Sunday, 7 July 2019

नीलतन्त्रे तारास्तोत्रं


नीलतन्त्रे तारास्तोत्रं
https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे ।
प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।।
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रीकपालोत्पले खङ्गं ।
चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥१॥
वाचामीश्वरि भक्तिकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धिश्वरि ।
गद्यप्राकृतपद्यजातरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे ।।
नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारान्निधे ।
सौभाग्यामृतवर्धनेन कृपयासिञ्च त्वमस्मादृशम् ॥२॥
खर्वे गर्वसमूहपूरिततनो सर्पादिवेषोज्वले ।
व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते ।।
सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिमिलन्मुण्डद्वयीमूर्द्धज-।
ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥३॥
मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्द्धचन्द्राम्बिके ।
हुम्फट्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः ।।
मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा ।
परा वेदानां नहि गोचरा कथमपि प्राज्ञैर्नुतामाश्रये ॥४॥
त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां ।
तस्याः श्रीपरमेश्वरत्रिनयनब्रह्मादिसाम्यात्मनः ।।
संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनुर्देवेन्द्रमुख्यासुरान् ।
मातस्ते पदसेवने हि विमुखान् किं मन्दधीः सेवते ॥५॥
मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते ।
देवा जयसङ्गरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः ।।
देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परे ।
तत्तुल्यां नियतं यथा शशिरवी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥६॥
त्वन्नामस्मरणात्पलायनपरान्द्रष्टुं च शक्ता न ते ।
भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षश्च नागाधिपाः ।।
दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवो ।
डाकिन्यः कुपितान्तकश्च मनुजान् मातः क्षणं भूतले ॥७॥
लक्ष्मीः सिद्धिगणश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा वैरिणां ।
स्तम्भश्चापि वराङ्गने गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम् ।।
मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः ।
क्लान्तः कान्तमनोभवोऽत्र भवति क्षुद्रोऽपि वाचस्पतिः ॥८॥
ताराष्टकमिदं पुण्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः ।
प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः ॥९॥
लभते कवितां विद्यां सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत्
लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ।
कीर्तिं कान्तिं च नैरुज्यं प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥१०॥
॥इति श्रीनीलतन्त्रे तारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

1. ॐ तारिण्यै नमः।
2. ॐ तरलायै नमः।
3. ॐ तन्व्यै नमः।
4. ॐ तारायै नमः।
5. ॐ तरुणवल्लर्यै नमः। 
6. ॐ तीररूपायै नमः।
7. ॐ तर्यै नमः।
8. ॐ श्यामायै नमः।
9. ॐ तनुक्षीणपयोधरायै नमः।
10. ॐ तुरीयायै नमः।
11. ॐ तरुणायै नमः।
12. ॐ तीव्रगमनायै नमः।
13. ॐ नीलवाहिन्यै नमः।
14. ॐ उग्रतारायै नमः।
15. ॐ जयायै नमः।
16. ॐ चण्ड्यै नमः।
17. ॐ श्रीमदेकजटाशिरायै नमः।
18. ॐ तरुण्यै नमः।
19. ॐ शाम्भव्यै नमः।
20. ॐ छिन्नभालायै नमः।
21. ॐ भद्रतारिण्यै नमः ।
22. ॐ उग्रायै नमः।
23. ॐ उग्रप्रभायै नमः।
24. ॐ नीलायै नमः।
25. ॐ कृष्णायै नमः।
26. ॐ नीलसरस्वत्यै नमः।
27. ॐ द्वितीयायै नमः।
28. ॐ शोभनायै नमः।
29. ॐ नित्यायै नमः।
30. ॐ नवीनायै नमः।
31. ॐ नित्यनूतनायै नमः।
32. ॐ चण्डिकायै नमः।
33. ॐ विजयाराध्यायै नमः।
34. ॐ देव्यै नमः।
35. ॐ गगनवाहिन्यै नमः।
36. ॐ अट्टहास्यायै नमः।
37. ॐ करालास्यायै नमः।
38. ॐ चरास्यायै नमः।
39. ॐ अदितिपूजितायै नमः।
40. ॐ सगुणायै नमः।
41. ॐ असगुणायै नमः।
42. ॐ आराध्यायै नमः।
43. ॐ हरीन्द्रदेवपूजितायै नमः।
44. ॐ रक्तप्रियायै नमः।
45. ॐ रक्ताक्ष्यै नमः।
46. ॐ रुधिरास्यविभूषितायै नमः।
47. ॐ बलिप्रियायै नमः।
48. ॐ बलिरतायै नमः।
49. ॐ दुर्धायै नमः।
50. ॐ बलवत्यै नमः।
51. ॐ बलायै नमः।
52. ॐ बलप्रियायै नमः।
53. ॐ बलरतायै नमः।
54. ॐ बलरामप्रपूजितायै नमः।
55. ॐ ऊर्ध्वकेशेश्वर्यै नमः।
56. ॐ केशायै नमः।
57. ॐ केशवायै नमः।
58. ॐ सविभूषितायै नमः।
59. ॐ पद्ममालायै नमः।
60. ॐ पद्माक्ष्यै नमः।
61. ॐ कामाख्यायै नमः।
62. ॐ गिरिनन्दिन्यै नमः।
63. ॐ दक्षिणायै नमः।
64. ॐ दक्षायै नमः।
65. ॐ दक्षजायै नमः।
66. ॐ दक्षिणेरतायै नमः।
67. ॐ वज्रपुष्पप्रियायै नमः।
68. ॐ रक्तप्रियायै नमः।
69. ॐ कुसुमभूषितायै नमः।
70. ॐ माहेश्वर्यै नमः।
71. ॐ महादेवप्रियायै नमः।
72. ॐ पञ्चविभूषितायै नमः।
73. ॐ इडायै नमः।
74. ॐ पिङ्गलायै नमः।
75. ॐ सुषुम्णाप्राणरूपिण्यै नमः।
76. ॐ गान्धार्यै नमः।
77. ॐ पञ्चम्यै नमः।
78. ॐ पञ्चाननादिपरिपूजितायै नमः।
79. ॐ तथ्यविद्यायै नमः।
80. ॐ तथ्यरूपायै नमः।
81. ॐ तथ्यमार्गानुसारिण्यै नमः।
82. ॐ तत्त्वरूपायै नमः।
83. ॐ तत्त्वप्रियायै नमः।
84. ॐ तत्त्वज्ञानात्मिकायै नमः।
85. ॐ अनघायै नमः।
86. ॐ ताण्डवाचारसन्तुष्टायै नमः।
87. ॐ ताण्डवप्रियकारिण्यै नमः।
88. ॐ तालदानरतायै नमः।
89. ॐ क्रूरतापिन्यै नमः।
90. ॐ तरणिप्रभायै नमः।
91. ॐ त्रपायुक्तायै नमः।
92. ॐ त्रपामुक्तायै नमः।
93. ॐ तर्पितायै नमः।
94. ॐ तृप्तिकारिण्यै नमः।
95. ॐ तारुण्यभावसन्तुष्टायै नमः।
96. ॐ शक्तिभक्तानुरागिन्यै नमः।
97. ॐ शिवासक्तायै नमः।
98. ॐ शिवरत्यै नमः।
99. ॐ शिवभक्तिपरायणायै नमः।
100. ॐ ताम्रद्युत्यै नमः।
101. ॐ ताम्ररागायै नमः।
102. ॐ ताम्रपात्रप्रभोजिन्यै नमः।
103. ॐ बलभद्रप्रेमरतायै नमः।
104. ॐ बलिभुजे नमः।
105. ॐ बलिकल्पिन्यै नमः।
106. ॐ रामरूपायै नमः।
107. ॐ रामशक्त्यै नमः।
108. ॐ रामरूपानुकारिण्यै नमः।



तारा तान्त्रोक्त मन्त्रम
तारा काली कुल की महविद्या है ।
तारा महाविद्या की साधना जीवन का सौभाग्य है ।
यह महाविद्या साधक की उंगली पकडकर उसके लक्ष्य तक पहुन्चा देती है।
गुरु कृपा से यह साधना मिलती है तथा जीवन को निखार देती है ।
साधना से पहले गुरु से तारा दीक्षा लेना लाभदायक होता है ।
ज्येष्ठ मास तारा साधना का सबसे उपयुक्त समय है ।
तारा मंत्रम
॥ ऐं ऊं ह्रीं स्त्रीं हुं फ़ट ॥
मंत्र का जाप रात्रि काल में ९ से ३ बजे के बीच करना चाहिये.
यह रात्रिकालीन साधना है.
गुरुवार से प्रारंभ करें.
गुलाबी वस्त्र/आसन/कमरा रहेगा.
उत्तर या पूर्व की ओर देखते हुए जाप करें.
यथासंभव एकांत वास करें.
सवा लाख जाप का पुरश्चरण है.
ब्रह्मचर्य/सात्विक आचार व्यव्हार रखें.
किसी स्त्री का अपमान ना करें.
क्रोध और बकवास ना करें.
साधना को गोपनीय रखें.
जयेष्ट मास तारा साधना के लिए सर्वश्रेष्ट होता है.
प्रतिदिन तारा त्रैलोक्य विजय कवच का एक पाठ अवश्य करें. यह आपको निम्नलिखित ग्रंथों से प्राप्त हो जायेगा.
तारा महाविद्या साधना
तारा काली कुल की महविद्या है ।
तारा महाविद्या की साधना जीवन का सौभाग्य है ।
यह महाविद्या साधक की उंगली पकडकर उसके लक्ष्य तक पहुन्चा देती है।
गुरु कृपा से यह साधना मिलती है तथा जीवन को निखार देती है ।
साधना से पहले गुरु से तारा दीक्षा लेना लाभदायक होता है ।
ज्येष्ठ मास तारा साधना का सबसे उपयुक्त समय है
मंत्रम
॥ ऐं ऊं ह्रीं स्त्रीं हुं फ़ट ॥
मंत्र का जाप रात्रि काल में ९ से ३ बजे के बीच करना चाहिये.
यह रात्रिकालीन साधना है.
गुरुवार से प्रारंभ करें.
गुलाबी वस्त्र/आसन/कमरा रहेगा.
उत्तर या पूर्व की ओर देखते हुए जाप करें.
यथासंभव एकांत वास करें.
सवा लाख जाप का पुरश्चरण है.
ब्रह्मचर्य/सात्विक आचार व्यव्हार रखें.
किसी स्त्री का अपमान ना करें.
क्रोध और बकवास ना करें.
साधना को गोपनीय रखें.
प्रतिदिन तारा त्रैलोक्य विजय कवच का एक पाठ अवश्य करें.
तारा महाविद्या साधना....हम फिर से कह रहे है कि बिना गूरू के मत करें
तारा काली कुल की महविद्या है ।
तारा महाविद्या की साधना जीवन का सौभाग्य है ।
यह महाविद्या साधक की उंगली पकडकर उसके लक्ष्य तक पहुन्चा देती है।
गुरु कृपा से यह साधना मिलती है



आज मॉ तारा की महिमा का बखान करते है , तारा कितना मीठा नाम है जितनी बार लें मन करता है और लें मन ही नही भरता, मॉ तारा की ममता भी निराली है आज आपको मॉ तारा के प्रिय बेटे वामाखेपा के बारे मे बताते हैवामा,माँ तारा से झगड़ा करते फिर माँ को मनाते।कभी जब खुद रूठ जाते तो माँ अपने प्यारे बेटे को मनाती।ऐसा संबध है तारा माँ का अपने भक्तों से।एक बार की घटना है तारापीठ के मंदिर में मां का पूजा आरम्भ होने जा ही रहा था कि वामाखेपा मंदिर में पहुँच कर माँ का प्रसाद जो भोग के लिए रखा था खुद खाने लगे।इनके इस कृत्य को देख पंडित,पुजारी इन्हें मारने लगे,बहुत मारा उन्हें और उठाकर बाहर फेंक दिया और कहा कि फिर दिखाई मत देना मंदिर के आसपास।वामा रो रहे थे और बोल रहे थे कि "तुने ही मंदिर मे बुलाया माँ और इतना मार खाया मै।अरे भई तुम लोग मुझे इस तरह मत मारो,माँ ने मुझसे खाने को कहाँ था तभी मैं खा रहा हूँ।" इधर मार पे मार पड़ती रही,वो दर्द से चिल्लाते रहे।पागल मुर्ख कही के,अब देखते है कौन तुमको अब प्रसाद खाने को देता है,एक पुजारी कहता है।एक भक्त से रहा नहीं गया कि बेचारा बोल उठा क्यों मार रहे हो बेचारे को ब्राह्मण का लड़का है,छोड़ दो इसे।मारे नहीं तो क्या करें,इस पागल को अभी पुजा भी नहीं हुई है प्रसाद जुठा कर दिया है।यह शमशान में कुते,सियार के साथ बैठकर जुठन खाने वाला,इसे कह रहे हो क्यों मार रहे हो?ठीक कर रहे है!ये फिर मंदिर के सामने दिखाई दिया तो मार के हाथ पैर तोड़ देंगे।इधर वामाचरण आँखो के आँसू पोंछते पोंछते उठ कर दर्द से कराहते हुए श्मशान आ गये और पेड़ के नीचे लेट कर रोते रहे।नाटो की रानी सो रही थी।उन्होनें स्वप्न देखा कि तारापीठ मे माँ तारा मंदिर छोड़कर रोते रोते जा रही है।जैसे उनको बहुत दुःख हो,माँ के बदन,पीठ से खुन निकल रहा था।जैसे माँ को किसी ने बड़ी बेदर्दी से
हाथ जोड़कर रानी खड़ी हो गई और कहने लगी,माँ किस अपराध की सजा दे रही हो मां,हमे क्यों छोड़कर जा रही हो मां।फिर मां ने कहा काफी युग युगान्तर से मैं यहां काफी अच्छी और सुख शान्ति में थी लेकिन अब नहीं हूँ,तुम्हारे मंदिर में मेरे प्रिय पुत्र वामाचरण को कई लोगों ने निर्दयी होकर मारा है।वो प्रहार सब मुझ पर पड़े हैं,वो चोट मुझे लगी है।काफी दर्द हो रहा है,इसी वजह से मै और यहाँ नहीं रहूँगी चली जाऊंगी।रानी बोली एक की सजा दूसरे को क्यों माँ?मुझे अपनी गलती सुधारने का मौका दो,ताकि जिसने ये पाप किया हैं उसे सजा मिले मां!पर तुम हमें क्षमा करो मां।ठीक है पुत्री!मेरे प्रसाद को मेरे पुत्र को खिला दो,कारण चार दिन से मेरा पुत्र भूखा है और मैं भी उपवास में हूँ।रानी पड़प उठी,अरे मां!ये क्या आप चार दिन से उपवास में हैं!हां!अगर पुत्र भुखा हो तो क्या मां खा सकती है।इसीलिए मै भी भुखी हूँ।फिर अचानक रानी की नींद टूट गई।इधर मां तारा अपने पुत्र बामा को मनाने लगी।बामा पीड़ा से कराह रहे थे।मां वामाचरण के पास खुद प्रसाद लेकर आई और वामा से कहने लगी,ले बेटा प्रसाद खा ले,कितने दिनों से तुमने कुछ खाया नहीं,देख कैसी हालत हो गई है,एकदम सुख गया हैं।मां की बात सुन वामा बोले नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगा और मै कभी तुम्हारे मंदिर में नहीं जाऊंगा।खुद मंदिर में बुलाकर मार खिलाती हो।नहीं बेटे!उनलोगों ने तुम्हें नहीं मारा है,मुझे मारा है,ये देखो मेरे बदन में भी दाग है।मुझे भी दर्द हो रहा है,मैं भी तुम्हारी तरह भूखी हूँ।इतना सुनते वामा बोले,माँ मेरी तु भी भुखी हैं क्यों नहीं खाया तो मां बोली बेटा तुने नहीं खाया तो मैं कैसे खा सकती हूँ?इधर रानी अपनी प्रजा के साथ मंदिर आई।मंदिर में रानी आते ही सबसे पहले उस पुजारी को निकाल कर नया पुजारी रखा,फिर वामा को खोजने लगी।ढूँढते हुए रानी श्मशान में आई ,वहाँ वामा को देख क्षमायाचन
तथा सपने की सारी बात बताई।उसी समय रानी के आदेश पर मंदिर की सारी जिम्मेवारी वामाचरण को सौंप दी और बोली पहले वामा बाबा को भोग लगेगा फिर मां को भोग लगेगा तथा मंदिर की पूजा वामा अपने हिसाब से करेगें।इसके बाद क्या मजाल,कौन क्या कहे,बामा जाकर मंदिर के आसन पर बैंठ गये।कोई आचार,विचार नहीं मां को देख वामा मुस्कुरा दिये,तुम तो अन्तर्यामी हो,तुम क्या खाओगी पहले मैं ही खाऊंगा,और खुद खाने लगे,ये देख वहाँ उपस्थित लोग आश्चर्य होकर देखने लगे।खाना खाने के बाद वामा ने शुरू किया मां का पूजन करना।दोनों हाथों में जवा फूल की माला लेकर जितनी भी इच्छा हुई उतनी गाली देना शुरू किया मां को और वामा के आँखों से आँसू भी गिरते रहे ।फूल से उस आँसू को पोछते हुए अन्जली देने के उद्देश्य से देवी की मूर्ति पर फूल फेंक दिया।मंत्र के नाम पर उन्होनें सिर्फ ये कहा ये लो फूल,ये लो बेलपत्र,सारे भक्तजन लोग देखे कि वामा के द्वारा फेंके फूल एक एक कर सब आपस में मिलकर माला का रूप ले लिया फिर माँ के गले मे पहुँच गई।ऐसी प्रेममयी है तारा माँ और उनके भक्त।बामा एक बार काशी से पैदल ही तारा पीठ चल पड़े,कारण पैसा भी नहीं था।उनके सामने जो रास्ता मिला उसी रास्ते से आगे बढते रहे,दिन भर चलते जहां रात होती वही किसी पेड़ के निचे सो जाते फिर प्रातःचलने लगते।लगातार कई दिन भूखे प्यासे चलते रहे,बाद में थक गये थे तथा कमजोरी के कारण चल भी नही पा रहे थे।थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गये फिर एक यात्री से पूछा ये कौन सी जगह हैं भाई,पर इन्हें पागल समझ लोग मुँह फेर चले जाते,थके तो थे ही फिर हार कर बोलने लगे हे माँ तारा ये कौन सी जगह ले आई हो माँ।अचानक एक आवाज आई तुम कहाँ जाओगे।नारी की आवाज सुन रास्ते के दुसरी तरफ देखा काले कपड़े पहनी हुई एक कुमारी कन्या खड़ी है,काफी सुन्दर घने बालों वाली कन्या थी तथा पाँवो मे आलता लगा हुआं था।वामा आवाक 



देवी काली तथा तारा में समानतायें।
देवी काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण तारा नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देविओ की जिह्वा मुँह से बाहर हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देविओ का वर्ण गहरे रंग काहैं एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कही कही देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुंडो की माला धारण करती हैं तो देवी तारा व्यग्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखते हैं। दोनों देविओ का वर्णन शास्त्रानुसार शिव पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि, 'हर' भगवान शिव का एक नाम हैं। परन्तु देवी तार ने ही, भगवान शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय, कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वो तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के सामान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं।
श्मशान वासिनी या वासी :तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता, मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वो स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, ये वो स्थान हैं, जहाँ पंच या पञ्च महाभूत, चिद-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतो से, संसार के समस्त जीवो के देह का निर्माण होता हैं, तथा शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वो स्थान हैं जहाँ, पांचो भूतो के मिश्रण से निर्मित देह, अपने अपने तत्व में मिल जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित ह्रदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। मानव देह कई प्रकार के विकारो का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारो या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। तथा मन या ह्रदय वो स्थान हैं जहाँ इन समस्त विकारो का दाह होता हैं अतः देवी काली अपने उपासको के विकार शून्य ह्रदय पर ही वास करती हैं।
चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी ह्रदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।
देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।
करालवदना या घोररूपा : देवी काली का वर्ण घनघोर या अत्यंत काला हैं तथा स्वरूप से भयंकर तथा डरावना हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के ह्रदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं।
पीनपयोधरा : देवी काली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनो लोको का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।
प्रकटितरदना : देवी काली के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतिक उज्वल दाँतो से दबाये हुऐ हैं। मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलो की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो।



तारा
भगवती कालीको ही नीलरूपा होनेके कारण तारा भी कहा गया है। वचनान्तरसे
तारा नामका रहस्य यह भी है कि वे सर्वदा मोक्ष देनेवाली, तारनेवाली हैं,
इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है। महाविद्याओँ में ये द्वितीय स्थानपर
परिगणित हैं। अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये
इन्हें नीलसरस्वती भी कहते हैं। भयंकर विपप्तियों से भक्तों की रक्षा
करती हैं। इसलिये उग्रतारा हैं। बृहन्नील-तन्त्र ादि ग्रन्थों में भगवती
ताराके स्वरूप की विशेष चर्चा है। हयग्रीवका वध करने के लिये इन्हें
नील-विग्रह प्राप्त हुआ था। ये शवरूप शिवरूप प्रत्यालीढ़ मुद्रा में
आरुढ़ हैं। भगवती तारा नीलवर्णवाली,नील कमलों के समान तीन नेत्रोंवाली
तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खड्ग धारण करनेवाली हैं। ये
व्याघ्रचर्मसे विभूषिता तथा कण्ठ में मुण्डमाला धारण करने वाली हैं।
शत्रुनाश, वाक्-शक्ति की प्राप्ति तथा भोग-मोक्ष की प्राप्ति के लिये
तारा अथवा उग्रतारा की साधना की जाती है। रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति
तारा महाविद्याओं में अद्भुत प्रभाववाली और सिद्ध की अधिष्ठाती देवी कहीं
गयी है। भगवती ताराके तीन रूप हैं।–तारा, एकजटा और नील सरस्वती। तीनों
रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं, किन्तु भिन्न
भिन्न होते हुए सबकी शक्ति समान और एक है। भगवती ताराकी उपासना मुख्यरूप
से तन्त्रोक्त पद्धतियों से होती हैं, जिसे आगमोक्त पद्धति भी कहते हैं।
इनकी उपासना से समान्य व्यक्ति भी बृहस्पति के समान विद्वान हो जाते है।
भारतमें सर्वप्रथम महर्षि वसिष्ठ ने ताराकी अराधना की थी। इसलिये ताराको
वसिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। वसिष्ठ ने पहले भगवती ताराकी आराधना
वैदिक रीतिसे करनी प्रारम्भ की, जो सफल न हो सकी। इन्हें अदृश्य शक्ति से
संकेत मिला कि वे तान्त्रिक-पद्धत िके द्वारा जिसे ‘चिनाचारा’ कहा जाता
है, उपासना करें। जब वसिष्ठ ने तान्त्रिक पद्धति का आश्रय लिया, तब
उन्हें सिद्ध प्राप्त हुई। यह कथा ‘आचार’ तन्त्र में वसिष्ट मुनि की
आराधना उपाख्या में वर्णित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पहले चीन,
तिब्बत, लद्दाख आदि में ताराकी उपासना प्रचलित थी।
ताराका प्रादुर्भाव, मेरू-पर्वतके, पश्चिम भाग में चोलना’ नामकी नदीके या
चोलन सरोवरके तटपर हुआ था, जैसा कि स्वतन्त्रतन्त्र में वर्णित है-
मेरोः पश्र्चिमकूले नु चोत्रताख्यों हृदो महान्।
तत्र जज्ञे स्वयं तारा देवी नीलसरस्वती।।
‘महाकाल-संहिता के काम कलाखण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें
तारारात्रिमें ताराकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। चैत्र-शुक्ल नवमी की
रात्रि ‘तारारात्रि’ कहलाती है-
चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्लपक्षे तु भूपते। क्रोधरात्रिर्मह ेशानि
तारारूपा भविष्यति।। (पुरश्चर्यार्णव भाग-3)
बिहार के सहरसा जिले में प्रसिद्ध ‘महिषी’ ग्राम में उग्रतारा का
सिद्धपीठ विद्यमान है। वहाँ तारा, एकजटा तथा नीलसरस्वती की तीनों
मूर्तियाँ एक साथ हैं। मध्य में बड़ी मूर्ति तथा दोनों तरफ छोटी
मूर्तियाँ हैं। कहा जाता है कि महर्षि वसिष्ठ ने यहीं ताराकी उपासना करके
सिद्ध प्राप्त की थी। तन्त्रशास्त्रके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘महाकाल’-संहिता
के गुह्य-काली खण्ड में महाविद्याओं की उपासनाका विस्तृत वर्णन हैं, उनके
अनुसार ताराका रहस्य अत्यन्त चमत्कारजनक हैं।



द्वितिय महाशक्ति मां तारा ...
ब्रह्मबेला के पहले मां महाकाली की सत्ता बताइ गई है इसके अनन्तर और सुर्य के पुर्व तक तारा का साम्राज्य होता है हिरण्यगर्भ विद्या के अनुसार निगम शास्त्र ने सम्पुर्ण सृष्टी की संरचना का आधार सुर्य को माना है असंख्य ब्रह्माण्ड है और असंख्य सुर्य इन सब का आधार जो परम सुर्य तत्व है वह सावित्री शक्ति है इसि के तप से समस्त सुर्य मन्डल आग्नेय है आग्नेय होने से सुर्य हिरण्मय कहलाते है क्योंकी अग्नि ही हिरण्यरेता है हिरण्यमंडल के एक नाभिक पर सुर्य प्रतिष्ठित हुआ अपने ब्रह्माण्ड के समस्त पिण्डो को धारण किये रहता है ब्रह्माण्ड को धारण करने से यह ब्रह्म है और हिरण्मय मण्डल को धारण करने से यह हिरण्यगर्भ कहा जाता है भ
भु: भुव: स्व: रुपरोदसी त्रिलोकी के निर्माता और अधिष्ठाता स्वयंभु परमेष्ठी,सुक्ष्मरुपा अमृतासृष्टी पृथ्वी चन्द्रमा सहित गृह उपगृहादि मृत्यासृष्टी के विभाजक एवं संचालक विश्वकेन्द्र में प्रतिष्ठित इन भगवान हिरण्यगर्भ का प्रादुर्भाव जब विकल्प से होने लगता है तब अनुपाख्य तम का ह्रास होने लगता है तथा महाकाली रुप का रुपान्तरण तारा शक्ति में हो जाता है इस प्रकार हिरण्यगर्भ परमपुरुष की अधिष्ठात्री शक्ति तारा है यह पुरुष क्षोभरहित है अत:अक्षोभ्य कहा जाता है वेदों के तात्विक समनव्य से जिस आपस्तत्व की उत्पत्ति पहले बताई जा चुकी है उससे समस्त विश्व व्याप्त हो जाता है और समस्त विश्व एक महासमुद्र बन जाता है इस आपोमय पारमेष्ठय महासमुद्र में घर्षण द्वारा आग्नेय परमाणु उत्पन्न हो जाते है तदनन्तर सफेदवाराह नामक प्रसिद्ध प्रजापतये वायु द्वारा परमाणु समुदाय के कैन्दो मे संघात होता है संघात होते होते आग्नेय परमाणु समुदाय घनिभूत हो पिण्ड रुप में परिणत हो जाते है इनका घनिकरण सहसा एक नही जाता है वरन तिव्रतर आकुंचन होता जाता है इस तिव्रतम आकुंचन से पिण्डमें अत्याधिक दबाव और तापक्रम उत्पन्न हो जाता है जिसके फलस्वरुप वे पिण्ड प्रज्वलित हो उठते है और विराट सुर्य का रुप धारण कर लेते है इस काल में ये अत्यन्त उग्र होते है और अन्न की ईच्छा से इनमें से बडी बडी रुद्राग्नि ज्वालाऐं निकलती है इस उग्र सुर्य की शक्ति ही उग्रतारा नाम से प्रसिद्ध है
सृष्टयोन्मुखी हुये सुर्य में वैष्णवी शक्ति अथवा पराशक्ति अपने यग्य रुप विष्णु स्वरुप से अनाहुति करती है सुर्य का कुछ प्रवर्गय भाग अलग हो हो कर अनेक शुद्र सुर्य और ग्रह उपग्रहादि का निर्माण कर अनेकानेक ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति कर देते है उक्त अन्नाहुति से उग्रतारा शांत होती है और तारा रुप से जगत का उद्धार करती रहती है इसि तारक शक्ति के सामन्जस्य से भगवान राम तारक ब्रह्म है जब तक अन्नाहुति होती रहती है तब तक तारा शान्त बनी रहती है अन्नाभाव में वही उग्ररुप धारण कर संसार को भस्म कर डालती है और पुर्ण शुन्यभाव में महाकाली की पुन: प्रतिष्ठा होती है महाकाली महाप्रलय की अधिष्ठात्री है और उग्रतारा सुर्य प्रलय की ,प्रलय करना दोनो का ही समान गुणधर्म है इसलिये दोनो के ध्यान में थोडा सा ही अन्तर रहता है.!!!

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Saturday, 6 July 2019

पञ्च तत्वों की अधिष्ठात्री देवी है देवी भुवनेश्वरी।


पञ्च तत्वों की अधिष्ठात्री देवी है देवी भुवनेश्वरी।
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संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त समस्त जीवित तथा अजीवित वस्तुओं का निर्माण मूल पञ्च तत्वों से ही होता हैं। १. आकाश, २. वायु ३. पृथ्वी ४. अग्नि ५. जल ये वो मूल तत्व है जिन से समस्त दिखने वाली तत्वों न निर्माण होता हैं। देवता तथा राक्षस, वेद, प्रकृति, महासागर, पर्वत, जीव, जंतु, समस्त वनस्पति इत्यादि समस्त भौतिक जगत इन्हीं पंच-तत्वों से जुड़ा हैं। पञ्च तत्वों का निरूपण तथा रचना इन्हीं भुवनेश्वरी देवी द्वारा ही हुआ है तथा वो इस इन समस्त तत्वों की ईश्वरी या मालकिन हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के निर्वाह, पालन पोषण का दाइत्व इन्हीं देवी भुवनेश्वरी का है, सात करोड़ महा मंत्र सर्वदा इनकी आराधना करने में तत्पर रहते हैं। देवी भक्तों को समस्त प्रकार कि सिद्धियाँ तथा अभय प्रदान करती हैं। देवी ललित के नाम से भी जानी जाती हैं, परन्तु ये ललित श्री विद्या ललित नहीं हैं। भगवान शिव द्वारा दो शक्तियों का नाम ललिता रखा गया है, एक पूर्वाम्नाय तथा दूसरी ऊर्ध्वाम्नाय द्वारा। ललिता शब्द जब त्रिपुर सुंदरी के साथ होती हैं तो वो श्रीविद्या ललिता के नाम से जानी जाती है तथा जब भुवनेश्वरी के साथ होती है तो भुवनेश्वरी ललित के नाम से जनि जाती हैं। इन के भैरव सदाशिव हैं।
देवी पञ्च परमेश्वरी नाम से विख्यात हैं। (मूल पांच तत्वों की ईश्वरी)
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देवी भुवनेश्वरी से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य

देवी भुवनेश्वरी से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य।
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देवी भुवनेश्वरी अपने अन्य नमो से भी प्रसिद्ध हैं :
१. मूल प्रकृति, देवी इस स्वरूप में स्वयं प्रकृति रूप में विद्यमान हैं, समस्त प्रकृति स्वरूप इन्हीं का रूप हैं। 
२. सर्वेश्वरी या सर्वेशी, देवी इस स्वरूप में, सम्पूर्ण चराचर जगत की ईश्वरी या मालकिन है। 
३. सर्वरूपा, देवी इस स्वरूप में, ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्व में विद्यमान है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इन्हीं का स्वरूप हैं।
४. विश्वरूपा, संपूर्ण विश्व का स्वरूप, इन्हीं देवी भुवनेश्वरी के रूप में हैं।
५. जगन-माता, सम्पूर्ण जगत, तीनो लोको की देवी जन्म दात्री है माता हैं।
६. जगत-धात्री, देवी इस रूप में सम्पूर्ण जगत को धारण तथा पालन पोषण करती हैं।
काली और भुवनेशी प्रकारांतर से अभेद है काली का लाल वर्ण स्वरूप ही भुवनेश्वरी हैं। दुर्गम नमक दैत्य के अत्याचारों से संतृप्त हो, सभी देवताओं तथा ब्राह्मणों ने हिमालय पर जा कर सर्वकारण स्वरुपा देवी भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी। सभी देवताओं तथा ब्राह्मणों के आराधना से संतुष्ट हो, देवी अपने हाथों में बाण, कमल पुष्प तथा शाक-मूल धारण किये हुए प्रकट हुई थी। देवी ने अपने नेत्रों से सहत्रो अश्रु जल धारा प्रकट की तथा इस जल से सम्पूर्ण भू-मंडल के समस्त प्राणी तृप्त हुए। समुद्रो तथा नदीओ में जल भर गया तथा समस्त वनस्पति सिंचित हुई। अपने हतो में धारण की हुई, शक फल मूलो से इन्होंने सम्पूर्ण प्राणिओ का पोषण किया, तभी से ये शाकम्भरी नाम से भी प्रसिद्ध हुई। इन्होंने ही दुर्गमासुर नमक दैत्य का वध किया तथा समस्त जगत को भय मुक्त, परिणाम स्वरूप देवी का दुर्गा नाम प्रसिद्ध हुआ।
भुवनेश्वरी अवतार धारण कर सम्पूर्ण जगत का निर्माण तथा सञ्चालन, तथा भगवान् विष्णु, 'ब्रह्मा' तथा शिव को जल प्रलय के पश्चात् अपना कार्य भर प्रदान करना।
श्रीमद देवी भागवत पुराण के अनुसार, जनमेजय द्वारा, व्यास जी से भगवान 'ब्रह्मा', विष्णु, शंकर तथा आदि शक्ति, अम्बा जी से उनके सम्बन्ध तथा विश्व के उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जाने पर, व्यास जी द्वारा जो वर्णन प्रस्तुत किया गया वो निन्नलिखित हैं। एक बार व्यास जी के मन में इसी तरह की जिज्ञासा जागृत हुई थी, तथा उन्होंने नारद जी से अपनी जिज्ञासा के निवारण हेतु प्रार्थना की। नारद जी के मन में भी ऐसी ही जिज्ञासा जागृत हुई थी, की पृथ्वी या इस सम्पूर्ण चराचर जगत का सृष्टि कर्ता कौन हैं ? तदनंतर नारद जी, 'ब्रह्मा' लोक में गमन कर अपने पिता 'ब्रह्मा जी' से प्रश्न किया।
नारद जी द्वारा पूछे जाने पर कि, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई ? 'ब्रह्मा', विष्णु तथा महेश में से किसके द्वारा इस चराचर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई हैं, सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन हैं ?
'ब्रह्मा जी' द्वारा उत्तर दिया गया कि, प्राचीन काल में जल प्रलय होने पर, केवल पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति होने पर, उनका ('ब्रह्मा जी') कमल से आविर्भूत हुआ। उस समय सर्वत्र केवल जल ही जल था, सूर्य, चन्द्र, पर्वत इत्यादि स्थूल जगत लुप्त था तथा चारो ओर केवल जल ही जल था, कमलकर्णिका पर आसन जमाये वे विचरने लगे। उन्हें ये ज्ञात नहीं था की इस महा सागर के जाल में उन का प्रादुर्भाव कैसे हुआ, उनका निर्माण करने वाला तथा पालन करने वाला कौन हैं। एक बार, 'ब्रह्मा जी' ने दृढ़ निश्चय किया की वो अपने कमल के आसन के मूल आधार देखेंगे, जिस से उन्हें मुल भूमि मिल जाएगी। तदनंतर उनके द्वारा जल में उत्तर कर पद्म के मूल को ढूंढने का प्रयास किया गया परन्तु वो अपने आसन कमल के मूल तक नहीं पहुँच पाये। आकाशवाणी हुई की, तपस्या करो, तदनंतर 'ब्रह्मा जी' ने कमल के आसन पर बैठ हजारों वर्ष तक तपस्या की। कुछ काल पश्चात् पुनः आकाशवाणी हुई सृजन करो, परन्तु 'ब्रह्मा जी' समझ नहीं पाये की किसकी सृजन करे, कैसे करे। उनके सोचते सोचते, उन के सन्मुख मधु तथा कैटभ नाम के दो महा दैत्य आये, जो उन से युद्ध करना चाहते थे तथा जिसे देख 'ब्रह्मा जी' डर गए। तदनंतर 'ब्रह्मा जी' अपने आसन कमल के नाल का आश्रय ले महासागर में उतरे, जहाँ उन्होंने एक अत्यंत सुन्दर एवं अद्भुत पुरुष को देखा, जो मेघ के समान श्याम वर्ण के थे। शंख, चक्र, गदा, पद्म अपने चारो हाथों में धारण किये हुए, तथा शेष नाग की शैय्या पर शयन करते हुऐ उन्होंने महा विष्णु को देखा। महा विष्णु को देख, 'ब्रह्मा जी' के मन में चिंता जागृत हुई और वे आदि शक्ति की सहायता हेतु स्तुति करने लगे, जिनकी तपस्या में वे सदा निमग्न रहते थे। परिणाम स्वरूप निद्रा स्वरूपी, आदि शक्ति महामाया, महा विष्णु के शरीर से अलग हुई तथा दिव्य अलंकारों, आभूषणो तथा वस्त्रो से युक्त हो, आकाश में विराजमान हुई। तदनंतर महा विष्णु ने निद्रा का त्याग किया और जागृत हुऐ, तत्पश्चात् उन्होंने पाँच हजार वर्षों तक मधु-कैटभ नमक महा दैत्यों से युद्ध किया तथा आद्या शक्ति महामाया की कृपा से अपनी जंघा पर उन महा दैत्यों का मस्तक रख कर, उन दैत्यों का वध किया। वध करने के परिणाम स्वरूप शंकर जी भी वहाँ उपस्थित हुए, जो संहार के प्रतिक हैं।

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तदनंतर, 'ब्रह्मा', विष्णु तथा शंकर द्वारा देवी आदि शक्ति की स्तुति की गई,

तदनंतर, 'ब्रह्मा', विष्णु तथा शंकर द्वारा देवी आदि शक्ति की स्तुति की गई, जिस से प्रसन्न हो कर, आदि शक्ति ने 'ब्रह्मा जी' को सृजन, विष्णु को पालन तथा शंकर को संहार रूपी दाइत्व निर्वाह करने की आज्ञा दी। तत्पश्चात्, 'ब्रह्मा जी' द्वारा आदि शक्ति से प्रश्न किया गया कि, अभी चारो ओर जल ही जल फैला हुआ हैं, पञ्च-तत्व, गुण, तन्मात्राएँ तथा इन्द्रियां, कुछ भी व्याप्त नहीं हैं, वे तीनो देव शक्ति हीन हैं। देवी ने मुस्कुराते हुए उस स्थान पर एक सुन्दर विमान को प्रस्तुत किया और तीनो देवताओ को विमान पर बैठ अद्भुत चमत्कार देखने का आग्रह किया गया, तीनो देवो के विमान पर आसीन होने पर, देवी विमान आकाश में उड़ने लगा।
मन के वेग के समान वो दिव्य तथा सुन्दर विमान, उड़ कर जिस स्थान पर पंहुचा, वहाँ जल नहीं था, इससे तीनो को महान आश्चर्य हुआ तथा उस स्थान पर नर-नारी, वन-उपवन, पशु-पक्षी, भूमि-पर्वत, नदियाँ-झरने इत्यादि विद्यमान थे। उस नगर को देख कर उन तीनो महा देवो को लगा की वो स्वर्ग में आ गए हैं। थोड़े ही समय पश्चात्, वह विमान पुनः आकाश में उड़ गया, तथा एक ऐसे स्थान पर गया, जहाँ, ऐरावत हाथी और मेनका आदि अप्सराओ के समूह नृत्य प्रदर्शित कर रही थी, सेकड़ो गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष रमण कर रहे थे, वहाँ इंद्र भी अपनी पत्नी सची के साथ दृष्टि-गोचर हो रहे थे। वहाँ पर कुबेर, वरुण, यम, सूर्य, अग्नि इत्यादि अन्य देवताओं को देख तीनो को महान आश्चर्य हुआ। तदनंतर तीनो देवताओं का विमान ब्रह्म-लोक की ओर बड़ा, वहाँ पर सभी देवताओं से वन्दित 'ब्रह्मा जी' को विद्यमान देख, सभी विस्मय पर पड़ गए। विष्णु तथा शंकर ने 'ब्रह्मा' से पूछा, ये 'ब्रह्मा' कौन हैं ? 'ब्रह्मा जी' ने उत्तर दिया, मैं इन्हें नहीं जनता हूँ मैं स्वयं भ्रमित हूँ। तदनंतर वो विमान, कैलाश पर्वत पर पंहुचा, वहां तीनो ने वृषभ पर आरूढ़, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण किये हुए, पञ्च मुख तथा दस भुजाओ वाले शंकर जी को देखा। जो व्यग्र चर्म पहने हुए थे तथा गणेश तथा कार्तिक उनके अंग रक्षक रूप में विद्यमान थे, तथा वे तीनो पुनः अत्यंत विस्मय में पड़ गये। तदनंतर उनका विमान कैलाश से भगवान् विष्णु के वैकुण्ठ लोक में जा पंहुचा। पक्षि-राज गरुड़ के पीठ पर आरूढ़, श्याम वर्ण, चार भुजा वाले, दिव्य अलंकारो से अलंकृत भगवान् विष्णु को देख सभी को महान आश्चर्य हुआ तथा सभी विस्मय में पड़ गए तथा एक दूसरे को देखने लगे। इसके बाद पुनः वो विमान वायु की गति से चलने लगा तथा एक सागर के तट पर पंहुचा। वहाँ का दृश्य अत्यंत मनोहर था तथा नाना प्रकार के पुष्प वाटिकाओ से सुसज्जित था, तथा रत्नामलाओ, विभिन्न प्रकार के अमूल्य रत्नों से विभूषित पलंग पर एक दिव्यांगना को बैठे हुए देखा। उन देवी ने रक्तपुष्पों की माला तथा रक्ताम्बर धारण किया हुआ था। वर, पाश, अंकुश और अभय मुद्रा धारण किये हुए, देवी भुवनेश्वरी, त्रि-देवो को दृष्टि-गोचर हुई, जो करोडो उदित सूर्य के प्रकाश के समान कान्तिमयी थी। वास्तव में आदि शक्ति ही भुवनेश्वरी अवतार में, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन तथा निर्माण करती हैं।
देवी समस्त प्रकार के श्रृंगार एवं भव्य परिधानों से सुसज्जित थी तथा उनके मुख मंडल पर मंद मुसकान शोभित हो रही थी। उन भगवती भुवनेश्वरी को देख, त्रि-देव आश्चर्य चकित और स्तब्ध रह गए तथा सोचने लगे ये देवी कौन हैं। 'ब्रह्मा', विष्णु तथा महेश सोचने लगे की, न तो ये अप्सरा हैं, न ही गन्धर्वी और न ही देवांगना, ये सोचते हुए वे तीनो संशय में पड़ गए। तब उन सुन्दर हास्वली हृल्लेखा देवी के सम्बन्ध में, भगवान विष्णु ने अपने अनुभव से शंकर तथा 'ब्रह्मा जी' से कहा; ये साक्षात् देवी जगदम्बा महामाया हैं, तथा हम सब तथा सम्पूर्ण चराचर जगत की कारण रूपा हैं। ये महाविद्या शाश्वत मूल प्रकृति रूपा हैं, सबकी आदि स्वरूप ईश्वरी हैं तथा इन योग-माया महाशक्ति को योग मार्ग से ही जाना जा सकता हैं। ये मूल प्रकृति स्वरूप भगवती महामाया, परम-पुरुष के सहयोग से ब्रह्माण्ड की रचना कर, परमात्मा के सन्मुख उसे उपस्थित करती हैं। तदनंतर तीनो देव भगवती भुवनेश्वरी की स्तुति करने के निमित्त, देवी के चरणों के निकट गए। जैसे ही 'ब्रह्मा', विष्णु तथा शंकर, विमान से उतर कर देवी के सन्मुख जाने लगे, देवी ने उन्हें स्त्रीरूप में परिणीत कर दिया तथा वे भी नाना प्रकार के आभूषणों से अलंकृत तथा वस्त्र धारण किये हुए थे। वे तीनो देवी के सन्मुख जा खड़े हो गए तथा देखा की असंख्य सुन्दर स्त्रियाँ देवी की सेवा में सेवारत थी। तदनंतर, तीनो देवो ने देवी के चरण-कमल के नख में, सम्पूर्ण स्थावर-जंगम ब्रह्माण्ड को देखा, समस्त देवता, 'ब्रह्मा', विष्णु, शिव, समुद्र, पर्वत, नदियां, अप्सराये, वसु, अश्विनी-कुमार, पशु-पक्षी, राक्षस गण इत्यादि सभी देवी के नख में प्रदर्शित हो रहे थे। वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक, कैलाश, स्वर्ग, पृथ्वी इत्यादि समस्त लोक देवी के पद नख में विराजमान थे। तब त्रिदेवो ये समझ गए की ये देवी, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की जननी हैं।


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भुवनेश्वरी संक्षिप्त पूजन

भुवनेश्वरी संक्षिप्त पूजन    
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सामान्य पूजन सामुग्री जैसे आचमनी पात्र ,हल्दी ,कुमकुम ,चंदन ,अष्टगंध ,अक्षत , फूल , माला ,नैवेद्य ,फल ,दीपक (तेल या घी का ),अगरबत्ती आदि का प्रयोग कर सकते है ..
सबसे पहले गुरु ,गणेश इन्हे वंदन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: 
ॐ श्री गणेशाय नम:
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम:
फिर आचमन करे
ह्रीं आत्मतत्वाय स्वाहा
ह्रीं विद्या तत्वाय स्वाहा
ह्रीं शिव तत्वाय स्वाहा
ह्रीं सर्व तत्वाय स्वाहा
फिर गुरु स्मरण करे और पुजन के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे
ॐ श्री गुरुभ्यो नम:
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नम:
ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नम:
अब आसन पर पुष्प अक्षत अर्पण करे
ॐ पृथ्वी देव्यै नमः
चारो तरफ दिशा बंधन हेतु अक्षत फेके
और अपनी शिखा पर दाहिना हाथ रखे
फिर दीपक को प्रणाम करे
दीप देवताभ्यो नमः
कलश में जल डाले और उसमे चन्दन या सुगन्धित द्रव्य डाले
कलश देवताभ्यो नमः
अब अपने आप को तिलक करे
गणेश जी के लिये पुष्प अक्षत अर्पण करे
वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटी समप्रभ
निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा
अब आप हाथ मे जल ,अक्षत ,पुष्प लेकर संकल्प करे की आप आज भुवनेश्वरी साधना कर रहे है और उनकी कृपा से आपकी जो समस्या है उसका निवारण हो ..
गुरुस्मरण कर सदगुरु का पंचोपचार पूजन करे
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: गंधं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: पुष्पम समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: धूपं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: दीपं समर्पयामि
ॐ गुं गुरुभ्यो नम: नैवेद्यम समर्पयामि
अब चंद्रमा का ध्यान करे
दधि शंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् !
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम !!
ॐ सों सोमाय नम:
सोम आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत और एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्वाय धीमहि तन्नो चंद्र: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर चंद्रमा की प्रार्थना करे
रोहिणीश: सुधामूर्ति: सुधागान्नो सुधाशन : !
विषमस्थानसंभूतां पीडां दहतु मे विधु: !!
फिर राहु का ध्यान करे
वंदे राहुं धूम्रवर्ण अर्धकायं कृतांजलीम !
विकृतास्यं रक्तनेत्रं धूम्रलंकारमन्वहम "
ॐ रां राहवे नम:
राहू आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत और एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर प्रार्थना करे
महाशिर्षो महावक्त्रो महादंष्ट्रो महायश: !
अनुश्च ऊर्ध्वकेशश्च पीडां दहतु मे तम:
फिर केतु का ध्यान करे
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकं !
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् !!
ॐ कें केतवे नम:
केतु आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम: तर्पयामि स्वाहा
पुष्प अक्षत अर्पण करे ..एक आचमनी जल अर्पण करे ..
फिर एक आचमनी जल मे पुष्प और चंदन गंध मिलाकर अर्घ्य दे
ॐ पद्म पुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात्
फिर हाथ जोडकर प्रार्थना करे
अनेकरुपवर्णश्च शतशो अथ सहस्त्रश: !
उत्पातरुपी घोरश्च पीडां दहतु मे शिखी: !!
अब आप भगवती भुवनेश्वरी जी का ध्यान का जो मंत्र है उसे पढे और उनका आवाहन करे
ध्यान मंत्र :-
उदत दिन द्युतिम इंदुं किरिटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम !
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशाभितिकरां प्रभजे भुवनेशीम !!
ह्रीम भुवनेश्वर्यै नम :
मा भगवती राजराजेश्वरी भुवनेश्वरी आवाहयामि मम पूजा स्थाने मम हृदये स्थापयामि पूजयामि नम:
अब आवाहनादि मुद्राये आती हो तो प्रदर्शित करे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: आवाहिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: संस्थापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निधापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निरुद्धा भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सम्मुखी भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: अवगुंठिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: वरदो भव सुप्रसन्नो भव
अब भगवती पाश ,अंकुश, वर ,अभय ,
ज्ञान , पुस्तक और योनि मुद्रा दिखाये
फिर भुवनेश्वरी देवी का पंचोपचार पूजन करे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: गंधं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: पुष्पं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: धूपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: दीपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: नैवेद्यं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: तांबूलं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सर्वोपचारार्थे पुन: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि
इसके बाद अगर आवरण पूजन करना हो तो करे .. या फिर भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र का पाठ करे .. फिर भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमंगल कवच स्तोत्र और अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र का पाठ करे .. इनमेसे तिनो का या जितना हो सके उतने स्तोत्रो का पाठ कर स्फटिक माला से यथा शक्ती किसी एक मंत्र का जाप करे .. कमसे कम खडगमाला का और कवच का पाठ करना ना भूले ..
मंत्र :- निम्न मे से कोइ एक
१) ॐ ह्रीम नम:
२) ऐं ह्रीं श्रीं
फिर मंत्र जाप भगवती को समर्पित करे और एक आचमनी जल मे कुंकुम या अष्टगंध मिलाकर भगवती को अर्घ्य दे
ह्रीं भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात् ..
अंत मे क्षमाप्रार्थना करे .. ॐ मां ..

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श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रम्

श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रम्    
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अथानन्दमयीं साक्षाच्छब्दब्रह्मस्वरूपिणीम् ।
ईडे सकलसम्पत्त्यै जगत्कारणमम्बिकाम् ॥
विद्यामशेषजननीमरविन्दयोने- आद्यामशेष
र्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयित्रीम् ।
सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां
स्तुत्वा गिरं विमलयाम्यहमम्बिके त्वाम् ॥ १॥
पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण
होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः ।
देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ता
हेतुस्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ॥ २॥
त्रिस्रोतसः सकलदेवसमर्च्चितायाः
वैशिष्ट्यकारणमवैमि तदेव मातः ।
त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु
शम्भोर्जटासु सततं परिवर्तनं यत् ॥ ३॥
आनन्दयेत्कुमुदिनीमधिपः कलाना-
न्नान्यामिनः कमलिनीमथ नेतरां वा ।
एकस्य मोदनविधौ परमेकमीष्टे
त्वं तु प्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्ट्या ॥ ४॥
आद्याप्यशेषजगतान्नवयौवनासि
शैलाधिराजतनयाप्यतिकोमलासि ।
त्रय्याः प्रसूरपि तया न समीक्षितासि
ध्येयासि गौरि मनसो न पथि स्थितासि ॥ ५॥
आसाद्य जन्म मनुजेषु चिराद्दुरापं
तत्रापि पाटवमवाप्य निजेन्द्रियाणाम् ।
नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्रि ये त्वां
निःश्रेणिकाग्रमधिरुह्य पुनः पतन्ति ॥ ६॥
कर्पूरचूर्णहिमवारिविलोडिते
ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धैः ।
आराधयन्ति हि भवानि समुत्सुकास्त्वां
ते खल्वखण्डभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ॥ ७॥
आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सरोजे
सुप्ता हि राजसदृशी विरचय्य विश्वम् ।
विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती
पद्मानि पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ॥ ८॥
तन्निर्गतामृतरसैरभिषिच्य गात्रं
मार्गेण तेन विलयं पुनरप्यवाप्ता ।
येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयु-
र्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि गर्भभाजः ॥ ९॥
आलम्बिकुण्डलभरामभिरामवक्त्रा-
मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् ।
चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्यहस्ता-
मावर्तयामि मनसा तव गौरि मूर्तिम् ॥ १०॥
आस्थाय योगमविजित्य च वैरिषट्क-
माबध्य चेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने ।
पाशाङ्कुशाभयवराढ्यकरांशुवक्त्रा-
मालोकयन्ति भुवनेश्वरि योगिनस्त्वाम् ॥ ११॥
उत्तप्तहाटकनिभां करिभिश्चतुर्भि-
रावर्तितामृतघटैरभिषिच्यमाना ।
हस्तद्वयेन नलिने रुचिरे वहन्ती
पद्मापि साभयकरा भवसि त्वमेव ॥ १२॥
अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि-
र्द्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिवासम् ।
दूर्वादलद्युतिरमर्त्यविपक्षपक्षा-
न्न्यक्कुर्वती त्वमसि देवि भवानि दुर्गे ॥ १३॥
आविर्न्निदाघजलशीकरशोभिवक्त्रां
गुञ्जाफलेन परिकल्पितहारयष्टिम् ।
रत्नांशुकामसितकान्तिमलङ्कृतां त्वा-
माद्यां पुलिन्दतरुणीमसकृन्नमामि ॥ १४॥
हंसैर्गतिः क्वणितनूपुरदूरदृष्टे
मूर्तेरिवाप्तवचनैरनुगम्यमानौ ।
पद्माविवोर्द्ध्वमुखरूढसुजातनालौ
श्रीकण्ठपत्नि शिरसैव दधे तवाङ्घ्री ॥ १५॥
द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव दृग्भ्या-
मुत्पाद्यता त्रिनयनं वृषकेतनेन ।
सान्द्रानुरागभवनेन निरीक्ष्यमाणे
जङ्घे उभे अपि भवानि तवानतोऽस्मि ॥ १६॥
ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ
स्थौल्येन मार्द्दवतया परिभूतरम्भौ ।
श्रोणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ
स्तम्भाविवाङ्गवयसा तव मध्यमेन ॥ १७॥
श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतोच्चै-
र्बाल्यात्परेण वयसा परिकृष्णसारः ।
रोमावलीविलसितेन विभाव्यमूर्ति-
र्मध्यं तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ॥ १८॥
सख्यास्स्मरस्य हरनेत्रहुताशभीरो-
र्ल्लावण्यवारिभरितं नवयौवनेन ।
आपाद्य दत्तमिव पल्लवमप्रविष्टं
नाभिं कदापि तव देवि न विस्मरेयम् ॥ १९॥
ईशोऽपि गेहपिशुनं भसितं दधाने
काश्मीरकर्द्दममनु स्तनपङ्कजे ते ।
स्नानोत्थितस्य करिणः क्षणलक्षफेनौ
सिन्दूरितौ स्मरयतः समदस्य कुम्भौ ॥ २०॥
कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्तिधारा
शोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजेन ।
कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ
मातर्मम स्मृतिपथं न विलज्जयेताम् ॥ २१॥
नात्यायतं रुचिरकम्बुविलासचौर्यं
भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् ।
कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये
सञ्चिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ॥ २२॥
अत्यायताक्षमभिजातललाटपट्टं
मन्दस्मितेन दरफुल्लकपोलरेखम् ।
बिम्बाधरं खलु समुन्नतदीर्घनासं
यत्ते स्मरत्यसकृदम्ब स एव जातः ॥ २३॥
आविस्त्वयारकरलेखमनल्पगन्ध-
पुष्पोपरि भ्रमदलिव्रजनिर्विशेषम् ।
यश्चेतसा कलयते तव केशपाशं
तस्य स्वयं गलति देवि पुराणपाशः ॥ २४॥
श्रुतिसुरचितपाकं धीमतां स्तोत्रमेतत्
पठति य इह मर्त्यो नित्यमार्द्द्रान्तरात्मा ।
स भवति पदमुच्चैस्सम्पदां पादनम्र-
क्षितिपमुकुटलक्ष्मीर्ल्लक्षणानां चिराय ॥ २५॥
इति श्रीभुवनेश्वरीस्तोत्रं समाप्तम् ॥
हिन्दी रुपान्तर -
श्री भुवनेश्वरी-स्तवः
हे माँ । आप श्री विश्वाद्या हो, अखिल ब्रह्माण्ड की जननी हो, ब्रह्माँ,
विष्णु, शिव की माता तथा अखिल विश्व को सृष्ट करनेवाली,
पोषण देनेवाली तथा लय करनेवाली हो । आप श्री के स्तवन से मेरी
वाक्य-रचना वाणी पवित्र हो ॥ १॥
हे माँ, पार्वति! पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यजमान,
सोम तथा सूर्य में जो महा-शिव व्यापक हैं तथा जो मदन को दहन
करनेवाले हैं, उन महाप्रभु शिव की भी त्रैलोक्य-सहार-शक्ति
आपसे ही उत्पन्न हुई है ॥ २॥
हे माँ! आप श्री की पवित्र चरण-से पवित्र हुई शिव के शिर की जटा
में तीन स्रोतवाली त्रिधार श्री भागीरथी गङ्गा विश्व-पूज्या हैं
तथा इसी कारण उनका प्राधान्य है ॥ ३॥
हे माँ, हे विश्व-जननि! चन्द्र से एकमात्र कुमुदिनी ही खिलती है ।
सूर्य से एकमात्र कमल का ही आनन्द बढता हे, अन्य का नहीं । इस
प्रकार एक-एक वस्तु के सुखार्थं एक-एक पदार्थ ही निर्दिष्ट हुआ
है परन्तु आप श्री तो सारे विश्व को श्री-दृष्टि से आनन्द देनेवाली
हो ॥ ४॥
हे माँ! विश्व में आप श्री सर्वादि-भूता होकर भी निरन्तर नव-यौवना
रहती हो । आप श्री अत्यन्त कठिन पर्वत-राज की पुत्री होने पर भी
अत्यन्त सु-कोमला हो । वेद आदि सद्-ग्रन्थ आप श्री से उत्पन्न होकर भी
आप श्री के-अनन्त गुण-कथन में असमर्थ हैं । आप श्री ध्यानगम्य
होकर भी किसी के मन में स्थिर नहीं होती हो ॥ ५॥
हे माँ! जो व्यक्ति दुर्लभ नर-जन्म में बुद्धि आदि दिव्य इन्द्रियों की
सहायता पाकर भी आपकी आराधना नहीं करते, वे मुक्ति की सीढी पर
चढकर भी पुनः गिरते हैं ॥ ६॥
हे माँ, हे भवानि! जो व्यक्ति कर्पूर-चूर्ण विलोडित (मिले हुए) शीतल
जल से घर्षित (घिसे हुए) चन्दन तथा सुगन्ध-युक्त पुष्पों से
उत्सुक-चित्त से आप श्री की आराधना करते हैं, वे सर्व-भुवनों
के अधिपति होते हैं ॥ ७॥
हें माँ, हे जननि! आप श्री मूलाधार चक्र में सर्वाकारा श्री कुण्डलिनी
रूप से स्थित होकर सारे विश्व को उत्पत्र करती हो तथा मूलाधार से
ऊर्ध्व में स्थित पद्यों को बिजली की रेखा के समान भेदकर सहस्रार-
स्थित परम शिव से सङ्ग करती हो (यह विद्युल्लता श्री कुण्डलिनी
अभ्यास से जागृत होती है ) ॥ ८॥
हे महेश्वर-कुटुम्बिनि है माँ! आप श्री सहस्रार-निर्गत
सुधा-पीयूष-रस से स्वदेह को स्नान कर सुषुम्ना-मार्ग में फिर
प्राप्त हो पुनः आधार-चक्र में विश्राम करती हो । जिस साधक
के हृत्कमल में आप श्री के इस रूप का भावोदय नहीं होता, वह
वारंवार (जन्म-मरणादि) गर्भवास भोगता है ॥ ९॥
हे माँ! आप श्री के लम्बे केश हैं । आप श्री का मुख अत्यन्त मनोहर
है । आप श्री पीन-स्तना हो । आप श्री की पतली कमर है तथा आप
श्री की चार भुजाओं में ज्ञानमुद्रा, जप-माला, कलश तथा पुस्तक
विराजमान है । है माँ! आप श्री की ऐसी छटा को नमस्कार है ॥ १०॥
हे माँ, हे विश्वेशि! योगि-जन योगाभ्यास से काम, क्रोध, मद,
लोभ, मत्सरादि को विजय कर इन्द्रिय-निरोध-द्वारा प्रफुल्लित चित्त
से प्राण-परा पाशांकुश-वराभय हाथवाली आप श्री का दर्शन करते
हैं ॥ ११॥
हे माँ! प्रतप्त सुवर्ण वर्णवाली, चार हाथियों द्वारा जल-पूरित
घटाभिषिक्ता, दो हाथों में पद्म तथा दो हाथों में वराभय-युक्ता
श्री महा-लक्ष्मी आप ही हो ॥ १२॥
हे भा, हे भवानि! श्रीसिंह-वाहना नाना अस्त्र-धारिणी, अष्ट-भुजा,
दूर्वा-दल-द्युति, सुरासुर-विजया, श्रीदुर्गा-रूप-धारिणी आप हि
हो ॥ १३॥
हे माँ! प्रस्वेद-बुन्द-सुशोभित मुख-कमलवाली गुञ्जा-फल-निर्मित
हार-यष्टी धारण किये हुये रत्नांशुका, रत्नवसना,
कृष्ण-कान्तियुता, श्रीअनङ्गवशी (काम को वशमें करनेवाली) आप
श्री का मैं सदा स्मरण करता हूँ ॥ १४॥
हे माँ, हे नील-कण्ठे! जिस प्रकार हंस नूपुर-ध्वनि से आकर्षित
होते हैं, उसी प्रकार वेद आप श्री के चरण-कमलो का अनुगमन
करते हैं । आप श्री के चरण-कमल ऊर्ध्व-मुख नील-कमल-वत्
प्रत्यन्त शोभा पा रहे हैं । मैं आपके उन्हीं दोनों चरण-कमलों
को अपने मस्तक पर धारण करता हूँ ॥ १५॥
हे माँ, हे भवानि! विश्वनाथ वृषभ-ध्वज श्रीमहा-शिवजी दो
नेत्रों से आप श्री के दर्शन कर तृप्त न हुए । अतः तीसरे नेत्र को
उत्पन्न कर गाढ़ानुराग-सहित आप श्री की जङ्घा का उन्होने दर्शन किया ।
आप श्री की उन जङ्गाओं को प्रणाम है, वारम्बार प्रणाम है ॥ १६॥
हे माँ! आप श्री की ऊरु हस्ति-शुण्ड-गर्व-खर्वा हैं, स्थूलता, आर्द्रता
एवं कोमलता में केले के स्तम्भ को विजय करनेवाली है । आप श्री के
देह के मध्य देश का भाग चाप श्री के नितम्बों ने हरण कर लिया
हो, ऐसा प्रतीत होता है अर्थात् मध्य देश ने ही स्तम्भ-रूप में
आप श्री के नितम्ब जङ्घादि निर्मित किये हों, ऐसा भासता है ॥ १७॥
हे माँ! आप श्री के मध्य देश से मानो आप श्री के नितम्ब, तथा
स्तन-मण्डल दोनों ने उच्चता तथा स्व-विस्तार के लिए सार खिंच
लिया है । अतः आप श्री का मध्यदेश क्षीण हो गया है । आप श्री का
यह मध्य देश मेरे हृदय में स्फुरित हो ॥ १८॥
हे माँ, हे जननि! श्री भगवान् महा-शिव के तृतीय नेत्राग्नि से
भय को प्राप्त हुए श्री मदन के रक्षार्थ श्रीमदन-प्रिया रति
ने स्व-लावण्य-जल-भरित सरोवर-वत् आप श्री की नाभि का निर्माण
किया हो, ऐसा प्रतीत होता है । आप श्री की इस नाभि को मैं कभी न
भूलूँ ॥ १९॥
हे माँ, हे जननि! आप श्री के दोनों कुच-कमलों में भस्म लगी
हुई है । ( इससे श्री भगवान् शिव ने आप श्री का आलिंगन किया हो,
ऐसा भासता है ) तथा आप श्री के स्तन-युगल केसर-पद्म-मूलादि
से अनुलिप्त हैं । स्नान कर निकले हुए मद-युक्त हाथी के क्षण
मात्र फेन-लक्षित सिन्दुरवाले गण्ड-स्थल के समान आप श्री के
कुच-युगल शोभा पा रहे हैं ॥ २०॥
हे माँ! पार्श्व में उत्तम कान्ति-धारा-सम शोभती आप श्री की दोनो
भुजाएं इस प्रकार शोभा दे रही हैं, मानो श्री मदन ने अपने
शत्रु श्री शिव का कण्ठ-ग्रहण करने के लिये लम्बा पाश बनाया
हो । हे माँ! आप श्री की इन दोनों भुजाओ का मेरे चित्त में सदैव
स्मरण रहे ॥ २१॥
हे माँ, हे गिरिकन्ये! आप श्री की मनोहर कम्बु-ग्रीवा को, जो अति दीर्घ
नहीं है, जिसमें अनेक प्रकार के आभूषण विद्यमान हैं तथा जिसमें
अनेक मनोहर गुण भरे हुए हैं, स्मरण करता हुआ मेरा मन कभी
तृप्त न हो ॥ २२॥
हे माँ, हे विश्व-जननि! आप श्री के आकर्ण खिंचे हुये अति दीर्घ
नेत्र हैं, परम मनोहर विशाल भाल है, स्मित हास्य से कपोल
प्रफुल्लित दीखते हैं, बिम्बाफल-वत् लाल अधर हैं, उठी हुई
दीर्घ नासिका है । जो पुरुष आप श्री के दिव्य मुखपद्य का स्मरण
करते हैं, उन्हीं का जन्म सफल हैं ॥ २३॥
हे देवि, हे माँ! आप श्री के केशपाश भाल-चन्द्रिका से प्रकाशित हो
रहे हैं, स्वल्प-सुगधिन्त फल गुञ्जित भ्रमर-वत् हो रहे हैं
(रत्यन्ते) । जो आप श्री के केशों का इस प्रकार चिन्तन करता है,
वह जगज्जाल से छूट जाता ॥ २४॥
आर्द्र-चित्त से स्तोत्र पाठ करने से सम्पत्ति का आधार बनता है
तथा उसके चरणों में राजपुरुष भी झुकते हैं ॥ २५॥
इति श्रीभुवनेश्वरीस्तवः सम्पूर्णः ।

Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.

श्री भुवनेश्वर्यष्टकम् ॥



श्री भुवनेश्वर्यष्टकम् ॥
अथ श्रीभुवनेश्वर्यष्टकम् ।
श्रीदेव्युवाच -
प्रभो श्रीभैरवश्रेष्ठ दयालो भक्तवत्सल ।
भुवनेशीस्तवम् ब्रूहि यद्यहन्तव वल्लभा ॥ १॥
ईश्वर उवाच -
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि भुवनेश्यष्टकं शुभम् ।
येन विज्ञातमात्रेण त्रैलोक्यमङ्गलम्भवेत् ॥ २॥
ऊं नमामि जगदाधारां भुवनेशीं भवप्रियाम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदां रम्यां रमणीयां शुभावहाम् ॥ ३॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देवि ! त्वं यज्ञा यज्ञनायिका ।
त्वं नाथा त्वं तमोहर्त्री व्याप्यव्यापकवर्जिता ॥ ४॥
त्वमाधारस्त्वमिज्या च ज्ञानज्ञेयं परं पदम् ।
त्वं शिवस्त्वं स्वयं विष्णुस्त्वमात्मा परमोऽव्ययः ॥ ५॥
त्वं कारणञ्च कार्यञ्च लक्ष्मीस्त्वञ्च हुताशनः ।
त्वं सोमस्त्वं रविः कालस्त्वं धाता त्वञ्च मारुतः ॥ ६॥
गायत्री त्वं च सावित्री त्वं माया त्वं हरिप्रिया ।
त्वमेवैका पराशक्तिस्त्वमेव गुरुरूपधृक् ॥ ७॥
त्वं काला त्वं कलाऽतीता त्वमेव जगतांश्रियः ।
त्वं सर्वकार्यं सर्वस्य कारणं करुणामयि ॥ ८॥
इदमष्टकमाद्याया भुवनेश्या वरानने ।
त्रिसन्ध्यं श्रद्धया मर्त्यो यः पठेत् प्रीतमानसः ॥ ९॥
सिद्धयो वशगास्तस्य सम्पदो वशगा गृहे ।
राजानो वशमायान्ति स्तोत्रस्याऽस्य प्रभावतः ॥ १०॥
भूतप्रेतपिशाचाद्या नेक्षन्ते तां दिशं ग्रहाः ।
यं यं कामं प्रवाञ्छेत साधकः प्रीतमानसः ॥ ११॥
तं तमाप्नोति कृपया भुवनेश्या वरानने ।
अनेन सदृशं स्तोत्रं न समं भुवनत्रये ॥ १२॥
सर्वसम्पत्प्रदमिदं पावनानाञ्च पावनम् ।
अनेन स्तोत्रवर्येण साधितेन वरानने ।
समप्दो वशमायान्ति भुवनेश्याः प्रसादतः ॥ १३॥
इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीभुवनेश्वर्यष्टकं सम्पूर्णम् ।
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