Thursday, 24 April 2014

वल्लभाचार्य ,,,श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म वरूथिनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को

श्री वल्लभाचार्य का जन्म वरूथिनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को संवत् १५३५ अर्थात सन् १४७९ ई. को रायपुर जिले में स्थित महातीर्थ राजिम के पास चम्पारण्य (चम्पारण) में हुआ था। बाद में वे अपने पिता के साथ काशी आकर बसे।
महाप्रभु वल्लभाचार्य के पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम इल्लमा गारू था। वे भारद्वाज गोत्र के तैलंग ब्राम्हण थे, कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अन्तर्गत इनका भारद्वाज गोत्र था। वे समृद्ध परिवार के थे और उनके अधिकांश संबंधी दक्षिण के आंध्र प्रदेश में गोदावरी के तट पर कांकरवाड ग्राम में निवास करते थे। उनकी दो बहिनें और तीन भाई थे। बड़े भाई का नाम रामकृष्ण भट्ट था। वे माधवेन्द्र पुरी के शिष्य और दक्षिण के किसी मठ के अधिपति थे। संवत १५६८ में वल्लभाचार्य जी बदरीनाथ धाम की यात्रा के समय वे उनके साथ थे। अपने उत्तर जीवन में उन्होने सन्यास ग्रहण करते हुए केशवपुरी नाम धारण किया। वल्लभाचार्य जी के छोटे भाई रामचन्द्र और विश्वनाथ थे। रामचंद्र भट्ट बड़े विद्वान और अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे। उनके एक चाचा ने उन्हें गोद ले लिया था और वे अपने पालक पिता के साथ अयोध्या में निवास करते थे।
वल्लभाचार्य की शिक्षा पाँच वर्ष की अवस्था में प्रारंभ हुई। श्री रुद्रसंप्रदाय के श्री विल्वमंगलाचार्य जी द्वारा इन्हें 'अष्टादशाक्षर गोपाल मन्त्र' की दीक्षा दी गई, त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्र तीर्थ से प्राप्त हुई। उन्होंने काशी और जगदीश पुरी में अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ कर विजय प्राप्त की थी। आगे चलकर वे विष्णुस्वामी संप्रदाय की परंपरा में एक स्वतंत्र भक्ति-पंथ के प्रतिष्ठाता, शुद्धाद्वैत दार्शनिक सिद्धांत के समर्थक प्रचारक और भगवत-अनुग्रह प्रधान एवं भक्ति-सेवा समन्वित 'पुष्टि मार्ग' के प्रवर्त्तक बने। उन्होंने एकमात्र शब्द को ही प्रमाण बतलाया और प्रस्थान चतुष्टयी (वेद, ब्रह्मसूत्र, गीता और भागवत) के आधार पर साकार ब्रह्म के विरूद्ध धर्माश्रयत्व और जगत का सत्यत्व सिद्ध किया तथा मायावाद का खण्डन किया।
श्री वल्लभाचार्य का सिद्धान्त है कि जो सत्य तत्त्व है, उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। जगत भी ब्रह्म का अविकृत परिणाम होने से ब्रह्मरूप ही है, सत्य है इसलिए उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। उसका केवल अविर्भाव और तिरोभाव होता है। सृष्टि के पूर्व और प्रलय की स्थिति में जगत अव्यक्त होता है, यह उसके तिरोभाव की स्थिति होती है। जब सृष्टि की रचना होती है तो जगत पुनः व्यक्त हो जाता है, यह उसके अविर्भाव की स्थिति है। तिरोभाव की स्थिति में जगत अपने कारण रूप ब्रह्म में अव्यक्तावस्था में लीन रहता है। श्री वल्लभाचार्य का मत है कि जब ब्रह्म ( ब्रह्म भगवान कृष्ण) प्रपंच में (जगत के रूप में) रमण करना चाहते है तो वे अनन्त रूप-नाम के भेद से स्वयं ही जगत रूप बनकर क्रिड़ा करने लगते है। चूँकि जगत - रूप में भगवान ही क्रीड़ा करते हैं, इसलिए जगत भगवान का ही रूप है और इसी कारण वह सत्य है, मिथ्या या मायिक नहीं है।
शुद्धाद्वैत दर्शन में जगत और संसार को भिन्न माना जाता है। भगवान जगत के अभिन्न-निमित-उपादान कारण है। वे जगत रूप में प्रकट हुए है, इसलिए जगत भगवान का रूप है, सत्य है। जगत भगवान की रचना है, कृति है। संसार भगवान की रचना नहीं है। वास्तव में संसार उत्पन्न ही नहीं होता, वह काल्पनिक है। अविद्याग्रस्त जीव 'यह मैं हूँ यह मेरा है', ऐसी कल्पना कर लेता है। इस प्रकार जीव स्वयं अहं और ममता का घेरा बनाकर अहंता-ममतात्मक संसार की कल्पना कर लेता है। वह अपने अहंता-ममतात्मक संसार में रचा-बसा रहता है, उसी में फँसे रहते हुए बंधन में पड़ जाता है। जीव के द्वारा अज्ञानवश रचा गया यह संसार काल्पनिक, असत्य और नाशवान् होता है।
अपने इन सिद्धांतों की स्थापना के लिये उन्होंने तीन बार पूरे भारत का भ्रमण किया तथा विद्वानों से शास्त्रार्थ करके अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया। ये यात्राएँ लगभग उन्नीस वर्षो में पूरी हुई। प्रथम संवत् १५५३, दूसरी संवत् १५५८ तथा तीसरी संवत् १५६६ में। प्रवास के समय वे अपना ठिकाना भीड़-भाड़ से दूर एकांत में किसी जलाशय के किनारे पर करते थे। ये स्थान आज भी बैठक नाम से जाने जाते हैं।
अपनी यात्राओं के दौरान मथुरा, गोवर्धन आदि स्थानों में उन्होंने श्रीनाथजी की पूजा आदि की व्यवस्था की तथा श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम भक्ति के लिये लोगों को प्रेरित किया। अपनी दूसरी यात्रा के समय उनका विवाह महालक्ष्मी के साथ संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात वे प्रयाग के निकट यमुना के तट पर स्थित अडैल ग्राम में बस गये। उनके दो पुत्र हुए। बड़े पुत्र गोपीनाथ जी का जन्म सं. १५६८ की आश्विन कृष्ण १२ को अड़ैल में और छोटे पुत्र विट्ठलनाथ जी का जन्म सं. १५७२ की पौष कृष्ण ९ को चरणाट में। दोनों पुत्र अपने पिता के समान विद्वान और धर्मनिष्ठ थे।

फिर वे वृन्दावन चले गये और भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में निमग्न रहे। वहीं उन्हें बालगोपाल के रूप में भगवान श्री कृष्ण के दर्शन हुए। संवत् १५५६ में महाप्रभु की प्रेरणा से गिरिराज में श्रीनाथ जी के विशाल मंदिर का निर्माण हुआ। इस मंदिर को पूरा होने में २० वर्ष लगे। कुम्भनदास जी इस मंदिर के प्रधान कीर्तिनिया बने और कृष्णदास जी अधिकारी।

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा संस्थापित पुष्टि मार्ग में अनेक भक्त कवि हुए हैं। उनमें प्रमुख थे महाकवि सूरदास, कुम्भनदास, परमानंददास, कृष्णदास। गोसाई विट्ठलदास ने पुष्टि मार्ग के इन आठ कवियों को अष्ट छाप के रूप में सम्मानित किया है। छत्तीसगढ़ के महाकवि गोपाल पर भी पुष्टिमार्ग का गहरा प्रभाव था। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘भक्ति चिंतामणि’ श्रीमद भागवत के दशमस्कंध पर आधारित है।
श्री वल्लभाचार्यजी की ८४ बैठक, ८४ शिष्य और ८४ ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। उनके ग्रंथों में टीका भाष्य निबंध, शिक्षा और साहित्य आदि सभी कुछ है। इनमें गायत्री भाष्य, पूर्वमीमांसा, उत्तर मीमांसा, तत्त्वार्थदीप निबन्ध, शास्त्रार्थ प्रकरण, सर्वनिर्णय प्रकरण, भगवातार्थ निर्णय, सुबोधिनी और षोडश ग्रंथ प्रमुख हैं। उपर्युक्त ग्रन्थो के अतिरिक्त महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य ने अन्य अनेक ग्रन्थों और स्तोत्रों की रचना की है जिनमें- पंचश्लोकी, शिक्षाश्लोक, त्रिविधनामावली, भगवत्पीठिका आदि ग्रन्थ तथा मधुराष्टक, परिवृढाष्टक, गिरिराजधार्याष्टक आदि स्तोत्र प्रसिद्ध है।
सर्वदा सर्वभावेनभजनीयोब्रजाधिप:।..तस्मात्सर्वात्मना नित्यंश्रीकृष्ण: शरणंमम।

नृसिंह स्तवः, श्री नृसिंह स्तवः

श्री नृसिंह स्तवः  

प्रहलाद ह्रदयाहलादं भक्ता विधाविदारण ।
शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥१॥
नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने ।
हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥२॥
इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह ।
बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥३॥
तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं ।
दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम् ।
केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥४॥
वागीशायस्य बदने लर्क्ष्मीयस्य च बक्षसि ।
यस्यास्ते ह्र्देय संविततं नृसिंहमहं भजे ॥५॥
श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह ।
प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म ॥६॥
नरसिंह मंत्र ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥
हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है. हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ   रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,

लक्ष्मी नरसिंह स्तोत्रं ,, श्री लक्ष्मी नरसिंह स्तोत्रं

श्री लक्ष्मी नरसिंह स्तोत्रं श्री मत्वयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे भोगींद्र भोगमणिरंजित पुण्यमूर्ते योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्ब्र ह्मेद्र रुद्र मरुदर्ककिरीटकोटि- संघट्टितांघ्र्‍इ कमलामलकांत लक्ष्मीलसत्कुच सरोरुह राजहंस लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्संसारदाव दहनातुर भीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्
त्वत्वाद पद्मसरसिरुह मागतस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसारजाल पतितस्य जगन्निवास
सर्वेंद्रियार्थ बडिशाग्र झ पोपमस्य
प्र्‍ओत्कंटित प्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसारकूपमति घोरमगाध मूलं
संप्राप्य दुःखशतसर्प समाकुलस्य
दीनस्यदेव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसारभीकर करींद्र कराभिघात-
निष्षिष्षमर्मवपुषः सकालार्तिनाश
प्राणप्रयाण भवभीति समाकुलस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसार सर्पघनवक्त्र भयोग्रतीव्र
दंष्ष्राकराल विषदग्ध विनष्षमूर्ते
नागारिवाहन सुधाब्दि निवास शौरे
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसारवृक्ष मघबीजमनंत कर्म
शाखाशतं करणपत्र मनंग पुष्पं
अरुह्य दुःख दलितं पततो दयालो
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसार सागर विशाल कराल घोर
नक्रग्रहग्रसन निग्रहविग्रहस्य
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनि पीडितस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसार सागर निमज्जनमुह्य मानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम्
प्रह्लाद खेद परिहार परावतार
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
संसार घोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्र भीकर मृग प्रचुरार्दि तस्य
आर्तस्य मत्सर निदाघ निपीडितस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
बद्द्वागले यमभटा बहुतर्जयंतः
कर्षंति यत्र भवपाशतैर्युतं मां
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप
ब्रह्मण्य केशव जनार्धन वासुदेव
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
एकेन चक्रमपरेण करेण शंख
मन्येन सिंधुतनयामवलंब्य तिष्ठन्
वामे करेण वरदाभयपद्म चिह्नं
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
अंधस्य मे हृत विवेकमहाधनस्य
चोरै प्रभो बलिभिरिंद्रिय नामधेयैः
मोहांधकूप कुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
प्रह्लाद नारद पराशर पुंडरीक
व्यासांबरीश शुकशौनक हृन्निवास
भक्तानुरक्त परिपालन पारिजात
लक्ष्मीनरसिंह ममदेहि करावलंबम्
लक्ष्मीनरसिंह चरणाब्ज मधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शंकरेण
ये यत्पठंति मनुजा हरिभक्ति युक्ता-
स्तेप्रयांति तत्पदसरोजमखंड रूपं

वेंकटेश मंगलाशासनम् श्री वेंकटेश मंगलाशासनम्

श्री वेंकटेश मंगलाशासनम्
 श्रियः कांताय कल्याणनिधये निधये‌ र्थिनाम् । श्रीवेंकट निवासाय श्रीनिवासाय मंगलम् ॥ १ ॥
लक्ष्मी सविभ्रमालोक सुभ्रू विभ्रम चक्षुषे । चक्षुषे सर्वलोकानां वेंकटेशाय मंगलम् ॥ २ ॥
श्रीवेंकटाद्रि शृंगाग्र मंगलाभरणांघ्रये । मंगलानां निवासाय श्रीनिवासाय मंगलम् ॥ ३ ॥
सर्वावय सौंदर्य संपदा सर्वचेतसाम् । सदा सम्मोहनायास्तु वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ४ ॥
नित्याय निरवद्याय सत्यानंद चिदात्मने । सर्वांतरात्मने शीमद्-वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ५ ॥
स्वत स्सर्वविदे सर्व शक्तये सर्वशेषिणे । सुलभाय सुशीलाय वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ६ ॥
परस्मै ब्रह्मणे पूर्णकामाय परमात्मने । प्रयुंजे परतत्त्वाय वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ७ ॥
आकालतत्त्व मश्रांत मात्मना मनुपश्यताम् । अतृप्त्यमृत रूपाय वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ८ ॥
प्रायः स्वचरणौ पुंसां शरण्यत्वेन पाणिना । कृपया‌ दिशते श्रीमद्-वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ९ ॥
दया‌ मृत तरंगिण्या स्तरंगैरिव शीतलैः । अपांगै स्सिंचते विश्वं वेंकटेशाय मंगलम् ॥ १० ॥
स्रग्-भूषांबर हेतीनां सुषमा‌ वहमूर्तये । सर्वार्ति शमनायास्तु वेंकटेशाय मंगलम् ॥ ११ ॥
श्रीवैकुंठ विरक्ताय स्वामि पुष्करिणीतटे । रमया रममाणाय वेंकटेशाय मंगलम् ॥ १२ ॥
श्रीमत्-सुंदरजा मातृमुनि मानसवासिने । सर्वलोक निवासाय श्रीनिवासाय मंगलम् ॥ १३ ॥
मंगला शासनपरैर्-मदाचार्य पुरोगमैः । सर्वैश्च पूर्वैराचार्यैः सत्कृतायास्तु मंगलम् ॥ १४ ॥
श्री पद्मावती समेत श्री श्रीनिवास परब्रह्मणे नमः


श्री वेंकटेश्वर स्तोत्रम्

श्री वेंकटेश्वर स्तोत्रम्   कमलाकुच चूचुक कुंकमतो नियतारुणि तातुल नीलतनो ।
कमलायत लोचन लोकपते विजयीभव वेंकट शैलपते ॥
सचतुर्मुख षण्मुख पंचमुखे प्रमुखा खिलदैवत मौलिमणे ।
शरणागत वत्सल सारनिधे परिपालय मां वृष शैलपते ॥
अतिवेलतया तव दुर्विषहै रनु वेलकृतै रपराधशतैः ।
भरितं त्वरितं वृष शैलपते परया कृपया परिपाहि हरे ॥
अधि वेंकट शैल मुदारमते- र्जनताभि मताधिक दानरतात् ।
परदेवतया गदितानिगमैः कमलादयितान्न परंकलये ॥
कल वेणुर वावश गोपवधू शत कोटि वृतात्स्मर कोटि समात् ।
प्रति पल्लविकाभि मतात्-सुखदात् वसुदेव सुतान्न परंकलये ॥
अभिराम गुणाकर दाशरधे जगदेक धनुर्थर धीरमते ।
रघुनायक राम रमेश विभो वरदो भव देव दया जलधे ॥
अवनी तनया कमनीय करं रजनीकर चारु मुखांबुरुहम् ।
रजनीचर राजत मोमि हिरं महनीय महं रघुराममये ॥
सुमुखं सुहृदं सुलभं सुखदं स्वनुजं च सुकायम मोघशरम् ।
अपहाय रघूद्वय मन्यमहं न कथंचन कंचन जातुभजे ॥
विना वेंकटेशं न नाथो न नाथः सदा वेंकटेशं स्मरामि स्मरामि ।
हरे वेंकटेश प्रसीद प्रसीद प्रियं वेंकटेश प्रयच्छ प्रयच्छ ॥
अहं दूरदस्ते पदां भोजयुग्म प्रणामेच्छया गत्य सेवां करोमि ।
सकृत्सेवया नित्य सेवाफलं त्वं प्रयच्छ पयच्छ प्रभो वेंकटेश ॥॥.Astrologer Gyanchand Bundiwal। nagpur . 0 8275555557
अज्ञानिना मया दोषा न शेषान्विहितान् हरे । क्षमस्व त्वं क्षमस्व त्वं शेषशैल शिखामणे ॥

श्री वेंकटेश्वर अष्टोत्तर शत नामावलि

श्री वेंकटेश्वर अष्टोत्तर शत नामावलि
ॐ श्री वेंकटेशाय नमः ॐ श्रीनिवासाय नमः ॐ लक्ष्मिपतये नमः ॐ अनानुयाय नमः ॐ अमृतांशने नमः
ॐ माधवाय नमः ॐ कृष्णाय नमः ॐ श्रीहरये नमः ॐ ज्ञानपंजराय नमः ॐ श्रीवत्स वक्षसे नमः
ॐ जगद्वंद्याय नमः ॐ गोविंदाय नमः ॐ शाश्वताय नमः ॐ प्रभवे नमः ॐ शेशाद्रिनिलायाय नमः ॐ देवाय नमः
ॐ केशवाय नमः ॐ मधुसूदनाय नमः ॐ अमृताय नमः ॐ विष्णवे नमः ॐ अच्युताय नमः ॐ पद्मिनीप्रियाय नमः
ॐ सर्वेशाय नमः ॐ गोपालाय नमः ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ॐ गोपीश्वराय नमः ॐ परंज्योतिषे नमः
ॐ व्तेकुंठ पतये नमः ॐ अव्ययाय नमः ॐ सुधातनवे नमः ॐ याद वेंद्राय नमः ॐ नित्य यौवनरूपवते नमः
ॐ निरंजनाय नमः ॐ विराभासाय नमः ॐ नित्य तृप्त्ताय नमः ॐ धरापतये नमःॐ सुरपतये नमः
ॐ निर्मलाय नमः ॐ देवपूजिताय नमः ॐ चतुर्भुजाय नमः ॐ चक्रधराय नमः ॐ चतुर्वेदात्मकाय नमः
ॐ त्रिधाम्ने नमः ॐ त्रिगुणाश्रयाय नमः ॐ निर्विकल्पाय नमः ॐ निष्कलंकाय नमः ॐ निरांतकाय नमः
ॐ आर्तलोकाभयप्रदाय नमः ॐ निरुप्रदवाय नमः ॐ निर्गुणाय नमः ॐ गदाधराय नमः ॐ शार्ञ्ङपाणये नमः
ॐ नंदकिनी नमः ॐ शंखदारकाय नमः ॐ अनेकमूर्तये नमः ॐ अव्यक्ताय नमः ॐ कटिहस्ताय नमः
ॐ वरप्रदाय नमः ॐ अनेकात्मने नमः ॐ दीनबंधवे नमः ॐ जगद्व्यापिने नमः ॐ आकाशराजवरदाय नमः
ॐ योगिहृत्पद्शमंदिराय नमः ॐ दामोदराय नमः ॐ जगत्पालाय नमः ॐ पापघ्नाय नमः ॐ भक्तवत्सलाय नमः
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ॐ शिंशुमाराय नमः ॐ जटामकुट शोभिताय नमः ॐ शंख मद्योल्ल सन्मंजु किंकिण्याढ्य नमः
ॐ कारुंडकाय नमः ॐ नीलमोघश्याम तनवे नमः ॐ बिल्वपत्त्रार्चन प्रियाय नमः ॐ जगत्कर्त्रे नमः
ॐ जगत्साक्षिणे नमः ॐ जगत्पतये नमः ॐ चिंतितार्ध प्रदायकाय नमः ॐ जिष्णवे नमः ॐ दाशार्हाय नमः
ॐ दशरूपवते नमः ॐ देवकी नंदनाय नमः ॐ शौरये नमः ॐ हयरीवाय नमः ॐ जनार्धनाय नमः
ॐ कन्याश्रणतारेज्याय नमः ॐ पीतांबरधराय नमः ॐ अनघाय नमः ॐ वनमालिने नमः ॐ पद्मनाभाय नमः
ॐ मृगयासक्त मानसाय नमः ॐ अश्वरूढाय नमः ॐ खड्गधारिणे नमः ॐ धनार्जन समुत्सुकाय नमः
ॐ घनतारल सन्मध्यकस्तूरी तिलकोज्ज्वलाय नमः ॐ सच्चितानंदरूपाय नमः ॐ जगन्मंगल दायकाय नमः
ॐ यज्ञभोक्रे नमः ॐ चिन्मयाय नमः ॐ परमेश्वराय नमः ॐ परमार्धप्रदायकाय नमः ॐ शांताय नमः
ॐ श्रीमते नमः ॐ दोर्दंड विक्रमाय नमः ॐ परब्रह्मणे नमः ॐ श्रीविभवे नमः ॐ जगदीश्वराय नमः
ॐ आलिवेलु मंगा सहित वेंकटेश्वराय नमः




श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वासंध्या प्रवर्तते ।

श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वासंध्या प्रवर्तते ।उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥ १ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।उत्तिष्ठ कमलाकांत त्रैलोक्यं मंगलं कुरु ॥ २ ॥
मातस्समस्त जगतां मधुकैटभारेःवक्षोविहारिणि मनोहर दिव्यमूर्ते ।
श्रीस्वामिनि श्रितजनप्रिय दानशीलेश्री वेंकटेश दयिते तव सुप्रभातम् ॥ ३ ॥
तव सुप्रभातमरविंद लोचनेभवतु प्रसन्नमुख चंद्रमंडले ।
विधि शंकरेंद्र वनिताभिरर्चिते वृश शैलनाथ दयिते दयानिधे ॥ ४ ॥
अत्र्यादि सप्त ऋषयस्समुपास्य संध्यां आकाश सिंधु कमलानि मनोहराणि ।
आदाय पादयुग मर्चयितुं प्रपन्नाः शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ५ ॥
पंचाननाब्ज भव षण्मुख वासवाद्याःत्रैविक्रमादि चरितं विबुधाः स्तुवंति ।
भाषापतिः पठति वासर शुद्धि मारात्शे षाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ६ ॥
ईशत्-प्रफुल्ल सरसीरुह नारिकेल पूगद्रुमादि सुमनोहर पालिकानाम् ।
आवाति मंदमनिलः सहदिव्य गंधैः शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ७ ॥
उन्मील्यनेत्र युगमुत्तम पंजरस्थाःपात्रावसिष्ट कदली फल पायसानि ।
भुक्त्वाः सलील मथकेलि शुकाः पठंतिशेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ८ ॥
तंत्री प्रकर्ष मधुर स्वनया विपंच्या गायत्यनंत चरितं तव नारदो‌உपि ।
भाषा समग्र मसत्-कृतचारु रम्यंशेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ९ ॥
भृंगावली च मकरंद रसानु विद्ध झुंकारगीत निनदैः सहसेवनाय ।
निर्यात्युपांत सरसी कमलोदरेभ्यःशेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ १० ॥
योषागणेन वरदध्नि विमथ्यमाने घोषालयेषु दधिमंथन तीव्रघोषाः ।
रोषात्कलिं विदधते ककुभश्च कुंभाः शेषाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ ११ ॥
पद्मेशमित्र शतपत्र गतालिवर्गाः हर्तुं श्रियं कुवलयस्य निजांगलक्ष्म्याः ।
भेरी निनादमिव भिभ्रति तीव्रनादम्शे षाद्रि शेखर विभो तव सुप्रभातम् ॥ १२ ॥
श्रीमन्नभीष्ट वरदाखिल लोक बंधो श्री श्रीनिवास जगदेक दयैक सिंधो ।
श्री देवता गृह भुजांतर दिव्यमूर्ते श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १३ ॥
श्री स्वामि पुष्करिणिकाप्लव निर्मलांगाः श्रेयार्थिनो हरविरिंचि सनंदनाद्याः ।
द्वारे वसंति वरनेत्र हतोत्त मांगाःश्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १४ ॥
श्री शेषशैल गरुडाचल वेंकटाद्रि नारायणाद्रि वृषभाद्रि वृषाद्रि मुख्याम् ।
आख्यां त्वदीय वसते रनिशं वदंति श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १५ ॥
सेवापराः शिव सुरेश कृशानुधर्म रक्षोंबुनाथ पवमान धनाधि नाथाः ।
बद्धांजलि प्रविलसन्निज शीर्षदेशाः श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १६ ॥
धाटीषु ते विहगराज मृगाधिराज नागाधिराज गजराज हयाधिराजाः ।
स्वस्वाधिकार महिमाधिक मर्थयंते श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १७ ॥
सूर्येंदु भौम बुधवाक्पति काव्यशौरि स्वर्भानुकेतु दिविशत्-परिशत्-प्रधानाः ।
त्वद्दासदास चरमावधि दासदासाः श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १८ ॥
तत्-पादधूलि भरित स्फुरितोत्तमांगाः स्वर्गापवर्ग निरपेक्ष निजांतरंगाः ।
कल्पागमा कलनया‌உ‌உकुलतां लभंते श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ १९ ॥
त्वद्गोपुराग्र शिखराणि निरीक्षमाणाःस्वर्गापवर्ग पदवीं परमां श्रयंतः ।
मर्त्या मनुष्य भुवने मतिमाश्रयंते श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २० ॥
श्री भूमिनायक दयादि गुणामृताब्दे देवादिदेव जगदेक शरण्यमूर्ते ।
श्रीमन्ननंत गरुडादिभि रर्चितांघ्रे श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २१ ॥
श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेव वैकुंठ माधव जनार्धन चक्रपाणे ।
श्री वत्स चिह्न शरणागत पारिजात श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २२ ॥
कंदर्प दर्प हर सुंदर दिव्य मूर्ते कांता कुचांबुरुह कुट्मल लोलदृष्टे ।
कल्याण निर्मल गुणाकर दिव्यकीर्ते श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २३ ॥
मीनाकृते कमठकोल नृसिंह वर्णिन्स्वा मिन् परश्वथ तपोधन रामचंद्र ।
शेषांशराम यदुनंदन कल्किरूप श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २४ ॥
एलालवंग घनसार सुगंधि तीर्थं दिव्यं वियत्सरितु हेमघटेषु पूर्णम् ।
धृत्वाद्य वैदिक शिखामणयः प्रहृष्टाः तिष्ठंति वेंकटपते तव सुप्रभातम् ॥ २५ ॥
भास्वानुदेति विकचानि सरोरुहाणि संपूरयंति निनदैः ककुभो विहंगाः ।
श्रीवैष्णवाः सतत मर्थित मंगलास्ते धामाश्रयंति तव वेंकट सुप्रभातम् ॥ २६ ॥
ब्रह्मादया स्सुरवरा स्समहर्षयस्ते संतस्सनंदन मुखास्त्वथ योगिवर्याः ।
धामांतिके तव हि मंगल वस्तु हस्ताः श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २७ ॥
लक्श्मीनिवास निरवद्य गुणैक सिंधो संसारसागर समुत्तरणैक सेतो ।
वेदांत वेद्य निजवैभव भक्त भोग्य श्री वेंकटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥ २८ ॥

रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks
इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातं ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः ।
तेषां प्रभात समये स्मृतिरंगभाजां प्रज्ञां परार्थ सुलभां परमां प्रसूते ॥ २९ ॥


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