Saturday, 8 October 2016

१०८ शक्ति पीठो का वर्णन .

१०८ शक्ति पीठो का वर्णन .... श्री देवी भागवत में वर्णित, राजा जन्मेजय द्वारा पूछे जाने पर व्यास जी द्वारा जिन १०८ शक्ति पीठो का वर्णन किया गया वो निम्नलिखित हैं।
१. वाराणसी में देवी विशालाक्षी।
२. नैमिषारण्य क्षेत्र में देवी लिंग्धारिणी।
३. प्रयाग में देवी ललिता।
४. गंधमादन पर्वत पर देवी कामुकी।
५. दक्षिण मानसरोवर में देवी कुमुदा।
६. उत्तर मानसरोवर में, सर्व कामना पूर्ण करने वाली देवी विश्वकामा।
७. गोमान्त पर देवी गोमती।
८. मंदराचल पर देवी कामचारिणी।
९. चैत्ररथ में देवी मदोत्कता।
१०. हस्तिनापुर में देवी जयंती।
११. कन्याकुब्ज में देवी गौरी।
१२. मलयाचल पर देवी रम्भा।
१३. एकाम्र पीठ पर देवी कीर्तिमती।
१४. विश्वपीठ पर देवी विश्वेश्वरी।
१५. पुष्कर में देवी पुरुहूता।
१६. केदार स्थल पर देवी सन्मार्गदायनी।
१७. हिमात्वपीठ पर देवी मंदा।
१८. गोकर्ण में देवी भद्र कर्णिका।
१९. स्थानेश्वर में देवी भवानी।
२०. बिल्वक में देवी बिल्वपत्रिका।
२१. श्रीशैलम में देवी माधवी।
२२. भाद्रेश्वर में देवी भद्र।
२३. वरह्पर्वत पर देवी जया।
२४. कमलालय में देवी कमला।
२५. रुद्रकोटि में देवी रुद्राणी।
२६. कालंजर में देवी काली।
२७. शालग्राम में देवी महादेवी।
२८. शिवलिंग में देवी जलप्रिया।
२९. महालिंग में देवी कपिला।
३०. माकोट में देवी मुकुटेश्वरी।
३१. मायापुरी में देवी कुमारी।
३२. संतानपीठ में देवी ललिताम्बिका।
३३. गया में देवी मंगला।
३४. पुरुषोतम क्षेत्र में देवी विमला।
३५. सहस्त्राक्ष में देवी उत्पलाक्षी।
३६. हिरण्याक्ष में देवी महोत्पला।
३७. विपाशा में देवी अमोघाक्षी।
३८. पुंड्रवर्धन में देवी पाडला।
३९. सुपर्श्व में देवी नारायणी।
४०. चित्रकूट में देवी रुद्रसुन्दारी।
४१. विपुल क्षेत्र में देवी विपुला।
४२. मलयाचल में देवी कल्याणी।
४३. सह्याद्र पर्वत पर देवी एकवीर।
४४. हरिश्चंद्र में चन्द्रिका।
४५. रामतीर्थ में देवी रमण।
४६. यमुना में देवी मृगावती।
४७. कोटितीर्थ में देवी कोटवी।
४८. माधव वन में देवी सुगंधा।
४९. गोदावरी में देवी त्रिसंध्या।
५०. गंगाद्वार में देवी रतिप्रिया।
५१. शिवकुंड में देवी सुभानंदा।
५२. देविका तट पर देवी नंदिनी।
५३. द्वारका में देवी रुकमनी।
५४. वृन्दावन में देवी राधा।
५५. मथुरा में देवी देवकी।
५६. पाताल में देवी परमेश्वरी।
५७. चित्रकूट में देवी सीता।
५८. विन्ध्याचल पर देवी विध्यवासिनी।
५९. करवीर क्षेत्र में देवी महालक्ष्मी।
६०. विनायक क्षेत्र में देवी उमा।
६१. वैद्यनाथ धाम में देवी आरोग्य।
६२. महाकाल में देवी माहेश्वरी।
६३. उष्ण तीर्थ में देवी अभ्या।
६४. विन्ध्य पर्वत पर देवी नितम्बा।
६५. माण्डवय क्षेत्र में देवी मांडवी।
६६. माहेश्वरी पुर में देवी स्वाहा।
६७. छगलंड में देवी प्रचंडा।
६८. अमरकंटक में देवी चंडिका।
६९. सोमेश्वर में देवी वरारोह।
७०. प्रभास क्षेत्र में देवी पुष्करावती।
७१. सरस्वती तीर्थ में देव माता।
७२. समुद्र तट पर देवी पारावारा।
७३. महालय में देवी महाभागा।
७४. पयोष्णी में देवी पिन्गलेश्वरी।
७५. कृतसौच क्षेत्र में देवी सिंहिका।
७६. कार्तिक क्षेत्र में देवी अतिशंकारी।
७७. उत्पलावर्तक में देवी लोला।
७८. सोनभद्र नदी के संगम पर देवी सुभद्रा।
७९. सिद्ध वन में माता लक्ष्मी।
८०. भारताश्रम तीर्थ में देवी अनंगा।
८१. जालंधर पर्वत पर देवी विश्वमुखी।
८२. किष्किन्धा पर्वत पर देवी तारा।
८३. देवदारु वन में देवी पुष्टि।
८४. कश्मीर में देवी मेधा।
८५. हिमाद्री पर्वत पर देवी भीमा।
८६. विश्वेश्वर क्षेत्र में देवी तुष्टि।
८७. कपालमोचन तीर्थ पर देवी सुद्धि।
८८. कामावरोहन तीर्थ पर देवी माता।
८९. शंखोद्धार तीर्थ में देवी धारा।
९०. पिंडारक तीर्थ पर धृति।
९१. चंद्रभागा नदी के तट पर देवी कला।
९२. अच्छोद क्षेत्र में देवी शिवधारिणी।
९३. वेण नदी के तट पर देवी अमृता।
९४. बद्रीवन में देवी उर्वशी।
९५. उत्तर कुरु प्रदेश में देवी औषधि।
९६. कुशद्वीप में देवी कुशोदका।
९७. हेमकूट पर्वत पर देवी मन्मथा।
९८. कुमुदवन में सत्यवादिनी।
९९. अस्वथ तीर्थ में देवी वन्दनीया।
१००. वैश्वनालय क्षेत्र में देवी निधि।
१०१. वेदवदन तीर्थ में देवी गायत्री।
१०२. भगवान् शिव के सानिध्य में देवी पार्वती।
१०३. देवलोक में देवी इन्द्राणी।
१०४. ब्रह्मा के मुख में देवी सरस्वती।
१०५. सूर्य के बिम्ब में देवी प्रभा।
१०६. मातृकाओ में देवी वैष्णवी।
१०७. सतियो में देवी अरुंधती।
१०८. अप्सराओ में देवी तिलोतम्मा।
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.
१०९. शारीर धारिओ के शारीर में या चित में ब्रह्मकला।

Saturday, 1 October 2016

पद्मावती स्तोत्र संकटमोचक

पद्मावती स्तोत्र संकटमोचक
देवी मां पद्मावती, ज्योति रूप महान।
विघ्न हरो मंगल करो, करो मात कल्याण। (1)
चौपाई।।जय-जय-जय पद्मावती माता, तेरी महिमा त्रिभुवन गाता।
मन की आशा पूर्ण करो मां, संकट सारे दूर करो मां।। (2)

तेरी महिमा परम निराली, भक्तों के दुख हरने वाली।
धन-वैभव-यश देने वाली, शान तुम्हारी अजब निराली।। (3)

बिगड़ी बात बनेगी तुम से, नैया पार लगेगी तुम से।
मेरी तो बस एक अरज है, हाथ थाम लो यही गरज है।। (4)

चतुर्भुजी मां हंसवाहिनी, महर करो मां मुक्तिदायिनी।
किस विध पूजूं चरण तुम्हारे, निर्मल हैं बस भाव हमारे।। (5)

मैं आया हूं शरण तुम्हारी, तू है मां जग तारणहारी।
तुम बिन कौन हरे दुख मेरा, रोग-शोक-संकट ने घेरा।। (6)

तुम हो कल्पतरु कलियुग की, तुमसे है आशा सतयुग की।
मंदिर-मंदिर मूरत तेरी, हर मूरत में सूरत तेरी।। (7)

रूप तुम्हारे हुए हैं अनगिन, महिमा बढ़ती जाती निशदिन।
तुमने सारे जग को तारा, सबका तूने भाग्य संवारा।। (8)

हृदय-कमल में वास करो मां, सिर पर मेरे हाथ धरो मां।
मन की पीड़ा हरो भवानी, मूरत तेरी लगे सुहानी।। (9)

पद्मावती मां पद्‍म-समाना, पूज रहे सब राजा-राणा।
पद्‍म-हृदय पद्‍मासन सोहे, पद्‍म-रूप पद-पंकज मोहे।। (10)

महामंत्र का मिला जो शरणा, नाग-योनी से पार उतरना।
पारसनाथ हुए उपकारी, जय-जयकार करे नर-नारी।। (11)

पारस प्रभु जग के रखवाले, पद्मावती प्रभु पार्श्व उबारे।
जिसने प्रभु का संकट टाला, उसका रूप अनूप निराला।। (12)

कमठ-शत्रु क्या करे बिगाड़े, पद्मावती जहं काज सुधारे।
मेघमाली की हर चट्टानें, मां के आगे सब चित खाने।। (13)

मां ने प्रभु का कष्ट निवारा, जन्म-जन्म का कर्ज उतारा।
पद्मावती दया की देवी, प्रभु-भक्तों की अविरल सेवी।। (14)

प्रभु भक्तों की मंशा पूरे, चिंतामणि सम चिंता चूरे।
पारस प्रभु का जयकारा हो, पद्मावती का झंकारा हो।। (15)
माथे मुकुट भाल सूरज ज्यों, बिंदिया चमक रही चंदा।
अधरों पर मुस्कान शोभती, मां की मूरत नित्य मोहती।। (16)

सुरनर मुनिजन मां को ध्यावे, संकट नहीं सपने में आवे।
मां का जो जयकारा बोले, उनके घर सुख-संपत्ति बोले।। (17)

ॐ ह्रीं श्री क्लीं मंत्र से ध्याऊं, धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाऊं।
रिद्धि-सिद्धि सुख-संपत्ति दाता, सोया भाग्य जगा दो माता।। (18)

मां को पहले भोग लगाऊं, पीछे ही खुद भोजन पाऊं।
मां के यश में अपना यश हो, अंतरमन में भक्ति-रस हो।। (19)

सुबह उठो मां की जय बोलो, सांझ ढले मां की जय बोलो।
जय-जय मां जय-जय नित तेरी, मदद करो मां अविरल मेरी।। (20)

शुक्रवार मां का दिन प्यारा, जिसने पांच बरस व्रत धारा।
उसका काज सदा ही संवरे, मां उसकी हर मंशा पूरे।। (21)

एकासन-व्रत-नियम पालकर, धूप-दीप-चंदन पूजन कर।
लाल-वेश हो चूड़ी-कंगना, फल-श्रीफल-नैवेद्य भेंटना।। (22)

मन की आशा पूर्ण हुए जब, छत्र चढ़ाएं चांदी का तब।
अंतर में हो शुक्रगुजारी, मां का व्रत है मंगलकारी।। (23)

मैं हूं मां बालक अज्ञानी, पर तेरी महिमा पहचानी।
सांचे मन से जो भी ध्यावे, सब सुख भोग परम पद पावे।। (24)

जीवन में मां का संबल हो, हर संकट में नैतिक बल हो।
पाप न होवे पुण्य संजोएं, ध्यान धरें अंतरमन धोएं।। (25)

दीन-दुखी की मदद हो मुझसे, मात-पिता की अदब हो मुझसे।
अंतर-दृष्टि में विवेक हो, घर-संपति सब नेक-एक हो।। (26)

कृपादृष्टि हो माता मुझ पर, मां पद्मावती जरा रहम कर।
भूलें मेरी माफ करो मां, संकट सारे दूर करो मां।। (27)

पद्‍म नेत्र पद्मावती जय हो, पद्‍म-स्वरूपी पद्‍म हृदय हो।
पद्‍म-चरण ही एक शरण है, पद्मावती मां विघ्न-हरण है।। (28)
।।दोहा।।पद्‍म रूप पद्मावती, पारस प्रभु हैं शीष।
'सेवक' तुम्हारी शरण में, दो मंगल आशीष।। (29)
पार्श्व प्रभु जयवंत हैं, जिन शासन जयवंत।
पद्मावती जयवंत हैं, जयकारी भगवंत।। (30)
चरण-कमल में सेवक का, नमन करो स्वीकार।
भक्तों की अरजी सुनो, वरते मंगलाचार।। (31)
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्री पद्मावति माता नाम मंत्र १०८ ,, ॐ पद्मावती पदम्नेत्रे पद्मासने लक्ष्मीदायिनी वांछापुरिनी रिद्धिम सिद्धिम जयम जयम जयम कुरु कुरु नमः

ॐ ह्रीँ श्रीं क्लीँ ऐँ श्री पदमावती दैव्यै नमः ।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं श्री पद्मावती देव्यै नमः ।।
ॐ पद्मावती पदम्नेत्रे पद्मासने लक्ष्मीदायिनी वांछापुरिनी रिद्धिम सिद्धिम जयम जयम जयम कुरु कुरु नमः| "
१०८ श्री पद्मावति माता नाम मंत्र

(1)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महादेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(2)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कल्याण्यै प द्मावत्यै स्वाहा ।।
(3)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री भुवनेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(4)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चंड्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(5)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कात्यायन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(6)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गौर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(7)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जिनधर्मपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(8)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचब्रह्मपदाराध्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(9)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचमंत्रोपदेशिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(10)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचव्रतगुणोपेतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(11)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पंचकल्याणदर्शिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(12)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री श्रियै पद्मावत्यै स्वाहा
(13)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री तोतलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(14)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नित्यायै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(15)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री त्रिपुरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(16)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री काम्यसाधिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(17)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मदनोन्मालिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(18)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री विद्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(19)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महालक्ष्म्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(20) ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सरस्वत्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(21)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सारस्वतगणाधीशायै पद्मावत्यै स्वाहा
(22)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वसास्त्रोपदेशिन्यै पद्मावत्यैस्वाहा
(23)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(24)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महादुर्गायै पद्मावत्यै स्वाहा
(25)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री त्रिनैत्रायै पद्मावत्यै स्वाहा
(26)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री फणिशेखर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(27)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जटाबालेन्दुमुकुटायै पद्मावत्यै स्वाहा
(28)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कुक्कुटोरगवाहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(29)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चतुर्मुख्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(30)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महायसायै पद्मावत्यै स्वाहा
(31)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री धनदेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(32)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गुह्येश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा ।।
(33)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागराज महापत्न्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(34)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(35)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागदेवतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(36)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सिद्धान्त सम्पन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(37)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री द्वादशांगपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(38)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चर्तुदशमहा विद्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(39)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अवधिज्ञानलोचनायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(40)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वासन्त्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(41)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वनदेव्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(42)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वनमालायै पद्मावत्यै स्वाहा
(43)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महेश्वर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(45)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महाधोरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(46)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महारौद्रायै पद्मावत्यै स्वाहा
(47)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वीतभीतायै पद्मावत्यै स्वाहा
(48)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अभयंकर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(49)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कंकाल्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(50)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कालरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(51)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गंगायै पद्मावत्यै स्वाहा
(52)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गान्धर्वनायक्यै पद्मावत्यै
स्वाहा
(53)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यग्दर्शनसंपन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(54)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यग्ज्ञानपरायण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(55)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सम्यक्चारित्रसं
पन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(56)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नराणामुपकारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(57)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अगण्यपुण्यसंपन्नायै पद्मावत्यै स्वाहा
(58)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गणन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(59)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गणनायक्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(60)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पातालवासिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(61)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मायै पद्मावत्यै स्वाहा
(62)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मास्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(63)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मलोचनायै पद्मावत्यै स्वाहा
(64)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री प्रज्ञप्त्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(65)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री रोहिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(66)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जम्भायै पद्मावत्यै स्वाहा
(67)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री स्तम्भिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(67)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मोहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(68)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री जयायै पद्मावत्यै स्वाहा
(69)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री योगिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(70)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री योगविज्ञान्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(71)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मृत्युदारिद्यभंजिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(72)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री क्षमायै पद्मावत्यै स्वाहा
(73)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री संपन्नधरण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(74)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वपापनिवारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(75)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री ज्वालामुख्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(76)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री महाज्वालामालिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(77)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वज्रशृंखलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(78)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री नागपाशधरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(79)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री धैर्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(80)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री श्रेणीतानफलान्वितायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(81)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तायै पद्मावत्यै स्वाहा
(82)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री प्रशस्तायै पद्मावत्यै स्वाहा
(83)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री विद्यार्यायै पद्मावत्यै स्वाहा
(84)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(85)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री हस्तिवाहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(86)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री वसन्तलक्ष्म्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(87)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गीर्वाण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(88)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वाण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(89)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पद्मविष्टरायै पद्मावत्यै
स्वाहा
(90)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री बालार्कवर्णसंकाशायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(91)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री शृंगाररसनायक्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(92)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री अनेकान्तात्मतत्त्वज्ञायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(93)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चिंतितार्थफलप्रदायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(94)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री चिंतामण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(95)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कृपापूर्णायै पद्मावत्यै स्वाहा
(96)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री पापारंभविमोचिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(97)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कल्पवल्लीसमाकारायै
पद्मावत्यै स्वाहा
(98)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री कामधेनवे पद्मावत्यै स्वाहा
(99)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री शुभंकर्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(100)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सद्धर्मवत्सलायै पद्मावत्यै स्वाहा
(101)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वायै पद्मावत्यै स्वाहा
(102)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सद्धर्मोत्सववर्द्धिन्यै
पद्मावत्यै स्वाहा
(103)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वपापोपशमन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(104)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सर्वरोगनिवारिण्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(105)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री गंभिरायै पद्मावत्यै स्वाहा
(106)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री मोहिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
(107)
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सिद्धायै पद्मावत्यै स्वाहा
(108 )
ॐ ह्रीँ श्रीँ श्री सेफालितरुवासिन्यै पद्मावत्यै स्वाहा
108 नाम मन्त्र
का पाठ करने के बाद
27 बार यह मन्त्र जपना
ॐ नमो भगवति ! त्रिभुवनवशंकरी सर्वभरणभूषिते पद्मनयने ! पद्मिनी पद्मप्रभे ! पद्मकोशिनी ! पद्महस्ते!श्रीँ ह्रीं कुरु कुरु , मम ह्रदयकार्यं कुरु कुरु , मम सर्वशांतिं कुरु कुरु मम सर्वराज्यवश्यं कुरु कुरु, सर्वलोकवश्यं कुरु कुरु, मम सर्व स्त्री वश्यं कुरु कुरु, मम सर्व भूत पिशाच प्रेतरोषं हर हर सर्वरोगान् छिंद छिंद, सर्वविघ्नान् भिन्द भिन्द, सर्वविषं छिंद छिंद, सर्व कुमृगं छिंद छिंद ,सर्व शाकिनी छिंद छिंद,
श्री पार्श्वजिनपदाम्भोज युगाय नमः ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रों ह्र:श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा सर्वजन-राज्य स्त्रीपुरुष-वश्यं सर्व सर्व ॐ आं क्रों ह्रीं ऐं क्लीं ह्रीं देवी ! पद्मावती ! त्रिपुर-कामसाधिनी दुर्जन-मति-विनाशिनी त्रैलोक्य क्षोभिनी श्री पार्श्वनाथोप्सर्ग-हारिणी क्लीं क्लूं मम दुष्टान् हन हन ,
मम सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट स्वाहा ।
ॐ आं क्रों ह्रीं क्लीं हूं हसौं पद्मे ! देवी ! मम सर्व-जगद्वशं कुरु कुरु सर्व विघ्नान् नाशय नाशय पुरक्षोभं कुरु कुरु ह्रीँ संवौषट् स्वाहा
ॐ आं क्रों हौं द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः हम्ल्वंयूं पद्मावती सर्वपुरजनान् क्षोभय क्षोभय मम पादयोः पातय पातय आकर्षिणी ह्रीं नमः
ॐ आँ क्रों ह्रीं अर्हं मम पापं फट् फट् दह दह हन हन पच पच पाचय पाचय हं ब्भं ब्भां क्ष्वीं हंसः ब्भं वंह्य वंह्य क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षौं क्षं क्षः क्षिं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रौं ह्रं ह्रः हिः हिः हिं द्रां द्रीं द्रावय द्रावय नामोर्हते भगवते श्रीमते ठः ठः मम श्रीरस्तु , पुष्टिरस्तु, कल्याणंस्तु स्वाहा... .

देवी पद्मावती आरती तुमारी, मंगलकारी जय जय कारी….देवी…१

पार्श्व प्रभु छे शिरपर ताहरे, भक्ति करंतां तुं भक्तोने तारे….देवी..२

उज्जवल वर्णी मूत्ति शुं सोहे, नीरखी हरखी सहु जन मोहे…..देवी..३

कुर्कुट सर्पना वाहने बेठी, भद्रासनथी तुं शोभे छे रुडी……देवी..४

सप्तफणा शोभे मनोहारी, नयन मनोहर परिकरधारी…..देवी…५

कमल पाशांकुश फळ रुडुं संगे, चार भुजामां कलामय अंगे..देवी…६

विविध स्वरुपे भिन्न भिन्न नामे, जगपूजे सहु सिद्धि कामे….देवी…७

शीघ्रफळा तुं संकट टाळे, विघ्न विदारे वांछित आले…..देवी…..८

धरणेन्द्र देवनां देवी छो न्यारा, पार्श्वभक्तोना दुःख हरनारा…देवी….९

……..नगरे …….तीर्थे, दर्शन करतां दुःख सहु विसरे……देवी…१०

धर्म प्रतापे आशीष देजो, सुयश सिद्धिने मंगल करजो…..देवी…११
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Sunday, 25 September 2016

दुर्गा पूजा,शारदीय नवरात्रे, कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त

दुर्गा पूजा,शारदीय नवरात्रे, कलश स्थापना की शुभ मुहूर्त 
शारदीय नवरात्री पूजन 21 सितंबर 2017 से प्रारम्भ है। इस दिन प्रथम नवरात्र (प्रतिपदा) है। नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री के रूप में विराजमान होती है। उस दिन कलश स्थापना के साथ-साथ माँ शैलपुत्री की पूजा होती हैऔर इसी पूजा के बाद मिलता है माँ का आशीर्वाद।
भारतीय शास्त्रानुसार नवरात्रि पूजन तथा कलशस्थापना आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के पश्चात 10 घड़ी तक अथवा अभिजीत मुहूर्त Abhijit muhurt में ही करना चाहिए। कलश स्थापना Kalash Sthapna के साथ ही नवरात्री का त्यौहार प्रारम्भ हो जाता है।
अभिजितमुहुर्त्त यत्तत्र स्थापनमिष्यते। अर्थात अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना करना चाहिए। भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार नवरात्रि पूजन द्विस्वभाव लग्न (Dual Lagan) में करना श्रेष्ठ होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मिथुन, कन्या,धनु तथा कुम्भ राशि द्विस्वभाव राशि है। अतः हमंा इसी लग्न में पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए।
नवरात्र कलश स्थापना मुहूर्त 2017
घटस्थापना मुहूर्त = 06:22 to 07:30
अवधि = 1 घंटा 8 मिनट
घटस्थापना मुहूर्त तिथि – प्रतिपदा तिथि
घटस्थापना मुहूर्त लग्न – द्विस्वभाव राशि कन्या लग्न
प्रतिपदा तिथि आरम्भ = 05:41 बजे से 21/ सितंबर /2017
प्रतिपदा तिथि समाप्त = 07:45 तक 22/ सितंबर /2017प्रथम(प्रतिपदा)
नवरात्र हेतु पंचांग विचार
दिन(वार) – वृहस्पतिवार
तिथि – प्रतिपदा
नक्षत्र – हस्त
योग – भव
करण – किंस्तुघ्न
पक्ष – शुक्ल
मास – आश्विन
लग्न – धनु (द्विस्वभाव)
लग्न समय – 11:33 से 13:37
मुहूर्त – अभिजीत
मुहूर्त समय – 11:46 से 12:34 तक
राहु काल – 13:45 से 15:16 तक
विक्रम संवत – 2074

इस वर्ष अभिजीत मुहूर्त (11:46 से12:34 तक है ) जो ज्योतिष शास्त्र में स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया है। धनु लग्न में पड़ रहा है अतः धनु लग्न में ही पूजा तथा कलश स्थापना करना श्रेष्ठकर होगा।

2017 : माता दुर्गा के प्रथम रूप “शैलपुत्री”

माँ दुर्गा के प्रथम रूप “शैलपुत्री”की उपासना के साथ नवरात्रि प्रारम्भ होती है। शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण, माँ दुर्गा के इस रूप का नाम “शैलपुत्री” है। पार्वती और हेमवती भी इन्हीं के नाम हैं। माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएँ हाथ में कमल का फूल है। माता का वाहन वृषभ है। माता शैलपुत्री की पूजा-अर्चना इस मंत्र के उच्चारण के साथ करनी चाहिए-

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
नवरात्र पूजन सामग्री
माँ दुर्गा की सुन्दर प्रतिमा, माता की प्रतिमा स्थापना के लिए चौकी, लाल वस्त्र , कलश/ घाट , नारियल का फल, पांच पल्लव आम का, फूल, अक्षत, मौली, रोली, पूजा के लिए थाली , धुप और अगरबती, गंगा का जल, कुमकुम, गुलाल पान, सुपारी, चौकी,दीप, नैवेद्य,कच्चा धागा, दुर्गा सप्तसती का किताब ,चुनरी, पैसा, माता दुर्गा की विशेष कृपा हेतु संकल्प तथा षोडशोपचार पूजन करने के बाद, प्रथम प्रतिपदा तिथि को, नैवेद्य के रूप में गाय का घी माता को अर्पित करना चाहिए तथा पुनः वह घी किसी ब्राह्मण को दे देना चाहिए।
वर्ष 2017 की नवरात्री की तिथियाँ
प्रथम नवरात्रि (प्रतिपदा), शैलपुत्री स्वरूप की पूजा 21 सितंबर 2017, वृहस्पतिवार,
दूसरा नवरात्रि, चन्द्र दर्शन, देवी ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा 22 सितंबर 2017, शुक्रवार
तृतीय नवरात्रि, सिन्दूर चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा 23 सितंबर 2017, शनिवार
चतुर्थ नवरात्रि, कुष्मांडा स्वरूप की पूजा 24 सितंबर 2017, रविवार
पंचमी नवरात्रि, स्कंदमाता की पूजा, वरद विनायका चौथ 25 सितंबर 2017, सोमवार
षष्ठी नवरात्रि, कात्यायनी स्वरूप की पूजा 26 सितंबर 2017, मंगलवार
सप्तमी नवरात्रि, कालरात्रि स्वरूप की पूजा 27 सितंबर 2017, बुधवार
अष्टमी नवरात्रि, महागौरी स्वरूप की पूजा 28 सितंबर 2017, वृहस्पतिवार

नवमी नवरात्रि, सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा 29
(1) प्रथम कलशस्थापन शैलपुत्री (भोग -खीर)
(2) द्वितीया ब्राह्मचारिणी (भोग खीर,गाय का घी,एवं मिश्री)
(3) त्रतीया चन्द्रघंटा (भोग कैला,दूध,माखन,मिश्री )
(4) चतुर्थी कुष्मांडा (भोग पोहा,नारियल,मखाना)
(5) पंचमी स्कन्दमाता (भोग शहद एवं मालपुआ )खिलोना
(6) षष्टी कात्यायनी(भोग शहद एवं खजूर)) सुहाग सामान
(7) सप्तमी कालरात्री (भोग अंकुरीत चना एवं अंकुरित मूँग )
(8) अष्टमी महागौरी (भोग नारियल,खिचड़ी,खीर )
(9) नवमी सिध्दीदात्री (भोग चूड़ा दही,पेड़ा,हलवा,,)
(10 ) दशमी धान का लावा
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,,,,,लिखने कुछ गलती 
हो तो अज्ञानी समझकर क्षमा करे,

Thursday, 15 September 2016

अनंत चतुर्दशी की पौराणिकथा

अनंत चतुर्दशी की पौराणिकथा,,,,
अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।
एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर 'अंधों की संतान अंधी' कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया।
यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया।
पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा- 'हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।'
इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई -
प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई।
पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए।
कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे। सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।
कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं।
पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े। तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- 'हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्षपर्यंत व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।'
श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे।।Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.




गणेश विसर्जन, ,,गणेश उत्‍सव का एक अभिन्‍न अंग है

गणेश विसर्जन,.अनन्‍त चतुर्दशी,,गणेश उत्‍सव का एक अभिन्‍न अंग है ।वगणेश विसर्जन के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त
प्रातः मुहूर्त ..शुभ,, 06:00 से 07:32
प्रातः मुहूर्त ..चर, लाभ, अमृत, 10:37  से 15 :15
अपराह्न मुहूर्त ,,शुभ,, 16,:47  से 18 :20
सायाह्न मुहूर्त ,,अमृत, चर,, 18 :20  से 21:15
रात्रि मुहूर्त ,,लाभ,, 00:10  से 01:38 , सितम्बर 13
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ - सितम्बर 12, 2019 को 05:06  बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त - सितम्बर 13, 2019 को 07:35  बजे
गणेश विसर्जन, ,,गणेश उत्‍सव का एक अभिन्‍न अंग है
जिसके बिना गणेश उत्‍सव पूर्ण नही होता। इसके अर्न्‍तगत गणेश जी की प्रतिमा को गणेश चतुर्थी के दिन स्‍थापित किया जाता है और 10 दिन बाद अनन्‍त चतुर्दशी को उसी गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ इस गणेश उत्‍सव का समापन होता है।
जो भी व्‍यक्ति गणेश चतुर्थी के बारे में जानता है, लगभग हर वह व्‍यक्ति ये भी जानता है कि गणेश चतुर्थी को स्‍थापित की जाने वाली गणपति प्रतिमा को ग्‍यारहवें दिन यानी अनन्‍त चतुर्दशी के दिन किसी बहती नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित भी किया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि आखिर गणपति विसर्जन किया क्‍यों जाता है। गणपति विसर्जन के संदर्भ में अलग-अलग लोगों व राज्‍यों में मान्‍यताऐं भी अलग-अलग हैं, जिनमें से कुछ को हमने यहां बताने की कोशिश्‍ा की है।
ईश्‍वर सगुण साकार भी है और निर्गुण निराकार भी और ये संसार भी दो हिस्‍सों में विभाजित है, जिसे देव लोक व भू लोक के नाम से जाना जाता है। देवलोक में सभी देवताओं का निवास है जबकि भूलोक में हम प्राणियों का।
देवलोक के सभी देवी-देवता निर्गुण निराकार हैं, जबकि हम भूलोकवासियों को समय-समय पर विभिन्‍न प्रकार की भौतिक वस्‍तुओं, सुख-सुविधाओं की जरूरत होती है, जिन्‍हें देवलोक के देवतागण ही हमें प्रदान करते हैं और क्‍योंकि देवलोक के देवतागण निर्गुण निराकार हैं, इसलिए वे हम भूलोकवासियों की भौतिक कामनाओं को तब तक पूरा नहीं कर सकते, जब तक कि हमारी कामनाऐं उन तक न पहुंचे और भगवान गण‍पति हमारी भौतिक कामनाओं को भूलोक से देवलोक तक पहुंचाने का काम करते हैं।
गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणपति की मूर्ति स्‍थापना की जाती है और निर्गुण निराकार भगवान गणेश काे देवलोक से भूलोक की इस मूर्ति में सगुण साकार रूप में स्‍थापित होने हेतु विभिन्‍न प्रकार की पूजा-अर्चना, आराधना, पाठ करते हुए आह्वान किया जाता है और ये माना जाता है भगवान गण‍पति गणेश चतुर्थी से अनन्‍त चतुर्दशी तक सगुण साकार रूप में इसी मूर्ति में स्‍थापित रहते हैं, जिसे गणपति उत्‍सव के रूप में मनाया जाता है।
ऐसी मान्‍यता है कि इस गणपति उत्‍सव के दौरान लोग अपनी जिस किसी भी इच्‍छा की पूर्ति करवाना चाहते हैं, वे अपनी इच्‍छाऐं, भगवान गणपति के कानों में कह देते हैं। फिर अन्‍त में भगवान गणपति की इसी मूर्ति को अनन्‍त चतुर्दशी के दिन बहते जल, नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित कर दिया जाता है ताकि भगवान गणपति इस भूलोक की सगुण साकार मूर्ति से मुक्‍त होकर निर्गुण निराकार रूप में देवलोक जा सकें और देवलोक के विभिन्‍न देवताओं को भूलोक के लोगों द्वारा की गई प्रार्थनाऐं बता सकें, ताकि देवगण, भूलोकवासियों की उन इच्‍छाओं को पूरा कर सकें, जिन्‍हें भूलोकवासियों ने भगवान गणेश की मूर्ति के कानों में कहा था।
इसके अलावा धार्मिक ग्रन्‍थों के अनुसार एक और मान्‍यता है कि श्री वेद व्‍यास जी ने महाभारत की कथा भगवान गणेश जी को गणेश चतुर्थी से लेकर अनन्‍त चतुर्थी तक लगातार 10 दिन तक सुनाई थी। यह कथा जब वेद व्‍यास जी सुना रहे थे तब उन्‍होंने अपनी आखें बन्‍द कर रखी थी, इसलिए उन्‍हें पता ही नहीं चला कि कथा सुनने का ग‍णेशजी पर क्‍या प्रभाव पड रहा है।
जब वेद व्‍यास जी ने कथा पूरी कर अपनी आंखें खोली तो उन्‍होंने देखा कि लगातार 10 दिन से कथा यानी ज्ञान की बातें सुनते-सुनते गणेश जी का तापमान बहुत ही अधिक बढा गया है, अन्‍य शब्‍दों में कहें, तो उन्‍हें ज्‍वर हो गया है। सो तुरंत वेद व्‍यास जी ने गणेश जी को निकट के कुंड में ले जाकर डुबकी लगवाई, जिससे उनके शरीर का तापमान कम हुअा।
इसलिए मान्‍यता ये है कि गणेश स्‍थापना के बाद से अगले 10 दिनों तक भगवान गणपति लोगों की इच्‍छाऐं सुन-सुनकर इतना गर्म हो जाते हैं, कि चतुर्दशी को बहते जल, तालाब या समुद्र में विसर्जित करके उन्‍हें फिर से शीतल यानी ठण्‍डा किया जाता है।
इसके अलावा एक और मान्‍यता ये है कि कि वास्तव में सारी सृष्टि की उत्पत्ति जल से ही हुई है और जल, बुद्धि का प्रतीक है तथा भगवान गणपति, बुद्धि के अधिपति हैं। जबकि भगवान गणपति की प्रतिमाएं नदियों की मिट्टी से बनती है। अत: अनन्‍त च‍तुर्दशी के दिन भगवान गणपति की प्रतिमाओं को जल में इसीलिए विसर्जित कर देते हैं क्योंकि वे जल के किनारे की मिट्टी से बने हैं और जल ही भगवान गणपति का निवास स्‍थान है।
गणपति बप्‍पा मोरया”
गणपति बप्‍पा से जुड़े मोरया नाम के पीछे गण‍पति जी का मयूरेश्‍वर स्‍वरूप माना जाता है। गणेश-पुराण के अनुसार सिंधु नामक दानव के अत्‍याचार से बचने हेतु देवगणों ने गणपति जी का आह्वान किया। सिंधु का संहार करने के लिए गणेश जी ने मयूर (मोर) को अपना वाहन चुना और छह भुजाओं वाला अवतार धारण किया। इस अवतार की पूजा भक्‍त लोग “गणपति बप्‍पा मोरया” के जयकारे के साथ करते हैं, और यही कारण है की जब गणेश जी को विसर्जित किया जाता है तो गणपति बप्‍पा मोरया, अगले बरस तू जल्‍दी आ का नारा लागया जाता है।
कैसे करते हैं गणपति विसर्ज भगवान गणपति जल तत्‍व के अधिपति है और यही कारण है कि अनंत चतुर्दशी के दिन ही भगवान गणपति की पूजा-अर्चना करके गणपति-प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। शास्‍त्रों के अनुसार मिट्टी की बनी गणेश जी की मूर्तियों को जल में विसर्जित करना अनिवार्य है। इसके लिए लोग गणेश जी की प्रतिमा को लेकर ढोल-नगारों के साथ एक कतार में निकलतें है, नाचते-गाते बहती नदी, तालाब या समुन्‍द्र के पास जाकर बड़े ही हर्षो उल्‍लास के साथ उनकी आरती करते हैं, और उसके बाद जब गणेश जी की प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है तो सभी भक्‍त मिलकर मंत्रोउच्‍चारण के जरिये प्रार्थना करते है। जो निम्‍न प्रकार से होती है
मूषिकवाहन मोदकहस्त, चामरकर्ण विलम्बितसूत्र ।
वामनरूप महेस्वरपुत्र, विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥
हे भगवान विनायक। आप सभी बाधाओं का हरण करने वाले हैं। आप भगवान शिव जी के पुत्र है, और आप अपने वाहन के रूप में मुस्‍कराज को लिये है। आप अपने हाथ में लड्डु लिये, और विशाल कान, और लम्‍बी सूण्‍ड लिये है। मैं पूरी श्रद्धा के सा‍थ आप को नमस्‍कार करता हूँ।।
पंचक आरम्भ
सितम्बर 12, 2019, बृहस्पतिवार को 03:29 ए एम बजे
पंचक अंत
सितम्बर 17, 2019, मंगलवार को 04:23 ए एम बजे
पंचक आरम्भ
अक्टूबर 9, 2019, बुधवार को 09:42 ए एम बजे
पंचक अंत
अक्टूबर 14, 2019, सोमवार को 10:21 ए एम बजे
पंचक आरम्भ
नवम्बर 5, 2019, मंगलवार को 04:48 पी एम बजे
पंचक अंत
नवम्बर 10, 2019, रविवार को 05:20 पी एम बजे
पंचक आरम्भ
दिसम्बर 3, 2019, मंगलवार को 12:58 ए एम बजे
पंचक अंत
दिसम्बर 8, 2019, रविवार को 01:29 ए एम बजे
पंचक आरम्भ
दिसम्बर 30, 2019, सोमवार को 09:36 ए एम बजे
पंचक अंत
जनवरी 4, 2020, शनिवार को 10:06 ए एम बजे
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Tuesday, 13 September 2016

श्री वीर तेजाजी,,,वीर तेजाजी महाराज

श्री वीर तेजाजी,, वीर तेजाजी महाराज 
तेजाजी की विरासत
(1) श्री वीर तेजाजी : शेषावतार लक्ष्मण जी
(2) जन्म तिथि : माघ शुक्ला चतुर्दशी, गुरुवार
वि.स. 1130 ,,,29 जनवरी 1074 ई.
(3) पिता : श्री ताहडदेव जी (थिरराज) धौलिया
(4) माता : श्रीमती रामकुंवरी
(5) वंश : नाग वंश की धौलिया जाट शाखा
(6) खांप : चौहान
(7) नख : खींची
(8) जन्म स्थल : खरनाल (नागौर)
(9) विवाह : पीले पोतडों में पुष्कर के नाग घाट पर
पुष्कर पूर्णिमा वि.स 1131
(10) पत्नी : पेमल
(11) ससुर : रायमल जी मुहता
(12) ससुर का गौत्र : झांझर जाट
(13) सासु : बोदल दे
(14) सासु का गौत्र : काला जाट
(15) ससुराल : शहर पनेर
(16) भाई : रुपजी, रणजी, गुणजी, महेश जी, नगजी
(17) भाभियाँ : रतनाई, शेरां, रीतां, राजा, माया
(18) बहिन : राजल
(19) बहनोई : नाथाजी सिहाग
(20) बहिन के ससुर : जोरा जी सिहाग
(21) बहिन का ससुराल : तबीजी (अजमेर)
(22) ननिहाल : त्योद व अठ्यासन
(23) नाना : दुल्हण जी सोढी
(24) गुरु : गुसांई जी व मंगलनाथ जी
(25) लाछां की संपत्ति : गौ माताएं
(26) वीरगति की निशानी : मेंमद मौलिया
(27) मेंमद मौलिया वाहक : आसू देवासी
(28) तेजाजी के दुश्मन : सासु बोदल दे व काला गौत्री बालू नाग
(29) तेजाजी का खेत : खाबड खेत (खरनाल)
(30) तेजाजी का तालाब : गैण तालाब (इनाणा व मूडावा के बीच)
(31) तेजाजी का रास्ता : तेजा पथ
(32) घाटा : मोकल घाटा (मालास परबतसर)
(33) नदी : पनेर की नदी
(34) तेजाजी का वचन : सत्यवाद
(35) तेजाजी की मर्यादा : नुगरां की धरती में वासा ना करां
(36) तेजाजी का व्रत : ब्रह्मचर्य
(37) सम्बोधन : सत्यवादी वीर तेजाजी
(38) माता का बोल : तेजा का बोयोडा मोती निपजे
(39) तेजाजी के साक्षी : चांद, सूरज व खेजडी वृक्ष
(40) बासग नाग द्वारा वरदान : काला बाला रोग चिकित्सा, घर घर पूजा
(41) तेजाजी देवता : सर्प विष चिकित्सा, कृषि उपकारक, पशुधन तारक
(42) पेमल का आशीर्वाद : पूजा से बस्ती नगर रोग निवारण
(43) तेजाजी की चिकित्सा पद्धति : गौमूत्र, नीमपत्र, काली मिर्च, देशी गाय का घी, देशी गाय के गोबर के कण्डो की भभूत
(44) तेजाजी का ध्वज : चांद, सूरज, नाग, खेजडी वृक्ष युक्त
(45) तेजाजी का भोग : देशी गाय का कच्चा दूध, नारियल, मिश्री
(46) तेजाजी के जागरण की रात व व्रत : भादवा सुदी नवमी हर वर्ष
(47) तेजाजी का शकुन : जागती जोत
(48) तेजाजी का गीत : गाज्यो गाज्यो जेठ आषाढ
(49) तेजाजी के गीत की प्रथम गायिका : लाछां गुर्जरी
(50) तेजाजी के गीत की पुन: रचना : बींजाराम जोशी
(51) तेजाजी का शिलोका : पूनमचन्द सिखवाल
(52) तेजाजी ख्याल : पं. अम्बालाल
(53) भक्ति : सालिगराम
(54) ईष्ट देव : शंकर भगवान
(55) सेवा : गोमाता
(56) कर्म : गोचारण, कृषि, युवराज पद दायित्व
(57) धर्म : गोरक्षा, न्याय, सत्यवाद
(58) तीर्थ : तीर्थराज पुष्कर
(59) वीरगति स्थल : सुरसुरा (अजमेर)
(60) दाह संस्कार स्थल : सुरसुरा (अजमेर)
(61) पेमल का सती स्थल : सुरसुरा (अजमेर)
(62) घोडी का नाम : लीलण
(63) प्रमुख शस्त्र : भाला
(64) सहअस्त्र शस्त्र : ढाल-तलवार, धनुष बाण
(65) रण संग्राम स्थल : मण्डावरिया पहाडी की तलहटी एवं चांग का लीला खुर न्हाल्सा करणाजी की डांग (पाली)
(66) प्रतिपक्षी : चांग के चीतावंशी मेर मीना
(67) मीना का सरदार : कालिया
(68) तेजाजी के साथी : पाँचू, खेता, जेता
(69) पेमल की सखी : लाछां गुर्जरी (चौहान खाँप)
(70) लाछां का गांव : रंगबाडी का वास पनेर (अजमेर)
(71) लाछां के पति : नन्दू गुर्जर
(72) लाछां की निशानी : लाछां बावडी
(73) वाईट मार्बल की तेजा जी की घोड़ी ( सूपर हिट ) जालसू नानक (काटेड़ी ) डेगाना
(74) तेजाजी महाराज ,,,,,जय तेजाजी।।।Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.


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