Wednesday, 17 December 2014

मंगल दोष अथवा ,,प्रभाव तथा दोष निवारण हेतु सरल उपाय,,,

मंगल दोष अथवा ,,प्रभाव तथा दोष निवारण हेतु सरल उपाय,,,
मंगल दोष एक ऐसी ज्योतिषीय स्थिति है, जो जिस किसी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, खासकर कन्याओ को तो कही जादा....उनके जीवन में या उनके आस पास किसी भी प्रकार की अशुभ घटना को उनसे जोड़ कर देखा जाता है...तरह तरह के ताने दिए जाते है.... आइये समझे के मंगल दोष है क्या....? और बनता कैसे है...?
यह सम्पूर्णत: ग्रहों की स्थति पर आधारित है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के 1, 4, 7, 8 और 12 वे घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है | यह स्थति विवाह के लिए अत्यंत विनाशकारी और अशुभ मानी जाती है | संबंधो में तनाव व बिखराव, कुटुंब में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है | ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दुसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए | यदि वर और वधु मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दुसरे से के योग से समाप्त हो जाते है | मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, लेकिन वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित कर सकते है | मंगल ग्रह की पूजा के द्वारा मंगल देव को प्रसन्न किया जाता है, तथा मंगल द्वारा जनित विनाशकारी प्रभावों, सर्वारिष्ट को शांत व नियंत्रित कर सकारात्मक प्रभावों में वृद्धि की जा सकती है |
मंगल दोष शांति के विशेष दान ,,,,शास्त्रानुसार लाल वस्त्र धारण करने से व किसी ब्रह्मण अथवा क्षत्रिय को मंगल की निम्न वास्तु का दान करने से जिनमे - गेहू, गुड, माचिस, तम्बा, स्वर्ण, गौ, मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है | लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल जनित अमंगल दूर होता है |
आइये मंगल दोष शांति के कुछ सरल उपाय जानते है
1,, - चांदी की चौकोर डिब्बी में शहद भरकर हनुमान मंदिर या किसी निर्जन वन, स्थान में रखने से मंगल दोष शांत होता है |
2,, - मंगलवार को सुन्दरकाण्ड एवं बालकाण्ड का पाठ करना लाभकारी होता है |
3,, - बंदरों व कुत्तों को गुड व आटे से बनी मीठी रोटी खिलाएं |
4 ,,- मंगल चन्द्रिका स्तोत्र का पाठ करना भी लाभ देता है |
5 ,,- माँ मंगला गौरी की आराधना से भी मंगल दोष दूर होता है |
6 ,,- कार्तिकेय जी की पूजा से भी मंगल दोष के दुशप्रभाव में लाभ मिलता है |
7,, - मंगलवार को बताशे व गुड की रेवड़ियाँ बहते जल में प्रवाहित करें |
8,, - आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिला दें |
9 ,,- मंगली कन्यायें गौरी पूजन तथा श्रीमद्भागवत के 18 वें अध्याय के नवें श्लोक का जप अवश्य करें |
10,, - मांगलिक वर अथवा कन्या को अपनी विवाह बाधा को दूर करने के लिए मंगल यंत्र की नियमित पूजा अर्चना करनी चाहिए।
11 ,,- मंगल दोष द्वारा यदि कन्या के विवाह में विलम्ब होता हो तो कन्या को शयनकाल में सर के नीचे हल्दी की गाठ रखकर सोना चाहिए और नियमित सोलह गुरूवार पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाना चाहिए |
12,, - मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से व हनुमान जी को सिन्दूर एवं चमेली का तेल अर्पित करने से मंगल दोष शांत होता है |
13 ,,- महामृत्युजय मंत्र का जप हर प्रकार की बाधा का नाश करने वाला होता है, महामृत्युजय मंत्र का जप करा कर मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक व दांपत्य जीवन में मंगल का कुप्रभाव दूर होता है |
14,,,- यदि कन्या मांगलिक है तो मांगलिक दोष को प्रभावहीन करने के लिए विवाह से ठीक पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करे |
15,,, - यदि वर मांगलिक हो तो विवाह से ठीक पूर्व वर का विवाह तुलसी के पौधे के साथ या जल भरे घट (घड़ा) अर्थात कुम्भ से करवाएं।
16,,, - यदि मंगली दंपत्ति विवाहोपरांत लालवस्त्र धारण कर तांबे के पात्र में चावल भरकर एक रक्त पुष्प एवं एक रुपया पात्र पर रखकर पास के किसी भी हनुमान मन्दिर में रख आये तो मंगल के अधिपति देवता श्री हनुमान जी की कृपा से उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखी बना रहता है |
मांगलिक दोष का परिहार
मांगलिक दोष के परिणाम: जन्मपत्रिका में मांगलिक दोष विवाह संबंधी परेशानियां जैसे विलंब, मुश्किल, गलतफहमी आदि का संकेत है। यह वैवाहिक जीवन में भी आने वाली परेशानियों का संकेत है। मांगलिक दोष का परिहार: (
1) वर-वधू दोनों की कुण्डली में मांगलिक दोष होने से मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।
(2) दूसरे भाव में मंगल यदि मिथुन या कन्या में हों तो भी मंगल दोष का निवारण हो जाता है।
(3) यदि द्वादश भाव में वृषभ और तुला के मंगल हों तो मंगल दोष का निवारण हो जाता है।
(4) चतुर्थ में मेष या वृश्चिक के मंगल हों तो भी परिहार होता है।
(5) सप्तम भाव में मकर या कर्क राशि में मंगल मांगलिक दोष का परिहार करते हैं।
(6) अष्टम भाव में यदि धनु या मीन राशि में मंगल हों।
(7) कुंभ, सिंह और कर्क राशि में होने पर मंगल का किसी प्रकार का दोष नहीं होता।
(8) बृहस्पति या चन्द्रमा का मंगल से युति करना भी मांगलिक दोष का परिहार करता है।
(9) अस्त मंगल किसी भी प्रकार का दोष उत्पन्न नहीं करते। शास्त्रों के अनुसार कुज दोष का परिहार पूरी तरह नहीं हो सकता केवल कम हो सकती है। यह शोध का विषय है।
कन्या की कुंडली मै मांगलिक दोष का परिहार नही हो रहा हो तो उपाय के रूप मे कन्या का प्रथम विवाह \सात फेरे किसी घट (घडे) या पीपल के वृक्ष साथ कराए जाने का विधान है ।इस प्रकार के उपाय के पीछे तर्क यह है कि मंगली दोष का मारक प्रभाव उस घट या वृक्ष पर होता हे ,जिससे कन्या का प्रथम विवाह किया जाता है । वर दूसरा पति होने के कारण उस प्रभाव से सुरक्षित रह जाता है ॥घट विवाह शुभ विवाह मुहूर्त और शुभ लग्न मे पुरोहित द्वारा सम्पन्न कराया जाना चाहिये । कन्या का पिता पूर्वाभिमुख बैठकर अपने दाहिने तरफ कन्या को बिठाऐ॥ कन्या का पिता घट विवाह का सकल्प ले ।नवग्रह,गौरी गणेशादि का पूजन ,शांति पाठ इत्यादि करे ।घट कि षोडषोचार से पूजा करे ।शाखोचार,हवन,सात फेरे और विवाह कि अन्य रश्म निभाये ।बाद मे कन्या घट को उठाकर ह्र्दय से सटाकर भुमि पर छोड दे जिससे घट फूट जाये ।इसके बाद देवताओ का विसर्जन करे और ब्राह्मणो को दक्षिणा दे बाद मे चिरंजीवी वर से कन्या का विवाह करे॥ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,
यदि कन्या मांगलिक है तो मांगलिक दोष को प्रभावहीन करने के लिए विवाह से ठीक पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करे |
15 – यदि वर मांगलिक हो तो विवाह से ठीक पूर्व वर का विवाह तुलसी के पौधे के साथ या जल भरे घट (घड़ा) अर्थात कुम्भ से करवाएं।
16 – यदि मंगली दंपत्ति विवाहोपरांत लालवस्त्र धारण कर तांबे के पात्र में चावल भरकर एक रक्त पुष्प एवं एक रुपया पात्र पर रखकर पास के किसी भी हनुमान मन्दिर में रख आये तो मंगल के अधिपति देवता श्री हनुमान जी की कृपा से उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखी बना रहता है |
मंगल दोष शांति के विशेष दान :-
शास्त्रानुसार लाल वस्त्र धारण करने से व किसी ब्रह्मण अथवा क्षत्रिय को मंगल की निम्न वास्तु का दान करने से जिनमे – गेहू, गुड, माचिस, तम्बा, स्वर्ण, गौ, मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है | लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल जनित अमंगल दूर होता है |
मंगल के लिए वैदिक मंत्र | ॐ अग्निमूर्धादिव: ककुत्पति: पृथिव्यअयम। अपा रेता सिजिन्नवति ।
मंगल के लिए तांत्रोक्त मंत्र | ॐ हां हंस: खं ख:
ॐ हूं श्रीं मंगलाय नम:
ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
मंगल का नाम मंत्र | ॐ अं अंगारकाय नम: ॐ भौं भौमाय नम:"
मंगल का पौराणिक मंत्र ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युतकान्तिसमप्रभम । कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम ।।
मंगल गायत्री मंत्र | ॐ क्षिति पुत्राय विदमहे लोहितांगाय धीमहि-तन्नो भौम: प्रचोदयात
मंगल का विचार करना
लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुजे . कन्या भर्तु विनाशाय भर्तु कन्या विनाशकृत ॥
जन्म लग्न मे (1,4,7,8,12)स्थानो मंगल होने से वर – कन्या मंगली होते है॥
मंगल दोष के परिहार
मांगलिक कुंडलियो मे दो तरह के परिहार मिलते है। (1) स्वय की कुंडली मे-जैसे शुभ ग्रहो का केन्द्र मे होना,शुक्र द्वितीय भाव मे हो,गुरू मंगल साथ हो या मंगल पर गुरू की दृष्टिे हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है। (2) वर-कन्या की कुन्डली मे आपस मांगलिक दोष का काट –जैसे एक के मांगलिक स्थान मे मंगल हो और दूसरे के इन्ही स्थानो मे सूर्य,शनि,राहु,केतु मे से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है।पापक्रांत शुक्र और सप्तम भाव के स्वामी की नेष्ट स्थिति को भी मंगल तुल्य ही समझे।मंगल दोष परिहार के कुछ शास्त्र वचन निम्न प्रकार है।इनके आधार पर यदि मांगलिक दोष भंग हो जाता है तो विवाह के बाद उनका दाम्पत्य जीवन सुख और प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत होगा॥
अंजे लग्ने व्यये चापे पाताले वृश्चिके कुजे। वृषे जाए घटे रन्ध्रे भौमदोषो न विद्यते॥
मेष का मंगल लग्न मे, धनु का द्वादश भाव मे वृश्चिक का चौथे भाव मे,वृष का सप्तम मे कुम्भ का आठवे भाव मे हो तो भौम दोष नही रहता ॥
अर्केन्दु क्षेत्रजातां कुज दोषो न विद्यते । स्वोच्चमित्रभ जातानां तद् दोषो न विद्यते ॥
सिंह लग्न और कर्क लग्न मे भी लग्नस्थ मंगल का दोष नही होता है
नीचस्थो रिपुराशिस्थः खेटो भाव विनाशकः । मूलस्वतुंगा मित्रस्था भावबृद्धि करोत्यलमः ॥
कुंडली मे मंगल यदि स्व-राशि (मेष,बृश्चिक )मूलत्रिकोण,उच्चराशि (मकर)मित्र राशि (सिंह,धनु,मीन )मे हो तो भौम दोष नही रहता है शनि भौमोथवा कश्चित्पापो वा तादृशो भवेत् । तेष्वेव भवनेष्वेव भौम दोष विनाशकृत ॥
शनि मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु,सूर्य,केतु अगर मंगलिक भावो(1,4,7,8,12)मे कन्या कि कुंडली हो और उन्ही भावो मे वर के भी हो तो भौम दोषनष्ट होता है ।यानि यदि एक कुंडली मे मांगलिक स्थान मे मंगल हो तथा दूसरे की मे इन्ही स्थानो मे शनि,सूर्य,मंगल,राहु,केतु मे से कोई एक ग्रह हो तो उअस दोष को काटता है।
केन्द्रे कोणे शुभाढ्याश्चते् च त्रिषडा़येप्य सद्ग्रहाः । तदा भौमस्य दोषो न मदने मदपस्तथा ॥
यानी 3,6,11वे भावो मे अशुभ ग्रह हो और केन्द्र (1,4,7,10)व त्रिकोण (5,9) मे शुभ ग्रह हो,सप्तमेष सातवे भाव मे हो तो मंगल दोष नही रहता है ।
वाचस्पतौ नवपंच केन्द्र संस्थे जातांगना भवति पूर्णविभूतियुक्ता । साध्वी सुपुत्रजननी सुखिनीगुढ्यां सप्ताष्टके यदि भवेदशुभ ग्रहोपि ॥
कन्या की कुंडली मे गुरू यदि केन्द्र या त्रिकोण मे हो तो मांगलिक दोष नही लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढाने वाला होता है । त्रिषट्‍ एकादशे राहु त्रिषड़कादशे शनिः। त्रिषड़कादशे भौमः सर्वदोष विनाशकृतः॥
यदि एक कुंडली मे मांगलिक योग हो और दूसरे कि कुंडली के (3,6,11)वे भाव मे से किसी भाव मे राहु ,मंगल या शनि मे से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है ।
द्वितीय भौमदोषस्तु कन्यामिथुन योर्विना, चतुर्थ कुजदोषःस्याद्‍ तुलाबृषभयोर्विना। अष्टमो भौमदोषस्तु धनु मीनद्व योर्विना, व्यये तु कुजदोषःस्याद् कन्यामिथुन योर्विना॥
द्वितीय भाव मे यदि बुध राशि (मिथुन,कन्या) का मंगल हो तो मांगलिक दोष नही लगेगा ऐसा बृष व सिंह लग्न की कुंडली मे ही होगा ।चतुर्थ भाव मे शुक्र राशि (बृष,तुला) का मंगल दोषकृत नही है, ऐसा कर्क व कुम्भ लग्न मे होगा।अष्टम भाव मे गुरू राशि (धनु,मीन) का मंगल दोष पैदा नही करेगा ।ऐस बृष और सिंह लग्न मे ही सम्भव है और बारहवे भाव मे मंगल का दोष बुध कि राशि (मिथुन,कन्या) मे नही होगा ।ऐसा कर्क और तुला लग्नो मे ही होगा तथा 1,4,7,8,12 वे भाव मे मंगल यदि चर राशि मेष कर्क ,तुला और मकर मे हो तो भी मांगलिक दोष नही लगता है
भौमेन सदृषो भौमः पापोवा तादृशो भवेत। विवाह शुभदः प्रोक्ततिश्चरायुः पुत्र पौत्रदः ॥
मंगल के समान ही कोई पापग्रह (सूर्य,शनि,राहु,केतु) दूसरे कि कुंडली के मांगलिक स्थान मे हो तो दोनो का विवाह करना चाहिए ,ऐसे दाम्पत्ति आयु,पुत्र,पौत्रादि से सम्पन्न होकर सुखी जीवन व्यतीत करेगे । यामित्रे च यदा सौरि लग्ने वा हिबूकेथवा । अष्टमे द्वादशे चैव- भौम दोषो न विद्यते
जिस वर –कन्या के (1,4,7,8,12) इन स्थनो मे शनि हो तो मंगली दोष मिट जाता ह
गुरु भौम समायुक्तश्च भौमश्च निशाकरः केन्द्रे वा वर्तते चन्द्र एतद्योग न मंगली । गुरु लग्ने त्रिकोणेवा लाभ स्थाने यदा शनिः, दशमे च यदा राहु मंगली दोष नाश कृत॥
गुरु भौम के साथ पडने से अथवा चन्द्रमा भौम एक साथ और केन्द्र मे (1,4,7,10) इन स्थानो मे चन्द्रमा होवे तो भी मंगली दोष मिट जाता है , जिसके लग्न मे गुरु बैठा हो अथवा त्रिकोण स्थान (5,9) मे गुरु बैठा और 11 भाव शनि हो 10 वे स्थान राहु बैठा हो तो भी मंगली दोष मिट जाता है ॥

Sunday, 14 December 2014

ज्योतिष ज्ञान ,,,,ज्योतिष को जाने,,,,

ज्योतिष को मुख्यता २  https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5        भागो में बाटा गया है सिद्धांत व फलित ज्योतिष ज्योतिष का वह भाग जिसमे ग्रह नक्षत्र आदि की गतियो का अवलोकन किया जाता है सिद्धांत या गणित के नाम से जाना जाता है फलित वह भाग है जिसके द्वारा ग्रह की विशेष स्तिथि को देख कर बताया जाता है की उस स्तिथि का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा 
जातक –
अधिकतर ज्योतिष की किताबो में ये शब्द आपने देखा व पढ़ा गया है जातक शब्द व्यक्ति विशेष के लिए आता है जिसकी ज्योतिष के अधार पर गड़ना कर फलित करने की कोशिश की जाती है अर्थात वो व्यक्ति स्वयं भी हो सकता है या जिसका ज्योतिषीय विधि से विचार किया जा रहा है 
पत्री –
ग्रहों की विशेष स्थिति को एक कागज पर विशेष आकृति में बनाना जिससे समय समय पर अलग अलग स्तिथि वश विचार किया जा सके पत्री कही जाती है सूक्ष्म पत्री में ग्रह की स्तिथि ही दी जाती है जबकि पूर्ण पत्रियो में ग्रह गडना के साथ साथ दशा अंतरदशा ग्रहों के शुभ अशुभ फल व जन्मदिन का पंचाग भी दिया जाता है 
सम्वंतसर –
ई० काल श्री क्राइस्ट के जन्म से माना जाता है जिसका २०१० व वर्ष चल रहा है क्राइस्ट के जन्म के ३१०१ वर्ष पूर्व ही कलियुग शुरू हो चुका था वास्तविक कलियुग का आरंभ १८ फरबरी ३१०२ बी०सी० की अर्ध रात्रि को हुआ था ज्योतिष गडना के अनुसार ७ ग्रह मेष राशि में थे इसका ज्योतिष गणित में विशेष महत्व है 
क्राइस्ट के जन्म के ५७ वर्ष पहले उज्जैन में विक्रमादित्य नाम के प्रतापी राजा हुए है स्कंध पुराण में लिखा गया है कि कलियुग के लगभग ३००० वर्ष बीत जाने पर विक्रमादित्य नामक राजा हुआ जिसके नाम से ही विक्रमी संवत जाना जाता है यही कारण है कि चल रहे इस्वी साल में ५७ और जोड़ दिया जाये तो वह विक्रमी सम्वत बन जाता है 
क्राइस्ट के जन्म के ७८ वर्ष के बाद शालिवाहन नामक राजा हुए है जिनके नाम पर ही शक संवत का प्राम्भ हुआ अर्थात इस्वी साल में ७८ और घटा दिया जाये तो वह शक सम्वत बन जाता है 
पंचांग –  पंचांग का अर्थ ही ५ अंगों का समूह है पंचाग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आते है ज्योतिष का पूर्ण पंचाग सूर्य और चन्द्रमा की गति पर निर्भर करता है 
तिथि – सूर्य और चन्द्रमा के अंशो के अंतर से तिथियो का चयन किया जाता है तिथिया दो प्रकार की होती है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की तिथिया –

राशि – प्रथ्वी जब सूर्य के चारो तरफ चक्कर लगाती है तो एक गोलाकार परिभ्रमण बन जाता है इस ३६० अंश के परिभ्रमण को गडना की सुगमता हेतु १२ भागो में विभक्त किया गया था लेकिन अनुभवों से ये पाया गया की इन १२ भागो की आपने एक अलग पहचान भी है जब भी कोई ग्रंह इन अलग अलग भागो में जाता है तो उसका अलग ही प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है
जिस प्रकार यदि कोई मनुष्य पहेली बार किसी मार्ग पर जाता है तो अपनी वापसी के लिए कुछ स्थान को अपने ध्यान का केंद्र बना लेता है जिससे वो याद रख सके की इससे मार्ग से आये थे उसी तरह पूर्व के ज्योतिषविदो ने राशियों को अलग अलग तारा मंडलों के स्थान के अधार पर निर्धारित कर दिया था जिससे यह ज्ञात किया जा सके कि कौन सा ग्रह कब और किस तारा मंडल की तरफ को जा रहा है इन तारा मंडल के विशेष समूह को ३० – ३० अंश में विभक्त कर अलग अलग नाम दे दिये गए जिनको आजकल लोग राशि कहते है 


उत्तर भारत की ज्योतिष की समस्त पत्रीयो में राशि के स्थान पर ऊपर दिए गये राशि अंको का ही प्रयोग किया जाता है ये अंक किसी भी पत्री में भाव को प्रदर्शित नहीं करते ये संबधित राशि को ही दर्शाते है जो की ऊपर बताइ गई है बहुत से नए ज्योतिष के विद्यार्थी राशि अंक को ही जातक की कुंडली का भाव समझते है जिस कारण उनके द्वारा किया गया फलित निष्प्रभावी हो जाता है 
ज्योतिष में ९ ग्रहों सूर्य चन्द्रमा मंगल राहू गुरु शनि बुध केतु और शुक्र को ही विशेष महत्व दिया गया है राशियों के स्वामी और उनका सम्बन्ध कुछ इस प्रकार है
वार – दैनिक रूप से हम लोग प्रतिदिन एक न एक दिन के नाम को जानते है जैसेकि रविवार सोमवार आदि लेकिन ये दिन एक क्रम में ही क्यों होते है क्यों सोमवार के बाद मंगल ही आता है शुक्र ही क्यों नहीं आ जाता इसका एक विशेष गणित निर्धारित है 
गणितीय आधार पर सबसे दूर शनि को बताया गया है इसकी दूरी ८८ करोड मील से कुछ ऊपर ही आकी गई है अतः शनि एक परिक्रमाँ १०७५९ दिनों में पूरा कर पता है यह अवधि ३० वर्ष के बराबर होती है शनि से कम दूरी पर गुरु (ब्रहस्पति) ४८ करोड मील दूर है इस कारण ये परिक्रमा ४३३२ दिन या १२ वर्ष में पूरी करता है गुरु से कम दूरी पर मंगल जो १४ करोड मील से कुछ अधिक है इसलिए ६८६ दिनों में परिक्रमा पूरी करता है मंगल से कम दूरी इस प्रथ्वी की है जो ९ करोड मील पर है चुकी प्रथ्वी को चलायेमान नहीं मानते इस लिए यह स्थान सूर्य को दिया गया है इससे कम दूरी पर शुक्र है जो ६ करोड मील से कुछ अधिक है इस कारण ये २२४ दिन में परिक्रमा पूरी करता है शुक्र से भी कम दूरी पर बुध जो ३.५ करोड मील पर है ये ८७ दिन में अपनी परिरकमा पूरी करता है सबसे कम दूरी पर चन्द्रमा है जो लगभग २.५ लाख मील पर है ये २७ दिन में अपना परिक्रमा का काल पूरा करता है 
यदि इन ग्रहों को उनके दूरवर्ती क्रम में लिखा जाये तो शनि गुरु मंगल सूर्य शुक्र बुध व चन्द्रमा आते है अहोरात्रि एक दिन और रात के युग्म को कहा जाता है अहोरात्रि में यदि अ और त्रि का विलोप कर दिया जाये तो उसको होरा कहा जाता है १ अहोरात्रि में २४ होरा होते है जिसे अग्रेजी के HOUR शब्द की संज्ञा दी गयी है 
प्रलय के अंत के बाद सूर्य का उदय होता है उसके ही प्रकाश में पुन सृष्टि का जन्म होता है इसलिए पहेला होरा सूर्य का ही माना गया है उसके बाद शुक्र के बाद बुध के बाद चंद्र के बाद शनि के बाद गुरु के बाद मंगल फिर ये ही क्रम बार बार चलता है इस क्रम में २४ होरा के बाद फिर चन्द्र का होरा आता है 
इस क्रम के चलते ही ठीक २४ घंटे या होरा के बाद यदि आज सूर्योदय पर रविवार है तो २४ घंटे बाद चन्द्र वार = सोमवार पड़ेगा ! उस क्रम को ध्यान में रखते हुए वार का नामांकन किया गया है 
नक्षत्र – अनेक तारो के विशिष्ट आक्रति वाले पुंज को नक्षत्र कहा जाता है आकाश में जो असंख्या तारा मंडल जो दिखाई पड़ते है वे ही नक्षत्र कहे जाते है ज्योतिष में नक्षत्र का एक विशेष स्थान है इस सम्पूर्ण आकाश को २७ नक्षत्रो में बाटा गया है प्रत्येक भाग को एक नाम दिया गया है जिनके नाम व स्वामी निम्न प्रकार है 


नक्षत्र और राशि का सम्बन्ध - गणितीय अधार पर एक नक्षत्र १३ अंश २० मिनिट का होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते है इस प्रकार हर नक्षत्र का प्रत्येक चरण ३ अंश २० मिनिट का होता है इस प्रकार नक्षत्रो को राशियों के साथ निम्नवत रखा गया है 


नक्षत्रो की संज्ञा –ज्योतिष में नक्षत्रो को मूल, पंचक, ध्रुव, चर, मिश्र, अधोमुख, उधर्व्मुख, दंध व त्रियाद्य्मुख नामो से जाना जाता है 
मूल नक्षत्र –अश्वनी, मघा, मूल, अश्लेषा ज्येष्ठा व रेवती ये ६ एसे नक्षत्र को मूल नक्षत्रो में गिना जाता है इन नक्षत्रो में होने वाले बच्चो को मूल संज्ञा में ही कहा जाता है २७ दिन के बाद ये नक्षत्र पुन आता है तब मूल की शांति कराई जाती है ज्येष्ठा और मूल को गणङात मूल की व अश्लेषा को सर्प मूल की संज्ञा दी गयी है
पंचक –घनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती ये ५ नक्षत्र पंचक कहे जाते है इनमे किये गए कार्य सिद्ध नहीं होते है 
ध्रुव –उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रेवती ये ४ नक्षत्र ध्रुव संज्ञक बताये गए है 
चर – स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण और शतभिषा ये ४ नक्षत्र चर संज्ञक है 
लघु व मिश्र –
हस्त, अश्वनी व पुष्य नक्षत्र लघु संज्ञक है विशाखा और कृतिका को मिश्र संज्ञक नक्षत्र माना गया है 
अधोमुख –मूल अश्लेषा विशाखा कृतिका पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाषाढ़ा पूर्वाभाद्रपद भरणी और मघा ये ९ नक्षत्र आते है इनमे कुआ बाबडी मकान की नीव आदि का कार्य का आरंभ करना शुभ माना गया है 
उधर्वमुख –आद्रा पुष्य श्रवण घनिष्ठा और शतभिषा ये नक्षत्र उधर्वमुख संज्ञक नक्षत्र है 
दंद –यदि रविवार को भरणी सोमवार को चित्रा मंगलवार को उत्तराषाढ़ा बुधवार को घनिष्ठा गुरुवार को उत्तराफाल्गुनी शुक्रवार को ज्येष्ठा और शनिवार को रेवती तो उस युग्म से बने योग को दंद संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है 
त्रियाद्य्मुख –अनुराधा हस्त स्वाति पुनर्वसु ज्येष्ठा और अश्वनी को त्रियाद्य्मुख संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है 
ज्योतिष में माह का नाम –मुख्यता उजाले पक्ष को शुक्ल पक्ष और अधेरे पक्ष को कृष्ण पक्ष कहा जाता है दोनों पक्षों को जोड़ कर एक माह का निर्धारण किया जाता है इसी प्रकार १२ चन्द्र मास का एक वर्ष होता है जिसके नाम इस प्रकार है 


ऊपर बताये गए माह के नाम भी एक विशेष कारण से ही रखे गए है जिस मास की पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र पड़ता है उस मास का नाम चेत माना गया है उसी क्रम में जिस मास की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र आता है वह वैशाख ही होता है 
पंचांग का अध्यन –जैसा की आपको पूर्व में ही बताया है की पंचांग के ५ अंग होते है तिथि वार नक्षत्र योग करण ! तिथि सूर्य से चंद्रमा के अंशो के बीच के अंतर से निकली जाती है यदि सूर्य से चन्द्रमा के बीच की दूरी का अंतर १८० अंश से कम है तो वह शुक्ल पक्ष की तिथि होती है जब सूर्य से चन्द्रमा के बीच का अंतर १८० अंश से ज्यादा होता है तो वह कृष्ण पक्ष की तिथि होती है 
उ० १ - मान ले यदि सूर्य सिंह राशि में १० अंश पर है और चन्द्रमा तुला में १५ अंश पर है 
सूर्य के कुल अंश = १२० + १० = १३० (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा के कुल अंश = १८० + १५ = १९५ (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा से सूर्य का अंतर = १९५ – १३० = ६५ = शुक्ल पक्ष की ६ षष्ठी (तालिका ०१ से)
उ० २ – मान ले यदि सूर्य मिथुन राशि में १२ अंश पर और चन्द्रमा मीन राशि में १० अंश पर है 
सूर्य के कुल अंश = ६० + १२ = ७२ (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा के कुल अंश = ३३० + १० = ३४० (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा से सूर्य का अंतर = ३४० – ७२ = २६८ 
चुकी यह मान १८० से ज्यादा है इसलिए २६८ – १८० = ८८ कृष्ण पक्ष ८ अष्टमी (तालिका ०१ से) 
उ० ३ – मान ले यदि सूर्य तुला राशि में १७ अंश पर और चन्द्रमा कर्क में १२ अंश पर है 
सूर्य के कुल अंश = १८० + १७ = १९७ (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा के कुल अंश = ९० + १२ = १०२ (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा से सूर्य का अंतर = १०२ – १९७ = - ९५ चुकी मान – में है इसलिए
चन्द्रमा से सूर्य का अंतर = -९५ + ३६० = २६५
चुकी यह मान १८० से ज्यादा है इसलिए २६५ – १८० = ८५ कृष्ण पक्ष ८ अष्टमी (तालिका ०१ से) 

तिथियों की संज्ञा –तिथियो को ५ अलग अलग समूह में रखा गया है –
अमावस्या –अमावस्या को ३ संज्ञाओ के रूप में जाना जाता है –
सिनी वाली – प्रातकाल से रात्रि तक की पूर्ण अमावस्या को
दर्श – चतुर्दशी तिथि से संलग्न अमावस्या को 
कुहू – प्रतिपदा से युक्त अमावस्या को 

कुछ तिथिया वार के साथ मिलकर अशुभ फल देने वाली होती है तथा कुछ को सिद्ध तिथि कहा जाता है जिनमें समस्त कार्य सिद्ध हो जाते है 

दग्ध विष और हुतासन को अशुभ फल देने वाली तिथि ही कहा गया है 
वार के विषय में विस्तार से तालिका ०४ के अनुक्रम में पूर्व में ही बताया जा चुका है 
नक्षत्र –नक्षत्र के बारे में पूर्व में ही बताया जा चुका है नक्षत्र की गडना के लिए तालिका १० से चन्द्रमा की स्तिथि ही उस समय के नक्षत्र को प्रदर्शित करती है 
उ० ४ यदि मान ले की चन्द्रमा कन्या में १७ अंश पर है तो तालिका १० से हस्त नक्षत्र कन्या में १० अंश से २३.२० अंश तक होता है चुकी चन्द्रमा १७ अंश का है इसलिए संगत अवधि में हस्त नक्षत्र होगा 
योग –सूर्य और चन्द्रमा के मान को जोड़ कर तालिका १० से प्राप्त स्तिथि के अधार योग को ज्ञात किया जा सकता है 
पूर्व में दिए गए उ० १ के अनुसार –
सूर्य के कुल अंश = १२० + १० = १३० (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा के कुल अंश = १८० + १५ = १९५ (तालिका ०२ से)
सूर्य व चन्द्र का योग = १९४ + १३० = ३२४
तालिका २ के अनुसार ३२४ कुम्भ राशि में आता है अत तालिका १० व ०३ से ब्रह्म योग बनता है 
पूर्व के दिए गए उ० २ के अनुसार –
सूर्य के कुल अंश = ६० + १२ = ७२ (तालिका ०२ से)
चन्द्रमा के कुल अंश = ३३० + १० = ३४० (तालिका ०२ से)
सूर्य व चन्द्र का योग = ७२ + ३४० = ४१२ चुकी यह ३६० से ज्यादा है 
अतः ४१२ - ३६० =५२
तालिका २ के अनुसार ५२ वृषभ राशि में आता है अत तालिका १० व ०३ से सौभाग्य योग बनता है 
करण –तिथि के आधे भाग को कारण कहा जाता है प्रत्येक तिथि का मान १२ अंश अर्थात २४ होरा या घंटे होता है इसमें पूर्वार्ध के १२ घंटे या होरा का एक करण तथा उतरार्ध के १२ घंटे या होरा का एक करण होता है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में ३० तिथिया होती है तिथि व पक्ष के आधार पर करण का निर्धरण निम्न प्रकार है 


पंचांग में भद्रा का भी उल्लेख मिलता है विष्टि करण को भद्रा कहा जाता है भद्रा में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है

Friday, 12 December 2014

बाबा गरीबनाथ स्त्रोतम्

बाबा गरीबनाथ स्त्रोतम्

ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधिशा
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदिशा ॥1॥हर हर हर महादेव
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने ।
गुज्जती मधुकरपुंज कुज्ज्वने गहने ॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता ।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता॥2॥हर हर हर महादेव
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता ।
तनमध्ये हरनिकटे गौरी सूदसहिता ॥
क्रीडा रचयति भूषारज्जित निजमीशम्।
इन्द्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्॥3॥हर हर हर महादेव
बिबुधबधू बहु नृत्यत हृदये मुदसहिता
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता ॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते ।
क्कण कण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥4॥हर हर हर महादेव
रूण रूण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता ।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां ॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते ।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥5॥ हर हर हर महादेव
कर्पूरधुतिगौरं पञ्जाननसहितम् ।
त्रिनयनाशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुंदरजटाकलापं पावकयुतभालम् ।
डमरूत्रिशूलपिनाकं  करधृतनृकपालम् ॥6॥ हर हर हर महादेव
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम् ।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम् ॥
सुंदरसकलशरीरे कृतभिस्माभरणम् ।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणम् ॥7॥ हर हर हर महादेव
शंखनिनाद कृत्वा झल्लरि नादयते ।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते ॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा ।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा ॥
संगतिमेव प्रतिदिन पठनं य: कुरुते ।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः शृणुते ॥8॥ हर हर हर महादेव


द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र 12 Shiv Jyotirling

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र   

सौराष्टेदेशे विशदेअतिरम्ये ज्योतिर्मयं चंद्रकलावतंसम् । 
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपघे ॥ 1 ॥ 
   https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5   
भावार्थ – जो अपनी भक्ति प्रदान करने के लिये अत्यन्त रमणीय तथा निर्मल सौराष्ट्र देश (काथियावाड़)- में दयापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, चन्द्रमा जिनके मस्तक का आभूषण है, उन ज्योतिलिङ्ग्स्वरूप भगवान श्री सोमनाथ जी की शरण में जाता हूँ ।
श्रीशैलक्षृङ्गे विबुधातिसङ्गे 
तुलाद्रितुङ्गेअपि मुद्रा वासन्तम् । 
तमर्जुनं      मल्लिकपूर्वमेकं 
नमामि  संसारसमुद्रसेतुम् ॥ 2 ॥ 

भावार्थ – जो ऊँचाई के आदर्शभूत पर्वतों से भी बढ़कर ऊँचे श्रीशैल के शिखर पर, जहाँ देवताओं का अत्यन्त समागम होता रहता है, प्रसन्नतापूर्वक निवास कराते हैं तथा जो संसार-सागर से पार कारने के लिये पुल के समान हैं उन एकमात्र प्रभु मल्लिकार्जुन को मैं नमस्कार करता हूँ ।
अवन्तिकायां  विहितावतारं 
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । 
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं 
वन्दे  महाकालमहासुरेशम् ॥ 3॥ 

भावार्थ – संतजनों के मोक्ष देने के लिये जिन्होंने अवन्तिपुरी (उज्जैन) में अवतार धारण किया है, उन महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी को मैं अकालमृत्यु से बचाने के लिये नमस्कार करता हूँ ।
कावेरिकानर्मदायो: पवित्रे 
समागमे सज्जनतारणाय । 
सदैव मान्धातृपुरे वसन्त- 
मोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥4॥ 

भावार्थ – जो सत्यपुरुषों को संसार-सागर से पार उतारने के लिये कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम के निकट मांधाता के पुर में सदा निवास कराते हैं , उन अद्वितीय कल्याणमय भगवान् ॐकारेश्वर का मैं स्तवन करता हूँ ।
पूर्वोतरे  प्रज्वलिकानिधाने 
सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । 
सुरासुराराधितपादपघं 
श्रीवैधनाथं तमहं नमामि ॥5॥ 

भावार्थ – जो पूर्वोतर दिशा में चिताभूमि (वैधनाथ-धाम) – के भीतर सदा हि गिरिजा के साथ वास करते हैं, देवता और असुर जिनके चरण-कमलों की अराधना करते हैं, उन श्रीवैधनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ ।
याम्ये  सदङ्गे नगरेअतिरम्ये 
विभूषिताङ्ग विविधैक्ष्च भोगै: । 
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकंग 
श्रीनागनाथं शरण प्रपघे ॥6॥ 

भावार्थ – जो दक्षिण के अत्यन्त रमणीय सदंग नगर में विविध भोगों से सम्पन्न होकर सुन्दर आभूषणों से भूषित हो रहे हैं, जो एकमात्र सद्-भक्ति और मुक्ति को देनेवाले हैं, उन प्रभु श्रीनागनाथ की मैं शरण में जाता हूँ । 
महाद्रिपार्श्र्वे च तटे रमन्तं 
संपूज्यमानं सततं मुनीन्द्र/दै: । 
सु रा सु रै र्य क्ष म हो र गा घै : 
केदारमीशं   शिवमेकमीडे ॥7॥ 

भावार्थ – जो महागिरी हिमालय के पास केदारक्षृंग के तटपर सदा निवास करते हुए मनीश्वरों द्वारा पूजित होते हैं तथा देवता, असुर, यक्ष और महान् सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक भगवान् केदारनाथ का मैं स्तवन करता हूँ ।
सहयाद्रिशिर्षे  विमले वसन्तं 
गो दा व री ती र प वि त्र दे शे । 
यद्दर्शनात् पातकमाशु नाशं 
प्रयाति तं त्र्यंबकमीशमीडे  ॥ 8 ॥

भावार्थ – जो गोदावरी तट के पवित्र देश में सह्यपर्वत के विमल शिखर पार वास करते हैं, जिनके दर्शन से तुरंत हि पातक नष्ट हो जाता है, उन श्रीत्र्यंबकेश्वर का मैं स्तवन करता हूँ ।
सुताम्रपर्णीजलराशियोगे 
निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यै : । 
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं 
निषेव्यमाणं पिशिताशनैक्ष्च॥9॥ 

भावार्थ – जो भगवान् श्रीरामचन्द्र जी के द्वारा ताम्रपर्णी और सागर के संगम पर अनेक बाणों द्वारा पुल बाँधकर स्थापित किये गये हैं, उन श्रीरामेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ ।
यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे 
निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । 
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं 
तं शंङ्करं भक्तहितं नमामि ॥10॥ 

भावार्थ – जो डाकिनी और शाकिनी वृन्द में प्रेतों द्वारा सदैव सेवित होते हैं, उन भक्त हितकारी भगवान्भीमशंकर को मैं प्राणम करता हूँ । 
सानन्दमानन्दवने वसन्त- 
मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । 
वाराणसीनाथमनाथनाथं 
श्रीविश्वनाथं शरण प्रपघे ॥ 11 ॥ 

भावार्थ –जो स्वयं आनंदकन्द हैं और आनंदपूर्वक आनंदवन (काशीक्षेत्र) मे वास करते हैं, जो पापसमूह के नाश करने वाले हैं, उन अनाथों के नाथ काशीपति श्रीविश्वनाथ की शरण में जाता हूँ ।
इलापुरे रम्यविशालकेअस्मिन् 
समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्। 
वन्दे महोदारतरस्वभावं 
घृष्णेक्ष्वराख्यं शरणप्रपघे ॥ 12 ॥ 

भावार्थ – जो इलापुर के सुरम्य मंदिर में विराजमान होकर समस्त जगत् के अराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव बड़ा हि उदार है, उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान् शिव की शरण में मैं जाता हूँ ।
ज्योतिर्मयद्वादशलिंगकानां
शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।
स्तोत्रां पठित्वा मनुजोअतिभक्त्या
फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥13॥
भावार्थ – यदि मनुष्य क्रमश: कहे गये इन बारहों ज्योतिर्मय शिवलिंग के स्तोत्र भक्तिपूर्वक पाठ करे तो इनके दर्शन से होने वाले फल को प्राप्त कर सकता है ।
12 Shiv Jyotirling Mantra :-
Somanath in Saurashtra and Mallikarjunam in Shri-Shail. (सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्).
Mahakaal in Ujjain and Amleshwar in Omkareshwar. (उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्).
Vaidyanath in Paralya and Bhimashankaram in Dakniya. (परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्).
Rameshem (Rameshwaram) in Sethubandh and Nageshem (Nageshwar) in Darauka-Vana. (सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने).
Vishwa-Isham (Vishvanath) in Vanarasi and Triambakam at bank of Gautami River. (वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे)).
Kedar (Kedarnath) in Himalayas and Gushmesh (Gushmeshwar) in Shivalaya (Shiwar). (। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये).
One who recites these Jyotirlingas every evening and morning. (एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।).
He is relieved of all sins committed in past seven lives.(सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति)
One who visits these, gets all his wishes fulfilled (एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति)
(कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः



श्री महालक्ष्मी अष्टकम Sri Mahalakshmi Ashtakam

श्री महालक्ष्मी अष्टकम  

Sri Mahalakshmi Ashtakam

नमस्तेस्तु महामाये श्री पीठे सुर पूजिते !शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

नमस्तेतु गरुदारुढै कोलासुर भयंकरी !सर्वपाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!
सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयंकरी !सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवी भक्ति मुक्ति प्रदायनी !मंत्र मुर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

आध्यंतरहीते देवी आद्य शक्ति महेश्वरी !योगजे योग सम्भुते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!
स्थूल सुक्ष्मे महारोद्रे महाशक्ति महोदरे !महापाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!
पद्मासन स्थिते देवी परब्रह्म स्वरूपिणी !परमेशी जगत माता महालक्ष्मी नमोस्तुते !!
श्वेताम्भर धरे देवी नानालन्कार भुषिते !जगत स्थिते जगंमाते महालक्ष्मी नमोस्तुते!!
महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्रं य: पठेत भक्तिमान्नर:!सर्वसिद्धि मवाप्नोती राज्यम् प्राप्नोति सर्वदा !!
एक कालम पठेनित्यम महापापविनाशनम !द्विकालम य: पठेनित्यम धनधान्यम समन्वित: !!
त्रिकालम य: पठेनित्यम महाशत्रुविनाषम !महालक्ष्मी भवेनित्यम प्रसंनाम वरदाम शुभाम !!
Namosthesthu Maha Maye,
Sree Peede, Sura Poojithe,
Sanka, Chakra, Gadha Hasthe,
Maha Lakshmi Namosthuthe 1
Namasthe Garudarude,
Kolasura Bhayam Kari,
Sarva Papa Hare Devi,
Maha Lakshmi Namosthuthe 2
Sarvagne Sarva Varadhe,
Sarva Dushta Bhayam Karee,
Sarva Dukha Hare Devi,
Maha Lakshmi Namosthuthe 3
Sidhi Budhi Pradhe Devi,
Bhakthi Mukthi Pradayinee,
Manthra Moorthe Sada Devi,
Maha Lakshmi Namosthuthe 4
Adhyantha Rahithe Devi,
Adhi Shakthi Maheswari,
Yogaje Yoga Sambhoothe,
Maha Lakshmi Namosthuthe 5
Sthoola Sukshma Maha Roudhre,
Maha Shakthi Maho Dhare,
Maha Papa Hare Devi,
Maha Lakshmi Namosthuthe 6
Padmasana Sthithe Devi,
Para Brahma Swaroopini,
Para Mesi, Jagan Matha,
Maha Lakshmi Namosthuthe 7
Swethambara Dhare Devi,
Nanalankara Bhooshithe,
Jagat Sthithe, Jagan Matha,
Maha Lakshmi Namosthuthe 8

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