday, 12 February 2020

Parshvanath 108 Names of Shri Ajhara Parshvanath

Parshvanath Parshvanath 108 Names of Shri Ajhara Parshvanath Shri Mahadeva Parshvanath Shri Alokik Parshvanath Shri Makshi Parshvanath Shri Amijhara Parshvanath Shri Mandovara Parshvanath Shri Amrutjhara Parshvanath Shri Manoranjan Parshvanath Shri Ananda Parshvanath Shri Manovanchit Parshvanath Shri Antariksh Parshvanath Shri Muhri Parshvanath Shri Ashapuran Parshvanath Shri Muleva Parshvanath Shri Avanti Parshvanath Shri Nageshvar Parshvanath Shri Bareja Parshvanath Shri Nagphana Parshvanath Shri Bhabha Parshvanath Shri Navasari Parshvanath Shri Bhadreshvar Parshvanath Shri Nakoda Parshvanath Shri Bhateva Parshvanath Shri Navapallav Parshvanath Shri Bhayabhanjan Parshvanath Shri Navkhanda Parshvanath Shri Bhidbhanjan Parshvanath Shri Navlakha Parshvanath Shri Bhiladiya Parshvanath Shri Padmavati Parshvanath Shri Bhuvan Parshvanath Shri Pallaviya Parshvanath Shri Champa Parshvanath Shri Panchasara Parshvanath Shri Chanda Parshvanath Shri Phalvridhi Parshvanath Shri Charup Parshvanath Shri Posali Parshvanath Shri Chintamani Parshvanath Shri Posina Parshvanath Shri Chorvadi Parshvanath Shri Pragatprabhavi Parshvanath Shri Dada Parshvanath Shri Ranakpura Parshvanath Shri Dharnendra Parshvanath Shri Ravana Parshvanath Shri Dhingadmalla Parshvanath Shri Shankhala Parshvanath Shri Dhiya Parshvanath Shri Stambhan Parshvanath Shri Dhrutkallol Parshvanath Shri Sahastraphana Parshvanath Shri Dokadiya Parshvanath Shri Samina Parshvanath Shri Dosala Parshvanath Shri Sammetshikhar Parshvanath Shri Dudhyadhari Parshvanath Shri Sankatharan Parshvanath Shri Gadaliya Parshvanath Shri Saptaphana Parshvanath Shri Gambhira Parshvanath Shri Savara Parshvanath Shri Girua Parshvanath Shri Serisha Parshvanath Shri Godi Parshvanath Shri Sesali Parshvanath Shri Hamirpura Parshvanath Shri Shamala Parshvanath Shri Hrinkar Parshvanath Shri Shankeshver Parshvanath Shri Jiravala Parshvanath Shri Sirodiya Parshvanath Shri Jotingada Parshvanath Shri Sogatiya Parshvanath Shri Jagavallabh Parshvanath Shri Somchintamani Parshvanath Shri Kesariya Parshvanath Shri Sphuling Parshvanath Shri Kachulika Parshvanath Shri Sukhsagar Parshvanath Shri Kalhara Parshvanath Shri Sultan Parshvanath Shri Kalikund Parshvanath Shri Surajmandan Parshvanath Shri Kalpadhrum Parshvanath Shri Svayambhu Parshvanath Shri Kalyan Parshvanath Shri Tankala Parshvanath Shri Kamitpuran Parshvanath Shri Uvasaggaharam Parshvanath Shri Kankan Parshvanath Shri Vadi Parshvanath Shri Kansari Parshvanath Shri Vahi Parshvanath Shri Kareda Parshvanath Shri Vanchara Parshvanath Shri Koka Parshvanath Shri Varanasi Parshvanath Shri Kukadeshvar Parshvanath Shri Varkana Parshvanath Shri Kunkumarol Parshvanath Shri Vighnapahar Parshvanath Shri Lodhan Parshvanath Shri Vignahara Parshvanath Shri Lodrava Parshvanath Shri Vijaychintamani Parshvanath Shri Manmohan Parshvanath Shri Vimal Parshvanath Gyanchand Bundiwal. Kundan Jewellers We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices. हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष होल सेल भाव में मिलते हैं और ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 website www.kundanjewellersnagpur.com

Guru Dev 108 Names of ,,Om gurave namah,

Guru Dev 108 Names of ,,Om gurave namah, Om gurave namah Om gunakaraya namah, Om goptre namah, Om gocaraya namah, Om gopatipriyaya namah, Om gunive namah Om gunavatam shrepthaya namah, Om gurunam gurave namah, Om avyayaya namah, Om jetre namah, Om jayantaya namah, Om jayadaya namah, Om jivaya namah, Om anantaya namah, Om jayavahaya namah, Om amgirasaya namah, Om adhvaramaktaya namah, Om viviktaya namah, Om adhvarakritparaya namah, Om vacaspataye namah, Om vashine namah, Om vashyaya namah, Om varishthaya namah, Om vagvacaksanaya namah, Om cittashuddhikaraya namah, Om shrimate namah, Om caitraya namah, Om citrashikhandijaya namah, Om brihadrathaya namah, Om brihadbhanave namah, Om brihaspataye namah, Om abhishtadaya namah, Om suracaryaya namah, Om suraradhyaya namah, Om surakaryakritodyamaya namah, Om girvanaposhakaya namah, Om dhanyaya namah, Om gishpataye namah, Om girishaya namah, Om anaghaya namah, Om dhivaraya namah, Om dhishanaya namah, Om divyabhushanaya namah, Om devapujitaya namah, Om dhanurddharaya namah, Om daityahantre namah, Om dayasaraya namah, Om dayakaraya namah, Om dariddyanashanaya namah, Om dhanyaya namah, Om daksinayanasambhavaya namah, Om dhanurminadhipaya namah, Om devaya namah, Om dhanurbanadharaya namah, Om haraye namah, Om angarovarshasamjataya namah, Om angirah kulasambhavaya namah, Om sindhudeshaadhipaya namah, Om dhimate namah, Om svarnakayaya namah, Om caturbhujaya namah, Om hemangadaya namah, Om hemavapushe namah, Om hemabhushanabhushitaya namah, Om pushyanathaya namah, Om pushyaragamanimandanamandi kashapushpasamanabhaya namah, Om indradyamarasamghapaya namah, Om asamanabalaya namah, Om satvagunasampadvibhavasave bhusurabhishtadaya namah, Om bhuriyashase namah, Om punyavivardhanaya namah, Om dharmarupaya namah, Om dhanaadhyaksaya namah, Om dhanadaya namah, Om dharmapalanaya namah, Om sarvavedaarthatattvajnaya namah, Om sarvapadvinivarakaya namah, Om sarvapapaprashamanaya namah, Om svramatanugatamaraya namah rigvedaparagaya namah, Om riksarashimargapracaravate sadaanandaya namah, Om satyasamdhaya namah, Om satyasamkalpamanasaya namah, Om sarvagamajnaya namah, Om sarvajnaya namah, Om sarvavedantavide namah, Om brahmaputraya namah, Om brahmaneshaya namah, Om brahmavidyaavisharadaya namah, Om samanaadhikanirbhuktaya namah, Om sarvalokavashamvadaya namah, Om sasuraasuragandharvavanditaya satyabhashanaya namah, Om brihaspataye namah, Om suracaryaya namah, Om dayavate namah, Om shubhalaksanaya namah, Om lokatrayagurave namah, Om shrimate namah, Om sarvagaya namah, Om sarvato vibhave namah, Om sarveshaya namah, Om sarvadatushtaya namah, Om sarvadaya namah, Om sarvapujitaya namah Gyanchand Bundiwal. Kundan Jewellers We deal in all types of gemstones and rudraksha. Certificate Gemstones at affordable prices. हमारे यहां सभी प्रकार के नवग्रह के रत्न और रुद्राक्ष होल सेल भाव में मिलते हैं और ज्योतिष रत्न परामर्श के लिए सम्पर्क करें मोबाइल 8275555557 website www.kundanjewellersnagpur.com

Tuesday, 4 February 2020

जया एकादशी , अजा तथा ,भीष्म एकादशी भी कहते हैं

जया एकादशी , अजा तथा ,भीष्म एकादशी भी कहते हैं। 05 फरवर (बुधवार) जया एकादशी जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। जया एकादशी के विषय में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से निवेदन कर जया एकादशी का महात्म्य, कथा तथा व्रत विधि के बारे में पूछा था। तब श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जया एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इस एकादशी का व्रत विधि-विधान करने से तथा ब्राह्मण को भोजन कराने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को जया एकादशी से संबंधित कथा भी सुनाई थी। माघ शुक्ल (जया) एकादशी व्रत कथा धर्मराज युधिष्ठिर बोले - हे भगवन्! आपने माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यन्त सुंदर वर्णन किया। आप स्वदेज, अंडज, उद्भिज और जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए। इसका क्या नाम है, इसके व्रत की क्या विधि है और इसमें कौन से देवता का पूजन किया जाता है? श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन्! इस एकादशी का नाम 'जया एकादशी' है। इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है तथा इसके प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए। अब मैं तुमसे पद्मपुराण में वर्णित इसकी महिमा की एक कथा सुनाता हूँ। देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे। पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया। हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था। इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप दे दिया। इंद्र ने कहा हे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो। इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यन्त दु:खी हुए और हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहाँ उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी। उस जगह अत्यन्त शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत बजते रहते। एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे। दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी भोजन नहीं किया और न कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे। उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई। हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ। माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो। !!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!! श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजा युधिष्ठिर ! इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं। 05 फरवर (बुधवार) जया एकादशी 19 फरवरी(बुधवार) विजया एकादशी 06 मार्च (शुक्रवार) आमलकी एकादशी 19 मार्च (बृहस्पतिवार) पापमोचिनी एकादशी 20 मार्च (शुक्रवार) वैष्णव पापमोचिनी एकादशी 04 अप्रैल (शनिवार) कामदा एकादशी 18 अप्रैल (शनिवार)बरूथिनी एकादशी 03 मई (रविवार) मोहिनी एकादशी 04 मई (सोमवार) गौण मोहिनी एकादशी ,,वैष्णव मोहिनी एकादशी 18 मई (सोमवार) अपरा एकादशी 02 जून (मंगलवार) निर्जला एकादशी 17 जून (बुधवार) योगिनी एकादशी 01 जुलाई (बुधवार) देवशयनी एकादशी 16 जुलाई (बृहस्पतिवार) कामिका एकादशी 30 जुलाई (बृहस्पतिवार) श्रावण पुत्रदा एकादशी 15 अगस्त (शनिवार) अजा एकादशी 29 अगस्त (शनिवार) परिवर्तिनी एकादशी 13 सितम्ब (रविवार) इन्दिरा एकादशी 27 सितम्बर (रविवार) पद्मिनी एकादशी 13 अक्टूबर (मंगलवार) परम एकादशी 27 अक्टूबर (मंगलवार) पापांकुशा एकादशी 11 नवम्बर (बुधवार) रमा एकादशी 25 नवम्बर (बुधवार) देवुत्थान एकादशी 26 नवम्बर (बृहस्पतिवार) वैष्णव देवुत्थान एकादशी 11 दिसम्बर (शुक्रवार) उत्पन्ना एकादशी 25 दिसम्बर (शुक्रवार) मोक्षदा एकादशी Gyanchand Bundiwal. 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Friday, 24 January 2020

शनि देव

शनि देव के एक राशि में ढाई साल तक समय बिताने के लिहाज से सभी 12 राशियों का एक चक्कर लगाने में लगभग 30 साल का समय लगता है। जैसे कि इस समय शनि धनु राशि में गोचर है अब दोबारा धनु राशि में आने के लिए शनि को 30 वर्षों का समय लगेगा। शनि के किसी 1 राशि में गोचर होने से 7 राशियों पर इसका प्रभाव पड़ता है। 3 राशियों पर शनि की साढ़ेसाती चढ़ती है। 2 राशियों पर शनि की ढैय्या लगती है और अन्य 2 राशियों पर शनि की नजर हमेशा लगी रहती है। शनि ग्रह की एक राशि में मंद चाल से किसी व्यक्ति के पूरे जीवन में औसतन 2 से 3 बार साढ़ेसाती लग सकती है। शनि की साढ़ेसाती ,,,जब शनि का गोचर किसी एक राशि में होता है तो शनि उस राशि में ढाई साल तक रहते हैं। ढाई साल के बाद ही शनि का राशि परिवर्तन दूसरी राशि में होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार चंद्र राशि से जब शनि 12वें भाव, पहले भाव व द्वितीय भाव से निकलते हैं। उस अवधि को शनि की साढ़े साती कहा जाता है। शनि जिस राशि में गोचर करते हैं तो राशि क्रम के हिसाब से उस राशि के आगे और पीछे वाली राशि पर भी अपना असर डालते हैं। इस तरह से शनि एक राशि पर साढ़े सात साल तक रहते हैं। इस साढ़े सात साल के समय को ही शनि की साढ़ेसाती कहा जाता है। फिर जैसे-जैसे शनि आगे बढ़ता है साढ़ेसाती उतरती जाती है। शनि की ढैय्या,,,शनि जब गोचर में जन्म राशि से चतुर्थ और अष्टम भाव में रहता है तब इसे शनि की ढैय्या कहते है। शनि की ढय्या एक राशि पर साढ़े सात साल और दूसरी पर लगभग 16 साल में आती है। शनि के ढैय्या किसी राशि पर इसको पता लगाने के लिए शनि जिस राशि में रहता है उससे क्रम अनुसार पहले की चौथी और बाद वाली छठी राशि पर शनि की ढैय्या रहती है। मेष आपकी राशि के जातकों के लिए शनि देव अपनी ही राशि मकर में गोचर करते हुए दशम कर्मभाव में जा रहे हैं जिससे पंचमहापुरुष योग में से एक शशक योग का निर्माण होगा जो फलित ज्योतिष के श्रेष्ठतम योगों में से एक है। ऐसे में 24 जनवरी 2020 को मकर राशि में शनि का गोचरआपको रोजगार के कई नए- नए अवसर प्रदान करेंगे। देश-विदेश में आपको नए मौके मिलेंगे। प्रॉपर्टी खरीदने और नए निवेश के लिए यह सही समय है। मेष राशि,,साढ़ेसाती- 29 मार्च 2025 से 31 मई 2032 तक ढय्या- 13 जुलाई 2034 से 27 अगस्त 2036 तक - 12 दिसंबर 2043 से 8 दिसंबर 2046 तक वृष ,,आपकी राशि से नवम भाग्य भाव में गोचर शनि का चांदी के पाए पर होकर गोचर करना अति भाग्यवर्धक सिद्ध होगा। पिछले ढाई साल से चल रही शनि की ढैय्या समाप्त होगी जिससे आपकी परेशानियां खत्म होने के संकेत हैं। साल 2020 वृष राशि के जातकों के लिए शुभ है। आय बढ़ाने के संकेत हैं। वृष राशि ,,साढ़ेसाती- 3 जून 2027 से 13 जुलाई 2034 तक ढय्या - 27 अगस्त 2036 से 22 अक्टूबर 2038 तक मिथुन,,,शनि के मकर राशि में प्रवेश करने से मिथुन राशि वालों के ऊपर शनि की ढैय्या शुरू हो जाएगी। आपकी राशि से आठवें भाव में शनिदेव का गोचर कई तरह के मिलेजुले फल देगा क्योंकि, इस भाव में गोचर करते हुए इनकी लघु कल्याणी ढैय्या का शुभारंभ करना आपके लिए कई तरह से परीक्षा लेने वाला सिद्ध होगा इसलिए वर्ष पर्यंत आपको अपने कार्य तथा निर्णय बहुत सावधानीपूर्वक करने होंगे।ढाई साल चुनौतियों से भरे रहेंगे। नौकरी के मामले में साल 2021 कुछ अच्छे परिणाम नहीं लेकर आएगा। साढ़ेसाती- 8 अगस्त 2029 से 27 अगस्त 2036 तक ढैय्या- 24 जनवरी 2020 से 29 अप्रैल 2022 तक,,,22 अक्टूबर 2038 से 29 जनवरी 2041 तक आपकी राशि से सप्तमभाव में शनिदेव का गोचर कई मायनों में आपकी परीक्षा भी लेगा और कार्य अथवा व्यापार की दृष्टि से आपको सफल भी बनाएगा, क्योंकि ये आपकी राशि से केंद्र भाव में गोचर करते हुए 'शशक' योग का निर्माण भी करेंगे, जिसके फलस्वरूप आपके लिए शनिजन्य सभी कार्यों में लाभ होगा किंतु ये अष्टम भाव के स्वामी भी हैं इसलिए कार्य बिना रुकावटों के संपन्न कर पाना आसान नहीं होगा। साल 2020 के मुकाबले 2021 में ज्यादा प्रगति होगी। साढेसाती- 31 मई 2032 से 22 अक्टूबर 2038 तक ढैय्या- - 29 अप्रैल 2022 स 29 मार्च 2025 तक,,, - 29 जनवरी 2041 से 12 दिसंबर 2043 तक सिंह आपकी राशि से छठें शत्रुभाव में शनि का गोचर अप्रत्याशित परिणाम दिलाने वाला सिद्ध होगा। फलित ज्योतिष के अनुसार तीसरे, छठे, और ग्यारहवें भाव में शनि गोचर कर रहे हों या किसी भी जातक की जन्मकुंडली के इन भावों में बैठे हों तो सभी अरिष्टों का शमन करते हुए उसे जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुचाते हैं । साढ़ेसाती- 13 जुलाई 2034 से 29 जनवरी 2041 तक ढैय्या- 29 मार्च 2025 से 3 जून 2027 तक -12 दिसंबर 2043 से 8 दिसंबर 2046 तक कन्या ,,शनि के मकर राशि में प्रवेश से 26 जनवरी 2017 से चली आ रही शनि की शनि की ढैय्या समाप्त हो जाएगी। शनि की ढैय्या का उतरना आपके लिए शुभ परिणाम लाएगा। आय में बढ़ोत्तरी होगी। व्यवसाय में तरक्की और यश की प्राप्ति होगी। साढ़ेसाती- 27 अगस्त 2036 से 12 दिसंबर 2043 तक ढैय्या- 3 जून 2027 से 8 अगस्त 2029 तक तुला राशि ,,,24 जनवरी को मकर राशि में शनि का गोचर होने से तुला राशि पर चतुर्थ शनि की ढैय्या चलेगी। तुला राशि के जातकों पर शनि की विशेष कृपा रहती है। शनि की ढैय्या शुरू होने से कार्यों का दबाव रहेगा। सेहत से जुड़ी कुछ तकलीफों का समाना करना पड़ सकता है। साढ़ेसाती- 22 अक्टूबर 2038 से 8 दिसंबर 2046 तक ढैय्या- 24 जनवरी 2020 से 29 अप्रैल 2022 तक,, - 8 अगस्त 2029 से 31 मई 2020 तक वृश्चिक राशि ,,,24 जनवरी को जैसे ही शनि मकर राशि में प्रवेश कर जाएगा वैसे ही वृश्चिक राशि से शनि की साढ़ेसाती की अवधि पूरी हो जाएगी। शनि के मकर राशि में जाने से अब से आपको सभी तरह की सुख सुविधा प्राप्त होने लगेगी। रुका हुआ काम पूरा होगा। भाग्य का साथ मिलता रहेगा। नौकरी और अपना बिजनेस करने वाले जातकों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर शुभ परिणाम देगा। साढ़ेसाती- 28 जनवरी 2041 से 3 दिसंबर 2049 तक ढैय्या- 29 अप्रैल 2022 से 29 मार्च 2025 तक,,, - 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक धनु राशि ,,,शनि के मकर राशि में प्रवेश करने से धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती का अंतिम चरण होगा। शनिदेव आपके धन स्थान से गोचर करेंगे। जिस कारण से आपको धन के मामले में सफलता प्राप्त होगा। शनि की साढ़ेसाती का अंतिम चरण होने से परेशानियां कम होने लगेंगी। साढ़ेसाती- 12 दिसंबर 2043 से 3 दिसंबर 2049 तक ढैय्या- 29 मार्च 2025 से 3 जून 2027 तक,,- 13 जुलाई 2034 से 27 अगस्त 2036 तक मकर राशि ,,24 जनवरी को शनि 30 वर्षों के बाद मकर राशि में आ रहे हैं। मकर राशि स्वयं शनि की राशि है। शनि के मकर राशि में आने शनि की साढ़ेसाती का दूसरा चरण शुरू हो जाएगा। जिससे कार्यक्षेत्र पर दबाव बढ़ेगा और परेशानियां पहले के मुकाबले ज्यादा आएंगी। शनि का दूसरा चरण बहुत ही घातक होता है। साढ़ेसाती- 26 जनवरी 2017 से 29 मार्च 2025 तक य्या- 3 जून 2027 से 8 अगस्त 2029 तक,,,- 27 अगस्त 2036 से 22 अक्टूबर 2038 तक कुंभ राशि पर शनि की साढ़ेसाती का पहला चरण रहेगा। परेशानियां बढ़ने लगेंगी। साढ़ेसाती- 24 जनवरी 2020 से 3 जून 2027 तक ढय्या- 8 अगस्त 2029 से 31 मई 2032 तक.,,- 22 अक्टूबर 2038 से 29 जनवरी 2041 तक मीन राशि ,,शनि के मकर राशि में गोचर से आपके लाभ भाव में गोचर करेंगे। जिस कारण से शनि के शुभ परिणाम मिलते हैं। साढ़ेसाती- 29 अप्रैल 2022 से 8 अगस्त 2029 तक ढय्या- 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक,, - 29 जनवरी 2041 से 12 दिसंबर 2043 तक 24 जनवरी को शनि ढाई साल के बाद राशि बदल रहे हैं। शनि धनु को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। ऐसे में तुला, वृश्चिक और धनु राशि के जातकों पर इस शनि गोचर का उनके जीवन में कैसा असर पड़ेगा आइए विस्तार से जानते हैं। तुला राशि,,आपकी राशि के लिए अकेले राजयोग कारक ग्रह शनिदेव चतुर्थ भाव में गोचर करते हुए ‘शशक’ योग का निर्माण करेंगे जो आपके अत्यंत कामयाबी दिलाने वाला सिद्ध होगा। साथ ही त्रिकोण का भी शुभ प्रभाव आपको मिलेगा क्योंकि, पंचमभाव के स्वामी शनि का स्वग्रही होकर केंद्रभाव में अपने ही घर में रहना आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है अतः यह परिवर्तन आपके लिए अत्यंत शुभ फलदाई होने वाला है। तुला राशि और शनि गोचर 2020,,किसी भी जातक की जन्मकुंडली यदि वह तुला लग्न अथवा तुला राशि में जन्मा हो तो मकर राशि में गोचर करते हुए शनिदेव उसके लिए हमेशा शुभ फलदाई कह गए हैं। ये वर्ष इस राशि के लोगों के लिए सफलताओं के सर्वोच्च शिखर तक ले जाएगा। यदि आप सन्मार्ग पर चलते हुए अच्छे कर्म करेंगे और दूसरों की भावनाओं का आदर करेंगे तो आपकी अभीष्ट सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी। जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव से माता, भूमि भवन, वाहन, अचल संपत्ति, मानसिक सुख आदि का विचार किया जाता है इसीलिए अधिकांशतः शनिदेव इन्हीं भागों को प्रभावित करेंगे। ये आपके पंचम भाव के भी स्वामी है जिसके फलस्वरूप इस वर्ष आपको संतान संबंधी चिंता से मुक्ति मिलेगी। यदि आप विद्यार्थी हैं तो शिक्षा अथवा प्रतियोगिता से संबंधित किसी भी क्षेत्र में अपना परचम लहरा सकते हैं। शनिदेव की दशम भाव पर भी दृष्टि पड़ रही है, ये दृष्टि आपके कार्य को प्रभावित करेगी। हो सकता है कार्यक्षेत्र में कुछ तनाव भी हो लेकिन यदि आप उच्चाधिकारियों से मधुर संबंध स्थापित किए रहेंगे और अपने आसपास कार्य करने वाले लोगों को अपने पक्ष में रखेंगे अथवा मेलजोल बनाकर रखेंगे तो परेशानियां स्वत: ही हल होती जाएंगी। राजनीति अथवा राजनेताओं से गहरे संबंध बनेंगे यदि चुनाव से संबंधित कोई कार्य संपन्न करना चाह रहे हैं तो अवसर अच्छा है। नौकरी में भी परिवर्तन चाह रहे हों तो नए अनुबंध पर सकते हैं। यहीं से शनिदेव की उच्चदृष्टि आपके ऊपर पड़ रही है अतः यदि आप न्याय संगत कार्य करेंगे और असहाय लोगों की मदद करते हुए आगे बढ़ेंगे, तो जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है, किंतु इस बात का सदैव ध्यान रखें कि इनकी दृष्टि आप पर है इसलिए जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशील रहें। वृश्चिक राशि,,,आपकी राशि से पराक्रम भाव में शनि देव का गोचर किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि, ज्योतिष के अनुसार तीसरे भाव में शनिदेव रहें तो सभी अरिष्टों का शमन करते हैं किंतु भाइयों के सुख में न्यूनता भी लाते हैं। इस वर्ष अपनी जिद एवं आवेश पर नियंत्रण रखते हुए योजनाओं को गोपनीय रखकर कार्य करेंगे तो सफलता की संभावना सर्वाधिक रहेगी। इस भाव से छोटे भाई बहन, पराक्रम, धैर्य-शौर्य, गले के रोग, श्वास संबंधी रोग तथा ऊर्जा शक्ति आदि का विचार किया जाता है अतः शनिदेव का गोचर इस वर्ष इन भागों को अधिक प्रभावित करेगा इसलिए सावधान रहें। काफी दिनों से रुका आ रहा सरकार से संबंधित कार्यो का निपटारा होगा नौकरी में पदोन्नति होगी मान-सम्मान की भी वृद्धि होगी। यहां से इनकी दृष्टि पंचम भाव पर पड़ रही है जिसके फलस्वरूप संतान से संबंधित चिंता रहेगी भी और उससे मुक्ति भी मिलेगी। नव दंपत्ति के लिए संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव के भी योग बनेंगे और आध्यात्म की ओर रुझान बढ़ेगा। विद्यार्थियों का मन पठन-पाठन में अधिक लगेगा। समय आ गया है की पूरी शक्ति लगा दें ताकि परीक्षा में अच्छे अंक हासिल हो सके। भाग्यभाव पर सप्तम दृष्टि भाग्य उन्नति एवं विदेश यात्रा के योग बनाएगी। धर्म-कर्म में रूचि बढ़ेगी, तीर्थ यात्रा करेंगे और मांगलिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा भी लेंगे। विदेश यात्रा हेतु वीजा का आवेदन करना अथवा दूसरे देश की नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन करना सफल रहेगा। इनकी उच्च दृष्टि आपके व्ययभाव पर भी पड़ रही है जिसके फलस्वरूप भागदौड़ और व्यय की अधिकता रहेगी आर्थिक तंगी से बचें, यात्रा सावधानीपूर्वक करें दुर्घटना से बचें। धनु राशि,,,,राशि से द्वितीय धन भाव में शनिदेव का अपनी ही राशि में होकर गोचर करना मिलाजुला फल देगा। आर्थिक दृष्टि से तो यह योग अच्छा कहा जाएगा किंतु पारिवारिक दृष्टि से कुछ अशांति का सामना करना पड़ सकता है। आकस्मिक धन प्राप्ति के योग बनेंगे, रुके हुए धन के वापस भी मिलने की संभावना है इसलिए परिवार में बिखराव को बचाते हुए अपना ध्यान कार्य-व्यापार की ओर अधिक ध्यान लगाएंगे तो आर्थिक तंगी से भी मुक्ति मिलेगी और कर्ज से भी छुटकारा मिलेगा। स्वास्थ्य की दृष्टि से जोड़ों-घुटनों में दर्द एवं आंख की बीमारी से बचना पड़ेगा। इस भाव से धन-धान्य, संपत्ति, कुटुम्ब, मृत्यु, वाणी, सत्य असत्य का संभाषण, जिह्वा, मुख के रोग, अच्छे-बुरे पड़ोसियों, दाहिनी आंख आदि के विषय में विचार किया जाता है। धनु राशि,,इनकी सप्तम मारक दृष्टि आपके अष्टम आयु भाव पर पड़ रही है जिसके फलस्वरूप आपको हर समय स्वास्थ्य के प्रति चिंतनशील रहना पड़ेगा षडयंत्र का शिकार होने से भी बचके रहना पड़ेगा। बेहतर रहेगा कि आप कार्यक्षेत्र से अपने काम संपन्न करके सीधे घर आए। यहां से इनकी दशम उच्च दृष्टि आपके लाभ भाव पर पड़ रही है अतः यह दृष्टि आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि, ये आपके लिए कामयाबियों के मार्ग में आने वाली सभी बाधाएं दूर करने में मदद करेगी। आय के स्रोत भी बढ़ेंगे और इसी दृष्टि के फलस्वरूप नौकरी में पदोन्नति एवं सम्मान प्राप्ति के भी योग बनेंगे। अपने कार्य व्यापार के प्रति सूझबूझ एवं संयम से चलते हुए कार्य करेंगे तो धन लाभ अधिक होगा जिससे आपकी आर्थिक तंगी भी दूर होगी और जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन कर पाएंगे Gyanchand Bundiwal. 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