Saturday, 6 July 2019

भुवनेश्वरी संक्षिप्त पूजन

भुवनेश्वरी संक्षिप्त पूजन    
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
सामान्य पूजन सामुग्री जैसे आचमनी पात्र ,हल्दी ,कुमकुम ,चंदन ,अष्टगंध ,अक्षत , फूल , माला ,नैवेद्य ,फल ,दीपक (तेल या घी का ),अगरबत्ती आदि का प्रयोग कर सकते है ..
सबसे पहले गुरु ,गणेश इन्हे वंदन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: 
ॐ श्री गणेशाय नम:
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम:
फिर आचमन करे
ह्रीं आत्मतत्वाय स्वाहा
ह्रीं विद्या तत्वाय स्वाहा
ह्रीं शिव तत्वाय स्वाहा
ह्रीं सर्व तत्वाय स्वाहा
फिर गुरु स्मरण करे और पुजन के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे
ॐ श्री गुरुभ्यो नम:
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नम:
ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम:
अब आसन पर पुष्प अक्षत अर्पण करे
ॐ पृथ्वी देव्यै नमः
चारो तरफ दिशा बंधन हेतु अक्षत फेके
और अपनी शिखा पर दाहिना हाथ रखे
फिर दीपक को प्रणाम करे
दीप देवताभ्यो नमः
कलश में जल डाले और उसमे चन्दन या सुगन्धित द्रव्य डाले
कलश देवताभ्यो नमः
अब अपने आप को तिलक करे
गणेश जी के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे
वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटी समप्रभ
निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा
अब आप हाथ मे जल ,अक्षत ,पुष्प लेकर संकल्प करे की आप आज भुवनेश्वरी साधना कर रहे है और उनकी कृपा से आपकी जो समस्या है उसका निवारण हो ..
गुरुस्मरण कर सदगुरु का पंचोपचार पूजन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: गंधं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: पुष्पम समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: धूपं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: दीपं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: नैवेद्यम समर्पयामि
अब चंद्रमा का ध्यान करे
दधि शंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् !
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम !!
ॐ सों सोमाय नम:
सोम आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत और एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्वाय धीमहि तन्नो चंद्र: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर चंद्रमा की प्रार्थना करे
रोहिणीश: सुधामूर्ति: सुधागान्नो सुधाशन : !
विषमस्थानसंभूतां पीडां दहतु मे विधु: !!
फिर राहु का ध्यान करे
वंदे राहुं धूम्रवर्ण अर्धकायं कृतांजलीम !
विकृतास्यं रक्तनेत्रं धूम्रलंकारमन्वहम "
ॐ रां राहवे नम:
राहू आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत और एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर प्रार्थना करे
महाशिर्षो महावक्त्रो महादंष्ट्रो महायश: !
अनुश्च ऊर्ध्वकेशश्च पीडां दहतु मे तम:
फिर केतु का ध्यान करे
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकं !
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् !!
ॐ कें केतवे नम:
केतु आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत अर्पण करे ..एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ पद्म पुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर प्रार्थना करे
अनेकरुपवर्णश्च शतशो अथ सहस्त्रश: !
उत्पातरुपी घोरश्च पीडां दहतु मे शिखी: !!
अब आप भगवती भुवनेश्वरी जी का ध्यान का जो मंत्र है उसे पढे और उनका आवाहन करे
ध्यान मंत्र :-
उदत दिन द्युतिम इंदुं किरिटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम !
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशाभितिकरां प्रभजे भुवनेशीम !!
ह्रीम भुवनेश्वर्यै नम :
मा भगवती राजराजेश्वरी भुवनेश्वरी आवाहयामि मम पूजा स्थाने मम हृदये स्थापयामि पूजयामि नम:
अब आवाहनादि मुद्राये आती हो तो प्रदर्शित करे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: आवाहिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: संस्थापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निधापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निरुद्धा भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सम्मुखी भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: अवगुंठिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: वरदो भव सुप्रसन्नो भव
अब भगवती पाश ,अंकुश, वर ,अभय ,
ज्ञान , पुस्तक और योनि मुद्रा दिखाये
फिर भुवनेश्वरी देवी का पंचोपचार पूजन करे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: गंधं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: पुष्पं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: धूपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: दीपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: नैवेद्यं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: तांबूलं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सर्वोपचारार्थे पुन: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि
इसके बाद अगर आवरण पूजन करना हो तो करे .. या फिर भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र का पाठ करे .. फिर भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमंगल कवच स्तोत्र और अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र का पाठ करे .. इनमेसे तिनो का या जितना हो सके उतने स्तोत्रो का पाठ कर स्फटिक माला से यथा शक्ती किसी एक मंत्र का जाप करे .. कमसे कम खडगमाला का और कवच का पाठ करना ना भूले ..
मंत्र :- निम्न मे से कोइ एक
१) ॐ ह्रीम नम:
२) ऐं ह्रीं श्रीं
फिर मंत्र जाप भगवती को समर्पित करे और एक आचमनी जल मे कुंकुम या अष्टगंध मिलाकर भगवती को अर्घ्य दे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात् ..
अंत मे क्षमाप्रार्थना करे .. ॐ मां ..

Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रम्

श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रम्    
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
अथानन्दमयीं साक्षाच्छब्दब्रह्मस्वरूपिणीम् ।
ईडे सकलसम्पत्त्यै जगत्कारणमम्बिकाम् ॥
विद्यामशेषजननीमरविन्दयोने- आद्यामशेष
र्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयित्रीम् ।
सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां
स्तुत्वा गिरं विमलयाम्यहमम्बिके त्वाम् ॥ १॥
पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण
होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः ।
देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ता
हेतुस्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ॥ २॥
त्रिस्रोतसः सकलदेवसमर्च्चितायाः
वैशिष्ट्यकारणमवैमि तदेव मातः ।
त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु
शम्भोर्जटासु सततं परिवर्तनं यत् ॥ ३॥
आनन्दयेत्कुमुदिनीमधिपः कलाना-
न्नान्यामिनः कमलिनीमथ नेतरां वा ।
एकस्य मोदनविधौ परमेकमीष्टे
त्वं तु प्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्ट्या ॥ ४॥
आद्याप्यशेषजगतान्नवयौवनासि
शैलाधिराजतनयाप्यतिकोमलासि ।
त्रय्याः प्रसूरपि तया न समीक्षितासि
ध्येयासि गौरि मनसो न पथि स्थितासि ॥ ५॥
आसाद्य जन्म मनुजेषु चिराद्दुरापं
तत्रापि पाटवमवाप्य निजेन्द्रियाणाम् ।
नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्रि ये त्वां
निःश्रेणिकाग्रमधिरुह्य पुनः पतन्ति ॥ ६॥
कर्पूरचूर्णहिमवारिविलोडितेन
ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धैः ।
आराधयन्ति हि भवानि समुत्सुकास्त्वां
ते खल्वखण्डभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ॥ ७॥
आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सरोजे
सुप्ता हि राजसदृशी विरचय्य विश्वम् ।
विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती
पद्मानि पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ॥ ८॥
तन्निर्गतामृतरसैरभिषिच्य गात्रं
मार्गेण तेन विलयं पुनरप्यवाप्ता ।
येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयु-
र्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि गर्भभाजः ॥ ९॥
आलम्बिकुण्डलभरामभिरामवक्त्रा-
मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् ।
चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्यहस्ता-
मावर्तयामि मनसा तव गौरि मूर्तिम् ॥ १०॥
आस्थाय योगमविजित्य च वैरिषट्क-
माबध्य चेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने ।
पाशाङ्कुशाभयवराढ्यकरांशुवक्त्रा-
मालोकयन्ति भुवनेश्वरि योगिनस्त्वाम् ॥ ११॥
उत्तप्तहाटकनिभां करिभिश्चतुर्भि-
रावर्तितामृतघटैरभिषिच्यमाना ।
हस्तद्वयेन नलिने रुचिरे वहन्ती
पद्मापि साभयकरा भवसि त्वमेव ॥ १२॥
अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि-
र्द्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिवासम् ।
दूर्वादलद्युतिरमर्त्यविपक्षपक्षा-
न्न्यक्कुर्वती त्वमसि देवि भवानि दुर्गे ॥ १३॥
आविर्न्निदाघजलशीकरशोभिवक्त्रां
गुञ्जाफलेन परिकल्पितहारयष्टिम् ।
रत्नांशुकामसितकान्तिमलङ्कृतां त्वा-
माद्यां पुलिन्दतरुणीमसकृन्नमामि ॥ १४॥
हंसैर्गतिः क्वणितनूपुरदूरदृष्टे
मूर्तेरिवाप्तवचनैरनुगम्यमानौ ।
पद्माविवोर्द्ध्वमुखरूढसुजातनालौ
श्रीकण्ठपत्नि शिरसैव दधे तवाङ्घ्री ॥ १५॥
द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव दृग्भ्या-
मुत्पाद्यता त्रिनयनं वृषकेतनेन ।
सान्द्रानुरागभवनेन निरीक्ष्यमाणे
जङ्घे उभे अपि भवानि तवानतोऽस्मि ॥ १६॥
ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ
स्थौल्येन मार्द्दवतया परिभूतरम्भौ ।
श्रोणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ
स्तम्भाविवाङ्गवयसा तव मध्यमेन ॥ १७॥
श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतोच्चै-
र्बाल्यात्परेण वयसा परिकृष्णसारः ।
रोमावलीविलसितेन विभाव्यमूर्ति-
र्मध्यं तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ॥ १८॥
सख्यास्स्मरस्य हरनेत्रहुताशभीरो-
र्ल्लावण्यवारिभरितं नवयौवनेन ।
आपाद्य दत्तमिव पल्लवमप्रविष्टं
नाभिं कदापि तव देवि न विस्मरेयम् ॥ १९॥
ईशोऽपि गेहपिशुनं भसितं दधाने
काश्मीरकर्द्दममनु स्तनपङ्कजे ते ।
स्नानोत्थितस्य करिणः क्षणलक्षफेनौ
सिन्दूरितौ स्मरयतः समदस्य कुम्भौ ॥ २०॥
कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्तिधारा
शोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजेन ।
कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ
मातर्मम स्मृतिपथं न विलज्जयेताम् ॥ २१॥
नात्यायतं रुचिरकम्बुविलासचौर्यं
भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् ।
कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये
सञ्चिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ॥ २२॥
अत्यायताक्षमभिजातललाटपट्टं
मन्दस्मितेन दरफुल्लकपोलरेखम् ।
बिम्बाधरं खलु समुन्नतदीर्घनासं
यत्ते स्मरत्यसकृदम्ब स एव जातः ॥ २३॥
आविस्त्वयारकरलेखमनल्पगन्ध-
पुष्पोपरि भ्रमदलिव्रजनिर्विशेषम् ।
यश्चेतसा कलयते तव केशपाशं
तस्य स्वयं गलति देवि पुराणपाशः ॥ २४॥
श्रुतिसुरचितपाकं धीमतां स्तोत्रमेतत्
पठति य इह मर्त्यो नित्यमार्द्द्रान्तरात्मा ।
स भवति पदमुच्चैस्सम्पदां पादनम्र-
क्षितिपमुकुटलक्ष्मीर्ल्लक्षणानां चिराय ॥ २५॥
इति श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रं समाप्तम् ॥
हिन्दी रुपान्तर -
श्री भुवनेश्वरी-स्तवः
हे माँ । आप श्री विश्वाद्या हो, अखिल ब्रह्माण्ड की जननी हो, ब्रह्माँ,
विष्णु, शिव की माता तथा अखिल विश्व को सृष्ट करनेवाली,
पोषण देनेवाली तथा लय करनेवाली हो । आप श्री के स्तवन से मेरी
वाक्य-रचना वाणी पवित्र हो ॥ १॥
हे माँ, पार्वति! पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यजमान,
सोम तथा सूर्य में जो महा-शिव व्यापक हैं तथा जो मदन को दहन
करनेवाले हैं, उन महाप्रभु शिव की भी त्रैलोक्य-सहार-शक्ति
आपसे ही उत्पन्न हुई है ॥ २॥
हे माँ! आप श्री की पवित्र चरण-से पवित्र हुई शिव के शिर की जटा
में तीन स्रोतवाली त्रिधार श्री भागीरथी गङ्गा विश्व-पूज्या हैं
तथा इसी कारण उनका प्राधान्य है ॥ ३॥
हे माँ, हे विश्व-जननि! चन्द्र से एकमात्र कुमुदिनी ही खिलती है ।
सूर्य से एकमात्र कमल का ही आनन्द बढता हे, अन्य का नहीं । इस
प्रकार एक-एक वस्तु के सुखार्थं एक-एक पदार्थ ही निर्दिष्ट हुआ
है परन्तु आप श्री तो सारे विश्व को श्री-दृष्टि से आनन्द देनेवाली
हो ॥ ४॥
हे माँ! विश्व में आप श्री सर्वादि-भूता होकर भी निरन्तर नव-यौवना
रहती हो । आप श्री अत्यन्त कठिन पर्वत-राज की पुत्री होने पर भी
अत्यन्त सु-कोमला हो । वेद आदि सद्-ग्रन्थ आप श्री से उत्पन्न होकर भी
आप श्री के-अनन्त गुण-कथन में असमर्थ हैं । आप श्री ध्यानगम्य
होकर भी किसी के मन में स्थिर नहीं होती हो ॥ ५॥
हे माँ! जो व्यक्ति दुर्लभ नर-जन्म में बुद्धि आदि दिव्य इन्द्रियों की
सहायता पाकर भी आपकी आराधना नहीं करते, वे मुक्ति की सीढी पर
चढकर भी पुनः गिरते हैं ॥ ६॥
हे माँ, हे भवानि! जो व्यक्ति कर्पूर-चूर्ण विलोडित (मिले हुए) शीतल
जल से घर्षित (घिसे हुए) चन्दन तथा सुगन्ध-युक्त पुष्पों से
उत्सुक-चित्त से आप श्री की आराधना करते हैं, वे सर्व-भुवनों
के अधिपति होते हैं ॥ ७॥
हें माँ, हे जननि! आप श्री मूलाधार चक्र में सर्वाकारा श्री कुण्डलिनी
रूप से स्थित होकर सारे विश्व को उत्पत्र करती हो तथा मूलाधार से
ऊर्ध्व में स्थित पद्यों को बिजली की रेखा के समान भेदकर सहस्रार-
स्थित परम शिव से सङ्ग करती हो (यह विद्युल्लता श्री कुण्डलिनी
अभ्यास से जागृत होती है ) ॥ ८॥
हे महेश्वर-कुटुम्बिनि है माँ! आप श्री सहस्रार-निर्गत
सुधा-पीयूष-रस से स्वदेह को स्नान कर सुषुम्ना-मार्ग में फिर
प्राप्त हो पुनः आधार-चक्र में विश्राम करती हो । जिस साधक
के हृत्कमल में आप श्री के इस रूप का भावोदय नहीं होता, वह
वारंवार (जन्म-मरणादि) गर्भवास भोगता है ॥ ९॥
हे माँ! आप श्री के लम्बे केश हैं । आप श्री का मुख अत्यन्त मनोहर
है । आप श्री पीन-स्तना हो । आप श्री की पतली कमर है तथा आप
श्री की चार भुजाओं में ज्ञानमुद्रा, जप-माला, कलश तथा पुस्तक
विराजमान है । है माँ! आप श्री की ऐसी छटा को नमस्कार है ॥ १०॥
हे माँ, हे विश्वेशि! योगि-जन योगाभ्यास से काम, क्रोध, मद,
लोभ, मत्सरादि को विजय कर इन्द्रिय-निरोध-द्वारा प्रफुल्लित चित्त
से प्राण-परा पाशांकुश-वराभय हाथवाली आप श्री का दर्शन करते
हैं ॥ ११॥
हे माँ! प्रतप्त सुवर्ण वर्णवाली, चार हाथियों द्वारा जल-पूरित
घटाभिषिक्ता, दो हाथों में पद्म तथा दो हाथों में वराभय-युक्ता
श्री महा-लक्ष्मी आप ही हो ॥ १२॥
हे भा, हे भवानि! श्रीसिंह-वाहना नाना अस्त्र-धारिणी, अष्ट-भुजा,
दूर्वा-दल-द्युति, सुरासुर-विजया, श्रीदुर्गा-रूप-धारिणी आप हि
हो ॥ १३॥
हे माँ! प्रस्वेद-बुन्द-सुशोभित मुख-कमलवाली गुञ्जा-फल-निर्मित
हार-यष्टी धारण किये हुये रत्नांशुका, रत्नवसना,
कृष्ण-कान्तियुता, श्रीअनङ्गवशी (काम को वशमें करनेवाली) आप
श्री का मैं सदा स्मरण करता हूँ ॥ १४॥
हे माँ, हे नील-कण्ठे! जिस प्रकार हंस नूपुर-ध्वनि से आकर्षित
होते हैं, उसी प्रकार वेद आप श्री के चरण-कमलो का अनुगमन
करते हैं । आप श्री के चरण-कमल ऊर्ध्व-मुख नील-कमल-वत्
प्रत्यन्त शोभा पा रहे हैं । मैं आपके उन्हीं दोनों चरण-कमलों
को अपने मस्तक पर धारण करता हूँ ॥ १५॥
हे माँ, हे भवानि! विश्वनाथ वृषभ-ध्वज श्रीमहा-शिवजी दो
नेत्रों से आप श्री के दर्शन कर तृप्त न हुए । अतः तीसरे नेत्र को
उत्पन्न कर गाढ़ानुराग-सहित आप श्री की जङ्घा का उन्होने दर्शन किया ।
आप श्री की उन जङ्गाओं को प्रणाम है, वारम्बार प्रणाम है ॥ १६॥
हे माँ! आप श्री की ऊरु हस्ति-शुण्ड-गर्व-खर्वा हैं, स्थूलता, आर्द्रता
एवं कोमलता में केले के स्तम्भ को विजय करनेवाली है । आप श्री के
देह के मध्य देश का भाग चाप श्री के नितम्बों ने हरण कर लिया
हो, ऐसा प्रतीत होता है अर्थात् मध्य देश ने ही स्तम्भ-रूप में
आप श्री के नितम्ब जङ्घादि निर्मित किये हों, ऐसा भासता है ॥ १७॥
हे माँ! आप श्री के मध्य देश से मानो आप श्री के नितम्ब, तथा
स्तन-मण्डल दोनों ने उच्चता तथा स्व-विस्तार के लिए सार खिंच
लिया है । अतः आप श्री का मध्यदेश क्षीण हो गया है । आप श्री का
यह मध्य देश मेरे हृदय में स्फुरित हो ॥ १८॥
हे माँ, हे जननि! श्री भगवान् महा-शिव के तृतीय नेत्राग्नि से
भय को प्राप्त हुए श्री मदन के रक्षार्थ श्रीमदन-प्रिया रति
ने स्व-लावण्य-जल-भरित सरोवर-वत् आप श्री की नाभि का निर्माण
किया हो, ऐसा प्रतीत होता है । आप श्री की इस नाभि को मैं कभी न
भूलूँ ॥ १९॥
हे माँ, हे जननि! आप श्री के दोनों कुच-कमलों में भस्म लगी
हुई है । ( इससे श्री भगवान् शिव ने आप श्री का आलिंगन किया हो,
ऐसा भासता है ) तथा आप श्री के स्तन-युगल केसर-पद्म-मूलादि
से अनुलिप्त हैं । स्नान कर निकले हुए मद-युक्त हाथी के क्षण
मात्र फेन-लक्षित सिन्दुरवाले गण्ड-स्थल के समान आप श्री के
कुच-युगल शोभा पा रहे हैं ॥ २०॥
हे माँ! पार्श्व में उत्तम कान्ति-धारा-सम शोभती आप श्री की दोनो
भुजाएं इस प्रकार शोभा दे रही हैं, मानो श्री मदन ने अपने
शत्रु श्री शिव का कण्ठ-ग्रहण करने के लिये लम्बा पाश बनाया
हो । हे माँ! आप श्री की इन दोनों भुजाओ का मेरे चित्त में सदैव
स्मरण रहे ॥ २१॥
हे माँ, हे गिरिकन्ये! आप श्री की मनोहर कम्बु-ग्रीवा को, जो अति दीर्घ
नहीं है, जिसमें अनेक प्रकार के आभूषण विद्यमान हैं तथा जिसमें
अनेक मनोहर गुण भरे हुए हैं, स्मरण करता हुआ मेरा मन कभी
तृप्त न हो ॥ २२॥
हे माँ, हे विश्व-जननि! आप श्री के आकर्ण खिंचे हुये अति दीर्घ
नेत्र हैं, परम मनोहर विशाल भाल है, स्मित हास्य से कपोल
प्रफुल्लित दीखते हैं, बिम्बाफल-वत् लाल अधर हैं, उठी हुई
दीर्घ नासिका है । जो पुरुष आप श्री के दिव्य मुखपद्य का स्मरण
करते हैं, उन्हीं का जन्म सफल हैं ॥ २३॥
हे देवि, हे माँ! आप श्री के केशपाश भाल-चन्द्रिका से प्रकाशित हो
रहे हैं, स्वल्प-सुगधिन्त फल गुञ्जित भ्रमर-वत् हो रहे हैं
(रत्यन्ते) । जो आप श्री के केशों का इस प्रकार चिन्तन करता है,
वह जगज्जाल से छूट जाता ॥ २४॥
आर्द्र-चित्त से स्तोत्र पाठ करने से सम्पत्ति का आधार बनता है
तथा उसके चरणों में राजपुरुष भी झुकते हैं ॥ २५॥
इति श्रीभुवनेश्वरीस्तवः सम्पूर्णः ।

Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्री भुवनेश्वर्यष्टकम् ॥



श्री भुवनेश्वर्यष्टकम् ॥
अथ श्रीभुवनेश्वर्यष्टकम् ।
श्रीदेव्युवाच -
प्रभो श्रीभैरवश्रेष्ठ दयालो भक्तवत्सल ।
भुवनेशीस्तवम् ब्रूहि यद्यहन्तव वल्लभा ॥ १॥
ईश्वर उवाच -
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि भुवनेश्यष्टकं शुभम् ।
येन विज्ञातमात्रेण त्रैलोक्यमङ्गलम्भवेत् ॥ २॥
ऊं नमामि जगदाधारां भुवनेशीं भवप्रियाम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदां रम्यां रमणीयां शुभावहाम् ॥ ३॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देवि ! त्वं यज्ञा यज्ञनायिका ।
त्वं नाथा त्वं तमोहर्त्री व्याप्यव्यापकवर्जिता ॥ ४॥
त्वमाधारस्त्वमिज्या च ज्ञानज्ञेयं परं पदम् ।
त्वं शिवस्त्वं स्वयं विष्णुस्त्वमात्मा परमोऽव्ययः ॥ ५॥
त्वं कारणञ्च कार्यञ्च लक्ष्मीस्त्वञ्च हुताशनः ।
त्वं सोमस्त्वं रविः कालस्त्वं धाता त्वञ्च मारुतः ॥ ६॥
गायत्री त्वं च सावित्री त्वं माया त्वं हरिप्रिया ।
त्वमेवैका पराशक्तिस्त्वमेव गुरुरूपधृक् ॥ ७॥
त्वं काला त्वं कलाऽतीता त्वमेव जगतांश्रियः ।
त्वं सर्वकार्यं सर्वस्य कारणं करुणामयि ॥ ८॥
इदमष्टकमाद्याया भुवनेश्या वरानने ।
त्रिसन्ध्यं श्रद्धया मर्त्यो यः पठेत् प्रीतमानसः ॥ ९॥
सिद्धयो वशगास्तस्य सम्पदो वशगा गृहे ।
राजानो वशमायान्ति स्तोत्रस्याऽस्य प्रभावतः ॥ १०॥
भूतप्रेतपिशाचाद्या नेक्षन्ते तां दिशं ग्रहाः ।
यं यं कामं प्रवाञ्छेत साधकः प्रीतमानसः ॥ ११॥
तं तमाप्नोति कृपया भुवनेश्या वरानने ।
अनेन सदृशं स्तोत्रं न समं भुवनत्रये ॥ १२॥
सर्वसम्पत्प्रदमिदं पावनानाञ्च पावनम् ।
अनेन स्तोत्रवर्येण साधितेन वरानने ।
समप्दो वशमायान्ति भुवनेश्याः प्रसादतः ॥ १३॥
इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीभुवनेश्वर्यष्टकं सम्पूर्णम् ।
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

भुवनेश्वरी त्रैलोक्य मंगल कवच स्तोत्र

भुवनेश्वरी त्रैलोक्य मंगल कवच स्तोत्र 
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
त्रैलोक्यमंगलअस्य कवचस्य ऋषि: शिव: ! 
छंदो विराट जगदधात्री देवता भुवनेश्वरी !!
धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोग: प्रकीर्तित: ! 
ह्रीं बीजंमे शिर:पातु भुवनेशी ललाटकम !!
ऐं पातु दक्षनेत्रम मे ह्रीं पातु वामलोचनम !
श्रीं पातु दक्षकर्णं मे त्रिवर्णात्मा महेश्वरी !!
वामकर्णं सदा पातु ऐं घ्राणं पातु मे सदा !
ह्रीं पातु वदनं देवी ऐं पातु रसनां मम !!
वाकत्रिपुरा त्रिवर्णात्मा कण्ठं पातु परात्मिका !
श्रीं स्कंधौ पातु नियतं ह्रीं भुजौ पातु सर्वदा !!
क्लीं करौ त्रिपुरेशानी त्रिपुरऐश्वर्यदायिनि
श्रीं पातु हृदयम ह्रीं मे मध्यदेशं सदावतु
क्रों पातु नाभिदेशं सा त्र्यक्षरी भुवनेश्वरी
सर्वजीवप्रदा पृष्ठम पातु सर्ववशंकरी
ह्रीं पातु गुह्यदेशं मे नमो भगवती कटिम
माहेश्वरी सदा पातु सक्थिनी जानुयुग्मकम
अन्नपुर्णे सदापातु स्वाहा पातु पदद्वयम
सप्तदशाक्षरी पायादन्नपूर्णा अखिलं वपु:
तारं माया रमा काम: षोडशार्णा तत:परम
शिरस्था सर्वदा पातु विंशत्यर्णात्मिका परा
तारं दुर्गे युगं रक्षिणि स्वाहेति दशाक्षरी
जयदुर्गा घनश्यामा पातु मां पूर्वत: सदा
माया बीजादिका चैषा दशार्णा च तथा परा
उत्तप्तकांचनाभा सा जयदुर्गा अनले अवतु
तारं ह्रीं दुर्गायै नम अष्टवर्णात्मिका परा
शंखचक्रधनुर्बाणधरा मां दक्षिणेवतु
महिषमर्दिनी स्वाहा वसुवर्णात्मिका परा
नैऋत्यां सर्वदा पातु महिषासुरनाशिनी
माया पद्मावती स्वाहा पश्चिमे मां सदावतु
पाशांकुशपुटा माया पाहि परमेश्वरि स्वाहा
त्रयोदशार्णा ताराद्या अश्वारुढानिलेवतु
सरस्वती पंचशरे नित्यक्लिन्ने मदद्रवे
स्वाहा च त्र्यक्षरी नित्या मामुत्तरे सदावतु
तारं माया च कवचं खे च रक्षेत ततो वधू:
हु क्षें ह्री फट महाविद्या द्वादशार्णाखिलप्रदा
त्वरिताष्टादिभि: पायात शिवकोणे सदा च माम
ऐं क्लीं सौ: सततं बाला माम ऊर्ध्वदेशतो वतु
बिंद्वंता भैरवी बाला भुमौ मां सर्वदावतु
इति ते कवचं पुण्यं त्रैलोक्यमंगलं परं
सारात सारतरं पुण्यं महाविद्यौघ विग्रहम
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

Monday, 1 July 2019

गुप्त नवरात्रि 25, जनवरी,,2020 शनिवार

गुप्त नवरात्रि 25, जनवरी,,2020 शनिवार गुप्त नवरात्रि प्रतिवर्ष दो बार माघ और आषाढ़ माह में आती हैं।
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5
गुप्त नवरात्रियों का महत्व चैत्र और शारदीय नवरात्रियों से भी अधिक हैं क्योंकि इनमें देवी अपने पूर्ण स्वरूप में विद्यमान रहती हैं जो प्रकट रूप में नहीं होता है। आइए जानें 9 खास बातें :
1. गुप्त नवरात्रि में आसपास की प्रकृति में हरियाते जीवन में देवी का ही स्वरूप है। अन्न के खेतों में ललहलहाती फसल देवी का ही रूप है। आसमान से बरसती बूंदें भी देवी ही हैं। मुस्कुराते रंगबिरंगे फूलों में देवी का ही सौंदर्य है।
2. गुप्त नवरात्रियों में देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं, लेकिन इसमें सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि साधकों को पूर्ण संयम और शुद्धता से देवी आराधना करना होती हैं।
3. इस बार आषाढ़ माह की गुप्त नवरात्रि आठ दिनों की है। सप्तमी तिथि का क्षय होने के कारण यह स्थिति बनी है। 3 जुलाई को गुप्त नवरात्रि की शुरुआत होगी और 10 जुलाई को भड़ली नवमी के साथ गुप्त नवरात्रि पूर्ण होगी।
4. गुप्त नवरात्रि में इस बार सर्वार्थसिद्धि और रवि योग के साथ ही अत्यंत शुभ माना जाने वाला गुरु-पुष्य संयोग भी बन रहा है। यह संयोग 4 जुलाई को यानी नवरात्रि के दूसरे दिन बनेगा।
5. इसके अलावा विनायक चतुर्थी, कुमार षष्ठी, विवस्वत सप्तमी जैसे पर्व भी आएंगे। इसी नवरात्रि में जगदीश रथयात्रा भी पूर्ण होगी। गुप्त नवरात्रि के आठ दिनों में तीन बार रवियोग और एक बार सर्वार्थसिद्धि योग आएगा।
6. गुप्त नवरात्रि में अधिकांश तांत्रिक साधक देवी की आराधना कर अधिक से अधिक लाभ-पुण्य कमाने का प्रयास करते हैं। गुप्त नवरात्रि के दिन तंत्र-मंत्र सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन माने गए हैं। कई साधक इन दिनों में दसों महाविद्याओं की साधना भी करते हैं। इनसे न केवल स्वयं के जीवन की परेशानियों का अंत होता है, बल्कि वे दूसरों की भलाई के काम भी कर सकते हैं।
7. सुखी जीवन के लिए करें देवी आराधना गृहस्थ साधक जो सांसारिक वस्तुएं, भोग-विलास के साधन, सुख-समृद्धि और निरोगी जीवन पाना चाहते हैं उन्हें इन नौ दिनों में दुर्गासप्तशती का पाठ करना चाहिए।
8. यदि इतना समय न हों तो सप्तश्लोकी दुर्गा का प्रतिदिन पाठ करें। देवी को प्रसन्न करने के लिए और साधना की पूर्णता के लिए नौ दिनों में लोभ, क्रोध, मोह, काम-वासना से दूर रहते हुए केवल देवी का ध्यान करना चाहिए। कन्याओं को भोजन कराएं, उन्हें यथाशक्ति दान-दक्षिणा, वस्त्र भेंट करें।
9. 25 जनवरी 2020 दिन शनिवार घट स्थापना, कलश स्थापना, शैलपुत्री पूजा
द्वितीया तिथि – 26 जनवरी 2020 दिन रविवार ब्रह्मचारिणी पूजा
तृतीया तिथि – 27 जनवरी 2020 दिन सोमवार ब्रह्मचारिणी पूजा
तृतीया तिथि – 28 जनवरी 2020 दिन मंगलवार चंद्रघंटा पूजा
चतुर्थी तिथि – 29 जनवरी 2020 दिन बुधवार कुष्मांडा पूजा
पंचमी तिथि – 30 जनवरी 2020 दिन गुरुवार स्कंदमाता पूजा
षष्ठी तिथि – 31 जनवरी 2020 दिन शुक्रवार कात्यायनी पूजा
सप्तमी तिथि – 1 फरवरी 2020 दिन शनिवार कालरात्रि पूजा
अष्टमी तिथि – 2 फरवरी 2020 दिन रविवार महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमी, महाष्टमी पूजा, संधि पूजा
नवमी तिथि – 3 फरवरी 2020 दिन सोमवार सिद्धिदात्री पूजा, नवरात्रि पारण, नवरात्री हवन
10 गुप्त नवरात्रि की देवियां ,,, मां काली, तारादेवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी माता, छिन्न माता, त्रिपुर भैरवी मां, धुमावती माता, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी।
11 महत्व ... देवी भागवत पुराण के अनुसार जिस तरह वर्ष में 4 बार नवरात्रि आती है और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के 9 रूपों की पूजा होती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है।
12 गुप्त नवरात्रि विशेष कर तांत्रिक कियाएं, शक्ति साधनाएं, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है।
13 इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग दुर्लभ शक्तियों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। गुप्त नवरात्रि के दौरान कई साधक महाविद्या के लिए मां दुर्गा के सभी स्वरूपों का पूजन करते हैं।
14 अष्टमी या नवमी के दिन कन्या-पूजन के साथ नवरात्रि व्रत का उद्यापन करने की मान्यता है। नवरात्रि उद्यापन में कुंआरी कन्याओं को भोजन कराकर यथाशक्ति दान, दक्षिणा, वस्त्र और आभूषण तथा श्रृंगार सामग्री भेंट करने से मां भगवती की अपार कृपा मिलती है।
15 गुप्त नवरात्रि में भी नौ दिनों तक क्रमानुसार देवी के स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों में मां दुर्गा की आराधना गुप्त रूप से की जाएगी।
16 तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए ये महा अवसर है। किसी एकांत \
17 इन नौ दिनों तक माता के 32 नाम के साथ उनके मंत्र का 108 बार जाप भी करें।
18 सिद्धिकुंजिकास्तोत्र का 18 बार पाठ कीजिए
19 यदि संभव हो तो दुर्गासप्तशती का एक पाठ प्रातः और एक रात्रि में कीजिए।
20 ब्रम्ह मुहूर्त में श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ करने से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का नाश होता है।
कलश की स्थापना और उसके पूजन के समय पुजारी शास्त्रसम्मत कुछ मंत्रों का उच्चारण करते हैं।
कलशस्य मुखे विष्णु : कंठे रुद्र: समाश्रित। मूल तस्य, स्थिति ब्रह्मा मध्ये मातगण: समाश्रित:।।
कलश के मुख में श्री विष्णु विराजमान हैं।
भ्रात: कान्चलेपगोपितबहिस्ताम्राकृते सर्वतो।
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।
ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।
कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।
प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणोशजी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।
स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होता है उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।
तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।
हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है
कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।
कब होते हैं गुप्त नवरात्र
चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र के बारे में तो सभी जानते ही हैं जिन्हें वासंती और शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है लेकिन गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाये जाते हैं। गुप्त नवरात्र की जानकारी अधिकतर उन लोगों को होती है जो तंत्र साधना करते हैं।
कब होते हैं गुप्त नवरात्र,,,,चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र के बारे में तो सभी जानते ही हैं जिन्हें वासंती और शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है लेकिन गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाये जाते हैं। गुप्त नवरात्र की जानकारी अधिकतर उन लोगों को होती है जो तंत्र साधना करते हैं।
गुप्त नवरात्र पौराणिक कथा,,,गुप्त नवरात्र के महत्व को बताने वाली एक कथा भी पौराणिक ग्रंथों में मिलती है कथा के अनुसार एक समय की बात है कि ऋषि श्रंगी एक बार अपने भक्तों को प्रवचन दे रहे थे कि भीड़ में से एक स्त्री हाथ जोड़कर ऋषि से बोली कि गुरुवर मेरे पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं जिसके कारण मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक कार्य व्रत उपवास अनुष्ठान आदि नहीं कर पाती। मैं मां दुर्गा की शरण लेना चाहती हूं लेकिन मेरे पति के पापाचारों से मां की कृपा नहीं हो पा रही मेरा मार्गदर्शन करें। तब ऋषि बोले वासंतिक और शारदीय नवरात्र में तो हर कोई पूजा करता है सभी इससे परिचित हैं। लेकिन इनके अलावा वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र भी आते हैं इनमें 9 देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है। यदि तुम विधिवत ऐसा कर सको तो मां दुर्गा की कृपा से तुम्हारा जीवन खुशियों से परिपूर्ण होगा। ऋषि के प्रवचनों को सुनकर स्त्री ने गुप्त नवरात्र में ऋषि के बताये अनुसार मां दुर्गा की कठोर साधना की स्त्री की श्रद्धा व भक्ति से मां प्रसन्न हुई और कुमार्ग पर चलने वाला उसका पति सुमार्ग की ओर अग्रसर हुआ उसका घर खुशियों से संपन्न हुआ।

।॥Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

Wednesday, 12 June 2019

श्री बटुक भैरव जयन्ती


श्री बटुक भैरव जयन्ती 
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
बटुक भैरव प्रसन्न होकर सदा साधक के साथ रहते हैं और उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं अकाल मौत से बचाते हैं। ऐसे साधक को कभी धन की कमी नहीं रहती और वह सुखपूर्वक वैभवयुक्त जीवन- यापन करता है।
जो साधक बटुक भैरव की निरंतर साधना करता है तो भैरव बींब रूप में उसे दर्शन देकर उसे कुछ सिद्धियां प्रदान करते हैं जिसके माध्यम से साधक लोगों का भला करता है। श्री बटुक
भगवान भैरव अपने भक्तों के कष्टों को दूर कर बल, बुद्धि, तेज, यश, धन तथा मुक्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति भैरव जयंती को भैरव का व्रत रखता है, पूजन या उनकी उपासना करता है वह समस्त कष्टों से मुक्त हो जाता है।
श्री बटुक भैरव अपने उपासक की दसों दिशाओं से रक्षा करते हैं। स्कंद पुराण के अवंति खंड के अंतर्गत उज्जैन में अष्ट महाभैरव का उल्लेख मिलता है।
भैरव तंत्र का कथन है कि जो भय से मुक्ति दिलाए वह भैरव है।भय स्वयं तामस-भाव है। तम और अज्ञान का प्रतीक है यह भाव। जो विवेकपूर्ण है वह जानता है कि समस्त पदार्थ और शरीर पूरी तरह नाशवान है।
आत्मा के अमरत्व को समझ कर वह प्रत्येक परिस्थिति में निर्भय बना रहता है। जहाँ विवेक तथा धैर्य का प्रकाश है वहाँ भय का प्रवेश हो ही नहीं सकता। वैसे भय केवल तामस-भाव ही नहीं, वह अपवित्र भी होता है।
इसीलिये भय के देवता महाभैरव को यज्ञ में कोई भाग नहीं दिया जाता। कुत्ता उनका वाहन है। क्षेत्रपाल के रूप में उन्हें जब उनका भाग देना होता है तो यज्ञीय स्थान से दूर जाकर वह भाग उनको अर्पित किया जाता है, और उस भाग को देने के बाद यजमान स्नान करने के उपरांत ही पुन: यज्ञस्थल में प्रवेश कर सकता है।
साधना विधि एवं मंत्र
साधक को साधना से पूर्व स्नानादि से निवृत होकर लाल अथवा कला वस्त्र धारण करना चाहिए यथा सामर्थ्य पूजन सामग्री पहके ही इकट्ठा करके रखी चाहिए। इसके बाद दक्षिण दिशा में चौकी पर श्री बटुक भैरव का यंत्र भैरवजी के चित्र के समीप रखें। दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें। लाल अथवा काले कंबल के आसन पर बैठकर आचमन कर शरीर एवं आसान शुद्धिकर पंचोपचार से यंत्र को स्नान कराये उसका पूजन
निम्न मंत्रो द्वारा करें
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
अब धूप दीप लड्डुओं का नैवैद्य अर्पण कर जप का संकल्प लेना चाहिए।
इसके बाद बटुक भैरव का ध्यान करें ध्यान मंत्र
वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।
दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः॥
दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल -दण्डौ दधानम्॥
अर्थात्  भगवान् श्री बटुक-भैरव बालक रुपी हैं। उनकी देह-कान्ति स्फटिक की तरह है। घुँघराले केशों से उनका चेहरा प्रदीप्त है। उनकी कमर और चरणों में नव मणियों के अलंकार जैसे किंकिणी, नूपुर आदि विभूषित हैं। वे उज्जवल रुपवाले, भव्य मुखवाले, प्रसन्न-चित्त और त्रिनेत्र-युक्त हैं। कमल के समान सुन्दर दोनों हाथों में वे शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं। भगवान श्री बटुक-भैरव के इस सात्विक ध्यान से सभी प्रकार की अप-मृत्यु का नाश होता है, आपदाओं का निवारण होता है, आयु की वृद्धि होती है, आरोग्य और मुक्ति-पद लाभ होता है। ध्यान के बाद जप आरम्भ करें
जप मंत्र  नॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा
उक्त मंत्र की आज रात्रि कम से कम 21 माला करे इसके बाद प्रतिदिन 11 माला जब तक सवालाख जप पूर्ण ना हो जाये करें। अपनी सामर्थ्य अनुसार अधिक जप भी कर सकते है। सवालाख जप पूर्ण होने के बाद इसका दशांश यानी 12500 मंत्रो से हवन में आहुति देना चाहिए।भैरव की पूजा में जप के आरम्भ व अंत मे श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली का पाठ भी करना चाहिए। मंत्र जाप के बाद अपराध-क्षमापन स्तोत्र का पाठ करें।
अंत मे श्री बटुक-भैरव-अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र का पाठ करें।
श्री बटुक-भैरव-अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र ॥
जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव आराधना का बहुत महत्व है। जप के बाद श्री बटुक-भैरव-अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र का पाठ करें, तो निश्चित ही आपके सारे कार्य सफल और सार्थक हो जाएंगे, साथ ही आप अपने व्यापार, व्यवसाय और जीवन में आने वाली समस्या, विघ्न, बाधा, शत्रु, कोर्ट कचहरी, और मुकदमे में पूर्ण सफलता प्राप्त करेंगे
मूल-स्तोत्र
ॐ  भैरवो भूत-नाथश्च,  भूतात्मा   भूत-भावनः।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च,   क्षेत्रदः     क्षत्रियो  विराट् ॥
श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।
रक्तपः पानपः सिद्धः,  सिद्धिदः   सिद्धि-सेवितः॥
कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।
त्रि-नेत्रो     बहु-नेत्रश्च,   तथा     पिंगल-लोचनः॥
शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।
अभीरुर्भैरवी-नाथो,   भूतपो    योगिनी –  पतिः॥
धनदोऽधन-हारी च,   धन-वान्   प्रतिभागवान्।
नागहारो नागकेशो,   व्योमकेशः   कपाल-भृत्॥
कालः कपालमाली च,    कमनीयः कलानिधिः।
त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत्॥
त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।
बटुको   बटु-वेषश्च,    खट्वांग   -वर – धारकः॥
भूताध्यक्षः      पशुपतिर्भिक्षुकः      परिचारकः।
धूर्तो दिगम्बरः   शौरिर्हरिणः   पाण्डु – लोचनः॥
प्रशान्तः  शान्तिदः  शुद्धः  शंकर-प्रिय-बान्धवः।
अष्ट -मूर्तिर्निधीशश्च,  ज्ञान- चक्षुस्तपो-मयः॥
अष्टाधारः  षडाधारः,  सर्प-युक्तः  शिखी-सखः।
भूधरो        भूधराधीशो,      भूपतिर्भूधरात्मजः॥
कपाल-धारी मुण्डी च ,   नाग-  यज्ञोपवीत-वान्।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा॥
शुद्द – नीलाञ्जन – प्रख्य – देहः मुण्ड  -विभूषणः।
बलि-भुग्बलि-भुङ्- नाथो,  बालोबाल  –  पराक्रम॥
सर्वापत् – तारणो  दुर्गो,   दुष्ट-   भूत-  निषेवितः।
कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी  वश-कृद्वशी॥
जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया – मन्त्रौषधी -मयः।
सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः,   प्रभ –   विष्णुरितीव  हि॥
                     ॥फल-श्रुति॥
अष्टोत्तर-शतं नाम्नां,    भैरवस्य          महात्मनः।
मया ते कथितं   देवि,   रहस्य    सर्व-कामदम्॥
य इदं पठते स्तोत्रं,          नामाष्ट – शतमुत्तमम्।
न तस्य दुरितं  किञ्चिन्न   च   भूत-भयं    तथा॥
न शत्रुभ्यो भयंकिञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।
पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत्  स्तोत्रमतः   सुधीः॥
मारी-भये राज-भये,  तथा चौ  राग्निजे   भये।
औत्पातिके भये चैव,  तथा   दुःस्वप्नज  भये॥
बन्धने च महाघोरे,  पठेत्   स्तोत्रमनन्य-धीः।
सर्वं प्रशममायाति, भयं  भैरव  – कीर्तनात्॥
साधना का समय👉   शाम 7 से 11 बजे के बीच।
साधना की चेतावनी👉 इस साधना को बिना गुरु की आज्ञा के ना करें। साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें। सहवास से दूर रहें। वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें।
साधना नियम व सावधानी
1. भैरव साधना किसी मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है इसलिए अपनी मनोकामना अनुसार संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें।
2. यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है।
3. रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है।
4. भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें।
5. भैरव पूजा में केवल सरसो के तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए।
6. साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें।
7.  लड्डू के भोग का प्रशाद चढ़ाए तथा साधना के बाद में थोड़ा प्रशाद स्वरूप ग्रहण करें शेष लड्डुओं को कुत्तों को खिला दें।
8. भैरव को अर्पित नैवेद्य को पूजा के बाद उसी स्थान पर ग्रहण करना चाहिए।
9. भैरव की पूजा में दैनिक नैवेद्य दिनों के अनुसार किया जाता है, जैसे रविवार को चावल-दूध की खीर, सोमवार को मोतीचूर के लड्डू, मंगलवार को घी-गुड़ अथवा गुड़ से बनी लापसी या लड्डू, बुधवार को दही-बूरा, गुरुवार को बेसन के लड्डू, शुक्रवार को भुने हुए चने, शनिवार को तले हुए पापड़, उड़द के पकौड़े या जलेबी का भोग लगाया जाता है।

निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी 
।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला-एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।
निर्जला एकादशी का महत्त्व
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहाँ तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।
निर्जला एकादशी पूजा
इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है। इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है। एकादशी के दिन सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें। पश्चात् 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करे। इस दिन व्रत करने वालों को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। तदोपरान्त नियमानुसार नारायण कवच का पाठ करें। पाठ के बाद भगवान नारायण की आरती करें।
विधि – उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जाय | तत्पश्चात ३ वार आचमन करके आसन एवं देह की शुद्धि करके ॐ ॐ नमः पादयोः |ॐ नं नमो जान्वोः | ॐ मों नमः ऊर्वो:| ॐ नां नमः उदरे |ॐ रां नमो हृदि | ॐ यं नमो उरसि | ॐ णां नमो मुखे | ॐ यं नमः शिरसि |

ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्यां, ॐ  नं नमो दक्षिणमध्यमायां ,ॐ मों  नमो दक्षिणानामिकायां, ॐ भं नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम्| ॐ गं नमो वामकनिष्ठिकायाम्, ॐ वं नमो वामानामिकायाम्, ॐ तें नमो वाममध्मायाम्, ॐ वां नमो वामतर्जन्याम्, ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ दें नमो दक्षिणांगुष्ठाधःपर्वणि, ॐ वां नमो वामान्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ यं नमो वामान्गुष्ठाधः पर्वणि –

इन मंत्रो से तत्तदंगों में न्यास करके निम्नलिखित मन्त्र से दिग्बन्धन करें

ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ,ॐ मः अस्त्राय फट्  आग्नेय्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् नैर्ऋत्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् प्र्तीच्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् कौबेर्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् ईशान्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम्,ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम्,

नारायणकवचम् ॥
राजोवाच ।
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥1॥

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥2॥
श्रीशुक उवाच ।
वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥3॥

विश्वरूप उवाच ।
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः ।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥4॥

नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते ।
दैवभूतात्मकर्मभ्यो नारायणमयः पुमान् |
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥5॥

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥6॥

करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ॥7॥

न्यसेद्धृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥8॥

वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥9॥

सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥10॥

आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥11॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥12॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥13॥

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः ।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥14॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥15॥

मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥16॥

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥17॥

धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्या-
द्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा ।
यज्ञश्च लोकादवताञ्जनान्ता-
द्बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ॥18॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधा-
द्बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात् ।
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥19॥

मां केशवो गदया प्रातरव्या-
द्गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः ।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥20॥

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा
सायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥21॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः
प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः ।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥22॥

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥23॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-भूतग्रहांश गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥24॥

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ-
पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् ।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो
भीमस्वनोऽरेहृदयानि कम्पयन् ॥25॥

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-
मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि ।
चक्षूंषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय
द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ॥26॥

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च ।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य वा ॥27॥

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात् ।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ॥28॥

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः ।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥29॥

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः ।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ॥30॥

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥31॥

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् ।
भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥32॥

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥33॥

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः।
प्रहापयंलोकभयं स्वनेन
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ॥34॥

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम् ।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ॥35॥

एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ॥36॥

न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥37॥

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन् द्विजः ।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरुधन्वनि ॥38॥

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा ।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ॥39॥

गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्षिराः ।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥40॥

श्रीशुक उवाच ।

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः ।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥41॥

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥42॥

॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारायणवर्मकथनंनामाष्टमोऽध्यायः ॥

निर्जला एकादशी के दान
इस एकादशी का व्रत करके यथा सामर्थ्य अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा। इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है। भक्ति भाव से कथा श्रवण करते हुए भगवान का कीर्तन करना चाहिए।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा

निर्जला एकादशी व्रत का पौराणिक महत्त्व और आख्यान भी कम रोचक नहीं है। जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था।

युधिष्ठिर ने कहा- जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|

तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।

यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।

भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।

व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।’

एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं। अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है। मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।

कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो- उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है। पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि "मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा।" द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।

संसारसागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।

भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई।

श्रीभगवान जगदीश्वर जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…

Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...