Tuesday, 15 July 2014

अंगारकी चतुर्थी ,,,मंगलवार

अंगारकी चतुर्थी  (मंगलवार) का व्रत विधिवत करने से सालभर की चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है। गणेश पुराण में उल्लेख है की भूमिपुत्र मंगल के कठोर तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें इच्छित वरदान देकर मंगलवार की चतुर्थी को सर्व संकट नाशक होने की शक्ति प्रदान की। मंगल देव को तेजस्विता एवं रक्त वर्ण के कारण 'अंगारक' नाम प्राप्त है। इसी कारण यह चतुर्थी अंगारक चतुर्थी कहलाती है।
चतुर्थी के दिन एक समय रात्रि को चंद्र उदय होने के पश्च्यात चंद्र दर्शन करके भोजन करे तो अति उत्तम रहता हैं।
रात में चंद्रमा के उदय हो जाने पर चंद्रमा को देख कर गणपतिजी का ध्यान करते हुए निम्न श्लोक पढकर अघ्र्य दें-
गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक।
संकष्ट हरमेदेव गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥1॥
कृष्णपक्षेचतुथ्र्यातुसम्पूजितविधूदये।
क्षिप्रंप्रसीददेवेश गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥2॥
पश्चात इस श्लोक से चतुर्थी तिथि की अधिष्ठात्री देवी को अघ्र्य प्रदान करें-
तिथीनामुत्तमेदेवि गणेशप्रियवल्लभे।
सर्वसंकटनाशायगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
जो व्यक्ति अंगारकी चतुर्थी का व्रत विधिवत करता है उसके कार्य में किसी प्रकार के बाधा-विघ्न नहीं आते एवं उसके घरे में गणेश जी के साथ मे रिद्धि-सिद्धि का वास होता हैं।
मंगलवार चतुर्थी- अंगार चतुर्थी को सब काम छोड़ कर जप-ध्यान करना ...जप, ध्यान, तप बहुत ही फलदायी है...
बिना नमक का भोजन करें !
मंगल देव का मानसिक आह्वान करो !
चन्द्रमा में गणपति की भावना करके अर्घ्य दें !
इस महा योग पर अगर मंगल ग्रह देव के 21 नाम से सुमिरन करे और धरती पर अर्घ्य देकर प्रार्थना करे,शुभ संकल्प करे तो आप सकल ऋण से मुक्त हो सकते है..
मंगल देव के 21 नाम इस प्रकार है :-
1) ॐ मंगलाय नमः2) ॐ भूमि पुत्राय नमः3 ) ॐ ऋण हर्त्रे नमः4) ॐ धन प्रदाय नमः5 ) ॐ स्थिर आसनाय नमः6) ॐ महा कायाय नमः7) ॐ सर्व कामार्थ साधकाय नमः8) ॐ लोहिताय नमः9) ॐ लोहिताक्षाय नमः10) ॐ साम गानाम कृपा करे नमः11) ॐ धरात्मजाय नमः12) ॐ भुजाय नमः13) ॐ भौमाय नमः14) ॐ भुमिजाय नमः15) ॐ भूमि नन्दनाय नमः16) ॐ अंगारकाय नमः17) ॐ यमाय नमः18) ॐ सर्व रोग प्रहाराकाय नमः19) ॐ वृष्टि कर्ते नमः20) ॐ वृष्टि हराते नमः21) ॐ सर्व कामा फल प्रदाय नमः
ये 21 मन्त्र से भगवान मंगल देव को नमन करे ..फिर धरती पर अर्घ्य देना चाहिए..अर्घ्य देते समय ये मन्त्र बोले :-
भूमि पुत्रो महा तेजा
कुमारो रक्त वस्त्रका
ग्रहणअर्घ्यं मया दत्तम
ऋणम शांतिम प्रयाक्ष्मे
हे भूमि पुत्र!..महा तेजस्वी,रक्त वस्त्र धारण करने वाले देव मेरा अर्घ्य स्वीकार करो और मुझे ऋण से शांति प्राप्त कराओ..
कितना भी कर्ज़दार हो ..काम धंधे से बेरोजगार हो ..रोज़ी रोटी तो मिलेगी और कर्जे से छुटकारा मिलेगा |
अगली मंगला चौथ
जुलाई (मंगलवार) अंगारकी चतुर्थी
09 दिसम्बर (मंगलवार) अंगारकी चतुर्थी

Photo: अंगारकी चतुर्थी 15 जुलाई (मंगलवार)  का व्रत विधिवत करने से सालभर की चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है। गणेश पुराण में उल्लेख है की भूमिपुत्र मंगल के कठोर तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें इच्छित वरदान देकर मंगलवार की चतुर्थी को सर्व संकट नाशक होने की शक्ति प्रदान की। मंगल देव को तेजस्विता एवं रक्त वर्ण के कारण 'अंगारक' नाम प्राप्त है। इसी कारण यह चतुर्थी अंगारक चतुर्थी कहलाती है।
चतुर्थी के दिन एक समय रात्रि को चंद्र उदय होने के पश्च्यात चंद्र दर्शन करके भोजन करे तो अति उत्तम रहता हैं।
रात में चंद्रमा के उदय हो जाने पर चंद्रमा को देख कर गणपतिजी का ध्यान करते हुए निम्न श्लोक पढकर अघ्र्य दें-
गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक।
संकष्ट हरमेदेव गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥1॥
कृष्णपक्षेचतुथ्र्यातुसम्पूजितविधूदये।
क्षिप्रंप्रसीददेवेश गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥2॥
पश्चात इस श्लोक से चतुर्थी तिथि की अधिष्ठात्री देवी को अघ्र्य प्रदान करें-
तिथीनामुत्तमेदेवि गणेशप्रियवल्लभे।
सर्वसंकटनाशायगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
जो व्यक्ति अंगारकी चतुर्थी का व्रत विधिवत करता है उसके कार्य में किसी प्रकार के बाधा-विघ्न नहीं आते एवं उसके घरे में गणेश जी के साथ मे रिद्धि-सिद्धि का वास होता हैं।
मंगलवार चतुर्थी- अंगार चतुर्थी को सब काम छोड़ कर जप-ध्यान करना ...जप, ध्यान, तप बहुत ही फलदायी है...
बिना नमक का भोजन करें !
मंगल देव का मानसिक आह्वान करो !
चन्द्रमा में गणपति की भावना करके अर्घ्य दें !
इस महा योग पर अगर मंगल ग्रह देव के 21 नाम से सुमिरन करे और धरती पर अर्घ्य देकर प्रार्थना करे,शुभ संकल्प करे तो आप सकल ऋण से मुक्त हो सकते है..
मंगल देव के 21 नाम इस प्रकार है :-
1) ॐ मंगलाय नमः2) ॐ भूमि पुत्राय नमः3 ) ॐ ऋण हर्त्रे नमः4) ॐ धन प्रदाय नमः5 ) ॐ स्थिर आसनाय नमः6) ॐ महा कायाय नमः7) ॐ सर्व कामार्थ साधकाय नमः8) ॐ लोहिताय नमः9) ॐ लोहिताक्षाय नमः10) ॐ साम गानाम कृपा करे नमः11) ॐ धरात्मजाय नमः12) ॐ भुजाय नमः13) ॐ भौमाय नमः14) ॐ भुमिजाय नमः15) ॐ भूमि नन्दनाय नमः16) ॐ अंगारकाय नमः17) ॐ यमाय नमः18) ॐ सर्व रोग प्रहाराकाय नमः19) ॐ वृष्टि कर्ते नमः20) ॐ वृष्टि हराते नमः21) ॐ सर्व कामा फल प्रदाय नमः
ये 21 मन्त्र से भगवान मंगल देव को नमन करे ..फिर धरती पर अर्घ्य देना चाहिए..अर्घ्य देते समय ये मन्त्र बोले :-
भूमि पुत्रो महा तेजा
कुमारो रक्त वस्त्रका
ग्रहणअर्घ्यं मया दत्तम
ऋणम शांतिम प्रयाक्ष्मे
हे भूमि पुत्र!..महा तेजस्वी,रक्त वस्त्र धारण करने वाले देव मेरा अर्घ्य स्वीकार करो और मुझे ऋण से शांति प्राप्त कराओ..
कितना भी कर्ज़दार हो ..काम धंधे से बेरोजगार हो ..रोज़ी रोटी तो मिलेगी और कर्जे से छुटकारा मिलेगा |
अगली मंगला चौथ
15 जुलाई (मंगलवार) अंगारकी चतुर्थी
09 दिसम्बर (मंगलवार) अंगारकी चतुर्थी

मंगला गौरी व्रत


मंगला गौरी व्रत,,,श्रावण मास में श्रावण सोमवार के दूसरे दिन यानी मंगलवार के दिन 'मंगला गौरी व्रत' मनाया जाता है। श्रावण माह के हर मंगलवार को मनने वाले इस व्रत को मंगला गौरी व्रत (पार्वतीजी) नाम से ही जाना जाता है। धार्मिक पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। अत: इस दिन माता मंगला गौरी का पूजन करके मंगला गौरी की कथा सुनना फलादायी होता है। .....
ऐसा माना जाता है कि श्रावण मास में मंगलवार को आने वाले सभी व्रत-उपवास मनुष्य के सुख-सौभाग्य में वृद्धि करते हैं। अपने पति व संतान की लंबी उम्र एवं सुखी जीवन की कामना के लिए महिलाएं खास तौर पर इस व्रत को करती है। सौभाग्य से जुडे़ होने की वजह से नवविवाहित दुल्हनें भी आदरपूर्वक एवं आत्मीयता से इस व्रत को करती है। ,,,,,
ज्योतिषीयों के अनुसार जिन युवतियों और महिलाओं की कुंडली में वैवाहिक जीवन में कम‍ी‍ महसूस होती है अथवा शादी के बाद पति से अलग होने या तलाक हो जाने जैसे अशुभ योग निर्मित हो रहे हो, तो उन महिलाओं के लिए मंगला गौरी व्रत विशेष रूप से फलदायी है। अत: ऐसी महिलाओं को सोलह सोमवार के साथ-साथ मंगला गौरी का व्रत अवश्य रखना चाहिए। ,,,
। ज्ञात हो कि एक बार यह व्रत प्रारंभ करने के पश्चात इस व्रत को लगातार पांच वर्षों तक किया जाता हैं। तत्पश्चात इस व्रत का विधि-विधान से उद्यापन कर देना चाहिए।
इस व्रत के दौरान ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें। ,,, नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ-सुथरे धुले हुए अथवा कोरे (नवीन) वस्त्र धारण कर व्रत करना चाहिए।
 इस व्रत में एक ही समय अन्न ग्रहण करके पूरे दिन मां पार्वती की आराधना की जाती है।
 मां मंगला गौरी (पार्वतीजी) का एक चित्र अथवा प्रतिमा लें।
 फिर - 'मम पुत्रापौत्रासौभाग्यवृद्धये श्रीमंगलागौरीप्रीत्यर्थं पंचवर्षपर्यन्तं मंगलागौरीव्रतमहं करिष्ये।’ इस मंत्र के साथ व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए।
व्रत संकल्प का अर्थ - ऐसा माना जाता है कि, मैं अपने पति, पुत्र-पौत्रों, उनकी सौभाग्य वृद्धि एवं मंगला गौरी की कृपा प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का संकल्प लेती हूं। तत्पश्चात मंगला गौरी के चित्र या प्रतिमा को एक चौकी पर सफेद फिर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित किया जाता है। फिर उस प्रतिमा के सामने एक घी का दीपक (आटे से बनाया हुआ) जलाएं, दीपक ऐसा हो, जिसमें सोलह बत्तियां लगाई जा सकें।
 तत्पश्चात -
'कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्।
नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्..।।
 यह मंत्र बोलते हुए माता मंगला गौरी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। माता के पूजन के पश्चात उनको (सभी वस्तुएं सोलह की संख्या में होनी चाहिए) 16 मालाएं, लौंग, सुपारी, इलायची, फल, पान, लड्डू, सुहाग क‍ी सामग्री, 16 चुडि़यां तथा मिठाई चढ़ाई जाती है। इसके अलावा 5 प्रकार के सूखे मेवे, 7 प्रकार के अनाज-धान्य (जिसमें गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर) आदि होना चाहिए। पूजन के बाद मंगला गौरी की कथा सुनी जाती है।

मां मंगला गौरी कथा के अनुसार - पुराने समय की बात है। एक शहर में धरमपाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी खूबसूरत थी और उनके पास बहुत सारी धन-दौलत थी। लेकिन उनको कोई संतान नहीं थी, इस वजह से पति-पत्नी दोनों ही हमेशा दुखी रहते थे।  ,!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!
फिर ईश्वर की कृपा से उनको पुत्र प्राप्ति हुई, लेकिन वह अल्पायु था। उसे यह श्राप मिला हुआ था कि सोलह वर्ष की उम्र में सर्प दंश के कारण उसकी मौत हो जाएगी।

ईश्वरीय संयोग से उसकी शादी सोलह वर्ष से पहले ही एक युवती से हुई, जिसकी माता मंगला गौरी व्रत किया करती थी। परिणामस्वरूप उसने अपनी पुत्री के लिए एक ऐसे सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त किया था, जिसके कारण वह कभी विधवा नहीं हो सकती। इसी कारण धरमपाल के पुत्र ने 100 साल की लंबी आयु प्राप्त की।

अत: शास्त्रों के अनुसार यह मंगला गौरी व्रत नियमानुसार करने से प्रत्येक मनुष्य के वैवाहिक सुख में बढ़ोतरी होकर पुत्र-पौत्रादि भी अपना जीवन सुखपूर्वक गुजारते हैं। ऐसी इस व्रत की महिमा है।


Sunday, 13 July 2014

श्रावण मास , शिव पूजा का विशेष महत्व है ,श्रावण सोमवार ,,Shravan Somvar

श्रावण मास में आशुतोष भगवान्‌ शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। जो प्रतिदिन पूजन न कर सकें उन्हें सोमवार को शिव पूजा अवश्य करनी चाहिये और व्रत रखना चाहिये। सोमवार भगवान्‌ शंकर का प्रिय दिन है, अत: सोमवार को शिवाराधन करना चाहिये। श्रावण मास में पार्थिव शिव पूजा का विशेष महत्व है। अत: प्रतिदिन अथवा प्रति सोमवार तथा प्रदोष को शिवपूजा या पार्थिव शिवपूजा अवश्य करनी चाहिये।
सोमवार ,,,Shravan Somvar ,,,के व्रत के दिन प्रातः काल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर देवालय या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव-पार्वती और नंदी की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रूप में जल , दूध , दही , शहद , घी , चीनी , जनेऊ , चंदन , रोली , बेल पत्र , भांग , धतूरा , धूप , दीप और दक्षिणा के साथ ही नंदी के लि‌ए चारा या आटे की पिन्नी बनाकर भगवान पशुपतिनाथ का पूजन किया जाता है। रात्रिकाल में घी और कपूर सहित गुगल, धूप की आरती करके शिव महिमा का गुणगान किया जाता है। लगभग श्रावण मास के सभी सोमवारों को यही प्रक्रिया अपना‌ई जाती है। इस मासमें लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ कराने का भी विधान है।
इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ा‌ई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :
1 प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी,
2 दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी,
3 तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी,
4 चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि
5 पाँचवाँ सोमवार आ‌ए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।
शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।
अगर आप उपरोक्त विधि का पालन करने में असमर्थ हैं तो शिवलिंग उअर जल अर्पण कर एक सवच, कोमल अखंडित बिल्वपत्र को भगवन भोले नाथ पर अर्पण कर श्रधा के साथ बिल्वाष्टक या यह लघु मन्त्र जाप करें
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्
त्रिजन्मपाप संहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥
बिल्वाष्टकम ,,,यह स्तोत्र भगवन शिव को अति प्रिये हे क्योंकि बिल्वपत्र भगवन शिव की पूजा के लिए सर्वॊच
है। प्रतिदिन भगवन शिव के लिंग स्वरुप पर बिल्वपत्र अर्पण करने और बिल्वाष्टक का पाठ करने से समस्त जन्मों के पापों का नाश होता है।

*ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,,
बिल्वाष्टकम,,,त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्त्रि जन्मपाप संहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् अखण्ड बिल्व पात्रेण पूजिते नन्दिकेश्र्वरे शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत्सो मयज्ञ महापुण्यं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च कोटि कन्या महादानं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
लक्ष्म्या स्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्बि ल्ववृक्षं प्रयच्छामि एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥
काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम्प्र यागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम्
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे अग्रतः शिवरूपाय एक बिल्वं शिवार्पणम् ॥ इति श्री बिल्वाष्टकम संपूर्णम्

Friday, 11 July 2014

श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नमः । श्रीनृसिंह मंत्रराजात्मकम्

श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नमः । ब्रह्मोवाच । श्रीनृसिंह मंत्रराजात्मकम्
अनेक मन्त्र कोटीशः नृसिंहनाम उच्यते । अन्यो विधि न रक्षायै विषरोग निवारणे ॥१॥
ॐ अस्य श्री लक्ष्मीनृसिंहमन्त्रकवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुभ् छन्दः ऐं कीलकम् ।
श्रीनृसिंहोदेवता ।
मम सर्वरोगानां सर्व देवानां चौरपन्नव्याघ्रवृश्चिकभूतप्रेतापिशाच शाकिनीडीकिनी यंत्रमंत्रानेकनिवारणार्थे नृसिंहराजप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ क्ष्रों अंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ प्रौं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ र्‍हौं मध्यमाभ्यां नमः ॥
ॐ र्‍है अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ वौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ज्यैं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं ह्रदयादिन्यासः ।
अथ ध्यानम् । सत्यज्ञानसुखस्वरुपममलक्षीराब्धिमध्यस्थितम् ।
योगारुढ मतिप्रसन्नवदनं भूषासहस्त्रोज्वलम् ॥
त्र्यक्षंचक्रपिनाकसाभयवरान् बिभ्राणमेकच्छविम् ।
छत्रीभूतफणीन्द्रामिन्दुधवलं लक्ष्मीनृसिंहं भजे ॥१॥
ॐ क्ष्रौं प्रौं ह्रौं रौं ब्रौं ज्रौं नमो नृसिंहाय सर्व दुष्टविनाशानाय सर्वजनमोहनाय सर्वराज्यं वश्यं कुरु कुरु स्वाहा ॥
ॐ नमो नृसिंहसिंहाय सिंहाराजाय नरकेशाय नमः ।
ॐ कालाय दंष्ट्राकरालवदनाय उग्राय उग्रवीराय उग्रविकटाय वज्राय वज्रेदेहिने भद्राय भद्रकारिणे ज्रीं र्‍हीं नृसिंहाय नमः ।
ॐ नृसिंहाय कपिलजटाय अमोदवाचा सत्यं व्रत्यं महोग्र प्रचंडरुपाय सर्वज्ञे रोगाबंध बंध सर्वोग्रहानाबंध सर्वदेवदोषानाबन्ध बन्ध सर्वचोराणाबन्ध बन्ध सर्व व्याघ्रनाबन्ध बन्ध बन्ध सर्वपन्नगानाबन्ध ॥
बन्ध सर्वरृश्चिकानाबन्ध सर्व भूतप्रेतपिशाच - शाकिनिडाकिनि यंत्र मंत्र बन्ध बन्ध किलय किलय मर्दय मर्दय चूर्णय चूर्णय ॐ ऐं ऐं एतां मद्विरोधतां सर्वतो हर हर दह दह मथ मथ पच पच चूर्णय चूर्णय चक्रेण गदया वज्रेण भस्मी कुरु कुरु स्वाहा ॥
ॐ ज्रीं र्‍हीं नृसिंहाय नमः । इति श्री नृसिंहपुराणे ब्रह्मासावित्रि संवादे नृसिंहमन्त्रराजात्मकं सम्पूर्ण मस्तु ।
श्री लक्ष्मी नृसिंहार्पणमस्तु ।
!!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Photo: श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नमः । ब्रह्मोवाच । श्रीनृसिंह मंत्रराजात्मकम्
अनेक मन्त्र कोटीशः नृसिंहनाम उच्यते । अन्यो विधि न रक्षायै विषरोग निवारणे ॥१॥
ॐ अस्य श्री लक्ष्मीनृसिंहमन्त्रकवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुभ् छन्दः ऐं कीलकम् ।
श्रीनृसिंहोदेवता ।
मम सर्वरोगानां सर्व देवानां चौरपन्नव्याघ्रवृश्चिकभूतप्रेतापिशाच शाकिनीडीकिनी यंत्रमंत्रानेकनिवारणार्थे नृसिंहराजप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ क्ष्रों अंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ प्रौं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ र्‍हौं मध्यमाभ्यां नमः ॥
ॐ र्‍है अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ वौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ज्यैं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं ह्रदयादिन्यासः ।
अथ ध्यानम् । सत्यज्ञानसुखस्वरुपममलक्षीराब्धिमध्यस्थितम् ।
योगारुढ मतिप्रसन्नवदनं भूषासहस्त्रोज्वलम् ॥
त्र्यक्षंचक्रपिनाकसाभयवरान् बिभ्राणमेकच्छविम् ।
छत्रीभूतफणीन्द्रामिन्दुधवलं लक्ष्मीनृसिंहं भजे ॥१॥ 
ॐ क्ष्रौं प्रौं ह्रौं रौं ब्रौं ज्रौं नमो नृसिंहाय सर्व दुष्टविनाशानाय सर्वजनमोहनाय सर्वराज्यं वश्यं कुरु कुरु स्वाहा ॥
ॐ नमो नृसिंहसिंहाय सिंहाराजाय नरकेशाय नमः ।
ॐ कालाय दंष्ट्राकरालवदनाय उग्राय उग्रवीराय उग्रविकटाय वज्राय वज्रेदेहिने भद्राय भद्रकारिणे ज्रीं र्‍हीं नृसिंहाय नमः ।
ॐ नृसिंहाय कपिलजटाय अमोदवाचा सत्यं व्रत्यं महोग्र प्रचंडरुपाय सर्वज्ञे रोगाबंध बंध सर्वोग्रहानाबंध सर्वदेवदोषानाबन्ध बन्ध सर्वचोराणाबन्ध बन्ध सर्व व्याघ्रनाबन्ध बन्ध बन्ध सर्वपन्नगानाबन्ध ॥
बन्ध सर्वरृश्चिकानाबन्ध सर्व भूतप्रेतपिशाच - शाकिनिडाकिनि यंत्र मंत्र बन्ध बन्ध किलय किलय मर्दय मर्दय चूर्णय चूर्णय ॐ ऐं ऐं एतां मद्विरोधतां सर्वतो हर हर दह दह मथ मथ पच पच चूर्णय चूर्णय चक्रेण गदया वज्रेण भस्मी कुरु कुरु स्वाहा ॥
ॐ ज्रीं र्‍हीं नृसिंहाय नमः । इति श्री नृसिंहपुराणे ब्रह्मासावित्रि संवादे नृसिंहमन्त्रराजात्मकं सम्पूर्ण मस्तु ।
श्री लक्ष्मी नृसिंहार्पणमस्तु ।

Thursday, 10 July 2014

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा,5 जुलाई 2020 रविवार को https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।  आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप मेंमनाया जाता है. हमारी संकृति में गुरु का विशेष महत्व है. गुरु ही हमें ईश्वर से मिलने का मार्ग हमें दिखाते है और हमें सद्‌गति प्रदान करते है. हमारे जन्मदाता तो माता पिता हैं, पर हमारे कर्म के दाता गुरुदेव है. इनकी शरण में आकर दुखिया और रोगी को चैन मिल जाता है. गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा का विधान है. प्राचीन काल में विार्थी प्रायः गुरुकुलों में ही शिक्षा प्राप्त करने जाते थे. छात्र इस दिन श्रृद्धा भाव से प्रेरित अपने गुरू का पूजन करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरुजी को प्रसन्न करते थे. इस दिन विद्या ग्रहण करने वाले छात्रों को पूजा आदि से निवृत्त होकर अपने गुरु के पास जाकर वस्त्र, फल व माला अर्पण करके उन्हें प्रसन्न करना चाहिए. गुरु का आशीर्वाद ही मंगलकारी और ज्ञानवर्द्धक होता है. चारों वेदों के व्याख्याता गुरु व्यास थे. हमें वेदों का दान देने वाले व्यास जी ही हैं. इसलिए वो हमारे आदि गुरु हुए. गुरु पूर्णिमा के दिन ही ऋषि व्यास का भी जन्मदिन मनाया जाता है. उन की स्मृति को ताजा रखने के लिए हमें अपने गुरु को व्यास जी का ही अंश मान कर सम्मानपूर्वक उन की पूजा करनी चाहिए. गुरु की कृपा से ही विद्या की प्राप्ति होती है.
गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उध स्थान दिया है. संस्कृत में गु का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान)एवं रु का अर्थ होता है प्रकाश(ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं.
हमारे जीवन के प्रथम गुरु हमारे माता-पिता होते हैं. जो हमारा पालन-पोषण करते हैं, सांसारिक दुनिया में हमें प्रथम बार बोलना, चलना तथा शुरुआती आवश्यकताओं को सिखाते हैं. अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है. जीवन का विकास सुचारू रूप से चलता रहे, उसके लिए हमें गुरु की आवश्यकता होती है. भावी जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही होता है.
मानव मन में व्याप्त बुराई रूपी विष को दूर करने में गुरु का विशेष योगदान है. महर्षि वाल्मीकि जिनका पूर्व नाम रत्नाकर था. वे अपने परिवार कापालन पोषण करने हेतु दस्युकर्म करते थे. महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की, ये तभी संभव हो सका, जब गुरू रूपी नारद जी ने उनका ह्दय परिर्वतित किया. मित्रों, पंचतंत्र की कथाएं हम सब ने सुनी है. नीति कुशल गुरू विष्णु शर्मा ने किस तरह राजा अमरशक्ति के तीनों अज्ञानी पुत्रों को कहानियों एवं अन्य माध्यमों से उन्हें ज्ञानी बना दिया.
गुरु शिष्य का संबंध सेतु के समान होता है. गुरू की कृपा से शिष्य के लक्ष्य का मार्ग आसान होता है.
स्वामी विवेकानंद जी को बचपन से परमात्मा को पाने की चाह थी. उनकी ये इच्छा तभी पूरी हो सकी, जब उनको गुरु परमहंस का आशीर्वाद मिला. गुरु की कृपा से ही आत्म साक्षात्कार हो सका.
छत्रपति शिवाजी पर अपने गुरु समर्थ गुरु रामदास का प्रभाव हमेशा रहा.
गुरु द्वारा कहा एक शब्द या उनकी छवि मानव की कायापलट सकती है. कबीर दास जी का अपने गुरु के प्रति जो समर्पण था, उसको स्पष्ट करना आवश्यक है क्योंकि गुरु के महत्व को सबसे ज्यादा कबीर दास जी के दोहों में देखा जा सकता है. एक बार रामानंद जी गंगा स्नान को जा रहे थे, सीढी उतरते समय उनका पैर कबीर दास जी के शरीर पर पड गया. रामानंद जी के मुख से राम-राम शब्द निकल पडा. उसी शब्द को कबीर दास जी ने दीक्षा मंत्र मान लिया और रामानंद जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया. ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि जीवन में गुरु के महत्व का वर्णन कबीर दास जी ने अपने दोहों में पूरी आत्मियता से किया है.
गुरू गोविंद दोऊ खडे काके लागू पांव
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय.
गुरू का स्थान ईश्वर से भी श्रेष्ठ है. हमारे सभ्य सामाजिक जीवन का आधार स्तभ गुरू हैं। कई ऐसे गुरू हुए हैं, जिन्होने अपने शिष्य को इस तरह शिक्षित किया कि उनके शिष्यों ने राष्ट्र की धारा को ही बदल दिया।
आचार्य चाणक्य ऐसी महान विभूती थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। गुरू चाणक्य कुशल राजनितिज्ञ एवं प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में विश्व विख्यात हैं। उन्होने अपने वीर शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को शासक पद पर सिहांसनारूढ करके अपनी जिस विलक्षंण प्रतिभा का परिचय दिया उससे समस्त विश्व परिचित है।
गुरु हमारे अंतर मन को आहत किये बिना हमें सभ्य जीवन जीने योग्य बनाते हैं। दुनिया को देखने का नजरिया गुरू की कृपा से मिलता है। पुरातन काल से चली आ रही गुरु महिमा को शब्दों में लिखा ही नही जा सकता। संत कबीर भी कहते हैं कि
सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।
सात समुंद्र की मसि करु, गुरु गुंण लिखा न जाए॥
गुरु पूर्णिमा के पर्व पर अपने गुरु को सिर्फ याद करने का प्रयास है। गुरू की महिमा बताना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है। गुरु की कृपा हम सब को प्राप्त हो। अंत में कबीर दास जी के निम्न दोहे से अपनी कलम को विराम देते हैं।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
इस दिन क्या करना चाहिए
१. जिसने अपने गुरु बनाए हैं वह गुरु के दर्शन करें।
२. हिन्दु शास्त्र में श्री आदि शंकराचार्य को जगतगुरु माना जाता है इसलिए उनकी पूजा करनी चाहिए।
३. गुरु के भी गुरु यानि गुरु दत्तात्रेय की पूजा करनी चाहिए एवं दत बावनी का पठन करना चाहिए।
ज्योतिष और कुंडली के आधार पर नीचे दी गयी स्थिति में गुरु यंत्र रखना चाहिए, एवं गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए-
१, आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ राशि में यानि की मकर राशि में है तो गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए।
२, गुरु-राहु, गुरु-केतु या गुरु-शनि युति में होने पर भी यह यंत्र लाभदायी है।
३, आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ स्थान में यानि कि ६, ८ या १२ वे स्थान में है तो आपको गुरु यंत्र रखना चाहिए एवं उसकी नियमित तौर पर पूजा करनी चाहिए।
४, कुंडली में गुरु वक्री या अस्त है तो गुरु अपना बल प्राप्त नहीं कर पाता, इसलिए आपको इस यंत्र की पूजा करनी चाहिए।
५, जिनकी कुंडली में विद्याभ्यास, संतान, वित्त एवं दाम्पत्यजीवन सम्बंधित तकलीफ है तो उन्हें विद्वान ज्योतिष की सलाह लेकर गुरु का रत्न पुखराज कल्पित करना आवश्यक है।
६, इस के अलावा आपकी कुंडली में हो रहे हर तरह के वित्तीय दोष को दूर करने के लिए आप श्री यंत्र की पूजा करेंगे तो अधिक लाभ होगा
7, गुरु को उच्च आसन पर बैठाएं.
8, उनके चरण जल से धुलाएं और पोंछे.
9, फिर उनके चरणों में पीले या सफेद पुष्प अर्पित करें .
10, इसके बाद उन्हें श्वेत या पीले वस्त्र दें.
11, यथाशक्ति फल, मिष्ठान्न दक्षिणा अर्पित करें.
12, गुरु से अपना दायित्व स्वीकार करने की प्रार्थना करें.
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा: 
गुरुर्सात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:। 
गुरु दीक्षा के 8 रहस्य मुख्य रूप से हैं
13,, समय दीक्षा- साधना पथ की ओर अग्रसर करना, विचार शुद्ध करना इसमें आता है। 
14, ज्ञान दीक्षा- इसमें विचारों की शुद्धि की जाती है। 
15, मार्ग दीक्षा- इसमें बीज मंत्र दिया जाता है।
16, शांभवी दीक्षा- गुरु, शिष्य की रक्षा का भार स्वयं ले लेते हैं जिससे साधना में अवरोध न हो।
17,चक्र जागरण दीक्षा- मूलाधार चक्र जागृत किया जाता है। 
18, विद्या दीक्षा- इसमें शिष्य को विशेष ज्ञान तथा सिद्धियां प्रदान की जाती हैं। 
19, शिष्याभिषेक दीक्षा- इसमें तत्व, भोग, शांति निवृत्ति की पूर्णता कराई जाती है। 
20, पूर्णाभिषेक दीक्षा- इसमें गुरु अपनी सभी शक्तियां शिष्य को प्रदान करते हैं, जैसे स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को दी थीं।
21, ज्योतिष और कुंडली के आधार पर नीचे दी गयी स्थिति में गुरु यंत्र रखना चाहिए, एवं गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए।
23, आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ राशि में यानि की मकर राशि में है तो गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए। 
24, गुरु-राहु, गुरु-केतु या गुरु-शनि युति में होने पर भी यह यंत्र लाभदायी है। 
25, आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ स्थान में यानि कि ६, ८ या १२ वे स्थान में है तो आपको गुरु यंत्र रखना चाहिए एवं उसकी नियमित तौर पर पूजा करनी चाहिए। 
26, कुंडली में गुरु वक्री या अस्त है तो गुरु अपना बल प्राप्त नहीं कर पाता, इसलिए आपको इस यंत्र की पूजा करनी चाहिए। 
27, जिनकी कुंडली में विद्याभ्यास, संतान, वित्त एवं दाम्पत्यजीवन सम्बंधित तकलीफ है तो उन्हें विद्वान ज्योतिष की सलाह लेकर गुरु का रत्न पुखराज कल्पित करना आवश्यक है। 
28, इस के अलावा आपकी कुंडली में हो रहे हर तरह के वित्तीय दोष को दूर करने के लिए आप श्री यंत्र की पूजा करेंगे तो अधिक लाभ होगा। 
गुरु प्राप्ति इतनी सहज नहीं है। गुरु मंत्रों में से किसी एक का लगातार जप गुरु प्राप्ति करा सकता है, जो निम्नलिखित है
गुरु मंत्र पढ़ें
1, ॐ गुरुभ्यों नम:।
2, ॐ गुं गुरुभ्यो नम:।
3, ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:।
4,ॐ वेदाहि गुरु देवाय विद्महे परम गुरुवे धीमहि तन्नौ: गुरु: प्रचोदयात्।
यदि गुरु प्राप्ति हो जाए तो उनसे श्री गुरु पादुका मंत्र लेने की यथाशक्ति कोशिश करें। यही वह मंत्र है जिससे पूर्णता प्राप्त होगी।
इस दिन गुरु पादुका पूजन करें। गुरु दर्शन करें। नेवैद्य, वस्त्रादि भेंट प्रदान कर दक्षिणादि देकर उनकी आरती करें तथा उनके चरणों में बैठकर उनकी कृपा प्राप्त करें। यदि गुरु के समीप जाने का अवसर न मिले तो उनके चित्र, पादुकादि प्राप्त कर उनका पूजन करें 
गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त
गुरु पूर्णिमा 4 जुलाई 2020 को सुबह 11 बजकर 33 मिनट से अगले दिन यानी 5 जुलाई 2020 को सुबह 10 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. इस बीच आप किसी भी वक्त गुरु की उपासना कर सकते हैं।
https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

Tuesday, 8 July 2014

शुभ रात्रि जय शिवशंकर, जय गंगाधर

शुभ रात्रि जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरेजय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,जय त्रिपुरारी, जय मदहारी,
जय शिव शंकर जय महादेवा,शिव शंकर जय महादेव बम बम भोले,

शुभ रात्रि,, भगवान् श्री राम भी सोने से पूर्व गुरु के चरणों की सेवा अवश्य ही करते थे !

शुभ रात्रि,, भगवान् श्री राम भी सोने से पूर्व गुरु के चरणों की सेवा अवश्य ही करते थे ! कृपया राम चरित मानस का सन्दर्भ ले ,.निशि प्रवेश मुनि आयसु दीन्हा , सबही संध्या बंदनु कीन्हा !!
कहत कथा इतिहास पुरानी , रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी !!
मुनिवर सयन कीन्हि तब जाई , लगे चरण चापन दोउ भाई !!
जिन्हके चरण सरोरुह लागी , करत विविध जप जोग बिरागी !!
तेई दोउ बन्धु प्रेम जणू जीते , गुरु पद कमल पलोटत प्रीते !!
बार बार मुनि आज्ञा दीन्ही , रघुबर जाई सयन तब कीन्ही !!
अंत में यदि सयुक्त परिवार में है , यदि संभव हो सके तो अपने से बड़ो की यथा संभव सेवा करके ही सोये ! बड़ो , बुजुर्गो का आशीवाद , सदगुरु का ध्यान करके ही सोये , यह बहुत आवश्यक है



Latest Blog

शीतला माता की पूजा और कहानी

 शीतला माता की पूजा और कहानी   होली के बाद शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है. इसे बसौड़ा पर्व भी कहा जाता है  इस दिन माता श...