Saturday, 14 June 2014

अन्नपूर्णा स्तोत्र ,, Annapoorna Stotram

अन्नपूर्णा स्तोत्र ,, Annapoorna Stotram

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौंदर्यरत्नाकरी l

निर्धूताखिल-घोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी l
प्रालेयाचल-वंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपुर्णेश्वरी ll
नानारत्न-विचित्र-भूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी l
मुक्ताहार-विलम्बमान विलसद्वक्षोज-कुम्भान्तरी l
काश्मीराऽगुरुवासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्माऽर्थनिष्ठाकरी l
चन्द्रार्कानल-भासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी l
सर्वैश्वर्य-समस्त वांछितकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
कैलासाचल-कन्दरालयकरी गौरी उमा शंकरी l
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी l
मोक्षद्वार-कपाट-पाटनकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
दृश्याऽदृश्य-प्रभूतवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी l
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपांकुरी l
श्री विश्वेशमन प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती माताऽन्नपूर्णेश्वरी l
वेणीनील-समान-कुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी l
सर्वानन्दकरी दृशां शुभकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
आदिक्षान्त-समस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी l
काश्मीरा त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्यांकुरा शर्वरी l
कामाकांक्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुंदरी l
वामस्वादु पयोधर-प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी l
भक्ताऽभीष्टकरी दशाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
चर्न्द्रार्कानल कोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी l
चन्द्रार्काग्नि समान-कुन्तलहरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी l
माला पुस्तक-पाश-सांगकुशधरी काशीपुराधीश्वरी l
शिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी l
साक्षान्मोक्षरी सदा शिवंकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी l
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी l
भिक्षां देहि कृपावलंबनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ll
अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे! l
ज्ञान वैराग्य-शिद्ध्‌यर्थं भिक्षां देहिं च पार्वति ll
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः l
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्‌ ll
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितमन्नपूर्णास्तोत्रं संपूर्णम्

Saturday, 7 June 2014

गायत्री स्तोत्र .,,,Gayatri Stotram

गायत्री स्तोत्र,,,Gayatri Stotram

सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

गंगा दशहरा ,, Ganga Dashahara

गंगा दशहरा ,, Ganga Dashahara

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस वर्ष गंगा दशहरा 8 जून 2014, रविवार के दिन मनाया जाएगा. स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए. इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. यदि कोई मनुष्य पवित्र नदी तक नहीं जा पाता तब वह अपने घर पास की किसी नदी पर स्नान करें.
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख कहा गया है. इसलिए इस इस दिन दान और स्नान का ही अत्यधिक महत्व है. वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी. इस पवित्र नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते है.

गंगा दशहरे का महत्व

भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की  दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.

गंगा दशहरे का फल

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.

पूजा विधि 

इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है. यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकता है. गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-
 नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:
इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए. इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए. गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए.
यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए. दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए. जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए.

गंगा जी की कथा 

इस दिन सुबह स्नान, दान तथा पूजन के उपरांत कथा भी सुनी जाती है जो इस प्रकार से है :-
प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर थे. महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र थे. एक बार सगर महाराज ने अश्वमेघ यज्ञ करने की सोची और अश्वमेघ यज्ञ के घोडे. को छोड़ दिया. राजा इन्द्र यह यज्ञ असफल करना चाहते थे और उन्होंने अश्वमेघ का घोड़ा महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया. राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम में पहुंचे और घोड़े को देखते ही चोर-चोर चिल्लाने लगे. इससे महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई और जैसे ही उन्होंने अपने नेत्र खोले राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा. सभी जलकर भस्म हो गये.
राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और फिर महाराज दिलीप तीनों ने मृतात्माओं की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि वह गंगा को धरती पर ला सकें किन्तु सफल नहीं हो पाए और अपने प्राण त्याग दिए. गंगा को इसलिए लाना पड़ रहा था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी नहीं बची थी.
महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए उन्होंने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की और एक दिन ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और भगीरथ को वर मांगने के लिए कहा तब भगीरथ ने गंगा जी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही जिससे वह अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति कर सकें. ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं गंगा को तुम्हारे साथ भेज तो दूंगा लेकिन उसके अति तीव्र वेग को सहन करेगा? इसके लिए तुम्हें भगवान शिव की शरण लेनी चाहिए वही तुम्हारी मदद करेगें.
अब भगीरथ भगवान शिव की तपस्या एक टांग पर खड़े होकर करते हैं. भगवान शिव भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं. गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड. देते हैं. इस प्रकार से गंगा के पानी से भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल होता है.
विष्णुरूपिणी के लिए और तुझ ब्रह्म मूर्ति के लिए बारंबार नमस्कार है।।1 ।। तुझ रुद्ररूपिणी के लिए और शांकरी के लिए बारंबार नमस्कार है, भेषज मूर्ति सब देव स्वरूपिणी तेरे लिए नमस्कार है।।2।।

निर्जला एकादशी व्रत ,,,, Nirjala Ekadashi Vrat

निर्जला एकादशी व्रत ,,,, Nirjala Ekadashi Vrat
साल की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण
एकादशी है।
बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी
भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है।
उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे
कठिन होता है।
निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी
ग्रहण नहीं करते हैं।
लाभ - जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम
नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी
उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।
एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम्
भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।
इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।
अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।
व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।
यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।
जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।
इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।
जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।
हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
गंगालहरी स्त्रोत्र पाठ
समृद्धं सौभाग्यं सकल वसुधायाः किमपि तत्-
महैश्वर्यं लीला जनित जगतः खण्डपरशोः ।
श्रुतीनां सर्वस्वं सुकृतमथ मूर्तं सुमनसां
सुधासौन्दर्यं ते सलिलमशिवं नः शमयतु॥१॥
(हे माँ!) महेश्वर शिव की लीला जनित इस सम्पूर्ण वसुधा की आप ही समृद्धि और सौभाग्य हो, वेदो का सर्वस्व सारतत्व भी आप ही हो. मूर्तिमान दिव्यता की सौंदर्य-सुधायुक्त आपका जल, हमारे सारे अमंगल का शमनकारी हो.
दरिद्राणां दैन्यं दुरितमथ दुर्वासनहृदाम्
द्रुतं दूरीकुर्वन् सकृदपि गतो दृष्टिसरणिम् ।
अपि द्रागाविद्याद्रुमदलन दीक्षागुरुरिह
प्रवाहस्ते वारां श्रियमयमऽपारां दिशतु नः॥२॥

आपकी दृष्टि मात्र से ही ह्रदय की दुर्वासनाएं और दरिद्रों के दैन्य शीघ्र दूर हो जाते हैं. राग और अविद्या के गुल्म आपके गुरुसम अपार प्रवाह की दीक्षा से समूल नष्ट हो जाएँ और हमें अतुलनीय श्रेय की प्राप्ति हो.

उदञ्चन्मार्तण्ड स्फुट कपट हेरम्ब जननी
कटाक्ष व्याक्षेप क्षण जनितसंक्षोभनिवहाः।
भवन्तु त्वंगंतो हरशिरसि गङ्गातनुभुवः
तरङ्गाः प्रोत्तुङ्गा दुरितभव भङ्गाय भवताम्॥३॥

गणेशजननी की बालार्क कटाक्षदृष्टि से शिव जटाओं में बद्ध गंगा की संक्षोभित उत्ताल तरंगें, कठिन अघयुक्त-भुवनभय भंगकारी हों!

तवालम्बादम्ब स्फुरद्ऽलघुगर्वेण सहसा
मया सर्वेऽवज्ञा सरणिमथ नीताः सुरगणाः ।
इदानीमौदास्यं भजसि यदि भागीरथि तदा
निराधारो हा रोदिमि कथय केषामिह पुरः॥४॥

आपके अवलंबन के आश्रय से सहसा अति गर्वित हो मैंने सभी अन्य देवों की अवज्ञा करली, ऐसे में यदि आप मुझसे उदासीन हो गयी तो मैं निराधार किसके आगे अपना रोना रोऊँ?

स्मृतिं याता पुंसामकृतसुकृतानामपि च या
हरत्यन्तस्तन्द्रां तिमिरमिव चण्डांशु सरणिः।
इयं सा ते मूर्तिः सकलसुरसंसेव्यसलिला
ममान्तःसन्तापं त्रिविधमपि पापं च हरताम्॥५॥

सूर्य रश्मियों की उपस्थिति मात्र से ही जैसे तम का नाश हो जाता है, आपके स्मरण मात्र से ही पुण्यहीनों की भी कुंठाओं का शमन हो जाता है. दिव्यात्माओं द्वारा भी अभिलाषित आपका पावन जल मेरे भी त्रिविध  पाप संताप को दूर कर दे.

अपि प्राज्यं राज्यं तृणमिव परित्यज्य सहसा
विलोलद्वानीरं तव जननि तीरं श्रितवताम् ।
सुधातः स्वादीयः सलिलभरमातृप्ति पिबताम्
जनानामानन्दः परिहसति निर्वाणपदवीम्॥६॥

बड़े बड़े साम्राज्यों का तृणवत त्याग करके, आपके तीर का आश्रय ले कर तृण विलोलित आपके जल के  आतृप्त अमृतपान के आनंद की तुलना में तो निर्वाणपद भी हेय है.

प्रभाते स्नान्तीनां नृपति रमणीनां कुचतटी-
गतो यावन् मातः मिलति तव तोयैर्मृगमदः।
मृगास्तावद्वैमानिक शतसहस्रैः परिवृता
विशन्ति स्वच्छन्दं विमल वपुषो नन्दनवनम्॥७॥

राजमहिषियों द्वारा प्रातःकाल आप में स्नान से  कस्तूरीलेपित वक्षों  से आपके जल में मृगमद अर्पित हो जाने के पुण्य से वे मृग  अनायास ही सहस्रशत विमानों से परिवृत हो दिव्यरूप प्राप्त कर नंदनवन में स्वच्छंद प्रवेश और विचरण करते हैं.

स्मृतं सद्यः स्वान्तं विरचयति शान्तं सकृदपि
प्रगीतं यत्पापं झटिति भवतापं च हरति ।
इदं तद्गङ्गेति श्रवण रमणीयं खलु पदम्
मम प्राण प्रान्त: वदन कमलान्तर्विलसतु॥८॥

स्मरण करते ही जो तुरंत मन में प्रशांति रच देता है, गान करने से जो अविलम्ब भवताप हर लेता है, श्रवण मात्र से “गंगा” यह नाम मेरे मन के कमलवन में और मुख में प्राणांत तक विलास करता रहे.

यदन्तः खेलन्तो बहुलतर सन्तोष भरिता
न काका नाकाधीश्वर नगर साकाङ्क्ष मनसः ।
निवासाल्लोकानां जनि मरण शोकापहरणम्
तदेतत्ते तीरं श्रम शमन धीरं भवतु नः॥९॥

और तो और, आपकी सन्निधि में कौवे भी इतने संतोष से भरे रमते हैं कि उनको अब स्वर्ग की भी चाहना नहीं. आपके तीर का निवास जन्म मरण के शोक का तो हरण करता ही है, इसका नैकट्य भी निष्ठावानों का श्रमहारी हो.

न यत्साक्षाद्वेदैरपि गलितभेदैरवसितम्
न यस्मिञ्जीवानां प्रसरति मनोवागवसरः ।
निराकारं नित्यं निजमहिम निर्वासित तमो-
विशुद्धं यत्तत्त्वं सुरतटि नि तत्त्वं न विषयः॥१०॥

आप नित्य निराकार तमोहारी विशुद्ध दिव्य तत्त्व हो, जीवों के मन वाणी के विषयों से परे, अगोचर हो. सारे भेदों को पार करके साक्षात वेद भी आपका निरूपण नहीं कर सकते.

महादानैः ध्यानैर्बहुविध वितानैरपि च यत्
न लभ्यं घोराभिः सुविमल तपोराजिभिरपि।
अचिन्त्यं तद्विष्णोःपदमखिल साधारणतया
ददाना केनासि त्वमिह तुलनीया कथय नः॥११॥

बहुविधियों से दान, ध्यान बलिदान और घोर ताप से भी जो अचिन्त्य विष्णु पद अप्राप्य रहता है, वो भी आप सहजता से प्रदान कर देती हो तो भला आप किससे तुलनीय हैं?

नृणामीक्षामात्रादपि परिहरन्त्या भवभयम्
शिवायास्ते मूर्तेः क इह महिमानं निगदतु ।
अमर्षम्लानायाः परममनुरोधं गिरिभुवो
विहाय श्रीकण्ठः शिरसि नियतं धारयति याम्॥१२॥

कोई मनुष्य आपको देख भर ले तो भवभय से निर्भय हो जाता है,ऐसी आपकी   महिमा की कौन प्रशस्ति कर सकता है? इसी कारण, अमर्ष से अम्लान हुई पार्वतीजी की भी अनदेखी करते हुए सदाशिव आपको सदा अपने मस्तक पर धारण किये रहते हैं.

विनिन्द्यान्युन्मत्तैरपि च परिहार्याणि पतितैः
अवाच्यानि व्रात्यैः सपुलकमपास्यानि पिशुनैः ।
हरन्ती लोकानामनवरतमेनांसि कियताम्
कदाप्यश्रान्ता त्वं जगति पुनरेका विजयसे॥१३॥

निन्दितों द्वारा भी निंदनीय पापियों को भी आप तार देती हो, जो पतितों द्वारा भी घृणित और नीचों द्वारा भी त्याज्य हैं, ऐसों को भी आप निरंतर आश्रय देते हुए भी श्रमित न होकर इस विश्व में सदैव एकमात्र विजयमान रहती हो.

स्खलन्ती स्वर्लोकादवनितलशोकापहृतये
जटाजूटग्रन्थौ यदसि विनिबद्धा पुरभिदा ।
अये निर्लोभानामपि मनसि लोभं जनयताम्
गुणानामेवायं तव जननि दोषः परिणतः॥१४॥

माँ! शोकग्रस्तों को तारने के लिए आपके  स्वयं को अपने दिव्यलोक से पत्तन करती हुई को निर्लोभी शिव ने अपनी जटाजूट ग्रंथियों में आबद्ध करके मानो स्वयं में लोभ का दोष आरोपित कर आपकी महिमा को निरुपित किया.

जडानन्धान्पङ्गून् प्रकृतिबधिरानुक्तिविकलान्
ग्रहग्रस्तानस्ताखिलदुरितनिस्तारसरणीन् ।
निलिम्पैर्निर्मुक्तानपि च निरयान्तर्निपततो
नरानम्ब त्रातुं त्वमिह परमं भेषजमसि॥१५॥

मूर्खों, अन्धों, पंगुओं, मूक बधिर और ग्रहादि दोषों से ग्रस्त, जिनका पाप से निस्तारण का कोई मार्ग न हो,  देवताओं द्वारा परित्यक्त उन नर्कगामियों की, हे माँ, आप ही परम उद्धारक औषधि हो.

स्वभावस्वच्छानां सहजशिशिराणामयमपाम्
अपारस्ते मातर्जयति महिमा कोऽपि जगति ।
मुदा यं गायन्ति द्युतलमनवद्यद्युतिभृतः
समासाद्याद्यापि स्पुटपुलकसान्द्राः सगरजाः॥१६॥

माँ! आपके स्वच्छ शीतल जल की इस जगत में अपार महिमा अवर्णनीय है. निष्कलंक कीर्ति से स्वर्ग प्राप्त किये सगरपुत्र आज भी पुलकित रोमावलीयुक्त हो आज भी आपकी महिमा का गान करते हैं.

कृतक्षुद्रैनस्कानथ झटिति सन्तप्तमनसः
समुद्धर्तुं सन्ति त्रिभुवनतले तीर्थनिवहाः ।
अपि प्रायश्चित्तप्रसरणपथातीतचरितान्
नरान् दूरीकर्तुं त्वमिव जननि त्वं विजयसे॥१७॥

छोटे मोटे पापों से शीघ्र क्षुब्ध मन वालों के परित्राण के लिए तो हे माँ! इस विश्व में अनेको पवित्र तीर्थ व सरिताएँ हैं, परन्तु जघन्य पापों और पापियों के उद्धार के लिए तो एक मात्र आप ही हैं.

निधानं धर्माणां किमपि च विधानं नवमुदाम्
प्रधानं तीर्थानाममलपरिधानं त्रिजगतः।
समाधानं बुद्धेरथ खलु तिरोधानमधियाम्
श्रियामाधानं नः परिहरतु तापं तव वपुः॥१८॥

सर्व धर्मों की निधान, नव प्रसन्नता की विधान,त्रिभुवन में पवित्रवारि तीर्थों में प्रधान और कुविचारों का तिरोधान कर बुद्धि को समग्र समाधान प्रदान करने वाली माँ, आप ऐश्वर्यों का भंडार हो. आपका वपु हमारे सब तापों का शमन करे.

पुरो धावं धावं द्रविण मदिरा घूर्णित दृशाम्
महीपानां नाना तरुणतर खेदस्य नियतम् ।
ममैवायं मन्तुः स्वहित शत हन्तुर्जडधियो
वियोगस्ते मातः यदिह करुणातः क्षणमपि॥१९॥

मदोन्मत्त शासकों के सामने चाटुकारिता करते करते मुझमे नाना भांति के विकार आ गए हैं  और जड़ बुद्धि हो मैं स्वयं का ही हितनाशक हो गया,क्योंकि क्षण भर का भी आपकी करुणा से वियोग मेरी ही भूल है.

मरुल्लीला लोलल्लहरि लुलिताम्भोज पटली-
स्खलत्पां-सुव्रातच्छुरण विसरत्कौंकुम रुचि ।
सुर स्त्री वक्षोज क्षरद् अगरु जम्बाल जटिलम्
जलं ते जम्बालं मम जनन जालं जरयतु॥२०॥

वायु की लीला से दोलित पंकजों की पतित केसर से केसरिया और सुर ललनाओं के वक्षो से क्षरित अगरु से प्रगाढ़ हुआ आपका जल मेरे जन्म-मृत्यु जाल का निवारक हो.

समुत्पत्तिः पद्मारमण पद पद्मामल नखात्
निवासः कन्दर्प प्रतिभट जटाजूट भवने ।
अथायं व्यासङ्गो हतपतित निस्तारण विधौ
न कस्मादुत्कर्षस्तव जननि जागर्तु जगतः॥२१॥

रमारमण विष्णु के पदकंजों के अमल श्रीनखों से निसरित, मदनारी महादेव के जटाजूट-भवन निवासिनी माँ, आप दुखियों और पतितों के उद्धार में निरत हैं. तो फिर इस जगत की जाग्रति और उन्नति  कैसे न होगी!

नगेभ्यो यान्तीनां कथय तटिनीनां कतमया
पुराणां संहर्तुः सुरधुनि कपर्दोऽधिरुरुहे ।
कया च श्रीभर्तुः पद कमलमक्षालि सलिलैः
तुलालेशो यस्यां तव जननि दीयेत कविभिः॥२२॥

हे देवसरिता! और कौन नदी नगेन्द्र से निकल कर त्रिपुरारी की अलकों  पे चढ़ी है? या जिसने रमापति के चरण कमलों का प्रक्षालन किया है?और हो भी तो क्या कोई कवि उसकी आपसे लेश मात्र भी तुलना कर सकता है?

विधत्तां निःशङ्कं निरवधि समाधिं विधिरहो
सुखं शेषे शेतां हरि: अविरतं नृत्यतु हरः ।
कृतं प्रायश्चित्तैरलमथ तपोदानयजनैः
सवित्री कामानां यदि जगति जागर्ति भवती॥२३॥

जगत में जब आप जाग्रत हो कम्नापूर्ण कर ही रही हैं, तो भले ब्रह्मा निरवधि समाधिस्थ हो जाएँ,विष्णु सुख से शेष शयन करें या शिव अविरत लास्य करें, तप दान बलि यज्ञादि युक्त प्रायश्चित्त परिष्कार की भी कोई आवश्यकता नहीं है.

अनाथः स्नेहार्द्रां विगलितगतिः पुण्यगतिदाम्
पतन् विश्वोद्भर्त्री गदविदलितः सिद्धभिषजम् ।
सुधासिन्धुं तृष्णाऽकुलितहृदयो मातरमयम्
शिशुः संप्राप्तस्त्वामहमिह विदध्याः समुचितम्॥२४॥

मुझ पथभ्रष्ट अनाथ पर आप स्नेहाद्र हो कर पुन्यगति प्रदायिनी हों. आप पतित को विश्व में अभ्यूदयी बनाने वाली, रुग्ण को सिद्धौषधिदायी,तृष्णातुर ह्रदय के लिए सुधासिंधु रूपा हैं, हे माँ,मैं  बाल रूप से आपके पास आया हूँ, आप जैसा उचित समझें, वैसा करें.

विलीनो वै वैवस्वतनगर कोलाहल भरः
गता दूता दूरं क्वचिदपि परेतान् मृगयितुम् ।
विमानानां व्रातो विदलयति वीथीर्दिविषदाम्
कथा ते कल्याणी यदवधि महीमण्डलमगात्॥२५॥

 हे शुभे! जिस दिन से आपकी कथा धरती पर पहुंची है, यमपुरी का कोलाहल शांत हो गया है,दूतों को उन्हें प्राप्य मृतकों की खोज में दूर दूर जाना पड़ता है. दिव्यों के नगर की गलियाँ यानों की घर्घराहट से व्याप्त हो गई हैं.

स्फुरत्काम क्रोध प्रबलतर सञ्जातजटिल-
ज्वरज्वाला जाल ज्वलित वपुषां नः प्रति दिनम् ।
हरन्तां सन्तापं कमपि मरुदुल्लासलहरी-
छटाश्चञ्चत्पाथः,कणसरणयो दिव्यसरितः॥२६॥

हे दिव्यसरित! उल्लसित मारुत  द्वारा आपकी लहरों  से विसरित जल कण, काम और क्रोध की प्रबल ज्वालाओं से  प्रतिदिन दग्ध  हमारे तन के अवर्णनीय ताप को दूर करे.

इदं हि ब्रह्माण्डं सकल भुवनाभोगभवनम्
तरङ्गैर्यस्यान्तर्लुठति परितस्तिन्दुकमिव ।
स एष श्रीकण्ठ प्रवितत जटाजूट जटिलः
जलानां सङ्घातस्तव जननि तापं हरतु नः॥२७॥

माँ! आपका जल, जिसने पूरे ब्रह्माण्ड को तिन्दुक फल की भांति प्लावित कर दिया था,परन्तु   शिव की खोली हुई जटाओं के जाल में आबद्ध हो के रह गया, हमारे लिए तापहारी हो!

त्रपन्ते तीर्थानि त्वरितमिह यस्योद्धृतिविधौ
करं कर्णे कुर्वन्त्यपि किल कपालिप्रभृतयः।
इमं तं मामम्ब त्वमियमनुकम्पार्द्रहृदये
पुनाना सर्वेषां अघमथन दर्पं दलयसि॥२८॥

मुझ जैसे पतित को, जिसे तारने में शिव जैसे देव ने भी कानों पर हाथ रख कर और अनेक तीर्थों ने लज्जित हो कर अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी,अपनी अनुकम्पा से तार कर, हे दयार्द्र हृदया माँ! आपने तो जैसे सभी तारकों के पापहारिता के दर्प का दलन कर दिया.

श्वपाकानां व्रातैरमितविचिकित्साविचलितैः
विमुक्तानामेकं किल सदनमेनः परिषदाम् ।
अहो मामुद्धर्तुं जननि घटयन्त्याः परिकरम्
तव श्लाघां कर्तुं कथमिव समर्थो नरपशुः॥२९॥

मैं तो दुश्चिंताओं से भरे चांडालों से भी त्यक्त पापों का भण्डार हूँ, फिर भी आप मेरे उद्धार तत्पर हैं. आपकी स्तुति करने में मुझ जैसा नर पशु कैसे समर्थ होगा?

न कोऽप्येतावन्तं खलु समयमारभ्य मिलितो
मदुद्धारादाराद्भवति जगतो विस्मयभरः ।
इतीमामीहां ते मनसि चिरकालं स्थितवतीम्
अयं संप्राप्तोऽहं सफलयितुमम्ब प्रथमतः॥३०॥

अनादि काल से हे माँ, आप सोचती रही हैं की क्या कोई ऐसा पतित भी मिलेगा जिसके उद्धार से सम्पूर्ण विश्व विस्मित हो जाय. अंततः आपकी इस इच्छापूर्ती हेतु प्रथम व्यक्ति के रूप में आपको मैं प्राप्त हो ही गया!

श्ववृत्तिव्यासङ्गो नियतमथ मिथ्याप्रलपनम्
कुतर्केष्वभ्यासः सततपरपैशून्यमननम् ।
अपि श्रावं श्रावं मम तु पुनरेवं गुणगणान्
ऋते त्वां को नाम क्षणमपि निरीक्षेत वदनम् ॥ ३१ ॥

कुतर्की की भांति हर समय मिथ्या प्रलापों में दूसरों की निंदा करते हुए मैंने श्वान वत जीवन जिया है. मेरे इन गुणों को जान कर, आपके सिवा कौन है जो क्षण मात्र के लिए भी मेरी और देखे?

विशालाभ्यामाभ्यां किमिह नयनाभ्यां खलु फलम्
न याभ्यामालीढा परमरमणीया तव तनुः ।
अयं हि न्यक्कारो जननि मनुजस्य श्रवणयोः
ययोर्नान्तर्यातस्तव लहरिलीलाकलकलः ॥ ३२ ॥

चाहे कितनी ही आभा से व्याप्त विशाल क्यों न हो, वो नेत्र ही क्या जिन्होंने आपके परम रमणीय स्वरुप  को ना देखा! धिक् उन मनुष्यों के कानों को जिनमे आपकी लीला लहरी की कलकल न पड़ी!

विमानैः स्वच्छन्दं सुरपुरमयन्ते सुकृतिनः
पतन्ति द्राक्पापा जननि नरकान्तः परवशाः ।
विभागोऽयं तस्मिन्नुभयविध मूर्तिः जनपदे
न यत्र त्वं लीला शमित मनुजाशेषकलुषा ॥ ३३ ॥

ये तो आप से हीन जनपदों की रीत है कि पुण्यवान सुरपुर जाते और पापी परवश हो शीघ्र नारकीय हो जाते हैं. आपकी लीलास्थली में ऐसा नहीं है क्योंकि यहाँ किसी में भी कोई कलुष बचता ही नहीं!

अपि घ्नन्तो विप्रानविरतमुषन्तो गुरुसतीः
पिबन्तो मैरेयं पुनरपि हरन्तश्च कनकम् ।
विहाय त्वय्यन्ते तनुमतनुदानाध्वरजुषाम्
उपर्यम्ब क्रीडन्त्यखिलसुरसंभावितपदाः॥३४॥

ब्रह्महत्या, गुरुतिय गमन, सुरापान, और तो और स्वर्ण चोरी जैसे जघन्य पाप करने वाले भी यदि आपकी सन्निधि में देहत्याग करते हैं तो वे भी दान बलि आदि सत्कर्म कर स्वर्गादि प्राप्त करने वालों से भी ऊँचे सुर सम्मानित दिव्य पद प्राप्त कर लेते हैं.

अलभ्यं सौरभ्यं हरति सततं यः सुमनसाम्
क्षणादेव प्राणानपि विरह शस्त्रक्षत भृताम् ।
त्वदीयानां लीलाचलित लहरीणां व्यतिकरात्
पुनीते सोऽपि द्रागहह पवमानस्त्रिभुवनम्॥३५॥

अहो, पुष्प सौरभयुक्त दुर्लभ पवन भी वियोगपीड़ा  और शस्त्राघात पीड़ितों के प्राण क्षण में हर लेती है, वह भी आपकी अठखेलियाँ करती लहरों का स्पर्श पा तत्क्षण त्रिभुवन पावनी हो जाती है.

कियन्तः सन्त्येके नियतमिह लोकार्थ घटका:
परे पूतात्मानः कति च परलोकप्रणयिनः ।
सुखं शेते मातस्तव खलु कृपातः पुनरयम्
जगन्नाथः शश्वत्त्त्वयि निहितलोकत्रयभरः॥३६॥

माँ, कितने हैं जो सामान्य जन का कल्याण करने को तत्पर हैं? कितनी पुण्यात्माएं परलोकाभिलाषा में हैं. ये तो आपकी करुणा है जिस पर शाश्वत त्रिभुवनतारण का भार जान  कर ये जगन्नाथ निश्चिन्तता से  सुख से सो रहा है.

भवत्या हि व्रात्याऽधम पतित पाषण्डपरिषत्
परित्राणस्नेहः श्लथयितुमशक्यः खलु यथा।
ममाप्येवं प्रेमा दुरितनिवहेष्वम्ब जगति
स्वभावोऽयं सर्वैरपि खलु यतो दुष्परिहरः॥३७॥

जैसे आप पतित, अधम और पाखंडियों के उद्धार का बिरद नहीं छोड़ सकती, ऐसे ही मैं भी दुष्कर्म और अधमता का त्याग नहीं कर सकता. अरे माँ,कोई कैसे अपने स्वाभाव का परित्याग कर सकता है?

प्रदोषान्तर्नृत्यत्पुरमथनलीलोद्धृतजटा-
तटाभोगप्रेङ्खल्लहरिभुजसन्तानविधुतिः ।
गलक्रोड क्रीडज्जल डमरु टङ्कार सुभगः
तिरोधत्तां तापं त्रिदश तटिनी ताण्डव विधिः॥३८॥

सांध्य तांडव करते भगवान शिव की झूलती जटाओं में से निराबद्ध हो कर, डमरू की टंकारवत क्रीडा करता और हरकंठ को आबद्ध करता हुआ गंगाजल, मानो स्वयं भी ताण्डव रत हो,  मेरे ताप का शमन करे.

सदैव त्वय्येवार्पित कुशल चिन्ताभरमिमं
यदि त्वं मामम्ब त्यजसि समयेऽस्मिन् सुविषमे ।
तदा विश्वासोऽयं त्रिभुवन तलादस्तमयते
निराधारा चेयं भवति निर्व्याजकरुणा॥३९॥

माँ, मैंने तो अपनी कुशल की सारी चिंताओं का भार सदैव आप पर ही छोड़ा हुआ है. यदि ऐसे विषम समय में आप मेरा त्याग करोगी तो त्रिभुवन में आपकी अहैतुकि करुणा का विश्वास और आधार ही उठ जायेगा.

कपर्दादुल्लस्य प्रणयमिलदर्धाङ्गयुवतेः
मुरारेः प्रेङ्खन्त्यो मृदुलतर सीमन्त सरणौ।
भवान्या सापत्न्या स्फुरितनयनं कोमलरुचा
करेणाक्षिप्तास्ते जननि विजयन्तां लहरयः॥४०॥

भगवान अर्धनारीश्वर की जटाओं से निसृत आपकी लहरों का जल लगने पर  किंचित झुंझलाहट दृष्टि से देखते हुए माँ पारवती ने अपने कोमल करों से हटाया, ऐसी आपकी धन्य लहरें विजयशाली हों.

प्रपद्यन्ते लोकाः कति न भवतीमत्रभवतीम्
उपाधिस्तत्रायं स्फुरति यदभीष्टं वितरसि ।
अये तुभ्यं मातर्मम तु पुनरात्मा सुरधुनि
स्वभावादेव त्वय्यमितमनुरागं विधृतवान्॥४१॥

अभीष्ट की पूर्ती हो जाने के कारण असंख्य लोग आपका आश्रय लेते हैं. जहाँ तक मेरा प्रश्न है, हे माँ, मैं तो स्वभावतः ही आपका अमित अनुरागी हूँ.

ललाटे या लोकैरिह खलु सलीलं तिलकिता
तमो हन्तुं धत्ते तरुणतरमार्तण्डतुलनाम् ।
विलुम्पन्ती सद्यो विधिलिखितदुर्वर्णसरणिं
त्वदीया सा मृत्स्ना मम हरतु कृत्स्नामपि शुचम्॥४२

लोग आपके जल की मृत्तिका का अपने ललाट पर तिलक लगाते हैं जो तमोहारि बालार्क की भांति शोभा पाता है, क्योंकि विधि द्वारा लिखित दुर्भाग्य-तम का इससे तुरंत नाश हो जाता है. ऐसी सद्य मृत्तिका मुझे शुचिता प्रदान करे.

 नरान्मूढांस्तत्तज्जनपदसमासक्तमनसः
हसन्तः सोल्लासं विकच कुसुम व्रातमिषतः ।
पुनानाः सौरभ्यैः सतत मलिनो नित्यमलिनान्
सखायो नः सन्तु त्रिदशतटिनीतीरतरवः॥४३॥

देवसरित के तट पर अवस्थित डोलते पुष्पद्रुमों से लदे वृक्ष मानो उन हत्भागियों पर हँसते हैं तो इससे विमुख हो अपनी ही विषम दुनिया में आसक्त रहते हैं. नित्य मलीन मधुमक्खियों को भी अपनी सुवास से सतत पवित्र करते पुष्पों वाले ये वृक्ष हमारे सखा हों.

भजन्त्येके देवान् कठिनतर सेवांस्तदपरे
वितानव्यासक्ता यमनियमारक्ताः कतिपये ।
अहं तु त्वन्नामस्मरणहितकामस्त्रिपथगे
जगज्जालं जाने जननि तृणजालेन सदृशम्॥४४॥

कोई देवताओं को भजते तो कोई कठिन सेवा में लगते, कोई बलि देते,  कुछ यम नियम में रत रहते या कठोर तपसाधन और ध्यान करते हैं. पर हे त्रिपथगामिनी, मैं तो आराम से मात्र आपका  नाम स्मरण मात्र ही करता हुआ इस जगत्जाल को तृणजालवत अनुभव करता हूँ.

अविश्रान्तं जन्मावधि सुकृतकर्मार्जनकृताम्
सतां श्रेयः कर्तुं कति न कृतिनः सन्ति विबुधाः ।
निरस्तालम्बानाम.ऽकृतसुकृतानां तु भवतीम्
विनामुष्मिन् लोके न परमवलोके हितकरम्॥४५॥

जन्म से ही सतत सत्कर्मियों के लिए श्रेयस्कर तो कई विद्वान और सुकृती होंगे. परन्तु सुकर्म ना करने वाले और अवलम्बनहीनों के उद्धार के लिए मुझे तो आपके अतिरिक्त और कोई नहीं दिखता है.

पयः पीत्वा मातस्तव सपदि यातः सहचरैः
विमूढैः संरन्तुं क्वचिदपि न विश्रान्तिमगमम् ।
इदानीमुत्सङ्गे मृदुपवनसञ्चारशिशिरे
चिरादुन्निद्रं मां सदयहृदये स्थापय चिरम्॥४६॥

अरे माँ, तेरा पय-जल पान करके भी मैं तुरंत विमूढ़ों के साहचर्य में चला गया, और कहीं भी विश्रांति न पाई. अब तो हे सदय हृदया माँ, मुझे सदा के लिए मृदु शीतल पवन युक्ता अपनी पावन गोद में   चिर विश्राम देदे, काफी देर बाद मेरे जीवन में  आपकी प्रेम के प्रति जागृति आयी है.

बधान द्रागेव द्रढिम रमणीयं परिकरम्
किरीटे बालेन्दुं नियमय पुनः पन्नग गणैः ।
न कुर्यास्त्वं हेलामितर जनसाधारण धिया
जगन्नाथस्य अयं सुरधुनि समुद्धार समयः॥४७॥

हे दिव्य सरिता! अपनी दृढ रमणिक कटि कसकर बालचंद्र के मुकुट को सर्पों के द्वारा सुस्थिर कर लो. ये किसी साधारण अधम जन का प्रकरण नहीं है. इस जगन्नाथ के समुद्धार का समय आ गया है.

शरच्चन्द्रश्वेतां शशिशकल शोभाल मुकुटाम्
करैः कुम्भाम्भोजे वराभय निरासौ विदधतीम् ।
सुधासाराकाराभरणवसनां शुभ्रमकर-
स्थितां त्वां ध्यायन्त्युदयति न तेषां परिभवः॥४८॥

आप शिशिरचन्द्र की धवलता लिए हैं और वक्रचन्द्र शोभित किरीट  आपको शोभित कर रहा है. हाथों में अभयमुद्रा युक्त हाथों में   कुम्भ्सम कुमुद हैं, सुधासार रूप वसन और अलंकार धारण किये हुए आप शुभ्र मकर पर आरूढ़ हैं. ऐसे आपके रूप का जो ध्यान धरता है, उसका कभी परिभव नहीं, अभ्युदय ही शोता है.

दरस्मित समुल्लसद्वदनकान्तिपूरामृतैः
भवज्वलन भर्जिताननिशमूर्जयन्ती नरान् ।
विवेकमय चन्द्रिका चयचमत्कृतिं तन्वती
तनोतु मम शं तनोः सपदि शन्तनोरङ्गना॥४९॥

शांतनु अन्गिनी गंगा! तीन ताप के भवजाल से निरंतर विदग्धित जीवों को अपने स्मितमुस्कान युक्त  मुख, कांतिपूरित वदनामृत और विवेक चन्द्रिका प्रसाद से शीतलता प्रदान करने वाली आप, मेरे भी पाप ताप का शमन कर शांति प्रदान करें.

मंत्रैर्मीलितमौषधैर्मुकुलितं त्रस्तं सुराणां गणैः
स्रस्तं सान्द्रसुधा रसैर्विदलितं गारुत्मतैर्ग्रावभिः ।
वीचिक्षालित कालिया हित पदे स्वर्लोक कल्लोलिनि
त्वं तापं निरयाधुना मम भवव्यालावलीढात्मनः॥५०॥

स्वर्गलोक कल्लोलिनी गंगे! आपकी लहरों के स्पर्श से तो कलि बह ही गया! अब मेरी इस त्रस्त आत्मा का भी उद्धार करो. भाव भुजंग से ग्रसित इसका न मन्त्र, न औषधि, न सुरसमूह, न गरिष्ठ सुधा और न ही गरुत्मान मणि उपचार है.

द्यूते नागेन्द्रकृत्ति प्रमथगण मणिश्रेणि नन्दीन्दुमुख्यं
सर्वस्वं हारयित्वा स्वमथपुरभिदिद्राक्पणी कर्तुकामे ।
साकूतं हैमवत्या मृदुलहसितया वीक्षितायास्तवाम्ब
व्यालो लोल्लासि वल्गल्लहरि नटघटी ताण्डवं नः पुनातु॥५१॥

चौसर की द्यूत क्रीडा में दांव पर अपने प्रमथगण,नंदी, ईंदु, गलहार नाग, गजचर्म सहित सब कुछ हारने के बाद जब शिव स्वयं को दांव पर लगाने को तत्पर हुए, तब अकूत जलभंडार युक्त स्वर्णकलश लिए तांडव नर्तक की भांति आपके जिस नर्तन को मृदुल हास्य के साथ पार्वतीजी ने देखा, वो हमारा पवित्र प्रोक्षण करे.

विभूषितानङ्ग रिपूत्तमाङ्गा, सद्यः कृतानेकजनार्तिभङ्गा ।
मनोहरोत्तुङ्गचलत्तरङ्गा,गङ्गा ममाङ्गान्यमली करोतु॥५२॥

अनंग-रिपु शिव के उत्तम भाल को विभूषित करने वाली गंगा असंख्य जनों के कष्टों का क्षण में शमन करती है. मनोहर उत्तंग तरंगों से हे माँ, मेरे अंगों को अमल करदो.

इमां पीयूषलहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम् । यः पठेत्तस्य सर्वत्र जायन्ते सुखसम्पदः ॥ ५३॥
!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Tuesday, 3 June 2014

श्रीनाथ जी शरणम् मम यमुना जी शरणम् मम,, ठाकुर जी शरणम् मम,, हे महाप्रभु जी शरणम् मम।

 श्रीनाथ जी शरणम् मम यमुना जी शरणम् मम,, ठाकुर जी शरणम् मम,, हे महाप्रभु जी शरणम् मम।
 श्री नाथ जी बोलो, श्री यमुना जी बोलो, श्री महाप्रभु जी बोलो,
मथुरा मां श्रीनाथजी, गोकुल मां श्रीनाथजी ।यमुनाजी ना कांठे रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १ ।।
रंगीला श्रीनाथजी, अलबेला श्रीनाथजी ।वल्लम कुल ना बालक बोले, रंगीला श्रीनाथजी ।। २ ।।
मधुबन मां श्रीनाथजी, कुंजन मां श्रीनाथजी ।बृन्दावन मां रास रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ३ ।।
नन्द गाँव श्रीनाथजी, बरसाने श्रीनाथजी।कामबन मां क्रीडा करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ४ ।।
दान गढ श्रीनाथजी, मान गढ़ श्रीनाथजी ।साँकरी खौरे गोरस खाता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ५ ।।
संकेत मां श्रीनाथजी, वन वन मां श्रीनाथजी ।गहवर वन मां रास रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ६ ।।
गोवर्द्धन मां श्रीनाथजी, मारग मां श्रीनाथजी ।मानसी गंगा मां मन हर, रंगीला श्रीनाथजी ।। ७ ।।
राधा कुंड श्रीनाथजी, कृष्ण कुंड श्रीनाथजी ।चन्द्र सरोबर चौके रमता, रंगीला श्रीनाथजी। ।। ८ ।।
वृक्ष वृक्ष श्रीनाथजी, डाल डाल श्रीनाथजी ।पत्र पत्र पर पुष्पे रमता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ९ ।।
आन्योर मां श्रीनाथजी, गोविन्द कुंडे श्रीनाथजी ।अप्सरा कुंडे आनन्द करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १० 
गली गली श्रीनाथजी, कुंज कुंज श्रीनाथजी।सुरभी कुंडे स्नान करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। ११ ।।
मन्दिर मां श्रीनाथजी, पर्वत पर श्रीनाथजी ।जतीपुरा में प्रकट विराजे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १२ ।।
विलछूवन श्रीनाथजी, कुसुमोखर श्रीनाथजी ।श्याम ढाक मां छाक अरोगे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १३ 
रुद्र कुंड श्रीनाथजी, हरजी कुंड श्रीनाथजी ।कदम्ब खण्डी क्रीडा करता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १४ ।।
गाम गाम श्रीनाथजी, ठाम ठाम श्रीनाथजी ।गुलाल कुंडे होली खेलता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १५ ।।
नवल कुंडे श्रीनाथजी, रमण कुंडे श्रीनाथजी ।वृन्दावन मां धेनु चरातां, रंगीला श्रीनाथजी ।। १६ ।।
गायों मां श्रीनाथजी, गोपों मां श्रीनाथजी ।गोपी मध्ये वेणु बजाता, रंगीला श्रीनाथजी ।। १७ ।।
वल्लभ मां श्रीनाथजी, विट्ठल मां श्रीनाथजी ।वृजवासी ना वाला म्हारा, रंगीला श्रीनाथजी ।। १८ ।
मेवाडे श्रीनाथजी, श्रीजी द्वार श्रीनाथजी ।मांग मांग कर भोग अरोगे, रंगीला श्रीनाथजी ।। १९ ।।
रंगीला श्रीनाथजी, अलबेला श्रीनाथजी।वल्लभ कुलना प्यारा बोले, रंगीला श्रीनाथजी ।। २० ।।

Monday, 2 June 2014

काशी विश्वनाथ की जय श्री विश्वनाथ सुप्रभातं

काशी विश्वनाथ की जय श्री विश्वनाथ सुप्रभातं
उत्तिष्ट भैरवस्वामिन काशिकापुरपालक ।
श्रीविश्वनाथभक्तानां संपूरय मनोरथम ॥ १ ॥
स्नानाय गाङ्गसलिले|अथ संर्चनाय विश्वेश्वरस्य बहुभक्तजना उपेताः ।
श्रीकालभैरव लसन्ति भवन्निदेशं उत्तिष्ट दर्शय दशां तव सुप्रभातं ॥ २॥
यागव्रतादिबहुपुण्यवशं यथा त्वं पापात्मनामपि तथा सुगतिप्रदा|असि ।
कारुण्यपूरंयि शैलसुतासपत्नि मातर्भगीरथसुते तव सुप्रब्ब्भातं ॥ ३ ॥
दुग्धप्रवाहकंनीयतरङ्गभङ्गे पुण्यप्रवाहपरिपाथितभक्तसङ्घे ।
नित्यं तपस्विजनसेवितपादपद्मे गङ्गे शरण्यशिवदे तव सुप्रभातं ॥ ४ ॥
वाराणसीस्थितगजानन दुण्ठिराज संप्रार्थितेष्टफलदानसंर्थमूर्ते ।
उत्तिष्ट विघ्नविरहाय भजामहे त्वां श्रीपार्वतीतनय भोस्तव सुप्रभातं ॥ ५ ॥
पूजास्पद प्रथममेव सुरेशु मध्ये संपूरणे कुशल भक्तमनोरथानाम ।
गीर्वाणबृन्दपरिपूजितपादपद्म संजायतां गणपते तव सुप्रभातं ॥ ६ ॥
कात्यायनि प्रमथनाथशरीरभागे भक्तालिगीतमुखरीकृतपादपद्मे ।
ब्रह्मादिदेवगणवन्दितदिव्यशौर्ये श्रीविश्वनाथदयिते तव सुप्रभातं ॥ ७ ॥
प्रातः प्रसीद विमले कंलायताक्शि कारुण्यपूर्णहृदये नंतां शरण्ये ।
निर्धूतपापनिचये सुरपूजिताङ्घ्रे श्रीविश्वनाथदयिते तव सुप्रभातं ॥ ८ ॥
सस्यानुकूलजलवर्षणकार्यहेतोः शाकम्भरीति तव नाम भुवि प्रसिद्दम ।
सस्यातिजातमिह शुष्यति चान्नपूर्णे उत्तिष्ट सर्वफलदे तव सुप्रभातं ॥ ९ ॥
सर्वोत्तमं मानवजन्म लब्ध्वा हिनस्ति जीवान भुवि मर्त्यवर्गः ।
तद्दारणायाशु जहीहि निद्रां देव्यन्नपूर्णे तव सुप्रभातं ॥१०।
शईकण्ठ कण्ठधृतपन्नग नीलकण्ठ सोत्कण्ठभक्तनिवहोपहितोपकण्ठ ।
उत्तिष्ट सर्वजनंङ्गलसाधनाय विश्वप्रजाप्रथितभद्र जहीहि निद्राम ॥ ११ ॥
गङ्गाधराद्रितनयाप्रिय शान्तमूर्ते वेदान्तवेद्य सकलेश्वर विश्वमूर्ते ।
कूटस्थनित्य निखिलागमगीतकीर्ते देवासुरार्चित विभो तव सुप्रभातं ॥ १२ ॥
श्रीविश्वनाथकरुणामृतपूर्णसिन्धो शीतांशुखण्डसंलंकृतभव्यचूड ।
भस्माङ्गरागपरिशोभितसर्वदेह वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १३ ॥
देवादिदेव त्रिपुरान्तक दिव्यभाव गङ्गाधर प्रमथवन्दित सुन्दराङ्ग ।
नागेन्द्रहार नतभक्तभयापहार वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १४ ॥
वेदान्तशास्त्रविशदीकृतदिव्यमूर्ते प्रत्यूषकालमुनिपुङ्गवगीतकीर्ते ।
त्वय्यर्पितार्जितसंस्तसुरक्शणस्य वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १५ ॥
कैलासवासमुनिसेवितपादपद्म गङ्गाजलौघपरिषिक्तजटाकलाप ।
वाचामगोचरविभो जटिलत्रिनेत्र वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १६ ॥
श्रीपार्वतीहृदयवल्लभ पञ्चवक्त्र श्रीनीलकण्ठ नृकपालकलापमाल ।
श्रीविश्वनाथमृदुपङ्कजमञ्जुपाद श्रीकाशिकापुरपते तव सुप्रभातं ॥ १७ ॥
काशी त्रितापहरणी शिवसद्मभूता शर्मेश्वरी त्रिजगतां सुपुरीषु हृद्या ।
विद्याकलासु नवकौशलदानशीला श्रीकाशिकापुरपते तव सुप्रभातं ॥ १८ ॥
श्रीविश्वनाथ तव पादयुगं स्मरामि गङ्गामघापहरणीं शिरशा नमामि ।
वाचं तवैव यशसा|अनघ भूषयामि वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १९ ॥

रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks
नारीनतेश्वरयुतं निजचारुरूपं स्त्रीगौरवं जगति वर्धयितुं तनोषि ।
गङ्गां हि धारयसि मूर्ध्नि तथैव देव वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ २० ॥

Photo: विश्वनाथ की जय श्री विश्वनाथ सुप्रभातं
उत्तिष्ट भैरवस्वामिन काशिकापुरपालक ।
श्रीविश्वनाथभक्तानां संपूरय मनोरथम ॥ १ ॥
स्नानाय गाङ्गसलिले|अथ संर्चनाय विश्वेश्वरस्य बहुभक्तजना उपेताः ।
श्रीकालभैरव लसन्ति भवन्निदेशं उत्तिष्ट दर्शय दशां तव सुप्रभातं ॥ २॥
यागव्रतादिबहुपुण्यवशं यथा त्वं पापात्मनामपि तथा सुगतिप्रदा|असि ।
कारुण्यपूरंयि शैलसुतासपत्नि मातर्भगीरथसुते तव सुप्रब्ब्भातं ॥ ३ ॥
दुग्धप्रवाहकंनीयतरङ्गभङ्गे पुण्यप्रवाहपरिपाथितभक्तसङ्घे ।
नित्यं तपस्विजनसेवितपादपद्मे गङ्गे शरण्यशिवदे तव सुप्रभातं ॥ ४ ॥
वाराणसीस्थितगजानन दुण्ठिराज संप्रार्थितेष्टफलदानसंर्थमूर्ते ।
उत्तिष्ट विघ्नविरहाय भजामहे त्वां श्रीपार्वतीतनय भोस्तव सुप्रभातं ॥ ५ ॥
पूजास्पद प्रथममेव सुरेशु मध्ये संपूरणे कुशल भक्तमनोरथानाम ।
गीर्वाणबृन्दपरिपूजितपादपद्म संजायतां गणपते तव सुप्रभातं ॥ ६ ॥
कात्यायनि प्रमथनाथशरीरभागे भक्तालिगीतमुखरीकृतपादपद्मे ।
ब्रह्मादिदेवगणवन्दितदिव्यशौर्ये श्रीविश्वनाथदयिते तव सुप्रभातं ॥ ७ ॥
प्रातः प्रसीद विमले कंलायताक्शि कारुण्यपूर्णहृदये नंतां शरण्ये ।
निर्धूतपापनिचये सुरपूजिताङ्घ्रे श्रीविश्वनाथदयिते तव सुप्रभातं ॥ ८ ॥
सस्यानुकूलजलवर्षणकार्यहेतोः शाकम्भरीति तव नाम भुवि प्रसिद्दम ।
सस्यातिजातमिह शुष्यति चान्नपूर्णे उत्तिष्ट सर्वफलदे तव सुप्रभातं ॥ ९ ॥ 
सर्वोत्तमं मानवजन्म लब्ध्वा हिनस्ति जीवान भुवि मर्त्यवर्गः ।
तद्दारणायाशु जहीहि निद्रां देव्यन्नपूर्णे तव सुप्रभातं ॥१०। 
शईकण्ठ कण्ठधृतपन्नग नीलकण्ठ सोत्कण्ठभक्तनिवहोपहितोपकण्ठ ।
उत्तिष्ट सर्वजनंङ्गलसाधनाय विश्वप्रजाप्रथितभद्र जहीहि निद्राम ॥ ११ ॥
गङ्गाधराद्रितनयाप्रिय शान्तमूर्ते वेदान्तवेद्य सकलेश्वर विश्वमूर्ते ।
कूटस्थनित्य निखिलागमगीतकीर्ते देवासुरार्चित विभो तव सुप्रभातं ॥ १२ ॥
श्रीविश्वनाथकरुणामृतपूर्णसिन्धो शीतांशुखण्डसंलंकृतभव्यचूड ।
भस्माङ्गरागपरिशोभितसर्वदेह वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १३ ॥
देवादिदेव त्रिपुरान्तक दिव्यभाव गङ्गाधर प्रमथवन्दित सुन्दराङ्ग ।
नागेन्द्रहार नतभक्तभयापहार वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १४ ॥
वेदान्तशास्त्रविशदीकृतदिव्यमूर्ते प्रत्यूषकालमुनिपुङ्गवगीतकीर्ते ।
त्वय्यर्पितार्जितसंस्तसुरक्शणस्य वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १५ ॥
कैलासवासमुनिसेवितपादपद्म गङ्गाजलौघपरिषिक्तजटाकलाप ।
वाचामगोचरविभो जटिलत्रिनेत्र वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १६ ॥
श्रीपार्वतीहृदयवल्लभ पञ्चवक्त्र श्रीनीलकण्ठ नृकपालकलापमाल ।
श्रीविश्वनाथमृदुपङ्कजमञ्जुपाद श्रीकाशिकापुरपते तव सुप्रभातं ॥ १७ ॥
काशी त्रितापहरणी शिवसद्मभूता शर्मेश्वरी त्रिजगतां सुपुरीषु हृद्या ।
विद्याकलासु नवकौशलदानशीला श्रीकाशिकापुरपते तव सुप्रभातं ॥ १८ ॥
श्रीविश्वनाथ तव पादयुगं स्मरामि गङ्गामघापहरणीं शिरशा नमामि ।
वाचं तवैव यशसा|अनघ भूषयामि वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ १९ ॥
नारीनतेश्वरयुतं निजचारुरूपं स्त्रीगौरवं जगति वर्धयितुं तनोषि ।
गङ्गां हि धारयसि मूर्ध्नि तथैव देव वाराणसीपुरपते तव सुप्रभातं ॥ २० ॥

बिल्वाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं

बिल्वाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं   श्री बिल्वाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम | त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १॥
त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अश्छिद्रैः कोमलैः शुभैः | तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २॥
सर्वत्रैलोक्य कर्तारं सर्वत्रैलोक्य पालनं | सर्वत्रैलोक्य हर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३॥
नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितं | नागकुन्डल संयुक्तम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४॥
अक्शमालाधरं रुद्रं पार्वती प्रियवल्लभं | चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५॥
त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणं | विभूत्यभ्यर्चितं दीवं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६॥
त्रिशूलधारिणं दीवं नागाभरणसुन्दरं | चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७॥
गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलंण्डितं | कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८॥
शुद्धस्फटिक संकाशं शितिकंठं कृपानिधिम | सर्वेश्वरं सदाशान्तम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९॥
सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवं | वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०॥
शिपिविष्टं सहस्राशं कैलासाचलवासिनं | हिरण्यबाहुं सेनान्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ११॥
अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवं | ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १२॥
हरिकेशं सनन्दीशं उच्च्हैर्घोषं सनातनं | अघोररूपकं कुंभं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १३॥
पूर्वजावरजं याम्यं सूश्म तस्करनायकं | नीलकंठं जघंन्यंच एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १४॥
सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनं | महासेनं महावीरं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १५॥
कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारधम | तौर्यातौर्यं च देव्यं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १६॥
दशकर्णं ललाटाशं पञ्चवक्त्रं सदाशिवं | अशेषपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १७॥
नीलकण्ठं जगद्वंद्यं दीननाथं महेश्वरं | महापापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १८॥
चूडामणीकृतविभुं वलयीकृतवासुकिम | कैलासवासिनं भीमम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १९॥
कर्पूरकुंदधवलं नरकार्णवतारकं | करुणामृतसिंधुं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २०॥
महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिप कङ्कणं | महापापहरं देवं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २१॥
भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनं | वामे शक्तिधरं श्रेष्ठम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २२॥
फालेशणं विरूपाशं श्रीकंठं भक्तवत्सलं | नीललोहितखट्वाङ्गम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २३॥
कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकं | वृषाङ्कं वृषभारूढम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २४॥
सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलित विग्रहं | मृत्युञ्जयं लोकनाथम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २५॥
दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेशणं | मृगपाणिं चन्द्रमौळिम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २६॥
सर्वलोकभयाकारं सर्वलोकैकसाशिणं | निर्मलं निर्गुणाकारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २७॥
सर्वतत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकं | सर्वतत्त्वस्वरूपंच एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २८॥
सर्वलोक गुरुं स्थाणुं सर्वलोकवरप्रदं | सर्वलोकैक नेत्रंच एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ २९॥
मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकं | कंलाप्रिय पूज्यंच एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३०॥
तेजोमयं महाभीमम उमेशं भस्मलेपनं | भवरोगविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३१॥
स्वर्गापवर्गफलदं रघुनाथवरप्रदं | नगराजसुताकांतं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३२॥
मंजीरपादयुगलं शुभलशणलशितं | फणिराज विराजं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३३॥
निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकं | तेजोरूपं महारौद्रम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३४॥
सर्वलोकैक पितरं सर्वलोकैक मातरं | सर्वलोकैकनाथं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३५॥
चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वर वाहनं | नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३६॥
रत्नकञ्चुकरत्नेशं रत्नकुण्डल मण्डितं | नवरत्न किरीटं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३७॥
दिव्यरत्नाङ्गुली स्वर्णं कण्ठाभरणभूषितं | नानारत्न मणिमयं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३८॥
रत्नाङ्गुलीय विलसत्करशाखानखप्रभं | भक्तमानस गेहं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ३९॥
वामाङ्गभाग विलसदम्बिका वीशणप्रियं | पुण्डरीकनिभाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४०॥
सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणं | सौभाग्यदं हितकरं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४१॥
नानाशास्त्रगुणोपेतं स्फुरन्मंगल विग्रहं | विद्याविभेदरहितं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४२॥
अप्रमेयगुणाधारं वेदकृद्रूप विग्रहं | धर्माधर्म प्रवृत्तं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४३॥
गौरीविलाससदनं जीवजीवपितामहं | कल्पान्तभैरवं शुभ्रम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४४॥
सुखदं सुखनाशं च दुःखदं दुःखनाशनं | दुःखावतारं भद्रं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४५॥
सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्म फलप्रदं | अतींद्रियं महामायं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४६॥
सर्वपशिमृगाकारं सर्वपशिमृगाधिपम | सर्वपशिमृगाधारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४७॥
जीवाध्यशं जीववंद्यं जीवजीवनरशकं | जीवकृज्जीवहरणं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४८॥
विश्वात्मानं विश्ववंद्यं वज्रात्मावज्रहस्तकं | वज्रेशं वज्रभूषं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ४९॥
गणाधिपं गणाध्यशं प्रलयानलनाशकं | जितेन्द्रियं वीरभद्रम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५०॥
त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनं | दिगम्बरं क्शोभनाशं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५१॥
कुन्देन्दु शंखधवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलं | कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५२॥
कम्बुग्रीवं कम्बुकंठं धैर्यदं धैर्यवर्धकं | शार्दूलचर्मवसनं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५३॥
जगदुत्पत्ति हेतुं च जगत्प्रलयकारणं | पूर्णानन्द स्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५४॥
सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवण कीर्तनं | ब्रह्मांडनायकं तारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५५॥
मन्दारमूलनिलयं मन्दारकुसुमप्रियं | बृन्दारकप्रियतरं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५६॥
महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकं | सुलभासुलभं लभ्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५७॥
बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदं | परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५८॥
युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनं | परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ५९॥
धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलंण्डितं | कर्पूरगौरं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६०॥
सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवं | योगदं योगिनां सिंहं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६१॥
उत्तमानुत्तमं तत्त्वम अंधकासुरसूदनं | भक्तकल्पद्रुमस्तोमम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६२॥
विचित्रमाल्यवसनं दिव्यचन्दनचर्चितं | विष्णुब्रह्मादि वंद्यं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६३॥
कुमारं पितरं देवं श्रितचन्द्रकलानिधिम | ब्रह्मशत्रुं जगन्मित्रं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६४॥
लावण्यमधुराकारं करुणारसवारधिम | भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६५॥
जटाधरं पावकाशं वृशेशं भूमिनायकं | कामदं सर्वदागम्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६६॥
शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणं | ज्ञानप्रदं कृत्तिवासम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६७॥
वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रहकारणं | ज्ञानप्रदं कृत्तिवासम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६८॥
शशाङ्कधारिणं भर्गं सर्वलोकैकशङ्करं | शुद्धं च शाश्वतं नित्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ६९॥
शरणागत दीनार्ति परित्राणपरायणं | गम्भीरं च वषट्कारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥७०॥
भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानस | करणं कारणं जिष्णुम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७१॥
क्शेत्रज्ञं क्शेत्रपालञ च परार्धैकप्रयोजनं | व्योमकेशं भीमवेषम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७२॥
भवज्ञं तरुणोपेतं चोरिष्टं यंनाशनं | हिरण्यगर्भं हेमाङ्गम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७३॥
दक्शं चामुण्डजनकं मोशदं मोशनायकं | हिरण्यदं हेमरूपम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७४॥
महाश्मशाननिलयं प्रच्च्हन्न स्फटिकप्रभं | वेदास्यं वेदरूप.च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७५॥
स्थिरं धर्मम उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम | जगन्निवासं प्रथममेक बिल्वं शिवार्पणं ॥ ७६॥
रुद्राशमालाभरणं रुद्राशप्रियवत्सलं | रुद्राशभक्त संस्तोममेक बिल्वं शिवार्पणं ॥ ७७॥
फणीन्द्र विलसत्कंठं भुजङभरणप्रियं | दशाध्वर विनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ७८॥
नागेन्द्र विलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतं | मुनिवंद्यं मुनिश्रेष्ठमेक बिल्वं शिवार्पणं ॥ ७९॥
मृगेन्द्रचर्मवसनं मुनीनामेकजीवनं | सर्वदेवादि पूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८०॥
निधनेशं धनाधीशं अपमृत्युविनाशनं | लिङ्गमूर्तिमलिङ्गात्मम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८१॥
भक्तकल्याणदं व्यस्तं वेदवेदांतसंस्तुतं | कल्पकृत्कल्पनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८२॥
घोरपातकदावाग्निं जन्मकर्मविवर्जितं | कपालमालाभरणं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८३॥
मातङ्गचर्मवसनं विराड्रूपविदारकं | विष्णुक्रांतंनंतं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८४॥
यज्ञकर्मफलाध्यशं यज्ञविघ्नविनाशकं | यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८५॥
कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्टनिग्रहकारकं | योगिमानसपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८६॥
महोन्नतंहाकायं महोदरंहाभुजम | महावक्त्रं महावृद्धम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८७॥
सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीमपराक्रमम | महेश्वरं शिवतरं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८८॥
समस्तजगदाधारं समस्तगुणसागरं | सत्यं सत्यगुणोपेतं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ८९॥
माघकृष्णचतुर्दश्यां पूजार्धं च जगद्गुरोः | दुर्लभं सर्वदेवानाम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९०॥
,,,(jyotish aur ratna paramarsh karta)08275555557 ,,
तत्रापिदुर्लभं मन्येत नभोमासेन्दुवासरे | प्रदोषकालेपूजायाम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९१॥
तटाकंधननिशेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयं | कोटिकन्यामहादानं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९२॥
दर्शनं बिल्ववृशस्य स्पर्शनं पापनाशनं | अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९३॥
तुलसीबिल्वनिर्गुण्डी जंबीरामलकं तथा | पञ्चबिल्वमितिख्यातं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९४॥
अखण्डबिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नंदिकेश्वरं | मुच्यते सर्वपापेभ्यः एकबिल्वं शिवार्पणं.ह ॥ ९५॥
सालंकृताशतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकं | साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९६॥
दन्त्यश्वकोटिदानानि अश्वमेधसहस्रकं | सवत्सधेनुदानानि एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९७॥
चतुर्वेदसहस्राणि भारतादिपुराणकं | साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९८॥
सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकं | तुलाभागं शतावर्तम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ९९॥
अष्टोत्तरश्शतं बिल्वं योर्चयेल्लिङ्गमस्तके | अधर्वोक्तम अधेभ्यस्तु एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १००॥
काशीशेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनं | अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०१॥
अष्टोत्तरश्शतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यधाः |
त्रिसंध्यं मोशमाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०२॥
दन्तिकोटिसहस्राणां भूः हिरण्यसहस्रकं | सर्वक्रतुमयं पुण्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०३॥
पुत्रपौत्रादिकं भोगं भुक्त्वाचात्रयधेप्सितं | अंतेज शिवसायुज्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०४॥
विप्रकोटिसहस्राणां वित्तदानाश्चयत्फलं | तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०५॥
त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वतवपादाम्बुयः पिबेत | जीवन्मुक्तोभवेन्नित्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०६॥
अनेकदानफलदं अनन्तसुकृतादिकं | तीर्थयात्राखिलं पुण्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०७॥
त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यानकृतं तव | भवनं शाङ्करं नित्यम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०८॥
उमयासहितं देवं सवाहनगणं शिवं | भस्मानुलिप्तसर्वाङ्गम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १०९॥
सालग्रामसहस्राणि विप्राणां शतकोटिकं | यज्ञकोटिसहस्राणि एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ११०॥ रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks
अज्ञानेन कृतं पापं ज्ञानेनाभिकृतं च यत | तत्सर्वं नाशमायात एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ १११॥
अमृतोद्भववृशस्य महादेवप्रियस्य च | मुच्यंते कंटकाघातात कंटकेभ्यो हि मानवाः ॥ ११२ ॥
एकैकबिल्वपत्रेण कोटियज्ञफलं भवेत | महादेवस्य पूजार्थम एकबिल्वं शिवार्पणं ॥ ११३ ॥
एककाले पठेन्नित्यं सर्वशत्रुनिवारणं | द्विकालेच पठेन्नित्यं मनोरथफलप्रदं ॥ ११४ ॥
त्रिकालेच पठेन्नित्यम आयुर्वर्ध्यो धनप्रदं | अचिरात्कार्यसिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ११५ ॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः | लश्मीप्राप्तिश्शिवावासः शिवेन सह मोदते ॥ ११६ ॥
कोटिजन्म कृतं पापम अर्चनेन विनश्यति | सप्तजन्मकृतं पापं श्रवणेन विनश्यति ॥ ११७ ॥
जन्मान्तरकृतं पापं पठनेन विनश्यति | दिवारात्रकृतं पापं दर्शनेन विनश्यति ॥ ११८ ॥
शणेशणेकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति | पुस्तकं धारयेद्देहि आरोग्यं भयनाशनं ॥ ११९ ॥
इति श्री बिल्वाश्ह्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं संपूर्णम

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