Friday, 12 January 2018

पीपल और शनि

पीपल और शनि,,

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ॐ प्राम प्रीम प्रौम सः शनये नमःॐ खां खीं खों सः शनये नमः,https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557,धर्मशास्त्रों में वर्णन है कि पीपल पूजा केवल शनिवार को ही करनी चाहिए। शनिवार को पीपल पर जल व तेल चढाना, दीप जलाना, पूजा करना या परिक्रमा लगाना अति शुभ होता है। पुराणों में आई कथाओं के अनुसार ऎसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय लक्ष्मीजी से पूर्व उनकी बडी बहन, अलक्ष्मी (ज्येष्ठा या दरिद्रा) उत्पन्न हुई, तत्पश्चात् लक्ष्मीजी।लक्ष्मीजी ने श्रीविष्णु का वरण कर लिया। इससे ज्येष्ठा नाराज हो गई। तब श्रीविष्णु ने उन अलक्ष्मी को अपने प्रिय वृक्ष और वास स्थान पीपल के वृक्ष में रहने का ओदश दिया और कहा कि यहाँ तुम आराधना करो। मैं समय-समय पर तुमसे मिलने आता रहूँगा एवं लक्ष्मीजी ने भी कहा कि मैं प्रत्येक शनिवार तुमसे मिलने पीपल वृक्ष पर आया करूँगी।
शनिवार को श्रीविष्णु और लक्ष्मीजी पीपल वृक्ष के तने में निवास करते हैं। इसलिए शनिवार को पीपल वृक्ष की पूजा, दीपदान, जल व तेल चढाने और परिक्रमा लगाने से पुण्य की प्राप्त होती है और लक्ष्मी नारायण भगवान व शनिदेव की प्रसन्नता होती है जिससे कष्ट कम होते हैं और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
श्री शनि - भार्या स्त्रोत :=ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलह-प्रिया,कलही कंटकी चापि अजा महिषी तुरंगमा !,,,,,नामानि शनि-भार्यायाः नित्यम जपति यः पुमान ,तस्य दुखानी नश्यन्ति सुखं सौभाग्यमेधते !! ---जो आदमी
शनि पत्नी के नामों का जप करता है उसके दुःख नष्ट होते हैं और सुख ,
सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है !!!
1 = " ॐ खां खीं खों सः शनये नमः " = 23000 जाप - नीले फुल ओर चन्दन से शनिदेव की पूजा - तेल का दीपक = पाइए = आकस्मिक संकट ओर दुर्भाग...्य से मुक्ति =
2 = " ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शनेश्चराय नमः " = 11 माला जाप प्रत्येक शनिवार = पाइए - कुष्ठ रोग से मुक्ति =
3 = जो लोग हमेशा उदास रहते है - चिडचिडे होते है - गंदे रहते है - उनको जीवन में बदलाव के लिए - गुलाबी ओर कभी - कभी लाल रंग के कपड़ो का उपयोग करना चाहिए =
4 = " ॐ शं शनेश्चराय नमः " = प्रत्येक शनिवार 5 माला जाप = पाइए कमर दर्द से मुक्ति =
5 = कमर दर्द से मुक्ति हेतु धारण करिए - " कटेला ( कटहला ) " रत्न - किन्तु ज्योतिष सलाह से =
6 = अगर आपकी जन्मकुंडली में - दुर्घटना योग - आकस्मिक संकट योग - शारीरिक पीड़ा योग बना हुआ है - तो 11 शनिवार लगातार 11 - 11 पीस सरसों तेल की भजिया ( पकोड़ी ) अपने शरीर से 9 बार उसारकर कौओ को खाने के लिए डाल देवे =
7 = श्री शनिदेव को ऐसे ब्यक्तियो से सख्त नफरत है - जो शराब पीता हो ओर पर स्त्री गमन करता हो - अतः इन आदतों से दूर रहे 

शनि देव के सामान्य मन्त्र ॐ शं शनैश्चराय नमः शनि देव के बीज मन्त्र ॐ प्राम प्रीम प्रौम सः शनये नमः
शनि देव के गायत्री मन्त्र ॐ भूर्भुवः स्वः शन्नो देविर्भिष्टाय विद्महे नीलान्जनाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोदयात
शनि देव के वैदिक मन्त्र ॐ शन्नो देविर्भिष्टाय आपोभवन्तु पीतये शंयोर भिश्रवन्तु नः
शनि देव के पौराणिक मन्त्र :
ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरं
शनि देव के ध्यान मन्त्र
इन्द्र्नीलद्युतिः शूली वरदो गृध्र वाहनः ! बाण -बाणा-संधर :कर्ताव्योअर्क-सुतस्त्था
!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

Wednesday, 10 January 2018

सुबह स्नान अथवा सायंकाल घर के पूजा गृह में अथवा मंदिर

सुबह स्नान अथवा सायंकाल घर के पूजा गृह में अथवा मंदिर में भगवान के सामने खड़े होकर तथा दोनों हाथ जोड़कर कर आप इन मंत्रों के साथ पूजा कीजिए. किसी भी देवी-देवता की आरती से पूर्व उसके मूल मंत्र का जाप कर लेने से भी देवी-देवता आप से खुश होते है व आप पर कृपा बरसातें हैं.https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 श्री गणेश मूल मंत्र ॐ गं गणपतये नमः ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः श्री सिद्धि विनायक गणेश मंत्र ॐ सिद्धि विनायकाय नमः श्री लक्ष्मी मंत्र विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं जगद्धिते अर्तिहंत्रि नमस्तुभ्यं समृद्धि कुरु में सदा श्री विष्णु मूल मन्त्र ॐ नमोः नारायणाय. ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ॐ श्री विष्णुवे नमः श्री विष्णु मन्त्र त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव श्री कृष्ण मंत्र ॐ श्री कृष्णाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्री राम मंत्र ॐ श्री रामचन्द्राय नमः श्री नरसिंह मंत्र ॐ श्री नरसिंहाय नमः श्री शिव मन्त्र ॐ नमः शिवाय प्राचीन शिव पंचाक्षरी मंत्र इस प्रकार है नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय भास्मंगारागाय महेश्वराय नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’काराय नमः शिवाय ।।1।। मन्दाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदिश्वाराय प्रमथानाथ महेश्वराय मंदारापुष्प बहुपुष्प सुपुजिताय तस्मै ‘म’काराय नमः शिवाय ।।2।। शिवाय गौरी वादानाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वार नशाकाय श्री निलाकंठाय वृषभध्वजाय तस्मै ‘शि’काराय नमः शिवाय।।3।। वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतामार्य मुनीन्द्र देवार्चिता शेखाराय चन्द्रार्कवैश्वनारा लोचनाय तस्मै ‘व’काराय नमः शिवाय।।4।। यक्षस्वरुपाय जटाधाराय पिनाकहस्ताय सनातनाय दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ‘य’काराय नमः शिवाय।।5।। श्री काली मंत्र ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते। श्री सरस्‍वती मंत् ॐ सरस्वत्यै नमः श्री दुर्गा मंत्र ॐ दुर्गायै नमः श्री हनुमान मंत्र मनोजवं मारुततुल्यवेगम्जितेन्दि्रयं बुद्धिमतां वरिष्थम्वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्री रामदूमं शरण प्रपद्ये सूर्य मंत्र आ कृष्णेन् रजसा वर्तमानो निवेशयत्र अमतं मर्त्य च हिरणययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन महामंत्र ।। शनि महामंत्र ॐ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम्।छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।। महालक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं ह्यीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्यीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मये नम:। धन लाभ व समृद्धि हेतु महालक्ष्मी मंत्र 1.ॐ सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धन धान्यः सुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॐ ।। 2. ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ । 3. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ।। कुबेर देव आराधना मंत्र 1.ॐ वैश्रवणाय स्वाहा। 2. ॐ श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:। 3.ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा। अष्टविनायक मंत्र मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान् गणेश के अनेकों अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। पहला अवतार भगवान् वक्रतुण्ड का है। वक्रतुण्ड वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः । मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावतार ‘ ब्रह्मरुप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला, मत्सरासुर का वध करने वाला तथा सिंह वाहन पर चलने वाला है एकदन्त एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः । मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः ।। भगवान् गणेश का ‘ एकदन्तावतार ‘ देहि – ब्रह्म का धारक है, वह मदासुर का वध करने वाला है. उनका वाहन मूषक बताया गया है. महोदर महोदर इति ख्यातो ज्ञानब्रह्मप्रकाशकः । मोहसुरस्य शत्रुर्वै आखुवाहनगः स्मृतः ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘ महोदर ’ नाम से विख्यात अवतार ज्ञान ब्रह्म का प्रकाशक है। उन्हें मोहासुर का विनाशक तथा उनका मूषक – वाहन बताया बताया गया है। गजानन गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्य सिद्धिदायकः । लोभासुरप्रहर्ता वै आखुगश्च प्रकीर्तितः ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘ गजानन ’ नामक अवतार सांख्यब्रह्म का धारण है। उसको सांख्य योगियों के लिए सिद्धिदायक जानना चाहिये। यह अवतार लोभासुर का संहारक तथा मूषक वाहन पर चलने वाला कहा गया है। लम्बोदर लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुर निबर्हणः ।शक्तिब्रह्माखुगः सद् यत् तस्य धारक उच्यते ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘ लम्बोदर ’ नामक अवतार सत्स्वरुप तथा शक्तिब्रह्म का धारक है। इनका भी वाहन मूषक है। विकट विकटो नाम विख्यातः कामासुरविदाहकः ।मयूरवाहनश्चायं सौरब्रह्मधरः स्मृतः । भगवान् श्रीगणेश का ‘ विकट ’ नामक प्रसिद्ध अवतार कामासुर का संहारक है। वह मयूर वाहन एवं सौरब्रह्म का धारक माना गया है। विघ्नराज विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्यते ।ममतासुर हन्ता स विष्णुब्रह्मेति वाचकः ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘ विघ्नराज ’ नामक अवतार विष्णु ब्रह्म का वाचक है। वह शेषवाहन पर चलने वाला तथा ममतासुर का संहारक है। धूम्रवर्ण धूम्रवर्णावतारश्चभिमानासुरनाशकः ।आखुवाहन एवासौ शिवात्मा तु स उच्यते ।। भगवान् श्रीगणेश का ‘ धूम्रवर्ण ’ नामक अवतार अभिमानासुर का नाश करने वाला है, वह शिवब्रह्म-स्वरुप है। उसे भी मूषक वाहन कहा गया है। कुछ लोग अपनी राशि के अनुसार भी मंत्र का जाप करते हैं. राशि के अनुसार मंत्र जाप यदि आप करना चाह्ते हैं तो मंत्र इस प्रकार हैं : मेष : ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम: वृषभ : ॐ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम: मिथुन : ॐ क्लीं कृष्णायै नम: कर्क : ॐ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम: सिंह : ॐ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम: कन्या : ॐ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम: तुला : ॐ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम: वृश्चिक : ॐ नारायणाय सुरसिंहायै नम: धनु : ॐ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम: मकर : ॐ श्रीं वत्सलायै नम: कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम: मीन : ॐ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम: ॥Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 हमसे कोई गलती हुई हो तो कृपया उसे नि:संकोच बताएं ताकि हम उसे सुधार सकें

Monday, 8 January 2018

गायत्री स्तोत्र माहात्म्य Gayatri Stotra mahatny,,श्री गायत्री शाप विमोचनम् Shri Gayatree Shap Vimochanam

गायत्री स्तोत्र माहात्म्य Gayatri Stotra mahatny

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557
भावार्थ: प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप अशा परमात्म्याला आम्ही अंतःकरणात धारण करतो. त्या परमात्म्या कडून आमची बुद्धी सन्मार्गी लागो
ॐ गायत्रीदेव्यै नमः॥ ॐ नमो श्रीगजवदना ॥ गणराया गौरीनंदना । विन्घेशा भवभयहरणा । नमन माझे साष्टांगीं ॥१॥
नंतर नमिली श्रीसरस्वती । जगन्माता भगवती । ब्रह्माकुमारी वीणावती । विद्यादात्री विश्र्वाची ॥२॥
नमन तैसें गुरुवर्या । सुखनिधान सद्‍गुरुराया । स्मरुनी त्या पवित्र पायां । चित्तशुद्धि जाहली ॥३॥
थोर ऋषिमुनी संतजन । बुधगण आणि सज्जन । करुनी तयांसी नमन । ग्रंथरचना आरंभिली ॥४॥
एकदां घडली ऐसी घटना । नारद भेटले सनकमुनींना । वंदन भावें करुनि तयांना । म्हणाले विनंती माझी ऎकावी ॥५॥
जपासाठीं असती मंत्र हजार । त्यांत अत्यंत प्रभावी थोर । ज्याचें सामर्थ्य अपरंपार । ऐसा मंत्र कोणता ॥६॥
तेव्हा म्हणाले सनकमुनी । नारदा तुझा प्रश्र्न ऎकोनी। समाधान झालें माझ्या मनीं । लोकोपयोगी प्रश्र्न हा ॥७॥
आतां ऎक लक्ष देऊन । त्वरित फलदायी मंत्रज्ञान । सफल होतील हेतु पूर्ण । ऐसा एकच मंत्र गायत्री ॥८॥
गायत्री ही मंत्रदेवता । सर्वश्रेष्ठा तिची योग्यता । तिंचे एकेक अक्षर जपतां । आत्मतेज प्रगटतें ॥९॥
गायत्रीमंत्राचें प्रत्येक अक्षर । प्रभाव पाडी सर्व गात्रांवार । देहाच्या एकेका अवयवावर । प्रत्यक्ष परिणाम घडतसे ॥१०॥
गायत्रीची नांवें अनेक असती । त्यांत असते दिव्य शक्ति । एकेका नामोच्चारानें ती । शरिरीं प्रगट होतसे ॥११॥
करीत असतां नामोच्चार । मनीं आणावा तिचा आकार । भक्तिपुर्वक करुनी नमस्कार । नामजप करावा तो ॥१२॥
ॐ काररुपा ब्रह्माविद्या ब्रह्मादेवता । सवित्री सरस्वती वेदमाता । अमृतेश्र्वरी रुद्राणी विक्रमदेवता । ॐ गायत्रीं नमो नमः ॥१३॥
वैष्णवी वेदगर्भा विद्यादायिका । शारदा विश्र्वभोक्त्री संध्यात्मिका । सुर्या , चंद्रा, ब्रह्माशीर्षका । ॐ गायत्रीं नमो नमः ॥१४॥
नारसिंही अघनाशिनी इंद्राणी । अंबिका पद्‍माक्षी रुद्ररुपिणी । सांख्यायनी सुरप्रिया ब्रह्माणी । ॐ गायत्रीं नमो नमः ॥१५॥
गायत्री तूं ब्रह्मांडघारिणी । गायत्री तूं ब्रह्मावादिनी । गायत्री तूं विश्र्वव्यापिनी । ॐ गायत्रीं नमो नमः ॥१६॥
ॐ भू: ऋग्वेदपुरुषं । ॐ भुव: यजुर्वेदपुरुषं । ॐ स्व: सामवेदपुरुषं । ॐ मह: अथर्वणवेदपुरुषं तपर्यामि ॥१७॥
ॐ जन: इतिहासपुराणपुरुषं । ॐ तप: सर्वांगपुरुषं । ॐ सत्यं सत्यलोकपुरुषं । त्वं ब्रह्माशापाद्विमुक्ता भव ॥१८॥
ॐ भू: भुर्लोकपुरुषं । ॐ भुव: भुवलोकपुरुषं । ॐ स्व: स्वर्लोकपुरुषं । त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव ॥१९॥
ॐ भू एकपदा गायत्रीं । ॐ भुव: द्विपदां गायत्रीं । ॐ स्व: त्रिपदां गायित्रीं । ॐ भूभुर्व स्व: चतुष्पदां गायित्रीं ॥२०॥
ॐ उषसीं तर्पयामि । ॐ गायत्रीं तर्पयामि । ॐ सावित्रीं तर्पयामि । तर्पयामि ॐ सरस्वतीं ॥२१॥
ॐ वेदमातरं तर्पयामि । ॐ पृथ्वीं तर्पयामि । ॐ अजां तर्पयामिअ । तर्पयामि ॐ कौशिकीं ॥२२॥
ॐ सांकृतिं तर्पयामि । ॐ सर्वजिनां तर्पयामि । ॐ गायत्रीत्रय तर्पयामि । त्व विश्र्वामित्रशापाद्विमुक्ता भव ॥२३॥
गायत्रीदेवी प्रात:काळीं । ऋग्वेदरुपा बालिका झाली ब्रह्मादेवाची शक्ति एकवटली । अपूर्व तेजें प्रकाशे ॥२४॥
हातीं कलश अक्षमाला । स्त्रकूस्त्रुवा धारण केला । मुखतेज लाजवी रविंचद्राला । हंसारुढ असते ती ॥२५॥
कंठी रन्तालंकार झगमगती । माणिबिंबांची शोभा अपूर्व ती । जी देतसे धनसंपत्ती । ध्यान तिचें करावें ॥२६॥
सावित्री नांव मध्यान्हकाळीं । तीच रुद्राणी शक्ति बनली । त्रिनेत्रा नवयौवना दिसली । व्याघ्रांबर धारिणी ॥२७॥
हातीं खट्‍वांग, त्रिशुळ,रुद्राक्षमाला । अभय मुद्रा मुगुटी चंद्रा शोभला । वृषभवाहन गौरवर्ण भला । यजुर्वेदस्वरुपा जी ॥२८॥
आयुष्य आणि ऎश्र्वर्यवृद्धी । देतसे सकल महासिद्धी । वाढवी सद्‍भावना सद्‍बुद्धी । साह्य करी ती सर्वांसी ॥२९॥
सायंकाळी तीच विष्णुशक्ति । पीतांबरधारी भगवती सरस्वती । श्यामलवर्णीं गरुडारुढ ती । रत्‍नहार कंठीं शोभती ॥३०॥
बाजुबंद, रत्‍नखचित नुपुर । सुवर्णकंकणें सौभाग्यलंकार । शंख , चक्र, गदा पद्ममय कर । श्रीवृद्धीकारक ती सर्वदा ॥३१॥
ब्राह्मामुहूर्तीं उठावें । बाह्माभ्यंतर शुचिर्भुत व्हावें । श्रीगायत्रीचें ध्यान करावें । स्वस्थ एकाग्र चिंत्तानें ॥३२॥
प्रथम करावा करन्यास । नंतर करावा अंगन्यास । मग पुर्ण प्राणायामास । प्रारंभ नीट करावा ॥३३॥
पूरकीं करणें विष्णुस्मरण । कुंभकीं करावें ब्रह्मास्मरण । रेचकीं करावें शिवध्यान । प्राणायन या नांव असे ॥३४॥
गायत्री जप करावा हजारदां । किंवा करावा शंभरदां । कमीतकमी तरी दहादां । महामंत्रजप करावा ॥३५॥
गायत्रीमंत्राचा जे जप करिती । तया चारी पुरुषार्थ साध्य होती । सर्वैंश्र्वर्य कीर्ती संपत्ती । आणि सिद्धि लाभती ॥३६॥
ज्योतिर्मय दिव्य रूपिणी । मंदमतीसी करिते महाज्ञानी । बल,यश,आयुरारोग्य देऊनी । पराक्रम जगीं गाजवी ॥३७॥
गायत्री मंत्रातील महाशक्ती । व्यक्त होते अव्यक्तीं । अपूर्व लाभते मन:शांति । पुर्ण समाधानी होतेसे ॥३८॥
म्हणुन हें देवर्षीं नारदा । गायत्री उपासना करावी सदा । मिळेल आत्मज्ञानसंपदा । सत्य सत्य वाचा ही ॥३९॥
गायत्रीहृदय गायत्रीतर्पण । गायत्रीकवच गायत्रीध्यान । सर्व पूजाविधी विसर्जन । नारदासी उपदेशिलें ॥४०॥
मग नारद संतुष्ट होऊन । सनकमुनींना करुनी वंदन । आपुल्या कार्यासी गेले निघून । जयजयकार करीत गायत्रीचा ॥४१॥
राजकारणी, समाजकारणी । साहित्यिकांनी विद्यार्थ्यांनी । सर्व स्थरातील गृहस्थानीं । गायत्रीमंत्र जपावा ॥४२॥
स्तोत्र-माहात्म्य गायत्रीचें । रुप पालटील आयुष्याचें । महत्व पटेल माझ्या शब्दांचे । अनुभवानेंच सर्वांना ॥४३॥
गायत्रीची यथार्थ स्तुति । तशीच तिची अपूर्व महती । ऎका आतां यापुढतीं । विनती मिलिंदमाधव ॥४४॥
गायत्री असे परम पुनिता । तींता वसतीए शास्त्रें , श्रुति, गीता । सत्वगुणी, चितरुपा,शाश्र्वता । सनातन, नित्य, सत्सुधा ॥४५॥
मंगलकरक जगज्जननी । सुखघाम, स्वघा, गायत्रीभवानी । सावित्री,स्वाहा,अपूर्वकरणी । मंत्र चौवीस अक्षरी ॥४६॥
ह्रीं , श्रीं, क्लीं, मेघा उदंड । जीवनज्योती महाप्रचंड । शांति, क्रांति , जागृति, अखंड । प्रगति, कल्पनाशक्ति ती ॥४७॥
हंसारुढ दिव्य वस्त्रघारी । सूवर्णकांती गगनाविहारी । कमल,कमंडलु,माला करीं । गौर तनु शोभते ॥४८॥
स्मरणें मन प्रसन्न होतें । दु:ख सरतें सुख उपजतें । कल्पतरुसम इच्छित देते । निराकार निर्गुणा ॥४९॥
गायत्री तुझी अद्‍भुत माया । सुरतरुसम शीतल छाया । भक्तांचे संकट हराया । सदा सिद्ध अससी तूं ॥५०॥
तूं काली लक्ष्मी सरस्वती । वेदमाता ब्रह्माणी पार्वती । तुजसम अन्य नसे त्रिजगतीं । कल्याणकारी देवता ॥५१॥
जयजय त्रिपदा भवभयहारी । ब्रह्मा विष्णु शिव तुझे पुजारी । अपार शक्तिची तुं त्रिरुपधारी । तेजोमय माता तूं ॥५२॥
ब्रह्मांडा , चंद्रसुर्यांना । नक्षत्रासीं , सकल ग्रहांना । तुच देसी गति प्रेरणा । उप्तादक ,पालक , नाशक तूं ॥५३॥
होते तव कृपा जयांवरी । तो जरी असला पापी भारी । तयाच्या पापाराशी दुरी । करिसी तूं क्षणांत ॥५४॥
निर्बुद्ध होई बुद्धिवंत । शक्तिहीन होई बलवंत । रोगी होतो व्याधीमुक्त । दरिद्र दु:ख न राही ॥५५॥
जप करितां गायत्रीचा । लेश न राही गृहक्लेशाचा । चित्तातील चिंताग्नीचा । र्‍हास होई झडकरी ॥५६॥
अपत्यहीनासी अपत्यप्रात्पी । सुखच्छुसी विपुल संपत्ती । सघवा अखंड सौभाग्यवती । होती गायत्रीकृपेनें ॥५७॥
सत्य व्रतस्थ पतिरहिता । तिजला लाभे विरक्तता । जन्माची होते सार्थकता । मोक्षलाभ होतसे ॥५८॥
विवाहेच्छू कुमारिकानीं । पिठाच्या पांच पणत्या पेटवुनी । बसावें पूर्वेकडे पुढा करुनी । चौवीस दिवस प्रभातीं ॥५९॥
मनकामना पूर्ण होऊनी । मना. सारखें येईल घडुनी । गायत्रीवरी श्रद्धा ठेवुनी । रोज ही पोथी वाचावी ॥६०॥
गायत्रीस्तोत्र हें गोड । माहात्म्यही अतीव गाढ । वाचतां ऎकतां प्रचंड । प्रभाव दिसुनी येतसे ॥६१॥
चौवीस वेळीं करावें वाचन श्रवण । चौवीस वेळां करावें मंत्रपठण । चौवीस जन्मींचें होतें पापक्षालन । महत्व ऐ या पोथीचें ॥६२॥
चौवीस वेळां करितां पारायण । गायत्रीदेवी होईल सुप्रसन्न । बोलवुनी सुवासिनी तीन । एक एक पोथी द्यावी ही ॥६३॥
प्रत्येक चौवीस दिवसांनी । अशाच पुजाव्या तीन सुवासिनी । प्रत्येकीस एक एक पोथी देऊनी । नमस्कार करावा ॥६४॥
देव आहे तसें दैवही असतें । पूर्वजन्मींचें त्यांत रहस्य असतें । हें न जाणतां मोठे जाणते । निरा शेनें देवभक्ती सोडिती ॥६५॥
काळ तेयां थोडा कठीण । देव न येई लगेच घावून । म्हणुनी देवासी दोष देऊन । श्रद्धा सोडूं नये कधीं ॥६६॥
गायत्रीची अट्टश्य शक्ती । प्रारब्धाची अनिष्ट गती । फिरवी तक्ताळ सत्य ती । विश्र्वास ऎसा धरावा ॥६७॥
योग्य काळ आल्यावीण । कोणतेंच कार्य न घडे जाण । म्हणुनी हातपाय गाळुन । स्वस्थ कधीम न बैसावें ॥६८॥
स्तोत्र-माहात्म्य हें वाचावें । साधुसंतांचें वचन ध्यानीं घ्यावें । स्वत:च स्वत:ला पारखावें । शुद्ध ज्ञानप्रकाशीं ॥६९॥
आत्माज्ञान नव्हे पोरखेळ । स्वत:ला पारखावें । यावी लागते योग्य वेळ । उगीच होऊनी उतावीळ । देवासी नच निंदावें ॥७०॥
मी तर एक मानव सामान्य । गुरुकृपेनें झालों धन्य धन्य । त्याच्याच प्रेरणेनें सुचलें ज्ञान । पोथीरूपें प्रगटलें तें ॥७१॥
कांहीं दोष गेला असेल राहून । तरी सज्जनांनी करावें थोर मन । क्षमा करावी कृपा करुनी । म्हणे मिलिंदमाधव ॥७२॥
शके अठराशे अठ्याण्णव वर्षीं पौष कृष्णप्रतिपदा दिवशीं । गुरुपुष्यामृत योगासी । पोथी पूर्ण झाली ही ॥७३॥
ॐ तत् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥शुभं भवतु ॥
ॐ शांति: शांति: शांतिः॥ ॐ भूर्भूव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भंगो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् मिलिंद माधवकृत 'गायत्री स्तोत्र-महात्म्य संपूर्ण
अघनाशक गायत्री स्तोत्र
आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि । सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसंध्ये ते नमोऽस्तु ते ॥
त्वमेव संध्या गायत्री सावित्रि च सरस्वती । ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा ॥
प्रातर्बाला च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः । वृद्धा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा ॥
हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहिनी । ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः ॥
यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते । सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि ॥
रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी ॥
सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा । शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा ॥
आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते । वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरर्व्णिनी ॥
गरिष्ठा च वराही च वरारोहा च सप्तमी । नीलगंगा तथा संध्या सर्वदा भोगमोक्षदा ॥
भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि ॥ त्रिलोकवाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी ॥
भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री शोकधारिणी । भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः ॥
महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि । तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक् ॥
कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकगा । रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धांगीनिवासिनी ॥
अहमो महतश्चैव प्रकृतिस्त्वं हि गीयसे । साम्यावस्थात्मिका त्वं हि शबलब्रह्मरूपिणी ॥
ततः परापरा शक्तिः परमा त्वं हि गीयसे । इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्रिशक्तिदा ॥
गंगा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती । सरयूर्देविका सिन्धुर्नर्मदेरावती तथा ॥
गोदावरी शतद्रुश्च कावेरी देवलोकगा । कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती ॥
गण्डकी तापिनी तोया गोमती वेत्रवत्यपि । इडा च पिंगला चैव सुषुम्णा च तृतीयका ॥
गांधारी हस्तिजिह्वा च पूषापूषा तथैव च । अलम्बुषा कुहूश्चैव शंखिनी प्राणवाहिनी ॥
नाडी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैर्बुधैः । हृतपद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका ॥
तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी । मूले तु कुण्डली शक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा ॥
शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रे तु मनोन्मनी । किमन्यद् बहुनोक्तेन यत्किंचिज्जगतीत्रये ॥
तत्सर्वं त्वं महादेवि श्रिये संध्ये नमोऽस्तु ते । इतीदं कीर्तितं स्तोत्रं संध्यायां बहुपुण्यदम् ॥
महापापप्रशमनं महासिद्धिविधायकम् । य इदं कीर्तयेत् स्तोत्रं संध्याकाले समाहितः ॥
अपुत्रः प्राप्नुयात् पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । सर्वतीर्थतपोदानयज्ञयोगफलं लभेत् ॥
भोगान् भुक्त्वा चिरं कालमन्ते मोक्षमवाप्नुयात् । तपस्विभिः कृतं स्तोत्रं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
यत्र कुत्र जले मग्नः संध्यामज्जनजं फलम् । लभते नात्र संदेहः सत्यं च नारद ॥
श्रृणुयाद्योऽपि तद्भक्त्या स तु पापात् प्रमुच्यते । पीयूषसदृशं वाक्यं संध्योक्तं नारदेरितम् ॥
इति श्रीअघनाशक गायत्री स्तोत्रं सम्पूर्णम्
श्री गायत्री शाप विमोचनम् Shri Gayatree Shap Vimochanam
शाप मुक्ता हि गायत्री चतुर्वर्ग फल प्रदा । अशाप मुक्ता गायत्री चतुर्वर्ग फलान्तका ॥
ॐ अस्य श्री गायत्री । ब्रह्मशाप विमोचन मन्त्रस्य । ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः ।
भुक्ति मुक्तिप्रदा ब्रह्मशाप विमोचनी गायत्री शक्तिः देवता । ब्रह्म शाप विमोचनार्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ गायत्री ब्रह्मेत्युपासीत यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः । तां पश्यन्ति धीराः सुमनसां वाचग्रतः ।
ॐ वेदान्त नाथाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमही । तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।
ॐ गायत्री त्वं ब्रह्म शापत् विमुक्ता भव ॥
ॐ अस्य श्री वसिष्ट शाप विमोचन मन्त्रस्य निग्रह अनुग्रह कर्ता वसिष्ट ऋषि । विश्वोद्भव गायत्री छन्दः ।
वसिष्ट अनुग्रहिता गायत्री शक्तिः देवता । वसिष्ट शाप विमोचनार्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ सोहं अर्कमयं ज्योतिरहं शिव आत्म ज्योतिरहं शुक्रः सर्व ज्योतिरसः अस्म्यहं ।(इति युक्त्व योनि मुद्रां प्रदर्श्य गायत्री त्रयं पदित्व)
ॐ देवी गायत्री त्वं वसिष्ट शापत् विमुक्तो भव ॥
ॐ अस्य श्री विश्वामित्र शाप विमोचन मन्त्रस्य नूतन सृष्टि कर्ता विश्वामित्र ऋषि । वाग्देहा गायत्री छन्दः ।
विश्वामित्र अनुग्रहिता गायत्री शक्तिः देवता । विश्वामित्र शाप विमोचनार्थे जपे विनियोगः ॥
ॐ गायत्री भजांयग्नि मुखीं विश्वगर्भां यदुद्भवाः देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीं इष्टकरीं प्रपद्ये ।
यन्मुखान्निसृतो अखिलवेद गर्भः । शाप युक्ता तु गायत्री सफला न कदाचन ।
शापत् उत्तरीत सा तु मुक्ति भुक्ति फल प्रदा ॥ प्रार्थना ॥ ब्रह्मरूपिणी गायत्री दिव्ये सन्ध्ये सरस्वती ।
अजरे अमरे चैव ब्रह्मयोने नमोऽस्तुते । ब्रह्म शापत् विमुक्ता भव । वसिष्ट शापत् विमुक्ता भव । विश्वामित्र शापत् विमुक्ता भव ॥
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Friday, 5 January 2018

संकष्टी चैतुर्थी सकट चौथा

संकष्टी चतुर्थी,, ,,प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते है


,,संकष्टी चतुर्थी 12 फरवरी (बुधवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.29 https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5
,,प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते है
और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। कहा जाता है कि जो श्रद्घालु चतुर्थी का व्रत कर श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। फिर माघी या तिल चौथ का तो विशेष महत्व है।माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ या वक्रतुण्ड चतुर्थी कहते हैं। संतान की लंबी आयु और आरोग्य के लिए इस दिन स्त्रियां व्रत रखती हैं। इस रोज गणपति के पूजन के साथ चंद्रमा को भी अघ्र्य दिया जाता है।
हालाँकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर महीने में होता है लेकिन सबसे मुख्य संकष्टी चतुर्थी पुर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ के महीने में पड़ती है और अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पौष के महीने में पड़ती है।
संकष्टी चतुर्थी अगर मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं और इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिल नाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है।
जो श्रद्घालु नियमित रूप से चतुर्थी का व्रत नहीं कर सकते यदि माघी चतुर्थी का व्रत कर लें, तो ही साल भर की चतुर्थी व्रत का फल प्राप्त हो जाता है। माघी तिल (तिल चौथ) चतुर्थी पर जहां गणेश मंदिरों में भक्तों का तांता लगेगा, वहीं मंदिरों मे विशेष आयोजन भी होंगे। श्रद्घालु लंबोदर के समक्ष शीश नवाएंगे और आशीष पाकर अपने संकटों को दूर करेंगे
माघी चौथ के अवसर पर गणेश मंदिरों में मनमोहक श्रृंगार होंगे तथा प्रसाद वितरण किया जाएगा। चतुर्थी का व्रत रख श्रद्घालु चंद्रदर्शन के बाद भोजन करेंगे। माघी चतुर्थी पर गणेश मंदिरों में तिल उत्सव मनेगा।
भगवान गणेश के भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से चन्द्रोदय तक उपवास रखते हैं। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं। भगवान गणेश जो ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च हैं, सभी तरह के विघ्न हरने के लिए पूजे जाते हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल जाती है।
संकष्टी चतुर्थी का उपवास कठोर होता है जिसमे केवल फलों, जड़ों (जमीन के अन्दर पौधों का भाग) और वनस्पति उत्पादों का ही सेवन किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, आलू और मूँगफली श्रद्धालुओं का मुख्य आहार होते हैं। श्रद्धालु लोग चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को तोड़ते हैं।
व्रतधारी श्रद्घालुओं को चंद्रदर्शन और गणेश पूजा के बाद व्रत समाप्त करना चाहिए। इसके अलावा पूजा के समय भगवान गणेश के इन बारह नामों का जाप करने से फल अवश्य मिलता है।
विशेष 01 . माघी चतुर्थी का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने वाले श्रद्घालुओं की समस्त मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
सुबह गणेश पूजा करें।
पूजा के साथ यदि अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाए तो अति उत्तम।
गणेश द्वादश नामावली का पाठ करें
दिन में अथवा गोधूली वेला में गणेश दर्शन अवश्य करें।
शाम को सहस्र मोदक या स्वेच्छानुसार लड्डुओं का भोग अर्पित करें।
सहस्र दुर्वा अर्पण करें
हो सके तो सहस्र मोदक से हवन अवश्य करें।
विशेष 02 . विनायक पूजा और उपासना कार्य बाधा और जीवन में आने वाली शत्रु बाधा को दूर कर शुभ व मंगल करती है। यही कारण है हर माह के शुक्ल पक्ष को विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश की उपासना कार्य की सफलता के लिए बहुत ही शुभ मानी गई है। यहां जानते हैं विनायक चतुर्थी के दिन श्री गणेश उपासना का एक सरल उपाय, जो कोई भी अपनाकर हर कार्य को सफल बना सकता है –
चतुर्थी के दिन, बुधवार को सुबह और शाम दोनों ही वक्त यह उपाय किया जा सकता है।
स्नान कर भगवान श्री गणेश को कुमकुम, लाल चंदन, सिंदूर, अक्षत, अबीर, गुलाल, फूल, फल, वस्त्र, जनेऊ आदि पूजा सामग्रियों के अलावा खास तौर पर 21 दूर्वा चढ़ाएं। दूर्वा श्री गणेश को विशेष रूप से प्रिय मानी गई है।
विनायक को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें। जानते हैं ये मंत्र
ॐ गणाधिपाय नम:। ॐ विनायकाय नम:। ॐ विघ्रनाशाय नम:। ॐ एकदंताय नम:। ॐ उमापुत्राय नम:। ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम:।ॐ ईशपुत्राय नम:। ॐ मूषकवाहनाय नम:। ॐ इभवक्त्राय नम:। ॐ कुमारगुरवे नम:।- ॐ गं गौं गणपतये विघ्रविनाशिने स्वाहा।
मंत्रों के साथ पूजा के बाद यथाशक्ति मोदक का भोग लगाएं। 21 मोदक का चढ़ावा श्रेष्ठ माना जाता है।
मंत्र जप के बाद भगवान गणेश की आरती गोघृत यानी गाय के घी के दीप और कर्पूर से करें।
अंत में भगवान गणेश से हर पीड़ा, दु:ख, संकट, भय व बिघ्न का अंत करने की प्रार्थना कर सफलता की कामना करें। यह मंत्र जप किसी भी प्रतिकूल या संकट की स्थिति में पवित्र भावना से स्मरण करने पर शुभ फल देता है।
अंत में श्री गणेश आरती कर क्षमा प्रार्थना करें। कार्य में विघ्र बाधाओं से रक्षा की कामना करें।
जानिए चिंतामण गणेश के बारह नाम
1 वक्रतुंड 2 एकदंत 3,, कृष्णपिंगाक्ष 4,, गजवक्त्र 5,, लंबोदर
6,, विकट 7,,, विघ्नराज 8,, धूम्रवर्ण 9,, भालचंद्र 10,,विनायक 11,, गणपति 12,, गजानंद।
॥।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
चन्द्रोदय का समय
12 फरवरी (बुधवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.29
12मार्च (बृहस्पतिवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.17
11 अप्रैल (शनिवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 22.08
10 मई (रविवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.54
08 जून (सोमवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21,32
08 जुलाई (बुधवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 21.42
07 अगस्त (शुक्रवार) संकष्टी चतुर्थी बहुला चतुर्थी चन्द्रोदय 21.27
05 सितम्बर (शनिवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 20.32
05 अक्टूबर (सोमवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 20.16
04 नवम्बर (बुधवार) संकष्टी चतुर्थी करवा चौथ चन्द्रोदय 20.22
03 दिसम्बर (बृहस्पतिवार) संकष्टी चतुर्थी चन्द्रोदय 20,01

Wednesday, 3 January 2018

श्री अष्टविनायक मंत्र,,Ashta Vinayak Mantra

श्री अष्टविनायक मंत्र,,Ashta Vinayak Mantra
अष्टविनायक नमो नमः हे अष्टविनायक तेरी जय जयकार !हे गणनायक !https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 तेरी जय जयकार !हे गौरी सुत ! हे शिव नंदन !तेरी महिमा अपरम्पारहे अष्टविनायक तेरी जय जयकार !प्रथम विनायक वक्रतुंड है सिंह सवारी करता ;मत्सर असुर का वध कर दानव भगवन पीड़ा सबकी हरता ,हे गणेश तेरी जय जयकार !हे शुभेश तेरी जय जयकार !द्वितीय विनायक एकदंत मूषक की करें सवारी ;मदासुर का वध कर हारते विपदा सबकी भारी ,हे गजमुख तेरी जय जयकार हे सुमुख तेरी जय जयकार .नाम महोदर तृतीय विनायक मूषक इनका वाहन ; मोहसुर का नाश ये करते इनकी महिमा पावन ,हे विकट तेरी जय जयकार !हे कपिल तेरी जय जयकार !चौथे रूप में प्रभु विनायक धरते नाम गजानन ;लोभासुर संहारक हैं ये मूषक इनका वाहन ,हे गजकर्णक तेरी जय जयकार !हे धूम्रकेतु तेरी जय जयकार !प्रभु विनायक पंचम रूप लम्बोदर का धरते ;करें सवारी मूषक की क्रोधासुर दंभ हैं हरते ,हे गणपति तेरी जय जयकार !
हे गजानन तेरी जय जयकार ! विकट नाम के षष्टविनायक सौर ब्रह्म के धारक ;है मयूर वाहन इनका ये कामासुर संहारक ,हे गणाध्यक्ष तेरी जय जयकार !हे अग्रपूज्य तेरी जय जयकार !विघ्नराज अवतार प्रभु का सप्तम आप विनायक ;वाहन शेषनाग है इनका ममतासुर संहारक ,हे विघ्नहर्ता तेरी जय जयकार !हे विघ्ननाशक तेरी जय जयकार !धूम्रवर्ण हैं अष्टविनायक शिव ब्रह्म रूप प्रभु का ;अभिमानासुर संहारक मूषक वाहन है इनका ,हे महोदर तेरी जय जयकार ! हे लम्बोदर तेरी जय जयकार !!!! Astrologer Gyanchand Bundiwal. Nagpur । M.8275555557 !!!

श्री गणपती चालीसा

श्री गणपती चालीसा 1

दोहा,जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 चौपाई..जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥३ राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥४ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥५ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥६ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥७ ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥८ कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥९ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।१० भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥११ अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥१२ अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥१३ मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥१४ गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥१५ अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥१६ बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥१७ सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥१८ शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥१९ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥२० निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥२१ गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥२२ कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥२३ नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥२४ पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥२५ गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥२६ हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥२७ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥२८ बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥२९ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥३० बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥३१ चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥३२ धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥३३ चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥३४ तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥३५ मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥३६ भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा॥३७ अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥३८ श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।३९ नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥४० दोहा सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥ श्री गणपती चालीसा 2 दोहा,,मंगलमय मंगल करन, करिवर वदन विशाल। विघ्न हरण रिपु रूज दलन, सुमिरौ गिरजा लाल॥ चौपाई जय गणेश बल बुद्दि उजागर। व्रक्तुन्द विद्या के सागर॥१ शम्भ्पूत सब जग से वन्दित। पुलकित बदन हमेश अनंदित॥२ शांत रूप तुम सिंदूर बदना। कुमति निवारक संकट हरना॥३ क्रीट मुकुट चंद्रमा बिराजै। कर त्रिशूल अरु पुस्तक राजै॥४ ॠद्दि सिद्दि के हे प्रिय स्वामी। माता पिता माता पिता वचन अनुगामी॥५ भावे मूषक की असवारी। जिनको उनकी है बलिहारी॥६ तुम्हरो नाम सकल नर गावै। कोटि जन्म के पाप नसावै॥७ सब मे पूजना प्रथम तुम्हारा। अचल अमर प्रिय नाम तुम्हारा॥८ भजन दुखी नर जो हैं करते। उनके संकट पल मे हरते॥ अहो षडानन के प्रिय भाई। थकी गिरा तव महिमा गाई॥१० गिरिजा ने तुमको उपजायो। वदन मैल तै अंग बनायो॥११ द्वार पाल की पदवी सुंदर। दिन्ही बैठायो ड्योडी पर॥१२ पिता शम्भू तब तप कर आए। तुम्हे देख कर अति सकुचाये॥१३ पूछैउं कौन कह्ना ते आयो। तुम्हे कौन एहि थल बैठायो॥१४ बोले तुम पार्वती लाल ह्नूं। इस ड्योडी का द्वारपाल ह्नूं॥१५ उनने कहा उमा का बालक। हुआ नही कोई कुल पालक॥१६ तू तेहि को फिर बालक कैसो। भ्रम मेरे मन में है ऐसो॥१७ सुन कर वचन पिता के बालक। बोले तुम मैं ह्नू कुलपालक॥१८ या मैं तनिक न भ्रम ही कीजे। कान वचन पर मेरे दीजे॥१९ माता स्नान कर रही भीतर। द्वारपाल सुत को थापित कर॥२० सो छिन में यही अवसर अइहै। प्रकट सफल सन्देह मिटाइहै॥२१ सुन कर शिव ऐसे तब वचना। ह्रदय बीच कर नई कल्पना॥२२ जाने के हित चरण बढाये। भीतर आगे तब तुम आये॥२३ बोले तात न पाँव उठाओ। बालक से जी न रार बढाओं॥२४ क्रोधित शिव ने शूल उठाया। गला काट कर पाँव बढाया॥२५ गए तुम गिरिजा के पास। बोले कहां नारी विश्वास॥२६ सुत कसे यह तुमने जायो। सती सत्य को नाम डुबायो॥२७ तब तव जन्म उमा सब भाखा। कुछ न छिपाया शंभु सन राखा॥२८ सुन गिरिजा की सकल कहानी। हँसे शम्भु माया विज्ञानी॥२९ दूत भद्र मुख तुरंत पठाये। हस्ती शीश काट सो लाये॥३० स्थापित कर शिव सो धड़ ऊपर। किनी प्राण संचार नाम धर॥३१ गणपति गणपति गिरिजा सुवना। प्रथम पूज्य भव भयरूज दहना॥३२ साई दिवस से तुम जग वन्दित। महाकाय से तुष्ट अनन्दित॥३३ पृथ्वी प्रद्क्षिणा दोउ दीन्ही। तहां षडानन जुगती कीन्ही॥३४ चढि मयूर ये आगे आगे। व्रक्तुन्द सो तुम संग भागे॥३५ नारद तब तोहिं दिय उपदेशा। रहनो न संका को लवलेसा॥३६ मातापिता की फेरी कीन्ही। भू फेरी कर महिमा लीन्ही॥३७ धन्य धन्य मूषक असवारी। नाथ आप पर जग बलिहारी॥३८ डासना पी नित कृपा तुम्हारी। रहे यही प्रभू इच्छा भारी॥३९ जो श्रधा से पढे ये चालीस। उनके तुम साथी गौरीसा॥४० दोहा शंबू तनय संकट हरन, पावन अमल अनूप। शंकर गिरिजा सहित नित, बसहु ह्रदय सुख भूप। श्री गणपती चालीसा 3 दोहा,जय जय जय वंदन भुवन, नंदन गौरिगणेश । दुख द्वंद्वन फंदन हरन,सुंदर सुवन महेश ॥ चौपाई,,जयति शंभु सुत गौरी नंदन । विघ्न हरन नासन भव फंदन ॥ जय गणनायक जनसुख दायक । विश्व विनायक बुद्धि विधायक ॥ एक रदन गज बदन विराजत । वक्रतुंड शुचि शुंड सुसाजत ॥ तिलक त्रिपुण्ड भाल शशि सोहत । छबि लखि सुर नर मुनि मन मोहत ॥ उर मणिमाल सरोरुह लोचन । रत्न मुकुट सिर सोच विमोचन ॥ कर कुठार शुचि सुभग त्रिशूलम् । मोदक भोग सुगंधित फूलम् ॥ सुंदर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ धनि शिव सुवन भुवन सुख दाता । गौरी ललन षडानन भ्राता ॥ ॠद्धि सिद्धि तव चंवर सुढारहिं । मूषक वाहन सोहित द्वारहिं ॥ तव महिमा को बरनै पारा । जन्म चरित्र विचित्र तुम्हारा ॥ एक असुर शिवरुप बनावै । गौरिहिं छलन हेतु तह आवै ॥ एहि कारण ते श्री शिव प्यारी । निज तन मैल मूर्ति रचि डारि ॥ सो निज सुत करि गृह रखवारे । द्धारपाल सम तेहिं बैठारे ॥ जबहिं स्वयं श्री शिव तहं आए । बिनु पहिचान जान नहिं पाए ॥ पूछ्यो शिव हो किनके लाला । बोलत भे तुम वचन रसाला ॥ मैं हूं गौरी सुत सुनि लीजै । आगे पग न भवन हित दीजै ॥ आवहिं मातु बूझि तब जाओ । बालक से जनि बात बढ़ाओ ॥ चलन चह्यो शिव बचन न मान्यो । तब ह्वै क्रुद्ध युद्ध तुम ठान्यो ॥ तत्क्षण नहिं कछु शंभु बिचारयो । गहि त्रिशूल भूल वश मारयो ॥ शिरिष फूल सम सिर कटि गयउ । छट उड़ि लोप गगन महं भयउ ॥ गयो शंभु जब भवन मंझारी । जहं बैठी गिरिराज कुमारी ॥ पूछे शिव निज मन मुसकाये । कहहु सती सुत कहं ते जाये ॥ खुलिगे भेद कथा सुनि सारी । गिरी विकल गिरिराज दुलारी ॥ कियो न भल स्वामी अब जाओ । लाओ शीष जहां से पाओ ॥ चल्यो विष्णु संग शिव विज्ञानी । मिल्यो न सो हस्तिहिं सिर आनी ॥ धड़ ऊपर स्थित कर दीन्ह्यो । प्राण वायु संचालन कीन्ह्यो ॥ श्री गणेश तब नाम धरायो । विद्या बुद्धि अमर वर पायो ॥ भे प्रभु प्रथम पूज्य सुखदायक । विघ्न विनाशक बुद्धि विधायक ॥ प्रथमहिं नाम लेत तव जोई । जग कहं सकल काज सिध होई ॥ सुमिरहिं तुमहिं मिलहिं सुख नाना । बिनु तव कृपा न कहुं कल्याना ॥ तुम्हरहिं शाप भयो जग अंकित । भादौं चौथ चंद्र अकलंकित ॥ जबहिं परीक्षा शिव तुहिं लीन्हा । प्रदक्षिणा पृथ्वी कहि दीन्हा ॥ षड्मुख चल्यो मयूर उड़ाई । बैठि रचे तुम सहज उपाई ॥ राम नाम महि पर लिखि अंका । कीन्ह प्रदक्षिण तजि मन शंका ॥ श्री पितु मातु चरण धरि लीन्ह्यो । ता कहं सात प्रदक्षिण कीन्ह्यो ॥ पृथ्वी परिक्रमा फल पायो । अस लखि सुरन सुमन बरसायो ॥ सुंदरदास राम के चेरा । दुर्वासा आश्रम धरि डेरा ॥ विरच्यो श्रीगणेश चालीसा । शिव पुराण वर्णित योगीशा ॥ नित्य गजानन जो गुण गावत । गृह बसि सुमति परम सुख पावत ॥ जन धन धान्य सुवन सुखदायक । देहिं सकल शुभ श्री गणनायक ॥ दोहा श्री गणेश यह चालिसा,पाठ करै धरि ध्यान । नित नव मंगल मोद लहि,मिलै जगत सम्मान ॥ द्धै सहस्त्र दस विक्रमी, भाद्र कृष्ण तिथि गंग । पूरन चालीसा भयो, सुंदर भक्ति अभंग ॥ ॥।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557

श्री गणपती आरती 1.नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें

श्री गणपती आरती 1.नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें
नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें । लाडू मोदक अन्नें परिपूरित पातें । ऐसें पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रें ।https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5।,,,,,,,,,,,Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557 अष्टहि सिद्धी नवनिधि देसी क्षणमात्रें ॥१॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती । तुझे गुण वर्णाया मज कैंची स्फूर्ती ॥ ध्रु० ॥ तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती । त्यांची सकलहि पापें विघ्नेंही हरती ॥ वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती । सर्वहि पावुनि अंती भवसागर तरती ॥ जय देव० ॥ २ ॥ शरणागत सर्वस्वे भजती तव चरणीं । कीर्ति तयांची राहे जोंवर शाशितरणी ॥ त्रैयोक्यों ते विजयी अद्भुत हे करणी । गोसावीनंदन रत नामस्मरणीम ॥ जय देव जय देव० ॥३॥
2.शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुखको शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुखको । दोंंदिल लाल बिराजे सुत गौरीहरको ॥ हाथ लिये गुडलड्डू साई सुरवरको । महिमा कहे न जाय लागत हूँ पदको ॥१॥ जय जयजी गणराज विद्या सुखदाता । धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता ॥ ध्रु० ॥ अष्टी सिद्धी दासी संकटको बैरी । विघ्नविनाशन मंगलमूरत अधिकाई ॥ कोटीसुरजप्रकाश ऐसी छबि तेरी । गंडस्थलमदमस्तक झुले शशिबहारी ॥जय० ॥२॥ भावभगतिसे कोई शारणागत आवे । संतति संपति सबही भरपूर पावे । ऐसे तुम महाराज मोको अति भवे । गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे ॥ जय० ॥३॥ 3.तूं सुखकर्ता तूं दुःखकर्ता विघ्नविनाशक मोरया तूं सुखकर्ता तूं दुःखकर्ता विघ्नविनाशक मोरया । संकटीं रक्षीं शरण तुला मी, गणपतीबाप्पा मोरया ॥ ध्रु० ॥ मंगलमूर्ति तूं गणनायक । वक्रतुंड तूं सिद्धिविनायक ॥ तुझिया द्वारीं आज पातलों । नेईं स्थितिप्रति राया ॥ संकटीं० ॥१॥ तूं सकलांचा भाग्यविधाता । तूं विद्येचा स्वामी दाता ॥ ज्ञानदीप उजळून आमुचा । निमवीं नैराश्याला ॥ संकटीं० ॥२॥ तूं माता, तुं पिता जगं या । ज्ञाता तूं सर्वस्व जगीं या ॥ पामर मी स्वर उणें भासती । तुझी आरती गाया ॥ संकटीं ३॥ मंगलमूर्ति मोरया । गणपतीबाप्पा मोरया 4.जय देव जय देव जय वक्रतुंडा जय देव जय देव जय वक्रतुंडा । सिंदुरमंडित विशाल सरळ भुजदंडा ॥ ध्रु० ॥ प्रसन्नभाळा विमला करिं घेउनि कमळा । उंदिरवाहन दोंदिल नाचसि बहुलीळा ॥ रुणझुण रुणझुण करिती घागरिया घोळा । सताल सुस्वर गायन शोभित अवलीळा ॥ जय देव० ॥ १ ॥ सारीगमपधनी सप्तस्वरभेदा । धिमिकिट धिमिकिट मृदंग वाजति गतिछंदा ॥ तातक तातक थैय्या करिसी आनंदा । ब्रह्मादिक अवलोकिती तव पदारविंदा ॥ जय देव० ॥ २ ॥ अभयवरदा सुखदा राजिवदलनयना । परशांकुशलड्डूधर शोभितशुभरदना ॥ ऊर्ध्वदोंदिल उंदिर कार्तिकेश्वर रचना । मुक्तेश्वर चरणांबुजिं अलिपरि करिं भ्रमणा ॥ जय देव जय देव जय वक्र० ॥ ३ ॥ 5. सुखकर्ता दु:खहर्ता || सुखकर्ता दु:खहर्ता वार्ता विघ्नाची | नुरवी पुरव प्रेम कृपा जयाची | सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची | कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ||१|| जयदेव जयदेव जय मंगलमुर्ती | दर्शनमात्रे मनःकामना पुरती ||ध्रु.|| रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा | चंदनाची उटी कुंकमकेशरा || हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा | रुणझुणती नुपुरे चरणी घागरिया ||२|| लंबोदर पीतांबर फणिवरवंदना | सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना | दास रामाचा वाट पाहे सदना | संकष्टी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना ||३|| ।'Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

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