Monday, 24 October 2016

दीपावली धनतेरस की कथा दिपावली पूजा

दीपावली धनतेरस की कथा दिपावली पूजा
दिपावली पूजा शनिवार ,14 नवंबर 2020 और धनतेरस: 13 नवंबर 2020 छोटी
नवम्बर 13, 2020, शुक्रवार प्रदोष व्रत
कार्तिक, कृष्ण त्रयोदशी प्रारम्भ 21, 30 रात , नवम्बर 12 , समाप्त - 17,59 शाम, नवम्बर 13
और बड़ी दिवाली 14 नवंबर 2020
गोवर्धन पूजा 15 नवंबर 2020
भाई दूज 16 नवंबर 2020
लक्ष्मी पूजा शनिवार, नवम्बर 14, 2020
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त - 17,33 पी एम से 19,32 पी एम
अवधि - 01 घण्टा 59 मिनट्स
प्रदोष काल - 17,32 पी एम से 20,07 पी एम
वृषभ काल - 17, 33 पी एम से 19, 32 पी एम
अमावस्या तिथि प्रारम्भ - नवम्बर 14, 2020 को 14, 17 पी एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त - नवम्बर 15, 2020 को 10,36 ए एम बजे
अन्य शहरों में लक्ष्मी पूजा मुहूर्त
17,58 पी एम से 19,59 पी एम - पुणे
17,28 पी एम से 19,24 पी एम - नई दिल्ली
17,41 पी एम से 19,43 पी एम - चेन्नई
17,37 पी एम से 19,33 पी एम - जयपुर
17,42 पी एम से 17,42 पी एम - हैदराबाद
17,29 पी एम से 19,25 पी एम - गुरुग्राम
17,26 पी एम से 19,21 पी एम - चण्डीगढ़
16,54 पी एम से 18,52 पी एम - कोलकाता
18,01 पी एम से 20,01 पी एम - मुम्बई
17,52 पी एम से 19,54 पी एम - बेंगलूरु
17,57 पी एम से 19,55 पी एम - अहमदाबाद
17,28 पी एम से 19,23 पी एम - नोएडा
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त - 23,33 पी एम से 00,24 ए एम, नवम्बर 15
अवधि - 00 घण्टे 51 मिनट्स
निशिता काल - 23,33 पी एम से 00 24 ए एम, नवम्बर 15
सिंह लग्न - 00, 01 ए एम से 02,10 ए एम, नवम्बर 15
अमावस्या तिथि प्रारम्भ - नवम्बर 14, 2020 को 14,17 पी एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त - नवम्बर 15, 2020 को 10,36 ए एम बजे
दीवाली लक्ष्मी पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त
अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) - 14,17 पी एम से 16,09 पी एम
सायाह्न मुहूर्त (लाभ) - 17,32 पी एम से 19:09 पी एम
रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) - 20,45 पी एम से 01,35 ए एम, नवम्बर 15
उषाकाल मुहूर्त (लाभ) - 04,48 ए एम से 06,24 ए एम, नवम्बर 15
धनतेरस पर भगवान यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो धनतेरस के दिन दीपदान करता है 
उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता। इस मान्यता के पीछे पुराणों में वर्णित एक कथा है, जो इस प्रकार है।
एक समय यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या कभी तुम्हें प्राणियों के प्राण का हरण करते समय किसी पर दयाभाव भी आया है, तो वे संकोच में पड़कर बोले- नहीं महाराज यमराज ने उनसे दोबारा पूछा तो उन्होंने संकोच छोड़कर बताया कि एक बार एक ऐसी घटना घटी थी, जिससे हमारा हृदय कांप उठा था
हेम नामक राजा की पत्नी ने जब एक पुत्र को जन्म दिया तो ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक जब भी विवाह करेगा, उसके चार दिन बाद ही मर जाएगा। यह जानकर उस राजा ने बालक को यमुना तट की एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में रखकर बड़ा किया।
एक दिन जब महाराजा हंस की युवा बेटी यमुना तट पर घूम रही थी तो उस ब्रह्मचारी युवक ने मोहित होकर उससे गंधर्व विवाह कर लिया। चौथा दिन पूरा होते ही वह राजकुमार मर गया।
अपने पति की मृत्यु देखकर उसकी पत्नी बिलख-बिलखकर रोने लगी। उस नवविवाहिता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय भी कांप उठा।
उस राजकुमार के प्राण हरण करते समय हमारे आंसू नहीं रुक रहे थे।
तभी एक यमदूत ने पूछा -क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है?
यमराज बोले- हां उपाय तो है। अकाल मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को धनतेरस के दिन पूजन और दीपदान विधिपूर्वक करना चाहिए।
जहां यह पूजन होता है, वहां अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता। कहते हैं कि तभी से धनतेरस के दिन यमराज के पूजन के पश्चात दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई।
पूजन विधि - इस दिन सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर एक पात्र में अन्न रखकर उसके ऊपर यमराज के निर्मित्त दक्षिण की ओर मुंह करके दीपदान करना चाहिए। दीपदान करते समय यह मंत्र बोलना चाहिए-
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति।।
रात्रि को घर की स्त्रियां इस दीपक में तेल डालकर चार बत्तियां जलाती हैं और जल, रोली, चावल, फूल, गुड़, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर यमराज का पूजन करती हैं।
हल जूती मिट्टी को दूध में भिगोकर सेमर वृक्ष की डाली में लगाएं और उसको तीन बार अपने शरीर पर फेर कर कुंकुम का टीका लगाएं और दीप प्रज्जवलित करें।
इस प्रकार यमराज की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। दीपदान का महत्व धर्मशास्त्रों में भी उल्लेखित है-
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।। अर्थात- कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यमराज के निमित्त दीपदान करने से मृत्यु का भय समाप्त होता है।
भगवान यमराज के अलावा धनतेरस पर भगवान धन्वन्तरि का भी पूजन होता है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार देवताओं व दैत्यों ने जब समुद्र मंथन किया तो उसमें से कई रत्न निकले।
समुद्र मंथन के अंत में भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उस दिन कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी ही थी।
इसलिए तब से इस तिथि को भगवान धनवंतरि का प्रकटोत्सव मनाए जाने का चलन प्रारंभ हुआ।
पुराणों में धनवंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार भी माना गया है।
पूजन विधि- सर्वप्रथम नहाकर साफ वस्त्र धारण करें। भगवान धनवंतरि की मूर्ति या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें तथा स्वयं पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। उसके बाद भगवान धन्वन्तरि का आह्वान इस मंत्र से करें-
सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं, अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपम्, धन्वन्तरिं च सततं प्रणमामि नित्यं।।
इसके पश्चात पूजन स्थल पर आसन देने की भावना से चावल चढ़ाएं। इसके बाद आचमन के लिए जल छोड़ें।
भगवान धन्वन्तरि के चित्र पर गंध, अबीर, गुलाल पुष्प, रोली, आदि चढ़ाएं। चांदी के बर्तन में खीर का भोग लगाएं। (अगर चांदी का पात्र उपलब्ध न हो तो अन्य पात्र में भी भोग लगा सकते हैं।) इसके बाद पुन: आचमन के लिए जल छोड़ें।
मुख शुद्धि के लिए पान, लौंग, सुपारी चढ़ाएं। भगवान धन्वन्तरि को वस्त्र (मौली) अर्पण करें। शंखपुष्पी, तुलसी, ब्राह्मी आदि पूजनीय औषधियां भी भगवान धन्वन्तरि को अर्पित करें।
रोग नाश की कामना के लिए इस मंत्र का जाप करें
ॐ रं रूद्र रोग नाशाय धनवंतर्ये फट्।।
इसके बाद भगवान धनवंतरि को श्रीफल व दक्षिणा चढ़ाएं। पूजन के अंत में कर्पूर आरती करें।
धनतेरस पर बर्तन खरीदने का महत्व है। ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय धनवंतरि हाथ में अमृत का कलश लेकर निकले थे।
इस कलश के लिए देवताओं और दानवों में भारी युद्ध भी हुआ था। इस कलश में अमृत था और इसी से देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ। तभी से धनतेरस पर प्रतीक स्वरूप बर्तन खरीदने की परंपरा है।
इस बर्तन की भी पूजा की जाती है और खुद व परिवार की बेहतर सेहत के लिए प्रार्थना की जाती है।
धनतेरस के पावन पर्व की पावन आप सभी भाईयो और बहनो के जीवन में आरोग्य और सौभाग्य प्राप्ति की भगवान धन्वन्तरि से कामना करता हूँ
शुभ महूर्त - सोना, चाँदी, बर्तन,बही खता, ट्रक, मोटर,कार,इंजन,मोटर साइकल आदि!!
भाग्योदय के लिए क्या करें
आज भगवान धन्वन्तरि का पूजन करे।
और घी का दीपक प्रज्वलित करे। समस्त भारत भूखंड के प्रत्येक कोने में दीपावली के दो दिन पूर्व हम समस्त भारतवासी धनतेरस पर्व को किसी न किसी रूप में मनाते हैं।
यह महापर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में वैद्य समाज द्वारा भगवान धन्वन्तरि की पूजा-अर्चना कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कर मनाया जाता है तथा उनसे यह प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त विश्व को निरोग कर समग्र मानव समाज को रोग विहीन कर उन्हें दीर्घायुष्य प्रदान करें।
वहीं दूसरी ओर समस्त नर-नारी उनकी स्मृति में धन्वन्तरि त्रयोदशी को नए बर्तन, आभूषण आदि खरी कर उन्हें शुभ एवं मांगलिक मानकर उनकी पूजा करते हैं। उनके मन में यह एक दृढ़ धारणा तथा विश्वास रहता है कि वह वर्तन तथा आभूषण हमें श्रीवृद्धि के साथ धन-धान्य से संपन्न रखेगा तथा कभी रिक्तता का आभास नहीं होगा।
चंचल लाभ व अमृत शुभ के चोधड़िये में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण गहने प्रॉपर्टी आदी खरीदना शुभफलदाई है!!
नोट,,,,,,,,,आज प्रीति योग में रात्रि काल में पीपल के पेड़ में तेल का दीपक करना शुभफलदायी
पॉच दिन तक मनाएँ उत्सव
धन त्रयोदशी
जिन लोगो का रोग समाप्त नही हो रहा वे ,जिनको अकाल मृत्यु का दोष निवारण करने भगवान धनवन्तरी के साथ दीपदान करे
लक्ष्मीपूजन करे !
मृत्युना पाश हस्तेन कालेन भार्यया सह !
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतामिति ||
रूप चौदस,,,,प्रात: सूर्योदय के पहले उठकर तेलमालिश करे,उबटन लगाए,अपामार्ग से दातुन करे ,स्नान
जिनको प्राकृतिक सुंदरता प्राप्त करनी हो या जो व्यक्ति पापनाश हेतु प्रयासरत हो ,जिसको मृत्यु का भय सता रहा हो वे प्रदोष के समय चारबत्ती वाला दीपक जलाकर निम्न मंत्र से दीपदान करे.
दत्तोदीप चतुर्दश्यां नरक प्रीतयेमया |
चतुर्वर्ती समायुक्त:सर्वपापनुत्तये ||
अमावस,,,,दीपमालिका जलाकर यमराज के निमित्त दीपदान करे |धनदा माता का पूजन करे !
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने
धनंमे जुषतां देवि सर्व कामांश्च देहि मे ||
पुत्र पौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वत्तरी रथम्
प्रजानां भवसिमाता आयुष्मन्तं करोतु मे ||
प्रतिपदा,,,,,,,,,गोवर्धन पूजा इस पर्व को गोसंरक्षणपूजा के रूप मे मनाएँ !निम्नमंत्र से गौ पूजा करे
गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक |
विष्णुवाहकृतोच्छाय गवां रक्षण प्रदोभव||
यमद्वितीया
भैयादूज के दिन भाई की आरोग्यता और आयुष्य कामना हेतु बहने यमराज-यमुना-चित्रगुप्त का पूजन कर भाई का पूजन करे !जो बहने भाई को घर पर बुलाकर उनका आशीर्वाद लेती हे उनके घर धनधान्य सौभाग्य की प्राप्ति होती है !
दीवाली के दौरान लक्ष्मी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले उपाय
16 पाठ धनतेरस से दीपावली तक रोज करे ।
॥वैभव प्रदाता श्री सूक्त॥
हरिः ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्र​जाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
प्रभासां यशसा लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
कर्दमेन प्रजाभूता सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस गृहे ।
नि च देवी मातरं श्रियं वासय कुले ॥१२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम् ॥१५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
पद्मानने पद्म ऊरु पद्माक्षी पद्मासम्भवे ।
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥१७॥
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।
धनं मे जुषताम् देवी सर्वकामांश्च देहि मे ॥१८॥
पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम् ॥१९॥
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते ॥२०॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु ॥२१॥
न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा ॥२२॥
वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः ।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि ॥२३॥
पद्मप्रिये पद्म पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विष्णु मनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥२४॥
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी ।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभर नमिता शुभ्र वस्त्रोत्तरीया ॥२५॥
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैस्स्नापिता हेमकुम्भैः ।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥२६॥
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम् ।
दासीभूतसमस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम् ॥२७॥
श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध विभव ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम् ।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥२८॥
सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीस्सरस्वती ।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥२९॥
वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् ।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीस्वरीं त्वाम् ॥३०॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३१॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥३२॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णोः प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥३३॥
महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३४॥
श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महियते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥३५॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥३६॥
य एवं वेद ॐ महादेव्यै च विष्णुपत्नीं च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥३७॥
भगवद चिन्तन
धनत्रयोदशी समुद्र मंथन के समय हाथों में अमृत कलश लिए भगवान विष्णु के धन्वन्तरि रूप में प्रगट होने का पावन दिवस है। भगवान् धन्वन्तरि आयुर्वेद के जनक और वैद्य के रूप में भी जाने जाते हैं।
आज के दिन नई वस्तुएं खरीदने का भी प्रचलन है। घर में नया सामान आए ये अच्छी बात है मगर हमारे जीवन में कुछ नए विचार, नए उत्साह, नए संकल्प आएं यह भी जरुरी है। घर की समृद्धि के लिए आपके हार और कार ही नहीं आपके विचार भी सुंदर होने चाहिए।
हम वैष्णवों का सबसे बड़ा धन तो श्री कृष्ण ही हैं। वो धन है तो हम वास्तविक धनवान हैं। कृष्ण रुपी धन के विना दरिद्रता कभी ख़तम नहीं होती। धन- ते- रस ..... हो सकता है कुछ लोगों को ऐसा लगता हो। पर हम तो ऐसा सोचते हैं ....
धन (कृष्ण) - ते - रस।
धन त्रयोदशी की सभी को बधाई।
लाल आसन पर बैठ कर उतर के तरफ मुख कर के जाप करे ।
गणेश जी का मंत्र ॐ गौं गणेशं ऋणं छिंदी वरेण्यम् हूँ फट् 21 माला
लक्ष्मी जी का मंत्र ॐ श्री श्रीयै नमः 21
दिपावली के पांच महोत्सव पर ध्यान दे, पंच महोत्सव के दिनों में ये चीजें कभी किसी को भेंट न करें-
घर में गणेश जी और महालक्ष्मी की मूर्त स्वयं तो लाएं लेकिन किसी को गिफ्ट न दें।
पंच महोत्सव में 5 धातुओं से बनी कोई भी चीज तोहफे में न दें जैसे सोना, चांदी, तांबा, कांसा और पीत्तल लेकिन इसे अपने घर में जरूर लाएं।
स्टील और लोहे से बनी कोई भी चीज गिफ्ट करें लेकिन अपने घर न लाएं।
रेशमी कपड़ें अपने लिए खरीदें लेकिन गिफ्ट नहीं करें।
धनतेरस के दिन कुछ भी शापिंग करें तो अपने लिए खरीदें, किसी के लिए भेंट न लें।
तेल, लकड़ी से इस्तेमाल होने वाली कोई वस्तु न खरीदें।
काले रंग का कोई भी सामान न ही अपने घर लाएं और न ही गिफ्ट करें।
सूरज ढलने के बाद घर में झाड़ू-पोंछा न करे ।
दीपावली पर लक्ष्मी प्राप्ति के सरल उपाय
दीपावली के दिन प्रातः काल मां लक्ष्मी के मंदिर जाकर लक्ष्मी जी को पोशाक चढ़ाएं, खुशबुदार गुलाब की अगरबत्ती जलाएं, धन प्राप्ति का मार्ग खुलेगा।
दीपावली के दिन प्रातः गन्ना लाकर रात्रि में लक्ष्मी पूजन के साथ गन्ने की भी पूजा करने से आपकी धन संपत्ति में वृद्धि होगी। - दीपावली की रात पूजन के पश्चात् नौ गोमती चक्र तिजोरी में स्थापित करने से वर्षभर समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है।
अगर घर में धन नहीं रूकता तो नरक चतुर्दशी के दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ लाल चंदन, गुलाब के फूल व रोली लाल कपड़े में बांधकर पूजें और फिर उसे अपनी तिजोरी में रखें, धन घर में रूकेगा और बरकत होगी।
दीपावली से आरंभ करते हुए प्रत्येक अमावस्या बकी शाम किसी अपंग भिखारी या विकलांग व्यक्ति को भोजन कराएं तो सुख, समृद्धि में वृद्धि होती है।
काफी प्रयास के बाद भी नौकरी न मिलने पर दीपावली की शाम लक्ष्मी पूजन के समय थोड़ी सी चने की दाल लक्ष्मीजी पर छिड़क कर पूजा समाप्ति के पश्चात इकट्ठी करके पीपल के पेड़ पर समर्पित कर दें।
दुकानदार, व्यवसायी दीपावली की रात्रि को साबुत फिटकरी का टुकड़ा लेकर उसे दुकान में चारों तरफ घुमाएं और किसी चैराहे पर आकर उसे उत्तर दिशा की तरफ फेंक दें। ऐसा करने से ज्यादा ग्राहक आएंगे और धन लाभ में वृद्धि होगी।
दीपावली की रात पांच साबुत सुपारी, काली हल्दी, पांच कौड़ी लेकर गंगाजल से धोकर लाल कपड़े में बांधकर दीपावली पूजन के समय चांदी की कटोरी या थाली में रखकर पूजा करें, अगले दिन सवेरे अपनी तिजोरी में रखें। मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी। पाठकगण दीपावली की रात्रि में उपाय करके देखें, मां लक्ष्मी की कृपा अवश्य होगी। हम दीपावली का त्यौहार क्यूँ मनाते है?
इसका अधिकतर उत्तर मिलता है राम जी के वनवास से लौटने की ख़ुशी में।
सच है पर अधूरा।। अगर ऐसा ही है तो फिर हम सब दीपावली पर भगवन राम की पूजा क्यों नहीं करते? लक्ष्मी जी और गणेश भगवन की क्यों करते है?
सोच में पड़ गए न आप भी।
इसका उत्तर आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ अगर कोई त्रुटि रह जाये तो क्षमा कीजियेगा।
देवी लक्ष्मी जी का प्राकट्य
देवी लक्ष्मी जी कार्तिक मॉस की अमावस्या के दिन समुन्दर मंथन में से अवतार लेकर प्रकट हुई थी।
भगवन विष्णु द्वारा लक्ष्मी जी को बचाना
भगवन विष्णु ने आज ही के दिन अपने पांचवे अवतार वामन अवतार में देवी लक्ष्मी को राजा बालि से मुक्त करवाया था।
नरकासुर वध कृष्ण द्वारा
इस दिन भगवन कृष्ण ने राक्षसों के राजा नरकासुर का वध कर उसके चंगुल से 16000 औरतों को मुक्त करवाया था। इसी ख़ुशी में दीपावली का त्यौहार दो दिन तक मनाया गया। इसे विजय पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
पांडवो की वापसी,
महाभारत में लिखे अनुसार कार्तिक अमावस्या को पांडव अपना 12 साल का वनवास काट कर वापिस आये थे जो की उन्हें चौसर में कौरवो द्वारा हरये जाने के परिणाम स्वरूप मिला था। इस प्रकार उनके लौटने की खुशी में दीपावली मनाई गई।
राम जी की विजय पर
रामायण के अनुसार ये चंद्रमा के कार्तिक मास की अमावस्या के नए दिन की शुरुआत थी जब भगवन राम माता सीता और लक्ष्मण जी अयोध्या वापिस लौटे थे रावण और उसकी लंका का दहन करके। अयोध्या के नागरिकों ने पुरे राज्य को इस प्रकार दीपमाला से प्रकाशित किया था जैसा आजतक कभी भी नहीं हुआ था।
 
 Gyanchand Bundiwal
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Saturday, 8 October 2016

१०८ शक्ति पीठो का वर्णन .

१०८ शक्ति पीठो का वर्णन .... श्री देवी भागवत में वर्णित, राजा जन्मेजय द्वारा पूछे जाने पर व्यास जी द्वारा जिन १०८ शक्ति पीठो का वर्णन किया गया वो निम्नलिखित हैं।
१. वाराणसी में देवी विशालाक्षी।
२. नैमिषारण्य क्षेत्र में देवी लिंग्धारिणी।
३. प्रयाग में देवी ललिता।
४. गंधमादन पर्वत पर देवी कामुकी।
५. दक्षिण मानसरोवर में देवी कुमुदा।
६. उत्तर मानसरोवर में, सर्व कामना पूर्ण करने वाली देवी विश्वकामा।
७. गोमान्त पर देवी गोमती।
८. मंदराचल पर देवी कामचारिणी।
९. चैत्ररथ में देवी मदोत्कता।
१०. हस्तिनापुर में देवी जयंती।
११. कन्याकुब्ज में देवी गौरी।
१२. मलयाचल पर देवी रम्भा।
१३. एकाम्र पीठ पर देवी कीर्तिमती।
१४. विश्वपीठ पर देवी विश्वेश्वरी।
१५. पुष्कर में देवी पुरुहूता।
१६. केदार स्थल पर देवी सन्मार्गदायनी।
१७. हिमात्वपीठ पर देवी मंदा।
१८. गोकर्ण में देवी भद्र कर्णिका।
१९. स्थानेश्वर में देवी भवानी।
२०. बिल्वक में देवी बिल्वपत्रिका।
२१. श्रीशैलम में देवी माधवी।
२२. भाद्रेश्वर में देवी भद्र।
२३. वरह्पर्वत पर देवी जया।
२४. कमलालय में देवी कमला।
२५. रुद्रकोटि में देवी रुद्राणी।
२६. कालंजर में देवी काली।
२७. शालग्राम में देवी महादेवी।
२८. शिवलिंग में देवी जलप्रिया।
२९. महालिंग में देवी कपिला।
३०. माकोट में देवी मुकुटेश्वरी।
३१. मायापुरी में देवी कुमारी।
३२. संतानपीठ में देवी ललिताम्बिका।
३३. गया में देवी मंगला।
३४. पुरुषोतम क्षेत्र में देवी विमला।
३५. सहस्त्राक्ष में देवी उत्पलाक्षी।
३६. हिरण्याक्ष में देवी महोत्पला।
३७. विपाशा में देवी अमोघाक्षी।
३८. पुंड्रवर्धन में देवी पाडला।
३९. सुपर्श्व में देवी नारायणी।
४०. चित्रकूट में देवी रुद्रसुन्दारी।
४१. विपुल क्षेत्र में देवी विपुला।
४२. मलयाचल में देवी कल्याणी।
४३. सह्याद्र पर्वत पर देवी एकवीर।
४४. हरिश्चंद्र में चन्द्रिका।
४५. रामतीर्थ में देवी रमण।
४६. यमुना में देवी मृगावती।
४७. कोटितीर्थ में देवी कोटवी।
४८. माधव वन में देवी सुगंधा।
४९. गोदावरी में देवी त्रिसंध्या।
५०. गंगाद्वार में देवी रतिप्रिया।
५१. शिवकुंड में देवी सुभानंदा।
५२. देविका तट पर देवी नंदिनी।
५३. द्वारका में देवी रुकमनी।
५४. वृन्दावन में देवी राधा।
५५. मथुरा में देवी देवकी।
५६. पाताल में देवी परमेश्वरी।
५७. चित्रकूट में देवी सीता।
५८. विन्ध्याचल पर देवी विध्यवासिनी।
५९. करवीर क्षेत्र में देवी महालक्ष्मी।
६०. विनायक क्षेत्र में देवी उमा।
६१. वैद्यनाथ धाम में देवी आरोग्य।
६२. महाकाल में देवी माहेश्वरी।
६३. उष्ण तीर्थ में देवी अभ्या।
६४. विन्ध्य पर्वत पर देवी नितम्बा।
६५. माण्डवय क्षेत्र में देवी मांडवी।
६६. माहेश्वरी पुर में देवी स्वाहा।
६७. छगलंड में देवी प्रचंडा।
६८. अमरकंटक में देवी चंडिका।
६९. सोमेश्वर में देवी वरारोह।
७०. प्रभास क्षेत्र में देवी पुष्करावती।
७१. सरस्वती तीर्थ में देव माता।
७२. समुद्र तट पर देवी पारावारा।
७३. महालय में देवी महाभागा।
७४. पयोष्णी में देवी पिन्गलेश्वरी।
७५. कृतसौच क्षेत्र में देवी सिंहिका।
७६. कार्तिक क्षेत्र में देवी अतिशंकारी।
७७. उत्पलावर्तक में देवी लोला।
७८. सोनभद्र नदी के संगम पर देवी सुभद्रा।
७९. सिद्ध वन में माता लक्ष्मी।
८०. भारताश्रम तीर्थ में देवी अनंगा।
८१. जालंधर पर्वत पर देवी विश्वमुखी।
८२. किष्किन्धा पर्वत पर देवी तारा।
८३. देवदारु वन में देवी पुष्टि।
८४. कश्मीर में देवी मेधा।
८५. हिमाद्री पर्वत पर देवी भीमा।
८६. विश्वेश्वर क्षेत्र में देवी तुष्टि।
८७. कपालमोचन तीर्थ पर देवी सुद्धि।
८८. कामावरोहन तीर्थ पर देवी माता।
८९. शंखोद्धार तीर्थ में देवी धारा।
९०. पिंडारक तीर्थ पर धृति।
९१. चंद्रभागा नदी के तट पर देवी कला।
९२. अच्छोद क्षेत्र में देवी शिवधारिणी।
९३. वेण नदी के तट पर देवी अमृता।
९४. बद्रीवन में देवी उर्वशी।
९५. उत्तर कुरु प्रदेश में देवी औषधि।
९६. कुशद्वीप में देवी कुशोदका।
९७. हेमकूट पर्वत पर देवी मन्मथा।
९८. कुमुदवन में सत्यवादिनी।
९९. अस्वथ तीर्थ में देवी वन्दनीया।
१००. वैश्वनालय क्षेत्र में देवी निधि।
१०१. वेदवदन तीर्थ में देवी गायत्री।
१०२. भगवान् शिव के सानिध्य में देवी पार्वती।
१०३. देवलोक में देवी इन्द्राणी।
१०४. ब्रह्मा के मुख में देवी सरस्वती।
१०५. सूर्य के बिम्ब में देवी प्रभा।
१०६. मातृकाओ में देवी वैष्णवी।
१०७. सतियो में देवी अरुंधती।
१०८. अप्सराओ में देवी तिलोतम्मा।
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
१०९. शारीर धारिओ के शारीर में या चित में ब्रह्मकला।

Saturday, 1 October 2016

पद्मावती स्तोत्र संकटमोचक

पद्मावती स्तोत्र संकटमोचक
देवी मां पद्मावती, ज्योति रूप महान।
विघ्न हरो मंगल करो, करो मात कल्याण। (1)
चौपाई।।जय-जय-जय पद्मावती माता, तेरी महिमा त्रिभुवन गाता।
मन की आशा पूर्ण करो मां, संकट सारे दूर करो मां।। (2)

तेरी महिमा परम निराली, भक्तों के दुख हरने वाली।
धन-वैभव-यश देने वाली, शान तुम्हारी अजब निराली।। (3)

बिगड़ी बात बनेगी तुम से, नैया पार लगेगी तुम से।
मेरी तो बस एक अरज है, हाथ थाम लो यही गरज है।। (4)

चतुर्भुजी मां हंसवाहिनी, महर करो मां मुक्तिदायिनी।
किस विध पूजूं चरण तुम्हारे, निर्मल हैं बस भाव हमारे।। (5)

मैं आया हूं शरण तुम्हारी, तू है मां जग तारणहारी।
तुम बिन कौन हरे दुख मेरा, रोग-शोक-संकट ने घेरा।। (6)

तुम हो कल्पतरु कलियुग की, तुमसे है आशा सतयुग की।
मंदिर-मंदिर मूरत तेरी, हर मूरत में सूरत तेरी।। (7)

रूप तुम्हारे हुए हैं अनगिन, महिमा बढ़ती जाती निशदिन।
तुमने सारे जग को तारा, सबका तूने भाग्य संवारा।। (8)

हृदय-कमल में वास करो मां, सिर पर मेरे हाथ धरो मां।
मन की पीड़ा हरो भवानी, मूरत तेरी लगे सुहानी।। (9)

पद्मावती मां पद्‍म-समाना, पूज रहे सब राजा-राणा।
पद्‍म-हृदय पद्‍मासन सोहे, पद्‍म-रूप पद-पंकज मोहे।। (10)

महामंत्र का मिला जो शरणा, नाग-योनी से पार उतरना।
पारसनाथ हुए उपकारी, जय-जयकार करे नर-नारी।। (11)

पारस प्रभु जग के रखवाले, पद्मावती प्रभु पार्श्व उबारे।
जिसने प्रभु का संकट टाला, उसका रूप अनूप निराला।। (12)

कमठ-शत्रु क्या करे बिगाड़े, पद्मावती जहं काज सुधारे।
मेघमाली की हर चट्टानें, मां के आगे सब चित खाने।। (13)

मां ने प्रभु का कष्ट निवारा, जन्म-जन्म का कर्ज उतारा।
पद्मावती दया की देवी, प्रभु-भक्तों की अविरल सेवी।। (14)

प्रभु भक्तों की मंशा पूरे, चिंतामणि सम चिंता चूरे।
पारस प्रभु का जयकारा हो, पद्मावती का झंकारा हो।। (15)
माथे मुकुट भाल सूरज ज्यों, बिंदिया चमक रही चंदा।
अधरों पर मुस्कान शोभती, मां की मूरत नित्य मोहती।। (16)

सुरनर मुनिजन मां को ध्यावे, संकट नहीं सपने में आवे।
मां का जो जयकारा बोले, उनके घर सुख-संपत्ति बोले।। (17)

ॐ ह्रीं श्री क्लीं मंत्र से ध्याऊं, धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाऊं।
रिद्धि-सिद्धि सुख-संपत्ति दाता, सोया भाग्य जगा दो माता।। (18)

मां को पहले भोग लगाऊं, पीछे ही खुद भोजन पाऊं।
मां के यश में अपना यश हो, अंतरमन में भक्ति-रस हो।। (19)

सुबह उठो मां की जय बोलो, सांझ ढले मां की जय बोलो।
जय-जय मां जय-जय नित तेरी, मदद करो मां अविरल मेरी।। (20)

शुक्रवार मां का दिन प्यारा, जिसने पांच बरस व्रत धारा।
उसका काज सदा ही संवरे, मां उसकी हर मंशा पूरे।। (21)

एकासन-व्रत-नियम पालकर, धूप-दीप-चंदन पूजन कर।
लाल-वेश हो चूड़ी-कंगना, फल-श्रीफल-नैवेद्य भेंटना।। (22)

मन की आशा पूर्ण हुए जब, छत्र चढ़ाएं चांदी का तब।
अंतर में हो शुक्रगुजारी, मां का व्रत है मंगलकारी।। (23)

मैं हूं मां बालक अज्ञानी, पर तेरी महिमा पहचानी।
सांचे मन से जो भी ध्यावे, सब सुख भोग परम पद पावे।। (24)

जीवन में मां का संबल हो, हर संकट में नैतिक बल हो।
पाप न होवे पुण्य संजोएं, ध्यान धरें अंतरमन धोएं।। (25)

दीन-दुखी की मदद हो मुझसे, मात-पिता की अदब हो मुझसे।
अंतर-दृष्टि में विवेक हो, घर-संपति सब नेक-एक हो।। (26)

कृपादृष्टि हो माता मुझ पर, मां पद्मावती जरा रहम कर।
भूलें मेरी माफ करो मां, संकट सारे दूर करो मां।। (27)

पद्‍म नेत्र पद्मावती जय हो, पद्‍म-स्वरूपी पद्‍म हृदय हो।
पद्‍म-चरण ही एक शरण है, पद्मावती मां विघ्न-हरण है।। (28)
।।दोहा।।पद्‍म रूप पद्मावती, पारस प्रभु हैं शीष।
'सेवक' तुम्हारी शरण में, दो मंगल आशीष।। (29)
पार्श्व प्रभु जयवंत हैं, जिन शासन जयवंत।
पद्मावती जयवंत हैं, जयकारी भगवंत।। (30)
चरण-कमल में सेवक का, नमन करो स्वीकार।
भक्तों की अरजी सुनो, वरते मंगलाचार।। (31)
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्री पद्मावति माता नाम मंत्र १०८ ,, ॐ पद्मावती पदम्नेत्रे पद्मासने लक्ष्मीदायिनी वांछापुरिनी रिद्धिम सिद्धिम जयम जयम जयम कुरु कुरु नमः

ॐ ह्रीँ श्रीं क्लीँ ऐँ श्री पदमावती दैव्यै नमः ।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं श्री पद्मावती देव्यै नमः ।।
ॐ पद्मावती पदम्नेत्रे पद्मासने लक्ष्मीदायिनी वांछापुरिनी रिद्धिम सिद्धिम जयम जयम जयम कुरु कुरु नमः| "
१०८ श्री पद्मावति माता नाम मंत्र

(1)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महादेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(2)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कल्याण्यै प द्मावत्यै स्वाहा ।।
(3)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री भुवनेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(4)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चंड्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(5)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कात्यायन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(6)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गौर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(7)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जिनधर्मपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(8)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचब्रह्मपदाराध्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(9)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचमंत्रोपदेशिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(10)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचव्रतगुणोपेतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(11)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचकल्याणदर्शिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(12)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री श्रियै पद्मावत्यै स्वाहा
(13)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री तोतलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(14)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नित्यायै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(15)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री त्रिपुरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(16)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री काम्यसाधिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(17)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मदनोन्मालिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(18)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री विद्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(19)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महालक्ष्म्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(20) ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सरस्वत्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(21)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सारस्वतगणाधीशायै पद्मावत्यै स्वाहा
(22)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वसास्त्रोपदेशिन्यै पद्मावत्यैस्वाहा
(23)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(24)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महादुर्गायै पद्मावत्यै स्वाहा
(25)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री त्रिनैत्रायै पद्मावत्यै स्वाहा
(26)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री फणिशेखर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(27)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जटाबालेन्दुमुकुटायै पद्मावत्यै स्वाहा
(28)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कुक्कुटोरगवाहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(29)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चतुर्मुख्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(30)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महायसायै पद्मावत्यै स्वाहा
(31)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री धनदेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(32)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गुह्येश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(33)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागराज महापत्न्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(34)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(35)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागदेवतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(36)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सिद्धान्त सम्पन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(37)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री द्वादशांगपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(38)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चर्तुदशमहा विद्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(39)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अवधिज्ञानलोचनायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(40)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वासन्त्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(41)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वनदेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(42)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वनमालायै पद्मावत्यै स्वाहा
(43)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(45)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महाधोरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(46)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महारौद्रायै पद्मावत्यै स्वाहा
(47)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वीतभीतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(48)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अभयंकर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(49)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कंकाल्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(50)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कालरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(51)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गंगायै पद्मावत्यै स्वाहा
(52)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गान्धर्वनायक्यै पद्मावत्यै
स्वाहा
(53)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यग्दर्शनसंपन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(54)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यग्ज्ञानपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(55)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यक्चारित्रसं
पन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(56)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नराणामुपकारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(57)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अगण्यपुण्यसंपन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(58)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गणन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(59)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गणनायक्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(60)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पातालवासिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(61)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मायै पद्मावत्यै स्वाहा
(62)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मास्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(63)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मलोचनायै पद्मावत्यै स्वाहा
(64)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री प्रज्ञप्त्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(65)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री रोहिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(66)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जम्भायै पद्मावत्यै स्वाहा
(67)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री स्तम्भिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(67)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मोहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(68)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जयायै पद्मावत्यै स्वाहा
(69)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री योगिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(70)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री योगविज्ञान्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(71)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मृत्युदारिद्यभंजिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(72)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री क्षमायै पद्मावत्यै स्वाहा
(73)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री संपन्नधरण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(74)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वपापनिवारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(75)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री ज्वालामुख्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(76)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महाज्वालामालिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(77)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वज्रशृंखलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(78)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागपाशधरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(79)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री धैर्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(80)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री श्रेणीतानफलान्वितायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(81)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तायै पद्मावत्यै स्वाहा
(82)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री प्रशस्तायै पद्मावत्यै स्वाहा
(83)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री विद्यार्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(84)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(85)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तिवाहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(86)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वसन्तलक्ष्म्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(87)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गीर्वाण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(88)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वाण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(89)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मविष्टरायै पद्मावत्यै
स्वाहा
(90)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री बालार्कवर्णसंकाशायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(91)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री शृंगाररसनायक्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(92)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अनेकान्तात्मतत्त्वज्ञायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(93)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चिंतितार्थफलप्रदायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(94)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चिंतामण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(95)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कृपापूर्णायै पद्मावत्यै स्वाहा
(96)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पापारंभविमोचिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(97)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कल्पवल्लीसमाकारायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(98)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कामधेनवे पद्मावत्यै स्वाहा
(99)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री शुभंकर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(100)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सद्धर्मवत्सलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(101)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वायै पद्मावत्यै स्वाहा
(102)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सद्धर्मोत्सववर्द्धिन्यै
पद्मावत्यै स्वाहा
(103)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वपापोपशमन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(104)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वरोगनिवारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(105)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गंभिरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(106)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मोहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(107)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सिद्धायै पद्मावत्यै स्वाहा
(108 )
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सेफालितरुवासिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
108 नाम मन्त्र
का पाठ करने के बाद
27 बार यह मन्त्र जपना
ॐ नमो भगवति ! त्रिभुवनवशंकरी सर्वभरणभूषिते पद्मनयने ! पद्मिनी पद्मप्रभे ! पद्मकोशिनी ! पद्महस्ते!श्रीँ ह्रीं कुरु कुरु , मम ह्रदयकार्यं कुरु कुरु , मम सर्वशांतिं कुरु कुरु मम सर्वराज्यवश्यं कुरु कुरु, सर्वलोकवश्यं कुरु कुरु, मम सर्व स्त्री वश्यं कुरु कुरु, मम सर्व भूत पिशाच प्रेतरोषं हर हर सर्वरोगान् छिंद छिंद, सर्वविघ्नान् भिन्द भिन्द, सर्वविषं छिंद छिंद, सर्व कुमृगं छिंद छिंद ,सर्व शाकिनी छिंद छिंद,
श्री पार्श्वजिनपदाम्भोज युगाय नमः ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रों ह्र:श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा सर्वजन-राज्य स्त्रीपुरुष-वश्यं सर्व सर्व ॐ आं क्रों ह्रीं ऐं क्लीं ह्रीं देवी ! पद्मावती ! त्रिपुर-कामसाधिनी दुर्जन-मति-विनाशिनी त्रैलोक्य क्षोभिनी श्री पार्श्वनाथोप्सर्ग-हारिणी क्लीं क्लूं मम दुष्टान् हन हन ,
मम सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट स्वाहा ।
ॐ आं क्रों ह्रीं क्लीं हूं हसौं पद्मे ! देवी ! मम सर्व-जगद्वशं कुरु कुरु सर्व विघ्नान् नाशय नाशय पुरक्षोभं कुरु कुरु ह्रीँ संवौषट् स्वाहा
ॐ आं क्रों हौं द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः हम्ल्वंयूं पद्मावती सर्वपुरजनान् क्षोभय क्षोभय मम पादयोः पातय पातय आकर्षिणी ह्रीं नमः
ॐ आँ क्रों ह्रीं अर्हं मम पापं फट् फट् दह दह हन हन पच पच पाचय पाचय हं ब्भं ब्भां क्ष्वीं हंसः ब्भं वंह्य वंह्य क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षौं क्षं क्षः क्षिं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रौं ह्रं ह्रः हिः हिः हिं द्रां द्रीं द्रावय द्रावय नामोर्हते भगवते श्रीमते ठः ठः मम श्रीरस्तु , पुष्टिरस्तु, कल्याणंस्तु स्वाहा... .

देवी पद्मावती आरती तुमारी, मंगलकारी जय जय कारी….देवी…१

पार्श्व प्रभु छे शिरपर ताहरे, भक्ति करंतां तुं भक्तोने तारे….देवी..२

उज्जवल वर्णी मूत्ति शुं सोहे, नीरखी हरखी सहु जन मोहे…..देवी..३

कुर्कुट सर्पना वाहने बेठी, भद्रासनथी तुं शोभे छे रुडी……देवी..४

सप्तफणा शोभे मनोहारी, नयन मनोहर परिकरधारी…..देवी…५

कमल पाशांकुश फळ रुडुं संगे, चार भुजामां कलामय अंगे..देवी…६

विविध स्वरुपे भिन्न भिन्न नामे, जगपूजे सहु सिद्धि कामे….देवी…७

शीघ्रफळा तुं संकट टाळे, विघ्न विदारे वांछित आले…..देवी…..८

धरणेन्द्र देवनां देवी छो न्यारा, पार्श्वभक्तोना दुःख हरनारा…देवी….९

……..नगरे …….तीर्थे, दर्शन करतां दुःख सहु विसरे……देवी…१०

धर्म प्रतापे आशीष देजो, सुयश सिद्धिने मंगल करजो…..देवी…११
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