Tuesday, 20 August 2019

तुलसी जयंती । श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन

तुलसी जयंती । श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है।  https://goo.gl/maps/N9irC7JL1Noar9Kt5 
 इस वर्ष यह तिथि । गोस्वामी तुलसीदास ने कुल 12 पुस्तकों की रचना की है, लेकिन सबसे अधिक ख्याति उनके द्वारा रचित रामचरितमानस को मिली। दरअसल, इस महान ग्रंथ की रचना तुलसी ने अवधीभाषा में की है और यह भाषा उत्तर भारत के जन-साधारण की भाषा है। इसीलिए तुलसीदास को जन-जन का कवि माना जाता है।
तुलसीदास रामभक्त कहलाते हैं। वे राम की मर्यादा, वीरता और सामान्यजनके प्रति उनके प्रेम से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अध्ययन किया, तो पाया कि यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखा गया है, जो आमजनकी भाषा नहीं है। सच तो यह है कि भगवान राम द्वारा साधारण मानव के रूप में किए गए सद्कर्मोकी कथा को सामान्य लोगों तक पहुंचाने के लिए ही तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। हिंदी भाषा के विकास में इस ग्रंथ का योगदान अतुलनीय है।
ऐसा माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संभवत:सम्वत् 1532में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था। कहा जाता है कि जन्म के समय तुलसीदास रोये नहीं थे और उनके मुख में पूरे बत्तीस दांत थे। लोगों का मानना है कि तुलसीदास संपूर्ण रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के अवतार थे। उनके बचपन का नाम रामबोलाथा। ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास को अपनी सुंदर पत्नी रत्नावली से अत्यंत लगाव था। एक बार तुलसीदास ने अपनी पत्नी से मिलने के लिए उफनती नदी को भी पार कर लिया था। तब उनकी पत्नी ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा- जितना प्रेम मेरे इस हाड-मांस के बने शरीर से कर रहे हो, उतना स्नेह यदि प्रभु राम से करते, तो तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती। यह सुनते ही तुलसीदास की चेतना जागी और उसी समय से वह प्रभु राम की वंदना में जुट गए।
अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति !
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ?
तुलसीदास जयंती के अवसर पर देशभर में रामचरितमानस के पाठ का आयोजन होता है। श्रद्धालु राम-सीता और हनुमान के मंदिर जाते हैं तथा तुलसीदास को स्मरण करते हैं।
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वरलक्ष्मी व्रतम् शुक्रवार,

वरलक्ष्मी व्रतम् शुक्रवार, अगस्त 9, 2019 को
सिंह लग्न पूजा मुहूर्त (प्रातः) - 06:28 ए एम से 08:38 ए एम
अवधि - 02 घण्टे 10 मिनट्स
वृश्चिक लग्न पूजा मुहूर्त (अपराह्न) - 13:00 से 15:15 
अवधि - 02 घण्टे 15 मिनट्स
कुम्भ लग्न पूजा मुहूर्त (सन्ध्या) - 19:09 से 20:44
अवधि - 01 घण्टा 35 मिनट्स
वृषभ लग्न पूजा मुहूर्त (मध्यरात्रि) - 23:58 से 01:57 ,
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्
श्री सूक्त,,हरिः ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्र​जाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
प्रभासां यशसा लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
कर्दमेन प्रजाभूता सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस गृहे ।
नि च देवी मातरं श्रियं वासय कुले ॥१२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम् ॥१५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
पद्मानने पद्म ऊरु पद्माक्षी पद्मासम्भवे ।
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥१७॥
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।
धनं मे जुषताम् देवी सर्वकामांश्च देहि मे ॥१८॥
पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम् ॥१९॥
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते ॥२०॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु ॥२१॥
न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा ॥२२॥
वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः ।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि ॥२३॥
पद्मप्रिये पद्म पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विष्णु मनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥२४॥
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी ।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभर नमिता शुभ्र वस्त्रोत्तरीया ॥२५॥
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैस्स्नापिता हेमकुम्भैः ।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥२६॥
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम् ।
दासीभूतसमस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम् ॥२७॥
श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध विभव ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम् ।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥२८॥
सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीस्सरस्वती ।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥२९॥
वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् ।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीस्वरीं त्वाम् ॥३०॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३१॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥३२॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णोः प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥३३॥
महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३४॥
श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महियते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥३५॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥३६॥
य एवं वेद ॐ महादेव्यै च विष्णुपत्नीं च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥३७॥!!
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पुत्रदा एकादशी श्रावण मास शुक्ल पक्ष की

पुत्रदा एकादशी श्रावण मास शुक्ल पक्ष की,,11 अगस्त , रविवार 2019
युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’

राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा

प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।

उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय
ज्योतिष और रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,
लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।

यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।
इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।
मम समस्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं श्रावणशुक्लैकादशीव्रतमहं करिष्ये
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बहुला चतुर्थी ,भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बहुला गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।

बहुला चतुर्थी व्रत से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है।
 जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप लेकर अवतार लिया। कामधेनु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई।
भगवान श्रीकृष्ण का बहुला गाय से बड़ा स्नेह था। एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में चर रही थी तब भगवान सिंह रूप में प्रकट हो गए। मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली, 'हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है। बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी।'
सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं, तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा ही रह जाऊंगा। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आऊंगी। बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया। बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई।
बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि 'हे बहुला, तुम परीक्षा में सफल हुई। अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ-माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा।

बहुला चौथ का पर्व मनाया जाएगा। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बहुला गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन बहुला चतुर्थी व्रत किया जाता है। इसे संकटनाशक चतुर्थी माना गया है। इसी दिन संकष्टी गणेश चतुर्थी होने के कारण यह व्रत अधिक महत्व का होगा। बहुला चतुर्थी व्रत में गौ-पूजन को बहुत महत्व दिया गया है।

बहुला चौथ की पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन माताएं कुम्हारों द्वारा मिट्टी से भगवान शिव-पार्वती, कार्तिकेय-श्रीगणेश तथा गाय की प्रतिमा बनवा कर मंत्रोच्चारण तथा विधि-विधान के साथ इसे स्थापित करके पूजा-अर्चना करने की मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि इस तरह के पूजन से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती हैं।
बहुला चतुर्थी (चौथ) तिथि को भगवान श्री कृष्ण ने गौ-पूजा के दिन के रूप में मान्यता प्रदान की है। अत: इस दिन श्री कृष्‍ण भगवान का गौ माता का पूजन भी किया जाता है।

कैसे करें बहुला चौथ का व्रत
बहुला चतुर्थी व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।

इस चतुर्थी को आम बोलचाल की भाषा में बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।

इस दिन चाय, कॉफी या दूध नहीं पीना चाहिए, क्योंकि यह दिन गौ-पूजन का होने से दूधयुक्त पेय पदार्थों को खाने-पीने से पाप लगता है। इस संबंध में यह मान्यता है कि इस दिन गाय का दूध एवं उससे बनी हुई चीजों को नहीं खाना चाहिए।

जो व्यक्ति चतुर्थी को दिनभर व्रत रखकर शाम (संध्या) के समय भगवान श्री कृष्‍ण, शिव परिवार तथा गाय-बछड़े की पूजा करता है उसे अपार धन तथा सभी तरह के ऐश्वर्य और संतान की चाह रखने वालों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

बहुला व्रत माताओं द्वारा अपने पुत्र की लंबी आयु की कामना के लिए रखा जाता है।

इस व्रत को करने से शुभ फल प्राप्त होता है, घर-परिवार में सुख-शांति आती है एवं मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

यह व्रत करने से परिवार और संतान पर आ रहे विघ्न संकट तथा सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।

इतना ही नहीं यह व्रत जन्म-मरण की योनि से मुक्ति भी दिलाता है।
बहुला चौथ की कथा
विष्णु जी जब कृष्ण रूप में धरती में आये थे, तब उनकी बाल लीलाएं सभी देवी देवता को भाती थी. गोपियों के साथ उनकी रास लीला हो या माखन चोरी कर खाना, इन सभी बातों से वे सबका मन मोह लेते थे. कृष्ण जी लीलाओं को देखने के लिए कामधेनु जाति की गाय ने बहुला के रूप में नन्द की गोशाला में प्रवेश किया. कृष्ण जी को यह गाय बहुत पसंद आई, वे हमेशा उसके साथ समय बिताते थे. बहुला का एक बछड़ा भी था, जब बहुला चरने के लिए जाती तब वो उसको बहुत याद करता था।

एक बार जब बहुला चरने के लिए जंगल गई, चरते चरते वो बहुत आगे निकल गई, और एक शेर के पास जा पहुंची. शेर उसे देख खुश हो गया और अपना शिकार बनाने की सोचने लगा. बहुला डर गई, और उसे अपने बछड़े का ही ख्याल आ रहा था. जैसे ही शेर उसकी ओर आगे बढ़ा, बहुला ने उससे बोला कि वो उसे अभी न खाए, घर में उसका बछड़ा भूखा है, उसे दूध पिलाकर वो वापस आ जाएगी, तब वो उसे अपना शिकार बना ले. शेर ये सुन हंसने लगा, और कहने लगा मैं कैसे तुम्हारी इस बात पर विश्वास कर लूँ. तब बहुला ने उसे विश्वास दिलाया और कसम खाई कि वो जरूर आएगी।

बहुला वापस गौशाला जाकर बछड़े को दूध पिलाती है, और बहुत प्यार कर, उसे वहां छोड़, वापस जंगल में शेर के पास आ जाती है. शेर उसे देख हैरान हो जाता है. दरअसल ये शेर के रूप में कृष्ण होते है, जो बहुला की परीक्षा लेने आते हैं। कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं और बहुला को कहते है कि मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हुआ, तुम परीक्षा में सफल रही. समस्त मानव जाति द्वारा सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन तुम्हारी पूजा अर्चना की जाएगी और समस्त जाति तुम्हें गौमाता कहकर संबोधित करेगी। कृष्ण जी ने कहा कि जो भी ये व्रत रखेगा उसे सुख, समृद्धि, धन, ऐश्वर्या व संतान की प्राप्ति होगी।

बहुला चतुर्थी का उत्सव कैसे मनाया जाए
1.बहुला चतुर्थी के पवित्र दिन पर, भक्त सुबह जल्दी उठते हैं, एक पवित्र स्नान करते हैं और फिर गायों के साथ-साथ बछड़ों को नहलाते हैं और उनके छप्पर (गायों के रहने का स्थान) को साफ करते हैं।
2.भक्त इस दिन बहुला चतुर्थी का उपवास रखते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लोगों को चाकू से कटा हुआ या गेहूं से बना कुछ भी खाद्य पदार्थ उपभोग करने की अनुमति नहीं होती है।
3.प्रार्थनाओं के लिए, भक्त भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु के मंदिरों में जाते हैं।
4.भक्त भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु की मूर्तियों या चित्रों की पूजा करके घर पर प्रार्थनाएं भी कर सकते हैं। धूप, फल, फूल और चंदन का उपयोग देवता की पूजा के लिए किया जाता है।
5.भक्त भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के मंत्रों का उच्चारण करते हैं एवं ध्यान लगाते हैं।
6.संध्या के समय के दौरान, भक्त बछड़ों और गायों की पूजा करते हैं जिसे गोधुली पूजा के नाम से जाना जाता है।
7.अगर भक्तों के पास कोई गाय नहीं है तो वे गाय और बछड़े की तस्वीर की भी पूजा कर सकते हैं और उनकी प्रार्थना कर सकते हैं  .
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बलराम (बलभद्र) जंयती

बलराम (बलभद्र) 21 अगस्त 2019 भगवान वासुदेव के ब्यूह या स्वरूप हैं। उनका कृष्ण के अग्रज और शेष का अवतार होना ब्राह्मण धर्म को अभिमत है। जैनों के मत में उनका संबंध तीर्थकर नेमिनाथ से है। बलराम या संकर्षण का पूजन बहुत पहले से चला आ रहा था, पर इनकी सर्वप्राचीन मूर्तियाँ मथुरा और ग्वालियर के क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं। ये शुंगकालीन हैं। कुषाणकालीन बलराम की मूर्तियों में कुछ व्यूह मूर्तियाँ अर्थात् विष्णु के समान चतुर्भुज प्रतिमाए हैं और कुछ उनके शेष से संबंधित होने की पृष्ठभूमि पर बनाई गई हैं। ऐसी मूर्तियों में वे द्विभुज हैं और उनका मस्तक मंगलचिह्नों से शोभित सर्पफणों से अलंकृत है। बलराम का दाहिना हाथ अभयमुद्रा में उठा हुआ है और बाएँ में मदिरा का चषक है। बहुधा मूर्तियों के पीछे की ओर सर्प का आभोग दिखलाया गया है। कुषाण काल के मध्य में ही व्यूहमूर्तियों का और अवतारमूर्तियों का भेद समाप्तप्राय हो गया था, परिणामत: बलराम की ऐसी मूर्तियाँ भी बनने लगीं जिनमें नागफणाओं के साथ ही उन्हें हल मूसल से युक्त दिखलाया जाने लगा। गुप्तकाल में बलराम की मूर्तियों में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। उनके द्विभुज और चतुर्भुज दोनों रूप चलते थे। कभी-कभी उनका एक ही कुंडल पहने रहना "बृहत्संहिता" से अनुमोदित था। स्वतंत्र रूप के अतिरिक्त बलराम तीर्थंकर नेमिनाथ के साथ, देवी एकानंशा के साथ, कभी दशावतारों की पंक्ति में दिखलाई पड़ते हैं।

कुषाण और गुप्तकाल की कुछ मूर्तियों में बलराम को सिंहशीर्ष से युक्त हल पकड़े हुए अथवा सिंहकुंडल पहिने हुए दिखलाया गया है। इनका सिंह से संबंध कदाचित् जैन परंपरा पर आधारित है।

मध्यकाल में पहुँचते-पहुँचते ब्रज क्षेत्र के अतिरिक्त - जहाँ कुषाणकालीन मदिरा पीने वाले द्विभुज बलराम मूर्तियों की परंपरा ही चलती रही - बलराम की प्रतिमा का स्वरूप बहुत कुछ स्थिर हो गया। हल, मूसल तथा मद्यपात्र धारण करनेवाले सर्पफणाओं से सुशोभित बलदेव बहुधा समपद स्थिति में अथवा कभी एक घुटने को किंचित झुकाकर खड़े दिखलाई पड़ते हैं। कभी-कभी रेवती भी साथ में रहती हैं।
जन्म
बलराम का जन्म यदूकुल में हुआ। कंस ने अपनी प्रिय बहन देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से विधिपुर्वक कराया।
जब कंस अपनी बहन को रथ में बिठा कर वसुदेव के घर ले जा रहा था तभी आकाशवाणी हुई और उसे पता चला कि उसकी बहन का आठवाँ संतान ही उसे मारेगा।

कंस ने अपनी बहन को कारागार में बंद कर दिया और क्रमश: 6 पुत्रों को मार दिया, 7वें पुत्र के रूप में नाग के अवतार बलराम जी थे जिसे श्री हरि ने योगमाया से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया।
आठवें गर्भ में कृष्ण थे।
परिचय
बलभद्र या बलराम श्री कृष्ण के सौतेले बड़े भाई थे जो रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। बलराम, हलधर, हलायुध, संकर्षण आदि इनके अनेक नाम हैं। बलभद्र के सगे सात भाई और एक बहन सुभद्रा थी जिन्हें चित्रा भी कहते हैं। इनका ब्याह रेवत की कन्या रेवती से हुआ था। कहते हैं, रेवती 21 हाथ लंबी थीं और बलभद्र जी ने अपने हल से खींचकर इन्हें छोटी किया था।
इन्हें नागराज अनंत का अंश कहा जाता है और इनके पराक्रम की अनेक कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। ये गदायुद्ध में विशेष प्रवीण थे। दुर्योधन इनका ही शिष्य था। इसी से कई बार इन्होंने जरासंध को पराजित किया था। श्रीकृष्ण के पुत्र शांब जब दुर्योधन की कन्या लक्ष्मणा का हरण करते समय कौरव सेना द्वारा बंदी कर लिए गए तो बलभद्र ने ही उन्हें दुड़ाया था। स्यमंतक मणि लाने के समय भी ये श्रीकृष्ण के साथ गए थे। मृत्यु के समय इनके मुँह से एक बड़ा साँप निकला और प्रभास के समुद्र में प्रवेश कर गया था।

बलराम जंयती का महत्व
बलराम जंयती का पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में शेषनाग ने भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में जन्म लिया था। बलराम का अस्त्र हल है इसलिए बलराम को हलधर भी कहा जाता है। इसके अलावा बलराम ने मूसल को भी धारण किया है। बलराम जंयती के अन्य नाम भी है। इस जंयती को हलषष्ठी और हरछठ भी कहा जाता है। बलराम जंयती के दिन धरती से पैदा होने वाले अन्न को ग्रहण किया जाता है। इस जयंती को दूध और दही का सेवन नहीं किया जाता। यह दिन संतान संबंधी परेशानियों के लिए भी उत्तम माना जाता है। जिन महिलाओं को संतान की प्राप्ति नहीं होती वह इस व्रत को पूरे विधि विधान से करती हैं। संतान संबंधी परेशानियों के निवारण के लिए बलराम जंयती काफी शुभ मानी जाती है।
बलराम कौन थे
पुराणों के अनुसार बलराम को भगवान श्री कृष्म का बड़ा भाई माना जाता है। बलराम शेषनाग के ही अवतार थे। बलराम को अत्याधिक शक्तिशाली भी माना जाता था। बलराम ने ही दुर्योधन और भीम को गदा युद्ध सीखाया था। बलराम भी श्री कृष्ण की तरह ही देवकी की संतान थे। बलराम देवकी की संतान थे। कंस देवकी के सभी बच्चों की हत्या कर देता था। देवकी और वासुदेव के तप के बल पर यह सांतवा गर्भ वासुदेव की पहली पत्नी के गर्भ में स्थापित हो गया। लेकिन वासुदेव की पहली पत्नी के आगे यह समस्या थी कि वह इस बच्चे को कैसे पाले। क्योंकि उस समय वासुदेव कंस की करागार में बंद थे। इसलिए बलराम के जन्म लेते ही उन्हें नंद बाबा के यहां पलने के लिए भेज दिया।
बलराम जंयती पूजा विधि
1.बलराम जंयती के दिन महिलाओं को महूआ की दातुन से दांत साफ करने चाहिए।

2.इस दिन पूरे घर को भैंस गोबर से लिपा जाता है।

3.बलराम जंयती के दिन भगवान गणेश और माता गौरा कि पूजा की जाती है।

4.बलराम जंयती पर महिलाएं तालाब के किनारे या घर में ही तालाब बनाकर, उसमें झरबेरी, पलाश और कांसी के पेड़ लगाती हैं।

5.अतं मे महिलाएं बलराम जंयती की कथा सुनती हैं।
बलराम की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक गांव एक ग्वालिन स्त्री गर्भवती थी। उसके प्रसव में कुछ समय ही बाकी था। लेकिन वह अपनी स्थिति की परवाह न करते हुए भी दूध दही को बेचने के लिए निकल पड़ी।

घर से कुछ दूर जाने पर पर ही उसे प्रसव पीड़ा शुरु हो गई और उसने झरबेरी की ओट में एक बच्चे को जन्म दे दिया। उसी दिन हल षष्ठी भी थी। वह ग्वालिन थोड़ी देर आराम करने के बाद फिर से अपने काम पर चली गई। इससे हल षष्ठी का व्रत करने वाले लोगो का व्रत खंडित हो गया।

ग्वालिन की इस गलती के कारण झरबेरी के नीचे लेटे उसके बच्चे को किसान का हल लग गया। किसान ने जब उस बच्चे का रोना सुना तो वह अत्यंत ही दुखी हुआ और बच्चे को झरबेरी के कांटों से टांके लगाकर भाग गया।जब ग्वालिन वापस लौटी तो उसे अपने बच्चे मृत पाया ।

अपने बच्चे को देखकर अपना किया हुआ पाप याद आया। उसने तुरंत ही लोगों को जाकर पूरी बात बताई और अपने बच्चे की दशा के बारे में भी बताया। उसके इस प्रकार से क्षमा मांगने पर सभी गांव वालों ने उसे क्षमा कर दिया। जब ग्वालिन वापस उसी स्थान पर आई तो उसका बच्चा जिंदा था और वह खेल रहा था।।'


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Wednesday, 31 July 2019

हरियाली अमावस्या का बहुत महत्त्व है

हरियाली अमावस्या का बहुत महत्त्व है। इस दिन पूजा करने से जीवन की बहुत सी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
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 इसके साथ ही धन की प्राप्ति के लिए भी यह दिन बेहद खास है। इस दिन पूजा करने से धन लाभ होता है। 
आइए जानते हैं कि कैसे इस दिन पूजा-अर्चना करके अपनी विभिन्न समस्याओं से निजात मिल सकती है।
1. हरियाली अमावस्या के दिन सूरज ढलने के बाद खीर बनाएं और उसे शिव जी को चढ़ाएं।
2. शाम को घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल के दीपक जलाएं।
3. इस दिन हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक जलाएं साथ ही लाल फूल चढ़ाएं, इससे धनलाभ होता है।
4. इस दिन शाम को आखिरी रोटी पर सरसों का तेल लगाकर काले कुत्ते को खिलाएं। इससे शानिदोष दूर होता है और साथ ही आपके घर में हमेशा सुख-शान्ति बनी रहेगी।
5. अमावस्या की रात को तुलसी के सामने सरसों का तेल जलाने से भी धन लाभ होता है।
मेष राशि - भगवान शिव का गाय के दूध से अभिषेक करना लाभदायी रहेगा
वृषभ राशि - आज के दिन भगवान शिव को 5 सफेद पुष्प अर्पण कर पीपल की पूजा करें।
मिथुन राशि - भगवान भोलेनाथ को 11 बिल्वपत्र चढ़ाएं।
कर्क राशि - भगवान शिव को पंचामृत चढ़ाएं।
सिंह राशि - आज शंकरजी को 3 धतूरा चढ़ाएं।
कन्या राशि - आज के दिन काली गाय को गुड़ खिलाकर शिवजी की पूजा करें।
तुला राशि - शिवजी का दुग्धाभिषेक करें, अति लाभदायी रहेगा।
वृश्चिक राशि - शंकरजी को तीर्थ जल चढ़ाने के बाद 5 बिल्वपत्र चढ़ाएं
धनु राशि - शिवजी को 108 बिल्वपत्र चढाकर पूजन करें।
मकर राशि - शिवजी को 2 सफेद मिठाई अर्पित करें।
कुंभ राशि - आज के दिन भोलेनाथ को शहद अर्पित करने से लाभ होगा।
मीन राशि - शिवजी को 5 पीली वस्तु चढ़ाएं, तो मनोकामना पूर्ण होगी।

सावन अौर अमावस्या के योग में पूजा-अर्चना करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं अौर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है। 
अमावस्या के दिन सुबह शीघ्र उठकर स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर तांबे के लोटे में जल लें। जल में चावल अौर फूल डालकर सूर्य को अर्पित करें। 
इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध व काले तिल अर्पित करें। इससे सदैव भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है।
गेहूं के आटे की गोलियां बनाकर अमावस्या के दिन मछलियों को खिलाएं।
अमावस्या के दिन भगवान विष्णु, हनुमान जी या भोलेनाथ के मंदिर में ध्वज लगवाएं।
मंदिर में जाकर हनुमान जी के सामने चमेली का दीपक प्रज्वलित कर हनुमान चालीसा का पाठ करें। उसके बाद हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाएं।
अमावस्या के दिन किसी मंदिर में जाकर अनाज का दान करें। झाडू का भी दान करें। इसके साथ ही ब्राह्मण को भोजन कराना भी शुभ होता है।
अमावस्या को शनिदेव के लिए तेल का दान करें। इसके साथ ही काली उड़द, काले तिल, लोहा, काला कपड़ा आदि चीजों का भी दान करें।
सुबह उठते ही अपनी दोनों हथेलियों को देखें अौर कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम॥ मंत्र का जाप करें। इस उपाय को प्रतिदिन भी किया जा सकता है।
अमावस्या का दिन पितरों के लिए विशेष महत्व होता है। इस दिन पितरों के निमित्त किसी गरीब को दूध का दान करें। इससे पितर प्रसन्न होते हैं
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Sunday, 7 July 2019

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना मंगलवार, अप्रैल 13, 2021 को

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना मंगलवार, अप्रैल 13, 2021 को
पहला नवरात्र, मां शैलपुत्री की पूजा, गुड़ी पड़वा, नवरात्रि आरंभ, घटस्थापना, हिंदू नव वर्ष की शुरुआत। 
घटस्थापना मुहूर्त - 05:56 से 10:08 अवधि - 04 घण्टे 12 मिनट्स
घटस्थापना अभिजित मुहूर्त - 11:49 से 12:39 अवधि - 00 घण्टे 50 मिनट्स
घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि पर है।
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ - अप्रैल 12, 2021 को 08:00 बजे
प्रतिपदा तिथि समाप्त - अप्रैल 13, 2021 को 10:16 बजे
नवरात्रि का पहला दिन 13 अप्रैल 2021  शैलपुत्री
नवरात्रि का दूसरा दिन 14 अप्रैल 2021 ब्रह्मचारिणी
नवरात्रि का तीसरा दिन 15 अप्रैल 2021 चंद्रघंटा
नवरात्रि का चौथा दिन 16 अप्रैल 2021 कूष्मांडा
नवरात्रि का पांचवां दिन 17 अप्रैल 2021स्कंदमाता
नवरात्रि का छठा दिन 18 अप्रैल 2021 कात्यायनी
नवरात्रि का सातवां दिन 19 अप्रैल 2021 कालरात्रि
नवरात्रि का आठवां दिन 20 अप्रैल 2021 महागौरी
नवरात्रि का नौवां दिन  21 अप्रैल 2021 सिद्धिदात्री
नवरात्रि का दसवां दिन 22 अप्रैल 2021 व्रत पारण
चैत्र नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं, यदि कोई इन महाविद्याओं के रूप में 
शक्ति की उपासना करे, तो जीवन धन-
धान्य, राज्य सत्ता, ऐश्वर्य से भर जाता है। गुप्त नवरात्र में
की गई मंत्र साधना निष्फल
नहीं जाती।
सिद्धिदायक हैं  
चैत्र नवरात्र
मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गु# नवरात्र
से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं।
श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के
साथ ही शत्रु संहार के लिए गु# नवरात्र में अनेक
प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते
हैं।
इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज
ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य
की प्राप्ति होती है। "दुर्गावरिवस्या"
नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले मानव
को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं
बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ
माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक
सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। "शिवसंहिता"
के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और
आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए
भी श्रेष्ठ है।
विवाह बाधा करें दूर
कुमारी कन्याओं को भी अच्छे वर
की प्राप्ति के लिए इन
नौ दिनों माता कात्यायनी की पूजा-
उपासना करनी चाहिए। "दुर्गास्तवनम्" जैसे प्रामाणिक
प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि इस मंत्र का 108 बार
जप करने से कुमारी कन्या का विवाह
शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न
हो जाता है।
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।
इसी तरह जिन पुरूषों के विवाह में विलंब
हो रहा हो उन्हें भी लाल
पुष्पों की माला देवी को चढ़ाकर इस मंत्र
के 108 बार जप पूरे नौ दिन तक करने चाहिए-
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।
देवी की महिमा अपार
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में
हुआ था। कभी सागर
की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी
तो कभी पर्वतराज हिमालय
की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति,
दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और
जीवन शक्ति संसार में
जहां कहीं भी दिखाई
देती है,
वहां देवी का ही दर्शन होता है।
ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र
विश्वरूपा देवी को ही देखती है,
इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली,
महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप
में प्रकट होती है। देवीभागवत में
लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु
तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार
करती हैं।
जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति,
पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के
ह्वदय में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व
भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के
रूप में निवास करती है। मार्कण्डेयपुराण कहता है
कि "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। भगवान् विष्णु के
ह्वदय में निवास करने
वाली मां लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान्
शंकर की महिमा बढ़ाने वाली मां तुम
ही हो।"
महानवमी को पूर्णाहुति
गुप्त नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए
अष्टमी और नवमी को आवश्यक रूप से
देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है।
माता के संमुख "जोत दर्शन" एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए।
नारीरूप में पूजित देवी
कूर्मपुराण में धरती पर देवी के बिंब के
रूप में स्त्री का पूरा जीवन
नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया है। जन्म
ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री",
कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" व विवाह से
पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से "चंद्रघंटा"
कहलाती हंै। नए जीव को जन्म देने
के लिए गर्भधारण करने से "कूष्मांडा" व संतान को जन्म देने के
बाद वही स्त्री "स्कंदमाता"
होती है। संयम व साधना को धारण करने
वाली स्त्री "कात्यायनी" व
पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु
को भी जीत लेने से "कालरात्रि"
कहलाती है। संसार का उपकार करने से
"महागौरी" व धरती को छोड़कर स्वर्ग
प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद
देने वाली "सिद्धिदात्री"
मानी जाती है।
नवरात्र में घट स्थापना
शा स्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ
दीवार पर सिंदूर से
देवी की मुख-
आकृति बना ली जाती है।
सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर मिल
जाए, वही चौकी पर स्थापित कर
दी जाती है, परंतु
देवी की असली प्रतिमा तो "घट"
है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और
स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान
किया जाता है। देवी के दायीं ओर जौ व
सामने हवनकुंड। नौ दिनों तक नित्य
देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र व गंध आदि से
षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल
तथा खीर। पूजन और हवन के बाद
"दुर्गास शती" का पाठ करना श्रेष्ठ है। साथ
ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के
लिए नवदुर्गा के प्रत्येक रूप की प्रतिदिन पूजा-
स्तुति करनी चाहिए।
दस महाविद्या व कामना मंत्र
सर्व प्रथम गुप्त नवरात्रों की प्रमुख
देवी सर्वेश्वर्यकारिणी माता को धूप,
दीप, प्रसाद अर्पित करें। रुद्राक्ष
की माला से प्रतिदिन ग्यारह माला ॐ
ह्नीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै
नमो नम:।’ मंत्र का जप करें। पेठे का भोग लगाएं। इसके बाद
मनोकामना के अनुसार निम्न में से किसी मंत्र का जप
करें। यह क्रम नौ दिनों तक गुप्त रूप से जारी रखें।
काली : लम्बी आयु, ग्रह जनित
दुष्प्रभाव, कालसर्प, मांगलिक प्रभाव, अकाल मृत्यु का भय
आदि के लिए काली की साधना करें।
मंत्र- ‘क्रीं ह्नीं ह्नुं दक्षिणे कालिके
स्वाहा:।’
हकीक की माला से नौ माला जप प्रतिदिन
करें।
तारा : तीव्र बुद्धि, रचनात्मकता, उच्च शिक्षा के लिए
मां तारा की साधना नीले कांच
की माला से बारह माला मंत्र जप प्रतिदिन करें।
मंत्र- ‘ह्नीं स्त्रीं हुम फट।’
त्रिपुर सुंदरी : व्यक्तित्व विकास, स्वस्थ्य और
सुन्दर काया के लिए त्रिपुर
सुंदरी देवी की साधना करें।
रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। दस माला मंत्र जप
अवश्य करें।
मंत्र- ‘ऐं ह्नीं श्रीं त्रिपुर
सुंदरीयै नम:।’
भुवनेश्वरी: भूमि, भवन, वाहन सुख के लिए
भुवनेश्वरी देवी की आराधना करें।
स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन जप करें।
मंत्र-‘ह्नीं भुवनेश्वरीयै
ह्नीं नम:।’
छिन्नमस्ता : रोजगार में सफलता, नौकरी,
पदोन्नति आदि के लिए
छिन्नमस्ता देवी की आराधना करें।
रुद्राक्ष की माला से दस माला प्रतिदिन जप करें।
मंत्र- ‘श्रीं ह्नीं ऐं वज्र वैरोचानियै
ह्नीं फट स्वाहा’।
त्रिपुर भैरवी : सुन्दर
पति या पत्नी प्राप्ति, शीघ्र विवाह, प्रेम
में सफलता के लिए मूंगे की माला से पंद्रह माला मंत्र
का जप करें।
मंत्र-
‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।’
धूमावती : तंत्र, मंत्र, जादू टोना,
बुरी नजर, भूत प्रेत, वशीकरण,
उच्चाटन, सम्मोहन, स्तंभन, आकर्षण और मारण
जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के
लिए देवी घूमावती के मंत्र
की नौ माला का जप
मोती की माला से करें।
मंत्र- ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:।’
बगलामुखी: शत्रु पराजय, कोर्ट
कचहरी में विजय, प्रतियोगिता में सफलता के लिए
हल्दी या पीले कांच
की माला से आठ माला मंत्र का जप करें।
मंत्र- ‘ह्नीं बगुलामुखी देव्यै
ह्नी ॐ नम:।’
मातंगी : संतान, पुत्र आदि की प्राप्ति के
लिए स्फटिक की माला से बारह माला मंत्र जप करें।
मंत्र-‘ह्नीं ऐं
भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:।’
कमला : अखंड धन-धान्य प्राप्ति, ऋण मुक्ति और
लक्ष्मी जी की के लिए
देवी कमला की साधना करें। कमल गट्टे
की माला से दस माला प्रतिदिन मंत्र का जप करें।
मंत्र- ‘हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:।’
रात्री का वैज्ञानिक रहस्य
रात्रि का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य क्या है 
 नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारत के प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। नवरात्र के दिन, नवदिन नहीं कहे जाते हैं ।
भारतीय मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (प्रथम तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। और इसी प्रकार ठीक छह मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि कर विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं । सामान्य भक्त ही नहीं बड़े-बड़े धर्मधुरंधर पंडित और साधु- महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागकर साधना करना नहीं चाहते हैं । न तो कोई आलस्य को त्यागना चाहता है ओर ना ही विधिवत कर्म ही करना चाहता है । अपने आप को आस्तिक दिखाने का दिखावा (एक प्रकार का मनोरंजन के जैसे) करते हैं बस । बहुत कम उपासक आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं उनको भी कुछ लोग तान्त्रिक या अन्य निम्नतर की संज्ञा देकर अपमानित करने की नीयत के धनी बैठे हैं । भारतीय मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया है । रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं । आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है ।
हमारे ऋषि – मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी , किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है । इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता – जागता उदाहरण है । कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं , उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है । इसीलिए हमारे ऋषि – मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है । रात्री के समय मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर – दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है । यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है । जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ साधना करते हुए अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं , उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य ही होती है ।
नवरात्र या नवरात्रि ? संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं । नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुध्द है। नवरात्र क्या है ? पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
नौ दिन या रात ? अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है । इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है । इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं ।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है ।
नवरात्रि मै करे नवराण मंत्र की साधना
शास्त्रों मै 4 नवरात्रि का वर्णन है 2 गुप्त नवरात्रि है ओर 2 दृष्टया नवरात्रि है इस बार चेत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रि पारम्ब हो रही है ।नवरात्रि एक ऐसी पल है जहाँ हम भगवती से जुड़कर उनका साणेध्य प्राप्त कर सकते है उनकी कृपा प्राप्त कर सकते है ।जिस तरह से एक बालक गर्भ मै 9 महीने रहता है उसके बाद ही वो गर्भ से निकलकर जीवन मै पूर्ण उत्साह ,पूर्ण निरोगता ,ओर पूर्ण उमंग से जीवन जीता है ये ऊर्जा उसे माँ की गर्भ मै ही मिलती है उसी तरह से ये 9 रात्रि मै माँ की ऊर्जा माँ की सणेध्ये प्राप्त करने की है जीसेय हम भी अपना जीवन पूर्णता के साथ पूर्ण ऊर्जा से जी सके
नवराण मंत्र सभी मँत्रों मै ऊतम मंत्र है की ये स्वयमभूथ मंत्र है जिस तरह से प्रणव ॐ मंत्र स्वयमभूथ है उसी तरह ये भी स्वयमभूथ मंत्र है। बहौत से लौग पूछते है किस तरह से इस नवराण मंत्र का उचारण करना चाहये तो सबसे पहेले मै सभी कॊ बता दूँ की इस मंत्र मै आगेय मै ॐ नही लगेँगा  की जैसा बोला की ये स्वय्म्भुत है वही 3 बीज मंत्र मै आखिरी मै  लगेँगा ना की ।
नवराण मंत्र की साधना सभी ने की है वो कोई सिद्ध हो या कोई भगवान का अवतार नवराण मंत्र की साधना सभी ने की है  की ये साधना सभी द्रुश्टी से पूर्णता देती है इसके कई लाभ बताये गये है शस्त्रों मै जो निम्लिक्थ है 1 - अगर आपके शादी सुधा जीवन मै उमंग नही है ,आप संतान हीन है तो एक बार साधना ज़रूर करे
2 - जीवन मै सभी शत्रुऔ के नाश हेतु ये शेर्स्त साधना है चाइय वो शत्रु गुप्त हो ये प्रतेक्स शत्रु ,आप प्रत्यक्ष शत्रुऔ कॊ देख सकते लीकीन उनका क्या जो आपसे मित्रता का दिखावा करके मन मै शत्रु भाव रखे हुवे है
3 -वही ये साधना पूर्ण चेतना जागरण की करती है
4 -ये साधना के प्रताप से आपके जीवन मै आने वाली सभी धन के अभाव का नाश करके आपके धन के नये नये रास्ते खोल देती है

विनियोग : ॐ अस्ये श्री नवराण मंत्रअसस्य ब्रम्हा विष्णु रुद्र ऋषिय गायत्रीविष्णुअनुषपछनदाशी ,श्री महाकाली महालक्ष्मी महसरस्वती देवता ,ऐम बीजम ह्रीम शक्ति ,क्लीम कील्कम ,श्री महाकाली महालक्ष्मी महसरस्वती प्रीतिअर्थे जापे विनियोग :
वही विनियोग के बाद ऋषिन्यास , करनयश ,हृदय न्यास ,ओर मंत्र ध्यान रहता है
नवराण मंत्र की साधना इसकी पूर्ण अनुष्ठान 9 दिन मै करना है जो बहौत आसानी से हो जाता है ,वही इस साधना मै "शक्ति यंत्र " वो भी अभिमंत्रित होना बहौत ज़रूरी है  की यंत्र मै ही देवता का वास होता है ओर बिना यंत्र के ये साधना मतलब अधूरी मानी जाती है

साधक को नवरात्र में क्या करना चाहिए ?
यदि किसी कारण विशेष के लिए पूजा कर रहे हो तो स्वयं को श्रृंगार, मौजमजा, काम से दूर करें रखें। निश्चित समय में पूजा पाठ करें तथा निश्चित संख्या में जप करें।
जप अवश्य करें। जप के समय मुंह पूर्व या दक्षिण दिशा में हो।
पूजा के लिए लाल फूल, रोली, चंदन, फल दूर्वा, तुलसीदल व कोई प्रसाद अवश्य लें।
नवरात्र के प्रथम दिन देवी का आवाह्न करें और नियमित पूजा करें।
दुर्गा सप्तशती का पाठ प्रतिदिन करें और इसका नियम समझ कर करें।

क्या कुछ ऐसी बाते भी हैं, जो हम इन दिनों में न करें ?
आवश्यकता से अधिक भोजन न करें।
मां को भोग लगाये बना भोजन नहीं करें। प्रतिदिन गाय, मंदिर, अर्चकों तथा आठ वर्ष से छोटी बच्चियों के लिए भोजन अवश्य निकालें।
तामसिक भोजन का प्रयोग बिल्कुल नहीं करें।
खट्टे भोजन का प्रयोग बिल्कुल नहीं करें।
चमड़े की चीजों का प्रयोग न करें।
संध्या पूजन अवश्य करें और पूजा के उपरांत भूखा नहीं रहना चाहिए।
विशिष्ठ गृहस्थ कर्म नहीं करना चाहिए।
झूठ नहीं बोलना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती का गलत पाठ नहीं करें।
माता की ज्योति को पीठ नहीं दिखाएं।
कलश स्थापना के उपरांत पूरे नौ दिन घर को अकेला न छोड़े।
बाहर के जूते-चप्पल उस स्थान से दूर रखें जहां माता तथा कलश स्थापना की हुई है।
तामसिक भोजन न करने वाले लोगों को घर में न आने दें।
माता की पूजा में आडम्बर न करें।
नवरात्र में व्रत व साधना हमें शक्ति, भक्ति, संपन्नता और ज्ञान से परिपूर्ण करती है। लेकिन आम लोग इतनी बड़ी बातें नहीं समझते कि उनकी रोजमर्रा जिंदगी में नवरात्र क्या बदलाव लाते हैं।
मानसिक बल प्राप्त करने के लिए ये 9 दिन बहुत उत्तम होते हैं। जिन लगों को शनि व राहु के कारण समस्याएं हो रही हैं, व भी अपनी पीड़ा ले मुक्ति पा सकते हैं बशर्ते आप सही उपासना रते हैं और कलश स्थापना करते हैं। झूठे मुकदमे में फंस गये हैं तो मुक्ति मिलेगी। यदि आपको महसूस होता है कि आप या आपका परिवार तंत्र से प्रभावित है तो भी सही तरीके से की गई पूजा आपको निजात दिला सकती है।
संतान वह भी उच्च कोटि की संतान प्राप्ति के लिए भी इन दिनों में की गई साधना रंग लाती है।

नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाएं मगर पहले ध्यान रखें ये 4 बातें
नवरात्रि में माता दुर्गा के समक्ष नौ दिन तक अखंड ज्योत जलाई जाती है। यह अखंड ज्योत माता के प्रति आपकी अखंड आस्था का प्रतीक स्वरूप होती है। मान्यता के अनुसार माता के सामने एक-एक तेल व एक शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
मान्यता के अनुसार मंत्र महोदधि (मंत्रों की शास्त्र पुस्तिका) के अनुसार दीपक या अग्नि के समक्ष किए गए जप का साधक को हजार गुना फल प्राप्त हो है। कहा जाता है
दीपम घृत युतम दक्षे, तेल युत: च वामत:।
अर्थात - घी युक्त दीपक देवी के दाहिनी ओर तथा तेल वाला दीपक देवी के बाई ओर रखनी चाहिए।
- अखंड ज्योत पूरे नौ दिनों तक अखंड रहनी चाहिए। इसके लिए एक छोटे दीपक का प्रयोग करें। जब अखंड ज्योत में घी डालना हो, बत्ती ठीक करनी हो तो या गुल झाडऩा हो तो छोटा दीपक अखंड दीपक की लौ से जलाकर अलग रख लें।
-यदि अखंड दीपक को ठीक करते हुए ज्योत बुझ जाती है तो छोटे दीपक की लौ से अखंड ज्योत पुुन: जलाई जा सकती है छोटे दीपक की लौ को घी में डूबोकर ही बुझाएं।
नवरात्रों में माँ दुर्गा के जो भक्त वर्ष में दो बार माँ की विधि सहित पूजा अर्चना करते हैं वो जाने अनजाने नवदुर्गा की भक्ति से नवग्रहों को स्वत: ही शांत कर लेते हैं आइये जाने – बुध – कन्या , शुक्र -स्त्री , चंदर – माता ये तीनो रूप स्त्रीलिंग होने से ‘माँ जगम्बा’ के ही माने जाते हैं और पूजन विधि तो साक्षात् नवग्रह शांति है जहाँ कुम्भ स्थापित करके खेत्री बीजी जाती है वहां ये नज़ारा साक्षात् है
ध्यान से देखे तो (घडा -बुध) (जौं – राहु) (जल – चन्द्रमा) (अखंड ज्वाला – मंगल) (लाल दुप्पटा – केतु) (माँ का वस्त्र और देसी घी-शुक्र) (काले चने – शनि) (मीठा हलवा – मंगल) (पूजन विधि और माँ का शेर – गुरु) (दिन/रात की अखंड ज्योति सेवा – सूर्य और शनि) (नारियल – राहु का सर) और अंत में कंजक पूजन और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले पंडित जी दोनों को भेंट और दक्षिणा देना ‘बुध’ और ‘गुरु’ को प्रसन्न करना आदि आदि….ये सारी विधि ऋषि मार्कण्डेय द्वारा माँ की भक्ति करते हुए समस्त संसार को प्रदान की गयी है और जो भक्त इस विधि से पूजन-अर्चन करता है उसकी जन्म पत्रिका के नवग्रह स्वयं ही माँ दुर्गा के शक्ति आशीर्वाद से शांत हो कर शुभ प्रभाव देने लग जाते हैं

 नवरात्रि पर्व ,काल (समय) चक्र के विभाग अनुसार पूरे एक दिन-रात में चार संधिकाल होते हैं. जिनको हम प्रात:काल, मध्यान्ह काल, सांयकाल और मध्यरात्रि काल कहते हैं. जब हमारा एक वर्ष हो जाता है, तब देव-असुरों का एक दिन-रात होता है. जिसे कि ज्योतिष शास्त्र में दिव्यकालीन अहोरात्र कहा गया है. ये दिन-रात छ:-छ: माह के होते हैं. इन्ही को हम उतरायण और दक्षिणायन के नाम से जानते हैं. यहाँ 'अयन' का अर्थ है---मार्ग. (उतरायण=उत्तरी ध्रुव से संबंधित मार्ग, जो कि देवों का दिन और दक्षिणायन=दक्षिणी ध्रुव से संबंधित मार्ग, जिसे देवों की रात्रि कहा जाता है)
जिस प्रकार मकर और कर्क वृ्त से अयन(मार्ग) परिवर्तन होता है, उसी प्रकार मेष और तुला राशियों से उत्तर गोल तथा दक्षिण गोल का परिवर्तन होता है. एक वर्ष में दो अयन परिवर्तन की संधि और दो गोल परिवर्तन की संधियाँ होती है. कुल मिलाकर एक वर्ष में चार संधियाँ होती हैं. इनको ही नवरात्री के पर्व के रूप में मनाया जाता है.
1. प्रात:काल (गोल संधि) चैत्री नवरात्र
2. मध्यान्ह काल (अयन संधि) आषाढी नवरात्र
3. सांयकाल (गोल संधि) आश्विन नवरात्र
4. मध्यरात्रि (अयन संधि) पौषी नवरात्र
उपरोक्त इन चार नवरात्रियों में गोल संधि की नवरात्रियाँ चैत्र और आश्विन मास की हैं, जो कि दिव्य अहोरात्र के प्रात:काल और सांयकाल की संधि में आती हैं----इन्हे ही विशेष रूप से मनाया जाता है. हालाँकि बहुत से लोग हैं, जिनके द्वारा अयन संधिगत (आषाढ और पौष) मास की नवारत्रियाँ भी मनाई जाती हैं, लेकिन विशेषतय: यह समय तान्त्रिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है---गृ्हस्थों के लिए गोल संधिगत नवरात्रियों का कोई विशेष महत्व नहीं है.
जिन चान्द्रमासों में नवरात्रि पर्व का विधान है, उनके क्रमश: चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी और पुष्य नक्षत्रों पर आधारित हैं. वैदिक ज्योतिष में नाक्षत्रीय गुणधर्म के प्रतीक प्रत्येक नक्षत्र का एक देवता कल्पित किया हुआ है. इस कल्पना के गर्भ में विशेष महत्व समाया हुआ है, जो कि विचार करने योग्य है.
भारतीय ज्योतिष शास्त्र कालचक्र की संधियों की अभिव्यक्ति करने में समर्थ है. प्राचीन युगदृ्ष्टा ऋषि-मुनियों नें विभिन्न तौर-तरीकों से अभिनव रूपकों में प्रकृ्ति के सूक्ष्म तत्वों को समझाने के तथा उनसे समाज को लाभान्वित करने के अपनी ओर से विशेष प्रयास किए हैं. संधिकाल में सौरमंडल के समस्त ग्रह पिण्डों की रश्मियों का प्रत्यावर्तन तथा संक्रमण पृ्थ्वी के समस्त प्राणियों को प्रभावित करता है. अत: संधिकाल में दिव्यशक्ति की आराधना, संध्या उपासना आदि करने का ये विधान बनाया गया है.
अयन, गोल तथा ऋतुओं के परिवर्तन मानव मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं. मानव मस्तिष्क, जो कि अनन्त शक्ति स्त्रोतों का अक्षय भंडार है. उसमें जहाँ संसार के निर्माण करने की स्थिति है, वहीं संहार करने की शक्ति भी केन्द्रित है. यही कारण है कि त्रिगुणात्मक महाकाली, महासरस्वती और महादुर्गा हमारी आराध्य रही हैं.
यह पर्व रात्रि प्रधान इसलिए है कि शास्त्रों में "रात्रि रूपा यतोदेवी दिवा रूपो महेश्वर:" अर्थात दिन को शिव(पुरूष)रूप में तथा रात्रि को शक्ति(प्रकृ्ति)रूपा माना गया है. एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं, फिर भी शिव(पुरूष)का अस्तित्व उसकी शक्ति(प्रकृ्ति) पर ही आधारित है.
सो, इस बात को समझने की जरूरत है कि अखिल पिण्ड ब्राह्मंड के समस्त संकेत के पारखी ऋषि-मुनियों नें नैसर्गिक सुअवसरों को परख कर हमें विशेष रूप से संस्कारित बनाने का प्रयास किया है. त्रिविध ताप नाश की इस पुनीत पर्व की गरिमा को समझते हुए हमें दिव्यशक्ति की आराधना, उपासना करते हुए पूर्ण मर्यादासहित(मन को विषय भोगों से दूर रख) नवरात्रि पूजन करना आवश्यक है. यह समय किसी धर्म, जाति या सम्प्रदाय विशेष से सम्बन्धित न होकर मानव मात्र के लिए कल्याणप्रद है

अपनी राशि अनुसार पूजा चुने 
मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।
मेष  मेष राशि के जातक शक्ति उपासना के लिए द्वितीय महाविद्या तारा की साधना करें। ज्योतिष के अनुसार इस महाविद्या का स्वभाव मंगल की तरह उग्र है। मेष राशि वाले महाविद्या की साधना के लिए इस मंत्र का जप करें।
मंत्र
   ह्रीं स्त्रीं हूं फट् ।
वृषभ  वृषभ राशि वाले धन और सिद्धि प्राप्त करने के लिए श्री विद्या यानि षोडषी देवी की साधना करें और इस मंत्र का जप करें।
मंत्र  ऐं क्लीं सौ: ।
मिथुन  अपना गृहस्थ जीवन सुखी बनाने के लिए मिथुन राशि वाले भुवनेश्वरी देवी की साधना करें। साधना मंत्र इस प्रकार है।
मंत्र  ऐं ह्रीं ।
कर्क  इस नवरात्रि पर कर्क राशि वाले कमला देवी का पूजन करें। इनकी पूजा से धन व सुख मिलता है। नीचे लिखे मंत्र का जप करें।
मंत्र  ऊं श्रीं ।
सिंह  ज्योतिष के अनुसार सिंह राशि वालों को मां बगलामुखी की आराधना करना चाहिए। जिससे शत्रुओं पर विजय मिलती है।
मंत्र  ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम: ।
कन्या  आप चतुर्थ महाविद्या भुवनेश्वरी देवी की साधना करें आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी।
मंत्र    ऐं ह्रीं ऐं
तुला   तुला राशि वालों को सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए षोडषी देवी की साधना करनी चाहिए।
मंत्र  ऐं क्लीं सौ: ।
वृश्चिक  वृश्चिक राशि वाले तारा देवी की साधना करें। इससे आपको शासकीय कार्यों में सफलता मिलेगी।
मंत्र  श्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट् ।
धनु  धन और यश पाने के लिए धनु राशि वाले कमला देवी के इस मंत्र का जप करें।
मंत्र   श्रीं ।
मकर   मकर राशि के जातक अपनी राशि के अनुसार मां काली की उपासना करें।
मंत्र  क्रीं कालीकाये नम: ।
कुंभ  कुंभ राशि वाले भी काली की उपासना करें इससे उनके शत्रुओं का नाश होगा।
मंत्र  क्रीं कालीकाये नम: ।
मीन  इस राशि के जातक सुख समृद्धि के लिए कमला देवी की उपासना करें।
  मंत्र- श्री कमलाये नम:। 
Astrologer Gyanchand Bundiwal M. 0 8275555557.





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