Friday, 17 May 2013

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे,,,बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ भावार्थ : निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथाअहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरणसे इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥

सूर्याय नमः

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमःॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
सूर्य गायत्री : ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात।
सूर्य बीज मंत्र : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ॐ सूर्याय नम:
सूर्य जप मंत्र : ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम: सूर्य के आदित्य मंत्र
विनियोग : ॐ आकृष्णेनि मंत्रस्य हिरण्यस्तूपांगिरस ऋषि स्त्रिष्टुप्छंद: सूर्यो देवता सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:,देहांगन्यास : आकृष्णेन शिरसि, रजसा ललाटे, वर्तमानो मुखे, निवेशयन हृदये, अमृतं नाभौ, मर्त्यं च कट्याम, हिरण्येन सविता ऊर्व्वौ, रथेना जान्वो:, देवो याति जंघयो:, भुवनानि पश्यन पादयो:
करन्यास : आकृष्णेन रजसा अंगुष्ठाभ्याम नम:, वर्तमानो निवेशयन तर्जनीभ्याम नम:, अमृतं: मर्त्यं च मध्यामाभ्याम नम:, हिरण्ययेन अनामिकाभ्याम नम:, सविता रथेना कनिष्ठिकाभ्याम नम:, देवो याति भुवनानि पश्यन करतलपृष्ठाभ्याम नम:
हृदयादिन्यास : आकृष्णेन रजसा हृदयाय नम:, वर्तमानो निवेशयन शिरसे स्वाहा, अमृतं मर्त्यं च शिखायै वषट, हिरण्येन कवचाय हुम, सविता रथेना नेत्रत्र्याय वौषट, देवो याति भुवनानि पश्यन अस्त्राय फ़ट (दोनों हाथों को सिर के ऊपर घुमाकर दायें हाथ की पहली दोनों उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें।)
ध्यानम : पदमासन: पद मकरो द्विबाहु: पद मद्युति: सप्ततुरंगवाहन: । दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विद्धातु देव:

परशुराम जयंती

परशुराम जयंती,,, वैशाख शुक्ल द्वितीया को परशुराम जयंती है । इस उपलक्ष्यमें भगवान परशुरामसे संबंधित,,परशुरामकी कथाएं रामायण, महाभारत एवं कुछ पुराणोंमें पाई जाती हैं । पूर्वके अवतारोंके समान इनके नामका स्वतंत्र पुराण नहीं है ।
अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।
अर्थ : चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष्य-बाण है अर्थात् शौर्य है । अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।
मूर्ति : भीमकाय देह, मस्तकपर जटाभार, कंधेपर धनुष्य एवं हाथमें परशु, ऐसी होती है परशुरामकी मूर्ति ।
पूजाविधि: परशुराम श्रीविष्णुके अवतार हैं, इसलिए उन्हें उपास्य देवता मानकर पूजा जाता है । वैशाख शुक्ल तृतीयाकी परशुराम जयंती एक व्रत और उत्सवके तौरपर मनाई जाती है 

परशुराम के अवतार हुए इसीलिए इस दिन इनकी जयंती मनाई जाती है। 
अक्षय तृतीया का भगवान परशुराम के अवतार से संबंध होने से यह पर्व राष्ट्रीय शासन व्यवस्था के लिए भी एक विशेष स्मरणीय एवं चिंतनीय पर्व है। दस महाविद्याओं में भगवती पीतांबरा (बगलामुखी) के अनन्य साधक परशुरामजी ने अपनी शक्ति का प्रयोग सदैव कुशासन के विरुद्ध किया। निर्बल और असहाय समाज की रक्षा के लिए उनका कुठार अत्याचारी कुशासकों के लिए काल बन चुका था।

अधर्मी कार्तवीर्य (सहस्रबाहु) जिसने परशुरामजी के पिता महर्षि जमदग्नि को मारा था, उसका वध कर उसकी राजसत्ता को परशुरामजी ने छिन्न-भिन्न कर दिया। आज लोग किसी भी जीत को प्रकट करने के लिए जिन दो उंगलियों को उठाकर विजय मुद्रा का प्रदर्शन करते हैं वह परशुरामजी की विजय मुद्रा की नकल मात्र है। भगवान परशुराम की इस विजय मुद्रा के कई भाव हैं। इसका इसका एक भाव है, जो शासक जीव और परमात्मा में अंतर समझते हैं उनका मैंने मर्दन किया है। 

दूसरा यह कि मनसुख और धर्मविमुख राजाओं को यह समझ लेना चाहिए कि या तो जनक की तरह निर्गुण निराकार ब्रह्म को जानने वाले तत्वज्ञानी राजा बनो या महाराजा दशरथ आदि की तरह सगुण साकार ब्रह्म को स्वीकार करो। अवैदिक अमर्यादित राजा मेरे कुठार से बच नहीं सकते इसीलिए उन्होंने तर्जनी और मध्यमा दो उंगलियों को प्रदर्शित कर ‍तात्विक विजय मुद्रा का प्रदर्शन किया। 

इसीलिए पुराणों में कहीं भी कौशल नरेश महाराजा दशरथ और मिथिला नरेश महाराज जनक के साथ परशुरामजी के मनमुटाव के उदाहरण नहीं दिखते। 

श्रीराम द्वारा धनुष तोड़ने के बाद समस्त राजाओं की दुरभिसंधि हुई कि श्रीराम ने धनुष तो तोड़ लिया है लेकिन इन्हें सीता स्वयंवर से रोकना होगा। अत: अपनी-अपनी सेनाओं की टु‍कड़ियों के साथ धनुष यज्ञ में आए समस्त राजा एकजुट होकर श्रीराम से युद्ध के लिए कमर कसकर तैयार हो गए। धनुष यज्ञ गृहयुद्ध में बदलने वाला था, ऐसी विकट स्थि‍ति में वहां अपना फरसा लहराते हुए परशुरामजी प्रकट हो जाते हैं। 

वे राजा जनक से पूछते हैं कि तुरंत बताओ कि यह शिव धनुष किसने तोड़ा है अन्यथा जितने भी राजा यहां बैठे हैं मैं क्रमश: उन्हें अपने परशु की भेंट चढ़ाता हूं। तब श्रीराम विनम्र भाव से कहते हैं- हे नाथ, शंकर के धनुष को तोड़ने वाला कोई आपका ही दास होगा। परशुराम-राम संवाद के बीच में ही लक्ष्मण उत्तेजित हो उठे। विकट लीला प्रारंभ हो गई। संवाद चलते रहे। लीला आगे बढ़ती रही। 
परशुरामजी ने श्रीराम से कहा- अच्‍छा, मेरे विष्णु धनुष में तीर चढ़ाओ। तीर चढ़ गया, परशुरामजी ने प्रणाम किया और कहा- मेरा कार्य अब पूरा हुआ, आगे का कार्य करने के लिए श्रीराम आप आ गए हैं। गृहयुद्ध टल गया। सारे राजाओं ने श्रीराम को अपना सम्राट मान लिया, भेंट पूजा की एवं अपनी-अपनी राजधानी लौट गए। 

श्रीराम के केंद्रीय शासन नियमों से धर्मयुक्त राज्य करने लगे। देश में शांति छाने लगी। अब श्रीराम निश्चिंत थे, क्योंकि उन्हें तो देश की सीमाओं के पार संचालित आतंक के खिलाफ लड़ना था इसीलिए अयोध्या आते ही वन को चले गए। पंचवटी में लीला रची गई, लंका कूच हुआ। रावण का कुशासन समाप्त हुआ। राम राज्य की स्थापना हुई। अत: रामराज्य की भूमिका तैयार करने वाले भगवान परशुराम ही थे।



अक्षय तृतीया आखा तीज


अक्षय तृतीया या आखा तीज 14 अप्रैल  2021 को 
अक्षय तृतीया वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया कहते हैं।  
ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अगर किसी कार्य का शुभारंभ किया जाए तो वह कार्य कभी समाप्त नहीं होता। केवल कार्य ही नहीं, जो भौतिक संसाधन भी इस अवधि में जुटाए जाएं वे भी हमारे जीवन में चिर स्थाई हो जाते हैं। इस तिथि का कुछ लोगों यह भी सदुपयोग किया है कि वे इस दिन दान पुण्य करते हैं, ताकि उनके किए दान अक्षय हो जाएं।

ऐसे में अक्षय तृतीया के दिन नया काम शुरू करने, नए भौतिक संसाधन जैसे बरतन, सोना, चांदी और अन्य कीमती वस्तुएं, विवाह और दान पुण्य करने का रिवाज बन गया है।

चूंकि यह दिन अपने आप में महत्वपूर्ण है, अत: इस पूरे दिन को अपने आप में अबूझ मुहुर्त कहा गया है, इस दिन न तो राहुकाल देखा जाता है, न चौघडि़या और न ही होरा, पूरे दिन में कभी भी किसी भी समय शुभ कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। हमारे बीकानेर में अक्षय तृतीय के दिन जमकर पतंगबाजी होती है, और मेरे जैसे कुछ लोग छतों पर चढ़कर पतंगों की उड़ान से हवा की दिशा ज्ञात कर आने वाले साल में मानसून कैसा रहेगा, यह तय करने का प्रयास करते हैं।   

आप सभी को अक्षय तृतीय की ढेरों शुभकामनाएं। नए वस्त्र खरीदिए, मांगलिक कार्य कीजिए, कीमती आभूषण खरीदिए और दान पुण्य कीजिए, सभी कुछ अक्षय रहे इस कामना के साथ।

प्रचलित मान्यताएं 
पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप–तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने–अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया के दिन क्या करें  
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है। ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन–जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।

सतयुग और त्रेता का आरंभ बिंदू 
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर–नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया 41 घटी 21 पल होती है तथा धर्म सिंधु एवं निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार अक्षय तृतीया 6 घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

व्रत कथाएं
एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी–देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म–कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी–पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी–पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

जैन धर्म में महत्व
जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी–गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते–करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।

भगवान श्री आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस की तपस्या के पश्चात पारायण किया था। यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी अत: जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है। तपस्या आरंभ करने से पूर्व इस बात का पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि प्रति मास की चौदस को उपवास करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का वर्षीतप करीबन 13 मास और 10 दिन का हो जाता है। उपवास में केवल गर्म पानी का सेवन किया जाता है।

मांगलिक कार्य इस दिन से शादी–ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े–बुजुर्ग अपने पुत्र–पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति–रिवाज के साथ अपने गुड्डा–गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ–साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत–प्रतिशत सत्य होते हैं। 

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक बडी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव–घर और कुटुंब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुंड बनाकर घर–घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर ख़रबूज़ा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरंभ किसानों को समृद्धि देता है।

पहले समझते हैं कि तिथि क्या है, सूर्य और चंद्रमा की निश्चित कोणीय दूरी को एक तिथि कहा जाता है। यही कारण है कि अंग्रेजी कलेण्डर में जब दिन जारी रहता है, तभी तिथि समाप्त हो जाती है अथवा अंग्रेजी कलेण्डर में तारीख वही रहती है और तिथि बदल जाती है।

इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि किसी तिथि का लोप हो जाता है तो किसी तिथि की वृद्धि हो जाती है। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि सनातन कलेण्डर के अनुसार एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच की अवधि को एक दिन कहा जाता है। अगर कोई तिथि एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच ही समाप्त हो जाती है, तो उसे तिथि का लोप होना कहते हैं और अगर एक दूसरे दिन के सूर्योदय के बाद भी तिथि जारी रहती है तो उसे तिथि वृद्धि होना कहा जाता है।

सूर्य और चंद्रमा के कोणीय संबंधों में अक्षय तृतीया एक ऐसा बिंदू है, जहां यह संबंध बिल्कुल सटीक होता है, और सूर्योदय के साथ तिथि का उदय होता है और अगले दिन सूर्योदय से पहले तिथि समाप्त हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अक्षय तृतीया ऐसी तिथि है, जिसमें कभी वृद्धि अथवा लोप नहीं होता। इसी कारण इसे अक्षय कहा गया है, इसका कभी क्षरण नहीं होता।

महाकाल

जय महाकाल,जागो हे महा काल, जागो जीवन आधार,भसम करो पापी के पाप को,धरती पुकारे प्रभु आपको । तुम को जगा रहा नीला गगन ।तुम को जगाये प्रभु पूरा पवन ॥कंदों पे नुसत धरो , डमरू पे ताल दो ।तीसरे नयन की आज ज्वाला निकाल दो ॥फूंक दो यह कष्टों की कालिमा ।भरदो कानो में नयी लालिमा ॥जय जय महाकाल, जय जय महाकाल, जय जय महाकाल,,
जय महाकाल,जागो हे महा काल, जागो जीवन आधार,भसम करो पापी के पाप को,धरती पुकारे प्रभु आपको । तुम को जगा रहा नीला गगन ।तुम को जगाये प्रभु पूरा पवन ॥कंदों पे नुसत धरो , डमरू पे ताल दो ।तीसरे नयन की आज ज्वाला निकाल दो ॥फूंक दो यह कष्टों की कालिमा ।भरदो कानो में नयी लालिमा ॥जय जय महाकाल, जय जय महाकाल, जय जय महाकाल,,

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया, न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गङग्या समम्।।" वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें प़डने वाली अक्षय तृतीय के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। भारतवर्ष संस्कृति प्रधान देश है। हिन्दू संस्कृति में व्रत और त्यौहारों का विशेष महत्व है। व्रत और त्यौहार नयी प्रेरणा एवं संस्कृति का सवंहन करते हैं। इससे मानवीय मूल्यों की वृद्धि बनी रहती है और संस्कृति का निरन्तर परिपोषण तथा सरंक्षण होता रहता है। भारतीय मनीषियों ने व्रत-पर्वो का आयोजन कर व्यक्ति और समाज को पथभ्रष्ट होने से बचाया है।
भारतीय काल गणना के अनुसार चार स्वयंसिद्ध अभिजित् मुहूर्त है -
1. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा)।
2. आखातीज (अक्षय तृतीया)।
3. दशहरा।
4. दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को "अक्षय तृतीया" या "आखा तृतीया" अथवा "आखातीज" भी कहते हैं। "अक्षय" का शब्दिक अर्थ है - जिसका कभी नाश (क्षय) न हो अथवा जो स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। सत्य केवल परमात्मा है जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि "ईश्वर तिथि" है। इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है। अत: यह तिथि "चिरंजीवी तिथि" भी कहलाती है। चारों युगों - सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग का आरंभ इसी आखातीज से हुआ है जिससे इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि "युर्गाद तिथि" भी कहते हैं।
भारतीय परिवेश में अक्षय तृतीया का महत्व:
1. बद्रीनारायण - दर्शन तिथि : इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। दर्शनार्थियों एवं भक्तों की अपार भी़ड रहती है। भक्तों के द्वारा इस दिन किए हुए पुण्य कर्म, त्याग, दान, दक्षिणा, जप-तप, होम-हवन, गंगा-स्नान आदि कार्य अक्षय की गिनती में आ जाते हैं। भगवान भक्तों का प्रसाद प्रेम से ग्रहण करते हैं।
2. वृंदावन में श्रीबिहारी जी के दर्शन : अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं। देश के कौने-कौन से श्रद्धालु भक्त जन चरण दर्शन के लिए वृंदावन पधारते हैं।
3. आत्म-विश्लेषण तथा आत्म निरीक्षण तिथि: यह दिन हमें स्वयं को टटोलने के लिए आत्मान्वेषण, आत्मविवेचन और अवलोकन की प्रेरणा देने वाला है। यह दिन "निज मनु मुकुरू सुधारि" का दिन है। क्षय के कार्यो के स्थान पर अक्षय कार्य करने का दिन है। इस दिन हमें देखना-समझना होगा कि भौतिक रूप से दिखाई देने वाला यह स्थूल शरीर, संसार और संसार की समस्त वस्तुएं क्षय धर्मा है, अक्षय धर्मा नहीं है। क्षय धर्मा वस्तुएं - असद्भावना, असद्विचार, अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध तथा लोभ पैदा करती है जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में आसुरीवृत्ति कहा है जबकि अक्षय धर्मा सकारात्मक चिंतन-मनन हमें दैवी संपदा की ओर ले जाता है। इससे हमें त्याग, परोपरकार, मैत्री, करूणा और प्रेम पाकर परम शांति पाते हैं अर्थात् व्यक्ति को दिव्य गुणों की प्राçप्त होती है। इस दृष्टि से यह तिथि हमें जीवन मूल्यों का वरण करने का संदेश देती है - "सत्यमेव जयते" की ओर अग्रसर करती है।
4. नवान्न का पर्व : वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत बहुश्रुत और बहुमान्य है। बुन्देलखण्ड में यह व्रत अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक ब़डी धूमधाम से मनाया जाता है। कुमारी कन्याएं अपने भाई, पिता, बाबा तथा गाँव-घर के, कुटुम्ब के लोगों को सगुन बांटती है औरा गीत गाती है। इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि का क्रय, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।
5. परशुराम जयंती : इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था, इसीलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। श्री परशुरामजी प्रदोष काल में प्रकट हुए थे इसलिए यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाए तो उस दिन "अक्षय तृतीया", "नर-नारायण जयंती", "हयग्रीव जयंती" सभी संपन्न की जाती है। इसे "परशुराम तीज" भी कहते हैं। अक्षय तृतीया ब़डी पवित्र और सुख सौभाग्य देने वाली तिथि है।
6. सामाजिक पर्व के रूप में अक्षय तृतीया : आखा तीज का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजित् शुभ मुहूर्त के कारण विवाहोत्सव आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं।
7. कृषि उत्पादन के संबंध में अक्षय तृतीया : किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र तीनों का सुयोग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। इस संबंध में भड्डरी की कहावतें भी लोक में प्रचलित है।
दान के पर्व के रूप में : अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है। इस दिन अपनी सामथ्र्य के अनुसार अधिक से अधिक दान-पुण्य करना चाहिए। इस तिथि पर ईख के रस से बने पदार्थ, दही, चावल, दूध से बने व्यंजन, खरबूज, लड्डू का भोग लगाकर दान करने का भी विधान है। अक्षय ग्रंथ गीता : गीता स्वयं एक अक्षय अमरनिधि ग्रंथ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं, जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय तिथि के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्व और हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिए। तभी हमें व्रतोपवासों का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है,,

द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग

श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग
सौराष्ट्रे सोमनाथं च, श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालं ॐ कारममलेश्वरम् ॥ परल्यां वैधनाथ च, डाकिन्यां भीमशंकरम् । सेतुबन्धे तु रामेशं, नागेशं दारुकावने ॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं, त्र्यंबकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं, धुश्मेशं च शिवालये ॥ ऐतानि ज्योतिर्लिंगानि, सायंप्रात: पठेन्नर । सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥

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