यदा
यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं
सृजाम्यहम् परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे,,,बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।सुखं
दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः
।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ भावार्थ : निश्चय करने की
शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना,
मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथाअहिंसा, समता,
संतोष तप (स्वधर्म के आचरणसे इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप
है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव
मुझसे ही होते हैं॥
हिन्दू धर्म के सभी देवी देवताओं की और त्योहारों की जानकारी। भगवान के मंत्र स्तोत्र तथा सहस्त्र नामावली की जानकारी ।
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